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हरिवंश को फिर मिला राज्यसभा उपसभापति का कार्यकाल, इस बार राष्ट्रपति ने किया मनोनयन

 नई दिल्ली राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश का बतौर सदस्य कार्यकाल आज यानी 10 अप्रैल को समाप्त हो रहा है. रिक्त हो रही सीट के लिए निर्वाचन की प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी है. हरिवंश की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) ने इस बार उनको राज्यसभा नहीं भेजा था. हरिवंश की उच्च सदन से विदाई तय मानी जा रही थी, लेकिन ऐन मौके पर उनको एक और कार्यकाल का तोहफा मिल गया है।  हरिवंश को राष्ट्रपति ने अपने कोटे से राज्यसभा सांसद मनोनीत कर दिया है. इस संबंध में गजट नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया गया है. राष्ट्रपति कोटे से मनोनयन के बाद अब यह तय हो गया है कि अगले छह साल तक उच्च सदन में हरिवंश की आवाज अभी गूंजती रहेगी. हरिवंश का राज्यसभा सदस्य के रूप में यह तीसरा कार्यकाल होगा।  गृह मंत्रालय की ओर से जारी गजट नोटिफिकेशन में कहा गया है कि राष्ट्रपति एक नामित सदस्य की सेवानिवृत्ति के कारण हुई रिक्ति को भरने के लिए राज्यसभा में हरिवंश को नामित करती हैं. गौरतलब है कि संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू राज्यसभा में 12 सदस्यों को मनोनीत कर सकती हैं।  साहित्य, कला, विज्ञान और समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले प्रतिष्ठित व्यक्तियों को मनोनीत किए जाने का प्रावधान संविधान में है. मनोनीत सदस्यों का कार्यकाल भी निर्वाचित सदस्यों की ही तरह छह साल का होता है. बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू अध्यक्ष नीतीश कुमार के करीबी माने जाने वाले हरिवंश पेशे से पत्रकार रहे हैं।  उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के जयप्रकाश नगर निवासी हरिवंश अप्रैल, 2014 में पहली बार राज्यसभा सांसद निर्वाचित हुए थे. तब उनको जेडीयू ने ही उच्च सदन में भेजा था. जेडीयू ने हरिवंश को लगातार दो बार राज्यसभा भेजा, लेकिन पार्टी ने तीसरा कार्यकाल नहीं दिया था. इसके बाद उच्च सदन में उनकी संसदीय पारी खत्म मानी जा रही थी, लेकिन ऐन वक्त पर सरकार ने राष्ट्रपति के कोटे से उनको मनोनीत करा दिया।  हरिवंश साल 2018 में 9 अगस्त को राज्यसभा के उपसभापति निर्वाचित हुए थे. 14 सितंबर 2020 को उन्हें लगातार दूसरी बार उच्च सदन का उपसभापति चुना गया था. अब उनको उच्च सदन में तीसरा कार्यकाल भी मिल गया है, ऐसे में क्या उनको लगातार तीसरी बार उपसभापति भी चुना जाएगा? अब नजरें इस पर हैं। 

राज्यसभा चुनाव में आज चुने जाएंगे सीएम नीतीश कुमार, पहले भी बना चुके हैं अनोखा राजनीतिक रिकॉर्ड

नई दिल्ली बिहार की राजनीति में फिर एक बड़ा दिन। राज्यसभा चुनाव तो भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा भी लड़ रहे हैं, लेकिन सबसे ज्यादा ध्यान जनता दल यूनाईटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष व बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर है। नितिन विधायक रहते सांसदी का यह चुनाव लड़ रहे तो नीतीश विधान परिषद् सदस्य रहते। नीतीश कुमार की चर्चा इसलिए सबसे ज्यादा हो रही है, क्योंकि दिल्ली जाने के लिए उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ेगा और पहली बार भारतीय जनता पार्टी इस कुर्सी पर अपना आदमी बैठाएगी। ऐसे में रोचक है कि नीतीश कुमार आज के बाद फैसला क्या लेते हैं? बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार को समझना असंभव जब 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री के रूप में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम प्रचारित होना शुरू होता, इससे पहले नीतीश कुमार ही ऐसे बड़े नेता थे जिन्होंने पुराने रिश्ते छोड़ दिए थे। नीतीश कुमार अटल-आडवाणी के समय से भाजपा से जुड़े थे, लेकिन नमो युग की शुरुआत से पहले एनडीए से निकल गए थे। तब भी अंदाजा नहीं लग रहा था। फिर 2017 में लौटे तो 2022 में छोड़ गए। फिर 2024 में वापस साथ आए। इस साल होली के एक दिन पहले जिस तरह से वह बिहार चुनाव 2025 के तीन महीने बाद ही राज्यसभा जाने के लिए तैयार हुए, वह भी अचरज में डालने वाला था। और, अब खरमास शुरू होने से पहले उनका इस्तीफा नहीं आना भी भाजपा के लिए सिरदर्द बना हुआ है। खरमास में वह फैसला लेते भी हैं तो यही माना जा रहा है कि 15 अप्रैल तक भाजपा नए सीएम की कुर्सी पर अपना आदमी बैठाने का 'जतरा' नहीं बनाएगी। केंद्रीय मंत्री रहे नीतीश एक बार सांसद रहते विधायक भी बने थे नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री हैं। वह केंद्रीय मंत्री भी रह चुके हैं। वह पटना जिले की बाढ़ सीट से लोकसभा सदस्य हुआ करते थे। नालंदा जिले की हरनौत विधानसभा सीट से विधायक हुआ करते थे। इस सदी में वह कभी विधानसभा चुनाव में नहीं उतरे। विधान पार्षद ही चुने जाते रहे। अब राज्य सभा के चुनाव में हैं। नीतीश कुमार के बारे में यह जानना बेहद रोचक है कि वह 1991 में तत्कालीन जनता दल के टिकट पर बाढ़ से कांग्रेस प्रत्याशी को हराकर सांसद बने थे। इसके बावजूद उन्होंने 1995 में तत्कालीन समता पार्टी के चुनाव चिह्न पर हरनौत से विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीते भी। विधायक चुने जाने के बाद जब लोग सांसद के रूप में उनके इस्तीफे का इंतजार कर रहे थे, लेकिन उन्होंने विधायक की शपथ नहीं ली। नतीजतन हरनौत सीट के लिए 1996 में उप चुनाव हुआ, जिसमें फिर समता पार्टी के अरुा कुमार सिंह विधायक बने। कब केंद्र में मंत्री बने और कब-कब बिहार की राजनीति का रुख किया? नीतीश कुमार 1985 में हरनौत विधायक चुने गए थे। इसके बाद दिल्ली की राजनीतिक यात्रा के लिए पहली बार 28 नवंबर 1989 को पटना जिले के बाढ़ संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित हुए थे। तब, सांसद के रूप में उनका कार्यकाल 2 दिसंबर 1989 से 13 मार्च 1991 तक रहा था। अप्रैल 1990 में तत्कालीन विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार में उन्हें केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री बनाया गया था। बाद में वीपी सिंह सरकार सदन में बहुमत साबित नहीं कर सकी तो केंद्रीय राज्यमंत्री के तौर पर नीतीश कुमार का कार्यकाल भी 10 नवंबर 1990 को खत्म हो गया। 13 मार्च 1991 को लोकसभा भंग हुआ तो फिर अगले चुनाव में नीतीश कुमार फिर बाढ़ से ही सांसद चुने गए। इसके बाद, बिहार की राजनीति में वापस वह सक्रिय होते दिखे। 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में वह हरनौत से फिर उतरे और विधायक चुने गए, हालांकि उन्होंने लोकसभा सदस्य रहना ही उचित समझा। इसके बाद, 1996 में फिर बाढ़ से ही नीतीश कुमार सांसद बने। तब अटल बिहारी वाजपेयी 7 दिन के लिए पीएम बने और फिर मौजूदा विपक्ष सत्ता में आ गया। 15 मार्च 1998 को अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो नीतीश कुमार की समता पार्टी उनके साथ थी। नीतीश कुमार को केंद्रीय रेल एवं भूतल परिवहन मंत्री बनाया गया। अगस्त 1999 में गैसाल में रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने मंत्रीपद से इस्तीफा दे दिया। फिर करगिल युद्ध के बाद 1999 के लोकसभा चुनाव कराना पड़ा तो भाजपा बड़े दल के उभरी। पहली बार पांच साल भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार रही। नीतीश केंद्रीय मंत्री रहे। नई सदी में पहली बार जब वह चुनाव में उतरे तो 2004 के बाढ़ ने उन्हें हरा दिया। इसके बाद परिस्थितियां देख वह बिहार को सुधारने के लिए यहां उतर गए। फिर तो 2005 से बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार बतौर मुख्यमंत्री अब तक कुर्सी पर हैं। बीच में एक बार जीतन राम मांझी को उन्होंने ही सीएम बनाया था, वह भी लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हुए।  

