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मध्य प्रदेश की जीवनरेखा नर्मदा पर NGT का सख्त रुख, पर्यावरण सचिव से रिपोर्ट तलब

भोपाल नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की भोपाल बेंच ने पर्यावरण के प्रधान सचिव को नर्मदा नदी को साफ रखने के लिए दिए गए निर्देशों पर एक अनुपालन रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है। यह रिपोर्ट विभिन्न एजेंसियों, विभागों, जिला कलेक्टरों और नगर निगम आयुक्तों से संकलित की जाएगी। NGT ने यह निर्देश एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। नर्मदा को जीवन रेखा बनाए रखने के लिए निर्देश NGT ने नर्मदा नदी के बाढ़ क्षेत्र को चिह्नित करने, उस क्षेत्र से अतिक्रमण हटाने, नदी में बिना उपचारित सीवेज और ठोस कचरा बहाने पर रोक लगाने, अवैध रेत खनन बंद करने और पूरे साल नदी के प्रवाह को स्थिर रखने जैसे कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। ये निर्देश नर्मदा नदी को मध्य प्रदेश की जीवन रेखा बनाए रखने के लिए हैं। रिपोर्ट के आधार पर होगी कार्रवाई यह अनुपालन रिपोर्ट 1 सितंबर, 2025 को NGT द्वारा जारी आदेश के अनुसार तैयार की जानी है। यह रिपोर्ट याचिकाकर्ता कीर्ति कुमार सदाशिव भट्ट की याचिका पर आधारित है। रिपोर्ट को NGT के रजिस्ट्रार को सौंपा जाएगा, जो इसे ट्रिब्यूनल के सामने पेश करेंगे। इसके बाद, रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। निष्पादन याचिका पर सुनवाई NGT ने यह टिप्पणी जबलपुर की सामाजिक कार्यकर्ता पी.जी. नज्पांडे द्वारा दायर एक निष्पादन याचिका पर सुनवाई करते हुए की। NGT यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसके द्वारा जारी किए गए निर्देशों का ठीक से पालन हो रहा है या नहीं। इसी के लिए NGT ने अब मुख्य सचिव (पर्यावरण) को इस मामले में निर्देशित किया है।  

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने उज्जैन में सप्त सागरों की बदहाली पर जताई चिंता

