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ट्रांसफर आदेश पर हाईकोर्ट की रोक, 200 शिक्षक नहीं होंगे स्थानांतरित

 जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति मनिंदर सिंह भट्टी की एकलपीठ ने जबलपुर सहित राज्य के अन्य जिलों के एकलव्य आवासीय विद्यालयों में पदस्थ 200 शिक्षकों को सामूहिक रूप से खंडवा स्थानांतरित करने के आदेश को अनुचित पाया। इसी के साथ आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी। कोर्ट ने शिक्षकों को वर्तमान एकलव्य विद्यालय में पदस्थ रखने की व्यवस्था दी है। याचिकाकर्ता एकलव्य आवासीय विद्यालय, रामपुर छापर में पदस्थ उपमा शांडिल्य की ओर से अधिवक्ता सुधा गौतम ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि 23 सितंबर, 2025 को आदेश जारी कर याचिकाकर्ता सहित जबलपुर सहित राज्य के अन्य जिलों के विभिन्न एकलव्य आवासीय विद्यालयों में पदस्थ 200 शिक्षकों को सामूहिक रूप से खंडवा स्थानांतरित कर दिया गया था। याचिकाकर्ता 2024 में उच्च पद प्रभार पर रामपुर छापर के एकलव्य आवासीय विद्यालय में पदस्थ हुई थी। दरअसल, 11 नवंबर, 2024 को संभागायुक्त, जबलपुर ने एक पत्र जारी किया था, जिसके जरिये साफ किया गया था कि एकलव्य विद्यालयों में स्थान नहीं है, इसलिए शिक्षक स्थानांतरण के विकल्प पेश करें। जिसके बाद याचिकाकर्ता ने एकलव्य विद्यालय, रामपुर छापर, रांझी व सदर के विकल्प भरे थे। इसके बावजूद इन विकल्पों को दरकिनार कर खंडवा भेजने का आदेश जारी कर दिया गया। इसी लिए हाई कोर्ट की शरण ली गई। हाई कोर्ट ने सुनवाई के बाद 23 सितंबर, 2025 के आदेश को अनुचित पाकर स्थानांतरण पर रोक लगा दी।

हाईकोर्ट ने जयपुर रियासत के ‘महाराज’ और ‘राजकुमारी’ उपाधियों पर लगाई रोक

जयपुर राजस्थान हाईकोर्ट ने पूर्व जयपुर राजपरिवार के वंशजों को गृह कर लगाने के मामले में अपनी याचिकाओं से महाराज और राजकुमारी उपसर्ग हटाने का निर्देश दिया है। हाईकोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि 13 अक्तूबर तक सुधार नहीं किया गया तो 24 साल पुराने मामले को बिना सुनवाई के खारिज कर दिया जाएगा। जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल ने पिछले सप्ताह गृह कर लगाने से संबंधित 24 वर्ष पुराने मामले में यह आदेश जारी किया। याचिका जयपुर राजघराने के दिवंगत जगत सिंह और पृथ्वीराज सिंह के कानूनी उत्तराधिकारियों की ओर से दायर की गई है। कोर्ट ने वाद शीर्षक में शाही सम्मानसूचक शब्दों के प्रयोग पर आपत्ति जताई तथा याचिकाकर्ताओं को संशोधित दस्तावेज दाखिल करने का निर्देश दिया। इसमें कहा गया है कि यदि अगली सुनवाई से पहले आदेश का पालन नहीं किया गया तो मामला सुनवाई किए बिना खारिज कर दिया जाएगा।

