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स्थिति बेहद खराब — मेकाहारा अस्पताल पर भड़का हाईकोर्ट, एक बेड पर दो प्रसूताओं का मामला गंभीर

बिलासपुर रायपुर के मेकाहारा अस्पताल के गायनिक वार्ड में दो प्रसूताओं को एक ही बेड पर भर्ती किए जाने का मामला सामने आया है। इस घटना ने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वहीं इस मामले में बिलासपुर हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की बेंच ने कहा, स्थिति बेहद ही खराब है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है और 6 नवंबर तक एडिशनल चीफ सेक्रेटरी को शपथ पत्र में जवाब पेश करने के निर्देश दिए हैं। इस मामले में मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की बेंच ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा, अगर राजधानी के प्रमुख अस्पताल की यह स्थिति है तो प्रदेश के अन्य जिलों में हालात की कल्पना की जा सकती है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए कहा कि अतिरिक्त मुख्य सचिव (स्वास्थ्य) को 6 नवंबर तक शपथपत्र प्रस्तुत करना होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ऐसी घटनाएं मानव गरिमा के विपरीत है और प्रशासन को तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने होंगे। सरकारी सिस्टम पर उठे सवाल इस घटना ने न केवल स्वास्थ्य तंत्र की लापरवाही को उजागर किया है, बल्कि राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है। जनता अब यह सवाल उठा रही है कि जब राजधानी के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल का यह हाल है तो ग्रामीण इलाकों के अस्पतालों में मरीजों का क्या हाल होगा?

अतिथि शिक्षकों के वेतन पर हाई कोर्ट का निशाना: नियमित पद का न्यूनतम वेतन क्यों रोका गया?

 जबलपुर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा व न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने राज्य शासन से पूछा है कि प्रदेश के शासकीय स्कूलों में कार्यरत अतिथि शिक्षकों को नियमित स्वीकृत पद का न्यूनतम वेतन क्यों नहीं दिया जा रहा है। कोर्ट ने मुख्य सचिव, वित्त विभाग, स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव, जनजातीय कार्य विभाग के प्रमुख सचिव, आयुक्त लोक शिक्षण सहित अन्य को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता देवास निवासी विकास कुमार नंदानिया व अन्य की ओर से अधिवक्ता विनायक प्रसाद शाह व पुष्पेंद्र शाह ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि सरकार नियमित स्वीकृत पद पर भर्ती नहीं करते हुए अतिथि शिक्षकों की भर्ती कर रही है। प्रदेश में लगभग 90 हजार अतिथि शिक्षक कार्यरत हैं। इन अतिथि शिक्षकों से नियमित शिक्षकों के सभी काम करवाए जाते हैं, लेकिन नियमित के लिए निर्धारित न्यूनतम वेतन नहीं दिया जाता है। इसके अलावा अतिथि शिक्षकों को नियमित शिक्षकों के समान छुट्टी का लाभ भी नहीं मिलता है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का हवाला दिया गया जिनमें यह निर्धारित किया है कि न्यूनतम वेतन से कम वेतन देना संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।  

