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कच्चे तेल पर बड़ी राहत, सऊदी अरब के फैसले से भारत को होगा फायदा; दिवाली तक बच सकते हैं हजारों करोड़

नई दिल्ली ग्‍लोबल एनर्जी मार्केट में सऊदी अरब के एक बड़े फैसले ने हलचल मचा दी है. दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातकों में शामिल सऊदी अरब ने एशियाई ग्राहकों के लिए अपने प्रमुख अरब लाइट (Arab Light) कच्चे तेल की आधिकारिक बिक्री कीमत (Official Selling Price-OSP) में अगस्त की आपूर्ति के लिए प्रति बैरल 11 डॉलर की भारी कटौती की है. यह पिछले 26 वर्षों में एशिया के लिए की गई सबसे बड़ी मंथली कटौती मानी जा रही है. इतना ही नहीं साल 2020 के बाद पहली बार सऊदी अरब ने अपने इस प्रमुख ग्रेड को ओमान-दुबई बेंचमार्क के मुकाबले 1.50 डॉलर प्रति बैरल की छूट पर उपलब्ध कराया है. एक्‍सपर्ट का मानना है कि यह फैसला केवल कीमत घटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि एशियाई बाजार में अपनी हिस्सेदारी बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है. खासकर ऐसे समय में जब रूस रियायती दरों पर तेल बेचकर भारत और चीन जैसे बड़े आयातकों के बीच अपनी मजबूत पकड़ बना चुका है. सऊदी अरब के इस ‘प्राइस वॉर’ से भारत के ऑयल इंपोर्ट बिल पर पॉजिटिव असर तय माना जा रहा है. भारत अपनी कुल जरूरतों का 85 फीसद तक आयात करता है. ‘मनीकंट्रोल’ रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल-मई 2026 के दौरान भारत ने 35.5 अरब डॉलर (₹337970 करोड़) मूल्‍य का कच्‍चा तेल आयात किया था. सऊदी अरब की ओर से किए गए प्राइस कट और होर्मुज से जहाजों की आवाजाही सुचारू होने के बाद इंपोर्ट बिल में कमी आने की संभावना है. आगे चलकर कंज्‍यूमर को भी इसका फायदा मिलना तय माना जा रहा है।  दरअसल, कुछ सप्ताह पहले तक वैश्विक तेल बाजार में चिंता का माहौल था. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े सैन्य तनाव तथा रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में शिपिंग प्रभावित होने की आशंका के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया था. दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत समुद्री तेल व्यापार का रास्ता इसी स्‍ट्रेट से होकर गुजरता है. ऐसे में किसी भी तरह के खलल से ग्‍लोबल सप्‍लाई प्रभावित होने का खतरा पैदा हो गया था. हालांकि, अब हालात काफी हद तक सामान्य हो चुके हैं. होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही फिर से सुचारु हो गई है, खाड़ी देशों का निर्यात सामान्य स्तर पर लौट आया है और बाजार में तत्काल आपूर्ति संकट की आशंका काफी कम हो गई है. इसके साथ ही तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक प्लस (OPEC+) ने अगस्त से प्रतिदिन 1.88 लाख बैरल अतिरिक्त उत्पादन बढ़ाने का फैसला किया है. संयुक्त अरब अमीरात (UAE) सहित अन्य उत्पादक देशों ने भी उत्पादन बढ़ाया है।  भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है सऊदी का फैसला? भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक कम रहती हैं तो भारत का इंपोर्ट बिल घट सकता है, चालू खाते का घाटा नियंत्रित रह सकता है और महंगाई पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है. कम कीमतों का लाभ केवल सरकार तक सीमित नहीं रहेगा. विमानन, परिवहन, लॉजिस्टिक्स, मैन्‍यूफैक्‍चरिंग और पेट्रोकेमिकल जैसे उद्योगों की लागत भी घट सकती है, क्योंकि ये सभी क्षेत्र पेट्रोलियम उत्पादों पर काफी हद तक निर्भर हैं. इससे उत्पादन लागत कम होने और आर्थिक गतिविधियों को गति मिलने की संभावना रहती है. इसका सीधा फायदा आम उपभोक्‍ताओं को मिलने की संभावन है।  क्या सस्ता होगा पेट्रोल और डीजल? हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमत कम होने का मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल और डीजल तुरंत सस्ते हो जाएंगे. भारत में खुदरा ईंधन की कीमतें कई कारकों पर निर्भर करती हैं. इनमें अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत, रिफाइनिंग मार्जिन, मालभाड़ा, डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर, केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लगाए जाने वाले कर तथा सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों के मूल्य निर्धारण संबंधी निर्णय शामिल हैं. इसलिए यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल लंबे समय तक सस्ता बना रहता है और तेल कंपनियां इसका लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचाती हैं, तभी पेट्रोल और डीजल की कीमतों में राहत मिलने की संभावना होगी।  भारत और चीन पर फोकस एशिया दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक क्षेत्र है. भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश सऊदी अरब के सबसे बड़े ग्राहक हैं. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस बाजार में रूस की मौजूदगी तेजी से बढ़ी है. यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के चलते रूस ने रियायती कीमतों पर अपना तेल एशियाई देशों को बेचना शुरू किया. भारत और चीन रूस के सबसे बड़े खरीदार बनकर उभरे. ऐसे में सऊदी अरब पर दबाव बढ़ा. विश्लेषकों का मानना है कि कीमतों में इतनी बड़ी कटौती का उद्देश्य एशियाई रिफाइनरियों को आकर्षित करना और उन्हें रूस या अन्य सप्‍लायर्स की बजाय सऊदी तेल खरीदने के लिए प्रोत्साहित करना है. इसके अलावा चीन की धीमी आर्थिक वृद्धि के कारण वहां तेल की मांग में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हो रही है, जिससे भी कीमतों पर दबाव बना हुआ है। 

ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर भारत, 95 हजार करोड़ के निवेश से समुद्र मंथन मिशन तेज