हाईकोर्ट में भाषण देते हुए जज माहेश्वरी ने चुनी मातृभाषा हिंदी

  बिलासपुर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की रजत जयंती का अवसर सोमवार को इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज हो गया. न्याय और आस्था के इस संगम को और गरिमामय बनाने मंच पर राज्यपाल रमेन डेका, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस प्रशांत मिश्रा, तेलंगाना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पी. सैम कोशी तथा पूर्व जज मनींद्र मोहन श्रीवास्तव की उपस्थिति रही. इस कार्यक्रम को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.के. माहेश्वरी ने संबोधित करते हुए कहा कि मैं छत्तीसगढ़ आया हूं तो हिंदी में ही बोलूंगा… जस्टिस माहेश्वरी का आत्मीय संबोधन जस्टिस जे.के. माहेश्वरी ने अपने संबोधन में कहा कि “मैं छत्तीसगढ़ आया हूं तो हिंदी में ही बोलूंगा. मैं मध्यप्रदेश का हूं और छत्तीसगढ़ से मेरा आत्मीय जुड़ाव है. बेंच और बार एक रथ के दो पहिए हैं, और कर्म ही सच्चा धर्म है.”  उन्होंने आगे कहा- “न्यायालय इमारतों से नहीं, बल्कि आम जनता को मिलने वाले न्याय से पहचाना जाएगा. आने वाले 25 वर्ष न्यायपालिका की उपलब्धियों और सबकी सहभागिता से तय होंगे.” चीफ जस्टिस सिन्हा ने गिनाई उपलब्धियां छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा ने रजत जयंती अवसर पर संबोधित करते हुए कहा कि बीते 25 वर्षों में हाईकोर्ट ने लंबित मामलों को घटाने और न्यायिक ढांचे को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं. जनता की आस्था अटूट रहेगी: तोखन साहू समारोह में केंद्रीय मंत्री तोखन साहू ने भरोसा जताया कि न्यायपालिका पर जनता की आस्था हमेशा अटूट रहेगी. उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने 25 वर्षों की यात्रा में जिस तरह से न्याय के नए आयाम गढ़े हैं, वह आने वाले समय में और भी प्रेरणादायी साबित होंगे.

दिल्ली दंगों के आरोपियों की रोक लगाने की याचिका खारिज, अब जल्द रिलीज होगी विवादित फिल्म

