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कनाडा में डिपोर्टेशन का अलर्ट, खालिस्तानी समर्थकों पर कार्रवाई की तैयारी

टोरंटो कनाडा में इमिग्रेंट्स और शरणार्थियों को लेकर सख्ती लगातार बढ़ती जा रही है. सरकार ने बड़ी संख्या में शरणार्थियों और अस्थायी रूप से रह रहे लोगों को नोटिस जारी करना शुरू कर दिया है, जिसमें संकेत दिया गया है कि वे अब देश में रहने के पात्र नहीं हो सकते और उन्हें वापस लौटने की तैयारी करनी पड़ सकती है. इस कार्रवाई का असर खालिस्तान समर्थक आधार पर किए गए कुछ दावों पर भी पड़ सकता है।  पहले जहां कनाडा ऐसे मामलों में खतरे के आधार पर आसानी से शरण दे देता था, वहीं अब सरकार का रुख सख्त होता दिखाई दे रहा है. दरअसल, Immigration, Refugees and Citizenship Canada (IRCC) ने करीब 30,000 शरणार्थी आवेदकों को “प्रोसीजरल फेयरनेस लेटर्स” भेजे हैं. इन नोटिसों में कहा गया है कि उनके दावे शरण के तय मानकों पर खरे नहीं उतर सकते. साथ ही आवेदकों को सीमित समय में अतिरिक्त जानकारी और सबूत पेश करने का मौका दिया गया है।  हालांकि सरकार ने साफ किया है कि ये “डिपोर्टेशन ऑर्डर” नहीं हैं, लेकिन कई मामलों में चेतावनी दी गई है कि अगर आवेदक अयोग्य पाए जाते हैं, तो उन्हें जल्द से जल्द कनाडा छोड़ना पड़ सकता है, अन्यथा उनके खिलाफ निर्वासन की कार्रवाई हो सकती है।  इस पूरी कार्रवाई के पीछे नया कानून Bill C-12 है, जिसने शरण आवेदन के नियमों को पहले से कहीं ज्यादा सख्त बना दिया है. इसके तहत, जो लोग कनाडा आने के एक साल के भीतर शरण के लिए आवेदन नहीं करते, उनके केस को Immigration and Refugee Board of Canada (IRB) तक नहीं भेजा जाएगा।  इसके अलावा, जो लोग अमेरिका से अनियमित तरीके से सीमा पार कर कनाडा पहुंचे और 14 दिनों के भीतर दावा नहीं किया, वे भी अपात्र माने जा सकते हैं।  इमिग्रेशन विशेषज्ञों का कहना है कि इस कार्रवाई का असर भारतीय आवेदकों पर भी पड़ सकता है. कनाडा के इस नए नियम से जो इस तरह के मूवमेंट से जुड़े हैं उनपर कैंची चल सकती है. भारत के संदर्भ में कनाडा की ये पॉलिसी अहम साबित हो सकती है, क्योंकि बड़ी संख्या में खालिस्तान समर्थक भारत से भागकर कनाडा में छिपे हुए हैं।  विशेषज्ञों और वकीलों ने इस प्रक्रिया पर गंभीर चिंता जताई है. उनका कहना है कि कई मामलों में आवेदकों को आमने-सामने सुनवाई का मौका नहीं मिल रहा और उन्हें अपना पक्ष कागजों के जरिए ही रखना पड़ रहा है. इससे उनकी स्थिति और जोखिम को ठीक से समझ पाना मुश्किल हो जाता है और गलत फैसलों की संभावना बढ़ सकती है।  कुल मिलाकर, कनाडा की यह सख्ती उसकी शरणार्थी नीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है. भले ही सरकार इसे मास डिपोर्टेशन नहीं मान रही, लेकिन जमीनी स्तर पर हजारों लोग अब अनिश्चितता में हैं और उन्हें अपने भविष्य को लेकर गंभीर चिंता सता रही है। 