नई दिल्ली  मिडिल ईस्ट संघर्ष ने भारत समेत कई देशों को एनर्जी को लेकर दूसरे देशों पर निर्भरता कम करने की सीख दी। भारत बहुत पहले से ही कच्चे तेल और गैस में आत्मनिर्भर होने की दिशा में बड़े स्तर पर काम कर रहा है। और अब भारत जल्द ही अपने इतिहास के सबसे बड़े तेल और गैस खोज अभियान की शुरुआत करने जा रहा है। केंद्र सरकार करीब 2.5 लाख वर्ग किलोमीटर (96,500 वर्ग मील) के ऐसे क्षेत्रों में तेल और प्राकृतिक गैस की तलाश शुरू करेगी, जहां अब तक बड़े पैमाने पर खोज नहीं हुई है। इस अभियान का मकसद घरेलू उत्पादन बढ़ाकर रूस, सऊदी अरब, इराक समेत दूसरे देशों से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना है। केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बताया कि सरकार जल्द ही इन नए क्षेत्रों को अन्वेषण के लिए नीलाम करेगी। उन्होंने कहा कि भारत की ऊर्जा जरूरतें तेजी से बढ़ रही हैं और अब समय आ गया है कि देश अपने ही संसाधनों का अधिकतम उपयोग करे। इसके लिए भारत लगभग 95 हजार करोड़ रुपये का निवेश करेगा जहां नहीं हुई खोज वहां महाअभियान चलाएगा भारत भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है। ऑयल मिनिस्ट्री के अनुसार, 2025-2026 में देश में कच्चे तेल का उत्पादन 25.98 मिलियन मीट्रिक टन था। यह भारत की कच्चे तेल की जरूरतों का सिर्फ 10 प्रतिशत है, जो लगभग 5,22,000 बैरल प्रति दिन (bpd) के बराबर है। यह आंकड़ा 2011 में 9,00,000 bpd से ज्यादा के पीक प्रोडक्शन से काफी कम है। भारत ने ईरान, वेनेजुएला, रूस से ज्यादा खरीद और कई अफ्रीकी देशों सहित कच्चे तेल के सप्लायर देशों की संख्या 27 से बढ़ाकर 41 करके ऊर्जा संकट का सामना किया। अब कच्चे तेल की निर्भरता दूसरे देशों पर कम करने के लिए भारत अपने यहां बड़े स्तर महाअभियान चलाएगा। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री पुरी ने AFP को बताया, "हम अभी लगभग 2,50,000 वर्ग किलोमीटर (96,500 वर्ग मील) के ऐसे इलाके की बोली लगाने की प्रक्रिया में हैं, जहा अभी तक कोई खोज नहीं हुई है।" उन्होंने कहा, "हम 10 अरब डॉलर (लगभग 95 हजार करोड़ रुपये) के प्रोग्राम के जरिए तेल और गैस की खोज में बड़े पैमाने पर पैसा लगा रहे हैं।" हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर पड़े असर ने यह साफ कर दिया कि आयात पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में बड़ी चुनौती बन सकती है। इसी वजह से सरकार ने घरेलू तेल और गैस खोज अभियान को तेज करने का फैसला लिया है। समुद्र में छिपा है तेल का खजाना! सरकार की नजर खासतौर पर समुद्र के गहरे इलाकों पर है। अंडमान एवं निकोबार के आसपास के अपतटीय क्षेत्रों को तेल और गैस के लिहाज से काफी संभावनाशील माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यहां की भूगर्भीय संरचना दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हाइड्रोकार्बन समृद्ध क्षेत्रों जैसी है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री पुरी ने भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के पास मौजूद "ऊर्जा के मौकों के भंडार" की तारीफ की है। यह द्वीप समूह 800 किलोमीटर (500 मील) लंबी द्वीपों की एक श्रृंखला है, जो पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील हैं और थाईलैंड व इंडोनेशिया से सटे समुद्रों में स्थित हैं। हालांकि गहरे समुद्र में तेल निकालना आसान नहीं है। इसके लिए अत्याधुनिक तकनीक, भारी निवेश और कई वर्षों तक लगातार काम करने की जरूरत होती है। इसी कारण सरकार अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कंपनियों और तकनीकी विशेषज्ञों का भी सहयोग ले रही है। पीएम मोदी ने की थी 'समुद्र मंथन मिशन' की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगस्त 2025 में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर अपने भाषण के दौरान "समुद्र मंथन" मिशन की शुरुआत की। यह नाम हिंदू पौराणिक कथाओं की एक अहम घटना से लिया गया है, जिसका अर्थ है "समुद्र का मंथन"। पीएम मोदी ने उस समय कहा था, "हम समुद्र के नीचे तेल और गैस के भंडार खोजने के लिए मिशन मोड में काम करना चाहते हैं और इसलिए भारत 'नेशनल डीप वॉटर एक्सप्लोरेशन मिशन' शुरू करने जा रहा है।"

Oil Import पर घटेगी निर्भरता? SBI रिपोर्ट में 2030 तक भारत की बड़ी तैयारी का खुलासा

नई दिल्‍ली ईरान-अमेरिका जंग के दौरान भारत को कच्‍चे तेल के आयात में दिक्‍कतों का सामना करना पड़ा था. स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने के कारण कई देश से ज्‍यादा कीमत पर कच्‍चे तेल का आयात करना पड़ा, जिस कारण देश का आयात बिल काफी बढ़ गया।  अब देश अपने आयात बिल को कम करने पर फोकस कर रहा है. साथ ही एनर्जी को लेकर दूसरे देशों से निर्भरता को कम कर रहा है. जिसे लेकर सरकार ने इलेक्‍ट्रिक वाहनों को अपनाने की रफ्तार बढ़ा दी है और इसे प्रमोट भी कर रही है. नियामकी चीजों में ढील भी दी गई है. हर तरफ से सरकार का फोकस कच्‍चे तेल को लेकर दूसरे देशों पर निर्भरता कम करना है. इस बीच, SBI की रिपोर्ट में एक बड़ा खुलासा किया गया है।  SBI की रिपोर्ट कहती है कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो 2030 तक भारत एक बड़ा मुकाम हासिल कर लेगा, जिससे उसका आयात बिल 1 लाख करोड़ रुपये कम हो सकता है, जिससे भारत को एक बड़ी मदद मिलेगी. हालांकि, इसके लिए भारत को कई चुनौतियों का सामना भी करना पड़ सकता है. आइए जानते हैं… 2030 तक हो सकता है ये बड़ा बदलाव दरअसल, रिपोर्ट का कहना है कि मौजूदा रफ्तार को देखते हुए ऐसा लगता है कि 2027 से 2030 के बीच 35 लाख इलेक्ट्रिक वाहन, पेट्रोल वाहनों की जगह ले सकते हैं. अगर 2030 तक घरेलू ऑटो मार्केट में 20 फीसदी ईवी का हिस्‍सा होता है तो भारत का इम्‍पोर्ट बिल 1 लाख करोड़ रुपये तक कम हो जाएगा।  रिपोर्ट में कहा गया है कि इस साल मार्च से जून महीने के दौरान, हर महीने एवरेज 2.30 लाख ईवी वाहनों का रजिस्‍ट्रेशन हुआ है. यह 2025 तक हर महीने 1.3 लाख था. इसका मतलब है कि हर महीने ईवी रजिस्‍ट्रेशन की संख्‍या में करीब 1 लाख की बढ़ोतरी हुई है।  चार्जिंग इंफ्रा बढ़ाने पर जोर  SBI की रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि अलग-अलग राज्‍यों में चार्जिंग स्‍टेशनों को लेकर लोड अलग-अलग है. कुछ राज्‍यों में हर चार्जिंग स्‍टेशन 200 से ज्‍यादा ईवी की सेवा देते हैं और दूसरे राज्‍यों में यह संख्‍या 50 वाहनों तक ही सीमित है. भारत में ईवी चार्जिंग की सफलता, चार्जिंग स्‍टेशनों और ईवी इंफ्रा पर निर्भर करेगी. भारत में कुल 29,151 चार्जिंग स्‍टेशन हैं. इसमें भी कर्नाटक और महाराष्‍ट्र में कुल देश का 35 फीसदी ईवी इंफ्रा डेवलप है. रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि सबसे पहले हर राज्‍यों में चार्जिंग इंफ्रा को बढ़ाने पर जोर देना होगा।  दूसरे देशों पर निर्भरता होगी कम  अगर सरकार और राज्‍य पूरी क्षमता के साथ ईवी को प्रमोट करते हैं और उसके सफलता के लिए सही प्रयास किए जाते हैं तो यह कच्‍चे तेल के आयात में बड़ी कटौती कर सकती है. देश में पेट्रोल-डीजल पंपो की संख्‍या कम हो सकती है, क्‍योंकि ईवी के आने से ईंधन भरवाने की समस्‍या कम हो जाएगी. इस वजह से दूसरे देशों-खासकर मिडिल ईस्‍ट और अमेरिका जैसे दशों से कच्‍चे तेल की निर्भरता कम हो जाएगी। 

