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PAK की ‘राफेल कहानी’ फिर हुई फेल, एयरफोर्स टेंडर से सामने आई 36 विमानों की सच्चाई

नई दिल्ली ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना के राफेल लड़ाकू विमानों को मार गिराने के पाकिस्तान के दावों की पोल एक बार फिर खुल गई है. भारतीय वायुसेना के मुख्यालय से जारी एक आधिकारिक दस्तावेज ने साफ कर दिया है कि भारत के पास फ्रांस से खरीदे गए सभी 36 राफेल विमान पूरी तरह ऑपरेशनल हैं. इस तरह भारत के राफेल पर गलतबयानी करने वाले पाकिस्तान को करारा तमाचा लगा है. पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कई राफेल विमानों को गिराने का झूठ फैलाया था।  15 जून 2026 को एयर मुख्यालय के डायरेक्टरेट ऑफ इंजीनियरिंग (राफेल) ने फ्रांस की कंपनी सैफ्रान एयरक्राफ्ट इंजिन्स को एक "ब्रिज सपोर्ट" प्रस्ताव (RFP) भेजा है. ये एक तरह का सपोर्ट टेंडर है. इस दस्तावेज़ में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि भारतीय वायुसेना 2016 के भारत-फ्रांस सरकारी समझौते के तहत खरीदे गए सभी 36 राफेल विमानों का संचालन कर रही है और सितंबर 2026 के बाद भी इनके रखरखाव और तकनीकी सहायता की आवश्यकता होगी. इसी काम के लिए भारतीय वायु सेना ने टेंडर जारी किया है।  36 राफेल के मेंटेनेंस के लिए एयरफोर्स ने जारी किया टेंडर दस्तावेज के अनुसार अगले पांच महीनों के लिए 36 राफेल विमानों के संचालन को ध्यान में रखते हुए पैकेज तैयार किया गया है।  यह घटनाक्रम 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान पाकिस्तान सेना और पाकिस्तान-समर्थक सोशल मीडिया अकाउंट्स के उन बार-बार किए गए दावों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जिनमें आरोप लगाया गया था कि भारत के कई राफेल विमान मार गिराए गए थे।  पाकिस्तान के अलग-अलग मीडिया प्लेटफ़ॉर्म और कमेंटेटर्स ने अलग-अलग आंकड़े पेश किए थे, जिनमें यह दावा भी शामिल था कि तीन राफेल विमान नष्ट हो गए हैं. हालांकि, IAF के हालिया दस्तावेज में बेड़े की संख्या में किसी भी कमी का जिक्र नहीं है; इसके बजाय, इसमें सभी 36 विमानों के लिए उड़ान की ज़रूरतों का हिसाब लगाया गया है।  टेंडर दस्तावेजों के अनुसार इस सपोर्ट पैकेज का मकसद 36 राफेल विमानों को चालू हालत में बनाए रखना है. इसके तहत हर विमान के लिए औसतन सालाना 150 घंटे की उड़ान तय की गई है, जिसका मतलब है कि पांच महीने की 'ब्रिज पीरियड' (अंतरिम अवधि) के दौरान कुल 2,250 घंटे की उड़ान का अनुमान है।  दस्तावेज में बताया गया है कि राफेल के मूल अनुबंध में 36 विमान, उनसे जुड़े उपकरण, इस्तेमाल होने वाली सामग्री, स्पेयर पार्ट्स और पांच साल तक विमानों के बेड़े के संचालन के लिए रखरखाव सहायता शामिल थी. प्रस्तावित 'ब्रिज सपोर्ट' का मकसद 18 सितंबर, 2026 के बाद भी विमानों के संचालन को बिना किसी रुकावट के जारी रखना है।  PAK की 'मनोहर कहानियां' फिर ध्वस्त रक्षा सूत्रों का कहना है कि मेंटेनेंस और सपोर्ट कॉन्ट्रैक्ट आम तौर पर ऑपरेटर के पास मौजूद असल इन्वेंट्री पर आधारित होते हैं. 36 विमानों के पूरे बेड़े का बार-बार ज़िक्र होने से राफेल के नुकसान के बारे में पाकिस्तान के दावों पर और सवाल उठते हैं. पाकिस्तान ने यह झूठा दावा भी किया था कि उसने भारत की एक महिला पायलट को पकड़ लिया है. IAF चीफ एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने पहले ही पाकिस्तान के इन दावों को "मनोहर कहानियां" करार दिया था।  भारतीय वायु सेना के राफेल बेड़े के लिए ये सपोर्ट टेंडर का प्रस्ताव सैफ्रन एयरक्राफ्ट इंजन को भेजा गया है, जो राफेल के M88 इंजन बनाने वाली मूल कंपनी है. यह तरीका आमतौर पर तब अपनाया जाता है जब केवल मूल उपकरण निर्माता ही खास तकनीकी सहायता, स्पेयर पार्ट्स या सेवाएं दे सकता है।  भारत ने फ्रांस के साथ 2016 के समझौते के तहत अपने 36 राफेल लड़ाकू विमान शामिल किए थे; ये विमान अभी IAF के नंबर 17 स्क्वाड्रन "गोल्डन एरोज़" और नंबर 101 स्क्वाड्रन में तैनात हैं। 

राफेल, S-400 और Su-30 बेसों को मिलेगा नया बूस्ट, बंगाल सरकार ने एयरबेस के लिए दी अतिरिक्त जमीन