नियुक्तियों को लेकर Chhattisgarh HC ने GGU के शीर्ष अधिकारियों से मांगा जवाब

 बिलासपुर  गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में शिक्षा विभाग के अंतर्गत हो रही नियुक्तियों में निर्धारित मापदंडों को लेकर दायर याचिका पर जस्टिस एनके व्यास की सिंगल बेंच में सुनवाई हुई। यूनिवर्सिटी के अधिवक्ता के जवाब के बाद कोर्ट ने यूनिवर्सिटी के कुलपति व रजिस्ट्रार को नोटिस जारी कर शपथ पत्र के साथ जवाब पेश करने का निर्देश दिया है। बीते सुनवाई के दौरान कोर्ट ने साफ कहा था कि यह विश्वविद्यालय का दायित्व बनता है कि वह यह स्पष्ट करे कि विज्ञापन किस विषय से संबंधित है और क्या वह एनसीटीई द्वारा निर्धारित शैक्षणिक योग्यताओं के अनुरूप है। अदालत ने इस संबंध में विश्वविद्यालय से स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे। आज इस मामले की सिंगल बेंच में सुनवाई हुई। बता दें कि गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में शिक्षा विभाग के अंतर्गत हो रही नियुक्ति पर शिक्षा विभाग को मान्यता देने वाली संस्था नेशनल काउंसिल फार टीचर एजुकेशन के नियमों की अनदेखी संबंधी मामला याचिकाकर्ता नवीन चौबे की ओर से अधिवक्ता आशुतोष शुक्ल ने पैरवी की। सुनवाई के दौरान विश्वविद्यालय के अधिवक्ता कोर्ट में संतोषजनक उत्तर नहीं दे सके। कोर्ट ने अपने पिछले आदेश नौ अक्टूबर का उचित परिपालन विश्वविद्यालय द्वारा नहीं किए जाने के पर जवाब मांगा है। विश्वविद्यालय से हाई कोर्ट ने मांगा स्पष्टीकरण हाई कोर्ट ने गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय बिलासपुर से यह स्पष्ट करने को कहा है कि उनके द्वारा जारी की गई भर्ती विज्ञापन में किस विषय या विशेषज्ञता क्षेत्र के लिए पद निकाले गए हैं और क्या यह विज्ञापन राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद विनियम 2014 के अनुरूप है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने बीते सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अशुतोष शुक्ला ने अदालत को बताया था कि विश्वविद्यालय द्वारा जारी विज्ञापन त्रुटिपूर्ण है, क्योंकि उसमें संबंधित विषय या विशेषज्ञता का उल्लेख नहीं है। अधिवक्ता ने पेश किया जवाब गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय की ओर से अधिवक्ता ने जवाब प्रस्तुत किया था। उन्होंने दलील दी थी कि राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा 1993 के अधिनियम की धारा 32(2) के अंतर्गत 2014 में जो विनियम बनाए गए हैं, उनके अनुसार पर्सपेक्टिव इन एजुकेशन या फांउडेशन कोर्स के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवार के पास समाजशास्त्र, मनोविज्ञान या अन्य सामाजिक विज्ञान विषय में स्नातकोत्तर डिग्री, न्यूनतम 55 प्रतिशत अंकों के साथ। एमए. या एमएड में भी कम से कम 55 प्रतिशत अंक। साथ ही बीएड या बीएएलएड में न्यूनतम 55 प्रतिशत अंक वाली योग्यताएं होनी चाहिए। याचिकाकर्ता के अनुसार, जब तक विश्वविद्यालय यह स्पष्ट नहीं करता कि यह विज्ञापन किस विषय या कोर्स के लिए है, तब तक यह अस्पष्ट और अपूर्ण माना जाएगा।

