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गुड़ी पड़वा के मौके पर महाकाल मंदिर के शिखर पर ब्रह्म ध्वज फहरेगा, 2000 साल पुरानी परंपरा का फिर से शुरुआत

उज्जैन  चैत्र शुक्ल प्रतिपदा और गुड़ी पड़वा के अवसर पर 19 मार्च को श्री महाकालेश्वर मंदिर के शिखर पर ब्रह्म ध्वज का आरोहण किया जाएगा। यह आयोजन लगातार दूसरे वर्ष किया जा रहा है। यह केवल ध्वजारोहण नहीं, बल्कि लगभग 2000 वर्ष पुरानी उस गौरवशाली परंपरा का पुनरुद्धार है, जिसकी शुरुआत सम्राट विक्रमादित्य के काल में हुई थी।  मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहल पर इस परंपरा को फिर से भव्य रूप दिया जा रहा है। विक्रमादित्य द्वारा प्रारंभ किया गया विक्रम संवत और ब्रह्म ध्वज की परंपरा भारत की सांस्कृतिक श्रेष्ठता और गौरव का प्रतीक मानी जाती है। ब्रह्म ध्वज की विशेषता विक्रमादित्य शोध संस्थान के निदेशक राम तिवारी के अनुसार ब्रह्म ध्वज शक्ति, साहस और चतुर्दिक विजय का प्रतीक है। केसरिया रंग के इस ध्वज की बनावट भी विशेष होती है। इसमें दो पताकाएं होती हैं, जो ध्वज के दोनों छोर पर स्थित रहती हैं। ध्वज के मध्य में सूर्य का चिन्ह अंकित होता है, जो तेज, ऊर्जा और विश्व विजय का प्रतीक माना जाता है। महिदपुर स्थित अश्विनी शोध संस्थान में आज भी वे प्राचीन मुद्राएं सुरक्षित हैं, जिन्हें सम्राट विक्रमादित्य ने इसी ब्रह्म ध्वज परंपरा को अमर बनाने के लिए जारी किया था। सम्राट विक्रमादित्य के काल में उज्जैन अंतरराष्ट्रीय व्यापार का प्रमुख केंद्र माना जाता था। उस समय की मुद्राओं पर बने चिह्न बताते हैं कि उज्जैन को पृथ्वी का मध्य बिंदु माना जाता था। इन सिक्कों के एक पक्ष पर भगवान शिव सूर्यदंड लिए दिखाई देते हैं, जबकि दूसरे पक्ष पर प्लस (+) का चिन्ह बना होता है, जिसकी चारों भुजाओं पर गोले बने रहते हैं। यह प्रतीक दर्शाता है कि उज्जैन जल, थल और नभ तीनों मार्गों से विश्व से जुड़ा हुआ था। 65 वर्षों तक सुरक्षित रखा गया था ध्वज शोधपीठ के निदेशक राम तिवारी ने बताया कि विक्रम संवत ज्ञान, संस्कृति, विज्ञान और अनुसंधान का महापर्व है। विक्रम संवत के अवसर पर ब्रह्म ध्वज विभिन्न स्थानों पर फहराया जाएगा। मध्यप्रदेश में मंदिरों, सार्वजनिक स्थलों और निजी स्थानों पर भी लोग स्वप्रेरणा से इस ध्वज को फहरा सकेंगे। उन्होंने बताया कि महाकालेश्वर मंदिर पर स्थापित यह ध्वज लंबे समय तक पंडित सूर्यनारायण व्यास के परिवार ने अपने पूजा स्थल पर लगभग 65 वर्ष तक सुरक्षित रखा था। उसी ध्वज से प्रेरणा लेकर वर्तमान ब्रह्म ध्वज का निर्माण किया गया है। 

रंग पंचमी के अवसर पर सीएम डॉ. मोहन यादव ने महाकालेश्वर को अर्पित की दंडवत श्रद्धा

उज्जैन  रंग पंचमी पर्व के अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव श्री महाकालेश्वर मंदिर पहुंचे। जहां उन्होंने बाबा महाकाल का आशीर्वाद लिया। सीएम ने गर्भगृह में जलाभिषेक व दुग्धाभिषेक कर पूजन-अर्चन की। दंडवत होकर बाबा महाकाल को प्रणाम किया। वहीं उन्होंने परंपरागत महाकाल की गेर का ध्वज पूजन भी किया। दरअसल, मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव 8 मार्च से उज्जैन प्रवास पर है। सीएम डॉ यादव कल शाम उज्जैन पहुंचे और कई आयोजनों में शामिल हुए। आज रविवार सुबह मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव श्री महाकालेश्वर मंदिर पहुंचे। पुजारी, पुरोहित आचार्यत्व में विधि-विधान से पूजन किया। बाबा महाकाल का जलाभिषेक और दुग्धाभिषेक किया और प्रदेश की सुख, समृद्धि की कामना की। इसके बाद मुख्यमंत्री डॉ यादव ने रंगपंचमी पर्व पर परंपरागत रूप से निकलने वाली श्री वीरभद्र ध्वज चल समारोह के ध्वज का पूजन किया। फिर सीएम ने शस्त्रों का पूजन कर शस्त्र संचालन-प्रदर्शन भी किया। रंगपंचमी पर्व पर आज शाम श्री वीरभद्र चल समारोह बड़े ही हर्षोल्लास के साथ निकलता है। जिसमें बैंड-बाजे, हाथी, घोड़े, रथ के साथ ही रंगबिरंगी रोशनी से नहाए विभिन्न मनमोहक धार्मिक झांकियां भी निकलती है।