उज्जैन उज्जैन की धार्मिक, ऐतिहासिक और पर्यावरणीय पहचान माने जाने वाले ‘सप्त सागर’ लगातार उपेक्षा, अतिक्रमण और प्रदूषण का शिकार हो रहे हैं। इस गंभीर स्थिति पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाते हुए मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव को सीधे दखल देने को कहा है। ट्रिब्यूनल ने साफ कहा है कि आदेशों की अवहेलना और पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सेंट्रल जोन बेंच के न्यायमूर्ति शिव कुमार सिंह और एक्सपर्ट मेंबर सुधीर कुमार चतुर्वेदी ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि स्थानीय प्रशासन न तो पूर्व आदेशों का समुचित पालन कर पाया और न ही समय पर संतोषजनक प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की। ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि पर्यावरण संरक्षण जैसे संवेदनशील मामलों में प्रशासनिक शिथिलता गंभीर परिणाम ला सकती है। अतिक्रमण हटाने की दिशा में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई सुनवाई में सामने आया कि खसरा नंबर 1281 में दर्ज गोवर्धन सागर (कुल रकबा 36 बीघा) के 18.5 बीघा से अधिक हिस्से पर अवैध कब्जा हो चुका है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस भूमि पर किसी भी न्यायालय का कोई स्टे नहीं है, इसके बावजूद अतिक्रमण हटाने की दिशा में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। आगामी सिंहस्थ 2028 को ध्यान में रखते हुए एनजीटी ने शासन-प्रशासन को सख्त निर्देश दिए हैं कि सप्तसागर के संरक्षण और पुनर्जीवन का कार्य मिशन मोड में किया जाए। ट्रिब्यूनल ने प्रमुख सचिव (पर्यावरण) को मासिक निगरानी कर रिपोर्ट पेश करने और मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सभी सात सागरों के पानी की गुणवत्ता की जांच कर हेल्थ रिपोर्ट प्रस्तुत करने के आदेश दिए हैं। पवित्र सरोवर बने नालियां आवेदक प्रशांत मौर्य और बाकिर अली रंगवाला की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने माना कि उज्जैन के रुद्रसागर, पुष्कर सागर, क्षीरसागर, गोवर्धन सागर, रत्नाकर सागर, विष्णु सागर और पुरुषोत्तम सागर, सभी की हालत दयनीय हो चुकी है। उज्जैन मास्टर प्लान-2021 के संदर्भ में ट्रिब्यूनल ने गंभीर टिप्पणियां करते हुए कहा कि तालाबों को कचरा डंपिंग यार्ड में तब्दील कर दिया गया है। शहर का अनुपचारित सीवेज सीधे इन जल निकायों में प्रवाहित हो रहा है। अवैध निर्माणों और गंदे पानी के कारण जल गुणवत्ता बेहद खराब हो चुकी है, जिससे स्वास्थ्य जोखिम बढ़ रहे हैं। जारी रहेगी सुनवाई एनजीटी ने स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई 20 फरवरी 2026 को होगी, जिसमें कलेक्टर और नगर निगम को की गई कार्रवाई की विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। अगली सुनवाई में प्रशासन को यह बताना होगा कि जमीनी स्तर पर आखिर क्या बदला। संकेत साफ है कि महाकाल की नगरी में आस्था के साथ अब पर्यावरणीय जवाबदेही भी कसौटी पर है। एनजीटी ने गेंद पूरी तरह शासन-प्रशासन के पाले में डाल दी है। एनजीटी के मुख्य निर्देश ये     अतिक्रमण हटाना : खसरा नंबर 1281 (गोवर्धन सागर) सहित सभी सातों सागरों से तत्काल और पूर्ण अतिक्रमण हटाने के निर्देश।     सीवेज पर पूर्ण रोक : बिना उपचारित (अनट्रीटेड) गंदा पानी और सीवेज किसी भी जल निकाय में बहाने पर पूरी तरह रोक।     मुख्य सचिव की सीधी भूमिका : राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश कि वे स्वयं हस्तक्षेप कर कलेक्टर और नगर निगम से प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित कराएं।     मासिक निगरानी तंत्र : प्रमुख सचिव (पर्यावरण) हर महीने प्रगति की निगरानी कर रिपोर्ट ट्रिब्यूनल में पेश करेंगे।     जल गुणवत्ता की जांच : मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सभी सात सागरों के पानी के नमूने लेकर हेल्थ रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश।     अनुपालन रिपोर्ट अनिवार्य : कलेक्टर और नगर निगम को 20 फरवरी 2026 की अगली सुनवाई से पहले की गई कार्रवाई की विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।  

एनजीटी सख्त: भोपाल के वेटलैंड पर अवैध कब्जे पर कार्रवाई न होने पर प्रशासन को चेतावनी