खड़गे ने संसद में जताई चिंता, ऊर्जा सुरक्षा पर असर

नई दिल्ली राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सोमवार को एशिया के एक महत्वपूर्ण क्षेत्र में तेजी से बदल रही भू-राजनीतिक स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि यह हालात केवल उस क्षेत्र तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। साथ ही भारत की वैश्विक छवि और सामर्थ्य पर भी इसका असर दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि भारत अपनी कच्चे तेल की लगभग 55 प्रतिशत जरूरतें पश्चिम एशिया से होने वाले आयात से पूरी करता है। यदि उस क्षेत्र में संघर्ष बढ़ता है तो उसका सीधा असर हमारे देश की आर्थिक स्थिरता पर पड़ सकता है। खड़गे ने राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन से कहा, "मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे यह मुद्दा उठाने का अवसर दिया।" खड़गे ने कहा कि वह नियम 176 के तहत तहत उभरती चुनौतियों के संदर्भ में भारत की ऊर्जा सुरक्षा के विषय पर अल्पकालिक चर्चा की अनुमति का अनुरोध करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि एशिया के उस क्षेत्र में लाखों भारतीय काम करते हैं, जिनकी सुरक्षा और आजीविका वहां की स्थिरता पर निर्भर करती है। हाल की घटनाओं में कुछ भारतीय नागरिकों के मारे जाने या लापता होने की खबरें भी सामने आई हैं। उन्होंने कहा कि रसोई गैस सिलेंडर के दाम में लगभग 60 रुपये की बढ़ोतरी भी आम लोगों पर अतिरिक्त बोझ डाल सकती है। भारत हर साल लगभग 51 बिलियन अमेरिकी डॉलर का तेल आयात करता है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था और परिवारों के जीवन से सीधे जुड़ा हुआ विषय है। इसलिए इन अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का असर अब भारत में भी दिखाई देने लगा है। इस बीच बाद सभापति द्वारा नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को बैठ जाने के लिए कहा गया। सभापति ने खड़गे को बाद में बोलने का अवसर देने की बात कही और कहा कि फिलहाल विदेश मंत्री एस जयशंकर सदन में अपनी बात रखने जा रहे हैं। इस बार विपक्षी सांसदों ने जमकर हंगामा किया। हंगामे के बीच एस जयशंकर ने अपनी बात रखी। लेकिन विपक्षी सांसद लगातार नारेबाजी करते रहे इसके उपरांत विपक्ष ने सदन से वॉकआउट किया। दरअसल, नेता प्रतिपक्ष और विपक्षी सांसद इस मुद्दे पर सदन में अपनी बात रखना चाहते थे। सभापति ने मल्लिकार्जुन खड़गे को शुरुआत में बोलने का अवसर दिया और इसके बाद उन्होंने कहा कि विदेश मंत्री द्वारा इस संदर्भ में आधिकारिक जानकारी दे रहे हैं। विदेश मंत्री द्वारा जानकारी दिए जाने के बाद वह खड़गे को बोलने का अवसर देंगे। लेकिन विपक्ष इसके लिए राजी नहीं हुआ और सदन में विपक्षी सांसद लगातार नारेबाजी करते रहे।

कांग्रेस का बड़ा फैसला, राज्यसभा के लिए सिंघवी, रेड्डी, फूलो और बौद्ध सहित 6 उम्मीदवार घोषित

