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ईरान का ट्रंप पर हमला, खामेनेई के आदेश पर होर्मुज खोला जाएगा, न कि ‘इडियट’ के कहने पर

तेहरान  ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा कूटनीतिक विवाद अब व्यक्तिगत हमलों और सोशल मीडिया वॉर में बदल गया है। दक्षिण अफ्रीका स्थित ईरानी दूतावास ने एक वायरल समुद्री ऑडियो क्लिप का हवाला देते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इडियट (मूर्ख) करार दिया है। इस तीखे हमले ने अंतरराष्ट्रीय गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। क्या है पूरा मामला? विवाद की शुरुआत एक वायरल वीडियो और ऑडियो क्लिप से हुई, जो कथित तौर पर ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) की नौसेना और समुद्र में मौजूद जहाजों के बीच रेडियो संचार की है। इस रिकॉर्डिंग में ईरानी नौसेना का एक अधिकारी इडियट शब्द का इस्तेमाल करता सुनाई दे रहा है। शुरुआत में सोशल मीडिया पर यह दावा किया गया कि ईरानी अधिकारी ने अपने ही विदेश मंत्री के लिए इस शब्द का प्रयोग किया है। ईरानी दूतावास का तीखा पलटवार इन दावों को खारिज करते हुए दक्षिण अफ्रीका में ईरानी मिशन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर एक बेहद कड़ा और सीधा पोस्ट किया। दूतावास ने लिखा, "ओ बेवकूफ, उसका मतलब तुम्हारे 'इडियट' राष्ट्रपति ट्रंप से था। बस गूगल पर 'इडियट' सर्च करके देख लो, तुम्हें समझ आ जाएगा कि वह कौन है।" दूतावास का यह बयान सीधे तौर पर डोनाल्ड ट्रंप को निशाना बनाता है, जो अक्सर सोशल मीडिया के जरिए अपनी विदेश नीति और घोषणाएं साझा करते रहते हैं। ऑडियो क्लिप में क्या था? मैरीटाइम चैनल 16 पर प्रसारित इस रेडियो संदेश में IRGC नौसेना ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की कोशिश कर रहे जहाजों को सख्त चेतावनी दी थी। संदेश में कहा गया, "यह चैनल 16 पर ईरानी सिपह नौसेना की कॉल है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अभी भी बंद है। हम इसे हमारे इमाम खामेनेई के आदेश पर खोलेंगे, न कि किसी 'इडियट' के ट्वीट्स के आधार पर।" यह संदेश स्पष्ट रूप से राष्ट्रपति ट्रंप के उन हालिया ट्वीट्स और बयानों पर कटाक्ष था, जिनमें उन्होंने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पूरी तरह खुले होने का दावा किया था। आम तौर पर दूतावास और राजनयिक मिशन इस तरह की अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल से बचते हैं, लेकिन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़ते सैन्य तनाव और अमेरिका की नौसैनिक घेराबंदी ने ईरान के रुख को और अधिक आक्रामक बना दिया है। ईरान का यह हमला दर्शाता है कि वह कूटनीतिक मेज के साथ-साथ नैरेटिव की लड़ाई में भी पीछे नहीं हटना चाहता। इस निजी हमले के बाद फिलहाल वाइट हाउस या राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

तेहरान का बयान, होर्मुज में भारतीय जहाज पर फायरिंग को लेकर 10 ताज़ा अपडेट्स

नई दिल्ली ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के कारण होर्मुज स्ट्रेट से एक बार फिर जहाजों का आवाजाही बंद हो गई है. होर्मुज के रास्ते कच्चा तेल ले जा रहे भारतीय ध्वज वाले दो जहाजों पर फायरिंग की घटना ने हालात को और गंभीर बना दिया है. समुद्री सुरक्षा से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, यह घटना तब हुई जब ये जहाज इस संकरे जलमार्ग से गुजर रहे थे, जो पहले से ही क्षेत्रीय संघर्ष के चलते संवेदनशील बना हुआ है. इस घटना के बाद भारत ने तुरंत कड़ा रुख अपनाते हुए ईरान के राजदूत को तलब किया और अपने नागरिकों और समुद्री व्यापार की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता जताई।  इस बीच एक ऑडियो क्लिप भी सामने आई है, जिसमें एक भारतीय जहाज के क्रू मेंबर समुद्री अधिकारियों पर नाराजगी जताते हुए कहते सुनाई दे रहे हैं, ‘आपने मुझे रास्ता दिया और अब फायरिंग कर रहे हैं, मुझे वापस मुड़ने दीजिए.’ इस बीच ईरान की ओर से शांति का संदेश भी आया है, लेकिन जमीनी हालात और समुद्री गतिविधियां लगातार बढ़ते तनाव की ओर इशारा कर रही हैं।  होर्मुज के हालात पर 10 लेटेस्ट अपडेट्स…     होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे दो भारतीय जहाजों के पास अचानक फायरिंग शुरू हो गई. बताया गया कि ये गोलियां आसपास हो रही ‘स्मॉल आर्म्स फायरिंग’ का हिस्सा थीं, जो जहाजों तक पहुंच गईं. हालांकि किसी भी क्रू मेंबर को चोट नहीं आई.     सरकार से जुड़े सूत्रों ने स्पष्ट किया कि दोनों जहाजों को हल्का नुकसान हुआ है. इन जहाजों की ब्रिज विंडो पर गोली लगने की बात सामने आई है, लेकिन कोई बड़ा तकनीकी नुकसान या जानमाल की हानि नहीं हुई।      एक टैंकर के कप्तान ने दावा किया कि इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से जुड़े दो गनबोट्स जहाज के पास आए और फायरिंग शुरू कर दी. हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।      इस घटना के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने ईरान के राजदूत मोहम्मद फताअली को तलब कर कड़ा विरोध दर्ज कराया. विदेश मंत्रालय के अनुसार, विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने ईरानी राजदूत को इस ‘गोलीबारी की घटना’ पर भारत की ‘गहरी चिंता’ से अवगत कराया.उन्होंने भारतीय जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।      विदेश मंत्रालय ने याद दिलाया कि पहले भी ईरान ने भारत जाने वाले जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने में सहयोग किया है. अब भारत चाहता है कि वही प्रक्रिया जल्द बहाल की जाए।      भारतीय सूत्रों के मुताबिक, जहाजों को जानबूझकर निशाना नहीं बनाया गया, बल्कि वे ‘भटकी हुई गोलियों’ की चपेट में आए. इसके बावजूद घटना ने सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।      उधर यूनाइटेड किंगडम मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस (UKMTO) ने ओमान तट से करीब 20 नॉटिकल मील दूर सुरक्षा घटना की पुष्टि की है, जिससे क्षेत्र में खतरे का स्तर और बढ़ गया है।      कई जहाजों ने दावा किया कि उन्हें VHF रेडियो पर ईरानी नौसेना की ओर से संदेश मिला कि होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से बंद कर दिया गया है. हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई, लेकिन इससे जहाजों में दहशत फैल गई।      होर्मुज में गोलीबारी की इस घटना पर भारत में ईरान के सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने कहा, ‘ईरान और भारत के बीच रिश्ते बहुत मज़बूत हैं और जिस घटना का आपने ज़िक्र किया है, उसके बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है।  हमें उम्मीद है कि सब ठीक हो जाएगा और यह मामला सुलझ जाएगा.’ इसके साथ ही उन्होंने कहा, ‘…हम यह युद्ध नहीं चाहते. हम शांति चाहते हैं, और हमें उम्मीद है कि दूसरा पक्ष भी शांति का पालन करेगा, ताकि हम एक शांतिपूर्ण क्षेत्र बना सकें।      इसी बीच ईरानी नेता मोहम्मद बाकेर क़ालिबाफ़ और सईद खतिबजादेह के बयानों ने हालात को और जटिल बना दिया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने अमेरिका को लेकर सख्त रुख अपनाया है और परमाणु मुद्दे पर किसी भी दबाव को मानने से इनकार किया है. इससे क्षेत्र में टकराव की आशंका और बढ़ गई है।  होर्मुज जलडमरूमध्य में हुई यह घटना सिर्फ एक फायरिंग नहीं, बल्कि वैश्विक समुद्री सुरक्षा के लिए बड़ा संकेत है. भारत जैसे देश, जिनका बड़ा व्यापार इस मार्ग से गुजरता है, अब अतिरिक्त सतर्कता बरत रहे हैं. बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच यह देखना अहम होगा कि आने वाले दिनों में हालात शांत होते हैं या यह संकट और गहराता है।   

तेल और गैस की कीमतों में गिरावट: होर्मुज खुलने से 11% कमी, नया संकट?