ऊर्जा सुरक्षा पर भारत का बड़ा दांव, 40 हजार करोड़ की परियोजना से तेल-गैस संकट का मिलेगा समाधान

नई दिल्ली ईरान की अमेरिका और इजरायल के खिलाफ जंग एक बार फिर जोर पकड़ती दिख रही है. अमेरिका ने अपने अपाचे हेलिकॉप्टर पर हमले पर बदला लेने के लिए होर्मुज के पास ईरान के अहम ठिकानों पर बुधवार तड़के (भारतीय समय) हमला कर दिया. वहीं ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी आईआरजीसी ने बहरीन स्थित अमेरिका के पांचवें बेड़े को निशाना बनाने का दावा किया है. अमेरिका और ईरान के बीच इस ताजा वार और पलटवार ने होर्मुज स्ट्रेट के जल्द दोबारा खुलने की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. होर्मुज की नाकेबंदी की वजह से मंडराते तेल-गैस के संकट के बीच भारत एक ऐसे मेगा प्रोजेक्ट पर गंभीरता से कदम आगे बढ़ा रहा है, जो आने वाले दशकों के लिए देश की ऊर्जा सुरक्षा की तस्वीर बदल सकता है. ओमान से गुजरात तक अरब सागर के नीचे लगभग 2,000 किलोमीटर लंबी डीप-सी गैस पाइपलाइन बिछाने की योजना को फिर से गति मिली है. करीब 40,000 करोड़ रुपये की लागत वाले इस प्रोजेक्ट को भारत के लिए ‘होर्मुज संकट का स्थायी समाधान’ माना जा रहा है।  भारत अपनी जरूरत का 50 प्रतिशत से ज्यादा प्राकृतिक गैस आयात करता है. इसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से एलएनजी (LNG) के रूप में आता है और होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है. यह वही समुद्री रास्ता है, जहां हाल के महीनों में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. अगर किसी वजह से होर्मुज स्ट्रेट बंद होता है या वहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो भारत समेत दुनिया के कई देशों की ऊर्जा आपूर्ति पर सीधा असर पड़ सकता है।  ओमान से गुजरात तक पाइपलाइन यही वजह है कि भारत अब ओमान से सीधे गैस लाने के विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रहा है. प्रस्तावित पाइपलाइन ओमान को सीधे गुजरात से जोड़ेगी और इसके जरिए गैस समुद्र के रास्ते टैंकरों में लाने की बजाय सीधे पाइपलाइन से भारत पहुंचेगी. इससे न केवल सप्लाई अधिक स्थिर होगी बल्कि समुद्री संकटों का असर भी काफी हद तक कम हो जाएगा।  इस परियोजना की सबसे बड़ी खासियत इसकी तकनीकी जटिलता है. पाइपलाइन का कुछ हिस्सा समुद्र तल से 3,000 मीटर से भी अधिक गहराई में बिछाया जाएगा. इतनी गहराई पर पाइपलाइन निर्माण दुनिया की सबसे चुनौतीपूर्ण इंजीनियरिंग परियोजनाओं में गिना जाता है. अगर यह योजना सफल होती है तो यह दुनिया की सबसे गहरी समुद्री गैस पाइपलाइनों में से एक होगी।  इस प्रोजेक्ट को लंबे समय से बढ़ावा देने वाली कंपनी साउथ एशिया गैस एंटरप्राइज (SAGE) का दावा है कि वह पहले ही तकनीकी और वित्तीय अध्ययन के साथ-साथ समुद्र तल का सर्वेक्षण भी कर चुकी है. रिपोर्ट्स के मुताबिक पेट्रोलियम मंत्रालय ने अब सरकारी कंपनियों जैसे गेल, इंडिया ऑयल कॉर्पोरेशन और इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड को विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने का काम सौंपा है।  गैस आयात हो जाएगा सस्ता एनर्जी एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह परियोजना सिर्फ गैस आयात का माध्यम नहीं होगी, बल्कि भारत और खाड़ी देशों के बीच रणनीतिक संबंधों को भी नई मजबूती देगी. ओमान को लंबे समय के लिए स्थायी ग्राहक मिलेगा, जबकि भारत को गैस की सुरक्षित और लगातार आपूर्ति सुनिश्चित हो सकेगी।  वर्तमान में एलएनजी आयात की प्रक्रिया काफी लंबी और महंगी है. पहले गैस को तरल रूप में बदला जाता है, फिर विशेष जहाजों से हजारों किलोमीटर दूर ले जाया जाता है और भारत पहुंचने पर दोबारा गैस में परिवर्तित किया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में भारी खर्च आता है. प्रस्तावित पाइपलाइन के जरिए गैस सीधे स्रोत से उपभोक्ता तक पहुंचेगी. शुरुआती अनुमान के मुताबिक गैस परिवहन की लागत 2 से 2.25 डॉलर प्रति MMBtu के बीच रह सकती है, जो कई परिस्थितियों में एलएनजी आयात से प्रतिस्पर्धी साबित हो सकती है।  इस प्रोजेक्ट में क्या है रोड़ा? हालांकि इस महत्वाकांक्षी परियोजना के सामने कई बड़ी चुनौतियां भी हैं. सबसे बड़ी चुनौती इंजीनियरिंग की है. समुद्र की 3,000 मीटर गहराई पर पाइपलाइन बिछाना और उसका रखरखाव करना बेहद जटिल और महंगा काम होगा. किसी भी तकनीकी खराबी या रिसाव की स्थिति में मरम्मत करना आसान नहीं होगा. इसके लिए विशेष जहाजों और अत्याधुनिक उपकरणों की जरूरत पड़ेगी।  दूसरी बड़ी चुनौती लागत और फंडिंग की है. 40,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत शुरुआती आंकड़ा है. ऐसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में अक्सर लागत बढ़ जाती है. इसके अलावा यह भी तय करना होगा कि निवेश कौन करेगा, लागत का बंटवारा कैसे होगा और गैस खरीद के दीर्घकालिक समझौते किस प्रकार होंगे।  तीन दशक से अटका था काम फिर भी हालात बदल चुके हैं. तीन दशक पहले जब यह परियोजना पहली बार सामने आई थी, तब तकनीक और आर्थिक व्यवहार्यता सबसे बड़ी बाधा थीं. लेकिन अब ऊर्जा सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम हिस्सा बन चुकी है. रूस-यूक्रेन युद्ध, लाल सागर संकट और अब होर्मुज क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने यह दिखा दिया है कि किसी एक समुद्री मार्ग पर अत्यधिक निर्भरता कितनी जोखिम भरी हो सकती है।  विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह परियोजना सफल होती है तो भविष्य में इसी नेटवर्क का इस्तेमाल हाइड्रोजन जैसे स्वच्छ ईंधनों के परिवहन के लिए भी किया जा सकता है. यानी यह सिर्फ आज की जरूरत नहीं, बल्कि आने वाले दशकों की ऊर्जा रणनीति का आधार बन सकती है।  यही कारण है कि ओमान-गुजरात डीप-सी गैस पाइपलाइन को सिर्फ एक ऊर्जा परियोजना नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है. होर्मुज संकट ने जिस खतरे की ओर दुनिया का ध्यान खींचा है, भारत उसी का स्थायी समाधान खोजने में जुटा हुआ है. अगर यह मेगा प्लान जमीन पर उतरता है, तो देश की तेल-गैस आपूर्ति पहले की तुलना में कहीं अधिक सुरक्षित और भरोसेमंद हो सकती है।   