ईडी गिरफ्तारी पर चुनौती: चैतन्य बघेल की याचिका हाईकोर्ट ने ठुकराई

बिलासपुर ईडी की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली चैतन्य बघेल की याचिका को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है. जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की सिंगल बेंच में यह निर्णय लिया गया है. दोनों पक्षों को सुनने के बाद 24 सिंतबर को फैसला सुरक्षित रखा गया था. याचिका में ईडी की कार्रवाई को असंवैधानिक और नियम विरुद्ध बताया गया था. ईडी ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल को उनके जन्मदिन पर 18 जुलाई को भिलाई निवास से धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के तहत गिरफ्तार किया था। शराब घोटाले की जांच ईडी ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत एसीबी/ईओडब्ल्यू रायपुर द्वारा दर्ज एफआईआर के आधार पर शुरू की थी। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि इस घोटाले के कारण प्रदेश के खजाने को भारी नुकसान हुआ और करीब 2,500 करोड़ रुपये की अवैध कमाई (पीओसी) घोटाले से जुड़े लाभार्थियों की जेब में पहुंचाई गई। ईडी की जांच में पता चला है कि चैतन्य बघेल को शराब घोटाले के 16.70 करोड़ रुपये मिले हैं। उन्होंने इस पैसे का इस्तेमाल अपनी रियल एस्टेट फर्मों में किया है। इस पैसे का उपयोग उनके प्रोजेक्ट के ठेकेदार को नकद भुगतान, नकदी के खिलाफ बैंक प्रविष्टियों आदि के माध्यम से किया गया था। उन्होंने त्रिलोक सिंह ढिल्लों के साथ भी मिलीभगत की और अपनी कंपनियों का उपयोग एक योजना तैयार करने के लिए किया, जिसके अनुसार उन्होंने त्रिलोक सिंह ढिल्लों के कर्मचारियों के नाम पर अपने “विठ्ठलपुरम प्रोजेक्ट” में फ्लैटों की खरीद की आड़ में अप्रत्यक्ष रूप से 5 करोड़ रुपये प्राप्त किए। बैंकिंग ट्रेल है जो इंगित करता है कि लेन-देन की प्रासंगिक अवधि के दौरान त्रिलोक सिंह ढिल्लों ने अपने बैंक खातों में शराब सिंडिकेट से भुगतान प्राप्त किया। पहले से गिरफ्त में हैं कई बड़े चेहरे ईडी ने शराब घोटाला मामले में पूर्व आईएएस अनिल टुटेजा, अरविंद सिंह, त्रिलोक सिंह ढिल्लों, अनवर ढेबर, ITS अरुण पति त्रिपाठी और पूर्व मंत्री व वर्तमान विधायक कवासी लखमा को गिरफ्तार किया है। फिलहाल, मामले में आगे की जांच जारी है।

पीड़िता के बयान और सहमति को देखते हुए हाईकोर्ट ने CAF जवान को बरी किया

बस्तर छत्तीसगढ़ के बस्तर में रेप के आरोप में 10 साल की सजा काट रहे सीएएफ के जवान रूपेश कुमार पुरी को हाईकोर्ट ने बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ ने कहा कि यह मामला प्रेम संबंध का है, झूठे विवाह वादे पर आधारित दुष्कर्म का नहीं। अदालत ने फास्ट ट्रैक कोर्ट जगदलपुर द्वारा 2022 में सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया। कोर्ट ने क्या कहा.. हाईकोर्ट ने माना कि पीड़िता बालिग थी और लंबे समय तक अपनी मर्जी से आरोपी के साथ रही। दोनों के बीच बने शारीरिक संबंध आपसी सहमति से थे। अदालत ने कहा कि जब तक यह साबित न हो कि आरोपी ने शुरू से ही शादी का इरादा नहीं रखा था, तब तक ऐसे मामले को दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता।   मामला कैसे शुरू हुआ साल 2020 में पीड़िता ने जवान रूपेश कुमार पुरी पर शादी का झांसा देकर रेप करने का आरोप लगाया था। कहा गया कि जवान ने उसे दो महीने तक घर में रखकर यौन शोषण किया और बाद में शादी से इनकार कर दिया। फास्ट ट्रैक कोर्ट ने रूपेश को 10 साल की सजा और 10 हजार रुपए जुर्माना लगाया था। क्या कहा बचाव पक्ष ने.. रूपेश के वकील ने दलील दी कि दोनों के बीच 2013 से प्रेम संबंध थे और पीड़िता अपनी मर्जी से आरोपी के घर गई थी। एफआईआर परिजनों के दबाव में दर्ज कराई गई। अदालत ने पाया कि पीड़िता ने खुद आरोपी को फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी थी और दोनों के बीच लंबे समय तक बातचीत होती रही। हाईकोर्ट का फैसला सभी सबूतों और बयानों की समीक्षा के बाद अदालत ने कहा कि यह मामला जबरन शोषण का नहीं, बल्कि प्रेम और सहमति का है। मेडिकल और एफएसएल रिपोर्ट में रेप के ठोस सबूत नहीं मिले। पीड़िता खुद आरोपी के घर गई और कई बार उसके साथ संबंध बनाए, जिसमें खुद युवती की भी मर्जी दिखी। इस आधार पर कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का निर्णय रद्द करते हुए रूपेश कुमार पुरी को सभी आरोपों से बरी कर दिया।  