नई दिल्‍ली हार्मुज खुलने के ऐलान के बाद इंटरनेशनल मार्केट में भारी उलटफेर देखने को मिला है, जहां कल तक कच्‍चे तेल के दाम 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बने हुए थे. वहीं अब इसकी कीमत अचानक से सस्‍ती हो चुकी हैं. मार्केट समय के दौरान इसकी कीमत 86 डॉलर के करीब चुकी थीं. हालांकि कुछ देर बाद तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर आ गईं।  दरअसल, ईरान ने कहा कि जबतक सीजफायर लागू है, तबतक कमर्शियल जहाजों से होर्मुज से गुजरने की मंजूरी रहेगी. वहीं ट्रंप ने भी कहा कि अब ईरान कभी भी होर्मुज को बंद नहीं करेगा. ईरान ने सहमति जताई है. इस खबर के आते ही तेल-गैस की कीमतें तेजी से गिरें।  11 फीसदी तक सस्‍ता हुआ तेल ब्रेंट क्रूड वायदा रात में 10.42 डॉलर या 10.48% गिरकर 88.97 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया, सत्र के दौरान यह 86.09 डॉलर के निचले स्तर पर भी पहुंचा था. WTI क्रूड वायदा 11.48 डॉलर या 12.12% गिरकर 83.21 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया, जो 80.56 डॉलर तक पहुंच गया था. हालांकि, कारोबार बंद होने तक क्रूड ऑयल 90.38 डॉलर पर पहुंच गया. तेल की कीमतों में एक दिन में यह सबसे बड़ी गिरावट रही।  गैस की कीमतों पर भी असर  खबर आते ही गैस की कीमतों में भी गिरावट देखने को मिली. एलएनजी की की कीमत 2.624 डॉलर आ गईं. हालांकि ईरानी राष्‍ट्रपति की ओर से अपडेट आने के बाद यह वायदा बाजार में 2.674 डॉलर पर पहुंच गया. इसका मतलब है कि नेचुरल गैस की कीमतों में कोई खास बदलाव नहीं हुआ।  होर्मुज को लेकर फिर बना संकट?  शनिवार की सुबह ईरान के सांसद अध्‍यक्ष मोहम्मद बगेर गालिबफ ने कहा कि होर्मुज को अमेरिका के इशारे पर नहीं, बल्कि ईरान के नियम के आधार पर संचालित किया जाएगा. साथ ही उन्‍होंने कहा कि अगर अमेरिका ईरानी पोर्ट पर प्रतिबंध लगाकर रखता है तो होर्मुज बंद कर दिया जाएगा. उन्‍होंने ट्रंप के बयानों की आलोचना की. इस खबर के बाद सोमवार को तेल की कीमतों पर असर दिखाई दे सकता है. तेल-गैस की कीमतों में फिर से तेजी दिख सकती हैं।  बाजार में क्‍या होगा असर?  स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलने से अमेरिकी बाजार में शानदार तेजी देखने को मिली. अमेरिकी बाजार 2 फीसदी से ज्‍यादा चढ़ गया. वहीं भारतीय बाजार का इंडिकेटर गिफ्ट निफ्टी भी शानदार तेजी का संकेत दे रहा है. सोमवार को भारतीय बाजार में करीब 300 अंकों का गैपअप देखने को मिल सकता है। 

होर्मुज तनाव समाप्त, रूस के बाद अब भारत को मिल रही तेल की बड़ी खेप

नई दिल्‍ली मिडिल ईस्‍ट में जंग के कारण तेल संकट पैदा हुआ है, जिस कारण कई देशों में तेल की कीमतें आसमान पर पहुंच चुकी है. अभी ब्रेंट क्रूड ऑयल 112 डॉलर के करीब आ चुका है. इस बीच, भारत ने अपने कच्‍चे तेल के आयात में विविधता लाया है. भारत ईरानी और रूसी तेल की खरीद तो कर ही रहा है. इस बीच खबर है कि भारत को वेनेजुएला से एक बड़ी खेप मिल रही है।  कमोडिटी एनालिटिक्स फर्म केप्लर के अनुसार, दक्षिण अमेरिकी देश से पिछली खेप आने के लगभग एक साल बाद, इस महीने लगभग 10-12 मिलियन बैरल वेनेजुएला का कच्चा तेल भारतीय बंदरगाहों पर पहुंचने की उम्मीद है. वेनेजुएला से कच्चे तेल की खरीद फिर से शुरू होना ऐसे समय में हुआ है, जब भारतीय रिफाइनर कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर विकल्पों में विविधता ला रही हैं।  रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल में आने वाले कार्गो को हालिया रुकावट से काफी पहले ही सुरक्षित कर लिया गया था, जो एक लंबे समय की रणनीतिक बदलाव को दिखाता है. अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण रोक लगने से पहले वेनेजुएला का कच्चे तेल का आयात औसतन 1.9 मिलियन बैरल था।  भारत के लिए बेहतर विकल्‍प है वेनेजुएला  वेनेजुएला भारत के लिए तेल का नया मार्केट है, जो भारत का एक बड़ा विकल्‍प देता है. खासकर होर्मुज रास्‍ता बंद होने के बाद से भारत के कच्‍चे तेल की आपूर्ति पूरी कर सकता है और भारत में तेल की कीमतें स्थिर रह सकती हैं और युद्ध का प्रभाव कम हो सकता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि वेनेजुएला से तेल आने पर इनमें से कुछ माल कोच्चि बंदरगाह पर उतारे जा सकते हैं, जहां बीपीसीएल की रिफाइनरी है।  हर तरफ से भारत के पास आ रहा तेल गौरतलब है कि अमेरिका द्वारा वेनेजुएला पर कंट्रोल के बाद भारतीय रिफाइनरियों और अमेरिका के बीच वेनेजुएला से तेल खरीदने की डील हुई है, जिसके तहत पहली खेप भारत आ रही है. इसके साथ ही अमेरिका द्वारा रूस और ईरानी तेल पर से प्रतिबंध हटाने के बाद भारत रूसी और ईरानी तेल खरीद रहा है. इसके साथ ही भारत अफ्रीकी देशों से भी तेल की आपूर्ति कर रहा है, जिसमें से प्रमुख देश अंगोल है।  क्‍यों खास है वेनेजुएला का तेल  वेनेजुला में दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार मौजूद हैं. यह एक हैवी और एक्‍स्‍ट्रा हैवी क्रूड ऑयल की बड़ी मात्रा रखता है. यह तेल भले ही रिफाइन करना थोड़ा महंगा पड़ता है, लेकिन इसकी उपलब्धता बहुत अधिक है, इसलिए लंबी अवधि में यह सप्लाई के लिहाज से बेहद अहम माना जाता है। 

होर्मुज स्ट्रेट का संकट समाप्त, तेल-गैस वाले देशों का गठबंधन, अब बिना दिक्कत जलेंगे चूल्हे

 मुंबई  ईरान जंग ने एक बार फिर से फॉसिल फ्यूल (पेट्रोल, डीजल आदि) बेस्‍ड डेवलपमेंट मॉडल की खामियों को उजागर कर दिया है. भारत अपनी तेल जरूरतों का तीन तिहाई आयात करता है. अरब देश एनर्जी का सबसे बड़ा स्रोत हैं. तेल के साथ ही गैस का भी आयात किया जाता है. इनसे ही भारत में गाड़ियां सड़कों पर सरपट भागती हैं और घरों में चूल्‍हे जलते हैं. ऐसे में खाड़ी देश में किसी भी तरह का संकट आने पर उसका सीधा असर भारत भी पड़ता है. अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान अटैक करने के बाद ऐसी ही स्थिति पैदा हो गई है. एनर्जी कॉरिडोर के तौर पर अपनी पहचान रखने वाले होर्मुज स्‍ट्रेट पर भी इसका व्‍यापक असर पड़ा है. इससे तेल और गैस से लदे जहाजों की आवाजाही बुरी तरह से प्रभावित हुई है. भारत के लिए होर्मुज जलडमरूमध्‍य काफी अहम है, क्‍योंकि इसी रूट से तेल और गैस के अधिकांश शिपमेंट आते हैं ।  अब इस निर्भरता को कम करने की दिशा में अहम और निर्णायक कदम उठाने का फैसला किया गया है. भारत अगले 9 से 10 साल में नॉन-फॉसिल फ्यूल बेस्‍ड पावर कैपेसिटी को कुल उत्‍पादन का 60 फीसद करने का लक्ष्‍य रखा है. इस तरह फॉसिल फ्यूल यानी तेल आधारित ऊर्जा जरूरतों को तकरीबन एक तिहाई तक सीमित कर दिया जाएगा. ऐसे में यदि होर्मुज जैसे संकट की स्थिति में भी देश की ऊर्जा जरूरतों पर ज्‍यादा असर नहीं पड़ेगा।  