महाकाल नगरी में रंगों का जश्न, शिव-पार्वती के साथ थिरके पंडे-पुजारी और भक्त

उज्जैन  धार्मिक नगरी उज्जैन में विराजमान बाबा महाकाल के दरबार में हर त्योहार विशेष श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है. होलिका दहन से पहले ही शहर रंगों और भक्ति के रंग में सराबोर हो गया. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के सान्निध्य में शयन आरती परिवार पिछले 26 वर्ष से अनोखी होली की परंपरा निभा रहा है, जिसे देखने और इसमें शामिल होने के लिए दूर-दराज़ से श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं। भगवान महाकाल की नगरी में इस बार होली का पर्व बेहद खास अंदाज में मनाया गया. शिप्रा नदी के किनारे नृसिंह घाट स्थित कुमार धर्मशाला में भक्त भक्ति में लीन होकर झूमते-गाते नजर आए. पूर्णिमा तिथि पर महाकालेश्वर मंदिर, माता हरसिद्धि मंदिर और महाकाल वन में विशेष होली उत्सव का आयोजन किया गया। शिव-पार्वती की प्रतीकात्मक उपस्थिति इस भव्य आयोजन का दृश्य उस समय और भी खास हो गया, जब शिव और माता पार्वती प्रतीकात्मक रूप में मंच पर प्रकट हुईं. ऐसा लग रहा था मानो स्वयं भोलेनाथ अपनी अर्धांगिनी के साथ भक्तों के बीच पधार गए हों. जैसे ही शिव-पार्वती ने नृत्य आरंभ किया, वातावरण भक्ति और उल्लास से भर गया. ढोल-नगाड़ों की गूंज और भजनों की मधुर धुन पर भक्त अपने भावों को रोक नहीं सके. हर चेहरा खिल उठा। गर्भगृह और नंदी हॉल रंगों से सराबोर सोमवार को संध्या आरती के दौरान मंदिर का गर्भगृह और नंदी हॉल रंगों से सराबोर नजर आया। पंडे-पुजारियों ने बाबा महाकाल को गुलाल अर्पित कर उनके साथ होली खेली। जैसे ही पुजारी ने बाबा पर केसरिया और हर्बल गुलाल छिड़का, पूरा मंदिर परिसर जय श्री महाकाल के उद्घोष से गूंज उठा। यहां मौजूद हर कोई शिव भक्ति के रंग में रंगा नजर आया। संध्या आरती के बाद मंदिर परिसर में स्थित ओंकारेश्वर मंदिर के सामने होलिका दहन किया गया। महाकाल करते हैं सभी त्योहारों की शुरुआत पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बाबा महाकाल ही समस्त त्योहारों की शुरुआत करते हैं, इसलिए यहां सबसे पहले होलिका प्रज्वलित की जाती है। इस अवसर पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु इस अलौकिक दृश्य के साक्षी बने। सुरक्षा और व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम प्रशासक प्रथम कौशिक के अनुसार भक्तों की भीड़ को देखते हुए मंदिर प्रबंध समिति ने विशेष इंतजाम किए थे। गर्भगृह में केवल प्राकृतिक और हर्बल गुलाल के उपयोग की ही अनुमति दी गई, ताकि मंदिर की मर्यादा और गर्भगृह की सुरक्षा बनी रहे। शिवगणों के साथ भक्तों की टोलियां भगवान महाकाल के साथ होली खेलने के लिए शिवगण, भूत-पिशाच और नंदी विशेष वेशभूषा में नजर आए. पूरा दृश्य ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे साक्षात शिव की सेना धरती पर उतर आई हो, ढोल-नगाड़ों और भजनों की गूंज के बीच भक्तों की टोलियां नाचते-गाते जुलूस के रूप में आयोजन स्थल तक पहुंचीं. हर ओर रंग, भक्ति और उल्लास का अद्भुत संगम दिखाई दिया, जिसने पूरे माहौल को शिवमय कर दिया। ग्रहण के