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पंजाब के लुधियाना में दूध के दाम बढ़े, 1 नवंबर से चुकाने होंगे ज्यादा पैसे; डेयरी संचालकों ने बताई वजह

लुधियाना त्योहारों की रौनक के बीच अमृतसर के लोगों को महंगाई का एक और बड़ा झटका लगने जा रहा है। एक नवंबर से शहर में दूध के दामों में उछाल आने वाला है। हैबोवाल और ताजपुर स्थित डेयरी परिसरों के संचालकों ने आपसी सहमति के बाद रेट में बढ़ोतरी का खाका तैयार कर लिया है। इस नए निर्णय के प्रभावी होते ही आम उपभोक्ताओं को दूध की खरीदारी पर प्रति लीटर पांच रुपये का खर्च पड़ने वाला है।  जिला डेयरी एसोसिएशन ने की औपचारिक पुष्टि जिला डेयरी एसोसिएशन के प्रमुख कुलदीप सिंह लहोरिया और उनके साथी प्रतिनिधियों ने इस रेट बढ़ाने की औपचारिक पुष्टि की है। उनके अनुसार लुधियाना के तमाम दूध बिक्री केंद्रों पर पांच रुपये प्रति लीटर के हिसाब से दूध का रेट बढ़ाया जाएगा। इसके साथ ही क्रीम का व्यापार करने वाले डेयरी संचालकों के लिए फैट की दरों में तीस पैसे का इजाफा किया गया है।  एसोसिएशन की कारोबारियों से अपील  एसोसिएशन की ओर से सभी कारोबारियों से आग्रह किया गया है कि वे परिस्थितियों को समझते हुए इन नए दामों को तत्काल प्रभाव से अपनाएं। दूध के दामों में बढ़ोतरी के पीछे मवेशियों के आहार की बढ़ती कीमतों को प्रमुख वजह बताया जा रहा है। कारोबारियों का कहना है कि बीते दिनों में सूखा चारा, खल-दाना और हरे चारे के बाजार भाव आसमान छूने लगे हैं। उत्पादन लागत में बेतहाशा बढ़ोतरी के चलते डेयरी संचालकों के सामने अपने परिवारों का लालन-पालन करना भी दुभर हो गया है।  एसोसिएशन के नुमाइंदों ने साफ कहा कि मौजूदा दौर में यदि कीमतें नहीं बढ़ाई गई तो यह व्यवसाय पूरी तरह टूट जाएगा। घाटे और तंगी के कारण कई लोग अपना पुश्तैनी काम समेटने की कगार पर पहुंच चुके हैं। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि इस आर्थिक संकट की अनदेखी कर पुराने रेट पर काम करने वाले व्यवसायियों को जल्द ही अपनी डेयरियां बेचने की नौबत आ जाएगी। पशुओं का चारा महंगा होना मुख्य वजह कीमतों में इस वृद्धि का मुख्य कारण पशुओं की फीड में आई भारी महंगाई को बताया गया है। डेयरी संचालकों के अनुसार पिछले कुछ समय में तूड़ी, दाना और हरे चारे (पठ्ठे) के रेट बहुत ज्यादा बढ़ गए हैं। हर चीज महंगी होने के कारण डेयरी मालिकों के लिए अपने घर का गुजारा चलाना भी मुश्किल होता जा रहा है। रेट नहीं बढ़ाए तो बिक जाएंगी डेयरियां डेयरी प्रतिनिधियों ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि महंगाई के इस दौर में दूध का महंगा होना बहुत जरूरी है। घाटे और आर्थिक तंगी के चलते कई डेयरी मालिक अपना कारोबार बेचने को मजबूर हो रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि जो कोई भी इस महंगाई को नहीं समझेगा और रेट नहीं बढ़ाएगा उसे बहुत जल्द अपनी डेयरी बेचनी पड़ जाएगी। क्या कहते हैं डेयरी संचालक? डेयरी संचालक राकेश कुमार ने बताया कि डेयरी उद्योग में महंगाई चरम सीमा में है। उन्होंने कहा 40 साल में पहली बार है कि रेट इतने आसमान छू रहे हैं। गाय भैंस के दाम पहले ही बढ़ गए हैं। वहीं, हरा चारा 140 रुपये प्रति चालीस किलो, जो पहले 80 से लेकर 90 रुपये था। वहीं, तूड़ी जो पहले 250 से 300 रुपये के बीच थी अब 400 रुपये प्रति मन (चालीस किलो) तक हो चुकी है। इसी तरह खल दाना और अन्य सामान भी महंगे हो रहे हैं। वहीं, बढ़ती महंगाई के कारण कई डेयरियां पहले ही बंद हो चुकी हैं और अगर अब बढ़ रहे दामों के हिसाब से काम नहीं किया गया तो डेयरी उद्योग बंद होने की कगार पर पहुंच जाएगा।  

कोसी में डेयरी सेक्टर का होगा विस्तार, ₹126 करोड़ के निवेश से नए प्लांट; 45 हजार महिलाओं को मिलेगा लाभ