लुधियाना का हौजरी कारोबारी और कोर्ट का एजेंट निकला खालिस्तानी

चंडीगढ़. लुधियाना में एक आतंकी साजिश को पंजाब पुलिस ने नाकाम कर दिया है। स्टेट स्पेशल ऑपरेशन सेल (SSOC) और काउंटर इंटेलिजेंस की संयुक्त कार्रवाई में बुधवार को पकडे़ गए आरोपियों में एक कोर्ट परिसर में एजेंट का काम करता है और दूसरा हौजरी का काम करता है। आरोपी करनबीर (21) हैबोवाल कलां और अवतार सिंह तारी न्यू शिमलापुरी मिलरगंज का रहने वाला है। अवतार सिंह कोर्ट परिसर में एजेंट का काम करता है। यहीं से वह सभी सरकारी इमारतों की रेकी करता रहता था। बाद में वह एक निहंग बन गया। इसी तरह आरोपी करनबीर अपने पिता के साथ हौजरी का काम करता है। पुलिस अब दोनों आरोपियों के पारिवारिक सदस्यों से भी पूछताछ जल्द करेगी। पुलिस ने दावा किया कि आरोपी सोशल नेटवर्किंग साइटों के माध्यम से हैंडलर के संपर्क में आए। पुलिस ने बताया कि अवतार सिंह का आपराधिक इतिहास रहा है, उसके खिलाफ आर्म्स एक्ट और आईपीसी के तहत कई मामले दर्ज हैं, जबकि करनबीर सिंह का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। पुलिस को मिला पिस्तौल और जिंदा कारतूस पुलिस ने इनके कब्जे से एक 9 एमएम की पिस्तौल और पांच जिंदा कारतूस बरामद किए हैं। पंजाब के पुलिस महानिदेशक (DGP) गौरव यादव ने बताया था कि प्रारंभिक जांच में पता चला है कि दोनों आरोपी ब्रिटेन और जर्मनी में बैठे आकाओं के सीधे संपर्क में थे। जिनका संबंध खालिस्तान कमांडो फोर्स (KCF) और कट्टरपंथी विचारधारा से है। उनके निर्देशों पर, आरोपियों ने कथित तौर पर लुधियाना में सरकारी इमारतों और प्रमुख कार्यालयों की रेकी की थी, जो एक लक्षित हमले को अंजाम देने की एक बड़ी साजिश का हिस्सा था। जांच में यह भी पता चला है कि दोनों को कई चिह्नित व्यक्तियों से संबंधित इनपुट एकत्र करने और जमीनी कार्य करने का भी काम सौंपा गया था, जो एक व्यापक नेटवर्क और संभावित रूप से एक बड़ी साजिश का संकेत देता है। खुफिया जानकारी के बाद ऑपरेशन किया एसएसओसी एसएएस नगर के एआईजी डी.सुडरविजी ने ऑपरेशन की जानकारी साझा करते हुए बताया कि साजिश के बारे में विशिष्ट और विश्वसनीय खुफिया जानकारी के बाद, एसएसओसी एसएएस नगर और काउंटर इंटेलिजेंस लुधियाना की एक संयुक्त टीम ने एक सटीक अभियान शुरू किया और दोनों आरोपियों को लुधियाना से गिरफ्तार कर लिया। उन्होंने बताया कि जांच के दौरान, अवतार सिंह के कब्जे से एक 9 एमएम पिस्तौल और जिंदा कारतूस बरामद किए। AIG ने कहा कि जांच से यह भी पता चला है कि दोनों व्यक्तियों को उनके विदेश स्थित आकाओं द्वारा कट्टरपंथी बनाया गया था और भर्ती किया गया था। उन्हें अपने काम के हिस्से के रूप में सोशल मीडिया पर चरमपंथी सामग्री प्रसारित करने का निर्देश दिया गया था। इस संबंध में पुलिस स्टेशन एसएसओसी एसएएस नगर में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 113 (5) और 61 (2) के तहत मामला दर्ज किया गया है। पुलिस ने कहा कि ऑपरेशन से सार्वजनिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरे को टाल दिया गया है और पूरे नेटवर्क को खत्म करने के लिए जांच जारी है। आरोपियों ने कई नेताओं की रेकी की आरोपी विदेश में रहने वाले कुलवंत सिंह मान खालसा नाम के एक हैंडलर के संपर्क में आए। खालसा ने दोनों को एक वॉट्सऐप ग्रुप में जोड़ा और उन्हें कट्टरपंथी बना दिया। उसने उन्हें शहर में दक्षिणपंथी नेताओं और सरकारी कार्यालयों की रेकी करने का काम दिया। आरोपियों ने उनके घरों और कार्यालयों की तस्वीरें क्लिक कीं और उन्हें भेज दीं।