नई दिल्ली/ इंदौर  भारत की पहली वन-शॉट हिंदी फीचर फिल्म ‘2020 दिल्ली’ अब 14 नवंबर 2025 को देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज होने जा रही है। यह फिल्म पूरी तरह इंदौर में शूट की गई है। फिल्म को लेकर लंबे समय से विवाद और विरोध चलते रहे, लेकिन आखिरकार दिल्ली हाईकोर्ट ने सभी याचिकाएं खारिज करते हुए इसे रिलीज की हरी झंडी दे दी।दिल्ली दंगों के 7 आरोपियों ने हाईकोर्ट में फिल्म पर रोक लगाने की अपील की थी। वहीं, मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने फिल्म की तारीफ की है। उन्होंने कहा कि इस तरह की फिल्म बनती रहना चाहिए। CAA का मुद्दा तो उस दौरान भी सही था और आज भी सही है। आरोपियों की रोक लगाने की मांग खारिज दिल्ली दंगों से जुड़े सात आरोपियों ने कोर्ट में फिल्म पर रोक लगाने की अपील की थी। उनका कहना था कि फिल्म से लोगों की नजरों में उनके खिलाफ नकारात्मक छवि बनेगी। लेकिन हाईकोर्ट ने साफ कह दिया कि रचनात्मक आज़ादी पर रोक नहीं लगाई जा सकती। फिल्म को सेंसर बोर्ड से UA 16+ सर्टिफिकेट मिला है।  दंगों के आरोपियों ने क्यों की थी बैन की मांग भारतीय सिनेमा में एक नया कीर्तिमान स्थापित करते हुए, पूरी तरह से इंदौर में शूट की गई देश की पहली वन-शॉट हिंदी फीचर फिल्म “2020 दिल्ली” 14 नवंबर, 2025 को सिनेमाघरों में रिलीज होने के लिए तैयार है। देवेंद्र मालवीय द्वारा निर्देशित यह फिल्म अपनी अनूठी तकनीक और संवेदनशील विषय के कारण रिलीज से पहले ही काफी विवादों में घिर गई थी, लेकिन अंततः सेंसर बोर्ड और दिल्ली हाईकोर्ट से इसे हरी झंडी मिल गई है। विवादों और कानूनी लड़ाई को पार किया निर्देशक देवेंद्र मालवीय ने बताया कि फिल्म का ट्रेलर सामने आते ही इस पर राजनीतिक बहस छिड़ गई थी। कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने इसे “भाजपा का प्रोपेगेंडा” बताते हुए चुनाव आयोग से इस पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी। इसके अलावा, दिल्ली दंगों के सात आरोपियों, जिनमें शरजील इमाम भी शामिल हैं, ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कर फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने की मांग की। उनका तर्क था कि फिल्म उनके खिलाफ जनमानस में पूर्वाग्रह पैदा कर सकती है। हालांकि, कोर्ट ने रचनात्मक स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए सभी सात याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिसके बाद सेंसर बोर्ड ने फिल्म को UA 16+ सर्टिफिकेट प्रदान किया। भारतीय सिनेमा में एक नया कीर्तिमान “2020 दिल्ली” को बिना किसी कट के एक ही टेक में शूट किया गया है, जिसकी कुल अवधि 2 घंटे 16 मिनट है। यह भारतीय सिनेमा में अपनी तरह का पहला प्रयोग है। अब तक इस तकनीक का इस्तेमाल केवल हॉलीवुड और वर्ल्ड सिनेमा में ही देखा गया है। फिल्म का लेखन, निर्देशन और निर्माण देवेंद्र मालवीय ने किया है। मध्य प्रदेश की प्रतिभा को मिला मंच यह फिल्म मध्य प्रदेश के फिल्म उद्योग के लिए एक मील का पत्थर मानी जा रही है। इसकी पूरी शूटिंग इंदौर में हुई है और इसमें 300 से अधिक स्थानीय कलाकारों और तकनीशियनों ने काम किया है। फिल्म का पोस्ट-प्रोडक्शन और संगीत भी इंदौर में ही तैयार किया गया है, जो स्थानीय प्रतिभा को बढ़ावा देने का एक बड़ा उदाहरण है। CAA और दिल्ली दंगों पर आधारित कहानी फिल्म की कहानी नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थियों की पीड़ा और 2020 में हुए दिल्ली दंगों की घटनाओं के इर्द-गिर्द घूमती है। फिल्म यह दर्शाने का प्रयास करती है कि कैसे CAA के विरोध की आड़ में देश के खिलाफ एक वैचारिक और सांस्कृतिक हमला किया गया। आय का हिस्सा हिंदू शरणार्थियों को निर्देशक देवेंद्र मालवीय ने घोषणा की है कि फिल्म से होने वाली आय का एक हिस्सा पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए दान किया जाएगा। उन्होंने कहा, “यह फिल्म प्रोपेगेंडा नहीं, बल्कि मेरी 5 साल की मेहनत और सच्चाई का पक्ष है।” बुधवार को भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय ने फिल्म का शीर्षक गीत “युद्ध कर” लॉन्च किया, जिसे संस्कृत और हिंदी शब्दों में लिखा गया है।  डायरेक्टर बोले- हमने पूरी ताकत लगाई फिल्म के लेखक, डायरेक्टर और निर्माता देवेंद्र मालवीय का कहना है कि शुरुआत से ही फिल्म को लेकर उनका अनुभव शानदार रहा। लेकिन जब विवाद खड़ा हुआ तो टीम ने और ज्यादा मेहनत की। उन्होंने कहा – “कुछ लोग किसी भी हाल में इस फिल्म को रोकना चाहते थे, लेकिन हमने हिम्मत नहीं हारी। आखिरकार हमारी मेहनत रंग लाई।” “बीमारी का इलाज नाम लेने से ही होता है” देवेंद्र मालवीय ने फिल्म के विरोध करने वालों पर तंज कसते हुए कहा कि अगर किसी बीमारी का नाम ही न लिया जाए तो उसका इलाज कैसे होगा? इसी तरह समाज की समस्याओं पर खुलकर बात करना ज़रूरी है। विजयवर्गीय ने की तारीफ, टैक्स फ्री कराने का वादा भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय ने फिल्म के टाइटल सॉन्ग ‘युद्ध कर’ को लॉन्च किया। इस गीत को हिंदी और संस्कृत शब्दों में लिखा गया है और इसे भी डायरेक्टर मालवीय ने ही लिखा है। विजयवर्गीय ने कहा कि वह चाहते हैं यह फिल्म ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे। उन्होंने भरोसा दिलाया कि सरकार से बात कर फिल्म को टैक्स फ्री कराने की कोशिश करेंगे। इंदौर से निकली आग पूरे देश में फैलेगी विजयवर्गीय ने कहा कि यह गर्व की बात है कि इंदौर के निर्देशक ने इतनी बड़ी फिल्म बनाई है। उन्होंने कहा – “फिल्म में जो आग दिखाई गई है, वह इंदौर से उठकर पूरे देश में असर दिखाए।”