सहरसा  पिछड़े कोसी क्षेत्र में आने वाले दिनों में डेयरी से संबंधित कारोबार तेजी से बढ़ेगा। सरकार ने सात निश्चय -3 के तहत एक अरब 26 करोड़ सात लाख की लागत से कोसी दुग्ध सहकारी संघ लिमिटेड के अंतर्गत दही प्लांट, प्रीमियम आईस्क्रीम प्लांट, टोटल मिक्स्ड राशन प्लांट, इंस्टैंट मिल्क चिलिंग प्लांट खोलने की योजना है। इससे कोसी क्षेत्र में डेयरी व दुग्ध व्यवसाय को पंख लगेगा। इससे इलाके के पशुपालक व दुग्ध कारोबारी काफी लाभांवित होंगे, जो पिछड़े कोसी क्षेत्र के विकास का बढ़ा कारण बनेगा। नवीन दुग्ध सहकारी समितियों का भी होगा गठन श्वेत क्रांति-2 पहल के तहत डेयरी किसानों को संगठित बाजार से जोड़ने के लिए नवीन दुग्ध सहकारी समितियों का गठन किया जाएगा। इससे किसानों की आय बढ़ाने और रोजगार के नए अवसर पैदा करने पर बल दिया जाएगा। इस समिति के गठन होने से सहकारी डेयरी के माध्यम से उपभोक्ताओं द्वारा दिए जाने वाले समितियों का अधिकांश हिस्सा सीधे किसानों तक पहुंचेगा। सात निश्चय- 3 से प्राप्त राशि से कोसी प्रमंडल के तीनों जिले में मिल्क चिलिंग प्लांट एवं इंस्टैंट मिल्क चिलिंग सिस्टम की स्थापना होगी। इससे दूध की गुणवत्ता बनी रहेगी और इसे खराब होने से बचाया जा सकेगा। दुग्ध उत्पादन बढ़ने से सशक्त होगी ग्रामीण महिलाएं कोसी प्रमंडल में दुग्ध उत्पादन में जीविका के माध्यम से महिलाएं लगातार नई ऊंचाइयों को छू रही है। कौशिकी जीविका महिला दुग्ध उत्पादक कंपनी महिलाओं द्वारा संचालित है और सहरसा, सुपौल और मधेपुरा जिलों में अपनी सेवाएं दे रही है। वर्तमान में कंपनी से 45,000 दुग्ध उत्पादक जीविका दीदी जुड़ी हुई हैं। यह महिलाएं न केवल दुग्ध उत्पादन करती हैं, बल्कि इसके संग्रह, प्रसंस्करण और विपणन में भी सक्रिय भूमिका निभाती हैं। यह कंपनी चालू वित्तीय वर्ष में प्रतिदिन औसतन 76,171 लीटर दूध की खरीद कर रही है महिलाएं अपने पारंपरिक कौशल का उपयोग कर आधुनिक तकनीकों के साथ अपने व्यवसाय को बढ़ावा दे रही हैं। सात निश्चय से विभिन्न तरह के प्लांट की स्थापना से इस कंपनी का भी कारोबार तेजी से फल-फूल सकेगा। ऐसी संभावना है।     कोसी क्षेत्र के विकास में डेयरी व्यवसाय महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। ऐसे में कई महत्वपूर्ण प्लांट की स्थापना से व्यवसाय को पंख लगेगा। इससे इलाके के लोग काफी लाभांवित होंगे। – डॉ. अभिनीत झा, जिला पशुपालन पदाधिकारी, सहरसा  

इंदौर में दूध के दाम बढ़े, विक्रेता संघ ने ₹65 तय किया; किसान ₹70 पर अड़े

 इंदौर  आगामी त्योहारों से पहले शहर के परिवारों का मासिक बजट कुछ गड़बड़ा सकता है, क्योंकि एक अक्टूबर से दूध के दाम बढ़ने जा रहे हैं। इंदौर दूध विक्रेता संघ ने दूध उत्पादकों से खरीदी का भाव बढ़ाने के साथ उपभोक्ताओं के लिए भी नए भाव तय किए हैं। अब आमजन को घर पहुंच दूध 65 रुपये लीटर और दुकान-डेयरी से 68 रुपये लीटर मिलेगा। यानी रोज 2 लीटर दूध लेने वाले परिवार को महीने में करीब 120 रुपये अतिरिक्त चुकाने पड़ सकते हैं। पांच लीटर प्रतिदिन खपत वाले परिवार का अतिरिक्त खर्च करीब 300 रुपये महीना हो सकता है। जानिए दूध के नए भाव वर्तमान में घर पर दूध पहुंचाने के दाम 63 रुपये प्रति लीटर हैं। इसमें 62 रुपये दूध और एक रुपये सेवा शुल्क शामिल है, लेकिन बढ़ोतरी के बाद दूध के दाम 65 रुपये प्रति लीटर हो जाएंगे। वहीं दुकान व डेयरी पर वर्तमान में 66 रुपये प्रति लीटर दूध मिलता है, जो गुरुवार से 68 रुपये प्रति लीटर हो जाएगा। यानी दूध के दाम में दो रुपये प्रति लीटर की सीधी बढ़ोतरी होगी। ये भाव 5.5 से 6 फैट वाले दूध के आधार पर तय किए गए हैं। जिस परिवार की रोजमर्रा की जरूरत में दूध की खपत ज्यादा है, उसके महीने के बजट पर इसका असर सीधे दिखाई देगा। संघ के अध्यक्ष भरत मथुरावाला का कहना है कि दूध के खरीदी और बिक्री दोनों दाम में दो रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई है। आगे बारिश की कमी बनी रही और कपास्या खली, चापड़ व भूसे जैसे पशु आहार के दाम बढ़े तो दूध के भाव पर दोबारा विचार किया जा सकता है। 9.24 रुपये प्रति फैट के हिसाब से खरीदी दूध उत्पादक किसानों से खरीदे जाने वाले दूध के दाम भी बढ़ाए गए हैं। अब उत्पादकों से दूध की खरीदी 9.23 रुपये प्रति फैट के हिसाब से होगी, जबकि अब तक 8.90 रुपये प्रति फैट खरीदी हो रही थी। इसके अनुसार दूध खरीदी के दाम करीब दो रुपये बढ़ेंगे। उत्पादक किसान लंबे समय से दूध के दाम बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। ऐसे में संघ ने दूध के दाम बढ़ाकर किसानों की मांगों को कुछ हद तक माना है। हालांकि किसान 12 रुपये प्रति फैट खरीदी की मांग कर रहे हैं।  इतना बढ़ेगा खर्च दूध के दाम में दो रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी के बाद विभिन्न परिवारों के मासिक और वार्षिक खर्च में होने वाली वृद्धि इस प्रकार है… एक लीटर रोज: 60 रुपये महीना, 730 रुपये वार्षिक दो लीटर रोज: 120 रुपये महीना, 1460 रुपये वार्षिक पांच लीटर रोज: 300 रुपये महीना, 3650 रुपये वार्षिक दूध मूल्य वृद्धि से जुड़ी मुख्य बातें 33 पैसे प्रति फैट बढ़ाया गया किसानों से खरीदी का भाव। दो रुपये प्रति लीटर खरीदी और बिक्री दोनों के दाम बढ़े। 12 रुपये प्रति फैट से खरीदी की मांग कर रहे थे किसान। 12 लाख लीटर के करीब दूध प्रतिदिन डेयरी और बंदी में होता है विक्रय। किसानों की मांग-खरीद रेट 70 रुपए हो मध्यप्रदेश दूध किसान संघ के अध्यक्ष दिलीप सिंह पंवार ने कहा कि हाल में हुई 3 रुपए की बढ़ोतरी में भी 1 रुपए डिलीवरी चार्ज शामिल है। किसानों के लिए वास्तविक बढ़ोतरी पर्याप्त नहीं है। उनकी मांग है कि दूध का खरीद मूल्य 70 रुपए प्रति लीटर किया जाए। फैट के आधार पर भुगतान की व्यवस्था होने पर किसान तैयार हैं, लेकिन इसके लिए 12 रुपए प्रति फैट के हिसाब से भुगतान की मांग है। पंवार ने कहा कि इंदौर में कुछ अन्य दूध व्यापारियों के यहां 65 से 68 रुपए तक खरीद और 70 से 72 रुपए तक बिक्री की बात सामने आती है। ऐसे में किसानों को भी 68 से 70 रुपए तक उचित खरीद मूल्य मिलना चाहिए। विक्रेता संघ बोला- उपभोक्ता पर ज्यादा बोझ नहीं डाल सकते इंदौर दूध विक्रेता संघ के अध्यक्ष भरत मथुरावाला ने बताया कि अभी घर पहुंच दूध के 63 रुपए में 62 रुपए दूध और 1 रुपए डिलीवरी चार्ज शामिल है। 1 अक्टूबर से यह 64 रुपए दूध + 1 रुपए डिलीवरी होकर कुल 65 रुपए होगा। दुकानों पर खुले दूध की कीमत 68 रुपए प्रति लीटर रहेगी। मथुरावाला ने कहा कि संघ पिछले 38 वर्षों से काम कर रहा है और पंजीकृत संस्था है। संघ की जिम्मेदारी किसानों को उत्पादन लागत के अनुरूप भुगतान दिलाने के साथ उपभोक्ताओं पर अनावश्यक बोझ नहीं डालना भी है। फैट के हिसाब से भुगतान 9.23 रुपए तक पहुंचा मथुरावाला के मुताबिक किसानों को फैट के आधार पर भुगतान किया जाता है। पहले 8.90 रुपए प्रति फैट दिया जा रहा था, जिसे बढ़ाकर 9.23 रुपए प्रति फैट किया गया है। उनका दावा है कि यह भुगतान सांची से अधिक है। उन्होंने कहा कि देवास, उज्जैन, धार और खंडवा सहित आसपास के क्षेत्रों में भी दूध के दाम में करीब 2 रुपए प्रति लीटर तक बढ़ोतरी हुई है। सप्लाई रुकी तो क्या होगा? किसान संगठन ने मांग पूरी नहीं होने पर दूध की सप्लाई रोकने की संभावना जताई है। हालांकि अभी सप्लाई बंद करने का कोई फैसला नहीं हुआ है। इसलिए 1 अक्टूबर से तय नए रेट लागू होंगे या नहीं, यह स्थिति आगे की बातचीत पर निर्भर करेगी। किस बात पर टकराव? विवाद मुख्य रूप से दूध के खरीद मूल्य, फैट के हिसाब से भुगतान और किसानों की उत्पादन लागत को लेकर है। दूध विक्रेता संघ का कहना है कि उपभोक्ताओं पर भी कीमत का असर पड़ता है, जबकि किसान संगठन का तर्क है कि मौजूदा खरीद मूल्य उनकी लागत के अनुरूप नहीं है। दोनों पक्ष अपने-अपने स्तर पर किसानों और उपभोक्ताओं के हित की बात कर रहे हैं।  