अब समझ‍िए कि होर्मुज स्‍ट्रेट पर निर्भरता आने वाले कुछ सालों में कैसे खत्‍म होगी. दरअसल, वैश्विक जलवायु संकट के बीच भारत ने अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं को और मजबूत करते हुए बड़ा कदम उठाया है. केंद्रीय मंत्रिमंडल ने United Nations Framework Convention on Climate Change (UNFCCC) के तहत 2031-2035 अवधि के लिए देश के अपडेटेड राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) को मंजूरी दे दी. इस नए लक्ष्य के तहत भारत ने 2005 के स्तर के मुकाबले अपनी अर्थव्यवस्था की उत्सर्जन तीव्रता में 47% की कमी लाने और 2035 तक कुल बिजली क्षमता में 60% हिस्सेदारी गैर-जीवाश्म ईंधनों से हासिल करने का लक्ष्य रखा है. यह कदम पेरिस एग्रीमेंट (Paris Agreement) के तहत भारत की जिम्मेदारियों का हिस्सा है और इसे देश की तीसरी NDC प्रस्तुति माना जा रहा है. सरकार का कहना है कि यह लक्ष्य केवल महत्वाकांक्षी नहीं, बल्कि पहले से हासिल प्रगति पर आधारित है।  संकट से सीख, टार्गेट से आगे की बात सरकार ने स्पष्ट किया कि भारत ने साल 2015 में तय किए गए अपने पूर्व NDC लक्ष्यों (33-35% उत्सर्जन तीव्रता में कमी और 40% गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता) को समय से काफी पहले ही हासिल कर लिया था. इसी आधार पर अब नए और अधिक कड़े लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं. अपडेटेड NDC समानता और साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों (CBDR-RC) के सिद्धांतों के अनुरूप है और ‘विकसित भारत 2047’ की व्यापक परिकल्पना को भी मजबूती देता है. पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और ऊर्जा आपूर्ति में अस्थिरता के बीच कई देश अपने जलवायु लक्ष्यों से पीछे हटते दिख रहे हैं. ऐसे समय में भारत का यह कदम वैश्विक मंच पर एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है. ऊर्जा और जलवायु विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने इस बार जलवायु महत्वाकांक्षा और ऊर्जा सुरक्षा के बीच संतुलन साधने की कोशिश की है. दिलचस्प बात यह है कि केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के आकलनों के अनुसार 2035-36 तक भारत की गैर-जीवाश्म क्षमता लगभग 70% तक पहुंच सकती है, लेकिन सरकार ने अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता के तौर पर 60% का ही लक्ष्य रखा है, जिससे यह लक्ष्य यथार्थवादी और विश्वसनीय बना रहे।  ऐसे बनेगी बात सरकार ने स्पष्ट किया कि इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कई मौजूदा और नई नीतियों का सहारा लिया जाएगा. इनमें ग्रीन एनर्जी का विस्तार (ग्रीन हाइड्रोजन मिशन) बैटरी स्टोरेज, स्वच्छ औद्योगिक प्रक्रियाएं और ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर जैसे प्रोजेक्ट शामिल हैं. इसके अलावा International Solar Alliance जैसे वैश्विक सहयोग मंच और राष्ट्रीय जलवायु कार्य योजना (NAPCC) के तहत चल रहे कार्यक्रम भी इन लक्ष्यों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाएंगे. सरकार कार्बन कैप्चर तकनीकों और जलवायु-लचीले बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ाने पर भी जोर दे रही है. नई NDC केवल उत्सर्जन में कटौती तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए अनुकूलन उपायों पर भी खास ध्यान दिया गया है. इसमें तटीय सुरक्षा, ग्लेशियर निगरानी, हीट एक्शन प्लान और आपदा लचीलापन शामिल हैं. सरकार ने Lifestyle for Environment (LiFE) पहल के जरिए आम नागरिकों को भी जलवायु कार्रवाई में शामिल करने का लक्ष्य रखा है, ताकि रोजमर्रा की जीवनशैली में पर्यावरण अनुकूल बदलाव लाए जा सकें। 