फारूक हत्याकांड में आरोपियों को हाईकोर्ट से बड़ी राहत, उम्रकैद से हुई कम

बिलासपुर रायपुर के बहुचर्चित फारूक खान हत्याकांड में हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने तीनों आरोपियों की उम्रकैद की सजा घटाकर 10-10 साल कर दी है। कोर्ट ने माना कि यह हत्या अचानक हुए झगड़े में गुस्से का नतीजा था, इसमें पहले से कोई साजिश या योजना नहीं थी। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस बीडी गुरु की खंडपीठ में हुई। दरअसल, 14 फरवरी 2022 की रात रायपुर के बैजनाथपारा में एक शादी समारोह में डीजे पर डांस को लेकर बहस शुरू हुई। आपसी विवाद बढ़ा तो गुस्से में राजा उर्फ अहमद रजा ने जेब से चाकू निकाला और फारूक खान के सीने पर वार कर दिया। फारूक को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उसकी मौत हो गई। घटना के बाद पुलिस ने राजा के साथ उसके साथियों मोहम्मद इश्तेखार और मोहम्मद शाहिद को गिरफ्तार किया। ट्रायल कोर्ट ने फरवरी 2024 में राजा को हत्या (धारा 302) और दोनों साथियों को हत्या में सहभागिता (302/34) में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट में बचाव पक्ष ने कहा कि यह घटना अचानक हुई, कोई पूर्व नियोजित साजिश नहीं थी। मेडिकल रिपोर्ट से भी साफ है कि एक ही चाकू का वार हुआ। राज्य पक्ष ने सजा बरकरार रखने की मांग की, लेकिन कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मामला आईपीसी की धारा 300 के अपवाद 4 के तहत आता है, यानी अचानक हुए झगड़े में हत्या हुई है। इस मामले में आरोपी राजा को 302 में उम्रकैद, इश्तेखार और शाहिद को 302/34 में उम्रकैद की सजा दी गई थी। वहीं हाईकोर्ट ने तीनों आरोपियो को धारा 304 (भाग-1) यानी गैरइरादतन हत्या में 10-10 साल कठोर कैद और 500-500 रुपये का जुर्माना लगाया है। आर्म्स एक्ट में एक साल की सजा पहले जैसी रहेगी और सारी सजाएं साथ-साथ चलेंगी। कोर्ट ने कहा कि शादी में अचानक शुरू हुए विवाद में कोई पूर्व योजना या हथियारबंद साजिश नहीं दिखती। यह हत्या नहीं बल्कि कुलपेबल होमिसाइड है, इसलिए सजा में राहत दी जाती है।