राष्ट्रीय कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम से बदली योहिनापाली के नीलाम्बर की किस्मत

राष्ट्रीय कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम से बदली योहिनापाली के नीलाम्बर की किस्मत 10 से 65 लीटर पहुँचा दूध उत्पादन ​रायपुर      सारंगढ़ तहसील स्थित ग्राम योहिनापाली के पशुपालक श्री नीलाम्बर पटेल के लिए पशुपालन अब केवल जीवन-यापन का जरिया नहीं रहा, बल्कि उनके परिवार की आर्थिक मजबूती और आत्मनिर्भरता का मुख्य आधार बन चुका है। राष्ट्रीय कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम (NAIP) और पशुपालन विभाग के निरंतर तकनीकी मार्गदर्शन से उनके पशुधन में नस्ल सुधार हुआ, जिससे उनके जीवन में एक अभूतपूर्व बदलाव आया है।        ​कुछ वर्षों पूर्व तक नीलाम्बर के पास केवल 6 देशी नस्ल की गायें थीं, जिनसे प्रतिदिन कुल मिलाकर मात्र 10 से 15 लीटर दूध ही मिल पाता था। कम उत्पादन के कारण सीमित आय में परिवार की दैनिक जरूरतों को पूरा करना, बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था करना और खेती में निवेश करना एक बड़ी चुनौती बनी हुई थी। इस संघर्षपूर्ण स्थिति से बाहर निकलने के लिए उन्होंने पशुपालन विभाग से संपर्क किया और राष्ट्रीय कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम के तहत अपनी गायों में कृत्रिम गर्भाधान कराने का निर्णय लिया। ​नस्ल सुधार के इस निर्णय से उनके पशुधन की तस्वीर पूरी तरह बदल गई। आज उनके पास 2 एच.एफ. क्रॉसब्रीड और 4 जर्सी क्रॉसब्रीड दुधारू गायें हैं, जबकि इसी प्रक्रिया से जन्मी एक जर्सी क्रॉसब्रीड बछिया उनके डेयरी व्यवसाय के उज्ज्वल भविष्य की नींव बन रही है। उन्नत नस्ल की गायों के आने से दूध उत्पादन में क्रांतिकारी उछाल आया है और अब प्रतिदिन लगभग 60 से 65 लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है। नीलाम्बर इस दूध को स्थानीय निजी होटलों और ग्राहकों को 50 रुपए प्रति लीटर की दर से बेचते हैं, जिससे उन्हें प्रतिदिन 2,400 से 2,600 रुपए की सीधी आय होती है। इस प्रकार उनकी मासिक आय 72,000 से 78,000 रुपए और वार्षिक आय लगभग 8.76 लाख से 9.36 लाख रूपए तक पहुँच गई है।         ​इस सफलता में पशुपालन विभाग की स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं का भी निरंतर सहयोग रहा है। पशुओं को समय-समय पर लगने वाले टीके,कृमिनाशन, जूं-नाशन, स्वास्थ्य परीक्षण और रोग नियंत्रण के तकनीकी मार्गदर्शन से दुग्ध उत्पादन में स्थिरता बनी हुई है। इसके साथ ही, नीलाम्बर ने पशुपालन को कृषि से जोड़कर एक अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है। वे पशुओं से प्राप्त गोबर से जैविक खाद तैयार कर अपने खेतों में उपयोग कर रहे हैं, जिससे रासायनिक उर्वरकों का खर्च कम हुआ है और भूमि की उर्वरता भी बनी हुई है।          ​नीलाम्बर पटेल का मानना है कि सही तकनीक, शासकीय मार्गदर्शन और निरंतर मेहनत से पशुपालन ग्रामीण परिवारों के सशक्तिकरण और स्थायी आय का एक मजबूत जरिया बन सकता है। योहिनापाली की यह सफलता की कहानी आज क्षेत्र के अन्य ग्रामीण पशुपालकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी है।