ईरान पर दबाव बढ़ाने की रणनीति! होर्मुज के लिए खर्ग द्वीप कब्जाने की तैयारी में ट्रंप

वॉशिंगटन ईरान-अमेरिका और इजरायल के बीच युद्ध दिन पर दिन और भीषण रूप ले रहा है। अब दोनों तरफ से ही तेल रिफाइनरियों पर हमले किए जा रहे हैं। ईरान की जवाबी कार्रवाइयों में कतर, सऊदी अरब, यूएई और इजरायल में तेल-गैस केंद्रों पर मिसाइलों और ड्रोन बरसाए गए हैं। वहीं, ईरान दुनियाभर को तेल सप्लाई करने वाले स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को खोलने के लिए सहमत नहीं हो रहा है। इस बीच, अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप होर्मुज खुलवाने के लिए बड़ा प्लान तैयार कर रहे हैं। एक्सियोस की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ईरान को होर्मुज खोलने पर मजबूर करने के लिए खर्ग द्वीप पर कब्जा करने की रणनीति तैयार कर रहे। कितना अहम है ईरान का खर्ग द्वीप खर्ग द्वीप वह द्वीप है, जो ईरान का ऑयल हब यानी कि तेल का मुख्य केंद्र माना जाता है। यहीं से ईरान को 90 फीसदी तेल मिलता है। यह द्वीप ईरान के दक्षिणी तट से करीब 25-30 किलोमीटर की दूरी पर है। पर्शियन गल्फ के बीच में होने की वजह से इसकी लोकेशन भी रणनीतिक है। हाल ही में ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिकी सेना ने इस द्वीप पर हवाई हमले भी किए थे। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने यहां पर 90 से अधिक ठिकानों को निशाना बनाया था, जिसमें मिसाइल स्टोरेज बंकर, एयर डिफेंस सिस्टम शामिल थे। खर्ग पर कब्जे की रणनीति एक्सियोस ने शुक्रवार को चार ऐसे सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी, जिन्हें इस मामले की जानकारी है, कि ट्रंप प्रशासन ईरान पर होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने का दबाव बनाने के लिए, ईरान के खर्ग द्वीप पर कब्जा करने या उसकी घेराबंदी करने की योजनाओं पर विचार कर रहा है। खर्ग द्वीप पर कब्जा करने का ऑपरेशन, जो तट से 15 मील दूर स्थित है और ईरान के 90 फीसदी कच्चे तेल के निर्यात को प्रोसेस करता है, अमेरिकी सैनिकों को सीधे तौर पर हमला करने की जद में ला सकता है। इसलिए, ऐसा कोई भी ऑपरेशन तभी शुरू किया जाएगा जब अमेरिकी सेना होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास ईरान की सैन्य क्षमता को और कमजोर कर देगी। व्हाइट हाउस की सोच की जानकारी रखने वाले एक सूत्र ने कहा, “हमें हमलों के जरिए ईरानियों को और कमजोर करने, द्वीप पर कब्जा करने, और फिर उन्हें पूरी तरह से अपने शिकंजे में लेकर बातचीत के लिए इस्तेमाल करने में लगभग एक महीने का समय लगेगा।” और अधिक सैनिक भेज सकता है अमेरिका अगर ऐसे किसी ऑपरेशन को मंजूरी मिलती है, तो उसके लिए और ज्यादा सैनिकों की जरूरत होगी। तीन अलग-अलग मरीन यूनिट इस क्षेत्र की ओर रवाना हो चुकी हैं। एक अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि व्हाइट हाउस और पेंटागन जल्द ही और भी ज्यादा सैनिक भेजने पर विचार कर रहे हैं। अमेरिकी प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ''वह चाहते हैं कि होर्मुज खुला रहे। अगर ऐसा करने के लिए उन्हें खर्ग द्वीप पर कब्ज़ा करना पड़ा, तो वह होगा। अगर वह तटीय आक्रमण करने का फ़ैसला करते हैं, तो वह भी होगा। लेकिन अभी तक ऐसा कोई फैसला नहीं लिया गया है।'' उन्होंने आगे कहा कि ट्रंप समेत हर राष्ट्रपति के कार्यकाल में, संघर्ष वाले इलाकों में हमारे सैनिक हमेशा ज़मीन पर मौजूद रहे हैं। मुझे पता है कि मीडिया में इस बात को लेकर काफी चर्चा होती है, और मैं इसके पीछे की राजनीति भी समझता हूं, लेकिन राष्ट्रपति वही करेंगे जो सही होगा।