 भोपाल  कलियासोत जलाशय क्षेत्र में अवैध निर्माण और अतिक्रमण के मामलों को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है। शुक्रवार को हुई सुनवाई में ट्रिब्यूनल ने साफ कहा कि बार-बार निर्देश देने के बावजूद जिला प्रशासन और नगर निगम द्वारा कार्रवाई नहीं की गई, जो चिंताजनक है। एनजीटी के समक्ष यह मामला कलियासोत जलाशय, केरवा जलाशय और आसपास के ग्रीन बेल्ट, बाटनिकल गार्डन व रीजनल गार्डन की जमीन पर हुए अतिक्रमण से जुड़ा है। ट्रिब्यूनल ने माना कि इन अवैध गतिविधियों से न सिर्फ पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है, बल्कि घड़ियाल, मगरमच्छ और कछुओं जैसे जलीय जीवों का प्राकृतिक आवास भी खतरे में है। 97 अतिक्रमण चिह्नित किए बीते कुछ वर्षों में इन जीवों का रिहायशी इलाकों में दिखना मानव जीवन के लिए भी जोखिम बनता जा रहा है। एनजीटी ने अपने आदेश में खुलासा किया कि कलियासोत जलाशय क्षेत्र में कुल 97 अतिक्रमण चिह्नित किए गए हैं, जिनमें से अधिकांश सरकारी भूमि पर हैं। इसके अलावा लगभग 150 हेक्टेयर भूमि, जो बाटनिकल गार्डन के लिए आरक्षित है, उसकी न तो समुचित सीमांकन हुआ और न ही सुरक्षा। वहीं, बिना उपचारित सीवेज जलाशयों प्रवाह अब भी एक बड़ी समस्या बना हुआ है। कई एसटीपी वर्षों से अधूरे या ट्रायल रन की स्थिति में हैं। दो सप्ताह के भीतर रिपोर्ट पेश करने के आदेश ट्रिब्यूनल ने कलेक्टर भोपाल और नगर निगम आयुक्त को व्यक्तिगत निगरानी में अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही आदेश दिया गया है कि दो सप्ताह के भीतर शपथपत्र के साथ विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट पेश की जाए। एनजीटी ने यह भी कहा कि लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच कर जिम्मेदारी तय की जाए। समय सीमा बीतने के बाद भी शुरू नहीं हुए एसपीटी एनजीटी ने यह भी चिंता जताई कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट निर्धारित समय-सीमा बीत जाने के बाद भी पूरी तरह चालू नहीं हो पाए हैं, जिसके कारण बिना उपचारित गंदा पानी जलाशयों में छोड़ा जा रहा है । अधिकरण ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक भूमि की रक्षा करना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है और अधिकारियों की निष्क्रियता किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है। मामले की अगली सुनवाई 17 मार्च को याचिकाकर्ता डॉ. सुभाष सी. पांडेय और राशिद नूर खान की ओर से प्रस्तुत तर्कों पर सुनवाई के बाद एनजीटी ने राज्य सरकार के अधिवक्ता को निर्देश दिए कि यह आदेश मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव तक पहुंचाया जाए, ताकि तत्काल और ठोस कार्रवाई हो सके। अधिकरण ने स्पष्ट किया कि वह स्वामित्व विवाद तय नहीं करेगा, बल्कि उसका उद्देश्य केवल जलाशयों से अतिक्रमण हटाकर भोज वेटलैंड की रक्षा करना है। मामले की अगली सुनवाई 17 मार्च 2026 को होगी।

पर्यावरण से खिलवाड़ पर NGT की फटकार: युवराज मेहता मामले में यूपी सरकार से मांगा जवाब

नई नोएडा एनजीटी ने नोएडा में 16 जनवरी की रात सेक्टर 150 में पानी भरे गड्ढे में तड़पकर जान देने वाले युवराज मेहता की मौत पर कार्रवाई की है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने यूपी सरकार के सभी संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है और उन्हें निर्देश दिया है कि वे कम से कम एक सप्ताह के भीतर हलफनामे के माध्यम से अपना जवाब दाखिल करें। एनजीटी ने कहा कि यह घटना पर्यावरण नियमों के पालन में गंभीर चूक और कानून के उल्लंघन की ओर इशारा करती है।   सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज की मौत के 6 दिन बाद एनजीटी ने इस मामले में नोएडा अथॉरिटी, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB), उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार के प्रधान सचिव (पर्यावरण) और गौतम बुद्ध नगर के जिला मजिस्ट्रेट (DM) को प्रतिवादी बनाया है। इन सभी संबंधित अधिरकारियों को नोटिस दे दिया गया है और सबसे सफ्ताह भर के भीतर जवाब मांगा गया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कहा कि यह घटना पर्यावरण नियमों के पालन में गंभीर चूक और कानून के उल्लंघन की ओर इशारा करती है। NGT ने अपनी रिपोर्ट में दर्ज किया है कि संबंधित जमीन मूल रूप से एक निजी मॉल प्रोजेक्ट के लिए आवंटित की गई थी। लेकिन लगभग एक दशक तक ध्यान न दिए जाने के कारण, बारिश के पानी और आस-पास की हाउसिंग सोसायटियों से निकलने वाले गंदे पानी के जमा होने से यह जगह अब एक तालाब में तब्दील हो गई थी। ट्रिब्यूनल के आदेश में स्थानीय निवासियों के उन आरोपों को भी दर्ज किया गया है, जिनमें उन्होंने नोएडा अथॉरिटी की निष्क्रियता की बात कही थी। निवासियों का कहना है कि जलजमाव की समस्या लंबे समय से बनी हुई थी, जिससे हिंडन नदी का जलस्तर बढ़ने पर पानी के वापस लौटने और खतरा पैदा होने की आशंका बनी रहती थी। प्रथम दृष्टया तथ्यों को देखने के बाद, बेंच ने माना कि समाचार रिपोर्ट में बताए गए तथ्य पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के उल्लंघन की ओर इशारा करते हैं। इसके साथ ही, यह मामला पर्यावरण नियमों के पालन और कानूनी जिम्मेदारियों को निभाने पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।  