अब मौके पर पकड़ी जाएगी दूध में मिलावट

करनाल. दूध में फॉर्मेलिन जैसे हानिकारक रसायनों की मिलावट की जांच अब आसान बनाने की दिशा में आईसीएआर-राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) ने अहम कदम उठाया है। एनडीआरआई ने दूध में फॉर्मेलिन का पता लगाने वाली पेपर आधारित स्ट्रिप तकनीक के व्यावसायिक उपयोग के लिए अहमदाबाद की एवरेस्ट इंस्ट्रूमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ समझौता ज्ञापन (एमओयू) किया है। संस्थान के अनुसार वर्ष 2025 से अब तक कंपनी को हस्तांतरित की जाने वाली यह उसकी 10वीं तकनीक है। यह समझौता सतत एवं जलवायु-अनुकूल डेयरी व खाद्य मूल्य श्रृंखला पर आयोजित 13वें राष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन सत्र में हुआ। उद्घाटन सत्र में एनडीआरआई निदेशक डॉ. धीर सिंह ने पूर्व छात्रों की सक्रिय भागीदारी के लिए तीन सूत्रीय एजेंडा रखा। कार्यक्रम में एनडीआरआई और एनजीएए के बीच अगले पांच वर्षों के लिए संयुक्त शैक्षणिक एवं विकासात्मक गतिविधियों को जारी रखने के एमओयू का नवीनीकरण भी किया गया। वहीं एनजीएए ने नवनिर्मित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन डेयरी औपचारिक रूप से संस्थान को सौंप दिया। सेमिनार में डायमंड और गोल्डन जुबली बैच के पूर्व छात्रों को परिजनों की मौजूदगी में सम्मानित किया गया।

जयपुर डेयरी का मेगा अपग्रेड तैयार, CM भजनलाल शर्मा करेंगे उद्घाटन; बढ़ी प्रोसेसिंग क्षमता

जयपुर  जयपुर जिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड (जयपुर डेयरी) ने अपने उपभोक्ताओं और पशुपालकों को बड़ी सौगात देते हुए प्लांट की उत्पादन व प्रोसेसिंग क्षमता में ऐतिहासिक विस्तार किया है। डेयरी ने करीब 133 करोड़ रुपए की लागत से अपने मौजूदा प्लांट का आधुनिकीकरण (Modernization) पूरा कर लिया है। इस अपग्रेडेशन के बाद प्लांट की दूध प्रोसेसिंग क्षमता अब 12 लाख लीटर से सीधे बढ़कर 20 लाख लीटर प्रतिदिन हो गई है। इस अत्याधुनिक नए प्लांट का उद्घाटन मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा जल्द ही करेंगे। विद्युत और प्रोसेसिंग यूनिट्स के सफल संचालन के बाद डेयरी मंत्री जोराराम कुमावत ने प्लांट का दौरा कर उद्घाटन समारोह की तैयारियों की समीक्षा की। मंत्री कुमावत ने अधिकारियों से नई ऑटोमैटिक प्रोसेसिंग यूनिट्स की कार्यप्रणाली को बारीकी से समझा और कार्यक्रम के सफल आयोजन को लेकर आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।  इस अवसर पर राजस्थान कोऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन (RCDF) की प्रबंध संचालक (MD) श्रुति भारद्वाज और जयपुर डेयरी के एमडी मनीष फौजदार सहित कई आला अधिकारी मौजूद रहे। संवाददाताओं से बातचीत करते हुए डेयरी मंत्री ने बताया कि इस नए और सर्वसुविधायुक्त प्लांट से उत्पादन क्षमता में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है, जिसका सीधा फायदा जयपुर और आसपास के जिलों के दुग्ध उत्पादकों को मिलेगा: पैकेजिंग क्षमता: दूध की प्रोसेसिंग के साथ ही पाउच पैकिंग की क्षमता को भी रफ्तार दी गई है। अब प्रतिदिन दूध पाउच पैक करने की क्षमता 10 लाख लीटर से बढ़कर 16.50 लाख लीटर हो गई है। घी उत्पादन: प्लांट की नई तकनीक के चलते अब यहाँ रोजाना 70 टन घी का उत्पादन आसानी से किया जा सकेगा। आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर : प्लांट में नई जनरेशन के बॉयलर और हैवी मशीनरी स्थापित की गई है, जो प्रति घंटे लगभग 70 मीट्रिक टन भाप जेनरेट कर सकती है। इसकी मदद से घी, बटर और वे-वाटर (Whey Water) जैसे विभिन्न दुग्ध उत्पादों का निर्माण और अधिक शुद्धता व गति से संभव हो सकेगा। महत्व : जयपुर डेयरी का यह नया रूप न केवल मिलावट रहित और शुद्ध दुग्ध उत्पादों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करेगा, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सहकारिता आंदोलन को भी राजस्थान में एक नई मजबूती प्रदान करेगा।