कलकत्ता पूर्वी भारत की हवाई सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने बड़ा फैसला लिया है. सरकार ने हसीमारा एयर फोर्स स्टेशन के लिए 25 एकड़ और कलाईकुंडा एयर फोर्स स्टेशन के लिए 37 एकड़ जमीन आवंटित करने का फैसला किया है।  यह जमीन दोनों एयरबेस के बुनियादी ढांचे के विस्तार, नई सुविधाओं और भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए इस्तेमाल होगी. यह कदम भारत की पूर्वी हवाई सुरक्षा व्यवस्था को नई ताकत देगा, खासकर चीन की सीमा के करीब।  हसीमारा एयरबेस: राफेल और S-400 का गढ़ हसीमारा एयरबेस अलीपुरद्वार जिले में भूटान सीमा के पास स्थित है. यह भारतीय वायुसेना का बेहद महत्वपूर्ण फॉरवर्ड बेस है. यहां राफेल फाइटर एयरक्राफ्ट की दूसरी स्क्वाड्रन तैनात है, जो पूर्वी क्षेत्र और भारत-चीन सीमा पर भारत की लड़ाकू क्षमता को बहुत बढ़ाती है।  राफेल बेहद आधुनिक मल्टीरोल फाइटर है जो लंबी दूरी तक हमला कर सकता है. दुश्मन के रडार से बच सकता है. हवा से हवा, हवा से जमीन दोनों तरह के मिशन कर सकता है. सूत्रों के अनुसार इस बेस पर S-400 ट्रायम्फ लंबी दूरी की एयर डिफेंस सिस्टम भी मौजूद हैं. सरकार ने इसे आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया है।  1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद 1963 में इस बेस को सक्रिय किया गया था. चुम्बी घाटी त्रिजंक्शन के पास होने के कारण यह सिलीगुड़ी कॉरिडोर और पूर्वी हिमालय क्षेत्र की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाता है. अतिरिक्त जमीन मिलने से यहां रनवे सुविधाएं, हैंगर, रखरखाव कार्यशालाएं और सैनिकों की आवास व्यवस्था बेहतर होगी. कलाईकुंडा एयरबेस: ट्रेनिंग और ऑपरेशन का प्रमुख केंद्र पश्चिम मेदिनीपुर जिले में स्थित कलाईकुंडा एयरबेस पूर्वी एयर कमांड के तहत एक बड़ा फाइटर और ट्रेनिंग हब है. यहां Su-30 MKI और हॉक ट्रेनर एयरक्राफ्ट तैनात रहते हैं. यह बेस अंतरराष्ट्रीय एयर एक्सरसाइज के लिए भी प्रसिद्ध है, खासकर सिंगापुर एयर फोर्स के साथ हुए कई द्विपक्षीय अभ्यास यहां हो चुके हैं।  कलाईकुंडा की रनवे लगभग 10,000 फीट लंबी है, जो फाइटर और ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट दोनों को संभाल सकती है. मिली 37 एकड़ जमीन से यहां लॉजिस्टिक्स, आवास, रखरखाव और सपोर्ट सुविधाएं बढ़ेंगी. यह विकास गेम चेंजर साबित होगा क्योंकि शांति और युद्धकाल दोनों में यहां तैनाती बदलती रहती है।  राफेल और S-400 का संयोजन हसीमारा को दुश्मन के लिए बहुत खतरनाक बना देता है. S-400 सिस्टम 400 किलोमीटर दूर तक दुश्मन के विमान, मिसाइल और ड्रोन को नष्ट कर सकता है. राफेल इस डिफेंस को आक्रामक ताकत देता है।  पूर्वी क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों के बीच इन बेसों का विस्तार जरूरी है. दोनों बेस सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं, जो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को बाकी देश से जोड़ता है।  पूर्वी कमान की तैयारियों में तेजी भारतीय वायुसेना पूर्वी क्षेत्र में अपनी मौजूदगी लगातार बढ़ा रही है. हसीमारा और कलाईकुंडा के विस्तार के साथ-साथ नए रडार, कम्युनिकेशन सिस्टम और लॉजिस्टिक सपोर्ट को मजबूत किया जा रहा है. यह विकास न सिर्फ चीन बल्कि समग्र क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों के लिए तैयार रहने में मदद करेगा।  पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा जमीन आवंटन से रक्षा मंत्रालय और वायुसेना को तेजी से काम करने में आसानी होगी. इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार भी बढ़ेगा क्योंकि बुनियादी ढांचे के निर्माण में स्थानीय कंपनियां और मजदूर शामिल होंगे।  पूर्वी भारत की भौगोलिक स्थिति काफी संवेदनशील है. भूटान, नेपाल, बांग्लादेश और चीन की सीमाएं यहां करीब हैं. इन बेसों का मजबूत होना न सिर्फ हवाई श्रेष्ठता बल्कि थल सेना और नौसेना के साथ समन्वय में भी मदद करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक युद्ध में एयरबेस सिर्फ विमान उड़ाने के स्थान नहीं रह गए हैं. ये कमांड सेंटर, ड्रोन बेस, लॉजिस्टिक हब और इंटेलिजेंस यूनिट का काम भी करते हैं. अतिरिक्त जमीन इन बहु-उद्देशीय क्षमताओं को विकसित करने में उपयोगी होगी।  पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा हसीमारा और कलाईकुंडा एयरबेस के लिए जमीन आवंटित करना पूर्वी भारत की सुरक्षा दृष्टि से एक महत्वपूर्ण फैसला है. राफेल और S-400 जैसी अत्याधुनिक प्रणालियों के साथ इन बेसों का विस्तार भारत को क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने में मजबूती देगा. आने वाले समय में इन बेसों की क्षमता बढ़ने से वायुसेना की तैयारियां और बेहतर होंगी तथा देश की समग्र रक्षा क्षमता को नई ऊंचाई मिलेगी। 

रक्षा सौदे में नया मोड़: भारत के रुख से फ्रांस को लग सकता है झटका, मित्र देश ने दिया नया ऑफर

नई दिल्ली भारत फाइटर जेट स्क्वाड्रन की घटती संख्या को मेंटेन करने के लिए फ्रांस के साथ 114 राफेल जेट की डील पर बातचीत कर रहा है. यह करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये की डील है. इसको लेकर इंडियन एयर फोर्स चीफ एपी सिंह एक दिन पहले तक फ्रांस में थे. लेकिन, अभी तक इस डील का सबसे बड़ा पेच नहीं सुलझा है. भारत चाहता है कि फ्रांस इस जेट का सोर्स कोड नहीं तो कम से कम इंटरफेस डॉक्यूमेंट साझा करे जिससे कि भारत इस जेट में देसी ब्रह्मोस जैसी घातक मिसाइलें लगा सके. लेकिन, फ्रांस इंटरफेस डॉक्यूमेंट भी नहीं देना चाहता है. उसकी चिंता है कि अगर वह भारत के साथ यह डॉक्यूमेंट साझा करेगा तो उसकी पूरी गोपनीयता भारत के हाथ लग जाएगी. फिर ये गोपनीय जानकारी भारत के जरिए उसके दुश्मन देश यानी रूस तक पहुंच जाएगी. इसी कारण वह फिलहाल राफेल का इंटरफेस डॉक्यूमेंट नहीं देना चाहता है।  भारत के लिए सुखद ऑफर इस बीच भारत के लिए एक सुखद खबर आई है. राफेल को लेकर बनी भ्रम की स्थिति के बीच पुराने दोस्त रूस ने बड़ा ऑफर दिया है. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने खुद एक बड़ी पेशकश कर दी है. उन्होंने इंटरनेशनल प्रेस मीट में कहा कि रूस पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट Su-57 से लेकर एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम तक हर स्तर पर भारत का सहयोग करने के लिए तैयार है. पुतिन का स्पष्ट रूप से यह कहना दुनिया खासकर फ्रांस के लिए एक बड़ा संदेश है. भारत रूस से एसयू-57 खरीदने की भी योजना पर काम कर रहा है. ऐसे में भारत कितनी संख्या में यह जेट खरीदेगा यह काफी हद तक राफेल डील पर निर्भर करेगा।  दरअसल, एसयू-57 पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट है. अभी तक दुनिया में केवल तीन देश ही पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स इस्तेमाल कर रहे हैं. इसमें एक अमेरिका, दूसरा चीन और तीसरा देश रूस है. हालांकि रूसी पांचवीं पीढ़ी के जेट एसयू-57 को लेकर एक्सपर्ट कई सवाल भी उठाते रहे हैं लेकिन, रूस की ओर से पूरा सोर्स कोड़ साझा करने, भारत में इस जेट को बनाने और भारत की जरूरत के हिसाब से इस जेट में बदलाव करने जैसे ऑफर को आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता है. सामरिक मामलों के एक्सपर्ट यहां तक कह रहे हैं कि भारत की योजना राफेल के साथ-साथ सुखोई-57 के कम से कम तीन स्क्वाड्रन लेने की है. इससे भारत पांचवीं पीढ़ी की अपनी तात्कालिक जरूरत को पूरा कर लेगा. इसके बाद 2035 तक भारत का अपना 5+ पीढ़ी का जेट एम्का तैयार हो जाएगा. भारत एम्का प्रोजेक्ट पर तेजी से काम कर रहा है।  फ्रांस को संदेश रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का ऑफर भारत के नजरिए से काफी अहम है. पुतिन इंटरनेशनल प्रेस के सामने यह बात कही है. ऐसे में पुतिन का यह बयान काफी कुछ कहता है. इसमें यह संदेश छिपा है कि अगर फ्रांस भारत के साथ इंटरफेर डॉक्यूमेंट नहीं साझा करता है तो भारत के विकल्प खुले हैं. भारत पहले ही से रूस का एक बड़ा सैन्य पार्टनर रहा है. इस वक्त भी भारतीय एयरफोर्स की रीढ़ सुखोई-30 एमके जेट हैं. ये चौथी पीढ़ी के जेट हैं और भारत के पास इसके 250 से अधिक यूनिट हैं. इनको भारत में ही असेंबल किया गया है. रूस ने सुखोई-30एमकेई के प्लांट में ही सुखोई-57 को असेंबल करने का ऑफर दिया है. इससे भारत के लिए खर्च में काफी कमी आ जाएगी. इसके साथ ही रूसी विमानों में किसी भी भारतीय मिसाइल को जोड़ना आसान रहेगा. ऐसे में पुतिन का संदेश केवल भारत के लिए नहीं है बल्कि फ्रांस के लिए भी है। 

