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मध्यप्रदेश में पेड़ों की कटाई पर सख्ती, हर प्रोजेक्ट में 80% पेड़ों का ट्रांसलोकेशन जरूरी; नई नीति लागू

भोपाल मध्य प्रदेश सरकार ने पर्यावरण संरक्षण और बुनियादी ढांचे के विकास के बीच संतुलन बनाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने मंगलवार को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के समक्ष 'ट्री ट्रांसलोकेशन पॉलिसी-2026' का ड्राफ्ट पेश किया। इस नीति का मुख्य उद्देश्य विकास परियोजनाओं (जैसे रोड, मेट्रो, फ्लाईओवर) के नाम पर होने वाली अंधाधुंध पेड़ों की कटाई को रोकना और वयस्क पेड़ों को वैज्ञानिक तरीके से सुरक्षित दूसरी जगह शिफ्ट करने को प्राथमिकता देना है। '20-फॉर-1' का कड़ा और नया नियम इस प्रस्तावित नीति की सबसे बड़ी खासियत इसका '20-फॉर-1' वृक्षारोपण फॉर्मूला है। अगर किसी बेहद अपरिहार्य स्थिति में एक पेड़ को काटना पड़ता है, तो संबंधित निर्माण एजेंसी को उसके बदले 20 नए पौधे लगाने होंगे। नियमों के मुताबिक, इनमें से 10 पौधे सीधे तौर पर कटे हुए पेड़ के मुआवजे के रूप में होंगे, जबकि शेष 10 पौधे इसलिए लगाए जाएंगे ताकि ट्रांसप्लांटेशन के दौरान जिन वयस्क पेड़ों की जान नहीं बच पाती, उनके नुकसान की भरपाई की जा सके। ग्वालियर के थाटीपुर मामले से लिया सबक दरअसल, यह पूरी कवायद ग्वालियर के थटीपुर पुनर्विकास योजना के दौरान सामने आई लापरवाही के बाद शुरू हुई है। वहां बड़ी संख्या में शिफ्ट किए गए पेड़ देखरेख के अभाव में मर गए थे, जिस पर हाई कोर्ट ने कड़ा संज्ञान लेते हुए सरकार से एक व्यापक नीति मांगी थी। अब नए नियमों के तहत प्रोजेक्ट डिजाइन में बदलाव करके पहले पेड़ बचाने की कोशिश करनी होगी। पेड़ काटना केवल अंतिम विकल्प होगा। ऑनलाइन डैशबोर्ड से जनता करेगी निगरानी भ्रष्टाचार और कागजी दावों को रोकने के लिए सरकार ने इस बार तकनीक का सहारा लिया है। नीति के अनुसार, सभी ट्रांसप्लांट किए गए पेड़ों और नए रोपे गए पौधों की अनिवार्य रूप से जियो-टैगिंग की जाएगी। इसके लिए एक सार्वजनिक ऑनलाइन डैशबोर्ड बनाया जाएगा। इस डैशबोर्ड पर पेड़ों की सटीक लोकेशन, उनकी तस्वीरें और रखरखाव का पूरा रिकॉर्ड रीयल-टाइम में अपडेट होगा, जिससे आम नागरिक भी इसकी सीधे निगरानी कर सकेंगे।  

विकास और पर्यावरण में संतुलन की पहल, नई पॉलिसी के तहत पेड़ों की कटाई पर कड़े नियम

ग्वालियर मध्यप्रदेश सरकार ने विकास परियोजनाओं के दौरान पेड़ों की कटाई को कम करने के उद्देश्य से 'ट्री ट्रांसलोकेशन पॉलिसी-2026' का मसौदा तैयार किया है।  यह ड्राफ्ट हाई कोर्ट की डबल बेंच के समक्ष पेश किया गया। प्रस्तावित नीति के तहत सड़क, मेट्रो, रेलवे और फ्लाईओवर जैसी परियोजनाओं में पेड़ों को काटने के बजाय वैज्ञानिक तरीके से दूसरी जगह प्रत्यारोपित करने पर जोर दिया गया है। थाटीपुर पुनर्विकास परियोजना के बाद बनी नीति सरकारी सूत्रों के अनुसार, ग्वालियर के थाटीपुर पुनर्विकास परियोजना के दौरान बड़ी संख्या में पेड़ों का प्रत्यारोपण किया गया था। बाद में पर्याप्त देखरेख नहीं होने से कई पेड़ नष्ट हो गए। इस मामले में हाई कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए सरकार से स्पष्ट नीति बनाने को कहा था। हाई कोर्ट के निर्देश के बाद तैयार हुआ ड्राफ्ट न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिए थे कि पेड़ों के प्रत्यारोपण और कटाई से संबंधित कार्य वैज्ञानिक मानकों और स्पष्ट नीति के आधार पर किए जाएं। इसके बाद राज्य सरकार ने ट्री ट्रांसलोकेशन पॉलिसी का मसौदा तैयार किया। पेड़ काटना नहीं होगा पहला विकल्प प्रस्तावित नीति के अनुसार किसी भी निर्माण एजेंसी को यह साबित करना होगा कि परियोजना के डिजाइन में बदलाव कर पेड़ों को बचाने के सभी विकल्पों पर विचार किया गया है। यदि पेड़ों को हटाना अपरिहार्य हो, तो प्रभावित पेड़ों में से कम से कम 80 प्रतिशत का वैज्ञानिक तरीके से प्रत्यारोपण करना होगा। जियो-टैगिंग और ऑनलाइन मॉनिटरिंग नीति में प्रत्यारोपित पेड़ों और उनके स्थान पर लगाए जाने वाले नए पौधों की जियो-टैगिंग का प्रावधान किया गया है। इसके लिए एक केंद्रीकृत ऑनलाइन डैशबोर्ड विकसित किया जाएगा। डैशबोर्ड पर पेड़ों की लोकेशन, तस्वीरें और रखरखाव से जुड़ी जानकारी उपलब्ध रहेगी, जिससे निगरानी और पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सकेगी। नए पौधे लगाने की भी व्यवस्था ड्राफ्ट के अनुसार प्रत्यारोपित किए गए प्रत्येक पेड़ के बदले निर्धारित संख्या में नए पौधे लगाने होंगे। इन पौधों की निगरानी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से की जाएगी।