चलते केवल शकर का भोग अर्पित धुलेंडी पर्व पर चंद्र ग्रहण होने के कारण महाकाल मंदिर में भस्मारती से लेकर शाम को ग्रहण समाप्त होने तक पट बंद नहीं किए जाएंगे। इस दौरान श्रद्धालु भगवान महाकाल के दर्शन कर सकेंगे। हालांकि, सुबह भगवान को नियमित भोग नहीं लगाया जाएगा। ग्रहण समाप्ति के बाद मंदिर का शुद्धिकरण किया जाएगा। इसके बाद ही भगवान को भोग अर्पित किया जाएगा। शासकीय पुजारी पं. घनश्याम शर्मा ने बताया कि शाम 6:32 से 6:46 बजे तक रहने वाले 14 मिनट के इस ग्रहण का वेध काल सूर्योदय से ही प्रारंभ हो जाएगा। वेध काल के कारण सुबह की दद्योदक और भोग आरती में भगवान को केवल शकर का भोग अर्पित किया जाएगा। ऐसे होगा महाकाल का पूजन     3 मार्च को शाम 6:32 से 6:46 बजे तक चंद्र ग्रहण रहेगा। उसका वेध काल सुबह सूर्योदय से शुरू हो जाएगा।     वेध काल के चलते सुबह की दद्योदक एवं भोग आरती में केवल शकर का भोग अर्पित किया जाएगा।     ग्रहण समाप्ति के बाद मंदिर में शुद्धिकरण, भगवान का स्नान एवं पूजन किया जाएगा। इसके बाद भोग अर्पित कर संध्या आरती होगी। कल से ठंडे जल से होगा स्नान महाकाल मंदिर में साल में दो बार भगवान की दिनचर्या में परिवर्तन होता है। कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा से ठंड के अनुसार आरती का समय तय होता है, जबकि चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से गर्मी के अनुसार समय तय किया जाता है। इस साल 4 मार्च से चैत्र कृष्ण प्रतिपदा शुरू हो रही है, जिससे भगवान महाकाल की दिनचर्या में भी परिवर्तन होगा। इस दिन से गर्मी की शुरुआत मानी जाती है। भगवान महाकाल को ठंडे जल से स्नान कराया जाएगा। यह क्रम शरद पूर्णिमा तक चलेगा। इस अवधि में प्रतिदिन होने वाली 5 आरतियों में से 3 के समय में परिवर्तन किया जाएगा। इसलिए ग्रहण का असर नहीं महाकाल मंदिर पर ग्रहण का प्रभाव क्यों नहीं होता, इस पर मंदिर के पुजारी महेश शर्मा ने बताया कि भगवान महाकाल कालों के काल कहलाते हैं। दक्षिण दिशा काल की मानी जाती है और महाकाल का मुख दक्षिण की ओर है, इसलिए वे काल पर नियंत्रण रखते हैं। इस कारण कोई भी ग्रह, नक्षत्र या ग्रहण महाकाल को प्रभावित नहीं कर सकता। ग्रहण के दिन मंदिर की व्यवस्थाएं सामान्य दिनों की तरह रहेंगी, लेकिन ग्रहण के चलते न पुजारी और न ही श्रद्धालु भगवान को स्पर्श करेंगे। इस दौरान गर्भगृह में पुजारी मंत्रोच्चार करेंगे। ग्रहण समाप्त होने के बाद पुजारी स्नान कर मंदिर का शुद्धिकरण करेंगे, फिर भगवान का जलाभिषेक किया जाएगा। शाम को भोग अर्पित किया जाएगा। भजन-कीर्तन और अबीर-गुलाल इस दौरान महिला भक्तों ने शिव-पार्वती के साथ बैठकर भजन गाए और एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाया. यह आयोजन महाकाल मंदिर शयन आरती भक्ति मंडल द्वारा आयोजित किया जाता है, जिसमें मंदिर के पुजारी, भक्त और आम श्रद्धालु शामिल होते हैं. आयोजन के दौरान कुछ भक्त चौसर खेलते नजर आए, तो वहीं दूसरी ओर भांग भी तैयार की जा रही थी. यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और हर साल श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती जा रही है  