नई राफेल डील में ‘मेक इन इंडिया’ पर जोर, 50% स्वदेशी पुर्जों के साथ भारत में तैयार होंगे 90 विमान

 नई दिल्ली भारतीय रक्षा क्षेत्र और वायु सेना (IAF) के इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय जुड़ने जा रहा है. भारत सरकार ने फ्रांस से 114 राफेल फाइटर जेट्स (Rafale Fighter Jets) खरीदने की मेगा डील की दिशा में सबसे बड़ा और औपचारिक कदम उठा लिया है।  रक्षा मंत्रालय ने फ्रांस सरकार को लेटर ऑफ रिक्वेस्ट (LoR – Letter of Request) जारी कर दिया है, जो सरकारी स्तर (G-to-G) पर होने वाले रक्षा समझौतों की आधिकारिक शुरुआत है. लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये की लागत वाली यह मेगा डील भारत का अब तक का सबसे बड़ा फाइटर जेट खरीद कार्यक्रम है।  यह सौदा न केवल भारतीय वायु सेना की घटती 'स्कवाड्रन क्षमता' को मजबूत करेगा, बल्कि देश को एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग के मामले में एक वैश्विक हब के रूप में स्थापित करेगा. इस सौदे की सबसे खास बात यह है कि यह 'बाय ग्लोबल, मेक इन इंडिया' नीति के तहत आ रहा है, जिसका सीधा असर भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था, रक्षा उत्पादन और रोजगार के अवसरों पर पड़ेगा।  क्यों खास है 114 राफेल की नई डील? यह नई राफेल डील साल 2016 में हुई 36 राफेल विमानों की खरीद से बिल्कुल अलग और कई गुना बड़ी है. पिछली बार भारत ने सभी 36 विमान फ्रांस से तैयार स्थिति (Fly-away condition) में खरीदे थे. लेकिन इस बार भारत सरकार की प्राथमिकता देश को रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना है. इस नई मेगा डील की सबसे मुख्य विशेषताएं हैं… 22 से 24 जेट्स फ्रांस से तैयार होकर आएंगे: वायुसेना की आपातकालीन जरूरतों को देखते हुए लगभग 22 से 24 राफेल लड़ाकू विमान सीधे फ्रांस में डसॉल्ट एविएशन की मैरिनेक फैक्ट्री से पूरी तरह तैयार स्थिति में उड़कर भारत आएंगे. इससे वायुसेना को तुरंत आधुनिक कॉम्बैट क्षमता मिलेगी।  90 से 94 जेट्स का निर्माण भारत में होगा: इस डील की असली ताकत यह है कि कुल 114 विमानों में से करीब 90 से 94 फाइटर जेट्स का उत्पादन भारत में किया जाएगा. यह इतिहास में पहली बार होगा जब राफेल जैसे विश्वस्तरीय 4.5 जेनरेशन के लड़ाकू विमान का निर्माण फ्रांस की धरती से बाहर किसी अन्य देश में किया जाएगा।  50% स्वदेशी पुर्जों का होगा इस्तेमाल: भारत में बनने वाले इन राफेल विमानों में कम से कम 50 प्रतिशत सामग्री, तकनीक और पुर्जे पूरी तरह से भारतीय यानी 'स्वदेशी' होंगे. इसके साथ ही, इस समझौते के तहत भारत को यह अधिकार और तकनीकी पहुंच मिलेगी कि वह अपनी स्वदेशी मिसाइल प्रणालियों (जैसे अस्त्र और ब्रह्मोस मिसाइल को राफेल जेट में सीधे इंटीग्रेट कर सके) . कौन सी भारतीय कंपनियां बनेंगी डसॉल्ट एविएशन की पार्टनर? फ्रांस की दिग्गज एयरोस्पेस कंपनी डसॉल्ट एविएशन अकेले भारत में इतने बड़े पैमाने पर विमानों का निर्माण नहीं कर सकती. इसके लिए उसे भारतीय रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों के साथ हाथ मिलाना होगा।  साझेदारी की रेस में सबसे आगे टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (Tata Advanced Systems Limited – TASL) का नाम है. जून 2025 में ही डसॉल्ट एविएशन और टाटा (TASL) ने राफेल के फ्यूजलेज (विमान का मुख्य धड़ या बॉडी) को भारत में बनाने के लिए एक बड़े रणनीतिक समझौते की घोषणा की थी।  इसके अलावा, भारत की सरकारी रक्षा कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) भी इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, जिसके पास लड़ाकू विमान बनाने का दशकों पुराना अनुभव है।  निजी क्षेत्र की अन्य बड़ी कंपनियां जैसे लार्सन एंड टुब्रो, महिंद्रा डिफेंस और भारत फोर्ज भी इस विशाल सप्लाई चेन का हिस्सा बन सकती हैं. ये भारतीय कंपनियां राफेल के विंग्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, रडार कंपोनेंट्स, केबिन और अन्य महत्वपूर्ण प्रणालियों के निर्माण में डसॉल्ट के साथ मिलकर काम करेंगी।  कहां होगा इन फाइटर जेट्स का प्रोडक्शन और मेंटेनेंस? 90 से अधिक राफेल विमानों का उत्पादन भारत के किन शहरों में होगा, इसे लेकर औद्योगिक गलियारों में भारी उत्साह है. सबसे बड़ा हब हैदराबाद बनने जा रहा है, जहां टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स और डसॉल्ट एविएशन मिलकर राफेल के फ्यूजलेज और मुख्य बॉडी पार्ट्स के निर्माण के लिए एडवांस्ड फैसिलिटी स्थापित कर रहे हैं।  इसके अलावा, विमानों की अंतिम असेंबली लाइन (Final Assembly Line) को लेकर भी कयास जारी हैं, जिसके लिए महाराष्ट्र या कर्नाटक के रक्षा औद्योगिक पार्कों पर विचार किया जा सकता है।  उत्पादन के साथ-साथ, विमानों के रख-रखाव को लेकर भी भारत ने बाजी मार ली है. डसॉल्ट एविएशन ने उत्तर प्रदेश के नोएडा के पास एक अत्याधुनिक 'मेंटेनेंस, रिपेयर एंड ओवरहॉल' (MRO) फैसिलिटी स्थापित की है, जिसका नाम DAMROI (Dassault Aviation Maintenance, Repair and Overhaul India) है।  यह सेंटर पहले से ही चालू हो चुका है. वर्तमान में भारतीय वायु सेना के पास मौजूद मिराज-2000 और 36 राफेल विमानों की सर्विसिंग का काम संभाल रहा है. भविष्य में भारत में बनने वाले 94 राफेल विमानों की सर्विसिंग और अपग्रेडेशन भी इसी एमआरओ हब के जरिए देश के भीतर ही संभव होगी।  रक्षा क्षेत्र में लगेंगी कितनी नौकरियां? यह निवेश भारतीय रोजगार बाजार के लिए एक गेम चेंजर साबित होने वाला है. रक्षा विशेषज्ञों और आर्थिक विश्लेषकों के मुताबिक इस मेगा प्रोजेक्ट से भारत में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हजारों नौकरियां पैदा होंगी।      हाई-टेक इंजीनियरिंग नौकरियां: विमान के डिजाइन, सॉफ्टवेयर इंटीग्रेशन और असेंबली के लिए हजारों एयरोस्पेस इंजीनियरों, डेटा साइंटिस्ट्स और तकनीशियनों की सीधी भर्ती होगी।      एमएसएमई (MSME) सेक्टर को बढ़ावा: 50% स्वदेशी पुर्जों की शर्त के कारण भारत की सैकड़ों छोटी और मध्यम (MSME) कंपनियों को कलपुर्जे बनाने के ऑर्डर मिलेंगे. इससे स्थानीय स्तर पर वेल्डिंग, मशीनिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स और लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में काम करने वाले कुशल और अर्ध-कुशल श्रमिकों के लिए रोजगार की बाढ़ आ जाएगी।      कौशल विकास (Skill Development): फ्रांस की तकनीक भारत में ट्रांसफर (Transfer of Technology) होने से भारतीय कार्यबल को वैश्विक स्तर की हाई-टेक ट्रेनिंग मिलेगी, जो भविष्य में भारत के अपने पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) के विकास में काम आएगी।  भारतीय वायु सेना के लिए क्यों जीवनदान है यह सौदा? वर्तमान में भारतीय वायु सेना (IAF) लड़ाकू विमानों की भारी किल्लत से जूझ रही है. दो मोर्चों (चीन और पाकिस्तान) पर एक साथ सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए वायुसेना के पास 42 लड़ाकू विमान स्क्वॉड्रन होने चाहिए. लेकिन पुराने मिग-21 जैसे … Read more