300 साल पुराना पेड़, 8 एकड़ में फैला विस्तार… पंजाब की इस अनोखी धरोहर के आगे किसान भी छोड़ देते हैं हक

फतेहगढ़ साहिब फतेहगढ़ साहिब के छोटे से गांव चोलटी खेड़ी में स्थित लगभग 300 वर्ष पुरानी विशाल बरोटी (बरगद का पेड़) आज भी प्रकृति, आस्था और पर्यावरण संरक्षण की अनोखी मिसाल बना हुआ है। करीब आठ एकड़ क्षेत्र में फैला यह विशाल वृक्ष पंजाब का सबसे बड़ा पेड़ माना जाता है। इसकी फैली शाखाएं और जमीन में उतरती नई जड़ें इसे छोटे जंगल का रूप देती हैं।  गांव के लोगों के अनुसार यह बरोटी हर दिन और फैलती जा रही है। इसकी जड़ें लगातार धरती में आगे बढ़ रही हैं और जहां तक यह फैलती हैं, वहां किसान अपनी जमीन पर ट्रैक्टर और हल चलाना छोड़ देते हैं। गांव वाले उस हिस्से को खाली छोड़कर पेड़ को आगे बढ़ने देते हैं। गांव के लोग इसे “बाबा जी के अंग-पैर” मानते हैं और इसकी एक टहनी तक तोड़ने से डरते हैं। लोगों का विश्वास है कि यह बरोटी मनोकामनाएं पूरी करती है और जो व्यक्ति इसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है, उसे भारी हानि उठानी पड़ती है।  गांव की बुजुर्ग महिलाओं और किसानों ने बताया कि वर्षों पहले कुछ लोगों ने इस बरोटी को काटने का प्रयास किया था, लेकिन बाद में उनके साथ दुर्घटनाएं हुईं और कई लोगों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। इसी कारण आज भी कोई व्यक्ति इसकी टहनी काटने या पत्ता तोड़ने की हिम्मत नहीं करता।   साधु और “भभूति” से जुड़ी है बरोटी की कथा  गांव में प्रचलित मान्यता के अनुसार कई दशक पहले एक साधु यहां खेतों में आकर ठहरे थे। उस समय एक किसान दंपती निसंतान था। साधु ने किसान की पत्नी को भभूति दी और आशीर्वाद दिया, लेकिन किसान ने उस पर विश्वास नहीं किया और वह भभूति साधुओं की धूनी में डाल दी गई। गांव वालों के अनुसार कुछ समय बाद उसी स्थान पर एक छोटा पौधा उग आया, जो धीरे-धीरे विशाल बरोटी में बदल गया। लोगों का कहना है कि जिस तरह किसान का परिवार बढ़ा, उसी तरह यह बरोटी भी लगातार फैलती चली गई। आज भी गांव के लोग इस कथा को श्रद्धा के साथ सुनाते हैं और बरोटी को चमत्कारी मानते हैं।  किसान छोड़ देते हैं जमीन  गांव वालों के अनुसार बरोटी की जड़ें और शाखाएं लगातार खेतों तक फैलती जा रही हैं। जिस खेत तक इसकी जड़ें पहुंचती हैं, वहां किसान ट्रैक्टर और हल चलाना बंद कर देते हैं। कई किसानों ने अपनी जमीन का हिस्सा पेड़ के लिए छोड़ दिया है, ताकि बरोटी बिना रोक-टोक आगे बढ़ सके।    “यह पेड़ नहीं पूरा जंगल है”  करीब आठ एकड़ में पहले इस पेड़ को लोग प्यार से बरोटी कहते हैं। जिसकी शाखाएं जमीन तक झुककर नई जड़ें बना लेती हैं। यही जड़ें आगे चलकर नए तनों का रूप लेती हैं और पेड़ लगातार फैलता जाता है। दूर से देखने पर यह किसी घने जंगल जैसा दिखाई देता है।  पक्षियों और जीव-जंतुओं का सुरक्षित आश्रय बरोटी के भीतर सैकड़ों पक्षी, मोर और अन्य जीव-जंतु रहते हैं। गांव वालों का कहना है कि गर्मियों में भी यहां ठंडक बनी रहती है। पर्यावरण प्रेमियों के लिए यह स्थान किसी प्राकृतिक धरोहर से कम नहीं है।  “विकास” के दौर में पर्यावरण बचाने की मिसाल  जहां एक ओर विकास के नाम पर बड़ी संख्या में पेड़ काटे जा रहे हैं, वहीं चोलटी खेड़ी की यह बरोटी लोगों को प्रकृति बचाने का संदेश दे रही है। गांव वालों का कहना है कि पंजाब में ऐसे और अधिक प्राकृतिक क्षेत्र और जंगल होने चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ वातावरण मिल सके।  विदेशी शोधकर्ताओं ने भी किया अध्ययन  गांव के निवासी डॉ. मोहनलाल के अनुसार करीब चार वर्ष पहले पेरिस से एक विशेष टीम यहां पहुंची थी। उनके साथ मुंबई और चंडीगढ़ के कई शोधकर्ता भी आए थे। टीम ने इस विशाल बरोटी का इतिहास तैयार किया और इस पर शोध कार्य भी किया। डॉ. मोहनलाल ने बताया कि पंजाब सरकार का जंगलात विभाग भी समय-समय पर इस वृक्ष का निरीक्षण करता है। विभाग की ओर से इसकी जड़ों में दवाई डाली जाती है ताकि दीमक या अन्य बीमारी से पेड़ को नुकसान न पहुंचे।    25 साल पहले बनवाया गया था मंदिर  डॉ. मोहनलाल ने बताया कि करीब 25 वर्ष पहले फतेहगढ़ साहिब के तत्कालीन एडिशनल डिप्टी कमिश्नर दविंदर वालिया द्वारा यहां एक मंदिर का निर्माण करवाया गया था। उन्होंने बताया कि बरोटी के नीचे बना प्राचीन शिव मंदिर आज भी लोगों की आस्था का बड़ा केंद्र है, जहां साधु-संत निवास करते हैं।  झुकी शाखा फिर खुद खड़ी हो गई  डॉ. मोहनलाल के अनुसार करीब दो वर्ष पहले बरोटी का एक बड़ा हिस्सा झुक गया था। लोगों को लगा कि अब यह हिस्सा सूख जाएगा, लेकिन कुछ समय बाद वहीं से नई मजबूती के साथ वह दोबारा खड़ा हो गया। गांव के लोग इसे चमत्कार के रूप में देखते हैं।  हर साल लगता है विशाल भंडारा  हर वर्ष अगस्त महीने में यहां विशाल भंडारा आयोजित किया जाता है। दूर-दूर से लोग अपनी मन्नतें लेकर यहां पहुंचते हैं और बरोटी के नीचे बने शिव मंदिर में माथा टेकते हैं। भंडारे में दाल, रोटी, सब्जी, जलेबी और अन्य मिष्ठान वितरित किए जाते हैं। गांव वालों के अनुसार इस दौरान हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।   बुजुर्ग महिला ने सुनाई मान्यता गांव की एक बुजुर्ग महिला ने बताया कि कई साल पहले एक व्यक्ति बरोटी की शाखा काटने के लिए हथियार लेकर आया था। उन्होंने उसे रोकते हुए कहा था कि यह “बाबा जी के अंग-पैर” हैं और इन्हें नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए। महिला के अनुसार उस व्यक्ति ने उनकी बात नहीं मानी और बाद में उसका दुर्घटना में बड़ा नुकसान हो गया। महिला ने बताया कि आज भी आसपास के गांवों से लोग यहां श्रद्धा के साथ आते हैं और इस बरोटी को प्रणाम करते हैं।  प्रकृति और आस्था का अद्भुत संगम  चोलटी खेड़ी की यह बरोटी केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की जीवंत मिसाल भी है। जिस समय दुनिया पेड़ों को बचाने की मुहिम चला रही है, उस समय पंजाब के इस छोटे से गांव के लोग पीढ़ियों से एक विशाल वृक्ष को अपने परिवार की तरह संभाल रहे हैं।  

