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ऊर्जा सुरक्षा पर भारत का बड़ा दांव, 40 हजार करोड़ की परियोजना से तेल-गैस संकट का मिलेगा समाधान

नई दिल्ली ईरान की अमेरिका और इजरायल के खिलाफ जंग एक बार फिर जोर पकड़ती दिख रही है. अमेरिका ने अपने अपाचे हेलिकॉप्टर पर हमले पर बदला लेने के लिए होर्मुज के पास ईरान के अहम ठिकानों पर बुधवार तड़के (भारतीय समय) हमला कर दिया. वहीं ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी आईआरजीसी ने बहरीन स्थित अमेरिका के पांचवें बेड़े को निशाना बनाने का दावा किया है. अमेरिका और ईरान के बीच इस ताजा वार और पलटवार ने होर्मुज स्ट्रेट के जल्द दोबारा खुलने की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. होर्मुज की नाकेबंदी की वजह से मंडराते तेल-गैस के संकट के बीच भारत एक ऐसे मेगा प्रोजेक्ट पर गंभीरता से कदम आगे बढ़ा रहा है, जो आने वाले दशकों के लिए देश की ऊर्जा सुरक्षा की तस्वीर बदल सकता है. ओमान से गुजरात तक अरब सागर के नीचे लगभग 2,000 किलोमीटर लंबी डीप-सी गैस पाइपलाइन बिछाने की योजना को फिर से गति मिली है. करीब 40,000 करोड़ रुपये की लागत वाले इस प्रोजेक्ट को भारत के लिए ‘होर्मुज संकट का स्थायी समाधान’ माना जा रहा है।  भारत अपनी जरूरत का 50 प्रतिशत से ज्यादा प्राकृतिक गैस आयात करता है. इसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से एलएनजी (LNG) के रूप में आता है और होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है. यह वही समुद्री रास्ता है, जहां हाल के महीनों में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. अगर किसी वजह से होर्मुज स्ट्रेट बंद होता है या वहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो भारत समेत दुनिया के कई देशों की ऊर्जा आपूर्ति पर सीधा असर पड़ सकता है।  ओमान से गुजरात तक पाइपलाइन यही वजह है कि भारत अब ओमान से सीधे गैस लाने के विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रहा है. प्रस्तावित पाइपलाइन ओमान को सीधे गुजरात से जोड़ेगी और इसके जरिए गैस समुद्र के रास्ते टैंकरों में लाने की बजाय सीधे पाइपलाइन से भारत पहुंचेगी. इससे न केवल सप्लाई अधिक स्थिर होगी बल्कि समुद्री संकटों का असर भी काफी हद तक कम हो जाएगा।  इस परियोजना की सबसे बड़ी खासियत इसकी तकनीकी जटिलता है. पाइपलाइन का कुछ हिस्सा समुद्र तल से 3,000 मीटर से भी अधिक गहराई में बिछाया जाएगा. इतनी गहराई पर पाइपलाइन निर्माण दुनिया की सबसे चुनौतीपूर्ण इंजीनियरिंग परियोजनाओं में गिना जाता है. अगर यह योजना सफल होती है तो यह दुनिया की सबसे गहरी समुद्री गैस पाइपलाइनों में से एक होगी।  इस प्रोजेक्ट को लंबे समय से बढ़ावा देने वाली कंपनी साउथ एशिया गैस एंटरप्राइज (SAGE) का दावा है कि वह पहले ही तकनीकी और वित्तीय अध्ययन के साथ-साथ समुद्र तल का सर्वेक्षण भी कर चुकी है. रिपोर्ट्स के मुताबिक पेट्रोलियम मंत्रालय ने अब सरकारी कंपनियों जैसे गेल, इंडिया ऑयल कॉर्पोरेशन और इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड को विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने का काम सौंपा है।  गैस आयात हो जाएगा सस्ता एनर्जी एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह परियोजना सिर्फ गैस आयात का माध्यम नहीं होगी, बल्कि भारत और खाड़ी देशों के बीच रणनीतिक संबंधों को भी नई मजबूती देगी. ओमान को लंबे समय के लिए स्थायी ग्राहक मिलेगा, जबकि भारत को गैस की सुरक्षित और लगातार आपूर्ति सुनिश्चित हो सकेगी।  वर्तमान में एलएनजी आयात की प्रक्रिया काफी लंबी और महंगी है. पहले गैस को तरल रूप में बदला जाता है, फिर विशेष जहाजों से हजारों किलोमीटर दूर ले जाया जाता है और भारत पहुंचने पर दोबारा गैस में परिवर्तित किया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में भारी खर्च आता है. प्रस्तावित पाइपलाइन के जरिए गैस सीधे स्रोत से उपभोक्ता तक पहुंचेगी. शुरुआती अनुमान के मुताबिक गैस परिवहन की लागत 2 से 2.25 डॉलर प्रति MMBtu के बीच रह सकती है, जो कई परिस्थितियों में एलएनजी आयात से प्रतिस्पर्धी साबित हो सकती है।  इस प्रोजेक्ट में क्या है रोड़ा? हालांकि इस महत्वाकांक्षी परियोजना के सामने कई बड़ी चुनौतियां भी हैं. सबसे बड़ी चुनौती इंजीनियरिंग की है. समुद्र की 3,000 मीटर गहराई पर पाइपलाइन बिछाना और उसका रखरखाव करना बेहद जटिल और महंगा काम होगा. किसी भी तकनीकी खराबी या रिसाव की स्थिति में मरम्मत करना आसान नहीं होगा. इसके लिए विशेष जहाजों और अत्याधुनिक उपकरणों की जरूरत पड़ेगी।  दूसरी बड़ी चुनौती लागत और फंडिंग की है. 40,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत शुरुआती आंकड़ा है. ऐसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में अक्सर लागत बढ़ जाती है. इसके अलावा यह भी तय करना होगा कि निवेश कौन करेगा, लागत का बंटवारा कैसे होगा और गैस खरीद के दीर्घकालिक समझौते किस प्रकार होंगे।  तीन दशक से अटका था काम फिर भी हालात बदल चुके हैं. तीन दशक पहले जब यह परियोजना पहली बार सामने आई थी, तब तकनीक और आर्थिक व्यवहार्यता सबसे बड़ी बाधा थीं. लेकिन अब ऊर्जा सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम हिस्सा बन चुकी है. रूस-यूक्रेन युद्ध, लाल सागर संकट और अब होर्मुज क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने यह दिखा दिया है कि किसी एक समुद्री मार्ग पर अत्यधिक निर्भरता कितनी जोखिम भरी हो सकती है।  विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह परियोजना सफल होती है तो भविष्य में इसी नेटवर्क का इस्तेमाल हाइड्रोजन जैसे स्वच्छ ईंधनों के परिवहन के लिए भी किया जा सकता है. यानी यह सिर्फ आज की जरूरत नहीं, बल्कि आने वाले दशकों की ऊर्जा रणनीति का आधार बन सकती है।  यही कारण है कि ओमान-गुजरात डीप-सी गैस पाइपलाइन को सिर्फ एक ऊर्जा परियोजना नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है. होर्मुज संकट ने जिस खतरे की ओर दुनिया का ध्यान खींचा है, भारत उसी का स्थायी समाधान खोजने में जुटा हुआ है. अगर यह मेगा प्लान जमीन पर उतरता है, तो देश की तेल-गैस आपूर्ति पहले की तुलना में कहीं अधिक सुरक्षित और भरोसेमंद हो सकती है।   