चेन्नई/नई दिल्ली देश के 10 राज्यों की 37 राज्यसभा सीटों के नामांकन का आज यानि गुरुवार को अंतिम दिन है. कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर दिया है. कांग्रेस ने तेलंगाना, तमिलनाडु, हरियाणा, हिमाचल और छत्तीसगढ़ की राज्यसभा सीट के लिए अपने पत्ते खोल दिए हैं. कांग्रेस ने राज्यसभा के लिए 6 उम्मीदवार घोषित कए हैं। कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी को तेलंगाना से दुबारा राज्यसभा भेजने का फैसला किया है. तेलंगाना से कांग्रेस ने सिंघवी के अलावा वेम नरेंद्र रेड्डी को राज्यसभा भेजने का फैसला किया है. सिंघवी को जहां गांधी परिवार का करीबी माना जाता है तो वेम रेड्डी तेलंगाना सीएम रेवंत रेड्डा के भरोसेमंद माने जाते हैं. पूर्व विधायक रेड्डी तेलंगाना कांग्रेस के उपाध्यक्ष भी हैं।   कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ से आदिवासी समुदाय से आने वाली फूलो देवी को दोबारा से राज्यसभा भेजने का निर्णय किया है. इसके अलावा कांग्रेस ने हरियाणा से करमवीर बौद्ध को राज्यसभा का टिकट दिया है, जो दलित समाज से आते हैं. हिमाचल प्रदेश से कांग्रेस ने अनुराग शर्मा को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया है तो तमिलनाडु से पार्टी ने एम क्रिस्टोफर तिलक को राज्यसभा का प्रत्याशी बनाया है।  हरियाणा में कर्मवीर बौद्ध के नाम पर लगी मुहर कांग्रेस के राज्यसभा उम्मीदवारों में सबसे चौंकाने वाला नाम है कर्मवीर सिंह बौद्ध का है, जिन्हें हरियाणा से राज्यसभा भेजा जा रहा है. दलित समाज से आने वाले कर्मवीर लो प्रोफाइल नेता हैं. अंबाला के रहने वाले कर्मवीर 2024 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में मुलाना से टिकट के दावेदार रहे हैं, लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिल पाया. अब कांग्रेस ने उन्हें संसद के उच्च सदन भेजने का फैसला किया है।  कर्मवीर बौद्ध हरियाणा सिविल सचिवालय से करीब 5 साल पहले सुपरिंटेंडेंट के पद से सेवानिवृत्त हुए थे. इनकी पत्नी लेबर डिपार्टमेंट में असिस्टेंट है. हरियाणा में दलित सामाज को संदेश देने के लिए कांग्रेस ने उनपर दांव लगाया है।  तेलंगाना से सिंघवी और रेड्डी को मिला मौका तेलंगाना की दो राज्यसभा सीटों के लिए कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार के नाम का ऐलान किया है, जिसमें एक नाम अभिषेक मनु सिंघवी का है तो दूसरा नाम पूर्व विधायक वेम नरेंद्र रेड्डी का है. सिंघवी का नाम पहले ही तय माना जा रहा था, क्योंकि उन्हें गांधी परिवार का करीबी माना जाता है. हिमाचल से चुनाव हारने के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें तेलंगाना से राज्यसभा भेजा था, जिसके लिए रेवंत रेड्डी ने बीआरएस के मौजूदा राज्यसभा सांसद की सीट खाली कराई थी। छत्तीसगढ़ से फिर जाएंगी फूलो देवी राज्यसभा वहीं, कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में एक बार फिर से फूलो देवी नेतम को राज्यसभा भेजने का निर्णय लिया है. कांग्रेस आसानी से एक सीट जीत लेगी. फूलो देवी को दोबारा से राज्यसभा भेजने के पीछे पहला उनका अदिवासी समुदाय से होना और दूसरा पार्टी किसी भी तरह से कोई गुटबाजी नहीं चाहती है. इसीलिए किसी नए चेहरे पर भरोसा नहीं जताया है.  हालांकि, कांग्रेस ने शुरू में उनके विकल्प पर पार्टी ने विचार कर रही थी, लेकिन नेताओं की गुटबाजी से पिंड छुड़ाने के लिए फूलो देवी नेताम को ही फिर से राज्यसभा भेजने का फैसला लिया गया.  कांग्रेस ने राज्यसभा से साधा जातीय समीकरण कांग्रेस ने राज्यसभा चुनाव के लिए बहुत ही सोची-समझी रणनीति के तहत उम्मीदवारों के नाम का ऐलान किया है. कांग्रेस ने जिन पांच नेताओं को राज्यसभा भेजने का फैसला किया है, उसमें पंजाबी ब्राह्मण समुदाय से आने वाले अभिषेक मनु सिंघवी हैं तो दूसरे तेलंगाना की सबसे प्रभावी जाति रेड्डी समुदाय के वेम नरेंद्र रेड्डी हैं।  कांग्रेस ने हरियाणा में दलित समुदाय से आने वाले कर्मवीर सिंह बौद्ध को प्रत्याशी बनाया है तो छत्तीसगढ़ में आदिवासी समुदाय से आने वाली फूलो देवी को दोबारा राज्यसभा भेजा है. कांग्रेस ने हरियाणा में दलित समुदाय को साधे रखने की चुनौती थी, जिसके चलते ही कर्मवीर बौद्ध पर भरोसा जताया है. ऐसे ही हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ने ब्राह्मण समाज से आने वाले अनुराग शर्मा को प्रत्याशी बनाया है जबकि सीएम ठाकुर समुदाय से हैं. इस तरह कांग्रेस ने ब्राह्मण और ठाकुर केमिस्ट्री बनाने की कवायद की है।

