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राफेल की ताकत होगी और मजबूत: फ्रांस देगा तकनीकी डेटा, भारत में रिपेयर होंगी MICA मिसाइलें

नई दिल्ली  राफेल और मिराज-2000 जैसे लड़ाकू विमानों में लगने वाली MICA मिसाइलों की मरम्मत भारत में ही की जा सकेगी। फ्रांसीसी कंपनी MBDA ने भारतीय वायुसेना (IAF) के साथ इस बारे में करार किया है। इसके तहत भारत में ही MICA मिसाइलों का आधुनिकीकरण किया जा सकेगा और साथ ही फ्रांस से खरीदे गए राफेल की भी मरम्मत की जा सकेगी। इस समझौते के लिए अरसे से कोशिशें की जा रही थीं। फ्रांसीसी कंपनी भारत में MICA के रखरखाव और मरम्मत केंद्र स्थापित करेगी। राफेल और मिराज में लगने वाले मिसाइलों की भी मरम्मत     OPEXNews की एक खबर के अनुसार, MBDA और IAF के इस नए समझौते में भारतीय डसॉल्ट राफेल लड़ाकू विमानों और आधुनिक मिराज 2000 विमानों द्वारा उपयोग की जाने वाली MICA मिसाइलों की मरम्मत और मध्यम स्तर के आधुनिकीकरण के लिए स्थानीय क्षमताओं की तैनाती का प्रावधान है।     भारत और MBDA ने MICA हवा से हवा मिसाइल के लिए एक नए समर्थन समझौते की घोषणा की है। इस समझौते के तहत भारतीय वायु सेना MICA के लिए एक घरेलू मरम्मत केंद्र स्थापित और संचालित करेगी, जबकि MBDA कलपुर्जे, तकनीकी डेटा और ट्रेनिंग देगी।     दरअसल, मिसाइलें रिपेयर नहीं, ओवरहॉल होती हैं। एक बार लॉन्च होने के बाद मिसाइल नष्ट हो जाती है। मरम्मत का मतलब उसके भंडारण (Storage) के दौरान खराबी को ठीक करना या उसकी उम्र बढ़ाने के लिए उसे सर्विस करना है। मिसाइल भंडार हमेशा भरा रहेगा     भारत वायु सेना ने बताया कि यह सेंटर मिसाइल भंडार को फिर से तैयार करने में लगने वाले समय को कम करेगा और वायु सेना की युद्धक तत्परता को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाएगा। फ्रांस आवश्यक उपकरण और तकनीकी दस्तावेज उपलब्ध कराएगा और स्थानीय कर्मियों को प्रशिक्षण देगा।     इस सुविधा की स्थापना का निर्णय ऑपरेशन सिंदूर के बाद लिया गया, जिसके दौरान भारत ने लंबी दूरी की हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों और वायु रक्षा प्रणालियों का सक्रिय रूप से इस्तेमाल किया गया था। MICA मिसाइलें क्या होती हैं, भारत क्यों कर रहा इस्तेमाल     MICA मिसाइल एक बहुमुखी हवा से हवा में मार करने वाला हथियार है। इसे फ्रांसीसी में (MICA:Missile d'Interception, de Combat et d'Auto-défense) कहा जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है-'अवरोधन, युद्ध और आत्मरक्षा के लिए मिसाइल'। यह एक फ्रांसीसी वायुरोधी मल्टीपल टार्गेट्स वाली हर मौसम में दागो और भूल जाओ वाली लघु से मध्यम दूरी की मिसाइल प्रणाली है, जिसका निर्माण MBDA फ्रांस द्वारा किया गया है।     MICA दो वर्जन में उपलब्ध है। MICA-RF सक्रिय रडार सीकर, जबकि MICA-IR इमेजिंग इन्फ्रारेड सीकर से लैस है। दोनों को लंबी दूरी (60-80 किमी) और करीबी लड़ाई में लक्ष्यों को भेदने के लिए डिजाइन किया गया है। मिसाइल का वजन लगभग 112 किलोग्राम है, जिसमें 12 किलोग्राम का उच्च-विस्फोटक वारहेड लगा है और यह लगभग मैक 4 की गति तक पहुंच सकती है। कारगिल युद्ध के बाद शुरू हुआ जंगी विमानों का आधुनिकीकरण 1999 के कारगिल युद्ध के बाद भारत ने अपने वायुसेना बेड़े का बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण शुरू किया और इन्फ्रारेड (MICA IR) और रडार (MICA RF) होमिंग हेड से लैस मिसाइलों के MBDA संस्करणों की मांग की। 