‘2-3 हफ्तों में तेल की कीमतों में बड़ा उछाल’, Hormuz संकट पर ग्लोबल ऑयल कंपनियों की वॉर्निंग

 नई दिल्ली करीब दो महीने पहले अमेरिका के इन्वेस्टमेंट बैंक जेपी मॉर्गन ने एक विश्लेषण जारी किया था, जिसमें सवाल पूछा गया था कि 'दुनिया के पास काम चलाने लायक कच्चे तेल का न्यूनतम स्टॉक खत्म होने में कितना वक्त लगेगा?.' इसका सार ये था कि भले ही बाजार में करोड़ों बैरल तेल मौजूद हो, लेकिन अगर इस्तेमाल के लिए उपलब्ध भंडार बहुत कम हो जाए तो पूरी व्यवस्था चरमरा जाती है. इंसानी शरीर में ब्लड प्रेशर की तरह असली मुद्दा तेल की मात्रा नहीं, बल्कि उसके लगातार प्रवाह का है।  करीब चार हफ्ते बाद बैंक ने एक और विश्लेषण जारी किया, जिसमें बताया गया कि .होर्मुज स्ट्रेट सितंबर तक क्यों खुल जाएगा… किसी न किसी तरह. बैंक के मुताबिक, 2026 की शुरुआत में वैश्विक तेल भंडार 8.4 अरब बैरल था, लेकिन उसमें से केवल 0.8 अरब बैरल ही ऐसा था जिसे इस्तेमाल किया जा सकता था।  संक्षेप में कहें तो, अगर होर्मुज स्ट्रेट बंद रहता है और तेल की महंगाई के कारण मांग में कमी 55 लाख बैरल प्रतिदिन पर स्थिर रहती है, तो OECD देशों (Organisation For Economic Co-operation and Development) के कमर्शियल तेल भंडार जून तक भारी दबाव में आ सकते हैं।  इसके बाद सितंबर तक दुनिया के तेल भंडार उस न्यूनतम स्तर पर पहुंच सकते हैं, जहां से सामान्य संचालन करना मुश्किल हो जाएगा. दिलचस्प बात यह है कि जेपीमॉर्गन की पिछली रिपोर्ट के बाद तेल की कीमतें बढ़ने के बजाय घटी हैं, इसलिए मांग में गिरावट की रफ्तार भी धीमी पड़ गई है।  सप्लाई कम फिर भी गिर रही तेल की कीमतें… बड़ा तूफान आने वाला है इस दौरान सबसे हैरानी वाली बात यह रही कि होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से रोजाना करीब 1 करोड़ बैरल तेल जरूरतमंद देशों तक नहीं पहुंच पा रहा था. सामान्य तौर पर ऐसी स्थिति में कीमतें तेजी से बढ़नी चाहिए थीं ताकि मांग कम हो जाए. लेकिन इसके उलट मार्च के आखिर में बहुत अधिक बढ़ने और फिर एक महीने बाद दोबारा बढ़ने के बाद तेल की कीमतें गिरने लगीं. इससे मांग कम होने के बजाय और बढ़ी है. इसी वजह से जेपीमॉर्गन ने रिपोर्ट जारी कर कहा था कि वैश्विक तेल बाजार के गणित में कुछ गड़बड़ है।  इसके कुछ हफ्ते बाद गोल्डमैन सैक्स ने भी कहा कि होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने के बावजूद, मई में वैश्विक तेल भंडार रिकॉर्ड 87 लाख बैरल प्रतिदिन की दर से घटे।  फिर भी मई में तेल की कीमतें काफी नीचे रहीं. इसकी एक बड़ी वजह बाजार को रोजाना दिए जाने वाले वो संकेत थे जिनमें सरकारी और गैर-सरकारी सूत्र लगातार यह कह रहे थे कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता बस होने ही वाला है।  लेकिन ऐसा नहीं हुआ. तेल बाजार भले ही इस खतरे को नजरअंदाज करना चाहे, लेकिन अब तेल उद्योग की बड़ी कंपनियां खुलकर चेतावनी देने लगी हैं।  तेल स्टोरेज खत्म होने का झटका बाजार सह नहीं पाएगा हाल ही में शेवरॉन के CEO माइक वर्थ ने कहा कि अगले दो महीनों में तेल की कीमतें बढ़ने की संभावना है क्योंकि पहले से ही बेहद कम स्तर पर मौजूद कच्चे तेल के भंडार ईरान युद्ध की वजह से लगातार घट रहे हैं।  उन्होंने गुरुवार को एक कॉन्फ्रेंस में कहा, 'सुरक्षा के लिए मौजूद अतिरिक्त भंडार खत्म हो रहा है और ऐसा झटका सहने की क्षमता भी खत्म होती जा रही है. बाजार के पास इस असंतुलन को संभालने की क्षमता अब पहले की तुलना में काफी कम रह गई है।  उन्होंने आगे कहा, 'अगले कुछ हफ्तों में यह दबाव सीधे तेल की कीमतों में दिखने लगेगा. जून और खासकर जुलाई में कीमतें ऊपर जाएंगी।  वर्थ की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब पिछले एक हफ्ते में तेल की कीमतों में करीब 10% की गिरावट आई है. इसकी वजह यह उम्मीद रही कि अमेरिका और ईरान तीन महीने से चल रहे संघर्ष को खत्म करने के लिए कोई समझौता कर सकते हैं. इसी संघर्ष के कारण होर्मुज स्ट्रेट बंद है, जो दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से के कच्चे तेल की आवाजाही का रास्ता है।  उनकी चेतावनी से यह चिंता भी बढ़ गई है कि अगर युद्ध खत्म करने के लिए कोई समझौता हो भी जाता है तब भी तेल की कीमतें महीनों तक ऊपर बनी रह सकती हैं. वैसे भी फिलहाल ऐसा कोई समझौता होता हुआ नजर नहीं आ रहा. इस संघर्ष के कारण वैश्विक बाजार से रोजाना 1.2 से 1.3 करोड़ बैरल तेल की आपूर्ति गायब हो चुकी है।  युद्ध खत्म हो भी जाए तब भी अगले साल तक नहीं सुधरेंगे तेल बाजार के हालात वर्थ की बात अन्य तेल अधिकारियों की चेतावनियों से भी मेल खाती है. इनमें संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की सरकारी तेल कंपनी Adnoc के प्रमुख भी शामिल हैं. उन्होंने पिछले सप्ताह कहा था कि अगर संघर्ष खत्म भी हो जाए, तब भी होर्मुज स्ट्रेट में तेल की सामान्य आवाजाही अगले साल से पहले बहाल होने की संभावना नहीं है।  ADNOC के सीईओ सुल्तान अल-जाबेर ने 21 मई को एक प्रोग्राम में कहा, 'संघर्ष से पहले के स्तर की 80% तेल आपूर्ति बहाल होने में कम से कम चार महीने लगेंगे और पूरी क्षमता से तेल प्रवाह 2027 की पहली या शायद दूसरी तिमाही से पहले शुरू नहीं होगा।  जेपीमॉर्गन की तरह वर्थ ने भी कहा कि युद्ध शुरू होने के बाद तेल की कीमतें उतनी नहीं बढ़ीं जितनी उम्मीद थी. इसकी वजह यह रही कि देशों ने इमर्जेंसी के लिए अच्छी मात्रा में तेल जमा कर रखा था, अमेरिका ने बाजार को तेल दिया और ईरान, रूस, वेनेजुएला के प्रतिबंधित तेल भी बाजार में पहुंचे. लेकिन अब ये भंडार तेजी से घट रहे हैं।  ऑयल प्राइस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें एक बड़ा फैक्टर चीन के तेल भंडार हैं जो चुपचाप तेजी से कम हो रहे हैं. इसमें कमर्शियल और स्ट्रैटेजिक दोनों तरह के भंडार शामिल हैं. चीन के रणनीतिक भंडार में करीब 1.4 अरब बैरल तेल होने का अनुमान है. अगर चीन इन्हें बड़े पैमाने पर बाजार में उतारता है, तो संकट कुछ समय के लिए टल सकता है।  वर्थ ने यह भी कहा कि मौजूदा ऊर्जा संकट सरकारों को सीख देगा कि वो भविष्य के लिए … Read more