पर्यावरण संरक्षण को नई दिशा: छत्तीसगढ़ में मियावाकी तकनीक से तेजी से विकसित हो रहे वन

मियावकी वन तकनीक से हरित छत्तीसगढ़ की ओर बढ़ते कदम कम समय में घने जंगल तैयार कर पर्यावरण संरक्षण को मिल रही नई दिशा  रायपुर              वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए मियावाकी तकनीक एक बेहद प्रभावी और लोकप्रिय विधि बन गई है। जापानी वनस्पतिशास्त्री डॉ. अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित यह तकनीक केवल 2-3 वर्षों में बंजर भूमि को घने, आत्मनिर्भर सूक्ष्म वनों में बदल देती है। पारंपरिक वृक्षारोपण की तुलना में यह विधि 10 गुना तेजी से बढ़ती है और 30 गुना अधिक घने जंगल बनाती है, जो शहरी क्षेत्रों के लिए आदर्श है।          छत्तीसगढ़ में पर्यावरण संरक्षण और वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए मियावकी वन तकनीक तेजी से अपनाई जा रही है। राज्य में वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग तथा छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम लिमिटेड द्वारा इस तकनीक के जरिए शहरी क्षेत्रों, औद्योगिक क्षेत्रों और खनन प्रभावित इलाकों में बड़े पैमाने पर हरियाली विकसित की जा रही है। मियावकी पद्धति में स्थानीय प्रजातियों के पौधों को अधिक घनत्व में लगाया जाता है, जिससे मात्र 3 से 5 वर्षों में घना जंगल तैयार हो जाता है। राज्य में तेजी से बढ़ रहा सघन वनीकरण        छत्तीसगढ़ में वर्ष 2022 से मियावकी पद्धति के तहत लगातार वृक्षारोपण किया जा रहा है। वर्ष 2022 में कोटा मण्डल में एनटीपीसी लिमिटेड के सहयोग से 1 हेक्टेयर क्षेत्र में 23 हजार पौधे तथा 0.3 हेक्टेयर में 7 हजार पौधे लगाए गए। वर्ष 2023 में कोटा के भिल्मी क्षेत्र में 6.4 हेक्टेयर भूमि पर 64 हजार पौधों का रोपण किया गया। वहीं गेवरा क्षेत्र में 2 हेक्टेयर भूमि पर 20 हजार पौधे लगाए गए। वर्ष 2024 में कोटा के उच्चभट्टी क्षेत्र में 3.2 हेक्टेयर में 32 हजार पौधे लगाए गए। इसके अलावा रायगढ़ मण्डल के तिलईपाली और छाल क्षेत्रों में कुल 3.75 हेक्टेयर भूमि पर 37 हजार 500 पौधों का सफल रोपण किया गया। वर्ष 2025 में कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं जारी           वर्तमान में राज्य के कई क्षेत्रों में वृक्षारोपण कार्य तेजी से जारी है। बारनवापारा मण्डल में ‘हरियर छत्तीसगढ़’ योजना के तहत 6 हजार पौधे लगाए जा रहे हैं। कोरबा और रायगढ़ क्षेत्रों में साउथ इस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड के सहयोग से 4 हेक्टेयर क्षेत्र में 40 हजार पौधों का रोपण किया जा रहा है। वहीं विशेष परियोजनाओं के अंतर्गत महानदीकोलफील्ड लिमिटेड द्वारा 1.9 हेक्टेयर भूमि पर 64 हजार पौधे लगाए जा रहे हैं। इसके साथ ही अरपा नदी के किनारे भी बड़े पैमाने पर पौधारोपण कर हरित क्षेत्र का विस्तार किया जा रहा है। पर्यावरण संरक्षण में मिल रहे बहुआयामी लाभ          विशेषज्ञों के अनुसार मियावकी वन सामान्य जंगलों की तुलना में अधिक कार्बन अवशोषित करते हैं। इससे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में मदद मिलती है। यह तकनीक वायु और ध्वनि प्रदूषण को कम करने, भू-जल स्तर सुधारने और मिट्टी संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इन वनों की शुरुआती वर्षों में देखभाल की जाती है, जिसके बाद ये जंगल स्वतः विकसित होने लगते हैं। इससे रखरखाव की लागत कम होती है और लंबे समय तक पर्यावरणीय लाभ मिलता है।  बंजर डंप क्षेत्र से हरित जंगल बनने की ओर गेवरा की प्रेरक पहल           छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम लिमिटेड ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक अनूठी पहल करते हुए कोरबा जिले के गेवरा क्षेत्र के 12.45 हेक्टेयर डंप क्षेत्र में 33 हजार 935 मिश्रित प्रजातियों के पौधों का सफल रोपण किया है। वन मंत्री केदार कश्यप ने इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि राज्य सरकार पर्यावरण संरक्षण और हरित क्षेत्र बढ़ाने के लिए लगातार प्रभावी कदम उठा रही है। जहां हरियाली संभव नहीं थी, वहां तैयार हो रहा जंगल         कोयला खनन के बाद डंप क्षेत्रों में उपजाऊ मिट्टी नीचे दब जाती है और ऊपर पत्थर, कोयला अवशेष तथा अनुपजाऊ मिट्टी रह जाती है। ऐसे क्षेत्रों में पौधों का उगना बेहद कठिन माना जाता है। लेकिन वैज्ञानिक पद्धति और सतत प्रयासों से इस बंजर भूमि को अब हरियाली में बदला जा रहा है। वैज्ञानिक तरीके से किया गया पौधारोपण          डंप क्षेत्र की कठिन परिस्थितियों को देखते हुए मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए वर्मी कम्पोस्ट, नीमखली और डीएपी का उपयोग किया गया। जीपीएस सर्वे और सीमांकन के बाद व्यवस्थित गड्ढे तैयार किए गए तथा 3 से 4 फीट ऊंचाई वाले स्वस्थ पौधों का रोपण किया गया। इस क्षेत्र में नीम, शीशम, सिरस, कचनार, करंज, आंवला, बांस, महोगनी, महुआ और बेल जैसी विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं। इससे आने वाले समय में यह क्षेत्र पक्षियों और अन्य वन्य जीवों के लिए भी उपयुक्त आवास बन सकेगा। निरंतर देखभाल से मिल रही सफलता         शुरुआती 2-3 वर्षों की देखभाल के बाद, यह वन पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो जाता है और इसे किसी उर्वरक या पानी की आवश्यकता नहीं होती है। रोपण के बाद पौधों की नियमित सिंचाई, खाद, निंदाई-गुड़ाई, घास कटाई और सुरक्षा का कार्य लगातार किया जा रहा है। मृत पौधों का समय पर प्रतिस्थापन भी सुनिश्चित किया जा रहा है। वर्ष 2025 से 2029 तक पांच वर्षों तक रखरखाव के बाद इस विकसित हरित क्षेत्र को साउथ इस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड गेवरा को सौंपा जाएगा। हरित भविष्य की ओर मजबूत पहल        कम जगह में घने जंगल बनाकर शहरों में प्रदूषण (धूल और ध्वनि) को कम करने में सहायक होते हैं। ये वन पारंपरिक वनों की तुलना में 30 गुना अधिक कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करते हैं। गेवरा की यह पहल दर्शाती है कि सही योजना, वैज्ञानिक तकनीक और निरंतर प्रयासों से बंजर और पत्थरीली भूमि को भी घने जंगल में बदला जा सकता है। आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र सघन हरित वन और जैव विविधता से भरपूर मानव निर्मित जंगल के रूप में विकसित होगा, जो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में प्रेरणादायक उदाहरण बनेगा।    धनंजय राठौर                             संयुक्त संचालक                         अशोक कुमार चंद्रवंशी                       सहायक जनसंपर्क … Read more