छत्तीसगढ़ की 2 राज्यसभा सीटों पर चुनाव की घोषणा

रायपुर. भारत निर्वाचन आयोग ने बुधवार को अप्रैल-2026 में सेवानिवृत्त होने वाले राज्यसभा सदस्यों की रिक्त सीटों को भरने के लिए द्विवार्षिक चुनाव की घोषणा कर दी गई है. (Rajya Sabha Election 2026) इसके माध्यम से देश के 10 राज्यों में कुल 37 राज्यसभा सदस्यों का निर्वाचन किया जाएगा. छत्तीसगढ़ से राज्यसभा की कुल 5 सीटों में से 2 सदस्यों, कवि तेजपाल सिंह तुलसी और फूलो देवी नेताम का कार्यकाल 9 अप्रैल 2026 को पूर्ण हो रहा है. इन दोनों सीटों के रिक्त होने के कारण निर्वाचन की कार्यवाही प्रारंभ करते हुए भारत निर्वाचन आयोग द्वारा राज्यसभा के द्विवार्षिक निर्वाचन कार्यक्रम की घोषणा की गई है. आयोग द्वारा जारी कार्यक्रम के अनुसार राज्यसभा सदस्यों के निर्वाचन के लिए 26 फरवरी को अधिसूचना जारी की जाएगी. नाम-निर्देशन पत्र 5 मार्च तक दाखिल किए जा सकेंगे. 6 मार्च को नामांकन पत्रों की संवीक्षा की जाएगी. अभ्यर्थी 9 मार्च तक अपना नाम वापस ले सकेंगे. 16 मार्च को सुबह 9 बजे से सायं 4 बजे तक मतदान होगा और उसी दिन शाम 5 बजे से मतगणना प्रारंभ की जाएगी. संपूर्ण निर्वाचन प्रक्रिया 20 मार्च 2026 शुक्रवार तक पूर्ण कर ली जाएगी. राज्यसभा निर्वाचन के लिए अभ्यर्थी अपना नाम-निर्देशन पत्र 26 फरवरी से 5 मार्च तक सुबह 11 बजे से दोपहर 3 बजे तक सार्वजनिक अवकाश को छोड़कर छत्तीसगढ़ विधानसभा भवन में निर्धारित स्थान पर रिटर्निंग ऑफिसर संचालक, छत्तीसगढ़ विधानसभा के समक्ष प्रस्तुत कर सकेंगे. राज्यसभा द्विवार्षिक निर्वाचन में राज्य के कुल 90 विधानसभा सदस्य अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे, जिनमें भारतीय जनता पार्टी के 54, इंडियन नेशनल कांग्रेस के 35 तथा गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के एक सदस्य शामिल हैं. सभी विधायक मतपत्र के माध्यम से मतपेटी में अपना मत प्रदान करेंगे. मतपत्र पर वरीयता अंकित करने के लिए केवल निर्वाचन अधिकारी द्वारा प्रदान किए गए बैंगनी रंग के स्केच पेन का उपयोग किया जाएगा. किसी अन्य पेन का उपयोग मान्य नहीं होगा. स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए पर्यवेक्षकों की नियुक्ति के माध्यम से चुनाव प्रक्रिया की कड़ी निगरानी की जाएगी. निर्वाचन की संपूर्ण प्रक्रिया आयोग के निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुरूप संपादित की जाएगी. अप्रैल 2026 में सेवानिवृत्त होने वाले सदस्यों का राज्यवार विवरण अनुलग्नक ‘A’ में पृथक रूप से संलग्न है.

संसद में उठी विरासत बचाने की आवाज, धरोहरों पर बढ़ते हमलों को लेकर चिंता जाहिर

नई दिल्ली राज्यसभा सदस्य मीनाक्षी जैन ने शुक्रवार को देश की अमूल्य धरोहरों की रक्षा का महत्वपूर्ण विषय सदन में उठाया। उन्होंने कहा कि सदन का ध्यान देश की अमूल्य धरोहर स्थलों पर बढ़ती हुई तोड़फोड़ और अपवित्रता के गंभीर खतरे की ओर आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि हाल के दिनों में ऐसी घटनाओं में वृद्धि हुई है, जो अत्यंत चिंताजनक है। मीनाक्षी जैन ने कहा कि हम्पी, जो 14वीं से 16वीं शताब्दी के बीच शासन करने वाले महान विजयनगर साम्राज्य की राजधानी था, हमारी समृद्ध सभ्यतागत विरासत का प्रतीक है। लगभग 16 वर्ग मील में फैला यह नगर मध्यकालीन विश्व के सबसे बड़े नगरों में से एक माना जाता था। अनेक विदेशी यात्रियों ने हम्पी की भव्यता और समृद्धि का वर्णन किया है। इस स्थल पर अनेक मंदिर, किले, मंडप, स्तंभयुक्त सभागार और अन्य भव्य संरचनाएं स्थित हैं। वर्ष 1986 में हम्पी को यूनेस्को की ओर से विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया। उन्होंने बताया कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ पर्यटक, इस स्थल के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व से अनभिज्ञ होकर, गैर-जिम्मेदाराना और विनाशकारी कृत्य कर रहे हैं। हाल ही में कुछ व्यक्तियों ने एक मंदिर के बाहर स्थित एक विशाल स्तंभ को तोड़ दिया, जबकि उनका एक साथी इस घटना का वीडियो बना रहा था। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने घोषणा की है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए मंदिरों के स्तंभों की सुरक्षा को और मजबूत किया जाएगा। यद्यपि संरचनात्मक सुदृढ़ीकरण आवश्यक है, किंतु जागरूकता और संवेदनशीलता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। राज्यसभा सांसद ने एक और उदाहरण देते हुए कहा, "इसी प्रकार की घटनाएं अन्य स्थानों से भी सामने आई हैं। मध्य प्रदेश स्थित उदयगिरि गुफाएं गुप्तकालीन धरोहर हैं। यहां भगवान विष्णु के वराह अवतार की देश की सबसे बड़ी एकाश्म प्रतिमा स्थित है, जिस पर अत्यंत सूक्ष्म और सुंदर नक्काशी की गई है। यह प्रतिमा 5वीं-6वीं शताब्दी की मानी जाती है। हाल ही में एक पर्यटक जूते पहनकर प्रतिमा के चबूतरे पर चढ़ गया और अपने मित्रों से फोटो खिंचवाई। उसने प्रतिमा पर चढ़ने का भी प्रयास किया। पूछने पर उन्होंने कहा कि उन्हें इस स्थल के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व की जानकारी नहीं थी। वे इसे केवल घूमने-फिरने का स्थान समझ रहे थे।" मीनाक्षी जैन ने कहा कि ऐसी घटनाएं स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि पर्यटकों के बीच जागरूकता और संवेदनशीलता की कमी है। यह जरूरी है कि आगंतुकों को उन स्थलों के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व के बारे में उचित जानकारी दी जाए। हमारी धरोहर का संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। यह विचार किया जा सकता है कि इन स्थलों पर तैनात सुरक्षाकर्मी और प्रशिक्षित गाइड आगंतुकों को जागरूक करने में सक्रिय भूमिका निभाएं। साथ ही, स्पष्ट सूचना-पट्ट, प्रारंभिक मार्गदर्शन और तोड़फोड़ के मामलों में कड़े दंड का प्रावधान भी प्रभावी सिद्ध हो सकता है। उन्होंने सदन में कहा कि हमारे ये धरोहर स्थल केवल पत्थर और संरचनाएं नहीं हैं, वे हमारे इतिहास, संस्कृति और पहचान के जीवंत प्रमाण हैं। इन्हें भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