क्या आने वाला है नया ऑयल क्राइसिस? तेजी से खत्म हो रहे भंडार ने बढ़ाई दुनिया की टेंशन

 नई दिल्ली ईरान जंग के कारण होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी से दुनिया में तेल खत्म होने का खतरा तेजी से बढ़ रहा है. तीन महीने पहले तक यह संभावना बेहद कम लग रही थी, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. होर्मुज स्ट्रेट लगभग पूरी तरह बंद रहने के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की भारी कमी का खतरा बढ़ता जा रहा है।  विश्लेषकों को अब अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच युद्ध जल्द खत्म होने की उम्मीद नहीं है. इसके बजाय उनका कहना है कि युद्ध लंबे समय तक चल सकता है जिससे एनर्जी सप्लाई लंबे समय तक बाधित रह सकती है. उनके अनुसार, तेल आपूर्ति की तस्वीर बिल्कुल अच्छी नहीं दिख रही।  डेटा एनालिटिक्स फर्म केप्लर की रिपोर्ट के मुताबिक, 28 फरवरी से 8 मई तक मध्य पूर्व में तेल आपूर्ति में कुल 78.2 करोड़ बैरल की कमी आ चुकी थी और इस महीने के अंत तक यह आंकड़ा 1 अरब बैरल तक पहुंच सकता है।  दैनिक उत्पादन के हिसाब से भी हालात गंभीर हैं. सऊदी अरब रोजाना 30 लाख बैरल से ज्यादा तेल उत्पादन गंवा रहा है. इराक का तेल उत्पादन 28.8 लाख बैरल प्रतिदिन कम हो गया है, जबकि ईरान का उत्पादन 16.9 लाख बैरल प्रतिदिन घटा है. कुवैत में भी रोजाना 17.5 लाख बैरल की गिरावट दर्ज की गई है।  तेल उत्पादन घटा, दुनिया रिजर्व रखे तेल पर चल रही इतने बड़े स्तर पर तेल उत्पादन बंद होने के बाद दुनिया पहले से निकाले गए तेल के भंडार को इस्तेमाल कर रही है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) पहले कह चुकी थी कि दुनिया के तेल भंडार रिकॉर्ड स्तर पर हैं और इसी वजह से बाजार में भारी अतिरिक्त सप्लाई की संभावना थी. लेकिन यह अनुमान युद्ध शुरू होने से पहले का था. अब IEA चेतावनी दे रही है कि इस साल तेल की मांग सप्लाई से ज्यादा हो जाएगी।  'द ऑयल प्राइस' की रिपोर्ट के मुताबिक, IEA की ताजा मासिक रिपोर्ट के अनुसार, इस साल वैश्विक तेल आपूर्ति में रोजाना करीब 39 लाख बैरल की गिरावट आ सकती है. हालांकि, यह आंकड़ा भी मध्य पूर्व में मौजूदा वास्तविक नुकसान से काफी कम है. एजेंसी का अनुमान है कि मध्य पूर्व में आपूर्ति में 1.05 करोड़ बैरल प्रतिदिन की कमी हो चुकी है. दूसरी ओर, मांग में सिर्फ 4.2 लाख बैरल प्रतिदिन की गिरावट आने का अनुमान है।  अटलांटिक काउंसिल के ग्लोबल एनर्जी सेंटर की वरिष्ठ फेलो एलेन वाल्ड ने वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा, 'खपत को एक सीमा तक ही कम किया जा सकता है. जब भंडार खत्म होंगे तो वे सचमुच खत्म हो जाएंगे. एक वक्त आएगा जब तेल की मांग और सप्लाई के बीच बड़ी खाई पैदा होगी और बाजार बुरी तरह हिल जाएगा. कीमतें तेजी से ऊपर जाएंगी।  सऊदी अरामको के सीईओ ने भी दी है वॉर्निंग यह चेतावनी अरामको के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) अमीन नासिर के बयान से भी मेल खाती है. उन्होंने कहा था कि दुनिया में जमीन पर मौजूद ईंधन भंडार रिकॉर्ड गति से घट रहे हैं. उनके मुताबिक, जमीन पर मौजूद तेल भंडार इस समय बाजार के लिए 'एकमात्र सुरक्षा कवच' हैं, लेकिन अब वे भी तेजी से कम हो रहे हैं।  जमीन पर मौजूद तेल भंडार का मतलब उस तेल से होता है जो पहले ही जमीन से निकाल लिया गया है और बाद में इस्तेमाल के लिए बड़े टैंकरों, स्टोरेज फैसिलिटीज या रिजर्व में रखा गया हो. इस तेल को जरूरत की स्थिति, जैसे युद्ध, सप्लाई रुकना या कीमतें बढ़ना, में इस्तेमाल किया जाता है।  जेपी मॉर्गन के कमोडिटी विश्लेषकों ने भी चेतावनी दी है कि अगले महीने तक विकसित देशों में व्यावसायिक तेल भंडार 'ऑपरेशनल तनाव' के स्तर तक पहुंच सकते हैं. इसका मतलब है कि तेल आपूर्ति में आई कमी को संभालना और मुश्किल हो जाएगा।  तेल की कमी इतनी होगी कि होर्मुज खोलना ही होगा जेपी मॉर्गन की वैश्विक कमोडिटी रणनीति प्रमुख नताशा कानेवा ने कहा, 'हमारा निष्कर्ष है कि किसी न किसी तरह जून में होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलना ही होगा.' उनके अनुसार, दुनिया तेल संकट से तभी बच सकती है जब युद्ध खत्म हो. अगर ऐसा नहीं हुआ तो अगला चरण सिर्फ कच्चे तेल की कीमतों में उछाल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रिफाइनिंग और अंतिम उपभोक्ता तक ईंधन पहुंचाने का संकट बन सकता है।  अमीन नासिर ने यह भी कहा कि बाजार में तेल भंडार की उपलब्धता को बढ़ा-चढ़ाकर आंका जा रहा है. उन्होंने बताया कि स्टोरेज में मौजूद सारा तेल वास्तव में इस्तेमाल के लिए उपलब्ध नहीं होता. उसका बड़ा हिस्सा पाइपलाइन, न्यूनतम टैंक स्तर और अन्य परिचालन जरूरतों में फंसा रहता है. उन्होंने कहा, 'यूरोप और अमेरिका में स्टोरेज से रोजाना अधिकतम 20 लाख बैरल तेल ही निकाला जा सकता है।  केप्लर के अनुसार, फिलहाल भंडार से तेल निकासी सीमित स्तर पर है. मार्च के आखिर से अब तक जमीन पर मौजूद भंडार से करीब 6 करोड़ बैरल तेल निकाला जा चुका है. इसके बावजूद अभी करीब 3 अरब बैरल तेल स्टोरेज में मौजूद है, हालांकि उसमें से कितना वास्तव में उपलब्ध है, यह साफ नहीं है।  कमजोर होता दुनिया का सुरक्षा कवच विश्लेषकों का कहना है कि अगर मध्य पूर्व में आपूर्ति संकट लंबा खिंचता है तो भंडार तेजी से घटेंगे और उन्हें दोबारा भरने के लिए पर्याप्त नई सप्लाई उपलब्ध नहीं होगी. यानी युद्ध जितना लंबा चलेगा, दुनिया का सुरक्षा कवच उतना कमजोर होता जाएगा।  हालांकि, कुछ राहत की खबर भी है. वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक, बाजार अब इस स्थिति का आदी होने लगा है. भंडार से तेल निकालने की वजह से तत्काल घबराहट कम हुई है और अब बाजार कमी को मैनेज करना सीख रहा है जिसका मतलब है कि तेल की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं।  कैपिटल इकोनॉमिक्स के कमोडिटी अर्थशास्त्री हमाद हुसैन ने कहा, 'तेल कार्गो की तत्काल खरीद की होड़ अब कम हो गई है. लेकिन हम तेजी से भंडार खाली कर रहे हैं और इसका सीधा असर कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में दिखाई देगा। 