‘2-3 हफ्तों में तेल की कीमतों में बड़ा उछाल’, Hormuz संकट पर ग्लोबल ऑयल कंपनियों की वॉर्निंग

 नई दिल्ली करीब दो महीने पहले अमेरिका के इन्वेस्टमेंट बैंक जेपी मॉर्गन ने एक विश्लेषण जारी किया था, जिसमें सवाल पूछा गया था कि 'दुनिया के पास काम चलाने लायक कच्चे तेल का न्यूनतम स्टॉक खत्म होने में कितना वक्त लगेगा?.' इसका सार ये था कि भले ही बाजार में करोड़ों बैरल तेल मौजूद हो, लेकिन अगर इस्तेमाल के लिए उपलब्ध भंडार बहुत कम हो जाए तो पूरी व्यवस्था चरमरा जाती है. इंसानी शरीर में ब्लड प्रेशर की तरह असली मुद्दा तेल की मात्रा नहीं, बल्कि उसके लगातार प्रवाह का है।  करीब चार हफ्ते बाद बैंक ने एक और विश्लेषण जारी किया, जिसमें बताया गया कि .होर्मुज स्ट्रेट सितंबर तक क्यों खुल जाएगा… किसी न किसी तरह. बैंक के मुताबिक, 2026 की शुरुआत में वैश्विक तेल भंडार 8.4 अरब बैरल था, लेकिन उसमें से केवल 0.8 अरब बैरल ही ऐसा था जिसे इस्तेमाल किया जा सकता था।  संक्षेप में कहें तो, अगर होर्मुज स्ट्रेट बंद रहता है और तेल की महंगाई के कारण मांग में कमी 55 लाख बैरल प्रतिदिन पर स्थिर रहती है, तो OECD देशों (Organisation For Economic Co-operation and Development) के कमर्शियल तेल भंडार जून तक भारी दबाव में आ सकते हैं।  इसके बाद सितंबर तक दुनिया के तेल भंडार उस न्यूनतम स्तर पर पहुंच सकते हैं, जहां से सामान्य संचालन करना मुश्किल हो जाएगा. दिलचस्प बात यह है कि जेपीमॉर्गन की पिछली रिपोर्ट के बाद तेल की कीमतें बढ़ने के बजाय घटी हैं, इसलिए मांग में गिरावट की रफ्तार भी धीमी पड़ गई है।  सप्लाई कम फिर भी गिर रही तेल की कीमतें… बड़ा तूफान आने वाला है इस दौरान सबसे हैरानी वाली बात यह रही कि होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से रोजाना करीब 1 करोड़ बैरल तेल जरूरतमंद देशों तक नहीं पहुंच पा रहा था. सामान्य तौर पर ऐसी स्थिति में कीमतें तेजी से बढ़नी चाहिए थीं ताकि मांग कम हो जाए. लेकिन इसके उलट मार्च के आखिर में बहुत अधिक बढ़ने और फिर एक महीने बाद दोबारा बढ़ने के बाद तेल की कीमतें गिरने लगीं. इससे मांग कम होने के बजाय और बढ़ी है. इसी वजह से जेपीमॉर्गन ने रिपोर्ट जारी कर कहा था कि वैश्विक तेल बाजार के गणित में कुछ गड़बड़ है।  इसके कुछ हफ्ते बाद गोल्डमैन सैक्स ने भी कहा कि होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने के बावजूद, मई में वैश्विक तेल भंडार रिकॉर्ड 87 लाख बैरल प्रतिदिन की दर से घटे।  फिर भी मई में तेल की कीमतें काफी नीचे रहीं. इसकी एक बड़ी वजह बाजार को रोजाना दिए जाने वाले वो संकेत थे जिनमें सरकारी और गैर-सरकारी सूत्र लगातार यह कह रहे थे कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता बस होने ही वाला है।  लेकिन ऐसा नहीं हुआ. तेल बाजार भले ही इस खतरे को नजरअंदाज करना चाहे, लेकिन अब तेल उद्योग की बड़ी कंपनियां खुलकर चेतावनी देने लगी हैं।  तेल स्टोरेज खत्म होने का झटका बाजार सह नहीं पाएगा हाल ही में शेवरॉन के CEO माइक वर्थ ने कहा कि अगले दो महीनों में तेल की कीमतें बढ़ने की संभावना है क्योंकि पहले से ही बेहद कम स्तर पर मौजूद कच्चे तेल के भंडार ईरान युद्ध की वजह से लगातार घट रहे हैं।  उन्होंने गुरुवार को एक कॉन्फ्रेंस में कहा, 'सुरक्षा के लिए मौजूद अतिरिक्त भंडार खत्म हो रहा है और ऐसा झटका सहने की क्षमता भी खत्म होती जा रही है. बाजार के पास इस असंतुलन को संभालने की क्षमता अब पहले की तुलना में काफी कम रह गई है।  उन्होंने आगे कहा, 'अगले कुछ हफ्तों में यह दबाव सीधे तेल की कीमतों में दिखने लगेगा. जून और खासकर जुलाई में कीमतें ऊपर जाएंगी।  वर्थ की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब पिछले एक हफ्ते में तेल की कीमतों में करीब 10% की गिरावट आई है. इसकी वजह यह उम्मीद रही कि अमेरिका और ईरान तीन महीने से चल रहे संघर्ष को खत्म करने के लिए कोई समझौता कर सकते हैं. इसी संघर्ष के कारण होर्मुज स्ट्रेट बंद है, जो दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से के कच्चे तेल की आवाजाही का रास्ता है।  उनकी चेतावनी से यह चिंता भी बढ़ गई है कि अगर युद्ध खत्म करने के लिए कोई समझौता हो भी जाता है तब भी तेल की कीमतें महीनों तक ऊपर बनी रह सकती हैं. वैसे भी फिलहाल ऐसा कोई समझौता होता हुआ नजर नहीं आ रहा. इस संघर्ष के कारण वैश्विक बाजार से रोजाना 1.2 से 1.3 करोड़ बैरल तेल की आपूर्ति गायब हो चुकी है।  युद्ध खत्म हो भी जाए तब भी अगले साल तक नहीं सुधरेंगे तेल बाजार के हालात वर्थ की बात अन्य तेल अधिकारियों की चेतावनियों से भी मेल खाती है. इनमें संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की सरकारी तेल कंपनी Adnoc के प्रमुख भी शामिल हैं. उन्होंने पिछले सप्ताह कहा था कि अगर संघर्ष खत्म भी हो जाए, तब भी होर्मुज स्ट्रेट में तेल की सामान्य आवाजाही अगले साल से पहले बहाल होने की संभावना नहीं है।  ADNOC के सीईओ सुल्तान अल-जाबेर ने 21 मई को एक प्रोग्राम में कहा, 'संघर्ष से पहले के स्तर की 80% तेल आपूर्ति बहाल होने में कम से कम चार महीने लगेंगे और पूरी क्षमता से तेल प्रवाह 2027 की पहली या शायद दूसरी तिमाही से पहले शुरू नहीं होगा।  जेपीमॉर्गन की तरह वर्थ ने भी कहा कि युद्ध शुरू होने के बाद तेल की कीमतें उतनी नहीं बढ़ीं जितनी उम्मीद थी. इसकी वजह यह रही कि देशों ने इमर्जेंसी के लिए अच्छी मात्रा में तेल जमा कर रखा था, अमेरिका ने बाजार को तेल दिया और ईरान, रूस, वेनेजुएला के प्रतिबंधित तेल भी बाजार में पहुंचे. लेकिन अब ये भंडार तेजी से घट रहे हैं।  ऑयल प्राइस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें एक बड़ा फैक्टर चीन के तेल भंडार हैं जो चुपचाप तेजी से कम हो रहे हैं. इसमें कमर्शियल और स्ट्रैटेजिक दोनों तरह के भंडार शामिल हैं. चीन के रणनीतिक भंडार में करीब 1.4 अरब बैरल तेल होने का अनुमान है. अगर चीन इन्हें बड़े पैमाने पर बाजार में उतारता है, तो संकट कुछ समय के लिए टल सकता है।  वर्थ ने यह भी कहा कि मौजूदा ऊर्जा संकट सरकारों को सीख देगा कि वो भविष्य के लिए … Read more