अयोध्या बायपास के लिए 8 हजार पेड़ों की कटाई पर NGT की रोक, भोपाल की सांसे अब नहीं थमेंगी

भोपाल   विकास बनाम पर्यावरण की जंग में हरियाली की जीत होती दिख रही है. भोपाल के अयोध्या बायपास रोड को 10 लेन बनाने के लिए प्रस्तावित पेड़ों की कटाई पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाया है. एनजीटी ने इस प्रोजेक्ट पर लगी रोक को बरकरार रखा है. इसके साथ ही एनजीटी ने इस मुद्दे को केवल भोपाल तक सीमित न रखते हुए पूरे देश में लागू होने वाली एक समान नीति बनाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया है, जिससे विकास कार्यों की आड़ में पेड़ों का अंधाधुंध सफाया न हो. विकास के साथ पर्यावरण संतुलन जरूरी यह फैसला नितिन सक्सेना बनाम राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) प्रकरण में सुनाया गया. न्यायमूर्ति शिव कुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने कहा कि सड़क, पुल और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए पेड़ों की कटाई को लेकर पूरे देश में एक समान और सख्त नीति होना आवश्यक है. इससे आर्थिक प्रगति और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाया जा सकेगा. इसी के साथ इस प्रकरण को एनजीटी की प्रधान पीठ, नई दिल्ली स्थानांतरित करने के निर्देश भी दिए गए हैं. अयोध्या बायपास रोड के लिए कटने हैं हजारों पेड़ सड़कों के विस्तार और शहरों की बढ़ती जरूरतों के बीच पर्यावरण संरक्षण का सवाल अब राष्ट्रीय स्तर पर भी उठने लगा है. भोपाल के अयोध्या बायपास पर प्रस्तावित 10 लेन सड़क परियोजना के कारण हजारों पेड़ों की कटाई का मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल तक पहुंचा, जहां कटाई पर स्टे बरकरार रखा गया है. एनजीटी ने स्पष्ट किया है कि विकास कार्य जरूरी हैं, लेकिन इसके नाम पर प्रकृति की बलि स्वीकार्य नहीं है. यह पेड़ नहीं भोपाल की सांसें हैं सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ताओं ने दलील दी कि ये पेड़ केवल लकड़ी नहीं, बल्कि भोपाल के नागरिकों की सांसों की सुरक्षा हैं. दूसरी ओर एनएचएआई ने परियोजना की आवश्यकता और समयबद्धता का हवाला दिया. इस बीच यह भी सामने आया कि पहले दिए गए स्थगन आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर अपील को वापस ले लिया गया है. हालांकि, इस दौरान कोई आधिकारिक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए, जिसके बाद एनजीटी ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग अपील का स्टेटस साफ नहीं होता, तब तक ट्रिब्यूनल इस मामले में आगे कोई सुनवाई नहीं करेगा और पहले से कटाई पर लगाई गई रोक बरकरार रहेगी. पूरे देश में मिसाल बनेगा ये फैसला बता दें की एनजीटी ने भोपाल में काटे जाने वाले 8 से 12 हजार पेड़ों को शहर के फेफड़े बताया. आसाराम तिराहा से करोंद होते हुए रत्नागिरी तिराहा तक प्रस्तावित 16 किलोमीटर लंबी सड़क के लिए इतने ही पेड़ों को काटे जाने की योजना थी. एनजीटी ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को भी दोहराया, जिसके तहत किसी भी तरह की कटाई या छंटाई से पहले एनजीटी की समिति की अनुमति अनिवार्य है. शहर के पर्यावरणविदों का मानना है कि इस फैसले के साथ यह स्पष्ट संदेश गया है कि अब देश में विकास की राह हरियाली को कुचलकर नहीं, बल्कि उसे साथ लेकर ही तय होगी.