सऊदी और यूएई ने होर्मुज को बायपास किया, भारत तक तेल सप्लाई का नया मार्ग तय

  नई दिल्ली ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल का युद्ध शुरू होने के बाद जब होर्मुज स्ट्रेट बंद हुआ तो भारत के लिए तेल और गैस की किल्लत हो गई. तेल और गैस के लिए सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे खाड़ी देशों पर निर्भर भारत के लिए होर्मुज का बंद होना बड़ा झटका साबित हुआ. इस बीच रूसी तेल पर लगे बैन के हटने से भारत को राहत मिली लेकिन सऊदी, यूएई से भारत को तेल सप्लाई कुछ समय के लिए लगभग बंद हो गई. लेकिन दोनों खाड़ी देशों ने इसका तोड़ भी निकाल लिया और होर्मुज को बायपास कर कच्चा तेल अब भारत तक पहुंचाने लगे हैं।  सऊदी अरब से भारत को कच्चे तेल की सप्लाई अब सामान्य हो गई है और यूएई से आने वाली खेप पिछले साल के औसत से काफी ज्यादा चल रही है. ऐसा इसलिए संभव हो सका है क्योंकि दोनों देशों ने होर्मुज स्ट्रेट में रुकावट के बीच वैकल्पिक बंदरगाहों से लोडिंग बढ़ा दी है।    शिप-ट्रैकिंग फर्म केप्लर के वरिष्ठ रिसर्च एनालिस्ट निखिल दुबे ने इकोनॉमिक टाइम्स से कहा कि सऊदी अरब और यूएई से बढ़ी सप्लाई, ईरान और वेनेजुएला से दोबारा शुरू हुए आयात, और रूस से अधिक खरीद ने खाड़ी क्षेत्र से आई कमी की आंशिक भरपाई की है. इससे अप्रैल में भारत को कच्चे तेल की उपलब्धता बनी रही।  केप्लर के मुताबिक, 1 से 26 अप्रैल के बीच भारत का औसत कच्चा तेल आयात 44 लाख बैरल प्रतिदिन रहा, जो फरवरी के 52 लाख बैरल प्रतिदिन के मुकाबले करीब 15% कम है. इसकी मुख्य वजह यह है कि भारत के दूसरे सबसे बड़े स्रोत इराक से सप्लाई अभी भी बंद है, साथ ही कुवैत और कतर से भी आपूर्ति रुकी हुई है।  अप्रैल में सऊदी अरब ने भारत को 6.97 लाख बैरल प्रतिदिन तेल भेजा, जबकि वित्त वर्ष 2025-26 का औसत 6.68 लाख बैरल प्रतिदिन था. वहीं, यूएई से सप्लाई 6.19 लाख बैरल प्रतिदिन रही, जो पिछले वित्त वर्ष के 4.33 लाख बैरल प्रतिदिन औसत से काफी ज्यादा है।  सऊदी अरब और यूएई होर्मुज के बंद होने के बीच भारत कैसे पहुंचा रहे अपना तेल? सऊदी अरब ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के जरिए भारत तक तेल भेज रहा है. फारस की खाड़ी स्थित रास तनुरा बंदरगाह से भेजी जाने वाली तेल की खेप 70 लाख बैरल प्रतिदिन क्षमता वाली पाइपलाइन के जरिए लाल सागर के यनबू टर्मिनल तक आ रही है।  दूसरी ओर यूएई 17 लाख बैरल प्रतिदिन क्षमता वाली ADCOP पाइपलाइन के जरिए तेल को फुजैरा बंदरगाह तक भेज रहा है, जो ओमान की खाड़ी पर स्थित है. इन दोनों देशों के अलावा खाड़ी के अन्य उत्पादक देश अब भी निर्यात के लिए बड़े पैमाने पर होर्मुज पर निर्भर हैं।  भारत ने ओमान से भी तेल खरीद बढ़ा दी है क्योंकि उसका तेल होर्मुज के जरिए नहीं आता. अप्रैल में भारत को ओमान से 1.01 लाख बैरल प्रतिदिन तेल मिला, जबकि 2025-26 का औसत केवल 18 हजार बैरल प्रतिदिन था।  युद्ध के बाद रूस और ईरान के तेल पर अमेरिकी प्रतिबंधों में ढील से भारतीय रिफाइनरों को राहत मिली है, जो होर्मुज संकट के बाद विकल्प तलाश रहे थे। अप्रैल में सात साल बाद ईरान से 1.51 लाख बैरल प्रतिदिन और नौ महीने बाद वेनेजुएला से 2.58 लाख बैरल प्रतिदिन सप्लाई फिर शुरू हुई। हालांकि अमेरिका से भारत को तेल सप्लाई कम रही. अप्रैल में यह घटकर 1.15 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई, जबकि 2025-26 का औसत 3.14 लाख बैरल प्रतिदिन था।  रूस से सप्लाई, जो जनवरी-फरवरी में अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण घटी थी, मार्च में दोगुनी होकर 20 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंच गई थी. लेकिन अप्रैल में रूसी तेल की उपलब्धता कम रही जिस कारण यह घटकर 16 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई। 