चंद्र ग्रहण के बावजूद महाकाल के दरबार में खुलेंगे पट, बाबा महाकाल खेलेंगे रंग-गुलाल

उज्जैन 3 मार्च 2026 को साल का पहला चंद्र ग्रहण लगने जा रहा है. चंद्र ग्रहण के दौरान सभी मंदिरों और शिवालयों के पट बंद रहते हैं. यहां तक की घरों में भी भगवान के मंदिर के पर्दे लगा दिए जाते हैं और पूजा-पाठ नहीं होती है. फिर ग्रहण खत्म होने पर शुद्धिकरण के बाद ही पट खुलते हैं. ये बातें तो सभी जानते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस दौरान भगवान महाकालेश्वर मंदिर के पट सामान्य दिनों की तरह खुले रहते हैं. भक्त बाबा के दर्शन कर सकते हैं. जानिए बाबा महाकाल मंदिर में क्यों ग्रहण पर भी पट खुले रहते हैं. महाकाल के आगे ग्रह, नक्षत्र का कोई दुष्प्रभाव नहीं अवंतिका नगरी उज्जैन में भगवान महाकालेश्वर मंदिर में हर दिन की तरह 3 मार्च यानि चंद्र ग्रहण पर भी बाबा के दर्शन का क्रम सुबह भस्म आरती से देर रात शयन आरती तक चलता रहेगा. इसके पीछे की वजह को लेकर मंदिर के पुजारी महेश शर्मा ने  चर्चा में बताया कि "बाबा महाकालेश्वर का मंदिर दक्षिण मुखी है. भगवान का मुख दक्षिण की और होने से वे कालों के काल महाकाल कहलाते हैं. दक्षिण दिशा काल का है, काल पर जिसका नियंत्रण हो वह महाकाल है. बाबा महाकाल के कारण कोई भी ग्रह, नक्षत्र या कोई बाधा किसी को प्रभावित नहीं कर पाता. इसलिए ग्रहण के दौरान भी कोई दुष्प्रभाव मंदिर क्षेत्र में नहीं पड़ेगा. लिहाजा चंद्रग्रहण के दौरान भी भगवान का पूजा-अर्चन और सभी आरती समय पर जारी रहेगी. इसके साथ ही भक्त बाबा के दर्शन हर दिन की तरह कर सकेंगे. मंदिर सुबह भस्म आरती से लेकर देर रात शयन आरती तक खुला रहेगा. मंदिर में 2 मार्च यानि सोमवार को होलिका दहन हुआ . इसके बाद 3 मार्च को ही होली पर्व मनाया जाएगा. वेद परंपरा का अपना महत्व है. उसका निर्वहन करने के लिए कुछ नियमों का पालन जरूर किया जाएगा." 14 मिनट का ग्रहण जानिए क्या रहेगा पूजन का क्रम मंगलवार को फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा का दिन है. शासकीय पुजारी पं. घनश्याम शर्मा ने बताया कि "सुबह की दद्योदक और भोग आरती में भगवान को केवल शक्कर का भोग अर्पित किया जाएगा. ग्रहण समाप्त होने के बाद मंदिर में शुद्धिकरण, भगवान का स्नान पूजन के बाद भगवान को भोग अर्पित कर संध्या आरती संपन्न की जाएगी. ग्रहण 3 मार्च को शाम 6:32 से 6:46 तक यानि 14 मिनट का रहने वाला है. ग्रहण का वेद काल सुबह सूर्योदय से ही प्रारंभ हो जाएगा. भगवान महाकालेश्वर की ऊर्जा के आगे सब कुछ क्षीण महेश पुजारी ने कहा कि " ग्रहण के दिन मंदिर की सारी व्यवस्थाएं हर दिन की तरह तो रहेगी, लेकिन ग्रहण के चलते कोई भी यानि पुजारी हो या श्रद्धालु भगवान को स्पर्श नहीं करेगा. इस दौरान गर्भ गृह में पुजारी मंत्रोच्चार करते हैं. जब ग्रहण खत्म हो जाता है, तो पुजारी स्नान करने के बाद भगवान का जलाभिषेक करेंगे, मंदिर परिसर में विराजमान सभी देवी-देवताओं की प्रतिमाओं का जलाभिषेक होगा. मंदिर शुद्धिकरण होगा. दूसरे मंदिरों की तरह महाकाल मंदिर का पट बंद नहीं होंगे. दक्षिण मुखी ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से सारे दुष्प्रभाव खत्म हो जाते हैं. भगवान महाकालेश्वर की ऊर्जा के आगे सब कुछ क्षीण है. जैसे सूर्य की ऊर्जा है, उससे कई गुना अधिक बाबा की ऊर्जा है." महाकाल मंदिर समिति ने क्या कहा? मंदिर प्रशासक प्रथम कौशिक ने जानकारी देते हुए बताया कि "पुजारी-पुरोहितों से चर्चा के बाद तय हुआ है कि होली पर्व 3 मार्च को ही मनाया जाएगा. ग्रहण में भी भगवान के दर्शन पूजन का क्रम हर रोज की तरह रहेगा. दर्शन करने आने वाले सभी दर्शनार्थियों को कोई परेशानी नहीं आए, इसका ध्यान रखा जाएगा. ग्रहण के कारण जो सामान्य जो बदलाव हुए हैं, जैसे मंदिर शुद्धिकरण हो या ग्रहण के दौरान गर्भ गृह के अंदर मंत्रोच्चार तमाम व्यवस्थाएं मंदिर समिति की ओर से की गई है.

होलिका दहन की अनोखी परंपरा: क्यों महाकाल के आंगन से होती है शुरुआत?