क्या आने वाला है नया ऑयल क्राइसिस? तेजी से खत्म हो रहे भंडार ने बढ़ाई दुनिया की टेंशन

 नई दिल्ली ईरान जंग के कारण होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी से दुनिया में तेल खत्म होने का खतरा तेजी से बढ़ रहा है. तीन महीने पहले तक यह संभावना बेहद कम लग रही थी, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. होर्मुज स्ट्रेट लगभग पूरी तरह बंद रहने के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की भारी कमी का खतरा बढ़ता जा रहा है।  विश्लेषकों को अब अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच युद्ध जल्द खत्म होने की उम्मीद नहीं है. इसके बजाय उनका कहना है कि युद्ध लंबे समय तक चल सकता है जिससे एनर्जी सप्लाई लंबे समय तक बाधित रह सकती है. उनके अनुसार, तेल आपूर्ति की तस्वीर बिल्कुल अच्छी नहीं दिख रही।  डेटा एनालिटिक्स फर्म केप्लर की रिपोर्ट के मुताबिक, 28 फरवरी से 8 मई तक मध्य पूर्व में तेल आपूर्ति में कुल 78.2 करोड़ बैरल की कमी आ चुकी थी और इस महीने के अंत तक यह आंकड़ा 1 अरब बैरल तक पहुंच सकता है।  दैनिक उत्पादन के हिसाब से भी हालात गंभीर हैं. सऊदी अरब रोजाना 30 लाख बैरल से ज्यादा तेल उत्पादन गंवा रहा है. इराक का तेल उत्पादन 28.8 लाख बैरल प्रतिदिन कम हो गया है, जबकि ईरान का उत्पादन 16.9 लाख बैरल प्रतिदिन घटा है. कुवैत में भी रोजाना 17.5 लाख बैरल की गिरावट दर्ज की गई है।  तेल उत्पादन घटा, दुनिया रिजर्व रखे तेल पर चल रही इतने बड़े स्तर पर तेल उत्पादन बंद होने के बाद दुनिया पहले से निकाले गए तेल के भंडार को इस्तेमाल कर रही है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) पहले कह चुकी थी कि दुनिया के तेल भंडार रिकॉर्ड स्तर पर हैं और इसी वजह से बाजार में भारी अतिरिक्त सप्लाई की संभावना थी. लेकिन यह अनुमान युद्ध शुरू होने से पहले का था. अब IEA चेतावनी दे रही है कि इस साल तेल की मांग सप्लाई से ज्यादा हो जाएगी।  'द ऑयल प्राइस' की रिपोर्ट के मुताबिक, IEA की ताजा मासिक रिपोर्ट के अनुसार, इस साल वैश्विक तेल आपूर्ति में रोजाना करीब 39 लाख बैरल की गिरावट आ सकती है. हालांकि, यह आंकड़ा भी मध्य पूर्व में मौजूदा वास्तविक नुकसान से काफी कम है. एजेंसी का अनुमान है कि मध्य पूर्व में आपूर्ति में 1.05 करोड़ बैरल प्रतिदिन की कमी हो चुकी है. दूसरी ओर, मांग में सिर्फ 4.2 लाख बैरल प्रतिदिन की गिरावट आने का अनुमान है।  अटलांटिक काउंसिल के ग्लोबल एनर्जी सेंटर की वरिष्ठ फेलो एलेन वाल्ड ने वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा, 'खपत को एक सीमा तक ही कम किया जा सकता है. जब भंडार खत्म होंगे तो वे सचमुच खत्म हो जाएंगे. एक वक्त आएगा जब तेल की मांग और सप्लाई के बीच बड़ी खाई पैदा होगी और बाजार बुरी तरह हिल जाएगा. कीमतें तेजी से ऊपर जाएंगी।  सऊदी अरामको के सीईओ ने भी दी है वॉर्निंग यह चेतावनी अरामको के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) अमीन नासिर के बयान से भी मेल खाती है. उन्होंने कहा था कि दुनिया में जमीन पर मौजूद ईंधन भंडार रिकॉर्ड गति से घट रहे हैं. उनके मुताबिक, जमीन पर मौजूद तेल भंडार इस समय बाजार के लिए 'एकमात्र सुरक्षा कवच' हैं, लेकिन अब वे भी तेजी से कम हो रहे हैं।  जमीन पर मौजूद तेल भंडार का मतलब उस तेल से होता है जो पहले ही जमीन से निकाल लिया गया है और बाद में इस्तेमाल के लिए बड़े टैंकरों, स्टोरेज फैसिलिटीज या रिजर्व में रखा गया हो. इस तेल को जरूरत की स्थिति, जैसे युद्ध, सप्लाई रुकना या कीमतें बढ़ना, में इस्तेमाल किया जाता है।  जेपी मॉर्गन के कमोडिटी विश्लेषकों ने भी चेतावनी दी है कि अगले महीने तक विकसित देशों में व्यावसायिक तेल भंडार 'ऑपरेशनल तनाव' के स्तर तक पहुंच सकते हैं. इसका मतलब है कि तेल आपूर्ति में आई कमी को संभालना और मुश्किल हो जाएगा।  तेल की कमी इतनी होगी कि होर्मुज खोलना ही होगा जेपी मॉर्गन की वैश्विक कमोडिटी रणनीति प्रमुख नताशा कानेवा ने कहा, 'हमारा निष्कर्ष है कि किसी न किसी तरह जून में होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलना ही होगा.' उनके अनुसार, दुनिया तेल संकट से तभी बच सकती है जब युद्ध खत्म हो. अगर ऐसा नहीं हुआ तो अगला चरण सिर्फ कच्चे तेल की कीमतों में उछाल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रिफाइनिंग और अंतिम उपभोक्ता तक ईंधन पहुंचाने का संकट बन सकता है।  अमीन नासिर ने यह भी कहा कि बाजार में तेल भंडार की उपलब्धता को बढ़ा-चढ़ाकर आंका जा रहा है. उन्होंने बताया कि स्टोरेज में मौजूद सारा तेल वास्तव में इस्तेमाल के लिए उपलब्ध नहीं होता. उसका बड़ा हिस्सा पाइपलाइन, न्यूनतम टैंक स्तर और अन्य परिचालन जरूरतों में फंसा रहता है. उन्होंने कहा, 'यूरोप और अमेरिका में स्टोरेज से रोजाना अधिकतम 20 लाख बैरल तेल ही निकाला जा सकता है।  केप्लर के अनुसार, फिलहाल भंडार से तेल निकासी सीमित स्तर पर है. मार्च के आखिर से अब तक जमीन पर मौजूद भंडार से करीब 6 करोड़ बैरल तेल निकाला जा चुका है. इसके बावजूद अभी करीब 3 अरब बैरल तेल स्टोरेज में मौजूद है, हालांकि उसमें से कितना वास्तव में उपलब्ध है, यह साफ नहीं है।  कमजोर होता दुनिया का सुरक्षा कवच विश्लेषकों का कहना है कि अगर मध्य पूर्व में आपूर्ति संकट लंबा खिंचता है तो भंडार तेजी से घटेंगे और उन्हें दोबारा भरने के लिए पर्याप्त नई सप्लाई उपलब्ध नहीं होगी. यानी युद्ध जितना लंबा चलेगा, दुनिया का सुरक्षा कवच उतना कमजोर होता जाएगा।  हालांकि, कुछ राहत की खबर भी है. वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक, बाजार अब इस स्थिति का आदी होने लगा है. भंडार से तेल निकालने की वजह से तत्काल घबराहट कम हुई है और अब बाजार कमी को मैनेज करना सीख रहा है जिसका मतलब है कि तेल की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं।  कैपिटल इकोनॉमिक्स के कमोडिटी अर्थशास्त्री हमाद हुसैन ने कहा, 'तेल कार्गो की तत्काल खरीद की होड़ अब कम हो गई है. लेकिन हम तेजी से भंडार खाली कर रहे हैं और इसका सीधा असर कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में दिखाई देगा। 