सेना के जवानों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाएगा यूपी की देसी गायों के दूध से बना स्कॉयर फ्रीज ड्राइड योगर्ट पाउडर

डेनिश डेयरी टेक्नोलॉजी से देसी गायों के दूध के उत्पाद बना यूपी बना देश का 'धुरंधर'  सेना के जवानों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाएगा यूपी की देसी गायों के दूध से बना स्कॉयर फ्रीज ड्राइड योगर्ट पाउडर मुख्यमंत्री योगी की प्रेरणा से देसी नस्ल की गायों के संरक्षण से राष्ट्रशक्ति और आर्थिक समृद्धि का नया मॉडल तैयार देसी गाय के दूध के विशेष उत्पाद से और फुर्तीले होंगे सेना के जवान, दुश्मनों के दांत खट्टे करने में मिलेगी नई ताकत  लखनऊ,  उत्तर प्रदेश में गो संरक्षण अब राष्ट्रशक्ति, सैनिक सामर्थ्य और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने वाला नया मॉडल बनकर उभरा है। योगी सरकार के कुशल प्रबंधन से प्रदेश की देसी नस्ल की गायों का दूध अब भारतीय सेना के जवानों की ताकत बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। डेनमार्क और आइसलैंड की अत्याधुनिक डेयरी तकनीक से तैयार हो रहा विशेष डेयरी उत्पाद स्कॉयर (Skyrrup) सेना के जवानों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और उन्हें अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान करने में उपयोगी साबित हो रहा है। उत्तर प्रदेश की देसी गायों के दूध से तैयार यह प्रीमियम सप्लीमेंट अब भारतीय सेना में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन, कम फैट और प्राकृतिक पोषक तत्वों से भरपूर यह उत्पाद जवानों को अधिक फिट, ऊर्जावान और सक्षम बनाने में मदद करेगा। पशुपालन विभाग के अपर मुख्य सचिव मुकेश मेश्राम ने बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में विकसित हो रही गो आधारित अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भर भारत की नई ताकत बनती दिखाई दे रही है। उत्तर प्रदेश का मॉडल अब पूरे देश के लिए प्रेरणा बनता जा रहा है। देश का पहला मॉडल, जहां गो सेवा से बढ़ रही सेना की शक्ति प्रयागराज के रहने वाले इंजीनियर एस.एन. द्विवेदी ने नोएडा में रोजगार, गो संरक्षण और आधुनिक डेयरी तकनीक को जोड़कर एक अनूठा मॉडल विकसित किया है। उनकी डेयरी में गिर, साहीवाल समेत 250 से अधिक देसी नस्ल की गायों की देखरेख की जा रही है। इन गायों के दूध में प्राकृतिक रूप से उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन और अनेक पोषक तत्व पाए जाते हैं। इन्हीं गुणों के कारण भारतीय सेना में इनके दूध से बने उत्पाद की मांग लगातार बढ़ रही है।  देसी गायों के दूध से तैयार स्कॉयर जवानों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, शरीर को अतिरिक्त ऊर्जा देने तथा मांसपेशियों को मजबूत बनाने में सहायक माने जा रहे हैं। आधुनिक प्रोसेसिंग और अल्ट्रा फिल्टर तकनीक के कारण इन उत्पादों की गुणवत्ता काफी बढ़ जाती है। डेनमार्क की अल्ट्रा फिल्टर तकनीक से तैयार होता है स्कॉयर स्कॉयर आइसलैंड का एक पारंपरिक डेयरी उत्पाद है, जिसे दही और चीज के बीच की श्रेणी का माना जाता है। इसका स्वाद हल्का खट्टा होता है और करीब 1000 साल पहले उत्तरी यूरोप के समुद्री योद्धा वाइकिंग्स (Vikings) खाते थे। इसमें सामान्य डेयरी उत्पादों की तुलना में अधिक प्रोटीन और बेहद कम फैट होता है। इसमें स्कॉयर, ग्रीक योगर्ट, जिलेटो आइसक्रीम, स्कॉयर पाउडर, योगार्ट पाउडर, पनीर और घी सभी शामिल हैं। उत्तर प्रदेश में पहली बार डेनमार्क की अत्याधुनिक अल्ट्रा फिल्टर डेयरी तकनीक और आइसलैंड की प्रोसेसिंग पद्धति का उपयोग कर इसे तैयार किया जा रहा है। यही कारण है कि प्रदेश में तैयार हो रहे प्रीमियम दूध और उससे बने उत्पाद राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रहे हैं। इससे प्रदेश की देसी गाय आधारित डेयरी अर्थव्यवस्था को नया बाजार और नई पहचान मिल रही है। गो संरक्षण से रोजगार और आर्थिक समृद्धि की नई राह इंजीनियर एस.एन. द्विवेदी अब अलीगढ़ में 500 देसी गायों की क्षमता वाली अत्याधुनिक गोशाला विकसित कर रहे हैं। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिली प्रेरणा ने उन्हें गो सेवा और गो संरक्षण के कार्य को बड़े स्तर पर आगे बढ़ाने का संकल्प दिया। उन्होंने गो सेवा को रोजगार सृजन और आर्थिक समृद्धि से जोड़ते हुए ऐसा मॉडल विकसित किया है जिसकी चर्चा अब देशभर में हो रही है। आधुनिक तकनीक और भारतीय संस्कृति के समन्वय से उन्होंने साबित किया है कि गौ संरक्षण केवल परंपरा नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बदलने का प्रभावी माध्यम भी बन सकता है। योगी सरकार में राष्ट्रनिर्माण का आधार बन रहा गो संरक्षण उत्तर प्रदेश गो सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता का कहना है कि योगी सरकार द्वारा गो संरक्षण को लेकर किए गए प्रयास अब बड़े परिणामों के रूप में सामने आ रहे हैं। आधुनिक गोशालाएं, उन्नत डेयरी तकनीक, डिजिटल मार्केटिंग और मूल्य संवर्धित गो उत्पादों ने प्रदेश को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई है। उन्होंने कहा कि गो सेवा के माध्यम से जहां ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा हो रहे हैं, वहीं भारतीय सेना तक पौष्टिक गो उत्पाद पहुंचाकर इसे राष्ट्रसेवा से भी जोड़ा गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में विकसित हो रही गो आधारित अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भर भारत की नई ताकत बनती दिखाई दे रही है। उत्तर प्रदेश का यह मॉडल अब पूरे देश के लिए प्रेरणा बनता जा रहा है।