राफेल की ताकत होगी और मजबूत: फ्रांस देगा तकनीकी डेटा, भारत में रिपेयर होंगी MICA मिसाइलें

नई दिल्ली  राफेल और मिराज-2000 जैसे लड़ाकू विमानों में लगने वाली MICA मिसाइलों की मरम्मत भारत में ही की जा सकेगी। फ्रांसीसी कंपनी MBDA ने भारतीय वायुसेना (IAF) के साथ इस बारे में करार किया है। इसके तहत भारत में ही MICA मिसाइलों का आधुनिकीकरण किया जा सकेगा और साथ ही फ्रांस से खरीदे गए राफेल की भी मरम्मत की जा सकेगी। इस समझौते के लिए अरसे से कोशिशें की जा रही थीं। फ्रांसीसी कंपनी भारत में MICA के रखरखाव और मरम्मत केंद्र स्थापित करेगी। राफेल और मिराज में लगने वाले मिसाइलों की भी मरम्मत     OPEXNews की एक खबर के अनुसार, MBDA और IAF के इस नए समझौते में भारतीय डसॉल्ट राफेल लड़ाकू विमानों और आधुनिक मिराज 2000 विमानों द्वारा उपयोग की जाने वाली MICA मिसाइलों की मरम्मत और मध्यम स्तर के आधुनिकीकरण के लिए स्थानीय क्षमताओं की तैनाती का प्रावधान है।     भारत और MBDA ने MICA हवा से हवा मिसाइल के लिए एक नए समर्थन समझौते की घोषणा की है। इस समझौते के तहत भारतीय वायु सेना MICA के लिए एक घरेलू मरम्मत केंद्र स्थापित और संचालित करेगी, जबकि MBDA कलपुर्जे, तकनीकी डेटा और ट्रेनिंग देगी।     दरअसल, मिसाइलें रिपेयर नहीं, ओवरहॉल होती हैं। एक बार लॉन्च होने के बाद मिसाइल नष्ट हो जाती है। मरम्मत का मतलब उसके भंडारण (Storage) के दौरान खराबी को ठीक करना या उसकी उम्र बढ़ाने के लिए उसे सर्विस करना है। मिसाइल भंडार हमेशा भरा रहेगा     भारत वायु सेना ने बताया कि यह सेंटर मिसाइल भंडार को फिर से तैयार करने में लगने वाले समय को कम करेगा और वायु सेना की युद्धक तत्परता को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाएगा। फ्रांस आवश्यक उपकरण और तकनीकी दस्तावेज उपलब्ध कराएगा और स्थानीय कर्मियों को प्रशिक्षण देगा।     इस सुविधा की स्थापना का निर्णय ऑपरेशन सिंदूर के बाद लिया गया, जिसके दौरान भारत ने लंबी दूरी की हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों और वायु रक्षा प्रणालियों का सक्रिय रूप से इस्तेमाल किया गया था। MICA मिसाइलें क्या होती हैं, भारत क्यों कर रहा इस्तेमाल     MICA मिसाइल एक बहुमुखी हवा से हवा में मार करने वाला हथियार है। इसे फ्रांसीसी में (MICA:Missile d'Interception, de Combat et d'Auto-défense) कहा जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है-'अवरोधन, युद्ध और आत्मरक्षा के लिए मिसाइल'। यह एक फ्रांसीसी वायुरोधी मल्टीपल टार्गेट्स वाली हर मौसम में दागो और भूल जाओ वाली लघु से मध्यम दूरी की मिसाइल प्रणाली है, जिसका निर्माण MBDA फ्रांस द्वारा किया गया है।     MICA दो वर्जन में उपलब्ध है। MICA-RF सक्रिय रडार सीकर, जबकि MICA-IR इमेजिंग इन्फ्रारेड सीकर से लैस है। दोनों को लंबी दूरी (60-80 किमी) और करीबी लड़ाई में लक्ष्यों को भेदने के लिए डिजाइन किया गया है। मिसाइल का वजन लगभग 112 किलोग्राम है, जिसमें 12 किलोग्राम का उच्च-विस्फोटक वारहेड लगा है और यह लगभग मैक 4 की गति तक पहुंच सकती है। कारगिल युद्ध के बाद शुरू हुआ जंगी विमानों का आधुनिकीकरण 1999 के कारगिल युद्ध के बाद भारत ने अपने वायुसेना बेड़े का बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण शुरू किया और इन्फ्रारेड (MICA IR) और रडार (MICA RF) होमिंग हेड से लैस मिसाइलों के MBDA संस्करणों की मांग की। 2011 में दोनों पक्षों ने 50 मिराज 2000 लड़ाकू विमानों को मिराज 2000I/TI मानक में अपग्रेड करने के लिए एक करार पर हस्ताक्षर किए, जिसमें इन मिसाइलों के एडवांस संस्करणों का एकीकरण भी शामिल था। इस समझौते की टाइमिंग बेहद अहम     भारत को 2000 के दशक की शुरुआत में मिराज-2000 के आधुनिकीकरण के साथ-साथ MICA मिसाइलें मिलनी शुरू हुईं। यह समझौता ऐसे समय में घोषित किया गया है जब भारत कई और राफेल जेट खरीदने पर विचार कर रहा है। भारत घरेलू रखरखाव क्षमताओं का निर्माण करके MICA मिसाइल भंडार को बढ़ाने की तैयारी कर रहा है।     स्थानीय मरम्मत और पुनर्निर्माण केंद्र होने से दागी गई या खराब मिसाइलों की त्वरित आपूर्ति सुनिश्चित होती है, जो तीव्र गति वाले अभियानों या संकटों के दौरान अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे विदेशी मरम्मत चक्रों पर निर्भरता कम होती है और विदेशी शिपिंग या निर्यात अनुमोदन में होने वाली देरी से बचा जा सकता है। उदाहरण के लिए, मध्य पूर्व में हाल ही में हुए अभियानों में एमआईसीए राउंड की खपत हुई, जिससे पर्याप्त भंडार की आवश्यकता स्पष्ट होती है।