हिमालय के जंगलों में गिरावट, सरकारी रिपोर्ट ने किया खुलासा- 2 साल में 2.2% ग्रीन कवर गायब

 नई दिल्ली भारतीय हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण को लेकर एक परेशान करने वाली रिपोर्ट सामने आई है. केंद्रीय मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने राज्यसभा में जानकारी दी है कि साल 2021 से 2023 के बीच हिमालयी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 'ट्री कवर' में 2.27 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। शुक्रवार को राज्यसभा में एक सवाल का लिखित जवाब देते हुए मंत्री ने 'इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट' (ISFR) 2023 के आंकड़े पेश किए. रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 में ट्री कवर 15,427.11 वर्ग किलोमीटर था, जो कि 2023 में घटकर 15,075.5 वर्ग किलोमीटर रह गया। ये आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ दो सालों में हिमालय की हरियाली में बड़ी कमी आई है. इस क्षेत्र में जम्मू और कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और उत्तर-पूर्वी राज्यों सहित कुल 13 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं। कार्बन स्टॉक में मामूली बढ़ोतरी एक तरफ जहां पेड़ों की संख्या कम हुई है, वहीं जंगलों में मौजूद कुल कार्बन स्टॉक में बहुत मामूली बढ़ोतरी देखी गई है. 2021 में ये 3,272.68 मिलियन टन था, जो 2023 में बढ़कर 3,273.10 मिलियन टन हो गया है. कार्बन स्टॉक का बढ़ना पर्यावरण के लिए अच्छा संकेत माना जाता है क्योंकि ये वातावरण से कार्बन सोखने की क्षमता को दिखाता है। जंगलों की स्थिति पर बात करते हुए मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने कहा, 'जंगलों का स्वास्थ्य सिर्फ उनकी हरियाली से नहीं मापा जाता. ये कई इकोलॉजिकल और बायोफिजिकल स्टैंडर्ड्स पर निर्भर करता है। भारतीय वन सर्वेक्षण क्यों करता है जंगलों की स्टडी? भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) जंगलों की सेहत जांचने के लिए कई तरह के आंकड़े जुटाता है. इसमें मिट्टी की गहराई, मिट्टी का कटाव, वनस्पति की विशेषताएं और जंगलों को होने वाले खतरों की स्टडी की जाती है. ये सभी कारक मिलकर ये तय करते हैं कि किसी खास समय में जंगलों की स्थिति क्या है। हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण में हो रहे ये बदलाव विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय हैं, क्योंकि ये क्षेत्र न सिर्फ जैव विविधता बल्कि भारत की प्रमुख नदियों का भी स्रोत है।  

पन्ना में सदियों पुराने पेड़ मिले, बरगद, पीपल और नीम सहित 100+ साल के वृक्षों का रिकॉर्ड तैयार