क्रूड ऑयल के दाम 111 डॉलर पार, पेट्रोल 393 रुपये पर, कई देशों में तेल संकट बढ़ा

मुंबई यूनाइटेड अरब अमीरात (UAE) के फैसले से दुनिया भर में तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है. ब्रेंट क्रूड करीब 2.8% बढ़कर 111 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया, जबकि WTI भी लगभग 100 डॉलर के आसपास है. इसी बीच UAE ने 1 मई से OPEC और OPEC+ छोड़ने का बड़ा फैसला लिया है.इससे पूरी दुनिया के तेल बाजार, कीमतों और सप्लाई सिस्टम पर असर पड़ सकता है।  OPEC और OPEC+ क्या है? ओपेक यानी ऑर्गनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (OPEC) एक ऐसा ग्रुप है जिसमें बड़े तेल उत्पादक देश शामिल हैं. इसमें सऊदी अरब, इराक, ईरान, कुवैत जैसे देश शामिल हैं और हाल तक यूएई भी इसका हिस्सा था.इसका मुख्य काम तेल उत्पादन को कंट्रोल करके कीमतों को मैनेज करना है।  OPEC कैसे काम करता है?  ओपेक तरराष्ट्रीय तेल बाजार  में बैलेंस बनाए रखने की कोशिश करता है.जब वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें गिरने लगती हैं, तो ओपेक देश मिलकर तेल की सप्लाई (उत्पादन) में कटौती कर देते हैं, ताकि मांग के मुकाबले आपूर्ति कम होने से कीमतें फिर से स्थिर हो सकें.इसके विपरीत, जब तेल की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ जाती हैं और दुनिया भर में ऊर्जा संकट का खतरा मंडराने लगता है, तो ओपेक उत्पादन बढ़ाकर बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ा देता है.इससे सदस्य देशों की कमाई  सुरक्षित बनी रहती है और और ग्लोबल मार्केट में कीमतों में  ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं होता।  OPEC क्या है और क्यों इतना ताकतवर है? ओपेक+ में ओपेक के साथ कुछ और देश भी जुड़े हैं, जैसे रूस.यह 2016 में तब बना जब तेल की कीमतें गिर गई थीं और ओपेक अकेले बाजार को संभाल नहीं पा रहा था.आज ओपेक+ दुनिया के करीब 40-50% तेल उत्पादन को कंट्रोल करता है।  ओपेक+ (OPEC+) की असली ताकत इस बात में छिपी है कि यह संगठन दुनिया के तेल सप्लाई के एक बहुत बड़े हिस्से को कंट्रोल करता है.जब भी ओपेक+ के सदस्य देश कोई फैसला लेते हैं, तो उसका असर तुरंत अंतरराष्ट्रीय बाजार पर दिखाई देता है और तेल की कीमतें पलक झपकते ही ऊपर-नीचे होने लगती हैं.चूंकि दुनिया की इकोनॉमी तेल पर टिकी है, इसलिए इनके फैसलों का सीधा असर हर देश की महंगाई, ट्रांसपोर्ट की लागत और पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है.यही वजह है कि ओपेक+ को इतना ताकतवर माना जाता है, क्योंकि यह पूरी दुनिया की जेब और बाजार की दिशा बदल सकती है।  यूएई ने ओपेक क्यों छोड़ा? जान लें वजह इसके अलावा, यूएई को भविष्य की भी चिंता है क्योंकि रिन्यूएबल एनर्जी(Renewable Energy) के बढ़ते चलन के कारण आने वाले समय में तेल की मांग घट सकती है. ऐसे में यूएई की सोच यह है कि आज का तेल भविष्य की तुलना में ज्यादा कीमती हो सकता है, इसलिए वह अभी अपनी पूरी क्षमता का इस्तेमाल करके ज्यादा से ज्यादा कमाई करना चाहता है. ओपेक की पाबंदियों से बाहर निकलकर वह अपनी इकोनॉमी को और मजबूत करने और भविष्य के जोखिमों से निपटने की तैयारी कर रहा है।  घरेलू वायदा बाजार में गिरावट जहां अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी दिखी, वहीं घरेलू स्तर पर मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। क्रूड ऑयल करीब 0.88% यानी 84 रुपये गिरकर 9,401 रुपये पर कारोबार करता दिखा।  होरमुज जलडमरूमध्य बना चिंता का कारण Strait of Hormuz को लेकर बनी अनिश्चितता भी कीमतों में तेजी की बड़ी वजह है। यह अहम समुद्री मार्ग वैश्विक तेल और LNG सप्लाई का लगभग 20% संभालता है, और यहां किसी भी तरह की बाधा का सीधा असर बाजार पर पड़ सकता है। भारत पर पड़ सकता है असर विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती हैं, तो भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है। इससे महंगाई और आर्थिक दबाव बढ़ने की आशंका है। रिपोर्ट्स के मुताबिक यूएई और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से उत्पादन को लेकर मतभेद थे.इसके अलावा कोटा सिस्टम से यूएई संतुष्ट नहीं था.वह अपनी मार्केट शेयर बढ़ाना चाहता है।  यूएई के बाहर निकलने का असर क्या होगा? यूएई के ओपेक से बाहर निकलने का असर काफी गहरा हो सकता है, जिससे सबसे पहले ओपेक की वैश्विक ताकत कमजोर पड़ सकती है.यूएई उन गिने-चुने देशों में शामिल था जिसके पास जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त तेल उत्पादन करने की बड़ी क्षमता थी, और उसके जाने से संगठन का दबदबा कम होना तय है.दूसरा बड़ा असर तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव के रूप में दिख सकता है. चूंकि अब सप्लाई को एक सुर में कंट्रोल करना मुश्किल होगा, इसलिए बाजार पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा वोलाटाइल हो सकता है. अंत में, इससे तेल बाजार पूरी तरह बिखर सकता है. जब हर देश संगठन की एकजुटता के बजाय अपने निजी फायदे और रणनीति के हिसाब से फैसले लेने लगेगा, तो इससे एकजुटता कम होगी और भविष्य में ग्लोबल मार्केट को संतुलित करना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा।  क्यों बढ़ रही हैं तेल की कीमतें? क्या आगे भी जारी रहेगी तेजी इस समय सबसे बड़ा कारण है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का बंद होना, जहां से दुनिया का करीब 20% तेल गुजरता है.ईरान युद्ध के कारण सप्लाई बाधित है और निर्यात कम हो गया है.इसी वजह से कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं.अगर हालात सामान्य होते हैं और यूएई ज्यादा उत्पादन शुरू करता है:सप्लाई बढ़ सकती है कीमतें फिर नीचे आ सकती हैं.लेकिन अभी बाजार अनिश्चित है कीमतें ऊंची बनी रह सकती हैं।  भारत पर क्या असर पड़ेगा? क्या पेट्रोल-डीजल होगा महंगा?  ग्लोबल ऑयल मार्केट में होने वाली इस हलचल का भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश पर सीधा और बड़ा असर पड़ता है. कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से न केवल पेट्रोल-डीजल महंगा होने का डर रहता है, बल्कि इससे माल ढुलाई की लागत बढ़ती है, जिससे सीधे तौर पर महंगाई में इजाफा होता है और देश का व्यापार घाटा भी बढ़ सकता है।  हालांकि, आम जनता के लिए राहत की बात यह है कि केंद्र सरकार ने फिलहाल कीमतों में बढ़ोतरी की किसी भी संभावना से इनकार किया है. पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने साफ किया है कि पेट्रोल … Read more