अंबाला से चला प्रहार,गोल्डन ऐरो स्क्वाड्रन ने दुश्मन के ठिकाने किए तबाह

अंबाला भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल होने के बाद राफेल लड़ाकू विमानों ने ऑपरेशन सिंदूर में अपनी पहली ही अग्निपरीक्षा दी। इसमें सफलता प्राप्त करते हुए वायु वीरों ने दुश्मन के दांत खट्टे कर दिए थे। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अंबाला स्थित 17 स्क्वाड्रन गोल्डन ऐरो ने पाकिस्तानी सीमा में घुसकर न केवल आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद किया, बल्कि उनके सैन्य एयरबेस और डिफेंसिव एयर पावर को भी पूरी तरह पंगु बना दिया। अंबाला एयरफोर्स स्टेशन के म्यूजियम में अब इस शौर्य गाथा को ऑपरेशन सिंदूर वॉल के जरिए सार्वजनिक किया गया है। जल, थल और नभ का संयुक्त प्रहार 22 अप्रैल 2025 को कश्मीर के पहलगाम में हुए कायरतापूर्ण आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस हमले में तीर्थयात्रियों और पर्यटकों समेत 26 निर्दोष लोगों की जान चली गई थी। इस बर्बरता का जवाब देने के लिए भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना ने संयुक्त रूप से ऑपरेशन सिंदूर का बिगुल फूंका। रणनीति के तहत अंबाला एयरफोर्स स्टेशन को फ्रंटलाइन बेस बनाया गया, जहां से राफेल और जगुआर विमानों ने दुश्मन पर गहरा प्रहार करने की कमान संभाली। राफेल और गोल्डन ऐरो की पहली जंग वायुसेना में शामिल होने के बाद राफेल का यह किसी युद्ध जैसी स्थिति में पहला मुकाबला था। एयर कमोडोर बी. सतीश (वीएम) के नेतृत्व में गोल्डन ऐरो स्क्वाड्रन ने पाकिस्तान के अंदरूनी इलाकों में सटीक लक्षित हमले किए। राफेल की अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों और लंबी दूरी की मिसाइलों के आगे दुश्मन का रडार तंत्र फेल हो गया। स्क्वाड्रन ने पाकिस्तानी सैन्य एयरबेस और उनके महत्वपूर्ण नागरिक बुनियादी ढांचे पर लंबे समय तक हमले जारी रखे, जिससे दुश्मन की जवाबी कार्रवाई की क्षमता ध्वस्त हो गई। पदकों से चमकी अंबाला की वीर धरा इस ऐतिहासिक ऑपरेशन में अदम्य साहस दिखाने के लिए अंबाला वायुसेना स्टेशन को स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर कुल 26 राष्ट्रपति पुरस्कारों से नवाजा गया है। इनमें वीर चक्र ग्रुप कैप्टन रंजीत सिंह सिद्धू और स्क्वाड्रन लीडर सार्थक कुमार के नाम हुआ। युद्ध सेवा पदक ग्रुप कैप्टन विकास वर्मा को मिला। वहीं वायु सेना पदक से ग्रुप कैप्टन दीपक चौहान, स्क्वाड्रन लीडर कौस्तुभ नलबड़े, मिहिर विवेक चौधरी और अमन सिंह नवाजे गए। मेंशन-इन-डिस्पैचेस से ग्रुप कैप्टन इंद्रजीत सिंह और विंग कमांडर एमआई संचिया समेत 19 जांबाज को सम्मानित किया गया। सभी वायु वीरों को दिल्ली में सम्मान मिला। म्यूजियम में दर्ज हुआ इतिहास अंबाला एयरबेस के म्यूजियम में बनी विशेष दीवार अब इन वीरों के नाम और उनके बलिदान की गवाह बन गई है। यह दीवार न केवल राफेल की मारक क्षमता को दर्शाती है, बल्कि उन तकनीकी श्रेष्ठताओं (उन्नत मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम) का भी विवरण देती है, जिन्होंने इस मिशन को सफल बनाया। अंबाला ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह देश की रक्षा पंक्ति का सबसे मजबूत और अभेद्य किला है।  

राफेल डील पर भारत ने तय की लक्ष्मण रेखा, शर्त नहीं मानी तो सौदा रद्द, फ्रांस को ₹325000 करोड़ का भारी नुकसान