पन्ना   दक्षिण पन्ना वनमण्डल में 100 वर्ष से अधिक आयु के प्राचीन वृक्षों की पहचान एवं संरक्षण के उद्देश्य से "हेरिटेज ट्री आइडेंटिफिकेशन" अभियान संचालित किया जा रहा है. इस पहल के अंतर्गत वनकर्मी अपने-अपने क्षेत्रों में भ्रमण कर पुराने वृक्षों की जानकारी एकत्रित कर रहे हैं. उनके फोटो और विवरण संकलित किए जा रहे हैं तथा ग्रामीणों से संवाद कर वृक्षों से जुड़ी ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक जानकारियां भी संजोई जा रही है. अभियान का मुख्य उद्देश्य जैव विविधता संरक्षण के साथ क्षेत्र की प्राकृतिक विरासत को पहचान देना है. बरगद, पीपल, नीम सहित कई 100 वर्ष पेड़ों का दस्तावेजीकरण अभियान के तहत विभिन्न रेंजों में वन अमले द्वारा निरंतर सर्वे कार्य किया जा रहा है. रैपुरा रेंज में डिप्टी रेंजर रंजना नागर, मोहन्द्रा रेंज में वनरक्षक जगदीश प्रसाद अहिरवार, पवई रेंज में वनरक्षक सत्येंद्र सिंह भदौरिया, शाहनगर रेंज में वनरक्षक प्रेमनारायण वर्मा तथा सलेहा रेंज में वनरक्षक उमाशंकर पाल द्वारा अब तक सराहनीय प्रयास किए गए हैं. अनेक ग्रामों में बरगद, पीपल, नीम, आम, इमली और अन्य प्रजातियों के 100 से 200 वर्ष तक एवं अधिक पुराने वृक्षों की पहचान कर उनका दस्तावेजीकरण किया जा रहा है. वृक्षों के ऐतिहासिक महत्व, स्थानीय मान्यताओं की जानकारी रैपुरा क्षेत्र में डिप्टी रेंजर रंजना नागर द्वारा ग्रामीण बुजुर्गों से विस्तृत चर्चा कर लगभग 20 ऐसे वृक्षों की जानकारी संकलित की गई, जिनकी आयु 100 से 200 वर्ष तक आंकी जा रही है. वरिष्ठ ग्रामीणों ने बताया कि कई वृक्ष धार्मिक आस्था से जुड़े होने के कारण आज भी सुरक्षित हैं, जिनके नीचे विभिन्न देवस्थलों की स्थापना की गई है. इस संवाद से वृक्षों के ऐतिहासिक महत्व, स्थानीय मान्यताओं तथा संरक्षण की परंपराओं को समझने में भी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई. शाहनगर रेंज में वनरक्षक प्रेमनारायण वर्मा द्वारा गुरझाई क्षेत्र एवं पतने-बघने नदी के पास लगभग 100 से 105 वर्ष पुराने सेमर और आम के वृक्ष चिन्हित किए गए. मोहन्द्रा रेंज में वनरक्षक जगदीश प्रसाद अहिरवार ने हथकुरी, कुंवरपुर और मोहन्द्रा ग्रामों में कई हेरिटेज ट्री की पहचान कर उनके फोटोग्राफ्स संकलित किए. जिनमें अनेक वृक्ष 150 वर्ष से अधिक पुराने पाए गए. पवई रेंज में वनरक्षक सत्येंद्र सिंह भदौरिया द्वारा बरगद, इमली और नीम सहित विभिन्न ग्रामों में 100 से 200 वर्ष तक आयु वाले वृक्षों का दस्तावेजीकरण किया गया. वहीं, सलेहा रेंज में वनरक्षक उमाशंकर पाल ने बुजुर्ग ग्रामीणों से चर्चा कर धार्मिक आस्था से जुड़े लगभग 110 से 120 वर्ष पुराने वृक्षों की जानकारी एकत्रित की. वन मण्डल द्वारा इस अभियान को जनसहभागिता से जोड़ते हुए सभी वन क्षेत्रों में ऐसे प्राचीन वृक्षों की पहचान और संरक्षण के प्रयास तेज किए जा रहे हैं. विभाग का मानना है कि स्थानीय समुदायों की सहभागिता और जागरूकता से न केवल जैव विविधता को संरक्षण मिलेगा, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत भी सुरक्षित रह सकेगी, जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति और परंपरा दोनों का संरक्षण सुनिश्चित होगा.

एमपी नगर में खाद्य भवन के निर्माण के लिए 150 पुराने पेड़ काटे जाएंगे, करेंगे ‘चिपको आंदोलन’