लंदन की सड़कों पर टकराव: हिंदू प्रदर्शन के दौरान खालिस्तानियों ने बांग्लादेश का खुलकर किया समर्थन

लंदन बांग्लादेश में हिंदू युवक दीपु चंद्र दास की नृशंस हत्या की गूंज अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुनाई दे रही है। हाल ही में लंदन स्थित बांग्लादेश उच्चायोग के बाहर इस हत्याकांड के विरोध में भारी विरोध प्रदर्शन हुआ। हालांकि, इस शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान उस समय तनाव पैदा हो गया जब खालिस्तानी अलगाववादी समूह बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के बचाव में उतर आए। लंदन में रहने वाले बांग्लादेशी हिंदुओं ने दीपु दास की हत्या और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों के खिलाफ उच्चायोग के बाहर प्रदर्शन आयोजित किया था। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि दोषियों को कड़ी सजा मिले और हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। हैरानी की बात यह रही कि इस प्रदर्शन का विरोध करने के लिए वहां खालिस्तानी समर्थक पहुंच गए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, खालिस्तानी प्रदर्शनकारी मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली बांग्लादेश सरकार की ढाल बनकर खड़े हो गए। उन्होंने न केवल हत्या का विरोध कर रहे हिंदुओं को डराने की कोशिश की, बल्कि उनके खिलाफ उकसाने वाले नारे भी लगाए। स्थिति को बिगड़ता देख लंदन पुलिस ने हस्तक्षेप किया और दोनों पक्षों के बीच दीवार बनकर शांति बनाए रखने की कोशिश की। भारत विरोध के लिए खालिस्तानी-कट्टरपंथी गठबंधन यह घटना भारत विरोधी ताकतों के बीच बढ़ते गठजोड़ की ओर इशारा करती है। खालिस्तानी आतंकी संगठन 'सिख फॉर जस्टिस' (SFJ) का नेता गुरपतवंत सिंह पन्नू लगातार भारत विरोधी बयानबाजी कर रहा है। हाल ही में पन्नू ने अमेरिका से एक वीडियो जारी कर बांग्लादेश के कट्टरपंथियों का समर्थन किया था। पन्नू ने भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को तोड़ने की एक नई साजिश रची है। उसने एक विवादास्पद मानचित्र जारी किया है, जिसमें असम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और नागालैंड को मिलाकर एक अलग देश बनाने का दावा किया गया है। पन्नू ने इस काल्पनिक देश का नाम 'ट्रम्पलैंड' रखा है। साथ ही, उसने अरुणाचल प्रदेश को चीन का हिस्सा दिखाने की हिमाकत भी की है। आपको बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब किसी ने पूर्वोत्तर को भारत से अलग करने की बात कही हो इससे पहले कुछ बांग्लादेशी कट्टरपंथी नेता भी इसी तरह के दावे कर चुके हैं। गुरपतवंत सिंह पन्नू भारत के खिलाफ जहर उगलने का कोई मौका नहीं छोड़ता। वह अक्सर पाकिस्तानी चैनलों पर बैठकर भारत विरोधी एजेंडा चलाता है। 2023 के क्रिकेट विश्व कप के दौरान पन्नू ने स्टेडियम और विमानों को निशाना बनाने की धमकी दी थी। पन्नू ने 2025 के स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तिरंगा फहराने से रोकने वाले के लिए इनाम की घोषणा भी की थी।  