बस्तर के विकास की नई रूपरेखा: दूध, सिंचाई, रोजगार और गांवों को नई पहचान देने की तैयारी

बस्तर में दूध, खेतों तक पानी, युवाओं को काम और गांवों को नई पहचान देने की तैयारी नीति आयोग की बैठक में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने रखा विकसित छत्तीसगढ़ का विजन बस्तर में आमदनी दोगुनी करने का बड़ा संकल्प: तीन साल में हर परिवार की आय 30 हजार रुपये प्रतिमाह तक पहुंचाने का लक्ष्य नई दिल्ली  छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में आयोजित नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल की 11वीं बैठक में नक्सलवाद से मुक्त बस्तर की नई तस्वीर देश के सामने रखी। उन्होंने कहा कि दशकों तक हिंसा की मार झेलने वाला बस्तर अब आर्थिक पुनरुत्थान, रोजगार, शिक्षा, पर्यटन और कृषि आधारित विकास का मॉडल बनेगा। मुख्यमंत्री ने बैठक में बस्तर के आदिवासी परिवारों की आय दोगुनी करने, दुग्ध क्रांति लाने, 32 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधाओं का विस्तार करने, पर्यटन को बड़े उद्योग के रूप में विकसित करने तथा एआई और सेमीकंडक्टर जैसे आधुनिक क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने की व्यापक कार्ययोजना प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि विकसित भारत-2047 के विजन के अनुरूप छत्तीसगढ़ को विकसित राज्य बनाने की दिशा में तेजी से काम किया जा रहा है। राष्ट्रपति भवन में आयोजित इस बैठक में केंद्रीय मंत्री, विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री, केंद्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपाल, नीति आयोग के उपाध्यक्ष, सदस्य और वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। मुख्यमंत्री साय ने कहा कि बस्तर अब नई पहचान की ओर बढ़ रहा है। वहां दूध उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है, खेतों तक पानी पहुंचाने की योजनाएं बनाई जा रही हैं, गांवों में डिजिटल स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंच रही हैं और युवाओं को रोजगार से जोड़ने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि अगले तीन वर्षों में बस्तर के परिवारों की मासिक आय बढ़ाकर 30 हजार रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। वर्तमान में बस्तर के लगभग 85 प्रतिशत परिवारों की मासिक आय 15 हजार रुपये से कम है। सरकार खेती, पशुपालन, वन उपज, छोटे उद्योग और विभिन्न योजनाओं के माध्यम से ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने पर काम कर रही है। मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर में “डेयरी मॉडल” को तेजी से लागू किया जा रहा है। इसके तहत आदिवासी परिवारों को दुधारू गाय और भैंस उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई है। इसका उद्देश्य गांवों में स्थायी आय का स्रोत तैयार करना है। इस पहल से महिलाओं और युवाओं को रोजगार मिलेगा तथा गांवों में डेयरी केंद्र, दूध संग्रहण, परिवहन और स्थानीय बाजार जैसी नई आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने बताया कि सिंचाई सुविधा बढ़ाने के लिए 2,000 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाले दो बड़े प्रोजेक्ट शुरू किए जा रहे हैं। इन परियोजनाओं से 32 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध होगी। इंद्रावती नदी क्षेत्र में सालभर पानी उपलब्ध होने से खेती बेहतर होगी, उत्पादन बढ़ेगा और किसान धान के साथ-साथ सब्जियां, फल तथा अन्य नकदी फसलें भी उगा सकेंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर के दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने के लिए लगभग 36 लाख लोगों की डिजिटल हेल्थ प्रोफाइल तैयार की जा रही है। इससे मरीजों के इलाज, बीमारी और दवाओं का रिकॉर्ड सुरक्षित रहेगा तथा डॉक्टरों को समय पर सही जानकारी मिल सकेगी। इसका सबसे अधिक लाभ ग्रामीण क्षेत्रों, महिलाओं और बुजुर्गों को मिलेगा। उन्होंने बताया कि बस्तर में बने लगभग 200 सुरक्षा शिविरों को अब “सेवा डेरा” के रूप में विकसित किया जा रहा है। इन केंद्रों के माध्यम से ग्रामीणों को राशन, पेंशन, आयुष्मान कार्ड, बैंकिंग, स्वास्थ्य और शिक्षा सहित केंद्र एवं राज्य सरकार की 371 योजनाओं का लाभ एक ही स्थान पर उपलब्ध कराया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार चित्रकोट और बौद्ध धर्म से जुड़े तीर्थस्थल सिरपुर को विश्वस्तरीय पर्यटन स्थलों के रूप में विकसित कर रही है। बस्तर में वॉटर स्पोर्ट्स, एडवेंचर स्पोर्ट्स और जंगल सफारी जैसी गतिविधियों का विस्तार किया जा रहा है, जबकि सिरपुर में ग्लोबल मेडिटेशन सेंटर, संग्रहालय और महानदी तट के विकास पर कार्य जारी है। उन्होंने कहा कि पर्यटन रोजगार का बड़ा माध्यम बन सकता है। पर्यटकों के आने से होटल, परिवहन, गाइड, हस्तशिल्प, दुकानदारों और स्थानीय उद्यमियों को रोजगार मिलता है। बस्तर को वैश्विक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने से हजारों युवाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार के अवसर बढ़ेंगे। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार निवेश, सुशासन और तकनीक आधारित विकास को तेजी से आगे बढ़ा रही है। राज्य में 435 सुधार लागू किए गए हैं और सिंगल विंडो सिस्टम को मजबूत बनाकर निवेश के लिए बेहतर वातावरण तैयार किया गया है। उन्होंने बताया कि राज्य में सेमीकंडक्टर क्षेत्र की दो आधुनिक इकाइयां स्थापित की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि बस्तर में शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास और डिजिटल तकनीक के जरिए विकास का नया मॉडल तैयार किया जा रहा है। अबूझमाड़ और जगरगुंडा में 100 करोड़ रुपये की लागत से एजुकेशन सिटी विकसित की जा रही है। इसके साथ ही 341 पीएमस्कूल, 5,857 स्मार्ट क्लासरूम और 16 स्थानीय भाषाओं में द्विभाषी पुस्तकों के माध्यम से बच्चों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराई जा रही है। मुख्यमंत्री ने बताया कि एग्रीस्टैक योजना के तहत 33 लाख से अधिक किसानों को डिजिटल सेवाओं से जोड़ा गया है। डिजिटल द्वार प्लेटफॉर्म और अटल मॉनिटरिंग पोर्टल के माध्यम से सरकारी सेवाओं को अधिक पारदर्शी और सरल बनाया गया है। उन्होंने कहा कि विकसित छत्तीसगढ़ के निर्माण के लिए सरकार ने एआई मिशन, पर्यटन मिशन, खेल मिशन, अधोसंरचना मिशन और स्टार्टअप-निपुण मिशन शुरू किए हैं। इन मिशनों से युवाओं को रोजगार, तकनीक और उद्यमिता के नए अवसर मिलेंगे तथा छत्तीसगढ़ को नवाचार और निवेश के अग्रणी राज्यों में शामिल किया जाएगा। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि आत्मनिर्भर भारत के तहत छत्तीसगढ़ में उद्योग, निवेश और निर्यात को नई गति मिली है। खेल सामग्री, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, बायो-एथेनॉल, गारमेंट और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में नए उद्योग स्थापित हो रहे हैं, जिससे रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण के लिए ग्रीन इंडस्ट्रीज को भी प्रोत्साहन दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि ‘एक जिला-एक उत्पाद’ (ओडीओपी) योजना से राज्य के स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार मिल रहे हैं। वित्तीय वर्ष 2025-26 में फरवरी 2026 तक 761.76 करोड़ रुपये का निर्यात … Read more