नईदिल्ली  भारत अपने डिफेंस सिस्‍टम को अपग्रेड करने और उसे मॉडर्न एज वॉरफेयर के लेवल तक लाने के लिए हर संभव कोशिश कर रहा है. स्‍वदेशी तकनीक से नेक्‍स्‍ट जेनरेशन फाइटर जेट डेवलप करने के लिए AMCA प्रोग्राम लॉन्‍च किया गया है. इसके तहत 5th और 6th जेनरेशन का फाइटर जेट डेवलप किया जाना है. इसके साथ ही एयरस्‍पेस को अभेद्य किला बनाने के लिए मिशन सुदर्शन चक्र नाम से नेशनल एयर डिफेंस प्रोग्राम भी शुरू किया गया है. S-400 के साथ ही अन्‍य देसी डिफेंस सिस्‍टम इसका हिस्‍सा हैं. साल 2035 तक इसे पूरी तरह से अमल में लाने का लक्ष्‍य रखा गया है. इसके तहत कई एंटी मिसाइल, एंटी ड्रोन और एंटी एयरक्राफ्ट सिस्‍टम डेवलप किए गए हैं और किए जा रहे हैं. मिसाइल के क्षेत्र में भी भारत ने कई उपलब्धियां हासिल की हैं. अग्नि सीरीज की मिसाइलों के साथ ही ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल इसका उदाहरण हैं. फाइटर जेट के मामले में भारत अभी भी इंपोर्ट पर निर्भर है. इसी क्रम में फ्रांस की डसॉल्‍ट एविएशन के साथ 114 राफेल फाइटर जेट खरीदने के प्रस्‍ताव को हरी झंडी दी गई है. यह सौदा तकरीबन 3.25 लाख करोड़ बताया जा रहा है. हालांकि, अब इस डील में नया पेच फंसता दिख रहा है. दरअसल, भारत ने राफेल डील के तहत इंटरफेस कंट्रोल डॉक्‍यूमेंट (ICD) तक पहुंच की शर्त रखी है. भारतीय पक्ष का कहना है कि यदि फ्रांस के साइड से इस शर्त का पालन नहीं किया गया तो भारत इस डील से पूरी तरह से बाहर निकल सकता है. ऐसे में अब फ्रांस पर निर्भर करता है कि 114 राफेल फाइटर जेट की महाडील आगे बढ़ती है या फिर बीच रास्‍ते ही दम तोड़ती है।  दरअसल, भारत के बहुप्रतीक्षित मीडियम रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) कार्यक्रम में 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद को लेकर बातचीत निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है. करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये के इस मेगा सौदे में अब इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट (ICD) सबसे अहम मुद्दा बनकर उभरा है, जो इस डील के भविष्य का फैसला कर सकता है. रक्षा मंत्रालय (MoD) के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, भारत को ICD तक पहुंच मिलने को लेकर भरोसा तो है, लेकिन यदि फ्रांस की ओर से इसमें किसी तरह की अनिच्छा दिखाई जाती है, तो नई दिल्ली इस सौदे से पूरी तरह पीछे हटने का कड़ा फैसला भी ले सकती है. यह रुख भारत की रक्षा खरीद नीति में एक बड़ा बदलाव दर्शाता है, जहां अब तकनीकी पहुंच और ऑपरेशनल ऑटोनॉमी को अनिवार्य शर्त के रूप में देखा जा रहा है, न कि एक अतिरिक्त सुविधा के रूप में. ‘इंडियन डिफेंस रिसर्च विंग’ की रिपोर्ट के अनुसार, रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह के नेतृत्व में ICD के महत्व को और अधिक बढ़ाया गया है. फरवरी 2026 में रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) से मंजूरी मिलने के बाद MRFA कार्यक्रम अब सिर्फ विमानों की खरीद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह भारत की दीर्घकालिक सामरिक आत्मनिर्भरता से जुड़ गया है. सरकार का स्पष्ट लक्ष्य है कि भविष्य में किसी भी अपग्रेड या वेपन इंटीग्रेशन के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम की जाए।  डिजिटल इंटरफेस फ्रेमवर्क तकनीकी रूप से ICD एक मानकीकृत डिजिटल इंटरफेस फ्रेमवर्क होता है, जो विमान के मिशन कंप्यूटर और बाहरी सिस्टम जैसे हथियारों के हार्डपॉइंट्स के बीच हैंडशेक का काम करता है. यदि भारत को ICD मिल जाता है, तो भारतीय इंजीनियर बिना मूल निर्माता के सोर्स कोड तक पहुंचे ही स्वदेशी हथियारों का फाइटर जेट में इंटीग्रेशन कर सकेंगे. इससे न केवल समय की बचत होगी, बल्कि लागत भी काफी कम हो जाएगी. पहले 36 राफेल विमानों की खरीद में भारत को हर नए गैर-फ्रांसीसी हथियार को जोड़ने के लिए डसॉल्ट एविएशन पर निर्भर रहना पड़ा था. इस प्रक्रिया में अतिरिक्त लागत और लंबा समय लगता था, जिससे ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी प्रभावित होता था. हर नए हथियार के लिए अलग से बातचीत करनी पड़ती थी, जिससे पूरे सिस्टम की दक्षता पर असर पड़ता था. अब MRFA कॉन्‍ट्रैक्‍ट में ICD को शामिल करके भारत शुरुआत से ही इंटीग्रेशन फ्रीडम सुनिश्चित करना चाहता है. इसके तहत स्वदेशी हथियारों जैसे अस्त्र सीरीज (Mk1, Mk2, Mk3) की बीवीआर मिसाइलें, रुद्रम एंटी-रेडिएशन मिसाइल और स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन (SAAW) जैसे प्रिसीजन गाइडेड म्यूनिशन को आसानी से जोड़ा जा सकेगा।  ICD क्‍यों है इतना अहम?     आईसीडी की अहम भूमिका: तकनीकी तौर पर ICD (Interface Control Document) एक मानकीकृत डिजिटल इंटरफेस फ्रेमवर्क है, जो विमान के मिशन कंप्यूटर और बाहरी सिस्टम के बीच हैंडशेक लेयर का काम करता है।      सिस्टम के बीच समन्वय: यह फ्रेमवर्क तय करता है कि विमान के मिशन कंप्यूटर और हथियार हार्डपॉइंट्स जैसे बाहरी सिस्टम आपस में कैसे संवाद करेंगे।      स्वदेशी क्षमता को बढ़ावा: ICD हासिल होने से भारतीय इंजीनियरों को स्वदेशी हथियारों को विमान में इंटीग्रेट करने की क्षमता मिलती है।      निर्माता पर निर्भरता कम: इसके जरिए मूल उपकरण निर्माता (OEM) के मालिकाना सोर्स कोड तक पहुंच की जरूरत नहीं रहती, जिससे विदेशी निर्भरता घटती है।      रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता: यह कदम भारत के रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत करने और स्वदेशी तकनीक के उपयोग को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।  तकरीबन सवा तीन लाख करोड़ रुपये की राफेल डील के तहत भारत इंटरफेस कंट्रोल डॉक्‍यूमेंट यानी ICD का एक्‍सेस चाहता है, ताकि वेपन सिस्‍टम को फाइटर जेट में इंटीग्रेट करने में द‍िक्‍कतों का सामना न करना पड़े।  डिजिटल संप्रभुता रक्षा मंत्रालय ICD को डिजिटल संप्रभुता का एक महत्वपूर्ण साधन मान रहा है. इसका उद्देश्य भारत को अपने लड़ाकू प्लेटफॉर्म्स के विकास और उन्नयन पर पूर्ण नियंत्रण देना है, ताकि देश विदेशी कंपनियों के तकनीकी इकोसिस्टम में बंधा न रहे. यह कदम आत्मनिर्भर भारत और घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत करने की व्यापक रणनीति के अनुरूप है. हालांकि, फ्रांस के लिए यह मुद्दा संवेदनशील बना हुआ है. ICD तक पहुंच देने से बौद्धिक संपदा अधिकारों और सिस्टम आर्किटेक्चर पर नियंत्रण से जुड़े सवाल उठ सकते हैं. ऐसे में सीमित या शर्तों के साथ पहुंच देने का विकल्प भी बातचीत में सामने आ सकता है, लेकिन यह भी विवाद का कारण बन सकता है. MRFA डील अब केवल रक्षा खरीद नहीं, … Read more