जाति प्रमाण पत्र मामले में खंडवा के विधायक कंचन तन्वे को न्यायालय ने दिया समर्थन

जबलपुर हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विशाल धगट की एकलपीठ ने खंडवा से भाजपा विधायक कंचन तन्वे को राहत प्रदान की है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता का वह आवेदन निरस्त कर दिया है, जिसमें विधायक के जाति प्रमाण पत्र की वैधता की सत्यता परखने के लिए राजस्व रिकार्ड तलब किए जाने की मांग की गई थी। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि याचिकाकर्ता को उक्त आवेदन पूर्व में पेश करना था। जब मामले में मुद्दे तय हो गए और आवेदक ने अपनी गवाही समाप्त कर दी, तब उक्त आवेदन स्वीकार नहीं किया जा सकता। उक्त मत के साथ न्यायालय ने आवेदन निरस्त कर मामले की अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद निर्धारित कर दी। याचिका खंडवा के आंबेडकर वार्ड निवासी कुंदन मालवीय की ओर से दायर की गई है।   आवेदक का कहना है कि तन्वे वर्ष 2023 में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित खंडवा सीट से भाजपा की उम्मीदवार थी। आरोप है कि अनावेदिका ने जो जाति प्रमाण पत्र पेश किया है, वह वैध नहीं, क्योंकि उक्त जाति प्रमाण पत्र का कोई प्रकरण क्रमांक नहीं है, न ही उसकी शासकीय कार्यालय में कोई फाइल है। इतना ही नहीं उक्त प्रमाण पत्र में पिता की जगह पति का नाम दर्ज है। याचिका में मांग की गई कि झूठा जाति प्रमाण पत्र पेश करने पर निर्वाचन शून्य घोषित किया जाना चाहिए। मामले में पूर्व में हुई गवाही के बाद आवेदक की ओर से जाति प्रमाण पत्र की सत्यता के लिए राजस्व रिकार्ड तलब किए जाने का आवेदन पेश किया गया था।

एचआइवी पाजिटिव महिला मरीज की पहचान सार्वजनिक करने पर हाई कोर्ट ने अस्पताल पर उठाया सवाल, सुनवाई 15 को

बिलासपुर  हाई कोर्ट ने रायपुर के डॉ. भीमराव आंबेडकर स्मृति चिकित्सालय में एचआइवी पाजिटिव महिला मरीज की पहचान सार्वजनिक करने की घटना पर कड़ी नाराजगी जताई है. मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की खंडपीठ ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार के मुख्य सचिव से व्यक्तिगत शपथपत्र मांगा है. कोर्ट ने कहा कि यह कृत्य न केवल अमानवीय है बल्कि नैतिकता और निजता के अधिकार का घोर उल्लंघन है. मामले की अगली सुनवाई 15 अक्टूबर को होगी. दरअसल, 10 अक्टूबर को प्रकाशित खबर में बताया गया कि रायपुर के डॉ. भीमराव आंबेडकर अस्पताल में नवजात शिशु के पास एक पोस्टर लगाया गया, जिसमें यह लिखा था कि बच्चे की मां एचआईवी पाजिटिव है. रिपोर्ट के मुताबिक, यह पोस्टर गाइनो वार्ड में भर्ती मां और नर्सरी वार्ड में रखे नवजात बच्चे के बीच लगाया गया था. जब बच्चे के पिता अपने शिशु को देखने पहुंचे तो उन्होंने यह पोस्टर देखा और भावुक होकर रो पड़ा. कोर्ट ने इस मामले को तत्काल संज्ञान में लेते हुए सुनवाई की. कोर्ट ने कहा कि यह अत्यंत अमानवीय, असंवेदनशील और निंदनीय आचरण है, जिसने न केवल मां और बच्चे की पहचान उजागर कर दी बल्कि उन्हें सामाजिक कलंक और भविष्य में भेदभाव का शिकार भी बना सकता है. कोर्ट ने कहा कि यह कार्य सीधे तौर पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है. अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि, राज्य के इतने प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान से यह अपेक्षा की जाती है कि वह रोगियों के साथ अत्यधिक संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करे. एचआइवी/एड्स जैसे सामाजिक रूप से संवेदनशील मामलों में पहचान उजागर करना गंभीर चूक है. मामले में कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि वे 15 अक्टूबर 2025 तक व्यक्तिगत शपथपत्र प्रस्तुत करते हुए यह स्पष्ट किया जाए कि, सरकारी अस्पतालों, मेडिकल कालेजों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में मरीजों की गोपनीयता सुनिश्चित करने की वर्तमान व्यवस्था क्या है. इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए कर्मचारियों को संवेदनशील बनाने के क्या कदम उठाए गए हैं. डाक्टरों, नर्सों और पैरा-मेडिकल स्टाफ को कानूनी और नैतिक जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक करने के लिए भविष्य में क्या उपाय प्रस्तावित हैं.  कोर्ट ने कहा- दोबारा ऐसी गलती न दोहराई जाए.