2011 में दोनों पक्षों ने 50 मिराज 2000 लड़ाकू विमानों को मिराज 2000I/TI मानक में अपग्रेड करने के लिए एक करार पर हस्ताक्षर किए, जिसमें इन मिसाइलों के एडवांस संस्करणों का एकीकरण भी शामिल था। इस समझौते की टाइमिंग बेहद अहम     भारत को 2000 के दशक की शुरुआत में मिराज-2000 के आधुनिकीकरण के साथ-साथ MICA मिसाइलें मिलनी शुरू हुईं। यह समझौता ऐसे समय में घोषित किया गया है जब भारत कई और राफेल जेट खरीदने पर विचार कर रहा है। भारत घरेलू रखरखाव क्षमताओं का निर्माण करके MICA मिसाइल भंडार को बढ़ाने की तैयारी कर रहा है।     स्थानीय मरम्मत और पुनर्निर्माण केंद्र होने से दागी गई या खराब मिसाइलों की त्वरित आपूर्ति सुनिश्चित होती है, जो तीव्र गति वाले अभियानों या संकटों के दौरान अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे विदेशी मरम्मत चक्रों पर निर्भरता कम होती है और विदेशी शिपिंग या निर्यात अनुमोदन में होने वाली देरी से बचा जा सकता है। उदाहरण के लिए, मध्य पूर्व में हाल ही में हुए अभियानों में एमआईसीए राउंड की खपत हुई, जिससे पर्याप्त भंडार की आवश्यकता स्पष्ट होती है।

अंबाला से चला प्रहार,गोल्डन ऐरो स्क्वाड्रन ने दुश्मन के ठिकाने किए तबाह

अंबाला भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल होने के बाद राफेल लड़ाकू विमानों ने ऑपरेशन सिंदूर में अपनी पहली ही अग्निपरीक्षा दी। इसमें सफलता प्राप्त करते हुए वायु वीरों ने दुश्मन के दांत खट्टे कर दिए थे। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अंबाला स्थित 17 स्क्वाड्रन गोल्डन ऐरो ने पाकिस्तानी सीमा में घुसकर न केवल आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद किया, बल्कि उनके सैन्य एयरबेस और डिफेंसिव एयर पावर को भी पूरी तरह पंगु बना दिया। अंबाला एयरफोर्स स्टेशन के म्यूजियम में अब इस शौर्य गाथा को ऑपरेशन सिंदूर वॉल के जरिए सार्वजनिक किया गया है। जल, थल और नभ का संयुक्त प्रहार 22 अप्रैल 2025 को कश्मीर के पहलगाम में हुए कायरतापूर्ण आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस हमले में तीर्थयात्रियों और पर्यटकों समेत 26 निर्दोष लोगों की जान चली गई थी। इस बर्बरता का जवाब देने के लिए भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना ने संयुक्त रूप से ऑपरेशन सिंदूर का बिगुल फूंका। रणनीति के तहत अंबाला एयरफोर्स स्टेशन को फ्रंटलाइन बेस बनाया गया, जहां से राफेल और जगुआर विमानों ने दुश्मन पर गहरा प्रहार करने की कमान संभाली। राफेल और गोल्डन ऐरो की पहली जंग वायुसेना में शामिल होने के बाद राफेल का यह किसी युद्ध जैसी स्थिति में पहला मुकाबला था। एयर कमोडोर बी. सतीश (वीएम) के नेतृत्व में गोल्डन ऐरो स्क्वाड्रन ने पाकिस्तान के अंदरूनी इलाकों में सटीक लक्षित हमले किए। राफेल की अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों और लंबी दूरी की मिसाइलों के आगे दुश्मन का रडार तंत्र फेल हो गया। स्क्वाड्रन ने पाकिस्तानी सैन्य एयरबेस और उनके महत्वपूर्ण नागरिक बुनियादी ढांचे पर लंबे समय तक हमले जारी रखे, जिससे दुश्मन की जवाबी कार्रवाई की क्षमता ध्वस्त हो गई। पदकों से चमकी अंबाला की वीर धरा इस ऐतिहासिक ऑपरेशन में अदम्य साहस दिखाने के लिए अंबाला वायुसेना स्टेशन को स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर कुल 26 राष्ट्रपति पुरस्कारों से नवाजा गया है। इनमें वीर चक्र ग्रुप कैप्टन रंजीत सिंह सिद्धू और स्क्वाड्रन लीडर सार्थक कुमार के नाम हुआ। युद्ध सेवा पदक ग्रुप कैप्टन विकास वर्मा