तेजस MK-2 बनेगा भारत का ‘मिनी राफेल’… बंकर फाड़ने वाली मिसाइलों से दुश्मनों में खौफ

नई दिल्ली भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान को पानी पिलाने वाले राफेल लड़ाकू विमान जैसा ही तेजस MK-2 को बनाने का प्लान किया है। भारत के स्वदेशी और अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान तेजस एमके-2 को हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) बना रहा है, जिसने तेजस एमके-2 को और उन्नत ओर ताकतवर बनाने का फैसला किया है। इसमें SCALP‑EG और Crystal Maze जैसी मिसाइलें लगाई जाएंगी। HAL के तेजस फैमिली के सबसे ताकतवर एडवांस संस्करण के रूप में डिजाइन किया गया यह विमान आने वाले दशक में भारतीय वायु सेना की रीढ़ बनने की उम्मीद है। दुश्मन के भीतरी इलाकों तक सटीक मार करेगा तेजस एमके-2     मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जैसे-जैसे भारत अपनी लंबी दूरी की मारक क्षमता का विस्तार कर रहा है, तेजस एमके2 को एडवांस स्टैंडऑफ मिसाइलों को एकीकृत करने के लिए पहले से ही लैस किया जा रहा है।     इसका मकसद यह है कि भारी सुरक्षा वाले हवाई क्षेत्र से बाहर रहते हुए दुश्मन के क्षेत्र में गहराई तक स्थित रणनीतिक लक्ष्यों को भेदने में तेजस एमके-2 सक्षम होगा। इससे वायुसेना की सटीक मारक क्षमता भी बढ़ेगी। तेजस MK-2 वायुसेना के MK-1 से ज्यादा ताकतवर     रिपोर्टों के अनुसार, तेजस एमके-2 को एक मध्यम-वजन बहु-भूमिका लड़ाकू विमान के रूप में परिकल्पित किया गया है, जो वर्तमान में सेवा में मौजूद एचएएल तेजस एमके-1 संस्करणों की तुलना में बड़ा और कहीं अधिक ताकतवर है।     इस विमान का विकास वैमानिकी विकास एजेंसी द्वारा किया जा रहा है और इसका निर्माण हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा किया जा रहा है। तेजस MK-2 की ये हैं खूबियां, जो बनाती हैं मारक     तेजस MK-2 का बड़ा एयरफ्रेम होगा।     तेजस MK-2 में अधिक पेलोड क्षमता होगी।     बेहतर एवियोनिक्स और सेंसर से लैस होगा।     इसकी दुश्मन के इलाके में अधिक युद्धक रेंज होगी।     GE F414-GE-INS6 टर्बोफैन इंजन से शक्ति मिलेगी।     Mk1 सीरीज में इस्तेमाल इंजन की तुलना में अधिक थ्रस्ट देता है।     लंबी दूरी के मिशनों के दौरान भारी हथियार भी ले जा सकेगा। लंबी दूरी की मारक मिसाइलों से लैस होगा तेजस एमके-2     तेजस Mk2 के लिए नियोजित सबसे महत्वपूर्ण अपग्रेड में से एक लंबी दूरी की सटीक मारक हथियारों का एकीकरण है। इसमें सबसे पहले SCALP-EG क्रूज मिसाइल और इजरायली मूल की क्रिस्टल मेज मिसाइलें लगाई जाएंगी।     ये दोनों हथियार पहले से ही भारतीय वायु सेना के हथियार भंडार का हिस्सा हैं और वर्तमान में डसॉल्ट राफेल और उन्नत डसॉल्ट मिराज 2000 लड़ाकू विमानों जैसे विमानों पर तैनात हैं। SCALP-EG क्रूज मिसाइल की खूबी जान लीजिए     SCALP-EG एक लंबी दूरी की वायु-प्रवेशित क्रूज मिसाइल है जिसे अत्यधिक सुरक्षित लक्ष्यों पर सटीक हमले करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह बंकरों और सैन्य ठिकानों पर तेजी से वार करती है।     यह रडार से बचते हुए कम ऊंचाई पर चुपके से उड़ान भरने में सक्षम है। ऊंचाई वाले लक्ष्यों के लिए सटीक मार्गदर्शन प्रणाली से लैस होगी। सैकड़ों किलोमीटर दूर के लक्ष्यों पर हमला करने की क्षमता है। यह दुश्मन की सीमा में जाए बिना ही टारगेट्स तबाह कर सकती है। क्रिस्टल मेज से कोई बच नहीं सकता है क्रिस्टल मेज मिसाइल वायु से सतह तक सटीक मारक हथियार के रूप में भी जाना जाता है। यह दुश्मन के रडार स्टेशनों, कमांड केंद्रों और वायु रक्षा प्रतिष्ठानों जैसे ज्यादा अहम टारगेट्स पर हमला करने के लिए डिजाइन की गई है। इसकी मारक क्षमता करीब 250 किमी तक है। इन चीजों से भी लैस होंगे तेजस विमान एस्ट्रा एमके-1 बियॉन्ड-विजुअल-रेंज मिसाइल, एस्ट्रा एमके-2 एक्सटेंडेड-रेंज बीवीआर मिसाइल और एस्ट्रा एमके-3 का भविष्य में एकीकरण। निकटवर्ती हवाई लड़ाइयों के लिए लड़ाकू विमान इन्फ्रारेड-गाइडेड एएसराम मिसाइल ले जाएगा, जिसका उपयोग भारतीय वायु सेना पहले से ही तेजस एमके1ए सहित कई प्लेटफार्मों पर कर रही है।