सऊदी और यूएई ने होर्मुज को बायपास किया, भारत तक तेल सप्लाई का नया मार्ग तय

  नई दिल्ली ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल का युद्ध शुरू होने के बाद जब होर्मुज स्ट्रेट बंद हुआ तो भारत के लिए तेल और गैस की किल्लत हो गई. तेल और गैस के लिए सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे खाड़ी देशों पर निर्भर भारत के लिए होर्मुज का बंद होना बड़ा झटका साबित हुआ. इस बीच रूसी तेल पर लगे बैन के हटने से भारत को राहत मिली लेकिन सऊदी, यूएई से भारत को तेल सप्लाई कुछ समय के लिए लगभग बंद हो गई. लेकिन दोनों खाड़ी देशों ने इसका तोड़ भी निकाल लिया और होर्मुज को बायपास कर कच्चा तेल अब भारत तक पहुंचाने लगे हैं।  सऊदी अरब से भारत को कच्चे तेल की सप्लाई अब सामान्य हो गई है और यूएई से आने वाली खेप पिछले साल के औसत से काफी ज्यादा चल रही है. ऐसा इसलिए संभव हो सका है क्योंकि दोनों देशों ने होर्मुज स्ट्रेट में रुकावट के बीच वैकल्पिक बंदरगाहों से लोडिंग बढ़ा दी है।    शिप-ट्रैकिंग फर्म केप्लर के वरिष्ठ रिसर्च एनालिस्ट निखिल दुबे ने इकोनॉमिक टाइम्स से कहा कि सऊदी अरब और यूएई से बढ़ी सप्लाई, ईरान और वेनेजुएला से दोबारा शुरू हुए आयात, और रूस से अधिक खरीद ने खाड़ी क्षेत्र से आई कमी की आंशिक भरपाई की है. इससे अप्रैल में भारत को कच्चे तेल की उपलब्धता बनी रही।  केप्लर के मुताबिक, 1 से 26 अप्रैल के बीच भारत का औसत कच्चा तेल आयात 44 लाख बैरल प्रतिदिन रहा, जो फरवरी के 52 लाख बैरल प्रतिदिन के मुकाबले करीब 15% कम है. इसकी मुख्य वजह यह है कि भारत के दूसरे सबसे बड़े स्रोत इराक से सप्लाई अभी भी बंद है, साथ ही कुवैत और कतर से भी आपूर्ति रुकी हुई है।  अप्रैल में सऊदी अरब ने भारत को 6.97 लाख बैरल प्रतिदिन तेल भेजा, जबकि वित्त वर्ष 2025-26 का औसत 6.68 लाख बैरल प्रतिदिन था. वहीं, यूएई से सप्लाई 6.19 लाख बैरल प्रतिदिन रही, जो पिछले वित्त वर्ष के 4.33 लाख बैरल प्रतिदिन औसत से काफी ज्यादा है।  सऊदी अरब और यूएई होर्मुज के बंद होने के बीच भारत कैसे पहुंचा रहे अपना तेल? सऊदी अरब ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के जरिए भारत तक तेल भेज रहा है. फारस की खाड़ी स्थित रास तनुरा बंदरगाह से भेजी जाने वाली तेल की खेप 70 लाख बैरल प्रतिदिन क्षमता वाली पाइपलाइन के जरिए लाल सागर के यनबू टर्मिनल तक आ रही है।  दूसरी ओर यूएई 17 लाख बैरल प्रतिदिन क्षमता वाली ADCOP पाइपलाइन के जरिए तेल को फुजैरा बंदरगाह तक भेज रहा है, जो ओमान की खाड़ी पर स्थित है. इन दोनों देशों के अलावा खाड़ी के अन्य उत्पादक देश अब भी निर्यात के लिए बड़े पैमाने पर होर्मुज पर निर्भर हैं।  भारत ने ओमान से भी तेल खरीद बढ़ा दी है क्योंकि उसका तेल होर्मुज के जरिए नहीं आता. अप्रैल में भारत को ओमान से 1.01 लाख बैरल प्रतिदिन तेल मिला, जबकि 2025-26 का औसत केवल 18 हजार बैरल प्रतिदिन था।  युद्ध के बाद रूस और ईरान के तेल पर अमेरिकी प्रतिबंधों में ढील से भारतीय रिफाइनरों को राहत मिली है, जो होर्मुज संकट के बाद विकल्प तलाश रहे थे। अप्रैल में सात साल बाद ईरान से 1.51 लाख बैरल प्रतिदिन और नौ महीने बाद वेनेजुएला से 2.58 लाख बैरल प्रतिदिन सप्लाई फिर शुरू हुई। हालांकि अमेरिका से भारत को तेल सप्लाई कम रही. अप्रैल में यह घटकर 1.15 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई, जबकि 2025-26 का औसत 3.14 लाख बैरल प्रतिदिन था।  रूस से सप्लाई, जो जनवरी-फरवरी में अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण घटी थी, मार्च में दोगुनी होकर 20 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंच गई थी. लेकिन अप्रैल में रूसी तेल की उपलब्धता कम रही जिस कारण यह घटकर 16 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई। 