एमपी में बढ़ते प्रदूषण पर NGT की चिंता, सरकार से 8 शहरों पर 8 हफ्तों में रिपोर्ट की मांग

भोपाल  मध्य प्रदेश में एक बार फिर प्रदूषण का ग्राफ बढ़ गया है। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) ने भोपाल और इंदौर के साथ साथ राज्य के 8 शहरों में बढ़ते प्रदूषण को लेकर चिंता व्यक्त की है। साथ ही, बढ़ते प्रदूषण को लेकर राज्य सरकार से 8 हफ्तों में रिपोर्ट पेश करने को कहा है। वहीं एनजीटी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार और संबंधित विभागों को नोटिस जारी किया है। इसके अलावा एक ज्वाइंट कमेटी भी गठित कर मामले पर संज्ञान लेने के निर्देश दिए हैं। प्रदेश में प्रदूषण का लेवल बढ़ गया है। एनटीजी ने भोपाल-इंदौर समेत 8 शहरों में बढ़ते प्रदूषण को लेकर चिंता जताई है। राजधानी भोपाल में वायु गुणवत्ता तय मानकों के नीचे है। एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) बहुत खराब से गंभीर श्रेणी में दर्ज हो रहा है, जो गंभीर पर्यावरणीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए संकट है। एमपी के इन शहरों पर संकट एनजीटी ने एमपी के भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन, सिंगरौली, सागर और देवास में बढ़ते प्रदूषण स्तर को लेकर कहा है कि, ये शहर गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट की श्रेणी में है। इनमें पीएम-10 का औसत 130-190 और पीएम 2.5 का 80-100 माइक्रोग्राम/घनमीटर है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इन 8 शहरों को 'नॉन-अटेनमेंट सिटी' घोषित किया है। बता दें कि, साल 2016 में 6 शहर थे, लेकिन अब इस श्रेणी में 8 शहर आ गए हैं। बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए एनजीटी ने सरकार से 8 हफ्तों में रिपोर्ट तलब की है।

रिंग रोड विवाद: अनुमति के बिना बनी सड़क, उग्रवादियों के नाम पर नामकरण, NGT ने किया रोक लगा

इंफाल मणिपुर में बिना राज्य सरकार की अनुमति के बनाई जा रही एक ‘रिंग रोड’ का मामला सामने आने के बाद प्रशासन और सरकार में हड़कंप मच गया है. यह सड़क राज्य के छह जिलों से होकर गुजरती बताई जा रही है और रिपोर्ट्स के अनुसार इसके कुछ हिस्सों को स्थानीय स्तर पर जर्मन रोड और टाइगर रोड कहा जा रहा है, जिनका नाम कुकी उग्रवादियों के उपनामों से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है. इस मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने सड़क निर्माण पर तत्काल रोक लगा दी है.  रिंग रोड के निर्माण कार्य पर रोक: NGT रिपोर्ट के मुताबिक, 23 दिसंबर को एनजीटी ने मणिपुर सरकार को आदेश दिया कि इस रिंग रोड पर किसी भी तरह का निर्माण कार्य आगे न बढ़ाया जाए. साथ ही एनजीटी ने राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि ये सड़क जिन 6 जिलों से होकर गुजरती है वहां जिलाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों को आदेश के सख्त अनुपालन के लिए निर्देश जारी करें. बताया गया है कि यह सड़क स्थानीय वन क्षेत्रों और पहाड़ी इलाकों से होकर गुजरती है और यह इंफाल में एशियाई विकास बैंक की सहायता से बन रही अधिकृत रिंग रोड से अलग है जिसे राज्य सरकार की मंजूरी प्राप्त है. एनजीटी ने स्पष्ट किया है कि विवादित सड़क को किसी भी तरह से आधिकारिक परियोजना से नहीं जोड़ा जा सकता. बता दें, ये पूरा मामला तब उजागर हुआ जब मणिपुर के मैतेई समुदाय के नागरिक संगठन कोऑर्डिनेटिंग कमेटी ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी (COCOMI) ने कोलकाता स्थित एनजीटी कार्यालय में याचिका दायर की. याचिका में आरोप लगाया गया कि जंगल और पहाड़ी क्षेत्रों में बिना किसी पर्यावरणीय और भू-वैज्ञानिक प्रभाव आकलन के सड़क निर्माण किया जा रहा है जो कानून का गंभीर उल्लंघन है. याचिकाकर्ताओं ने एनजीटी से मांग की कि इस अवैध निर्माण पर तुरंत रोक लगाई जाए और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए. एनजीटी ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद इस मामले को गंभीर जनहित से जुड़ा मानते हुए अंतरिम आदेश जारी किया है. एनजीटी के अनुसार, याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि चुराचांदपुर, कांगपोकपी, नोनी और उखरूल सहित कई जिलों के वन और पहाड़ी इलाकों से गुजरने वाली इस सड़क का निर्माण कुकी समुदाय के कुछ लोगों द्वारा किया जा रहा था. हालांकि इस दावे की आधिकारिक पुष्टि अभी जांच के अधीन है. स्थानीय गांव के एक निवासी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि मणिपुर में यह स्थिति बेहद चिंताजनक है. उनका कहना था कि बिना किसी सरकारी अनुमति के सड़कें बनाई जा रही हैं और उन्हें उग्रवादियों के नाम से जोड़ा जा रहा है, जिससे आम लोगों में गुस्सा और असंतोष बढ़ रहा है. याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि इस सड़क का निर्माण मणिपुर संकट के दौरान शुरू हुआ था और इसकी जानकारी सबसे पहले सोशल मीडिया के जरिए सामने आई थी. सोशल मीडिया पर  उद्घाटन की तस्वीरें, एक विधायक की मौजूदगी और टाइगर रोड नाम से बने गेट की तस्वीरें भी सामने आई थीं. याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि इस सड़क का इस्तेमाल गुप्त आवाजाही के लिए किया जा सकता है. इसके जरिए अवैध ड्रग्स, तस्करी, छोटे हथियार, गोला-बारूद और अवैध प्रवासियों की आवाजाही की आशंका जताई गई है. एनजीटी ने इन सभी बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए मामले की विस्तृत जांच के आदेश दिए हैं. फिलहाल, एनजीटी के आदेश के बाद सड़क निर्माण पर रोक लगा दी गई है और राज्य सरकार से इस पूरे मामले पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है. 