हर साल चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन पूरे देश में होली का त्योहार मनाया जाता है. इससे एक दिन पहले फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि के दिन होलिका दहन किया जाता है. होलिका दहन का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है. इस साल फाल्गुन माह की पूर्णिमा 03 मार्च को है. ऐसे में इस साल 03 मार्च को होलिका दहन किया जाएगा. इसके अगले दिन 04 मार्च को रंगों से होली खेली जाएगी. होलिका दहन को छोटी होली भी कहा जाता है. मान्यता है कि होलिका की पवित्र अग्नि में सभी तरह की नकरात्मक शक्तियों और कष्टों को समाप्त करने की शक्ति है, इसलिए होलिका दहन की पूजा अवश्य करें, लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश में सबसे पहले महाकाल के दरबार में होलिका दहन किया जाता है. आइए जानते हैं कि सबसे पहले यहां होलिका दहन क्यों होता है? महाकाल के दरबार होलिका क्यों जलती है सबसे पहले? महाकाल उज्जैन के राजा माने जाते हैं. पुरानी परंपरा के अनुसार प्रजा पहले अपने राजा के घर ही उत्सव मनाती है. उसके बाद वो अपने घरों में उत्सव मनाती है. यही कारण है कि मदिर में सबसे पहले होलिका दहन के दिन पूजा और संध्या आरती की जाती है. इसके बाद पुजारियों के मंत्रोच्चार के साथ मंदिर प्रांगण में होलिका दहन किया जाता है. मान्यता है कि महाकाल दरबार में होलिका दहन करने से नगर की नकारात्मक शक्तियां दूर हो जाती हैं. भस्म आरती में राख की जाती है उपयोग दूर-दूर से श्रद्धालु इस पावन अग्नि के दर्शन करने के लिए महाकाल के दरबार में आते हैं. महाकाल मंदिर का होलिका दहन सिर्फ लकड़ियों और उपलों का जलना भर नहीं है, बल्कि यह शिव और शक्ति के प्रति अटूट विश्वास का त्योहार माना जाता है. मंदिर में होने वाले इस आयोजन से पहले महाकाल बाबा को गुलाल अर्पित किया जाता है. फाल्गुन पूर्णिमा की संध्या को मंदिर परिसर में होलिका दहन के बाद, उस पवित्र अग्नि की राख यानी विभूति को अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त में होने वाली विशेष भस्म आरती में उपयोग किया जाता है. इसी ताजी राख से भगवान महाकाल का दिव्य शृंगार किया जाता है.

भस्म आरती में भगवान को चढ़ेगा हर्बल गुलाल, महाकाल रंगोत्सव की धूम आज से

उज्जैन  धर्मनगरी उज्जैन में रंगोत्सव की शुरुआत इस बार भी परंपरा और आध्यात्म के संग होगी। विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में 02 मार्च को संध्या आरती के बाद प्राचीन परंपरा अनुसार होलिका दहन किया जाएगा। मान्यता है कि विश्व में सबसे पहले बाबा महाकाल के आंगन में ही होलिका प्रज्वलित होती है और यहीं से रंगों के पर्व का शुभारंभ माना जाता है । संध्या आरती के दौरान सबसे पहले भगवान महाकाल को हर्बल गुलाल अर्पित किया जाएगा और परंपरानुसार शक्कर की माला पहनाई जाएगी। इसके बाद मंदिर प्रांगण में ओंकारेश्वर मंदिर के सामने विधिवत पूजन-अर्चन कर होलिका दहन होगा। 03 मार्च को धुलेंडी पर्व पर तड़के 4 बजे होने वाली भस्म आरती में सबसे पहले मंदिर के पुजारी और पुरोहित बाबा महाकाल को हर्बल गुलाल अर्पित करेंगे। भक्ति का यह अद्भुत संगम श्रद्धालुओं के लिए अलौकिक अनुभव होगा। इसी क्रम में 04 मार्च 2026 से चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से अश्विन पूर्णिमा तक आरतीयों के समय में परंपरानुसार परिवर्तन लागू होगा। नई समय-सारिणी के अनुसार, भस्म आरती प्रातः 4 से 6 बजे तक, दद्योदक आरती 7 से 7:45 बजे तक, भोग आरती 10 से 10:45 बजे तक, संध्या पूजन 5 से 5:45 बजे तक, संध्या आरती 7 से 7:45 बजे तक और शयन आरती रात्रि 10:30 से 11 बजे तक संपन्न होगी।