सड़कें सुधारो, या जवाब दो: हाईकोर्ट ने PWD और NHAI को कड़ा नोटिस दिया

बिलासपुर छत्तीसगढ़ की जर्जर सड़कों और लगातार हो रहे सड़क हादसों पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने कहा कि नेशनल हाईवे-343 और एनएच-130 जैसे मार्गों की खराब हालत और ब्लैक स्पाटों के कारण आम लोगों की जान जा रही है। कोर्ट ने लोक निर्माण विभाग (PWD) और नेशनल हाईवे अथारिटी ऑफ इंडिया (NHAI) के हलफनामे पेश होने के बाद कहा कि अब जिम्मेदार एजेंसियां जवाबदेह बनें और जल्द सुधारात्मक कदम उठाएं। कोर्ट ने कहा कि नागरिकों की जान बचाना सर्वोच्च प्राथमिकता है। लापरवाही करने वाले किसी भी विभाग या कंपनी को बख्शा नहीं जाएगा। मामले की अगली सुनवाई 10 अक्टूबर को होगी। यह मामला उस समय हाईकोर्ट के संज्ञान में आया, जब एक पिकअप वाहन के ब्रेक फेल होने से 19 लोगों की मौत हो गई थी। चालक वाहन छोड़कर कूद गया और गाड़ी 35 फीट गहरी खाई में गिर गई। हादसे की खबरें अखबारों में प्रकाशित हुईं तो कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेकर मामले को जनहित याचिका के रूप में दर्ज किया। पीडब्ल्यूडी सचिव ने कोर्ट में कहा कि अंबिकापुर-रामानुजगंज-गढ़वा रोड (एनएच-343) की हालत सुधारने के लिए करीब 740 करोड़ की मंजूरी केंद्र सरकार से मिल चुकी है। तीन पैकेजों में काम बांटा गया है। मई 2025 में ठेका भी दे दिया गया है, लेकिन बारिश की वजह से काम ठप है। फिलहाल 2.81 करोड़ की लागत से अस्थायी मरम्मत जारी है। वहीं ब्लैक स्पाटों को सुधारने के लिए कई प्रस्ताव केंद्र को भेजे गए हैं, लेकिन मंजूरी का इंतजार है। एनएचएआई ने बताया कि बिलासपुर, मुंगेली और बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के 10 ब्लैक स्पाटों में से कई को हटाया जा चुका है। बिलासपुर के सेंदरी जंक्शन पर नई सर्विस रोड 90 प्रतिशत तैयार हो चुकी है। लिमतरा मोड़ पर 3.98 करोड़ की लागत से सर्विस रोड बनाने का टेंडर जारी हो चुका है। कोर्ट कमिश्नर की रिपोर्ट में पता चला कि कोरबा से रायपुर तक के एनएच-130 पर स्थित पावर प्लांट्स की राख (फ्लाई ऐश) ढोते समय पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं करते। ट्रकों से उड़ने वाली राख दिन में भी जीरो विजिबिलिटी बना देती है। इससे सड़क हादसे तो होते ही हैं। साथ ही आसपास के गांवों में सांस की बीमारियां भी फैल रही है। कोर्ट ने माना कि इससे हाईवे पर हुए मरम्मत कार्य भी बर्बाद हो रहे हैं। कोर्ट ने एनटीपीसी और सीएसपीजीसीएल को छोड़कर बाकी पावर प्लांट्स जैसे केएसके महानदी, डीबी पावर (बरादरहा), बालको, एसकेएस पावर, एसीबी पावर और अन्य स्वतंत्र बिजली उत्पादकों से स्पष्टीकरण मांगा है। छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल को भी पार्टी बनाकर कहा गया है कि वे अपना हलफनामा कोर्ट में पेश करें। हाईकोर्ट ने साफ किया कि अब मामले की नियमित मानिटरिंग होगी।

हाईकोर्ट की टिप्पणी: MPPSC शेड्यूल को अभी मंजूरी नहीं, सभी पक्षों की सुनवाई जरूरी