भारत में राफेल बनाने के बाद सरकार बेचेगी, समझें डील की शर्तें

बेंगलुरु  भारत में राफेल बनाने की तैयारी तेज हो गई है. फ्रांस के राष्ट्रपति के दौरे के बाद डील को आगे बढ़ाने की कवायद शुरू हो चुकी है. सवाल अब यह उठ रहा है कि अगर राफेल भारत में बनेंगे, तो क्या सरकार इन्हें दूसरे देशों को बेच भी सकेगी? या ये विमान सिर्फ भारतीय वायुसेना के लिए ही होंगे? डील की शर्तें क्या कहती हैं चलिए समझते हैं. राफेल डील में आई तेजी इमैनुएल मैक्रों के भारत दौरे के बाद राफेल डील को लेकर हलचल तेज हुई है. रक्षा मंत्रालय जल्द ही प्रस्ताव को कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी के पास भेजने की तैयारी में है. ऐसे में उम्मीद है कि अगले 4 से 6 महीने में समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं. सूत्रों के मुताबिक, रक्षा खरीद प्रक्रिया की टाइमलाइन छोटी करने की कोशिश की जा रही है ताकि लड़ाकू विमान और अन्य हथियार जल्द मिल सकें. अभी विदेशी हथियार खरीदने की प्रक्रिया लंबी और जटिल मानी जाती है.  114 राफेल को भारत में बनाने की मंजूरी मैक्रों के दौरे से पहले रक्षा मंत्रालय की डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल ने भारतीय वायुसेना के लिए 114 राफेल विमान देश में बनाने की मंजूरी दी थी. राफेल विमान फ्रांस की कंपनी दासो एविएशन बनाती है. प्रस्ताव है कि दासो किसी भारतीय कंपनी के साथ साझेदारी कर भारत में उत्पादन प्लांट स्थापित करे. इससे तकनीक हस्तांतरण, स्थानीय रोजगार और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा.  क्या भारत इन राफेल को बेच सकेगा? यहीं सबसे अहम सवाल आता है. साफ तौर पर कहा गया है कि ये 114 राफेल भारतीय वायुसेना की जरूरतों के लिए बनाए जा रहे हैं. यानी इनका उद्देश्य निर्यात नहीं, बल्कि देश की रक्षा क्षमता बढ़ाना है. डील की शर्तों के मुताबिक, विमान का उत्पादन लाइसेंस और तकनीकी समझौते के तहत होगा. ऐसे में बिना फ्रांसीसी कंपनी और सरकार की अनुमति के भारत इन विमानों को तीसरे देश को नहीं बेच सकता है.  रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भविष्य में निर्यात का विकल्प खुलता भी है, तो वह अलग समझौते और संयुक्त अनुमति के तहत ही संभव होगा. 

5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट पर भारत का बड़ा फैसला, राफेल के साथ होगा शामिल

नई दिल्ली फाइटर जेट्स की कमी से जूझ रही इंडियन एयरफोर्स को मजबूत बनाने के लिए ऐसा लगता है कि भारत सरकार ने अपनी तिजोरी खोल दी है. फ्रांस की दसॉल्ड एविएशन से 114 राफेल विमान खरीदने संबंधी एयरफोर्स के प्रस्ताव पर जल्द ही सरकार की मुहर लगने वाली है. इस बीच रिपोर्ट आई है कि भारत में रूसी पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स सुखोई-57 की लागत को लेकर गंभीरता से विचार चल रहा है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारत राफेल के साथ रूस से भी सुखोई-57 फाइटर जेट का सौदा करेगा? दरअसल, इंडियन एक्सप्रेस अखबार में एक रिपोर्ट छपी है. इमसें कहा गया है कि पब्लिक सेक्टर की कंपनी एचएएल को अब भी रूस से उस रिपोर्ट का इंतजार है जिसमें भारत में सुखोई-57 विमानों को बनाने में खर्च का आंकलन किया गया है. सुखोई-57 को लेकर अभी तक कोई फैसला नहीं लिया गया है. यह रिपोर्ट इसी माह एचएएल को मिलने की संभावना है. देश में सुखोई-57 बनाने पर कितना खर्च? इस रिपोर्ट में एचएएल को यह बताया जाएगा कि इस प्रोजेक्ट को देश में शुरू करने में कितना खर्च जाएगा. यहां एक बात समझने की जरूरत है कि भारत पहले से सुखोई श्रेणी के विमानों का निर्माण करता है. रूस के साथ वर्ष 2000 में हुई एक डील के तहत भारत में 250 से अधिक सुखोई 30एमकेआई फाइटर जेट बनाए गए हैं. ये एक बहुत पावरफुल चौथी पीढ़ी के विमान हैं. इसके निर्माण के लिए तैयार किया गया इंफ्रास्ट्रक्टर आज भी मौजूद है. पिछले दिनों एसयू-57 को लेकर रूस की एक टीम भारत दौरे पर आई थी. उस टीम ने कहा था कि भारत में इस फाइटर जेट के निर्माण के लिए करीब-करीब 50 फीसदी सुविधाएं मौजूद हैं. उसने इस प्रोजेक्ट पर होने वाले संभावित खर्च को लेकर एक रिपोर्ट देने की बात कही थी.  एचएएल को इसी रिपोर्ट का इंतजार है. फिलहाल एचएएल की नासिक डिवीजन में सुखोई-30 एमकेआई की फाइनल असेंबली लाइन मौजूद है. कोरापुट डिवीजन में एएल-31एफपी टर्बोफैन इंजन का लाइसेंस प्रोडक्शन किया जाता है. केरल में इस फाइटर जेट्स के एवयोनिक्स कंपोनेंट्स तैयार किए जाते हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि क्षमता और लागत आंकने का यह काम एएचएल की पहल पर किया जा रहा है. करीब 1000 फाइटर जेट्स की जरूरत अभी तक सरकार ने यह फैसला नहीं लिया है कि पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स की कमी को पूरा करने के लिए कौन विमान खरीदे जाएंगे. भारत अभी 4.5 पीढ़ी के फ्रांसीसी विमान राफेल की खरीद की तैयारी कर रहा है. जहां तक पांचवीं पीढ़ी के जेट की बात है तो हमारे पास मौजूदा वक्त में केवल दो विकल्प मौजूदा हैं. पहला अमेरिकी एफ-35 और दूसरा रूसी सुखोई-57. चीन के पास पांचवीं पीढ़ी के जे-20 विमान हैं. उसे हम नहीं खरीद सकते. इसके अलावा दुनिया में किसी अन्य देश के पास अपना पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट नहीं है. भारत अपना पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट एम्का प्रोजेक्ट चला रहा है. लेकिन, इसमें कभी समय लगेगा. माना जा रहा है कि सब कुछ ठीक रहा तो देसी पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट 2035 तक एयरफोर्स को मिल पाएंगे. जहां तक भारतीय एयरफोर्स की बात है तो इस वक्त उसके पास करीब 30 स्क्वाड्रन हैं. उसके लिए मंजूर क्षमता 42 स्क्वाड्रन की है. लेकिन, चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मन देशों की क्षमता और टू-फ्रंट वार की आशंका को देखते हुए एक्सपर्ट इन स्क्वाड्रन क्षमता को बढ़ाकर 60 तक ले जाने की बात कर रहे हैं. यानी इंडियन एयरफोर्स को कम से कम 1000 से 1100 फाइटर जेट्स से लैस करना होगा.