वसुंधरा राजे सिंधिया ने महाकाल मंदिर में नंदी हाल से किए दर्शन, लिया आशीर्वाद

उज्जैन मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले में स्थित महाकालेश्वर मंदिर में आज यानी बुधवार को सुबह राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया दर्शन करने पहुंचीं। इस दौरान उन्होंने नंदी हाल से भगवान महाकाल के दर्शन किए और आशीर्वाद लिया। उन्होंने मंदिर में दर्शन व्यवस्था की जमकर सराहना भी की। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने ज्योतिर्लिंग भगवान श्री महाकालेश्वर के दर्शन के बाद भगवान वीरभद्र और महाकालेश्वर ध्वज चल समारोह में निकलने वाले ध्वज का भी पूजन किया। नंदी हाल में नंदी का पूजन कर बाबा महाकाल को जल अर्पित किया। मंदिर प्रबंधन ने निभाई परंपरा मंदिर प्रबंध समिति की ओर से सहायक प्रशासक मूलचंद जूनवाल एवं सहायक प्रशासक प्रतीक द्विवेदी ने सिंधिया का स्वागत एवं सत्कार किया गया। वसुंधरा राजे सिंधिया ने कहा कि राजस्थान के लोग बड़ी संख्या में महाकाल मंदिर में आते हैं, भगवान महाकाल का हम सब पर आशीर्वाद रहा है। सुखी-दुख में हम भगवान शिव के पास आते हैं। महाकाल मंदिर में भक्तों को सुलभ दर्शन मिल रहे हैं। होली उत्सव पर ग्रहण का कोई प्रभाव नहीं इधर, होली पर्व को लेकर इस वर्ष तिथियों को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है। चंद्रग्रहण के कारण 3 और 4 मार्च को लेकर अलग-अलग मत सामने आ रहे हैं, लेकिन महाकालेश्वर मंदिर उज्जैन में होली उत्सव पर ग्रहण का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। मंदिर प्रशासन ने 2 और 3 मार्च को पारंपरिक रूप से होली मनाने का कार्यक्रम तय किया है। महाकाल को गुलाल अर्पित किया जाएगा महाकालेश्वर मंदिर के पुजारी पंडित महेश शर्मा ने बताया कि बाबा महाकाल के दरबार में ग्रहण का विशेष प्रभाव नहीं होता। ग्रहण काल में भी दर्शन व्यवस्था निरंतर जारी रहती है। उन्होंने बताया कि 2 मार्च की शाम को होली सजाई जाएगी और सांध्य आरती में बाबा महाकाल को गुलाल अर्पित किया जाएगा। इसके बाद शाम 7 बजे विधिवत होलिका दहन किया जाएगा। 3 मार्च की सुबह होने वाली भस्म आरती में भी प्रतिदिन की तरह पूजन-अर्चन होगा, लेकिन विशेष रूप से बाबा महाकाल को गुलाल अर्पित कर होली का पर्व मनाया जाएगा।   हर्बल गुलाल और शक्कर की माला चढ़ेगी विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में इस वर्ष भी परंपरानुसार 2 मार्च को संध्या आरती के बाद होलिका दहन किया जाएगा। मंदिर समिति के अनुसार, संध्या आरती में बाबा महाकाल को हर्बल गुलाल अर्पित किया जाएगा और शक्कर की माला चढ़ाई जाएगी। इसके बाद ओंकारेश्वर मंदिर के सामने विधिवत पूजन-अर्चन के साथ होलिका दहन किया जाएगा। मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे निर्धारित व्यवस्था का पालन करते हुए दर्शन करें और पर्व को श्रद्धा व अनुशासन के साथ मनाएं।

फिल्म अभिनेत्री मेधा शंकर ने बाबा महाकाल की शरण में बिताए दो घंटे, की शिव आराधना

उज्जैन  विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर मंदिर में रोजाना सेलिब्रिटी अपनी मनोकामना लिए आते हैं. मंगलवार को अलसुबह होने वाली भस्म आरती में फिल्म अभिनेत्री मेधा शंकर शामिल हुईं. मेधा शंकर उभरती अभिनेत्री हैं. वह 12वीं फेल फिल्म में लीड रोल निभा चुकी हैं. मेधा ने भस्म आरती के दर्शन किए और काफी देर तक भगवान शिव की आराधना की. दर्शन के बाद क्या बोली मेधा शंकर श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति की ओर से इंजीनियर शिवाकांत पांडे द्वारा मेधा शंकर का स्वागत एवं सत्कार किया गया. मेधा ने चांदी द्वार से माथा टेक भगवान का आशीर्वाद लिया. नंदी हॉल में 2 घंटे बैठकर भगवान शिव की भक्ति में लीन रही. इसके बाद अभिनेत्री मेधा शंकर ने कहा "मैं दूसरी बार दर्शन आई हूं. पहले वर्ष 2024 में आई थी. अच्छे व सुगम दर्शन हुए हैं. बाबा महाकाल के दर्शन करने से ही सारी समस्याएं दूर हो जाती हैं. वह उम्मीद करती हैं कि बाबा महाकाल इसी प्रकार उन्हें अपने दर पर बुलाते रहें." मंदिर का इतिहास, महत्व बताया दो दिन पहले सुषमा स्वराज विदेश सेवा संस्थान के 43 सदस्यीय दल ने श्री महाकालेश्वर मंदिर पहुंचकर कर बाबा महाकाल के दर्शन लाभ प्राप्त किए. मंदिर प्रबंध समिति की ओर से डेलीगेशन के सदस्यों का स्वागत एवं सत्कार किया गया गया. प्रबंध समिति के सदस्यों ने इस मौके पर अतिथियों को श्री महाकालेश्वर मंदिर की प्राचीनता, धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्ता, मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से अवगत कराया. सभी सदस्यों नंदी हॉल में बैठ शिव साधना की. श्री महाकालेश्वर मंदिर में फिल्मी हस्तियों के साथ ही क्रिकेटर्स, राजनेता, उद्योगपति लगातार आते हैं. यहां वीवीआईपी मूवमेंट बना ही रहता है. बॉलीवुड कलाकार अपनी फिल्म रिलीज होने से पहले बाबा महाकाल के दर हाजिरी लगाते हैं. अगर इंदौर के आसपास फिल्म की शूटिंग होती है तो भी सारे कलाकार महाकालेश्वर मंदिर आते हैं. इंदौर में क्रिकेट मैच खेलने से पहले और बाद में क्रिकेटर्स लगातार हाजिरी लगाते रहते हैं. 