सरकारी योजना ने दिलाई नई पहचान, झाबुआ के अर्पित अब हर महीने कमा रहे 25 हजार रुपए

सफलता की कहानी भगवान बिरसा मुण्डा योजना से झाबुआ के अर्पित बने आत्मनिर्भर  शुरू किया अमूल पार्लर अब हर माह कमा रहे 25 हजार रुपए भोपाल  जिंदगी में अपने पैरों पर खड़े होने की इच्छा हर इंसान के मन में होती है। हर व्यक्ति आर्थिक एवं सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर बनना चाहता है, लेकिन सफलता उसी को मिलती है जो अपने लक्ष्य को ध्यान में रखकर निरंतर मेहनत करता है। ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी है झाबुआ के वार्ड क्रमांक 16, मेघनगर नाका, के अर्पित पिता पारसिंह मचार की। उन्होंने स्वरोजगार के माध्यम से आत्मनिर्भर बनने की दिशा में सतत् प्रयास किया। अर्पित ने स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद निजी क्षेत्र में कार्य किया, लेकिन वे अपने कार्य से पूर्णतः संतुष्ट नहीं थे। उनके मन में स्वयं का व्यवसाय स्थापित करने की इच्छा थी। इसी उद्देश्य से उन्होंने अमूल पार्लर (मिल्क पार्लर) प्रारंभ करने का निर्णय लिया। व्यवसाय शुरू करने के लिए आर्थिक सहायता की आवश्यकता होने पर उन्होंने शासन की “भगवान बिरसा मुण्डा स्वरोजगार योजना” के अंतर्गत ऋण प्राप्त करने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने आदिवासी वित्त एवं विकास निगम, झाबुआ कार्यालय में संपर्क किया। 5 लाख के ऋण से शुरू किया अमूल पार्लर, अब हर माह हो रही 25 हजार रूपये की आय मध्यप्रदेश आदिवासी वित्त एवं विकास निगम, झाबुआ द्वारा भगवान बिरसा मुण्डा स्वरोजगार योजना अंतर्गत ऋण प्रकरण एम.पी. ऑनलाइन के माध्यम से भारतीय स्टेट बैंक, राजवाड़ा शाखा, झाबुआ को प्रेषित किया गया। बैंक द्वारा प्रकरण का परीक्षण करने के उपरांत अर्पित को 5 लाख रुपये का ऋण स्वीकृत किया गया। ऋण स्वीकृति प्राप्त होने के तुरंत बाद अर्पित ने अमूल पार्लर प्रारंभ कर अपना व्यवसाय शुरू किया। आज वे अपने व्यवसाय से प्रतिमाह लगभग 25 हजार रुपये की आय अर्जित कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने अपनी इकाई में एक अन्य व्यक्ति को सहायक के रूप में रोजगार भी प्रदान किया है। रोजगार की तलाश से आत्मनिर्भरता तक, अर्पित ने युवाओं को दिया प्रेरणा का संदेश  अर्पित का कहना है कि पहले वे रोजगार की तलाश में भटकते थे, लेकिन आज स्वयं का व्यवसाय संचालित कर आत्मनिर्भर बन चुके हैं। वे अपनी सफलता का श्रेय मध्यप्रदेश आदिवासी वित्त एवं विकास निगम द्वारा संचालित भगवान बिरसा मुण्डा स्वरोजगार योजना को देते हैं। उनका मानना है कि यदि मन में दृढ़ संकल्प और मेहनत करने का जज्बा हो तो सफलता अवश्य मिलती है। शासन की योजनाओं का लाभ लेकर युवा आत्मनिर्भर बन सकते हैं। ''भगवान बिरसा मुण्डा स्वरोजगार'' योजना के बारे में जानकारी मध्यप्रदेश सरकार द्वारा अनुसूचित जनजाति वर्ग के बेरोजगार युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के उद्देश्य से “भगवान बिरसा मुण्डा स्वरोजगार योजना” संचालित की जा रही है। योजना के तहत पात्र युवाओं को स्वयं का व्यवसाय स्थापित करने के लिए बैंकों के माध्यम से आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाती है। योजना के अंतर्गत विनिर्माण इकाई स्थापित करने हेतु 1 लाख रुपये से 50 लाख रुपये तक का ऋण प्रदान किया जाता है। इसके साथ ही हितग्राहियों को 7 वर्षों तक 5 प्रतिशत ब्याज अनुदान दिया जाता है तथा गारंटी फीस का भुगतान मध्यप्रदेश शासन द्वारा किया जाता है। योजना का लाभ लेने के लिए आवेदक को अनुसूचित जनजाति वर्ग का सदस्य होना अनिवार्य है। आवेदक की आयु 18 से 45 वर्ष के बीच होनी चाहिए। साथ ही आवेदक के पास अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) द्वारा जारी जाति प्रमाण पत्र, वार्षिक आय 12 लाख रुपये से कम होने का प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, कक्षा 8वीं उत्तीर्ण की अंकसूची, बैंक पासबुक की छायाप्रति, आधार कार्ड, पैन कार्ड, समग्र आईडी, राशन कार्ड, पासपोर्ट साइज फोटो एवं मोबाइल नंबर होना आवश्यक है। इस योजना में सेवा इकाई एवं खुदरा व्यवसाय के लिए भी 1 लाख रुपये से 25 लाख रुपये तक की परियोजनाओं को शामिल किया गया है। इसके अंतर्गत ब्यूटी पार्लर, वाहन मरम्मत, साइकिल रिपेयरिंग, किराना दुकान, फोटोकॉपी, फोटोग्राफी, ऑफसेट प्रिंटिंग प्रेस, मोटरसाइकिल रिपेयरिंग, इलेक्ट्रिकल कार्य, टेंट हाउस, ढाबा, होटल आदि व्यवसाय शुरू किए जा सकते हैं। वाहन संबंधी योजनाओं के लिए वैध ड्राइविंग लाइसेंस होना अनिवार्य रहेगा। पात्र युवक-युवतियां एमपी ऑनलाइन के माध्यम से अथवा अपने जिले के आदिवासी वित्त विकास निगम कार्यालय में संपर्क कर आवेदन कर सकते हैं। 