क्रूड ऑयल के दाम 111 डॉलर पार, पेट्रोल 393 रुपये पर, कई देशों में तेल संकट बढ़ा

मुंबई यूनाइटेड अरब अमीरात (UAE) के फैसले से दुनिया भर में तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है. ब्रेंट क्रूड करीब 2.8% बढ़कर 111 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया, जबकि WTI भी लगभग 100 डॉलर के आसपास है. इसी बीच UAE ने 1 मई से OPEC और OPEC+ छोड़ने का बड़ा फैसला लिया है.इससे पूरी दुनिया के तेल बाजार, कीमतों और सप्लाई सिस्टम पर असर पड़ सकता है।  OPEC और OPEC+ क्या है? ओपेक यानी ऑर्गनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (OPEC) एक ऐसा ग्रुप है जिसमें बड़े तेल उत्पादक देश शामिल हैं. इसमें सऊदी अरब, इराक, ईरान, कुवैत जैसे देश शामिल हैं और हाल तक यूएई भी इसका हिस्सा था.इसका मुख्य काम तेल उत्पादन को कंट्रोल करके कीमतों को मैनेज करना है।  OPEC कैसे काम करता है?  ओपेक तरराष्ट्रीय तेल बाजार  में बैलेंस बनाए रखने की कोशिश करता है.जब वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें गिरने लगती हैं, तो ओपेक देश मिलकर तेल की सप्लाई (उत्पादन) में कटौती कर देते हैं, ताकि मांग के मुकाबले आपूर्ति कम होने से कीमतें फिर से स्थिर हो सकें.इसके विपरीत, जब तेल की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ जाती हैं और दुनिया भर में ऊर्जा संकट का खतरा मंडराने लगता है, तो ओपेक उत्पादन बढ़ाकर बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ा देता है.इससे सदस्य देशों की कमाई  सुरक्षित बनी रहती है और और ग्लोबल मार्केट में कीमतों में  ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं होता।  OPEC क्या है और क्यों इतना ताकतवर है? ओपेक+ में ओपेक के साथ कुछ और देश भी जुड़े हैं, जैसे रूस.यह 2016 में तब बना जब तेल की कीमतें गिर गई थीं और ओपेक अकेले बाजार को संभाल नहीं पा रहा था.आज ओपेक+ दुनिया के करीब 40-50% तेल उत्पादन को कंट्रोल करता है।  ओपेक+ (OPEC+) की असली ताकत इस बात में छिपी है कि यह संगठन दुनिया के तेल सप्लाई के एक बहुत बड़े हिस्से को कंट्रोल करता है.जब भी ओपेक+ के सदस्य देश कोई फैसला लेते हैं, तो उसका असर तुरंत अंतरराष्ट्रीय बाजार पर दिखाई देता है और तेल की कीमतें पलक झपकते ही ऊपर-नीचे होने लगती हैं.चूंकि दुनिया की इकोनॉमी तेल पर टिकी है, इसलिए इनके फैसलों का सीधा असर हर देश की महंगाई, ट्रांसपोर्ट की लागत और पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है.यही वजह है कि ओपेक+ को इतना ताकतवर माना जाता है, क्योंकि यह पूरी दुनिया की जेब और बाजार की दिशा बदल सकती है।  यूएई ने ओपेक क्यों छोड़ा? जान लें वजह इसके अलावा, यूएई को भविष्य की भी चिंता है क्योंकि रिन्यूएबल एनर्जी(Renewable Energy) के बढ़ते चलन के कारण आने वाले समय में तेल की मांग घट सकती है. ऐसे में यूएई की सोच यह है कि आज का तेल भविष्य की तुलना में ज्यादा कीमती हो सकता है, इसलिए वह अभी अपनी पूरी क्षमता का इस्तेमाल करके ज्यादा से ज्यादा कमाई करना चाहता है. ओपेक की पाबंदियों से बाहर निकलकर वह अपनी इकोनॉमी को और मजबूत करने और भविष्य के जोखिमों से निपटने की तैयारी कर रहा है।  घरेलू वायदा बाजार में गिरावट जहां अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी दिखी, वहीं घरेलू स्तर पर मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। क्रूड ऑयल करीब 0.88% यानी 84 रुपये गिरकर 9,401 रुपये पर कारोबार करता दिखा।  होरमुज जलडमरूमध्य बना चिंता का कारण Strait of Hormuz को लेकर बनी अनिश्चितता भी कीमतों में तेजी की बड़ी वजह है। यह अहम समुद्री मार्ग वैश्विक तेल और LNG सप्लाई का लगभग 20% संभालता है, और यहां किसी भी तरह की बाधा का सीधा असर बाजार पर पड़ सकता है। भारत पर पड़ सकता है असर विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती हैं, तो भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है। इससे महंगाई और आर्थिक दबाव बढ़ने की आशंका है। रिपोर्ट्स के मुताबिक यूएई और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से उत्पादन को लेकर मतभेद थे.इसके अलावा कोटा सिस्टम से यूएई संतुष्ट नहीं था.वह अपनी मार्केट शेयर बढ़ाना चाहता है।  यूएई के बाहर निकलने का असर क्या होगा? यूएई के ओपेक से बाहर निकलने का असर काफी गहरा हो सकता है, जिससे सबसे पहले ओपेक की वैश्विक ताकत कमजोर पड़ सकती है.यूएई उन गिने-चुने देशों में शामिल था जिसके पास जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त तेल उत्पादन करने की बड़ी क्षमता थी, और उसके जाने से संगठन का दबदबा कम होना तय है.दूसरा बड़ा असर तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव के रूप में दिख सकता है. चूंकि अब सप्लाई को एक सुर में कंट्रोल करना मुश्किल होगा, इसलिए बाजार पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा वोलाटाइल हो सकता है. अंत में, इससे तेल बाजार पूरी तरह बिखर सकता है. जब हर देश संगठन की एकजुटता के बजाय अपने निजी फायदे और रणनीति के हिसाब से फैसले लेने लगेगा, तो इससे एकजुटता कम होगी और भविष्य में ग्लोबल मार्केट को संतुलित करना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा।  क्यों बढ़ रही हैं तेल की कीमतें? क्या आगे भी जारी रहेगी तेजी इस समय सबसे बड़ा कारण है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का बंद होना, जहां से दुनिया का करीब 20% तेल गुजरता है.ईरान युद्ध के कारण सप्लाई बाधित है और निर्यात कम हो गया है.इसी वजह से कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं.अगर हालात सामान्य होते हैं और यूएई ज्यादा उत्पादन शुरू करता है:सप्लाई बढ़ सकती है कीमतें फिर नीचे आ सकती हैं.लेकिन अभी बाजार अनिश्चित है कीमतें ऊंची बनी रह सकती हैं।  भारत पर क्या असर पड़ेगा? क्या पेट्रोल-डीजल होगा महंगा?  ग्लोबल ऑयल मार्केट में होने वाली इस हलचल का भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश पर सीधा और बड़ा असर पड़ता है. कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से न केवल पेट्रोल-डीजल महंगा होने का डर रहता है, बल्कि इससे माल ढुलाई की लागत बढ़ती है, जिससे सीधे तौर पर महंगाई में इजाफा होता है और देश का व्यापार घाटा भी बढ़ सकता है।  हालांकि, आम जनता के लिए राहत की बात यह है कि केंद्र सरकार ने फिलहाल कीमतों में बढ़ोतरी की किसी भी संभावना से इनकार किया है. पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने साफ किया है कि पेट्रोल … Read more