जबलपुर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा व न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ के समक्ष मंगलवार को एमपी-पीएससी मुख्य परीक्षा-2025 के मामले की सुनवाई हुई। मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की ओर से हाई कोर्ट में मुख्य परीक्षा का शेड्यूल पेश कर इसे मंजूर करने का आग्रह किया गया। हाई कोर्ट ने उसे फिलहाल मंजूरी नहीं दी। कोर्ट ने कहा कि दूसरे पक्ष को भी सुनना जरूरी है। इसी के साथ मामले की सुनवाई नौ अक्टूबर तक के लिए स्थगित की दी गई। दरअसल, आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों भोपाल निवासी सुनीत यादव, नरसिंहपुर निवासी पंकज जाटव व बैतूल निवासी रोहित कावड़े की ओर से याचिका दायर की गई है। उनकी ओर से कोर्ट को अवगत कराया गया कि एमपीपीएससी द्वारा कुल 158 पदों की भर्ती के लिए प्रारंभिक परीक्षा के परिणाम पांच मार्च को घोषित किए गए। लेकिन परिणाम में वर्गवार कट ऑफ अंक जारी नहीं किए गए। जबकि पूर्व की सभी परीक्षाओं में वर्गवार कट ऑफ अंक जारी किए जाते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के विभिन्न फैसलों को बायपास करने का आरोप याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के विभिन्न फैसलों को बायपास करते हुए आयोग ने अनारक्षित पदों के विरुद्ध आरक्षित वर्ग के प्रतिभावान अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा के लिए चयनित नहीं किया। समस्त अनारक्षित पद सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित कर प्रारंभिक परीक्षा का रिजल्ट जारी किया गया। आयोग ने अपनी इस असंवैधानिक त्रुटि को छुपाने के उद्देश्य से 2025 के प्रारंभिक परीक्षा में कट ऑफ मार्क्स भी जारी नहीं किए हैं। जबकि नियमानुसार प्रत्येक चरण की परीक्षा में वर्गवार कट आफ अंक जारी किए जाने का प्रविधान है। इसके चलते याचिकाकर्ताओं को मुख्य परीक्षा में चयन से वंचित कर दिया गया है। विगत 21 जुलाई को शासन से जवाब के लिए समय मांगा गया था।

न्याय व्यवस्था में तकनीक की दस्तक: केरल हाई कोर्ट WhatsApp से देगा कानूनी सूचना

तिरुवनंतपुरम  सूचना तक पहुंच बढ़ाने और समय पर संचार सुनिश्चित करने के उद्देश्य से, केरल हाई कोर्ट ने घोषणा की है कि वह 6 अक्टूबर से अपने केस मैनेजमेंट सिस्टम (सीएमएस) में एक अतिरिक्त सुविधा के रूप में WhatsApp मैसेजिंग शुरू करेगा. यह नई सेवा मौजूदा सूचना चैनलों के साथ-साथ रियल टाइम में अपडेट प्रदान करके वकीलों, वादियों और व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने वाले पक्षकारों को लाभान्वित करेगी. केरल हाई कोर्ट द्वारा जारी एक अधिसूचना के अनुसार, यह सुविधा शुरुआत में चरणबद्ध तरीके से शुरू की जाएगी. WhatsApp के माध्यम से भेजे जाने वाले अपडेट में ई-फाइलिंग में खामियों, मामलों की लिस्ट, कार्यवाही और अन्य प्रासंगिक अदालती संचार से संबंधित विवरण शामिल होंगे. हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि WhatsApp मैसेज केवल संचार के एक अतिरिक्त माध्यम के रूप में काम करेंगे और आधिकारिक नोटिस, सम्मन या अन्य अनिवार्य प्रक्रियाओं का स्थान नहीं लेंगे, जब तक कि अन्यथा निर्दिष्ट न किया जाए. सुरक्षा और प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए, सभी संदेश केवल सत्यापित प्रेषक आईडी "केरल उच्च न्यायालय" से ही भेजे जाएंगे. हितधारकों से आग्रह किया गया है कि वे धोखाधड़ी वाले संदेशों के प्रति सतर्क रहें और यह सुनिश्चित करें कि अपडेट केवल इसी आधिकारिक प्रेषक आईडी से प्राप्त हों. अदालत ने सभी अधिवक्ताओं और वादियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि उनके CMS प्रोफाइल में एक सक्रिय WhatsApp-सक्षम नंबर शामिल हो. यदि रजिस्ट्रेशन प्राथमिक नंबर WhatsApp से लिंक नहीं है, तो एक द्वितीयक WhatsApp-सक्षम नंबर अवश्य जोड़ा जाना चाहिए. प्राथमिक नंबरों को मौजूदा प्रक्रिया के अनुसार ईमेल के माध्यम से अनुरोध प्रस्तुत करके अपडेट किया जा सकता है, जबकि द्वितीयक नंबरों को CMS में एडवोकेट पोर्टल के माध्यम से सीधे संशोधित किया जा सकता है. केरल हाई कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि WhatsApp मैसेज की किसी भी देरी या गैर-डिलीवरी से हितधारकों को अदालत में उपस्थित होने या कार्यवाही का पालन करने की उनकी ज़िम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जाएगा. उपयोगकर्ताओं को हाई कोर्ट के आधिकारिक वेब पोर्टल पर अपडेट की बार-बार जांच करने की सलाह दी गई है. यह पहल हाई न्यायालय के डिजिटल आधुनिकीकरण अभियान में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसका उद्देश्य संचार को सुव्यवस्थित और न्यायिक प्रक्रियाओं को अधिक सुलभ बनाना है.