को मिला। वहीं वायु सेना पदक से ग्रुप कैप्टन दीपक चौहान, स्क्वाड्रन लीडर कौस्तुभ नलबड़े, मिहिर विवेक चौधरी और अमन सिंह नवाजे गए। मेंशन-इन-डिस्पैचेस से ग्रुप कैप्टन इंद्रजीत सिंह और विंग कमांडर एमआई संचिया समेत 19 जांबाज को सम्मानित किया गया। सभी वायु वीरों को दिल्ली में सम्मान मिला। म्यूजियम में दर्ज हुआ इतिहास अंबाला एयरबेस के म्यूजियम में बनी विशेष दीवार अब इन वीरों के नाम और उनके बलिदान की गवाह बन गई है। यह दीवार न केवल राफेल की मारक क्षमता को दर्शाती है, बल्कि उन तकनीकी श्रेष्ठताओं (उन्नत मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम) का भी विवरण देती है, जिन्होंने इस मिशन को सफल बनाया। अंबाला ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह देश की रक्षा पंक्ति का सबसे मजबूत और अभेद्य किला है।  

राफेल डील पर भारत ने तय की लक्ष्मण रेखा, शर्त नहीं मानी तो सौदा रद्द, फ्रांस को ₹325000 करोड़ का भारी नुकसान

नईदिल्ली  भारत अपने डिफेंस सिस्‍टम को अपग्रेड करने और उसे मॉडर्न एज वॉरफेयर के लेवल तक लाने के लिए हर संभव कोशिश कर रहा है. स्‍वदेशी तकनीक से नेक्‍स्‍ट जेनरेशन फाइटर जेट डेवलप करने के लिए AMCA प्रोग्राम लॉन्‍च किया गया है. इसके तहत 5th और 6th जेनरेशन का फाइटर जेट डेवलप किया जाना है. इसके साथ ही एयरस्‍पेस को अभेद्य किला बनाने के लिए मिशन सुदर्शन चक्र नाम से नेशनल एयर डिफेंस प्रोग्राम भी शुरू किया गया है. S-400 के साथ ही अन्‍य देसी डिफेंस सिस्‍टम इसका हिस्‍सा हैं. साल 2035 तक इसे पूरी तरह से अमल में लाने का लक्ष्‍य रखा गया है. इसके तहत कई एंटी मिसाइल, एंटी ड्रोन और एंटी एयरक्राफ्ट सिस्‍टम डेवलप किए गए हैं और किए जा रहे हैं. मिसाइल के क्षेत्र में भी भारत ने कई उपलब्धियां हासिल की हैं. अग्नि सीरीज की मिसाइलों के साथ ही ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल इसका उदाहरण हैं. फाइटर जेट के मामले में भारत अभी भी इंपोर्ट पर निर्भर है. इसी क्रम में फ्रांस की डसॉल्‍ट एविएशन के साथ 114 राफेल फाइटर जेट खरीदने के प्रस्‍ताव को हरी झंडी दी गई है. यह सौदा तकरीबन 3.25 लाख करोड़ बताया जा रहा है. हालांकि, अब इस डील में नया पेच फंसता दिख रहा है. दरअसल, भारत ने राफेल डील के तहत इंटरफेस कंट्रोल डॉक्‍यूमेंट (ICD) तक पहुंच की शर्त रखी है. भारतीय पक्ष का कहना है कि यदि फ्रांस के साइड से इस शर्त का पालन नहीं किया गया तो भारत इस डील से पूरी तरह से बाहर निकल सकता है. ऐसे में अब फ्रांस पर निर्भर करता है कि 114 राफेल फाइटर जेट की महाडील आगे बढ़ती है या फिर बीच रास्‍ते ही दम तोड़ती है।  दरअसल, भारत के बहुप्रतीक्षित मीडियम रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) कार्यक्रम में 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद को लेकर बातचीत निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है. करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये के इस मेगा सौदे में अब इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट (ICD) सबसे अहम मुद्दा बनकर उभरा है, जो इस डील के भविष्य का फैसला कर सकता है. रक्षा मंत्रालय (MoD) के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, भारत को ICD तक पहुंच मिलने को लेकर भरोसा तो है, लेकिन यदि फ्रांस की ओर से इसमें किसी तरह की अनिच्छा दिखाई जाती है, तो नई दिल्ली इस सौदे से पूरी तरह पीछे हटने का कड़ा फैसला भी ले सकती है. यह रुख भारत की रक्षा खरीद नीति में एक