2026 में राज्यसभा में NDA की बढ़ी हुई ताकत, इन नेताओं को हो सकती है मुश्किल

नई दिल्ली साल 2026 में राज्यसभा की रिक्त हो रही 72 सीटों के लिए होने वाले चुनाव प्रमुख नेताओं के भविष्य के साथ केंद्रीय राजनीति में सत्ताधारी भाजपा और विपक्षी कांग्रेस की रणनीति को भी प्रभावित करेंगे। विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं की दलीय स्थिति को देखते हुए भाजपा और NDA और मजबूत होगा, वहीं कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की दिक्कतें बढ़ेंगी। हालांकि राज्यसभा के अंकगणित में बहुत ज्यादा बदलाव तो नहीं आएगा, लेकिन NDA अपने बहुमत को और मजबूत करेगा और भाजपा की संख्या भी बढ़ जाएगी। इससे संसद के दोनों सादनों में विधायी कामकाज के लिए सरकर की सहूलियत और बढ़ जाएगी। वहीं विपक्ष की सरकर को घेरने के रणनीति कमजोर पड़ेगी। राज्यसभा की अधिकृत जानकारी के अनुसार, सदन में अभी भाजपा के 103 सांसद हैं और NDA के 126 सांसद हैं। 2026 में भाजपा के 30 सांसदों का कार्यकाल पूरा होगा और उसके 32 सांसदों का आना पक्का है। जोड़-तोड़ के साथ पार्टी तीन सीटें और जीत सकती है। पार्टी के सहयोगी दलों के चार सांसद बढ़ेंगे, जिनमें तेलुगु देशम,जनसेना,शिवसेना व एनसीपी का एक-एक सांसद बढ़ जाएगा। हालांकि दो सांसद कम भी होंगे। तब भी कुल मिलाकर NDA लाभ की स्थिति में रहेगा। मनोनीत सांसद पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई भी मार्च में रिटायर हो रहे हैं। उनकी जगह जो भी आएगा उसके भी सरकार का समर्थन करने की संभावना है। कई दिग्गजों का कार्यकाल पूरा होगा इन राज्यसभा चुनावों का महत्व इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि इसमें कई दिक्कत नेताओं का कार्यकाल खत्म हो रहा है। इनमें केंद्र सरकार में मंत्री एवं विभिन्न दलों के प्रमुख नेता शामिल है। अगर मंत्री फिर से चुनकर नहीं आते हैं तो उनका सरकार में रहना मुश्किल हो जाएगा और अन्य प्रमुख नेताओं के लिए भी दिक्कतें बढ़ेगी। जिन प्रमुख नेताओं कार्यकाल पूरा हो रहा है उनमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा, दिग्विजय सिंह, शरद पवार, केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, बी एल बर्मा, जॉर्ज कुरियन आदि शामिल है। इनके अलावा प्रेमचंद गुप्ता, राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश नारायण सिंह, रामनाथ ठाकुर, उपेंद्र कुशवाहा, प्रियंका चतुर्वेदी, रामदास अठावले, रामगोपाल यादव, नीरज शेखर, राम जी, शक्ति सिंह गोहिल, अभिषेक मनु सिंघवी, थंबी दुरई, तिरुचि शिवा और मनोनीत सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई शामिल है। सबसे ज्यादा दस सीटें उत्तर प्रदेश में रिक्त होंगी 2026 में जिन 72 सीटों के लिए चुनाव होंगे उनमें अप्रैल में 37 सीटों के लिए, जून में 23 सीटों के लिए, जुलाई में एक सीट के लिए और नवंबर में 11 सीटों के लिए चुनाव होने हैं। अप्रैल माह में जिन 37 सीटों के लिए चुनाव होंगे, उनमें असम, बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, तमिलनाडु, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल शामिल है, जबकि नवंबर में होने वाले 11 सीटों के चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश की 10 सीटें होगी। इसके अलावा जून में होने वाले 23 सीटों के चुनाव में आंध्र प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य हैं। बिहार की 5 सीटें रिक्त हो रही है, जिनमें जेडीयू की दो, राजद की दो और आरएलएम की एक सीट शामिल है। चुनाव के बाद जेडीयू और भाजपा दो-दो सीटें और उनका सहयोगी एक सीट जीत सकता है। झारखंड में दो रिक्त हो रही सीटों में झामुमो की एक पहले से ही खाली है और भाजपा की एक सीट और होगी। नए समीकरण में दोनों को एक-एक सीट मिल सकती है। उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 10 सीटें खाली हो रही है। इनमें भाजपा की आठ, सपा की एक और बसपा की एक है। चुनाव के बाद भाजपा सात और सपा को दो सीटें मिलना तय हैं। भाजपा सहयोगी दलों से मिलकर एक सीट और जीत सकती है, लेकिन बसपा का राज्यसभा से सफाया होना लगभग तय है। उत्तराखंड में एक सीट खाली होगी और एक सीट भाजपा के पास ही रहेगी। अन्य राज्यों में आंध्र प्रदेश की चार सीटें रिक्त होंगी, जिनमें तेलुगू देशम की एक और वायएसआरसीपी की तीन सीटें शामिल है। चुनाव के बाद तेलुगू देशम को दो, भाजपा को एक और जनसेना को एक सीट मिलने की संभावना है। अरुणाचल प्रदेश में भाजपा की एक सीट रिक्त हो रही है और भाजपा का ही एक सांसद फिर से चुनकर आएगा। असम में तीन सीटें रिक्त होने जा रही हैं, जिनमें भाजपा की दो और निर्दलीय एक सांसद शामिल है। चुनाव के बाद भाजपा के दो और कांग्रेस के एक सांसद का चुनाव जाना तय है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के ही दोनों सांसद रिटायर हो रहे हैं। चुनाव के बाद भाजपा व कांग्रेस को एक -एक सीट मिलने की संभावना है। गुजरात में चार सीटें रिक्त हो रही है, जिनमें तीन भाजपा की और एक कांग्रेस की है। चुनाव के बाद चारों सीटें भाजपा के पास आएंगी। हरियाणा में दोनों सीटें भाजपा की रिक्त हो रही है, लेकिन चुनाव के बाद भाजपा की एक ही सीट आएगी एक सीट कांग्रेस के पास जाएगी। हिमाचल में भाजपा की एक सीट खाली हो रही है और यह सीट कांग्रेस के पास जाएगी। कर्नाटक की चार खाली हो रही सीटों में भाजपा की दो, कांग्रेस की एक और जद एस की एक सीट है। विधानसभा की दलीय स्थिति में कांग्रेस तीन सीटें और भाजपा को एक सीट मिलने की संभावना है। मध्य प्रदेश की तीन रिक्त होने वाली सीटों भाजपा की दो व कांग्रेस की एक सीट हैा। यहां पर फिर से भाजपा दो कांग्रेस को एक सीट मिलेगी। महाराष्ट्र में सात सीटें खाली हो रही है, जिनमें भाजपा की दो, शिवसेना उद्धव ठाकरे एक, राकांपा शरद पवार दो, कांग्रेस एक, रिपब्लिक रिपब्लिकन पार्टी एक शामिल है। चुनाव के बाद भाजपा के तीन, राकांपा एक, शिवसेना के एक, आरपीआई की एक और कांग्रेस को एक सीट मिलने की स्थिति बन सकती है। पश्चिम बंगाल की पांच खाली होने वाली सीटों में तृणमूल कांग्रेस की चार व एक माकपा की है। इस बार तृणमूल कांग्रेस को चार व एक भाजपा को मिलेगी। मणिपुर में भाजपा की एक सीट खाली होगी और वह भाजपा को ही मिलेगी। यही स्थिति मेघालय में होगी जहां एनपीपी की एक सीट खाली होगी और फिर से उसका ही सांसद चुना जाएगा। मिजोरम में एमएनएफ … Read more