ट्रंप ने पलटी मारी, अमेरिका ने होर्मुज पर ईरानी मिसाइल भंडार पर गिराया भारी बम

वाशिंगटन  ईरान के साथ जंग में अमेरिका अकेला पड़ चुका है. उसका साथ कोई नहीं दे रहा है. ऐसे में अब अमेरिका ने अकेले ही ईरान से आर-पार की जंग लड़ने की ठान ली है. अमेरिका अब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को अकेले ईरान के कब्जे से मुक्त कराने में जुट गया है. जी हां, इसी सिलसिले में अमेरिका ने होर्मुज के पास 23 क्विंटल के खतरनाक बमों की बमबारी की है. इस बमबारी का मकसद होर्मुज के पास स्थित ईरानी मिसाइल साइटों को ध्वस्त करना था. ताकि होर्मुज के दरवाजे को समुद्री व्यापार के लिए खोला जा सके. अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने एक्स पर पोस्ट कर इसकी जानकारी दी. इसके मुताबिक, ईरान की इन क्रूज मिसाइलों से होर्मुज से होने वाली अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार को खतरा था। दरअसल, अमेरिकी फोर्स ने कई 5000 पाउंड वजन वाले गहराई तक घुसने वाले बम गिराए. यानी अमेरिका ने करीब 23 क्विंटल के बम से ईरान के मिसाइल भंडार पर हमला किया है. ये बम ईरान के मजबूत बनाए गए मिसाइल स्टोरेज और लॉन्च साइटों पर गिराए गए, जो समुद्र किनारे बने थे. अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने इसकी सफलता की जानकारी दी। यूएस सेंट्रल कमांड के मुताबिक, ‘कुछ घंटे पहले अमेरिकी सेना ने होर्मुज जलडमरूमध्य के पास ईरान के समुद्र तट पर स्थित ईरान की मजबूत मिसाइल साइटों पर 5000 पाउंड के कई ‘डीप पेनिट्रेटर’ बमों का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया. इन साइटों पर मौजूद ईरान की जहाज-रोधी क्रूज मिसाइलों से इस जलडमरूमध्य में होने वाली अंतर्राष्ट्रीय जहाज़ों की आवाजाही को खतरा था.’ इसका मतलब है कि अमेरिका इस कार्रवाई को सफल मान रहा है। क्यों दुनिया के लिए खास है होर्मुज गौरतलब है कि होर्मुज की खाड़ी दुनिया के लिए बहुत अहम है. यहां से दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल गुजरता है. अगर ये रास्ता बंद हो जाए तो पूरी दुनिया में तेल की कीमतें आसमान छू जाती हैं. अभी इस होर्मुज के कारण पूरी दुनिया में खलबली है. कारण कि पिछले कुछ हफ्तों से ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच जंग चल रही है. ईरान ने बदला लेते हुए होर्मुज को बंद कर दिया है. ईरान लगातार होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों को टारगेट करने के लिए मिसाइलें, ड्रोन और माइन्स का इस्तेमाल कर रहा है. इस खौफ से ईंधन वाले जहाज पार नहीं कर पा रहे हैं. इससे तेल के टैंकर रुक गए और दुनिया भर में तेल संकट खड़ा हो गया है। होर्मुज के पास ईरानी मिसाइल पर अटैक क्यों? होर्मुज खोलना अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती है. कारण कि ईरान ने भारत समेत एशिया के कुछ देशों को छूट तो दी है, मगर अमेरिका और यूरोप के लिए पूरी तरह से होर्मुज का दरवाजा बंद कर रखा है. ऐसे में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लगातार नाटो और अन्य देशों से होर्मुज खोलने में मदद मांग रहे हैं. उन्होंने कहा कि होर्मुज को खुला और सुरक्षित रखने के लिए दूसरे देश भी जहाज भेजें.  