भोपाल  राजधानी भोपाल के एमपी नगर क्षेत्र में प्रस्तावित खाद्य भवन के निर्माण को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। इस परियोजना के तहत करीब 150 पुराने पेड़ों को काटने की तैयारी है, जिनमें पीपल और बरगद जैसे बड़े और छायादार वृक्ष शामिल हैं। इन पेड़ों की उम्र 40 से 50 साल से अधिक बताई जा रही है। पेड़ों की कटाई के विरोध में अब कर्मचारी संगठनों के साथ पर्यावरणविद् भी मैदान में उतर आए हैं। जानकारी के मुताबिक, वेयर हाउसिंग कॉर्पोरेशन द्वारा करीब 64 करोड़ रुपये की लागत से एक नया 6 मंजिला खाद्य भवन बनाने की योजना तैयार की गई है। इस भवन में खाद्य संचालनालय, वेयर हाउसिंग और नाप-तौल विभाग के दफ्तरों को एक ही परिसर में शिफ्ट किया जाना है। सभी सुविधाओं को मिलाकर कुल खर्च 90 से 100 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। यह निर्माण एमपी नगर स्थित नाप-तौल नियंत्रक कार्यालय की लगभग डेढ़ एकड़ जमीन पर प्रस्तावित है। इसी परिसर में टैंक लॉरी कैलिब्रेशन और प्रयोगशालाओं के लिए भी बड़ा क्षेत्र आरक्षित है। पुराने भवन को तोड़कर नया निर्माण किया जाएगा, जिसके चलते परिसर में मौजूद सैकड़ों पेड़ों को हटाया जाना तय माना जा रहा है। नए भवन के लिए टेंडर हो चुके जारी हाल ही में वेयर हाउसिंग द्वारा नए ‎भवन के निर्माण के लिए एजेंसी‎ चुनने टेंडर जारी कर दिए हैं।‎ नाप-तौल नियंत्रक कार्यालय एमपी‎ नगर में जिला उद्योग केंद्र के पास ‎लगभग डेढ़ एकड़ जमीन पर स्थित ‎है। मुख्य भवन के अलावा काफी‎ बड़ा क्षेत्र टैंक लारी कैलिब्रेशन और‎ दूसरी प्रयोगशाला के लिए छोड़ा गया‎ है। इसी जमीन पर पुराने भवन को‎ तोड़कर नया खाद्य भवन बनेगा। जिसके लिए पेड़ों को भी काटा‎ जाएगा। पीपल, बरगद सहित परिसर‎में 40 से 50 साल पुराने लगभग‎ 150 पेड़ हैं।‎ एक विभाग के लिए इतना खर्च ठीक नहीं तिवारी ने बताया कि नागरिक आपूर्ति निगम को छोड़कर सभी विभागीय दफ्तरों के सरकारी भवन‎ हैं। सिर्फ नान के लिए 100 करोड़ रुपए का खर्च ठीक नहीं है। ‎परिसर के 150 पेड़ भी काटे जाएंगे। 3 साल में भवन बनने‎ पर मुख्यालय को लाखों रुपए किराए के देने होंगे। विभाग के‎ सभी स्टाफ गुरुवार से काली पट्टी लगाकर काम करेंगे। वहीं, भोजन‎ अवकाश में विरोध करेंगे। सात साल पहले अपने दफ्तर बाहर भेजे‎ जगह की कमी बताकर 7 साल पहले नाप तौल मुख्यालय से‎ उप नियंत्रक व निरीक्षक कार्यालय 50 लाख खर्च कर जेके ‎रोड क्षेत्र में 5 हजार वर्गफीट के दफ्तर में भेजे थे। कर्मचारियों‎ के मुताबिक यहां स्टाफ के बैठने और जब्त सामान रखने के‎लिए बमुश्किल जगह है। मुख्यालय में टैंक लॉरी कैलिब्रेशन‎ सुविधा बनाने 5 करोड़ की स्वीकृति मांगी जा चुकी है।‎ इस फैसले के खिलाफ मप्र नाप-तौल अधिकारी-कर्मचारी संघर्ष समिति ने मोर्चा खोल दिया है। समिति के अध्यक्ष उमाशंकर तिवारी ने बताया कि गुरुवार को भोजन अवकाश के समय कर्मचारी और पर्यावरण से जुड़े लोग पेड़ों से चिपककर ‘चिपको आंदोलन’ करेंगे। विरोध के प्रतीक स्वरूप कर्मचारी काली पट्टी बांधकर काम करेंगे। कर्मचारियों का कहना है कि नागरिक आपूर्ति निगम (नान) को छोड़ दें तो बाकी सभी विभागों के पास पहले से अपने सरकारी भवन हैं। ऐसे में केवल एक विभाग के लिए 100 करोड़ रुपये खर्च करना और इसके बदले 150 पेड़ों की बलि देना पूरी तरह अनुचित है। साथ ही, नए भवन के निर्माण में करीब तीन साल लगेंगे, इस दौरान मुख्यालय को किराए के भवन में शिफ्ट करना पड़ेगा, जिससे लाखों रुपये अतिरिक्त खर्च होंगे। कर्मचारियों ने यह भी बताया कि करीब सात साल पहले जगह की कमी का हवाला देकर नाप-तौल मुख्यालय से कुछ कार्यालयों को 50 लाख रुपये खर्च कर जेके रोड स्थित किराए के भवन में भेजा गया था, जहां आज भी स्टाफ और जब्त सामग्री के लिए पर्याप्त जगह नहीं है। वहीं, मुख्यालय परिसर में टैंक लॉरी कैलिब्रेशन सुविधा विकसित करने के लिए पहले ही 5 करोड़ रुपये की स्वीकृति मांगी जा चुकी है। अब पेड़ों की कटाई और भारी खर्च को लेकर विरोध तेज होता जा रहा है। पर्यावरणविदों का कहना है कि शहर में पहले ही हरियाली लगातार कम हो रही है, ऐसे में पुराने और बड़े पेड़ों को बचाना प्रशासन की जिम्मेदारी है। आंदोलन को देखते हुए आने वाले दिनों में यह मामला और तूल पकड़ सकता है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पेड़ काटने पर लगाई है रोक पत्रकार गौरव चतुर्वेदीने बताया कि "मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कुछ माह पहले ही आदेश जारी करते हुए पेड़ों की कटाई पर रोक लगाई थी. इसमें यह भी कहा गया था कि हाईकोर्ट के बगैर आदेश के राजधानी भोपाल में एक भी पेड़ नहीं काटा जाएगा. यह रोक हाईकोर्ट ने इसलिए लगाई थी कि भोपाल में ही हजारों पेड़ काटने का मामला सामने आया था. जिसमें कोर्ट ने कहा था कि मध्य प्रदेश में अवैध तरीके से पेड़ों की कटाई बंद होनी चाहिए. कुछ रिपोर्टर्स के अनुसार मध्य प्रदेश में 408 वर्गफीट जंगल कम हुए हैं,जो कि चिंता विषय है."

अयोध्या बायपास के लिए 8 हजार पेड़ों की कटाई पर NGT की रोक, भोपाल की सांसे अब नहीं थमेंगी