राज्यसभा और विधानसभा चुनाव 2026: पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु में हलचल बढ़ने की संभावना

नई दिल्ली आने वाला साल 2026 चुनावी हलचल से भरा होने वाला है। 2026 में संसद के ऊपरी सदन में भी बड़ा परिवर्तन हो सकता है। अगले साल जहां पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु औऱ असम में विधानसभा के चुनाव होने हैं तो वहीं राज्यसभा में भी लगभग 75 सीटों पर चुनाव होने हैं। ये सीटें अप्रैल, जून और नवंबर में खाली होने वाली हैं। इसके बाद देखना होगा कि राज्यसभा में एनडीए और इंडिया गठबंधन का क्या समीकरण बनता है। आने वाले समय में बिहार से पांच और उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटें खाली हो जाएंगी। इसके अलावा महाराष्ट्र, झारखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल औऱ तमिलनाडु के साथ कई पूर्वोत्तर के राज्यों की सीटें भी खाली होने वाली हैं। इन दिग्गज नेताओं को खत्म हो रहा कार्यकाल 2026 में राज्यसभा चुनाव का बड़ा महत्व होने वाला है। इससे ही संसद का आगे का लेजिस्लेटिव अजेंडा तय होने वाला है। 2026 में जिन दिग्गज नेताओं का कार्यकाल खत्म हो रहा है उनमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा, दिग्वजिय सिंह, शरद पवार और केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, बीएल वर्मा, रवनीत सिंह बिट्टू और जॉर्ज कुरियन शामिल हैं। यह अभी नहीं कहा जा सकता है कि इनमें से कितने नेताओँ की सदन में वापसी होगी और कितने की जगह नए चेहरे ले लेंगे। अप्रैल से जून तक और फिर नवंबर में बिहार से पांच सीटें खाली हो जाएंगी। ये सीटें अप्रैल में ही खालीहोंगी। इसके अलावा झारखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल औ तमिलनाडु के सांसदों का भी कार्यकाल खत्म हो रहा है। नवंबर में उत्तर प्रदेश की सीटें भी खाली होंगी। इसके अलावा मध्य प्रदेश, असम, अरुणाचल प्रदेशष मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की भी कई सीटें खाली होने वाली हैं। फिलहाल राज्यसभा में एनडीए की 129 सीटें हैं। वहीं विपक्षी दलों के केवल 78 सांसद राज्यसभा में हैं। 2026 में होने वाले चुनाव राज्यसभा में ताकत को बैलेंस भी कर सकते हैं। इसके अलावा विधानसभा के चुनाव भी राजनीतिक दलों की रणनीति में परिवर्तन करेंगे। बिहार की पांचों सीटें 9 अप्रैल को खाली हो जाएंगी। आरजेडी के प्रेम चंद गुप्ता, अमरेंद्र धारी सिंह, जेडीयू के हरिवंश नारायण सिंह और केंद्रीय मंत्री रामनाथ ठाकुर के साथ उपेंद्र कुशवाहा का कार्यकाल अप्रैल में खत्म हो रहा है। बिहार विधानसभा में एनडीए की ताबड़तोड़ जीत के बाद संभव है कि बीजेपी और जेडूयी दो-दो सीटों पर काबिज हो जाए। उपेंद्र कुशवाहा के अलावा कुछ नेताओं की सदन में वापसी भी हो सकती है। महाराष्ट्र की सात राज्यसभा सीटों के लिए अप्रैल में चुनाव हो सकते हैं। शरद पवार, प्रियंका चतुर्वेदी और केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले का कार्यकाल समाप्त हो रहा है।