महाकाल मंदिर आरती बुकिंग गाइड: कितना देना होगा, कब है संध्या और शयन आरती

उज्जैन  उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर भारत के सबसे प्रसिद्ध 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है. इसी वजह से यह हिंदुओं की आस्था का केंद्र हैं और श्रद्धालु इनके दर्शन करने के लिए दूर-दूर से खिंचे चले आते हैं. यहां पर रोज होने वाली भस्म आरती विश्व प्रसिद्ध है, जो जीवन और मृत्यु को दर्शाती है. अब उज्जैन के महाकाल मंदिर में संध्या आरती और शयन आरती की ऑनलाइन बुकिंग शुरू हो गई है. इसको लेकर खास जानकारी सामने आई है. उज्जैन के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग में डिजिटलाइजेशन की प्रक्रिया को निरंतर आगे बढ़ाते हुए मंदिर प्रबंध समिति द्वारा संध्या आरती एवं शयन आरती की बुकिंग प्रक्रिया को पूर्णतः ऑनलाइन करने का फैसला लिया गया है. यह व्यवस्था पारदर्शिता, सुव्यवस्थित प्रबंधन एवं श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए लागू की जा रही है. ताकि श्रद्धालुओं को किसी भी तरह की कोई समस्या नहीं हो. कौन-सी वेबसाइट से होगी सकेगी बुकिंग अब श्रद्धालु दोनों आरतियों के लिए केवल मंदिर की अधिकृत वेबसाइट के माध्यम से ही बुकिंग कर सकेंगे. इसके लिए उन्हें https://www.shrimahakaleshwar.mp.gov.in वेबसाइट पर जाना होगा. ऐसी रहेगी व्यवस्था अब श्रद्धालु दोनों आरतियों के लिए केवल मंदिर की अधिकृत वेबसाइट के माध्यम से ही बुकिंग कर सकेंगे। संध्या आरती की ऑनलाइन बुकिंग प्रतिदिन दोपहर 12:00 बजे से प्रारंभ होगी, जबकि शयन आरती की ऑनलाइन बुकिंग प्रतिदिन शाम 4:00 बजे से प्रारंभ होगी। दोनों ही आरतियों के लिए प्रति श्रद्धालु ₹250/- (शीघ्र दर्शन के समान) शुल्क निर्धारित किया गया है। बुकिंग फर्स्ट कम, फर्स्ट सर्व (प्रथम आओ, प्रथम पाओ) के आधार पर की जाएगी। दोनों आरतियों हेतु प्रवेश द्वार क्रमांक 1 निर्धारित किया गया है। ऐसा रहेगा प्रवेश का समय संध्या आरती के लिए प्रवेश का अंतिम समय सायं 6:00 बजे रहेगा, जबकि शयन आरती के लिए प्रवेश का अंतिम समय रात्रि 10:00 बजे रहेगा। दोनों आरतियों के निर्धारित समय के दौरान चलित दर्शन की प्रक्रिया भी संचालित की जाएगी, जिससे श्रद्धालु सुव्यवस्थित रूप से दर्शन लाभ प्राप्त कर सकें। इसलिए बदली गई व्यवस्था मंदिर समिति का उद्देश्य डिजिटल माध्यम से पारदर्शी, सुव्यवस्थित एवं श्रद्धालु-अनुकूल व्यवस्था सुनिश्चित करना है, जिससे अधिकाधिक श्रद्धालु सुगमता से आरती एवं दर्शन का लाभ प्राप्त कर सकें। यह नई व्यवस्था श्रद्धालुओं के लिए एक बड़ा कदम है, जिससे वे आसानी से आरतियों की बुकिंग कर सकेंगे और भगवान महाकाल के दर्शन कर सकेंगे। क्या है बुकिंग करने का समय 1)संध्या आरती की ऑनलाइन बुकिंग प्रतिदिन दोपहर 12:00 बजे से शुरू होगी. 2)शयन आरती की ऑनलाइन बुकिंग प्रतिदिन शाम 4:00 बजे से शुरू होगी. महाकालेश्वर मंदिर में आरती की ऑनलाइन बुकिंग श्रद्धालुओं को आरती के लिए देना होगा इतना पैसा दोनों ही आरतियों के लिए प्रति श्रद्धालु ₹250/- (शीघ्र दर्शन के समान) शुल्क निर्धारित किया गया है. बुकिंग फर्स्ट कम, फर्स्ट सर्व (प्रथम आओ, प्रथम पाओ) के आधार पर की जाएगी. दोनों आरतियों के लिए भक्तगणों को प्रवेश द्वार क्रमांक एक से मिलेगा. दोनों आरतियों के लिए क्या है प्रवेश का अंतिम समय 1)संध्या आरती के लिए प्रवेश का अंतिम समय सायं 6:00 बजे रहेगा. 2)शयन आरती के लिए प्रवेश का अंतिम समय रात्रि 10:00 बजे रहेगा. दोनों आरतियों के निर्धारित समय के दौरान चलित दर्शन की प्रक्रिया भी संचालित की जाएगी, जिससे श्रद्धालु सुव्यवस्थित रूप से दर्शन लाभ प्राप्त कर सकें. मंदिर समिति का उद्देश्य डिजिटल माध्यम से पारदर्शी, सुव्यवस्थित व्यवस्था सुनिश्चित करना है. शीघ्र दर्शन के लिए प्रति व्यक्ति 250 रुपए महाकालेश्वर मंदिर समिति पहले से ही श्रद्धालुओं से भस्मारती के ऑनलाइन प्रवेश के लिए 200 रुपए और शीघ्र दर्शन के लिए प्रति व्यक्ति 250 रुपए शुल्क ले रही है। इसके अलावा विभिन्न पूजन विधियों के लिए अलग से राशि ली जाती है। मंदिर में रोज लगभग 1200 श्रद्धालुओं को ऑनलाइन भस्मारती प्रवेश दिया जाता है। मंदिर में सामान्य कतार के अलावा वीआईपी लाइन से दर्शन की सुविधा उपलब्ध है, जिसके लिए काउंटर या ऑनलाइन माध्यम से 250 रुपए देकर रसीद लेकर दर्शन किए जा सकते हैं। गर्भगृह प्रवेश अब भी बंद पहले श्रद्धालु 1500 रुपए शुल्क देकर गर्भगृह में प्रवेश कर सकते थे, लेकिन 4 जुलाई 2023 को सावन की भीड़ के कारण इसे 11 सितंबर 2023 तक अस्थायी रूप से बंद किया गया था। उस समय आश्वासन दिया गया था कि सावन के बाद गर्भगृह फिर खोल दिया जाएगा, लेकिन ढाई साल बाद भी आम श्रद्धालुओं के लिए प्रवेश शुरू नहीं हुआ है।