बड़ा बदलाव दर्शाता है, जहां अब तकनीकी पहुंच और ऑपरेशनल ऑटोनॉमी को अनिवार्य शर्त के रूप में देखा जा रहा है, न कि एक अतिरिक्त सुविधा के रूप में. ‘इंडियन डिफेंस रिसर्च विंग’ की रिपोर्ट के अनुसार, रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह के नेतृत्व में ICD के महत्व को और अधिक बढ़ाया गया है. फरवरी 2026 में रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) से मंजूरी मिलने के बाद MRFA कार्यक्रम अब सिर्फ विमानों की खरीद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह भारत की दीर्घकालिक सामरिक आत्मनिर्भरता से जुड़ गया है. सरकार का स्पष्ट लक्ष्य है कि भविष्य में किसी भी अपग्रेड या वेपन इंटीग्रेशन के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम की जाए।  डिजिटल इंटरफेस फ्रेमवर्क तकनीकी रूप से ICD एक मानकीकृत डिजिटल इंटरफेस फ्रेमवर्क होता है, जो विमान के मिशन कंप्यूटर और बाहरी सिस्टम जैसे हथियारों के हार्डपॉइंट्स के बीच हैंडशेक का काम करता है. यदि भारत को ICD मिल जाता है, तो भारतीय इंजीनियर बिना मूल निर्माता के सोर्स कोड तक पहुंचे ही स्वदेशी हथियारों का फाइटर जेट में इंटीग्रेशन कर सकेंगे. इससे न केवल समय की बचत होगी, बल्कि लागत भी काफी कम हो जाएगी. पहले 36 राफेल विमानों की खरीद में भारत को हर नए गैर-फ्रांसीसी हथियार को जोड़ने के लिए डसॉल्ट एविएशन पर निर्भर रहना पड़ा था. इस प्रक्रिया में अतिरिक्त लागत और लंबा समय लगता था, जिससे ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी प्रभावित होता था. हर नए हथियार के लिए अलग से बातचीत करनी पड़ती थी, जिससे पूरे सिस्टम की दक्षता पर असर पड़ता था. अब MRFA कॉन्‍ट्रैक्‍ट में ICD को शामिल करके भारत शुरुआत से ही इंटीग्रेशन फ्रीडम सुनिश्चित करना चाहता है. इसके तहत स्वदेशी हथियारों जैसे अस्त्र सीरीज (Mk1, Mk2, Mk3) की बीवीआर मिसाइलें, रुद्रम एंटी-रेडिएशन मिसाइल और स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन (SAAW) जैसे प्रिसीजन गाइडेड म्यूनिशन को आसानी से जोड़ा जा सकेगा।  ICD क्‍यों है इतना अहम?     आईसीडी की अहम भूमिका: तकनीकी तौर पर ICD (Interface Control Document) एक मानकीकृत डिजिटल इंटरफेस फ्रेमवर्क है, जो विमान के मिशन कंप्यूटर और बाहरी सिस्टम के बीच हैंडशेक लेयर का काम करता है।      सिस्टम के बीच समन्वय: यह फ्रेमवर्क तय करता है कि विमान के मिशन कंप्यूटर और हथियार हार्डपॉइंट्स जैसे बाहरी सिस्टम आपस में कैसे संवाद करेंगे।      स्वदेशी क्षमता को बढ़ावा: ICD हासिल होने से भारतीय इंजीनियरों को स्वदेशी हथियारों को विमान में इंटीग्रेट करने की क्षमता मिलती है।      निर्माता पर निर्भरता कम: इसके जरिए मूल उपकरण निर्माता (OEM) के मालिकाना सोर्स कोड तक पहुंच की जरूरत नहीं रहती, जिससे विदेशी निर्भरता घटती है।      रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता: यह कदम भारत के रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत करने और स्वदेशी तकनीक के उपयोग को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।  तकरीबन सवा तीन लाख करोड़ रुपये की राफेल डील के तहत भारत इंटरफेस कंट्रोल डॉक्‍यूमेंट यानी ICD का एक्‍सेस चाहता है, ताकि वेपन सिस्‍टम को फाइटर जेट में इंटीग्रेट करने में द‍िक्‍कतों का सामना न करना पड़े।  