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AAP को बड़ा झटका: 7 राज्यसभा सांसदों के बीजेपी में शामिल होने से बदला राजनीतिक समीकरण

चंडीगढ़ आम आदमी पार्टी के 10 में से 7 राज्य सभा सांसद बीजेपी में शामिल हो गए हैं। इसको लेकर राज्य सभा सचिवालय ने भी अधिसूचना जारी कर दी है। इसी के साथ उच्च सदन में भाजपा की ताकत भी बढ़ी है और सांसदों की संख्या 113 हो गई है। जिन सात सांसदों ने बीजेपी का दामन थामा है, उनमें से 6 पंजाब का प्रतिनिधित्व करते हैं और स्वाती मालिवाल दिल्ली से है। पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। इससे पहले राज्य सभा सांसदों का बीजेपी में जाना अरविंद केजरीवाल की पार्टी AAP के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। दरअसल, दिल्ली हारने के बाद अब आम आदमी पार्टी की पंजाब में ही सरकार है। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली चुनाव हारने के बाद पूरा ध्यान पंजाब पर लगा दिया है। AAP के बागी सांसदों के शामिल होने से बीजेपी खुश नजर आ रही है। दरअसल, राघव चड्ढा और संदीप पाठक ने विधासनभा चुनाव 2022 में AAP की जीत में अहम भूमिका निभाई थी। जो सांसद बीजेपी में शामिल हुए हैं उनमें- राघव चड्ढा, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, संदीप पाठक, विक्रमजीत सिंह साहनी, राजिंदर गुप्ता और स्वाति मालीवाल शामिल है। क्या बीजेपी को मिलेगा फायदा? AAP के सातों राज्य सभा सांसदों के विलय के बाद उच्च सदन में भले ही बीजेपी का संख्या बल बढ़ा हो, लेकिन जमीनी स्तर पर फायदा कम होता नजर आ रहा है। अपनी रणनीति से 2022 में राघव चड्ढा और संदीप पाठक ने AAP को जीत दिलाई हो, लेकिन जमीनी स्तर पर इन नेताओं का कोई जनाधार नहीं है। ऐसे में बीजेपी के लिए इनका कितना उपयोगी साबित होना संभव है, यह आने वाला समय बताएगा। पंजाब में चड्ढा का इस्तेमाल करेगी बीजेपी वहीं पंजाब में बीजेपी अब राघव चड्ढा का इस्तेमाल करेगी, क्योंकि प्रदेश में कायदे से पार्टी अपनी उपस्थिति भी दर्ज नहीं करा पाई है। इसके अलावा बीजेपी पर पंजाब में किसान विरोधी होने का आरोप भी लगता है। खासकर केंद्र के कृषि कानूनों के विवाद के बाद। संयुक्त किसान मोर्चा और अन्य किसान संगठनों ने बीजेपी पर किसानों की मांगों की अनदेखी करने का आरोप लगाया। इसलिए अकाली दल भी अब बीजेपी के साथ नहीं है। चड्ढा के सामने भी होगी चुनौती राघव चड्ढा AAP की तरफ से राज्य सभा में पंजाब का प्रतिनिधित्व करते थे, लेकिन अब बीजेपी में जाने के बाद उनके सामने कई चुनौतियां होगी। दरअसल, इससे पहले तक वे बीजेपी के मुखर विरोधी रहे है और कई मौके पर मोदी सरकार पर जमकर निशाना साधा है। खासतौर पर कृषि कानूनों को लेकर। ऐसे में प्रदेश की जनता और बीजेपी में अपनी जगह कैसे बनाते है, यह आने वाला समय बताएगा। उन्हें न केवल पार्टी की विचारधारा के साथ तालमेल बैठाना होगा, बल्कि जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का भरोसा भी जीतना होगा।  

कांग्रेस में राज्यसभा सीट को लेकर बढ़ा कास्ट प्रेशर, दलित- ब्राह्मणों के बाद सिंधी समाज ने भी किया दावेदारी