राज्यसभा की 75 सीटों के गणित ने बढ़ाई शरद पवार और उपेंद्र कुशवाहा की वापसी की चुनौती

नई दिल्ली साल 2025 अब अलविदा हो रहा है और 2026 में दस्तक के लिए तैयार हैं. भारत के सियासी परिदृश्य के लिहाज से 2026 को चुनावी साल के तौर पर देखा जा रहा है. दक्षिण भारत में केरल और तमिलनाडु से लेकर पूर्वोत्तर के असम और बंगाल सहित पांच राज्यो में विधानसभा चुनाव होंगे. इस दौरान उत्तर भारत के उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार तक में राज्यसभा चुनाव की असल इम्तिहान होगा, जो संसद के उच्च सदन की तस्वीर काफी बदल जाएगी? साल 2026 में अप्रैल से लेकर जून और नंबर तक तकरीबन 75 राज्यसभा सीटों पर चुनाव होने है, जिसमें बिहार की पांच और उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीट है. 2026 में होने वाले राज्यसभा चुनाव एनडीए और विपक्षी दलों के 'इंडिया गठबंधन' दोनों के लिए अहम माने जा रहा है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा, दिग्विजय सिंह, शरद पवार और कई केंद्रीय मंत्री जैसे हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा, रवनीत सिंह बिट्टू, जॉर्ज कुरियन जैसे दिग्गज नेताओं के राज्यसभा का कार्यकाल 2026 में खत्म हो जाएगा. ऐसे में देखना है कि किस दिग्गज नेता की वापसी होती है और कौन से नए चेहरे की संसद में एंट्री होती है? 2026 में 75 राज्यसभा सीटें हो रही खाली साल 2026 में अप्रैल से लेकर जून और नवंबर तक करीब 75 राज्यसभा की सीटें खाली हो रही है. महाराष्ट्र की 7 राज्यसभा सीटें अप्रैल में खाली हो रही है तो बिहार की पांच सीटें भी अप्रैल में खाली हो जाएंगी. इसके अलावा झारखंड की दो सीटें, आंध्र प्रदेश की 4, झारखंड की 2, तेलंगाना की एक, पश्चिम बंगाल की 5, तमिलनाडु की 6 राज्यसभा सीट खाली हो रही है. उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटें है, जो नवंबर तक खाली होंगी. इसके अलावा मध्य प्रदेश से लेकर असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर और मिजोरम जैसे उत्तर-पूर्वी राज्यों से चुनकर आए राज्यसभा का भी कार्यकाल समाप्त हो रहा है. उत्तराखंड और हिमाचल की भी एक-एक राज्यसभा सीट खाली हो रही है. इसके अलावा राजस्थान और छत्तीसगढ़ की सीटों का भी कार्यकाल समाप्त हो रहा. राज्यसभा में एनडीए के पास 129 सीटें हैं जबकि विपक्ष के पास 78 सीटें हैं. इसलिए ये चुनाव उच्च सदन में शक्ति संतुलन के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं. इन चुनावों से पता चलेगा कि राज्यसभा में किस पार्टी का दबदबा रहेगा. बिहार में किसकी होगी उच्च सदन से छुट्टी बिहार की पांच राज्यसभा सीटें 9 अप्रैल 2026 को खाली हो रही हैं, जिसके चलते मार्च तक चुनाव करा लिए जाएंगे. बिहार से राज्यसभा के जिन 5 नेताओं का कार्यकाल खत्म हो रहा है, उनमें आरजेडी के प्रेम चंद गुप्ता और अमरेंद्र धारी सिंह (एडी सिंह), जेडीयू के हरिवंश नारायण सिंह और केंद्रीय मंत्री रामनाथ ठाकुर, राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा शामिल हैं. बिहार विधानसभा चुनाव के बाद राज्यसभा चुनाव के लिए भी सीन बदल गया है. एक राज्यसभा सीट के लिए 41 विधायकों के समर्थन की जरूरत है. इस लिहाज से बीजेपी और जेडीयू दो-दो सीटें जीतने की हैसियत में है तो एक सीट विपक्ष के खाते में जा सकती है. बीजेपी से राज्यसभा के लिए कई दावेदार है. ऐसे में उपेंद्र कुशवाहा की राज्यसभा में वापसी पर संकट गहरा सकता है. महाराष्ट्र में किसे मिलेगा राज्यसभा का मौका महाराष्ट्र में सात सीटें अप्रैल 2026 में खाली हो रही है. शरद पवार (NCP-SP), प्रियंका चतुर्वेदी (शिवसेना UBT) और केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले जैसे बड़े नेताओं के उच्च सदन का कार्यकाल खत्म हो रहा है. 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद सीन बदल गया है. शरद पवार और प्रियंका चतुर्वेदी की संसद में वापसी पर ग्रहण लग सकता है. महाराष्ट्र में महायुति आसानी से 7 सीटें जीत लेगी और विपक्ष के खाते में सिर्फ एक सीट जा सकती है. ऐसे में कांग्रेस क्या खुद अपने नेता को राज्यसभा भेजी या फिर शरद पवार या उद्धव ठाकरे की पार्टी को भेजने के लिए रजामंद होगी. महाविकास अघाड़ी में सबसे ज्यादा विधायक कांग्रेस के पास है. यही वजह है कि आगामी राज्यसभा चुनाव काफी रोचक होने जा रहा है. खड़गे और देवगौड़ा में कौन करेगा वापसी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे कर्नाटक से राज्यसभा सदस्य हैं. उनका कार्यकाल 25 जून 2026 को खत्म हो रहा है. मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा भी रिटायर होंगे, वे भी कर्नाटक से ही हैं. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे 25 जून 2026 को रिटायर होंगे। एचडी देवेगौड़ा और हरिवंश 9 अप्रैल 2026 को रिटायर होंगे. कर्नाटक में चार राज्यसभा सीटों पर चुनाव होने हैं, जिसमें से तीन सीटें कांग्रेस जीत सकती है. विपक्ष के खाते में सिर्फ एक सीट आनी है. बीजेपी अपने किसी नेता को संसद भेजेगी या फिर जेडीएस को समर्थक करेगी. यूपी में 10 सीटों पर राज्यसभा चुनाव उत्तर प्रदेश से मोदी सरकार के दो मंत्री हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा भी रिटायर होने वाले हैं. उनका कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को खत्म हो रहा है. इनके साथ ही उत्तर प्रदेश से 8 और सदस्य भी रिटायर होंगे. इन 10 सीटों में 8 सीटें बीजेपी और एक सीट सपा और एक बसपा के पास है. 2026 में रिटायर होने वाले राज्यसभा सांसदों में बृजलाल, सीमा द्विवेदी, चंद्रप्रभा उर्फ गीता, हरदीप सिंह पुरी, रामजी, दिनेश शर्मा, नीरज शेखर, अरुण सिंह और बीएल वर्मा का नाम शामिल हैं. सपा से प्रोफेसर रामगोपाल यादव हैं. यूपी विधानसभा की मौजूदा संख्याबल की बात करें तो बीजेपी के 258, सपा के 103, अपना दल के 13, रालोद के 9, निषाद पार्टी के 5, सुभासपा के 6, कांग्रेस के 2, जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के 2 बसपा 1 और सपा के बागियों कुल 3 सदस्य हैं. यानी कुल 402 सदस्यों की संख्या पूरी है और 1 सीट रिक्त है. इस आधार पर एक राज्यसभा सीट के लिए 37 विधायकों के समर्थन की जरूरत है.इस गणित के लिहाज से सपा 2 और बीजेपी 8 राज्यसभा सीटें जीत सकती है. बसपा राज्यसभा में जीरो पर सिमट सकती है. जाने किसकी होगी वापसी और किसकी नहीं कांग्रेस छोड़कर BJP में शामिल हुए रवनीत सिंह बिट्टू भी रिटायर होने वाले हैं. उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी का दामन थाम लिया था. पंजाब के लुधियाना से चुनाव … Read more