तेल के दामों में फिर बढ़ोतरी, डीजल ₹25 और पेट्रोल ₹7.4 महंगा, नायरा के बाद इस कंपनी ने भी बढ़ाए रेट

नई दिल्‍ली  नायरा के बाद निजी क्षेत्र की कंपनी शेल इंडिया (Shell India) ने भी पेट्रोल और डीजल के दामों में भारी बढ़ोतरी का ऐलान कर दिया है. कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आए उछाल के कारण तेल के दाम बढ़ाए गए हैं. मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट के अनुसार, शेल ने डीजल की कीमतों में सीधे ₹25.01 प्रति लीटर की वृद्धि की है. पेट्रोल की कीमतों में ₹7.41 प्रति लीटर की बढोतरी की गई है. इस वृद्धि के बाद सामान्य डीजल की कीमत शेल इंडिया के पंपों पर ₹123.52 और प्रीमियम वेरिएंट की कीमत ₹133.52 प्रति लीटर तक पहुंच गई है।  वहीं, बेंगलुरु में अब सामान्य पेट्रोल ₹119.85 और पावर वेरिएंट ₹129.85 प्रति लीटर की दर से बिक रहा है. स्थानीय करों (VAT) और परिवहन लागत के कारण अलग-अलग राज्यों और शहरों में इन कीमतों में मामूली अंतर हो सकता है, लेकिन कुल मिलाकर पूरे देश में शेल के आउटलेट्स पर अब ग्राहकों को जेब ज्यादा ढीली करनी पड़ रही है।  सरकारी कंपनियों ने नहीं बढ़ाए दाम जहां सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां (IOCL, BPCL, HPCL) कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बावजूद सरकार के हस्तक्षेप के कारण खुदरा कीमतों को स्थिर रखे हुए हैं, वहीं निजी कंपनियों को ऐसा करने पर सरकार से कोई वित्तीय मुआवजा या सब्सिडी नहीं मिलती. घाटे से बचने के लिए निजी कंपनियों के पास कीमतों को बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।  कच्‍चे तेल की कीमतों में वृद्धि ईंधन की कीमतों में इस अभूतपूर्व वृद्धि के पीछे मुख्य कारण कच्‍चे तेल के बढ़े दाम हैं. फरवरी के अंत में अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद से कच्चे तेल की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है. ब्रेंट क्रूड की कीमतों में लगभग 60 फीसदी तक का उछाल आया है. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चा तेल $100 प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ है. भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 85 फीसदी आयात करता है। 