डिजिटल संप्रभुता रक्षा मंत्रालय ICD को डिजिटल संप्रभुता का एक महत्वपूर्ण साधन मान रहा है. इसका उद्देश्य भारत को अपने लड़ाकू प्लेटफॉर्म्स के विकास और उन्नयन पर पूर्ण नियंत्रण देना है, ताकि देश विदेशी कंपनियों के तकनीकी इकोसिस्टम में बंधा न रहे. यह कदम आत्मनिर्भर भारत और घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत करने की व्यापक रणनीति के अनुरूप है. हालांकि, फ्रांस के लिए यह मुद्दा संवेदनशील बना हुआ है. ICD तक पहुंच देने से बौद्धिक संपदा अधिकारों और सिस्टम आर्किटेक्चर पर नियंत्रण से जुड़े सवाल उठ सकते हैं. ऐसे में सीमित या शर्तों के साथ पहुंच देने का विकल्प भी बातचीत में सामने आ सकता है, लेकिन यह भी विवाद का कारण बन सकता है. MRFA डील अब केवल रक्षा खरीद नहीं, … Read more

तेजस MK-2 बनेगा भारत का ‘मिनी राफेल’… बंकर फाड़ने वाली मिसाइलों से दुश्मनों में खौफ

नई दिल्ली भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान को पानी पिलाने वाले राफेल लड़ाकू विमान जैसा ही तेजस MK-2 को बनाने का प्लान किया है। भारत के स्वदेशी और अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान तेजस एमके-2 को हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) बना रहा है, जिसने तेजस एमके-2 को और उन्नत ओर ताकतवर बनाने का फैसला किया है। इसमें SCALP‑EG और Crystal Maze जैसी मिसाइलें लगाई जाएंगी। HAL के तेजस फैमिली के सबसे ताकतवर एडवांस संस्करण के रूप में डिजाइन किया गया यह विमान आने वाले दशक में भारतीय वायु सेना की रीढ़ बनने की उम्मीद है। दुश्मन के भीतरी इलाकों तक सटीक मार करेगा तेजस एमके-2     मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जैसे-जैसे भारत अपनी लंबी दूरी की मारक क्षमता का विस्तार कर रहा है, तेजस एमके2 को एडवांस स्टैंडऑफ मिसाइलों को एकीकृत करने के लिए पहले से ही लैस किया जा रहा है।     इसका मकसद यह है कि भारी सुरक्षा वाले हवाई क्षेत्र से बाहर रहते हुए दुश्मन के क्षेत्र में गहराई तक स्थित रणनीतिक लक्ष्यों को भेदने में तेजस एमके-2 सक्षम होगा। इससे वायुसेना की सटीक मारक क्षमता भी बढ़ेगी। तेजस MK-2 वायुसेना के MK-1 से ज्यादा ताकतवर     रिपोर्टों के अनुसार, तेजस एमके-2 को एक मध्यम-वजन बहु-भूमिका लड़ाकू विमान के रूप में परिकल्पित किया गया है, जो वर्तमान में सेवा में मौजूद एचएएल तेजस एमके-1 संस्करणों की तुलना में बड़ा और कहीं अधिक ताकतवर है।     इस विमान का विकास वैमानिकी विकास एजेंसी द्वारा किया जा रहा है और इसका निर्माण हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा किया जा रहा है। तेजस MK-2 की ये हैं खूबियां, जो बनाती हैं मारक     तेजस MK-2 का बड़ा एयरफ्रेम होगा।     तेजस MK-2 में अधिक पेलोड क्षमता होगी।     बेहतर एवियोनिक्स और सेंसर से लैस होगा।     इसकी दुश्मन के इलाके में अधिक युद्धक रेंज होगी।     GE F414-GE-INS6 टर्बोफैन इंजन से शक्ति मिलेगी।     Mk1 सीरीज में इस्तेमाल इंजन की तुलना में अधिक थ्रस्ट देता है।     लंबी दूरी के मिशनों के दौरान भारी हथियार भी ले जा सकेगा। लंबी दूरी की मारक मिसाइलों से लैस होगा तेजस एमके-2     तेजस Mk2 के लिए नियोजित सबसे महत्वपूर्ण अपग्रेड में से एक लंबी दूरी की सटीक मारक हथियारों का एकीकरण है। इसमें सबसे पहले SCALP-EG क्रूज मिसाइल और इजरायली मूल की क्रिस्टल मेज मिसाइलें लगाई जाएंगी।     ये दोनों हथियार पहले से ही भारतीय वायु सेना के हथियार भंडार का हिस्सा हैं और वर्तमान में डसॉल्ट राफेल और उन्नत डसॉल्ट मिराज 2000 लड़ाकू विमानों जैसे विमानों पर तैनात हैं। SCALP-EG क्रूज मिसाइल की खूबी जान लीजिए     SCALP-EG एक लंबी दूरी की वायु-प्रवेशित क्रूज मिसाइल है जिसे अत्यधिक सुरक्षित लक्ष्यों पर सटीक हमले करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह बंकरों और सैन्य ठिकानों पर तेजी से वार करती है।     