त्रिपुंड और रुद्राक्ष पहने जफर पर हमला, युवती के साथ मंदिर दर्शन के दौरान हुई पिटाई

उज्जैन  उज्जैन में बजरंग दल कार्यकर्ताओं ने धोती-कुर्ता, माथे पर त्रिपुंड और गले में रुद्राक्ष की माला पहने मुस्लिम युवक की पिटाई कर दी। वह एक युवती के साथ मोहाली से उज्जैन आया था। नानाखेड़ा क्षेत्र में सोमवार रात को बजरंग दल कार्यकर्ताओं ने पकड़कर उससे पूछताछ की और बाद में मारपीट की। इसका वीडियो भी मंगलवार को सामने आया है, जिसमें युवक अपना नाम जफर खान और खुद को शिव भक्त बता रहा है। बजरंग दल को सूचना मिली थी कि अलग-अलग राज्यों से आए युवक-युवती एक होटल में ठहरे हुए हैं। करीब एक घंटे इंतजार के बाद होटल के बाहर धोती-कुर्ता पहने जफर खान नाम के युवक को कार्यकर्ताओं ने पकड़ लिया। पूछताछ में उसने पहले हिंदू नाम बताया, लेकिन सख्ती करने पर अपना नाम जफर खान स्वीकार किया। जफर ने कहा कि वह शिव भक्त है और युवती उसे भगवान शिव के दर्शन कराने उज्जैन लाई थी। दोनों ने महाकाल मंदिर, हरसिद्धि मंदिर और काल भैरव मंदिर के दर्शन किए थे। मुस्लिम नाम सुनते ही की पिटाई जफर खान को पकड़ने के बाद कार्यकर्ताओं ने उसके साथ मारपीट की। करीब एक दर्जन से अधिक लोगों ने उसे घेरकर पहले पूछताछ की और असली नाम सामने आने के बाद पिटाई शुरू कर दी। इस दौरान युवक के सिर से खून भी बहने लगा। सूचना मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुंची। होटल में ठहरने पर भी विवाद बजरंग दल के जिला संयोजक ऋषभ कुशवाह ने बताया कि युवक-युवती को कई होटलों में कमरा नहीं मिला था। बाद में वे नानाखेड़ा क्षेत्र के एक होटल में रुके। युवक ने होटल में हिंदू नाम बताया था और पंडित की वेशभूषा में था। बाद में पूछताछ में उसने अपना नाम जफर खान बताया। उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया है। युवक-युवती अलग-अलग समुदाय से नानाखेड़ा थाना प्रभारी नरेंद्र यादव ने बताया कि युवक और युवती मोहाली के रहने वाले हैं। युवती की उम्र 32 साल है और दोनों अलग-अलग समुदाय से हैं। युवती को युवक के दूसरे धर्म का होने की जानकारी थी। दोनों पहले से एक-दूसरे को जानते थे। पुलिस ने आधार कार्ड सहित अन्य दस्तावेजों की जांच शुरू कर दी है। शिकायत मिलने पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।