लेकिन कई सहयोगी देशों ने मना कर दिया. ट्रंप ने नाराजगी जताई और कहा कि अमेरिका अकेले ही ये काम कर सकता है. यहा कारण है कि अब अमेरिका अकेले ही होर्मुज को खुलवाने में जुट गया है. आज का यह एक्शन इसी का नतीजा है। अमेरिका ने गेम पलटना शुरू किया पहले अमेरिका ने ईरान के खार्ग द्वीप पर भी हमले किए थे. वहां मिलिट्री टारगेट नष्ट किए गए, लेकिन तेल सुविधाओं को बचाया गया. ट्रंप ने कहा था कि अगर जरूरत पड़ी तो तेल सुविधाएं भी निशाना बनाई जा सकती हैं. अब ये नया हमला ट्रंप की रणनीति का हिस्सा लगता है. होर्मुज के पास ईरानी मिसाइल भंडार को तबाह करके ट्रंप ने गेम पलट दिया है. अमेरिका के इस एक्शन से होर्जुम में ईरान का खतरा कम हो जाएगा. ईरान की मिसाइलें नष्ट होने से होर्मुज का दरवाजा फिर से खुलने की उम्मीद बढ़ गई है। अमेरिका ने किस बम से किया अटैक अमेरिका का ये हमला बंकर-बस्टर बमों से किया गया. ये बम जमीन के अंदर घुसकर मजबूत ठिकानों को तबाह कर देते हैं. अमेरिका ने 5000 पाउंड यानी करीब 23 क्विंटल बमों से अटैक किया. ईरान की तरफ से अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है. लेकिन ये साफ है कि अमेरिका ईरान की समुद्री ताकत को कमजोर करने पर जोर दे रहा है. अगर अमेरिका का यह दावा सही है तो दुनिया भर के व्यापारियों और तेल कंपनियों को राहत मिल सकती है. अगर होर्मुज खुल गया तो तेल की सप्लाई सामान्य हो जाएगी और कीमतें गिरेंगी. वैसे भी ट्रंप का कहना है कि अमेरिका अपने सहयोगियों के बिना भी इस रास्ते को सुरक्षित रखेगा. बता दें कि 28 फरवरी से ही युद्ध जारी है। क्या है ये बंकर बस्टर बम और क्यों है इसकी इतनी चर्चा? अब सवाल उठता है कि ये बंकर बस्टर बम आखिर बला क्या है? आम भाषा में समझें तो ये ऐसे बम हैं जो जमीन या कंक्रीट की मोटी दीवारों को भेदकर गहराई में छिपे दुश्मनों का काल बन जाते हैं. 2022 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक ऐसे बम की कीमत करीब 2.88 लाख डॉलर होती है. हालांकि, अमेरिका के पास इससे भी बड़े 30,000 पाउंड वाले बम हैं, लेकिन फिलहाल ईरान के इन मिसाइल ठिकानों को मिट्टी में मिलाने के लिए ये 5,000 पाउंड यानी 2200 किलो वाले बम ही काफी थे। पूरी कहानी का दूसरा पहलू ये भी है कि इस जंग के पीछे इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का भी हाथ माना जा रहा है, जो महीनों से अमेरिका को इस रास्ते पर चलने के लिए उकसा रहे थे. लेकिन ट्रंप का कहना है कि यह उनकी अपनी फीलिंग थी कि ईरान से खतरा बढ़ रहा है, इसलिए उन्होंने यह कदम उठाया. दूसरी तरफ, ईरान आज भी अपनी बात पर अड़ा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ बिजली बनाने जैसे शांतिपूर्ण कामों के लिए है और उसका बम बनाने का कोई इरादा नहीं है। फिलहाल, हालात ये हैं कि पूरी दुनिया की नजरें होर्मुज के इस रास्ते पर टिकी हैं. अमेरिका ने अपनी ताकत दिखाकर ये साफ कर दिया है कि वो पीछे हटने वाला नहीं है. अब देखना ये होगा कि ईरान इस बंकर बस्टर हमले का क्या … Read more