भोपाल   विकास बनाम पर्यावरण की जंग में हरियाली की जीत होती दिख रही है. भोपाल के अयोध्या बायपास रोड को 10 लेन बनाने के लिए प्रस्तावित पेड़ों की कटाई पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाया है. एनजीटी ने इस प्रोजेक्ट पर लगी रोक को बरकरार रखा है. इसके साथ ही एनजीटी ने इस मुद्दे को केवल भोपाल तक सीमित न रखते हुए पूरे देश में लागू होने वाली एक समान नीति बनाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया है, जिससे विकास कार्यों की आड़ में पेड़ों का अंधाधुंध सफाया न हो. विकास के साथ पर्यावरण संतुलन जरूरी यह फैसला नितिन सक्सेना बनाम राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) प्रकरण में सुनाया गया. न्यायमूर्ति शिव कुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने कहा कि सड़क, पुल और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए पेड़ों की कटाई को लेकर पूरे देश में एक समान और सख्त नीति होना आवश्यक है. इससे आर्थिक प्रगति और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाया जा सकेगा. इसी के साथ इस प्रकरण को एनजीटी की प्रधान पीठ, नई दिल्ली स्थानांतरित करने के निर्देश भी दिए गए हैं. अयोध्या बायपास रोड के लिए कटने हैं हजारों पेड़ सड़कों के विस्तार और शहरों की बढ़ती जरूरतों के बीच पर्यावरण संरक्षण का सवाल अब राष्ट्रीय स्तर पर भी उठने लगा है. भोपाल के अयोध्या बायपास पर प्रस्तावित 10 लेन सड़क परियोजना के कारण हजारों पेड़ों की कटाई का मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल तक पहुंचा, जहां कटाई पर स्टे बरकरार रखा गया है. एनजीटी ने स्पष्ट किया है कि विकास कार्य जरूरी हैं, लेकिन इसके नाम पर प्रकृति की बलि स्वीकार्य नहीं है. यह पेड़ नहीं भोपाल की सांसें हैं सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ताओं ने दलील दी कि ये पेड़ केवल लकड़ी नहीं, बल्कि भोपाल के नागरिकों की सांसों की सुरक्षा हैं. दूसरी ओर एनएचएआई ने परियोजना की आवश्यकता और समयबद्धता का हवाला दिया. इस बीच यह भी सामने आया कि पहले दिए गए स्थगन आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर अपील को वापस ले लिया गया है. हालांकि, इस दौरान कोई आधिकारिक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए, जिसके बाद एनजीटी ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग अपील का स्टेटस साफ नहीं होता, तब तक ट्रिब्यूनल इस मामले में आगे कोई सुनवाई नहीं करेगा और पहले से कटाई पर लगाई गई रोक बरकरार रहेगी. पूरे देश में मिसाल बनेगा ये फैसला बता दें की एनजीटी ने भोपाल में काटे जाने वाले 8 से 12 हजार पेड़ों को शहर के फेफड़े बताया. आसाराम तिराहा से करोंद होते हुए रत्नागिरी तिराहा तक प्रस्तावित 16 किलोमीटर लंबी सड़क के लिए इतने ही पेड़ों को काटे जाने की योजना थी. एनजीटी ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को भी दोहराया, जिसके तहत किसी भी तरह की कटाई या छंटाई से पहले एनजीटी की समिति की अनुमति अनिवार्य है. शहर के पर्यावरणविदों का मानना है कि इस फैसले के साथ यह स्पष्ट संदेश गया है कि अब देश में विकास की राह हरियाली को कुचलकर नहीं, बल्कि उसे साथ लेकर ही तय होगी.

NGT ने लगाया ब्रेक: भोपाल अयोध्या बायपास पर अब नहीं कटेंगे पेड़

भोपाल राजधानी भोपाल के अयोध्या बायपास चौड़ीकरण के लिए हरे पेड़ों की कटाई के खिलाफ दायर एक याचिका की सुनवाई करते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल( NGT) ने बुधवार को पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी है.   बायपास चौड़ीकरण के लिए कुल 8 हजार पेड़ों को काटा जाना था. रोक के बाद प्रोजेक्ट में खटाई खटाई में पड़ सकता है..  मंगलवार 23 दिसम्बर से इन पेड़ों की कटाई शुरू कर दी गई थी, लेकिन इसके अगले ही दिन यानी आज 24 दिसम्बर बुधवार को एनजीटी ने पेड़ों की कटाई पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है. हालांकि एनजीटी के आदेश में कहा गया है कि सिर्फ पेड़ कटाई पर रोक लगाई गई है, लेकिन संबंधित एजेंसी सड़क निर्माण का कार्य जारी रख सकता है. इसके लिए पेड़ों के साथ छेड़छाड़ न की जाए. इसलिए लगाई कटाई में रोक भोपाल में 10 लेन सड़क के लिए पेड़ों की कटाई पर रोक लगाने के लिए एनजीटी में याचिका लगाने वाले नितिन सक्सेना ने बताया कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण  (एनएचएआई) द्वारा सड़क निर्माण के लिए पेड़ों की कटाई तो शुरू कर दी गई, लेकिन इसके लिए तय मानकों का पालन नहीं किया गया. शहर में इसके पहले भी बीआरटीएस, स्मार्ट सिटी, कोलार सिक्सलेन और मेट्रो समेत अन्य प्रोजेक्ट के लिए लाखों पेड़ों की बलि चढ़ चुकी है. संबंधित निर्माण एजेंसियों ने भी पेड़ कटने के बाद उसकी भरपाई के लिए पौधारोपण का दावा किया था, लेकिन हकीकत सबके सामने है. 8 जनवरी तक रोक याचिकाकर्ता के वकील हरप्रीत सिंह गुप्ता ने बताया कि पूर्व में दिए गए एनजीटी के आदेश के अनुसार वृक्षों की कटाई की वैकल्पिक योजना पर विचार करने के लिए कोई केंद्रीय रूप से सशक्त समिति गठित नहीं की गई है, जिससे कम संख्या में वृक्षों की कटाई आवश्यक हो सके. न ही काटे गए वृक्षों की क्षतिपूर्ति और रोपित वृक्षों के 5 वर्ष तक जीवित रहने के लिए इस न्यायाधिकरण द्वारा निर्देशित विधि के अनुसार क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण के संबंध में कोई निर्णय लिया गया है. अयोध्या बायपास क्षेत्र में बड़ी संख्या में हरे-भरे पेड़ों को सॉ कटर से काटा गया था. स्थानीय लोगों ने कहा कि यह क्षेत्र शहर के लिए ग्रीन लंग की तरह काम करता था. अयोध्या बायपास प्रोजेक्ट से जुड़ा मामला पहले से ही एनजीटी में विचाराधीन था. इसके बावजूद इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई को मंजूरी देना कई सवाल खड़े करता है. नियमों के मुताबिक, एनजीटी में मामला लंबित होने की स्थिति में किसी भी तरह की बड़ी पर्यावरणीय गतिविधि पर रोक लगनी चाहिए. इतनी जल्दी कैसे मिली अनुमति? सूत्रों के अनुसार, 12 दिसंबर को स्टेट इम्पावरमेंट कमेटी की बैठक हुई और उसी दिन या बेहद कम समय में एनएचएआई को 7,881 पेड़ काटने की हरी झंडी दे दी गई. पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर अनुमति देने से पहले विस्तृत पर्यावरणीय आकलन और जनसुनवाई जरूरी होती है. खटाई में पड़ सकता है 16 किलोमीटर लंबा 10 लेन वाला प्रोजेक्ट  गौरतलब है एनजीटी द्वारा हरे पेड़ों की कटाई पर रोक लगाने से करीब 16 किलोमीटर लंबे 10 लेन वाला अयोध्या बायपास चौड़ीकरण प्रोजेक्ट खटाई में पड़ सकता है. हालांकि बिना हरे पेड़ों के काटे सड़क चौड़ीकरण का काम बदस्तूर जारी रहेगा. हालांकि एनजीटी ने सुनवाई के दौरान बड़े ही सख्त अंदाज में कहा है कि, नियम पहले, प्रोजेक्ट बाद में होता रहेगा.  हरे पेड़ों की कटाई ने वृक्ष संरक्षण कानून पर उठा दिए सवाल रिपोर्ट के मुताबिक अयोध्या बाइपास चौड़ीकरण के लिए प्रस्तावित 8000 हरे पेड़ों की कटाई के फैसले ने वृक्ष संरक्षण कानून पर भी सवाल उठा दिए हैं. बायपास चौड़ीकरण के लिए 8000 हरे पेड़ों की कटाई पर रोक लगाते हुए एनजीटी में अपनी टिप्पणी में प्रतिपूरक वनीकरण पर भी सरकार से जवाब मांगा और कहा है कि विकल्पों पर भी विचार जरूरी है.  रोक के बावजूद बिना पेड़ काटे चलता रहेगा सड़क का काम NGT ने बायपास चौड़ीकरण के लिए हरे पेड़ों की कटाई पर रोक लगाते हुए कहा कि अगली सुनवाई तक एक भी पेड़ नहीं कटेगा. इससे 16 किमी लंबे 10 लेन वाला बड़ा प्रोजेक्ट सवालों के घेरे में आ गया है. एनजीटी के आदेश को मोहन सरकार के लिए एक झटके के रूप में देखा जा रहा है.  प्रतिपूरक वृक्षारोपण पर सवाल एनएचएआई की ओर से दावा किया गया है कि पेड़ों की कटाई के बदले प्रतिपूरक वृक्षारोपण किया जाएगा. लेकिन सवाल यह है कि क्या नए लगाए जाने वाले पौधे उसी क्षेत्र में, उसी संख्या और उसी जैव विविधता के होंगे? अनुभव बताता है कि कागजों में दिखाया गया वृक्षारोपण ज़मीनी हकीकत में अक्सर नजर नहीं आता. हाईकोर्ट और नियमों का हवाला पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि इससे पहले भी हाईकोर्ट और एनजीटी कई मामलों में साफ कर चुके हैं कि विकास कार्यों के नाम पर अंधाधुंध पेड़ काटना स्वीकार्य नहीं है. सड़क चौड़ीकरण के विकल्प तलाशे जाने चाहिए थे, लेकिन सबसे आसान रास्ता हरियाली खत्म करना चुना गया.