तेल-गैस की तलाश में मेगा गेम शुरू, कीमतों में गिरावट और निवेश का मौका

नई दिल्ली  भारत सरकार ने तेल और प्राकृतिक गैस की खोज को बढ़ावा देने के लिए एक बड़ा फैसला लेते हुए देश के 2.62 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को एक्सप्लोरेशन के लिए खोल दिया है. यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है और भारत अपनी जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है. सरकार का मकसद साफ है कि आने वाले वर्षों में देश को ऊर्जा के मामले में ज्यादा आत्मनिर्भर बनाया जाए और घरेलू उत्पादन को बढ़ाया जाए।  क्या है पूरा फैसला और कितना बड़ा है इसका दायरा: सरकार ने कुल 2,62,817 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को एक्सप्लोरेशन के लिए खोला है, जिसमें जमीन के साथ साथ समुद्री क्षेत्र भी शामिल हैं. यह कोई छोटा कदम नहीं है, बल्कि भारत के कुल सेडिमेंटरी बेसिन का बड़ा हिस्सा अब कंपनियों के लिए उपलब्ध हो गया है. इसका मतलब है कि अब पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा इलाकों में तेल और गैस की तलाश की जा सकेगी।  OALP मॉडल क्या है और कंपनियों को कैसे फायदा मिलेगा: यह पूरा प्रोसेस ओपन एकरेज लाइसेंसिंग प्रोग्राम यानी OALP के तहत किया जा रहा है. इस मॉडल की खास बात यह है कि इसमें सरकार खुद ब्लॉक ऑफर करने के बजाय कंपनियों को यह आजादी देती है कि वे अपनी पसंद के इलाकों को पहचान कर वहां के लिए बोली लगा सकें. इससे कंपनियों की दिलचस्पी बढ़ती है और एक्सप्लोरेशन ज्यादा टारगेटेड तरीके से हो पाता है।  किन इलाकों में होगा एक्सप्लोरेशन और क्या है संभावना: इस फैसले के तहत 26 सेडिमेंटरी बेसिन के ब्लॉक्स को शामिल किया गया है. ये वही इलाके होते हैं जहां भूगर्भीय संरचना ऐसी होती है कि तेल और गैस मिलने की संभावना ज्यादा रहती है. हालांकि संभावना होना और असल में रिजर्व मिलना दो अलग बातें हैं, इसलिए हर ब्लॉक में सफलता की गारंटी नहीं होती। समुद्र पर बढ़ता फोकस और समुद्र मंथन पहल: सरकार इस बार खासतौर पर डीप सी एक्सप्लोरेशन पर जोर दे रही है, जो प्रधानमंत्री के समुद्र मंथन इनिशिएटिव का हिस्सा है. बंगाल की खाड़ी और अरब सागर जैसे इलाकों में बड़ी संभावनाएं मानी जाती हैं, लेकिन यहां काम करना तकनीकी रूप से ज्यादा चुनौतीपूर्ण और महंगा होता है।  विदेशी और निजी कंपनियों के लिए बड़ा मौका: इस कदम के जरिए सरकार ने साफ तौर पर ग्लोबल ऑयल और गैस कंपनियों को भारत में निवेश के लिए न्योता दिया है. रिलायंस, ओएनजीसी के अलावा बीपी, शेल, टोटल और एक्सॉन जैसी विदेशी कंपनियां भी इसमें दिलचस्पी दिखा सकती हैं. इससे न सिर्फ निवेश आएगा बल्कि नई तकनीक और विशेषज्ञता भी देश में आएगी।  भारत की आयात निर्भरता कम करने की कोशिश: भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जो अर्थव्यवस्था पर बड़ा बोझ डालता है. अगर घरेलू स्तर पर उत्पादन बढ़ता है, तो इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और वैश्विक कीमतों में उतार चढ़ाव का असर भी कम होगा. यही इस फैसले के पीछे की सबसे बड़ी रणनीतिक सोच है।  चुनौतियां भी कम नहीं हैं, समय और लागत दोनों भारी: तेल और गैस की खोज कोई आसान या जल्दी होने वाली प्रक्रिया नहीं है. इसमें कई साल लग जाते हैं और भारी निवेश करना पड़ता है. कई बार कंपनियों को सालों की मेहनत के बाद भी कुछ नहीं मिलता, इसलिए जोखिम भी काफी ज्यादा होता है।  कब दिखेगा असर और क्या है आगे की तस्वीर: इस फैसले का असर तुरंत नहीं दिखेगा क्योंकि एक्सप्लोरेशन से लेकर प्रोडक्शन तक पहुंचने में 5 से 10 साल तक का समय लग सकता है. लेकिन अगर कुछ बड़े रिजर्व मिलते हैं, तो आने वाले समय में भारत की ऊर्जा स्थिति मजबूत हो सकती है और देश को आयात पर कम निर्भर रहना पड़ेगा।   

पश्चिम एशिया के तनाव से रसोई का बजट बिगड़ा, खाद्य तेलों की कीमतों में 20 रुपये तक बढ़ोतरी

चंडीगढ़  पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का असर अब आम आदमी की रसोई तक पहुंच गया है। खाद्य तेलों की कीमतों में पिछले एक महीने में 15 से 20 रुपये प्रति किलो तक का उछाल दर्ज किया गया है। कारोबारियों का कहना है कि यदि हालात जल्द नहीं सुधरे तो कीमतों में और तेजी बनी रह सकती है।  कारोबारियों के अनुसार युद्ध के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 से 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। इससे बायोडीजल की मांग बढ़ी है, जिसके कारण वनस्पति तेलों पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है। भारत अपनी जरूरत का करीब 60 से 66 प्रतिशत खाद्य तेल आयात करता है। सामान्य तौर पर देश हर महीने 13 से 14 लाख टन आयात करता है, लेकिन मार्च में यह घटकर करीब 11 लाख टन रहने का अनुमान है। खासतौर पर सूरजमुखी तेल के आयात में भारी गिरावट आई है, जो फरवरी में लगभग 51 प्रतिशत तक कम हो गया। आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता और लगातार बढ़ती कीमतें इसकी मुख्य वजह हैं। युद्ध के कारण समुद्री मार्ग प्रभावित हुए हैं, जिससे जहाजों की आवाजाही और डिलीवरी पर असर पड़ा है। समुद्री किराया भी 60 डॉलर प्रति टन बढ़ा खाद्य तेल कारोबारी संजय विरमानी के मुताबिक समुद्री रास्तों में बाधा और बढ़ते जोखिम के कारण बीमा कंपनियां भी माल कवर करने से हिचक रही हैं। वहीं समुद्री किराया भी प्रति टन करीब 60 डॉलर तक बढ़ गया है। ब्राजील और अर्जेंटीना से आने वाले शिपमेंट भी प्रभावित हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बायोडीजल में बढ़ती खपत से भी बाजार पर दबाव बढ़ा है। राइस ब्रान की उपलब्धता घटने से राइस ब्रान ऑयल का उत्पादन प्रभावित हुआ है। इसकी कीमत पिछले साल 350 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़कर अब करीब 700 रुपये तक पहुंच गई है। 20 से 30 प्रतिशत तक हो सकती है वृद्धि इसका असर बाजार में साफ दिख रहा है। सरसों तेल 132.50 से बढ़कर 147 रुपये, सोया रिफाइंड 131.20 से 150.10 रुपये और सनफ्लावर रिफाइंड 160 से 175 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो खाद्य तेलों की कीमतों में 20 से 30 प्रतिशत तक और बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे आम उपभोक्ताओं की परेशानी और बढ़ेगी। 

भारत ने होर्मुज के विकल्प में खोजा रास्ता, अब तेल का भंडार आ रहा है इस नई दिशा से