हाईकोर्ट का फैसला: केवल नोटों की बरामदगी से रिश्वत का आरोप सिद्ध नहीं, तहसील क्लर्क बरी

बिलासपुर हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में बिल्हा तहसील कार्यालय के तत्कालीन रीडर/क्लर्क बाबूराम पटेल को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत लगे आरोपों से बरी कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि अभियोजन यह साबित करने में विफल रहा कि आरोपी ने रिश्वत की मांग की थी, या उसे अवैध लाभ के रूप में स्वीकार किया था. यह फैसला जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की सिंगल बैंच ने सुनाया. 5000 की रिश्वत मांगने का आरोप दरअसल, लोकायुक्त कार्यालय, बिलासपुर में 20 फरवरी 2002 को शिकायतकर्ता मथुरा प्रसाद यादव ने शिकायत दर्ज कराई थी कि आरोपी बाबूराम पटेल ने उसके पिता की जमीन का खाता अलग करने के नाम पर 5000 रिश्वत की मांग की थी, जो बाद में 2000 में तय हुई. शिकायत के आधार पर लोकायुक्त पुलिस ने ट्रैप की कार्रवाई की. शिकायतकर्ता को 15 नोट 100 के दिए गए, जिन पर फिनाल्फ्थेलीन पाउडर लगाया गया था. आरोप था कि आरोपी ने 1500 रिश्वत ली, जिसे मौके पर पकड़ लिया गया. जांच के बाद उसे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 और 13(1)(डी) सहपठित 13(2) के तहत दोषी ठहराया गया था. प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश, बिलासपुर ने 30 अक्टूबर 2004 को उसे एक-एक वर्ष की कठोर कारावास और 500-500 के जुर्माने की सजा सुनाई थी. आरोपी बाबूराम पटेल ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी. अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता विवेक शर्मा ने तर्क दिया कि आरोपी के खिलाफ झूठा प्रकरण रचा गया है. शिकायतकर्ता की पत्नी पूर्व सरपंच थीं और उनके खिलाफ एक जांच में आरोपी ने भाग लिया था, जिससे निजी द्वेष के चलते झूठा फंसाया गया. उन्होंने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता द्वारा दिया गया 1500 रिश्वत नहीं, बल्कि ग्रामवासियों से पट्टा शुल्क के रूप में वसूला गया बकाया राशि था, जिसे जमा कराने के लिए आरोपी ने कहा था. इसके अलावा, कुल 3180 की जब्ती राशि में से 1500 रिश्वत के रूप में चिन्हित करना भी संदिग्ध था. राज्य की ओर से शासकीय अधिवक्ता ने कहा कि अभियोजन के साक्ष्य पर्याप्त हैं और आरोपित ने अवैध रूप से 1500 रुपए लिए. केवल नोट मिलने से आरोपी सिद्ध नहीं होता : बिलासपुर हाईकोर्ट कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णय बी. जयाराज वर्सेज स्टेट आफ आंध्र प्रदेश (2014) और सौंदर्या राजन वर्सेज स्टेट (2023) का हवाला देते हुए कहा कि केवल नोटों की बरामदगी से रिश्वत का अपराध सिद्ध नहीं होता, जब तक मांग और स्वीकार का ठोस प्रमाण न हो. न्यायालय ने पाया कि, शिकायतकर्ता ने खुद कहा कि उसे यह स्पष्ट नहीं था कि 1500 रिश्वत थी या पट्टा शुल्क की राशि. उसने स्वीकार किया कि शिकायत लोकायुक्त एसपी के निर्देश पर लिखी गई थी और वह पूरी तरह नहीं पढ़ी गई थी. रिकार्ड किए गए वार्तालाप में भी आरोपी की आवाज स्पष्ट नहीं थी. ट्रैप टीम के तीन सदस्यों ने पैसे की बरामदगी के स्थान को लेकर विरोधाभासी बयान दिए, किसी ने दायें पाकेट, किसी ने बायें, तो किसी ने पीछे की जेब बताई. इन तथ्यों से कोर्ट ने कहा कि मांग, स्वीकारोक्ति और बरामदगी तीनों संदिग्ध और असंगत हैं. इसलिए, संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाना चाहिए. कोर्ट ने सभी आरोपों से बरी कोर्ट ने कहा कि, अभियोजन अपना मामला संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका. ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन नहीं किया. अतः दोषसिद्धि टिकाऊ नहीं है. इस आधार पर हाई कोर्ट ने 30 अक्टूबर 2004 का निर्णय रद्द करते हुए बाबूराम पटेल को सभी आरोपों से बरी कर दिया.