यमुना में घटती जैव विविधता पर गंभीर सुनवाई, NGT ने आदेश रखा रिज़र्व

यमुना  राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने यमुना नदी में स्वदेशी प्रजाति की मछलियों की तादाद में तेज गिरावट और विदेशी मछलियों के बढ़ते प्रभुत्व से संबंधित एक स्वतः संज्ञान मामले में अपना आदेश सुरक्षित रखा है। सभी पक्षों की अंतिम दलीलें सुनने के बाद अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डा. ए. सेंथिल वेल की पीठ ने मामले को आदेश के लिए सुरक्षित रखा।  यह स्वतः संज्ञान मामला मई 2024 की एक समाचार रिपोर्ट से सामने आया। एक वैज्ञानिक सर्वेक्षण में यमुना में मछलियों की 126 प्रजातियों की मौजूदगी को दर्ज किया गया है। लेकिन यह स्वदेशी मछलियों की प्रजातियों में गिरावट और विदेशी मछलियों में वृद्धि को दर्शाता है।  प्रयागराज ने अपने सर्वेक्षण में पाया कि प्रदूषण, नदी के प्रवाह में परिवर्तन और आवासीय क्षति ने मछली की विविधता पर गंभीर प्रभाव डाला है। जबकि यमुना के पूरे विस्तार क्षेत्र में मछलियों की कुल 126 प्रजातियों का घर है। दिल्ली के आइटीओ में सबसे कम प्रजातियों की विविधता दर्ज की गई, जिसे "सबसे प्रदूषित" स्थल के रूप में वर्णित किया, जहां घुलनशील लगभग शून्य या पहचानने योग्य स्तर से नीचे थे। अध्ययन में प्रतीकात्मक स्वदेशी प्रजातियों में महत्वपूर्ण गिरावट दिखाई गई।