दिलजीत दोसांझ पर खालिस्तानी संगठन का निशाना, वजह बना अमिताभ बच्चन के पैर छूना

मुंबई  खालिस्तानी आतंकवादी गुरपतवंत सिंह पन्नू के संगठन, सिख्स फॉर जस्टिस (एसएफजे) ने पंजाबी गायक-अभिनेता दिलजीत दोसांझ द्वारा बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन के पैर छूने के विरोध में 1 नवंबर को ऑस्ट्रेलिया में उनके कॉन्सर्ट को बंद करने की धमकी दी है। समूह का आरोप है कि यह कृत्य 1984 के सिख विरोधी दंगा पीड़ितों की "स्मृति का अनादर" करता है। पन्नू ने एक बयान में कहा-  "अमिताभ बच्चन, जिनके शब्दों ने 1984 के नरसंहार को हवा दी, के पैर छूकर दिलजीत दोसांझ ने 1984 के सिख नरसंहार के हर पीड़ित, हर विधवा और हर अनाथ का अपमान किया है।" उन्होंने आगे कहा- "यह अज्ञानता नहीं, विश्वासघात है। जिन सिखों को ज़िंदा जला दिया गया, जिन महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ, जिन बच्चों को क़त्ल किया गया, उनकी राख अभी ठंडी भी नहीं हुई है। कोई भी विवेकशील सिख 1 नवंबर, स्मृति दिवस पर कोई भी प्रदर्शन या उत्सव नहीं मना सकता।" सप्ताहांत में 'कौन बनेगा करोड़पति 17' में अपनी उपस्थिति के दौरान, सेट पर पहुंचते ही दोसांझ ने दिग्गज अभिनेता के पैर छुए। बच्चन, जिन्होंने गायक-अभिनेता का परिचय "पंजाब दे पुत्तर (पंजाब का बेटा)" कहकर कराया, ने उन्हें गले लगाकर दर्शकों की तालियां बटोरीं। यह क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है और यूजर्स दोसांझ की इस हरकत की जमकर तारीफ कर रहे हैं। दोसांझ के कॉन्सर्ट को बंद करने की धमकी के अलावा, प्रतिबंधित खालिस्तानी संगठन ने जत्थेदार अकाल तख्त साहिब, ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज को पत्र लिखकर उनसे आग्रह किया है कि वे अभिनेता-गायक को तलब करें और 2010 के तख्त के उस आदेश के मद्देनजर अपने कृत्य पर सफाई दें, जिसमें नवंबर 1984 को "सिख नरसंहार माह" के रूप में मान्यता दी गई थी। एसएफजे ने सभी "सिख संस्थाओं, कलाकारों और दर्शकों से उन दंगों के प्रचार या लीपापोती से जुड़े किसी भी कार्यक्रम या सहयोग का बहिष्कार करने" का आह्वान किया है, जो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या के बाद हुए थे। इस बीच, दोसांझ जो इस समय अपने ऑरा टूर के लिए ऑस्ट्रेलिया में हैं, ने सिडनी में एक स्टेडियम शो के सभी टिकट बेचने वाले पहले भारतीय कलाकार बनकर इतिहास रच दिया। शो के सभी टिकट बिक गए, कुछ टिकट तो 800 डॉलर प्रति टिकट तक बिक गए और 30,000 प्रशंसक उपस्थित हुए।  