यह रडार से बचते हुए कम ऊंचाई पर चुपके से उड़ान भरने में सक्षम है। ऊंचाई वाले लक्ष्यों के लिए सटीक मार्गदर्शन प्रणाली से लैस होगी। सैकड़ों किलोमीटर दूर के लक्ष्यों पर हमला करने की क्षमता है। यह दुश्मन की सीमा में जाए बिना ही टारगेट्स तबाह कर सकती है। क्रिस्टल मेज से कोई बच नहीं सकता है क्रिस्टल मेज मिसाइल वायु से सतह तक सटीक मारक हथियार के रूप में भी जाना जाता है। यह दुश्मन के रडार स्टेशनों, कमांड केंद्रों और वायु रक्षा प्रतिष्ठानों जैसे ज्यादा अहम टारगेट्स पर हमला करने के लिए डिजाइन की गई है। इसकी मारक क्षमता करीब 250 किमी तक है। इन चीजों से भी लैस होंगे तेजस विमान एस्ट्रा एमके-1 बियॉन्ड-विजुअल-रेंज मिसाइल, एस्ट्रा एमके-2 एक्सटेंडेड-रेंज बीवीआर मिसाइल और एस्ट्रा एमके-3 का भविष्य में एकीकरण। निकटवर्ती हवाई लड़ाइयों के लिए लड़ाकू विमान इन्फ्रारेड-गाइडेड एएसराम मिसाइल ले जाएगा, जिसका उपयोग भारतीय वायु सेना पहले से ही तेजस एमके1ए सहित कई प्लेटफार्मों पर कर रही है।

भारत में राफेल बनाने के बाद सरकार बेचेगी, समझें डील की शर्तें

बेंगलुरु  भारत में राफेल बनाने की तैयारी तेज हो गई है. फ्रांस के राष्ट्रपति के दौरे के बाद डील को आगे बढ़ाने की कवायद शुरू हो चुकी है. सवाल अब यह उठ रहा है कि अगर राफेल भारत में बनेंगे, तो क्या सरकार इन्हें दूसरे देशों को बेच भी सकेगी? या ये विमान सिर्फ भारतीय वायुसेना के लिए ही होंगे? डील की शर्तें क्या कहती हैं चलिए समझते हैं. राफेल डील में आई तेजी इमैनुएल मैक्रों के भारत दौरे के बाद राफेल डील को लेकर हलचल तेज हुई है. रक्षा मंत्रालय जल्द ही प्रस्ताव को कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी के पास भेजने की तैयारी में है. ऐसे में उम्मीद है कि अगले 4 से 6 महीने में समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं. सूत्रों के मुताबिक, रक्षा खरीद प्रक्रिया की टाइमलाइन छोटी करने की कोशिश की जा रही है ताकि लड़ाकू विमान और अन्य हथियार जल्द मिल सकें. अभी विदेशी हथियार खरीदने की प्रक्रिया लंबी और जटिल मानी जाती है.  114 राफेल को भारत में बनाने की मंजूरी मैक्रों के दौरे से पहले रक्षा मंत्रालय की डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल ने भारतीय वायुसेना के लिए 114 राफेल विमान देश में बनाने की मंजूरी दी थी. राफेल विमान फ्रांस की कंपनी दासो एविएशन बनाती है. प्रस्ताव है कि दासो किसी भारतीय कंपनी के साथ साझेदारी कर भारत में उत्पादन प्लांट स्थापित करे. इससे तकनीक हस्तांतरण, स्थानीय रोजगार और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा.  क्या भारत इन राफेल को बेच सकेगा? यहीं सबसे अहम सवाल आता है. साफ तौर पर कहा गया है कि ये 114 राफेल भारतीय वायुसेना की जरूरतों के लिए बनाए जा रहे हैं. यानी इनका उद्देश्य निर्यात नहीं, बल्कि देश की रक्षा क्षमता बढ़ाना है. डील की शर्तों के मुताबिक, विमान का उत्पादन लाइसेंस और तकनीकी समझौते के तहत होगा. ऐसे में बिना फ्रांसीसी कंपनी और सरकार की अनुमति के भारत इन विमानों को तीसरे देश को नहीं बेच सकता है.  रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भविष्य में निर्यात का विकल्प खुलता भी है, तो वह अलग समझौते और संयुक्त अनुमति के तहत ही संभव होगा. 