इतिहास में दूसरी बार बीजेपी के 100+ सांसद राज्यसभा में, कांग्रेस पीछे छूटी

नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नीत बीजेपी सरकार को संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा से एक बड़ी राजनीतिक बढ़त मिली है. आगामी 9 सितंबर को होने वाले उपराष्ट्रपति चुनाव से पहले बीजेपी ने राज्यसभा में 100 का आंकड़ा फिर से पार कर लिया है, जो पार्टी के लिए सियासी तौर पर बेहद अहम मानी जा रही है. बीजेपी की ताकत अब 102 सांसदों तक पहुंच गई है, जो कि अप्रैल 2022 के बाद पहली बार हुआ है. यह बढ़त तीन नामित सदस्यों के बीजेपी में शामिल होने से मिली है- शीर्ष वकील उज्ज्वल निकम, पूर्व विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला और केरल के समाजसेवी सी सदानंदन मास्टर… बीजेपी ने दूसरी बार पार किया 100 का आंकड़ा राज्यसभा की मौजूदा ताकत 240 सांसदों की है, जिसमें 12 नामित सदस्य भी शामिल हैं और 5 सीटें खाली हैं. ऐसे में बीजेपी के पास अकेले 102 सांसद हैं, जबकि एनडीए गठबंधन की कुल संख्या बढ़कर 134 हो गई है, जो बहुमत के लिए जरूरी 121 के आंकड़े से कहीं ज्यादा है. 31 मार्च, 2022 को 13 राज्यसभा सीटों के लिए हुए चुनावों के नतीजे घोषित होने के बाद बीजेपी भारतीय इतिहास में संसद के ऊपरी सदन में 100 से अधिक सांसदों वाली दूसरी पार्टी बन गई थी. तब बीजेपी की संख्या 97 से बढ़कर 101 हो गई थी. कांग्रेस को 1988 और 1990 के बीच यह गौरव प्राप्त था. कौन हैं ये तीन नए चेहरे? उज्ज्वल निकम: 26/11 मुंबई आतंकी हमलों में अजमल कसाब को सज़ा दिलवाने वाले स्पेशल पब्लिक प्रोसिक्यूटर. 2016 में पद्मश्री से सम्मानित. 2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी के टिकट पर उतरे थे, हालांकि हार गए थे. हर्षवर्धन श्रृंगला: 2020 से 2022 तक भारत के विदेश सचिव रहे. वह G20 समिट 2023 के चीफ कोऑर्डिनेटर भी रहे हैं. अमेरिका और बांग्लादेश में भारत के राजदूत के तौर पर काम कर चुके हैं. सी सदानंदन मास्टर: केरल के चर्चित समाजसेवी और शिक्षक. 1994 में हिंसा में उनके पैर काट दिए गए थे, आरोप सीपीएम कार्यकर्ताओं पर लगे थे. 2016 में बीजेपी के टिकट पर विधानसभा चुनाव भी लड़ा था. एक और नामित सदस्य – मीना मेनन इन तीनों के साथ नामित हुईं राजनीतिक इतिहासकार डॉ. मीनाक्षी जैन को भी बीजेपी के विचारों के करीब माना जाता है. वे भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (ICHR) की सदस्य रह चुकी हैं और 2020 में उन्हें भी पद्मश्री से नवाजा गया था. क्या है इसका मतलब? राज्यसभा में 102 सांसदों के साथ बीजेपी अब संसद के दोनों सदनों में मजबूत पकड़ रखती है. इसका सीधा असर कानूनों के पारित होने में रफ्तार, नीतियों के लागू होने में सुगमता और राजनीतिक दबदबे में दिखेगा. 2024 के बाद पीएम मोदी की तीसरी पारी में यह संसदीय मजबूती उनके लिए ‘नीतिगत सुधारों’ को तेज़ी से लागू करने का रास्ता खोलती है. राज्यसभा से आई यह खुशखबरी मोदी सरकार के लिए न सिर्फ सांसदों की गिनती में बढ़त है, बल्कि एक राजनीतिक संकेत भी है- सरकार अब और सरपट दौड़ने को तैयार है!