कर्मचारियों के लिए राहत भरी खबर! हाई कोर्ट ने प्रमोशन और पेंशन लाभ का रास्ता किया साफ

कैथल  पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कैथल जिले के पुलिस कर्मचारियों के पक्ष में बड़ा आदेश सुनाते हुए रोहतक रेंज द्वारा जारी सीनियरिटी और प्रमोशन से जुड़े विवादित आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने साफ किया कि कैथल पुलिसकर्मियों की वरिष्ठता और प्रमोशन का निर्णय केवल करनाल रेंज कर सकता है। इस फैसले से कैथल के करीब 70 पुलिस कर्मचारियों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा, जिनमें एएसआई और एसआई रैंक के अधिकारी शामिल हैं। इनमें से कुछ कर्मचारी अब सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं। मामला सब-इंस्पेक्टर मोहिंदर सिंह और अन्य कर्मचारियों द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता कर्मवीर सिंह बनयाना ने अदालत में दलील दी कि उनके मुवक्किल वर्ष 2004 से 2008 के बीच कैथल जिले में हेड कांस्टेबल के रूप में कन्फर्म हुए थे। जबकि उनके जूनियर साथियों को वर्ष 2009 से 2011 के बीच करनाल और पानीपत में कन्फर्म किया गया था। इसके बावजूद 2019 में रोहतक रेंज ने सीनियरिटी सूची बदलते हुए जूनियर्स को सीनियर बना दिया और उन्हें एंटीडेटेड प्रमोशन भी दे दिए। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि नियमों के मुताबिक हेड कांस्टेबल तक की सीनियरिटी जिला स्तर पर तय होती है, जबकि एएसआई और एसआई की सीनियरिटी रेंज स्तर पर होती है। ऐसे में कैथल, करनाल और पानीपत के कर्मचारियों की वरिष्ठता और प्रमोशन का फैसला केवल करनाल रेंज कर सकता था। रोहतक रेंज को इसमें हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं था क्योंकि 29-9-2011 में करनाल रेंज के गठन के बाद जिला करनाल, पानीपत और कैथल के पुलिस कर्मियों के बारे में कोई भी निर्णय लेने का अधिकार केवल करनाल रेंज के पास ही है रोहतक रेंज के पास नहीं है। न्यायमूर्ति जगमोहन बंसल ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद माना कि रोहतक रेंज का आदेश पूरी तरह गलत था। अदालत ने इस आदेश को रद्द करते हुए कहा कि पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) हरियाणा स्वयं या किसी अन्य अधिकारी को नियुक्त कर तीन माह में उचित आदेश जारी करें। इस फैसले से कैथल जिले के एएसआई और एसआई रैंक के लगभग 70 पुलिस कर्मचारियों को प्रमोशन, वेतनमान और पेंशन लाभ मिलेगा। चूंकि इनमें से कुछ कर्मचारी अब रिटायर हो चुके हैं, इसलिए उन्हें भी एरियर और पेंशन लाभ का फायदा मिल सकेगा। कैथल पुलिस लाइन और थानों में तैनात कर्मचारियों ने हाईकोर्ट के इस आदेश का स्वागत किया है। उनका कहना है कि यह फैसला न केवल वर्षों से लंबित उनके हक की बहाली है बल्कि इससे उनका मनोबल भी ऊँचा होगा। कर्मचारी संगठनों ने भी अदालत के इस निर्णय को ऐतिहासिक करार देते हुए सरकार से अपील की है कि आदेश का पालन समय पर और बिना देरी के किया जाए। हाईकोर्ट का यह आदेश केवल कैथल पुलिसकर्मियों पर लागू होगा। इससे यह भी साफ हो गया है कि सीनियरिटी और प्रमोशन को लेकर भविष्य में किसी अन्य रेंज को कैथल के कर्मचारियों के मामले में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होगा।