Camel Milk से तैयार हुआ खास पनीर, बीकानेर वैज्ञानिकों की रिसर्च ने बढ़ाई उम्मीदें

बीकानेर रेगिस्तान की पहचान माने जाने वाले ऊंट अब केवल परिवहन या दूध उत्पादन तक सीमित नहीं रहेंगे. बीकानेर स्थित राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र (एनआरसीसी) के वैज्ञानिकों ने ऊंटनी के दूध से विशेष प्रकार का पनीर तैयार कर एक नई उपलब्धि हासिल की है. यह पनीर ऊंटनी और गाय के दूध के मिश्रण से बनाया गया है, जो प्रोटीन, खनिज तत्वों और औषधीय गुणों से भरपूर बताया जा रहा है. वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले समय में यह स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों के लिए एक बेहतर विकल्प बन सकता है. बीकानेर के वैज्ञानिकों की यह पहल न केवल डेयरी क्षेत्र में नई संभावनाएं खोल रही है, बल्कि रेगिस्तानी क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा देने वाली साबित हो सकती है।  एनआरसीसी के वैज्ञानिक डॉ. मितुल बुंबडिया और डॉ. राजेंद्र कुमार ने प्रयोगशाला स्तर पर सिट्रिक अम्ल की सहायता से इस विशेष पनीर को तैयार किया है. वैज्ञानिकों के अनुसार, ऊंटनी के दूध में सामान्य गाय या भैंस के दूध की तुलना में प्रोटीन की संरचना अलग होती है, जिसके कारण इसे सीधे फाड़कर पनीर बनाना संभव नहीं होता. इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों ने ऊंटनी के दूध में 30 प्रतिशत गाय का दूध मिलाकर उसकी जमावट क्षमता बढ़ाई. तैयार पनीर में लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा ऊंटनी के दूध का है।  पनीर को सात दिनों तक रखा जा सकता है सुरक्षित वैज्ञानिकों का कहना है कि इस पनीर का स्वाद हल्का नमकीन है और इसे पांच से सात दिन तक सुरक्षित रखा जा सकता है. खास बात यह है कि यह पनीर पोषक तत्वों से भरपूर होने के साथ स्वास्थ्यवर्धक भी माना जा रहा है. ऊंटनी के दूध में प्राकृतिक रूप से कई ऐसे तत्व पाए जाते हैं, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक होते हैं. यही कारण है कि इस उत्पाद को औषधीय गुणों वाला दुग्ध उत्पाद भी माना जा रहा है।  ऊंटनी के दूध से तैयार पनीर लोगों के लिए बेहतर विकल्प डेयरी प्रौद्योगिकी एवं प्रसंस्करण इकाई के वैज्ञानिक डॉ. राजेंद्र कुमार ने बताया कि भारत में पनीर का उपयोग दैनिक भोजन से लेकर कई प्रकार के व्यंजनों में बड़े स्तर पर किया जाता है. ऐसे में ऊंटनी के दूध से तैयार यह पनीर लोगों के लिए एक नया और स्वास्थ्यप्रद विकल्प साबित हो सकता है. उन्होंने बताया कि यदि बाजार में इसकी मांग बढ़ती है, तो बड़े स्तर पर उत्पादन की दिशा में भी काम किया जाएगा।  ऐसे तैयार होता है ऊंटनी के दूध से पनीर पनीर तैयार करने की प्रक्रिया भी वैज्ञानिकों ने साझा की है. सबसे पहले ऊंटनी के दूध को करीब 90 डिग्री तापमान तक गर्म किया जाता है. इसके बाद इसे थोड़ा ठंडा कर विशेष अनुपात में तैयार मिश्रण के साथ फाड़ा जाता है, जिससे पनीर तैयार हो जाता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि लंबे शोध और प्रयोगों के बाद उन्हें अच्छे परिणाम मिले हैं और उच्च गुणवत्ता वाला पनीर तैयार करने में सफलता मिली है. एनआरसीसी अब इस तकनीक को पशुपालकों और किसानों तक पहुंचाने की तैयारी भी कर रहा है. यदि कोई किसान या पशुपालक ऊंटनी के दूध से पनीर बनाना सीखना चाहता है, तो वह केंद्र में आकर प्रशिक्षण प्राप्त कर सकता है. इससे ऊंट पालन से जुड़े लोगों की आय बढ़ने की संभावनाएं भी मजबूत होंगी।