स्व सहायता समूहों ने लगाया हरियाली का जाल, शहरी इलाकों में 2.5 लाख पौधे रोपे, पौधरोपण में रचा रिकॉर्ड

शहरी क्षेत्र में वीमेन फॉर ट्रीज अभियान में 7 हजार स्व सहायता समूहों का योगदान, अब तक हुआ ढ़ाई लाख पौधरोपण शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की हरियाली क्रांति, 2.5 लाख पौधे लगा चुकीं 7 हजार महिला समूह स्व सहायता समूहों ने लगाया हरियाली का जाल, शहरी इलाकों में 2.5 लाख पौधे रोपे, पौधरोपण में रचा रिकॉर्ड भोपाल प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में हरियाली को बढ़ाने के लिये नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग केन्द्र सरकार के निर्देश पर ‘वीमेर फॉर ट्रीज’ अभियान संचालित कर रहा है। पौधरोपण के बाद उनकी देखभाल की जिम्मेदारी स्व सहायता समूहों की महिलाओं को सौंपी गयी है। इसके लिये विभाग ने एक करोड़ 14 लाख रूपये की राशि जारी की है। यह कार्यक्रम ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के अंतर्गत लिया गया है। प्रदेश में इस कार्य के लिये 7 हजार स्व सहायता समूहों की महिलाओं को जिम्मेदारी दी गई है। ‘वीमेर फॉर ट्रीज’ में 2 लाख 30 हजार पौधरोपण किया जा चुका है। स्व सहायता समूहों की महिलाएं लगाये गये पौधों के रख-रखाव की जिम्मेदारी आगामी 2 वर्ष तक सुनिश्चित करेंगी। इस कार्यक्रम में स्व सहायता समूहों की महिलाओं के साथ नागरिकों, शैक्षणिक संस्थानों और औद्योगिक इकाइयों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है। स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण कार्यक्रम, नर्सरी स्थापना और मास्टर ट्रेनर्स भी तैयार किये जा रहे हैं। पर्यावरण और मातृत्व को समर्पित पहल प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण के लिये विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून से "एक पेड़ माँ के नाम" अभियान की शुरूआत की गई। यह केवल एक पौधरोपण कार्यक्रम नहीं है, बल्कि मातृत्व के सम्मान और पृथ्वी के संरक्षण की एक भावनात्मक, प्रतिकात्मक और सामाजिक पहल है, जिसमें नागरिक अपनी माँ के नाम पर एक पेड़ लगाकर प्रकृति से जुड़ते हैं। अमृत हरित महा अभियान प्रदेश के 418 नगरीय निकायों में पौधरोपण के लिये 13 जून 2025 से अमृत हरित महा अभियान की शुरूआत की गई। इसके लिये प्रदेश में 2500 नोड़ल कर्मियों को प्रशिक्षित किया गया है। अब तक विभिन्न सरकारी विभागों द्वारा शहरी क्षेत्रों में 41 लाख 65 हजार पौधरोपण किया गया है। इसके साथ ही नगरीय निकायों द्वारा 6 लाख 80 हजार पौधरोपण किया गया है। शहरी क्षेत्रों में अब तक 48 लाख 44 हजार पौधों का रोपण किया जा चुका है। शहरी क्षेत्रों में इस वर्ष 15 अगस्त तक 50 लाख पौधे लगाने का कार्यक्रम तैयार किया गया है।