तेल के दामों में फिर बढ़ोतरी, डीजल ₹25 और पेट्रोल ₹7.4 महंगा, नायरा के बाद इस कंपनी ने भी बढ़ाए रेट

नई दिल्‍ली  नायरा के बाद निजी क्षेत्र की कंपनी शेल इंडिया (Shell India) ने भी पेट्रोल और डीजल के दामों में भारी बढ़ोतरी का ऐलान कर दिया है. कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आए उछाल के कारण तेल के दाम बढ़ाए गए हैं. मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट के अनुसार, शेल ने डीजल की कीमतों में सीधे ₹25.01 प्रति लीटर की वृद्धि की है. पेट्रोल की कीमतों में ₹7.41 प्रति लीटर की बढोतरी की गई है. इस वृद्धि के बाद सामान्य डीजल की कीमत शेल इंडिया के पंपों पर ₹123.52 और प्रीमियम वेरिएंट की कीमत ₹133.52 प्रति लीटर तक पहुंच गई है।  वहीं, बेंगलुरु में अब सामान्य पेट्रोल ₹119.85 और पावर वेरिएंट ₹129.85 प्रति लीटर की दर से बिक रहा है. स्थानीय करों (VAT) और परिवहन लागत के कारण अलग-अलग राज्यों और शहरों में इन कीमतों में मामूली अंतर हो सकता है, लेकिन कुल मिलाकर पूरे देश में शेल के आउटलेट्स पर अब ग्राहकों को जेब ज्यादा ढीली करनी पड़ रही है।  सरकारी कंपनियों ने नहीं बढ़ाए दाम जहां सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां (IOCL, BPCL, HPCL) कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बावजूद सरकार के हस्तक्षेप के कारण खुदरा कीमतों को स्थिर रखे हुए हैं, वहीं निजी कंपनियों को ऐसा करने पर सरकार से कोई वित्तीय मुआवजा या सब्सिडी नहीं मिलती. घाटे से बचने के लिए निजी कंपनियों के पास कीमतों को बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।  कच्‍चे तेल की कीमतों में वृद्धि ईंधन की कीमतों में इस अभूतपूर्व वृद्धि के पीछे मुख्य कारण कच्‍चे तेल के बढ़े दाम हैं. फरवरी के अंत में अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद से कच्चे तेल की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है. ब्रेंट क्रूड की कीमतों में लगभग 60 फीसदी तक का उछाल आया है. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चा तेल $100 प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ है. भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 85 फीसदी आयात करता है। 

तेल-गैस की तलाश में मेगा गेम शुरू, कीमतों में गिरावट और निवेश का मौका

नई दिल्ली  भारत सरकार ने तेल और प्राकृतिक गैस की खोज को बढ़ावा देने के लिए एक बड़ा फैसला लेते हुए देश के 2.62 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को एक्सप्लोरेशन के लिए खोल दिया है. यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है और भारत अपनी जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है. सरकार का मकसद साफ है कि आने वाले वर्षों में देश को ऊर्जा के मामले में ज्यादा आत्मनिर्भर बनाया जाए और घरेलू उत्पादन को बढ़ाया जाए।  क्या है पूरा फैसला और कितना बड़ा है इसका दायरा: सरकार ने कुल 2,62,817 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को एक्सप्लोरेशन के लिए खोला है, जिसमें जमीन के साथ साथ समुद्री क्षेत्र भी शामिल हैं. यह कोई छोटा कदम नहीं है, बल्कि भारत के कुल सेडिमेंटरी बेसिन का बड़ा हिस्सा अब कंपनियों के लिए उपलब्ध हो गया है. इसका मतलब है कि अब पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा इलाकों में तेल और गैस की तलाश की जा सकेगी।  OALP मॉडल क्या है और कंपनियों को कैसे फायदा मिलेगा: यह पूरा प्रोसेस ओपन एकरेज लाइसेंसिंग प्रोग्राम यानी OALP के तहत किया जा रहा है. इस मॉडल की खास बात यह है कि इसमें सरकार खुद ब्लॉक ऑफर करने के बजाय कंपनियों को यह आजादी देती है कि वे अपनी पसंद के इलाकों को पहचान कर वहां के लिए बोली लगा सकें. इससे कंपनियों की दिलचस्पी बढ़ती है और एक्सप्लोरेशन ज्यादा टारगेटेड तरीके से हो पाता है।  किन इलाकों में होगा एक्सप्लोरेशन और क्या है संभावना: इस फैसले के तहत 26 सेडिमेंटरी बेसिन के ब्लॉक्स को शामिल किया गया है. ये वही इलाके होते हैं जहां भूगर्भीय संरचना ऐसी होती है कि तेल और गैस मिलने की संभावना ज्यादा रहती है. हालांकि संभावना होना और असल में रिजर्व मिलना दो अलग बातें हैं, इसलिए हर ब्लॉक में सफलता की गारंटी नहीं होती। समुद्र पर बढ़ता फोकस और समुद्र मंथन पहल: सरकार इस बार खासतौर पर डीप सी एक्सप्लोरेशन पर जोर दे रही है, जो प्रधानमंत्री के समुद्र मंथन इनिशिएटिव का हिस्सा है. बंगाल की खाड़ी और अरब सागर जैसे इलाकों में बड़ी संभावनाएं मानी जाती हैं, लेकिन यहां काम करना तकनीकी रूप से ज्यादा चुनौतीपूर्ण और महंगा होता है।  विदेशी और निजी कंपनियों के लिए बड़ा मौका: इस कदम के जरिए सरकार ने साफ तौर पर ग्लोबल ऑयल और गैस कंपनियों को भारत में निवेश के लिए न्योता दिया है. रिलायंस, ओएनजीसी के अलावा बीपी, शेल, टोटल और एक्सॉन जैसी विदेशी कंपनियां भी इसमें दिलचस्पी दिखा सकती हैं. इससे न सिर्फ निवेश आएगा बल्कि नई तकनीक और विशेषज्ञता भी देश में आएगी।  भारत की आयात निर्भरता कम करने की कोशिश: भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जो अर्थव्यवस्था पर बड़ा बोझ डालता है. अगर घरेलू स्तर पर उत्पादन बढ़ता है, तो इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और वैश्विक कीमतों में उतार चढ़ाव का असर भी कम होगा. यही इस फैसले के पीछे की सबसे बड़ी रणनीतिक सोच है।  चुनौतियां भी कम नहीं हैं, समय और लागत दोनों भारी: तेल और गैस की खोज कोई आसान या जल्दी होने वाली प्रक्रिया नहीं है. इसमें कई साल लग जाते हैं और भारी निवेश करना पड़ता है. कई बार कंपनियों को सालों की मेहनत के बाद भी कुछ नहीं मिलता, इसलिए जोखिम भी काफी ज्यादा होता है।  कब दिखेगा असर और क्या है आगे की तस्वीर: इस फैसले का असर तुरंत नहीं दिखेगा क्योंकि एक्सप्लोरेशन से लेकर प्रोडक्शन तक पहुंचने में 5 से 10 साल तक का समय लग सकता है. लेकिन अगर कुछ बड़े रिजर्व मिलते हैं, तो आने वाले समय में भारत की ऊर्जा स्थिति मजबूत हो सकती है और देश को आयात पर कम निर्भर रहना पड़ेगा।