पंजाब के पानी पर NGT की कड़ी नजर, जारी किए सख्त दिशा-निर्देश

पंजाब  नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने पंजाब सरकार को राज्य के जल स्रोतों में हो रहे प्रदूषण को लेकर जिला-वार, verifiable data की विस्तृत जानकारी देने के निर्देश दिए हैं। ट्रिब्यूनल ने कहा कि जमीनी हकीकत और सुधारात्मक उपायों की प्रभावशीलता का आकलन करने के लिए सूक्ष्म और ठोस आंकड़े बेहद जरूरी हैं। यह निर्देश जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए. सेंथिल वेल की पीठ ने सुओ मोटो मामले में जारी किए। पीठ ने 15 दिसंबर को पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PPCB) द्वारा दाखिल की गई स्थिति रिपोर्ट की समीक्षा की। रिपोर्ट के अनुसार, पूरे पंजाब में कुल 1,511 प्रदूषण स्रोतों की पहचान की गई है। इनमें से 692 स्रोतों (करीब 45.79 प्रतिशत) को बंद या हटाया जा चुका है, जबकि 819 स्रोतों पर अब भी कार्रवाई लंबित है। रिपोर्ट में औद्योगिक इकाइयों, डेयरी अपशिष्ट, नगर निगम के सीवेज, गांवों के गंदे पानी के निकास और अन्य व्यक्तिगत प्रदूषण स्रोतों के खिलाफ की गई कार्रवाई का विवरण दिया गया है। इसके अलावा तालाबों के नवीनीकरण, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) और इन-सिटू रेमेडिएशन सिस्टम लगाने की समय-सीमा भी बताई गई है, जो फंड की उपलब्धता के आधार पर वर्ष 2028 तक निर्धारित की गई है। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने कहा कि मौजूदा रिपोर्ट से जमीनी हालात की पूरी तस्वीर साफ नहीं होती। इसलिए PPCB को निर्देश दिए गए हैं कि वह एक व्यापक, जिला-वार और तालिकाबद्ध रिपोर्ट दाखिल करे। इस रिपोर्ट में हर जल स्रोत का नाम, क्षेत्रफल, जियो-कोऑर्डिनेट्स, प्रदूषण के पहचाने गए स्रोत, अब तक बंद किए गए स्रोत, शेष स्रोतों को बंद करने की कार्ययोजना व समय-सीमा, और वर्तमान जल गुणवत्ता की स्थिति शामिल होनी चाहिए। PPCB ने संशोधित रिपोर्ट दाखिल करने के लिए आठ सप्ताह का समय मांगा, जिसे ट्रिब्यूनल ने मंजूर कर लिया है। इस मामले की अगली सुनवाई 18 मार्च 2026 को होगी। 