हाईकोर्ट का फैसला: पत्नी की आत्महत्या के मामले में पति निर्दोष, निचली अदालत ने ठहराया था दोषी

बिलासपुर पत्नी की आत्महत्या मामले में हाईकोर्ट ने पति को दोषमुक्त कर दिया है। न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ ने निचली अदालत की सजा को निरस्त करते किया। कोर्ट ने कहा, अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि आरोपी ने पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाया या उसके साथ ऐसी क्रूरता की, जिससे वह आत्महत्या करने को मजबूर हुई। पूरा मामला धमतरी जिले के सिहावा थाना क्षेत्र का है। पवन प्रजापति की पत्नी बसंती बाई की 6 दिसंबर 2019 को घर में आग लगने से मृत्यु हो गई थी। आरोपी ने खुद पुलिस को सूचना दी थी कि उसकी पत्नी आग में जल गई है। जांच के दौरान पुलिस ने घटना स्थल से जले हुए कपड़े, टायर के टुकड़े, माचिस, मिट्टी तेल की बोतल और अन्य सामान जब्त किया था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में डाक्टर ने बताया कि मृतका के शरीर के महत्वपूर्ण अंग 3 से 4 डिग्री तक जले थे और मौत का कारण जलने से हुई दम घुटने को बताया गया। ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी पांच साल की सजा मर्ग जांच के बाद पुलिस ने आरोपी पति के खिलाफ धारा 306 (आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण) और 498-ए (पत्नी के प्रति क्रूरता) के तहत मामला दर्ज किया। आरोप था कि पति पवन शराब पीकर पत्नी से मारपीट करता था और यह कहकर ताना मारता था कि वह केवल बेटियां ही जन्म देती है। ट्रायल कोर्ट ने दिसंबर 2021 में आरोपित को दोषी पाते हुए 5 साल की सजा (धारा 306) और एक साल की सजा (धारा 498ए) सुनाई थी। पत्नी ने कभी नहीं की थी पुलिस में शिकायत हाईकोर्ट में आरोपी के वकील डीएन प्रजापति ने दलील दी कि अभियोजन का पूरा मामला केवल यह कहता है कि पवन शराब पीकर पत्नी से झगड़ा करता था, पर ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि उसने जानबूझकर पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाया या मारपीट की वजह से उसने आत्महत्या की। उसकी पत्नी ने कभी पुलिस में शिकायत नहीं की और उनकी बेटियां या परिजनों ने भी ऐसा कुछ नहीं कहा कि घर में गंभीर हिंसा होती थी। राज्य सरकार की ओर से पैनल लायर ने कहा कि पवन का व्यवहार क्रूर था और उसकी वजह से बसंती मानसिक रूप से परेशान रहती थी, जिससे उसने आत्महत्या कर ली। बैठक में पवन ने पत्नी को न सताने का किया था वादा कोर्ट ने मामले की पूरी गवाही, मेडिकल रिपोर्ट और सामाजिक साक्ष्य का विश्लेषण करते हुए कहा कि मृतका की दोनों बेटियों और भाभी ने स्पष्ट कहा कि पति-पत्नी में झगड़े नहीं होते थे। मृतका के भाइयों ने कहा कि कभी-कभी शराब पीने के बाद पवन पत्नी को मारता था, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि ऐसा कितनी बार हुआ। पड़ोसी या स्थानीय गवाह, जो सबसे महत्वपूर्ण होते हैं, उन्हें पेश नहीं किया गया। समाज की बैठक में पवन ने पत्नी को न सताने का वादा किया था, पर यह भी एक सामान्य पारिवारिक विवाद की तरह था, न कि गंभीर क्रूरता जैसा। ‘कभी-कभी झगड़ा करना क्रूरता की श्रेणी में नहीं आता’ अदालत ने कहा कि केवल शराब पीना और कभी-कभी झगड़ा करना क्रूरता या आत्महत्या के लिए उकसाने की श्रेणी में नहीं आता। अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में केवल सामान्य आरोपों या घरेलू मतभेदों के आधार पर व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