नई दिल्‍ली मिडिल ईस्‍ट में जंग से तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है, क्‍योंकि खाड़ी देशो से एशिया और यूरोप के देशों में तेल-गैस की सप्‍लाई बाधित हुई है. इन्‍हीं जगहों पर खाड़ी देशों के तेल-गैस की खपत ज्‍यादा होती है. इस बीच, एक रिपोर्ट का दावा है कि भारत कुछ अन्‍य जगहों से भी तेल-गैस का आयात कर रहा है, जो यह संकेत देता है कि अब वह सिर्फ स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज या खाड़ी देशों पर निर्भर नहीं है।  रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की सरकारी कंपनी हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने टेंडर के जरिए अंगोला से 20 लाख बैरल तेल खरीदा है, क्योंकि महंगे मिडिल ईस्‍ट तेल की उपलब्धता कम होने के कारण भारतीय रिफाइनर वेस्‍ट अफ्रीकी और एशिया-प्रशांत क्षेत्र के तेल की ओर रुख कर रहे हैं।  भारत पहले मिडिल ईस्‍ट पर तेल गैस आयात के लिए 45 फीसदी निर्भर था, लेकिन अब वह नए-नए रास्‍तों की तलाश में है. अमेर‍िका और ईरान के बीच जंग से भारत की एनर्जी सप्‍लाई प्रभावित हुई है. स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज का रास्‍ता बंद होने के कारण भारत में LPG की सप्‍लाई सबसे ज्‍यादा बाधित हुई है।  मिडिल ईस्‍ट का तेल दुनिया का सबसे महंगा तेल  ओमान और दुबई के बेंचमार्क में थोड़ी नरमी आई, लेकिन सप्ताह की शुरुआत में इनमें तेजी आई क्योंकि मिडिल ईस्‍ट देशों का कच्चा तेल दुनिया का सबसे महंगा तेल बन गया था. इस सप्ताह की शुरुआत में ब्रेंट फ्यूचर कीमतें 2008 में 147.50 डॉलर के पिछले रिकॉर्ड को पार कर गईं।  एशिया जाने वाले लाखों बैरल मिडिल ईस्‍ट कच्‍चे तेल की कीमत तय करने के लिए इस्‍तेमाल किए जाने वाले बेंचमार्क में अचानक हुई वृद्धि ने एशियाई रिफाइनरों के लिए लागत बढ़ा दी है, जिससे वे विकल्प तलाशने या उत्पादन कम करने के लिए मजबूर हो गए हैं।  कहां कितना तेल खरीद रहा भारत?  रॉयटर्स के अनुसार, एचपीसीएल ने एक्सॉन से क्लोव और कैबिंडा के दस लाख बैरल खरीदे हैं, जिनकी कीमत ब्रेंट क्रूड ऑयल की तुलना में लगभग 15 डॉलर अधिक है और जिनकी डिलीवरी मई 1-10 के बीच होनी है. इस रिफाइनरी ने राजस्थान के रेगिस्तानी राज्य में स्थित अपनी 180,000 बैरल प्रति दिन की क्षमता वाली बाड़मेर रिफाइनरी के लिए तेल खरीदा है।  इस सप्ताह की शुरुआत में, HPCL ने व्यापारी टोट्सा से फोरकाडोस और अगबामी के एक-एक मिलियन बैरल खरीदे. इसके अलावा, इंडियन ऑयल कॉर्प देश की सबसे बड़ी तेल रिफाइन कंपनी भी पश्चिम अफ्रीका से कच्चा तेल खरीदने की कोशिश कर रही थी। 

US के बैन हटाने के बाद, क्या भारत फिर से ईरानी तेल खरीदेगा? समंदर में है विशाल भंडार

 नई दिल्‍ली अमेरिका ने कच्‍चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी को रोकने के लिए ईरानी तेल से प्रतिबंध हटा दिया है. अब ये तेल एशिया के देशों में आसानी से जा सकते हैं. समंदर के बीच ईरानी तेल का बड़ा भंडार है.  खबर है कि भारत की रिफाइनरियां इसे खरीदने के लिए योजना बना रही हैं. पहले ईरानी तेल सिर्फ चीन द्वारा खरीदे जाते थे, लेकिन बैन हटने के बाद अब भारत भी आ सकते हैं।  रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, व्‍याप‍ारियों ने शनिवार को बताया कि अमेरिका-इजरायल वॉर के कारण ईरान पर लगे एनर्जी संकट को कम करने के लिए अमेरिका द्वारा अस्‍थायी तौर से प्रतिबंध हटाए जाने के बाद भारतीय रिफाइनरियां ईरानी तेल की खरीद फिर से शुरू करने की योजना बना रही हैं, जबकि एशिया के अन्य हिस्सों में रिफाइनरियां भी इस तरह के कदम पर विचार कर रही हैं।  ईरानी तेल खरीदने के लिए निर्देश का इंतजार  रिपोर्ट में कहा गया है कि तीन भारतीय रिफाइनर्स सोर्स ने कहा कि वे ईरानी तेल खरीदेंगे और भुगतान की शर्तों पर सरकार के निर्देश का इंतजार कर रहे हैं. रॉयटर्स का कहना है कि भारत में कच्‍चे तेल का भंडार अन्‍य बड़े एशियाई देशों की तुलना में काफी कम है. अमेरिका ने हाल ही में रूसी तेल से भी बैन हटाया है, जिसके बाद भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल की बुकिंग में तेजी दिखाई।  अमेरिका ने दी है 30 दिनों की छूट  अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि ट्रंप प्रशासन ने शुक्रवार को समुद्र में मौजूद ईरानी तेल की खरीद के लिए 30 दिनों की प्रतिबंध छूट जारी की है. यह छूट समुद्र में स्थित ईरानी तेल पर होगा, जो 19 अप्रैल तक उतारने तक लागू रहेगा. युद्ध शुरू होने के बाद से यह तीसरी बार है जब अमेरिका ने तेल पर लगे प्रतिबंधों में अस्थायी छूट दी है।  समंदर के बीच इतना बड़ा तेल भंडार  केप्लर के कच्चे तेल बाजार डेटा के अनुसार, लगभग 170 मिलियन या 17 करोड़ बैरल ईरानी कच्चा तेल समुद्र में है, जो मिडिल ईस्‍ट की खाड़ी से लेकर चीन के निकट के जलक्षेत्र तक फैले जहाजों पर मौजूद है. कंसल्टेंसी एनर्जी एस्पेक्ट्स ने 19 मार्च को अनुमान लगाया कि पानी पर 13 करोड़ से 14 करोड़ बैरल ईरानी तेल मौजूद है, जो मिडिल ईस्‍ट के 14 दिनों के उत्‍पादन के बराबर है।  एशिया अपनी कच्चे तेल की आपूर्ति का 60% हिस्सा मिडिल ईस्‍ट से मंगाता है और इस महीने स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज के लगभग बंद होने से पूरे क्षेत्र की रिफाइनरियों को कम दरों पर काम करने और ईंधन निर्यात में कटौती करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।