NGT ने लगाया ब्रेक: भोपाल अयोध्या बायपास पर अब नहीं कटेंगे पेड़

भोपाल राजधानी भोपाल के अयोध्या बायपास चौड़ीकरण के लिए हरे पेड़ों की कटाई के खिलाफ दायर एक याचिका की सुनवाई करते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल( NGT) ने बुधवार को पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी है.   बायपास चौड़ीकरण के लिए कुल 8 हजार पेड़ों को काटा जाना था. रोक के बाद प्रोजेक्ट में खटाई खटाई में पड़ सकता है..  मंगलवार 23 दिसम्बर से इन पेड़ों की कटाई शुरू कर दी गई थी, लेकिन इसके अगले ही दिन यानी आज 24 दिसम्बर बुधवार को एनजीटी ने पेड़ों की कटाई पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है. हालांकि एनजीटी के आदेश में कहा गया है कि सिर्फ पेड़ कटाई पर रोक लगाई गई है, लेकिन संबंधित एजेंसी सड़क निर्माण का कार्य जारी रख सकता है. इसके लिए पेड़ों के साथ छेड़छाड़ न की जाए. इसलिए लगाई कटाई में रोक भोपाल में 10 लेन सड़क के लिए पेड़ों की कटाई पर रोक लगाने के लिए एनजीटी में याचिका लगाने वाले नितिन सक्सेना ने बताया कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण  (एनएचएआई) द्वारा सड़क निर्माण के लिए पेड़ों की कटाई तो शुरू कर दी गई, लेकिन इसके लिए तय मानकों का पालन नहीं किया गया. शहर में इसके पहले भी बीआरटीएस, स्मार्ट सिटी, कोलार सिक्सलेन और मेट्रो समेत अन्य प्रोजेक्ट के लिए लाखों पेड़ों की बलि चढ़ चुकी है. संबंधित निर्माण एजेंसियों ने भी पेड़ कटने के बाद उसकी भरपाई के लिए पौधारोपण का दावा किया था, लेकिन हकीकत सबके सामने है. 8 जनवरी तक रोक याचिकाकर्ता के वकील हरप्रीत सिंह गुप्ता ने बताया कि पूर्व में दिए गए एनजीटी के आदेश के अनुसार वृक्षों की कटाई की वैकल्पिक योजना पर विचार करने के लिए कोई केंद्रीय रूप से सशक्त समिति गठित नहीं की गई है, जिससे कम संख्या में वृक्षों की कटाई आवश्यक हो सके. न ही काटे गए वृक्षों की क्षतिपूर्ति और रोपित वृक्षों के 5 वर्ष तक जीवित रहने के लिए इस न्यायाधिकरण द्वारा निर्देशित विधि के अनुसार क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण के संबंध में कोई निर्णय लिया गया है. अयोध्या बायपास क्षेत्र में बड़ी संख्या में हरे-भरे पेड़ों को सॉ कटर से काटा गया था. स्थानीय लोगों ने कहा कि यह क्षेत्र शहर के लिए ग्रीन लंग की तरह काम करता था. अयोध्या बायपास प्रोजेक्ट से जुड़ा मामला पहले से ही एनजीटी में विचाराधीन था. इसके बावजूद इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई को मंजूरी देना कई सवाल खड़े करता है. नियमों के मुताबिक, एनजीटी में मामला लंबित होने की स्थिति में किसी भी तरह की बड़ी पर्यावरणीय गतिविधि पर रोक लगनी चाहिए. इतनी जल्दी कैसे मिली अनुमति? सूत्रों के अनुसार, 12 दिसंबर को स्टेट इम्पावरमेंट कमेटी की बैठक हुई और उसी दिन या बेहद कम समय में एनएचएआई को 7,881 पेड़ काटने की हरी झंडी दे दी गई. पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर अनुमति देने से पहले विस्तृत पर्यावरणीय आकलन और जनसुनवाई जरूरी होती है. खटाई में पड़ सकता है 16 किलोमीटर लंबा 10 लेन वाला प्रोजेक्ट  गौरतलब है एनजीटी द्वारा हरे पेड़ों की कटाई पर रोक लगाने से करीब 16 किलोमीटर लंबे 10 लेन वाला अयोध्या बायपास चौड़ीकरण प्रोजेक्ट खटाई में पड़ सकता है. हालांकि बिना हरे पेड़ों के काटे सड़क चौड़ीकरण का काम बदस्तूर जारी रहेगा. हालांकि एनजीटी ने सुनवाई के दौरान बड़े ही सख्त अंदाज में कहा है कि, नियम पहले, प्रोजेक्ट बाद में होता रहेगा.  हरे पेड़ों की कटाई ने वृक्ष संरक्षण कानून पर उठा दिए सवाल रिपोर्ट के मुताबिक अयोध्या बाइपास चौड़ीकरण के लिए प्रस्तावित 8000 हरे पेड़ों की कटाई के फैसले ने वृक्ष संरक्षण कानून पर भी सवाल उठा दिए हैं. बायपास चौड़ीकरण के लिए 8000 हरे पेड़ों की कटाई पर रोक लगाते हुए एनजीटी में अपनी टिप्पणी में प्रतिपूरक वनीकरण पर भी सरकार से जवाब मांगा और कहा है कि विकल्पों पर भी विचार जरूरी है.  रोक के बावजूद बिना पेड़ काटे चलता रहेगा सड़क का काम NGT ने बायपास चौड़ीकरण के लिए हरे पेड़ों की कटाई पर रोक लगाते हुए कहा कि अगली सुनवाई तक एक भी पेड़ नहीं कटेगा. इससे 16 किमी लंबे 10 लेन वाला बड़ा प्रोजेक्ट सवालों के घेरे में आ गया है. एनजीटी के आदेश को मोहन सरकार के लिए एक झटके के रूप में देखा जा रहा है.  प्रतिपूरक वृक्षारोपण पर सवाल एनएचएआई की ओर से दावा किया गया है कि पेड़ों की कटाई के बदले प्रतिपूरक वृक्षारोपण किया जाएगा. लेकिन सवाल यह है कि क्या नए लगाए जाने वाले पौधे उसी क्षेत्र में, उसी संख्या और उसी जैव विविधता के होंगे? अनुभव बताता है कि कागजों में दिखाया गया वृक्षारोपण ज़मीनी हकीकत में अक्सर नजर नहीं आता. हाईकोर्ट और नियमों का हवाला पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि इससे पहले भी हाईकोर्ट और एनजीटी कई मामलों में साफ कर चुके हैं कि विकास कार्यों के नाम पर अंधाधुंध पेड़ काटना स्वीकार्य नहीं है. सड़क चौड़ीकरण के विकल्प तलाशे जाने चाहिए थे, लेकिन सबसे आसान रास्ता हरियाली खत्म करना चुना गया.