5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट पर भारत का बड़ा फैसला, राफेल के साथ होगा शामिल

नई दिल्ली फाइटर जेट्स की कमी से जूझ रही इंडियन एयरफोर्स को मजबूत बनाने के लिए ऐसा लगता है कि भारत सरकार ने अपनी तिजोरी खोल दी है. फ्रांस की दसॉल्ड एविएशन से 114 राफेल विमान खरीदने संबंधी एयरफोर्स के प्रस्ताव पर जल्द ही सरकार की मुहर लगने वाली है. इस बीच रिपोर्ट आई है कि भारत में रूसी पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स सुखोई-57 की लागत को लेकर गंभीरता से विचार चल रहा है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारत राफेल के साथ रूस से भी सुखोई-57 फाइटर जेट का सौदा करेगा? दरअसल, इंडियन एक्सप्रेस अखबार में एक रिपोर्ट छपी है. इमसें कहा गया है कि पब्लिक सेक्टर की कंपनी एचएएल को अब भी रूस से उस रिपोर्ट का इंतजार है जिसमें भारत में सुखोई-57 विमानों को बनाने में खर्च का आंकलन किया गया है. सुखोई-57 को लेकर अभी तक कोई फैसला नहीं लिया गया है. यह रिपोर्ट इसी माह एचएएल को मिलने की संभावना है. देश में सुखोई-57 बनाने पर कितना खर्च? इस रिपोर्ट में एचएएल को यह बताया जाएगा कि इस प्रोजेक्ट को देश में शुरू करने में कितना खर्च जाएगा. यहां एक बात समझने की जरूरत है कि भारत पहले से सुखोई श्रेणी के विमानों का निर्माण करता है. रूस के साथ वर्ष 2000 में हुई एक डील के तहत भारत में 250 से अधिक सुखोई 30एमकेआई फाइटर जेट बनाए गए हैं. ये एक बहुत पावरफुल चौथी पीढ़ी के विमान हैं. इसके निर्माण के लिए तैयार किया गया इंफ्रास्ट्रक्टर आज भी मौजूद है. पिछले दिनों एसयू-57 को लेकर रूस की एक टीम भारत दौरे पर आई थी. उस टीम ने कहा था कि भारत में इस फाइटर जेट के निर्माण के लिए करीब-करीब 50 फीसदी सुविधाएं मौजूद हैं. उसने इस प्रोजेक्ट पर होने वाले संभावित खर्च को लेकर एक रिपोर्ट देने की बात कही थी.  एचएएल को इसी रिपोर्ट का इंतजार है. फिलहाल एचएएल की नासिक डिवीजन में सुखोई-30 एमकेआई की फाइनल असेंबली लाइन मौजूद है. कोरापुट डिवीजन में एएल-31एफपी टर्बोफैन इंजन का लाइसेंस प्रोडक्शन किया जाता है. केरल में इस फाइटर जेट्स के एवयोनिक्स कंपोनेंट्स तैयार किए जाते हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि क्षमता और लागत आंकने का यह काम एएचएल की पहल पर किया जा रहा है. करीब 1000 फाइटर जेट्स की जरूरत अभी तक सरकार ने यह फैसला नहीं लिया है कि पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स की कमी को पूरा करने के लिए कौन विमान खरीदे जाएंगे. भारत अभी 4.5 पीढ़ी के फ्रांसीसी विमान राफेल की खरीद की तैयारी कर रहा है. जहां तक पांचवीं पीढ़ी के जेट की बात है तो हमारे पास मौजूदा वक्त में केवल दो विकल्प मौजूदा हैं. पहला अमेरिकी एफ-35 और दूसरा रूसी सुखोई-57. चीन के पास पांचवीं पीढ़ी के जे-20 विमान हैं. उसे हम नहीं खरीद सकते. इसके अलावा दुनिया में किसी अन्य देश के पास अपना पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट नहीं है. भारत अपना पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट एम्का प्रोजेक्ट चला रहा है. लेकिन, इसमें कभी समय लगेगा. माना जा रहा है कि सब कुछ ठीक रहा तो देसी पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट 2035 तक एयरफोर्स को मिल पाएंगे. जहां तक भारतीय एयरफोर्स की बात है तो इस वक्त उसके पास करीब 30 स्क्वाड्रन हैं. उसके लिए मंजूर क्षमता 42 स्क्वाड्रन की है. लेकिन, चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मन देशों की क्षमता और टू-फ्रंट वार की आशंका को देखते हुए एक्सपर्ट इन स्क्वाड्रन क्षमता को बढ़ाकर 60 तक ले जाने की बात कर रहे हैं. यानी इंडियन एयरफोर्स को कम से कम 1000 से 1100 फाइटर जेट्स से लैस करना होगा.

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राफेल में भरी शानदार उड़ान, अंबाला एयरफोर्स स्टेशन पर गार्ड ऑफ ऑनर

अंबाला  राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अंबाला एयरफोर्स स्टेशन से लड़ाकू विमान राफेल में उड़ान भरी. राष्ट्रपति सुबह 9.15 बजे स्पेशल विमान से अंबाला पहुंची थीं. यहां एयरफोर्स स्टेशन पर एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह ने उनका स्वागत किया. कैप्टन अमित गेहानी राफेल के पायलट: कैप्टन अमित गेहानी राष्ट्रपति को ले जाने वाले विमान के पायलट हैं. वो भारतीय वायु सेना की नंबर 17 स्क्वाड्रन, "गोल्डन एरो" के कमांडिंग ऑफिसर (सीओ) भी हैं. भारतीय वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ने भी भरी उड़ान: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के विमान के साथ भारतीय वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने भी एक अन्य राफेल विमान से उड़ान भरी. राष्ट्रपति को दिया गया गार्ड ऑफ ऑनर: अंबाला एयरफोर्स स्टेशन पर सबसे पहले उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया. इसके बाद उन्होंने अधिकारियों से मुलाकात की और एयरफोर्स स्टेशन की विभिन्न यूनिट्स का निरीक्षण किया. इसके अलावा राष्ट्रपति अधिकारियों से राफेल विमान की तकनीक, परिचालन प्रणाली और सुरक्षा रणनीति से जुड़ी जानकारी ली. अंबाला एयरपोर्ट स्टेशन के आसपास की सुरक्षा कड़ी: कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भारतीय वायुसेना के अधिकारियों और जवानों को संबोधित करेंगी. राष्ट्रपति के कार्यक्रम को देखते हुए अंबाला प्रशासन और एयरफोर्स ने सुरक्षा कड़ी कर दी है. वायुसेना और स्थानीय प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं. एयरफोर्स स्टेशन के आसपास के इलाके को नो ड्रोन जोन घोषित किया गया है. नो ड्रोन जोन घोषित: अंबाला SP अजीत सिंह शेखावत ने बताया "सुरक्षा के लिए हर एरिया में पुलिस, एसपीजी और एयरफोर्स की टीमें तैनात की गई है. अंबाला एयरपोर्ट स्टेशन और आसपास के इलाकों को नो ड्रोन जोन घोषित कर दिया गया है." बता दें कि राफेल लड़ाकू विमान भारत ने फ्रांस से खरीदे हैं. 5 राफेल की पहली खेप 27 जुलाई 2020 को मिली थी. ये विमान सबसे पहले अंबाला एयरबेस पहुंचे थे.