हाईकोर्ट ने माना पुलिस की यातना जिम्मेदार, युवक की मौत पर राज्य सरकार को मुआवजा देने का निर्देश

बिलासपुर पुलिस हिरासत में युवक की संदिग्ध मौत के मामले में हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने राज्य सरकार को मृतक के परिवार को मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा, जहां किसी व्यक्ति की मौत पुलिस हिरासत में होती है, वहां मृत्यु का कारण स्पष्ट करना राज्य की जिम्मेदारी है। ऐसा न करना जीवन और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है। मौत के हालात यह दिखाते हैं कि मृतक को अमानवीय यातना दी गई थी और यह मामला कस्टोडियल बर्बरता का उदाहरण है। पूरा मामला धमतरी जिले के अर्जुनी थाना का है। याचिकाकर्ता दुर्गा देवी कैठोलिया ने बताया कि उनके पति दुर्गेंद्र कैठोलिया को 29 मार्च 2025 को धोखाधड़ी के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार किया था। 31 मार्च को उन्हें कोर्ट में पेश किया गया, जहां वे पूरी तरह स्वस्थ थे। शाम 5 बजे उन्हें फिर से थाने में रखा गया, जहां कुछ ही घंटों में उनकी मौत हो गई। परिजन का आरोप है कि पुलिस ने हिरासत में थर्ड डिग्री टार्चर दिया, जिससे दुर्गेंद्र की मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में शरीर पर 24 चोटों का है जिक्र पोस्टमार्टम रिपोर्ट में शरीर पर 24 पूर्व-मृत्यु चोटों का जिक्र है। मौत का कारण दम घुटने से सांस न ले पाने को बताया गया। दूसरे दिन पुलिस ने परिवार को बताया कि दुर्गेंद्र बीमार पड़ गए थे और अस्पताल में भर्ती हैं, लेकिन बाद में पता चला कि उनकी पहले ही मौत हो चुकी थी। शव मिलने पर परिवार ने शरीर पर चोट के निशान देखकर हंगामा किया और उच्चाधिकारियों से शिकायत की। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि सभी साक्ष्य साफ बताते हैं कि यह मौत पुलिस की यातना से हुई है। यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और सम्मान के अधिकार का सीधा उल्लंघन है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि मौत के हालात यह दिखाते हैं कि मृतक को अमानवीय यातना दी गई थी। मृतक की पत्नी और माता-पिता को मुआवजा देने के निर्देश हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि मृतक की पत्नी दुर्गा देवी को तीन लाख की राशि दी जाए, ताकि वह और उनके दो नाबालिग बच्चों की देखभाल कर सकें। मृतक के माता-पिता को प्रत्येक एक लाख दिए जाएं। यह भुगतान 8 हफ्ते के भीतर किया जाए अन्यथा राशि पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लगेगा।