खालिस्तानी संगठनों को फंडिंग पर खुलासा, कनाडा की रिपोर्ट से हुआ बड़ा पर्दाफाश

ओटावा खालिस्तानी आतंकियों की फंडिंग को लेकर कनाडा सरकार की अपनी ही नई रिपोर्ट में बड़ा खुलासा हुआ है। इसमें कहा गया है कि खालिस्तानी हिंसक उग्रवादी संगठन बब्बर खालसा इंटरनेशनल और इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन समेत कई आतंकी संगठनों को कनाडा से आर्थिक सहायता मिल रही है। यह जानकारी हाल ही में जारी की गई रिपोर्ट “2025 असेसमेंट ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एंड टेररिस्ट फाइनेंसिंग रिस्क्स इन कनाडा” में सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, कनाडा में आपराधिक संहिता के अंतर्गत सूचीबद्ध कुछ आतंकवादी संगठन जैसे हमास, हिजबुल्लाह और खालिस्तानी चरमपंथी संगठन, राजनीतिक रूप से प्रेरित हिंसक उग्रवाद (PMVE) श्रेणी में आते हैं और इन्हें कनाडा से वित्तीय सहयोग प्राप्त होता रहा है। खालिस्तानी नेटवर्क और फंडिंग के तरीके रिपोर्ट में कहा गया है कि खालिस्तानी संगठन भारत के पंजाब में स्वतंत्र राज्य बनाने के लिए हिंसक तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इन्हें कनाडा समेत विभिन्न देशों में मौजूद समर्थकों से धन जुटाने में मदद मिलती है। रिपोर्ट ने यह भी स्वीकार किया कि पहले कनाडा में इनका बड़ा फंडिंग नेटवर्क सक्रिय था, लेकिन अब यह ऐसे छोटे-छोटे समूहों और व्यक्तियों के माध्यम से संचालित हो रहा है, जिनकी निष्ठा खालिस्तान आंदोलन के प्रति है, भले ही वे किसी विशेष संगठन से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े न हों। एनपीओ और चैरिटेबल संगठनों के जरिए धन जुटाना जांच में पाया गया है कि इन आतंकी संगठनों ने धन जुटाने के लिए गैर-लाभकारी संस्थाओं (NPOs) और चैरिटेबल संगठनों का भी इस्तेमाल किया है। रिपोर्ट के अनुसार, “हमास और हिजबुल्लाह लंबे समय से चैरिटेबल और NPO सेक्टर के दुरुपयोग के लिए कुख्यात रहे हैं। इसी तरह खालिस्तानी चरमपंथी संगठनों ने भी प्रवासी समुदायों से चंदा के जरिए धन इकट्ठा करने और उसे ट्रांसफर करने के लिए ऐसे नेटवर्क का सहारा लिया है।” हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कनाडा में अधिकांश NPOs में मनी लॉन्ड्रिंग और टेरर फाइनेंसिंग का खतरा शून्य है, लेकिन कुछ संस्थाओं के मामले में यह जोखिम अधिक हो सकता है। भारत-कनाडा संबंध खालिस्तानी उग्रवाद का उल्लेख ऐसे समय पर हुआ है जब भारत और कनाडा के रिश्तों में धीरे-धीरे सुधार देखने को मिल रहा है। मार्क कार्नी की सरकार के सत्ता में आने के बाद दोनों देशों ने हाल ही में एक-दूसरे के लिए नए उच्चायुक्तों की नियुक्ति की है। गौरतलब है कि पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के कार्यकाल में रिश्ते गहरे संकट में आ गए थे, जब उन्होंने भारत पर कनाडा में खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में संलिप्त होने का आरोप लगाया था। इसके बाद भारत और कनाडा के बीच कई उच्च-स्तरीय राजनयिकों को निष्कासित कर दिया गया था। नई रिपोर्ट से यह साफ हो गया है कि कनाडा में सक्रिय खालिस्तानी तत्व अब भी प्रवासी सिख समुदाय और गैर-लाभकारी संगठनों के जरिए अपनी गतिविधियों को जारी रखे हुए हैं।