बीजामंडल में रोजाना पूजा की अनुमति को लेकर हाईकोर्ट में होगी सुनवाई

 विदिशा  विदिशा शहर के किलेअंदर स्थित बीजामंडल (विजय मंदिर) को लेकर ग्वालियर हाईकोर्ट में सुनवाई होगी। कोर्ट ने विदिशा निवासी शुभम वर्मा सहित पांच याचिकाकर्ताओं की याचिका को स्वीकार कर लिया है। साथ ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से इस संबंध में जवाब मांगा है। याचिकाकर्ताओं में शामिल विदिशा निवासी शुभम वर्मा ने रविवार को यह जानकारी दी है। बीजामंडल को लेकर की जा रही मांगों के संबंध में शुभम ने बताया कि बीजामंडल के आगे मंदिर लिखे जाने और पूजा-अर्चना के लिए हर रोज गेट खोले जाने की मांग की जा रही है।  20 अगस्त को याचिका की थी दायर, कोर्ट ने किया मंजूर इसको लेकर 20 अगस्त को हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी। पैरवी कर रहे अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन के अनुसार कोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली है। आठ सितंबर को याचिका स्वीकृत किए जाने संबंधित पत्र भी प्राप्त हुआ है। शुभम के अनुसार इस मामले में प्रथम याचिकाकर्ता हरिशंकर जैन है। जबकि स्वयं शुभम द्वितीय याचिकाकर्ता हैं। इसके अलावा राकेश, मनी व राहुल का नाम भी संयुक्त रूप से दायर की गई याचिका में शामिल है। हरिशंकर जैन अधिवक्ता है और अयोध्या राममंदिर के पक्ष में याचिकाकर्ता भी रहे है। काशी विश्वनाथ मंदिर को लेकर दायर की गई याचिका में भी उनका नाम याचिकाकर्ताओं में शामिल है। पिछले कई वर्षों से गेट खोलने की मांग शुभम ने बताया कि बीजामंडल को लेकर उनके द्वारा कई बार कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा गया है। हर रोज पूजा के लिए गेट खोलने की मांग की गई है, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। इसलिए उन्होंने न्यायालय की शरण ली। उन्होंने बताया कि पिछले एक वर्ष से वह बीजामंडल को लेकर अध्ययन करते हुए कई साक्ष्य जुटाए हैं। साक्ष्यों के साथ ही न्यायालय में 118 पेज की याचिका लगाई गई है। दावा है कि 1962 में बीजामंडल मंदिर को तोड़ दिया गया। कई वर्षों तक मंदिर में देवी-देवताओं की मूर्तियां थी, जिसे संग्रहालय में रखवा दिया गया है। बीजामंडल मंदिर के रूप में प्रतिष्ठित हो, इसके लिए न्यायालय की शरण ली गई है।