भोपाल  मध्य प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का राज्यसभा कार्यकाल समाप्त होने के बाद खाली हुई सीट को लेकर कांग्रेस के भीतर खींचतान तेज हो गई है। पार्टी में जातीय समीकरणों को लेकर दबाव(कास्ट प्रेशर) लगातार बढ़ रहा है। जहां पहले दलित और फिर विंध्य के ब्राह्मणों की ओर से दावेदारी पेश की गई थी, वहीं अब इस रेस में सिंधी समाज की भी एंट्री हो गई है। सिंधी प्रतिनिधित्व की मांग उठी रीवा शहर कांग्रेस कमेटी के महामंत्री दिलीप ठारवानी ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को पत्र लिखकर सिंधी समाज से राज्यसभा प्रतिनिधि भेजने की मांग उठाई है। ठारवानी ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को संबोधित पत्र में लिखा है कि वे लंबे समय से कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ता रहे हैं और उनका परिवार पीढ़ियों से पार्टी की विचारधारा से जुड़ा है। सिंधी समाज देशभर में कांग्रेस के प्रति अपनी आस्था और योगदान के लिए जाना जाता है। आगामी राज्यसभा चयन में सिंधी समाज से एक योग्य और समर्पित प्रतिनिधि के रूप में उनके नाम पर विचार किया जाए। इस पत्र की प्रतिलिपि मध्यप्रदेश कांग्रेस प्रभारी हरीश चौधरी और प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी को भी भेजी गई है। त्रिकोणीय हुआ जातीय समीकरण दलित वर्ग: दिग्विजय सिंह के राज्यसभा जाने से इनकार करने के बाद कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने दलित वर्ग के नेता को राज्यसभा भेजे जाने की मांग की थी। पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा भी इसका समर्थन कर चुके हैं। ब्राह्मण समाज: विंध्य क्षेत्र के ब्राह्मण नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने हाल ही में उमंग सिंघार और जीतू पटवारी से मुलाकात की थी। उनका तर्क है कि विंध्य में ब्राह्मण समाज का बड़ा प्रभाव है, जिसे राज्यसभा के जरिए प्रतिनिधित्व देना जरूरी है। सिंधी समाज: अब दिलीप ठारवानी की दावेदारी ने इस रेस को और दिलचस्प बना दिया है। ठारवानी का मानना है कि यदि उन्हें अवसर मिलता है, तो वे संसद में पार्टी की नीतियों और जनहित के मुद्दों को पूरी निष्ठा से उठाएंगे। प्रदेश भर में सिंधी समाज कांग्रेस से जुडे़गा। सीट बचाने के लिए कांग्रेस की घेराबंदी मध्य प्रदेश से राज्यसभा की तीन सीटें जून में रिक्त हो रही हैं। विधानसभा में दलीय स्थिति के अनुसार कांग्रेस को एक सीट मिल सकती है। इस पर प्रदेश के नेता को ही भेजने की मांग उठ रही है। विधानसभा के पूर्व नेता प्रतिपक्ष डा. गोविंद सिंह ने प्रदेश से किसी भी जमीनी नेता को भेजने की मांग की है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी भी नेताओं का मन टटोलने में लगे हैं। उन्होंने वरिष्ठ विधायक अजय सिंह से भी भेंट की। इसे राज्यसभा चुनाव की तैयारी से जोड़कर देखा जा रहा है क्योंकि कांग्रेस के पास एक सदस्य भेजने के लिए चार विधायक ही अतिरिक्त हैं। उधर, भाजपा भी तीसरी सीट पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस ने पिछले दो बार पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को राज्यसभा भेजा था। वे तीसरी बार जाने के इच्छुक नहीं हैं और पार्टी नेतृत्व को अपनी भावना से अवगत भी करा चुके हैं। साथ ही यह भी कह चुके हैं कि यदि किसी एससी वर्ग के व्यक्ति को भेजा जाता है तो उन्हें प्रसन्नता होगी। दरअसल, वे एक बार फिर दलित एजेंडे पर काम कर रहे हैं और बड़ा सम्मेलन भोपाल में कर चुके हैं। प्रदेश में एससी वर्ग के मतदाता कई सीटों पर प्रभावी भूमिका में हैं। उधर, ओबीसी समीकरण के चलते पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव और महिला प्रतिनिधित्व के हिसाब से मीनाक्षी नटराजन के नाम चर्चा में हैं। उधर, डा.सिंह ने यह मांग रख दी कि प्रदेश के किसी जमीनी नेता को राज्यसभा भेजा जाए। अन्य नेता भी इसके पक्ष में हैं। इसी बीच पूर्व नेता प्रतिपक्ष डा.गोविंद सिंह, अजय सिंह और जीतू पटवारी के बीच दो दिन पहले हुई बैठक को चुनाव की तैयारी से जोड़कर देखा गया। दरअसल, यह कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का चुनाव है। यदि आवश्यक संख्या बल से अधिक होने के बाद भी पार्टी अपना सदस्य नहीं बनवा पाती है तो कार्यकर्ताओं में जोश भरने के प्रयास प्रभावित होंगे। इसका असर अगले साल होने वाले नगरीय निकाय और पंचायत के चुनावों पर भी पड़ सकता है। यही कारण है कि कांग्रेस अभी से घर को सुरक्षित करने में जुट गई है। उधर, जीतू पटवारी ने साफ कर दिया है कि उनके पास प्रदेश अध्यक्ष पद की बड़ी जिम्मेदारी है और उसके लिए पूरा समय देना आवश्यक है। पार्टी जब प्रदेश इकाई से परामर्श करेगी तो कार्यकर्ताओं की भावना से अवगत कराया जाएगा।  

एमपी के दो सांसद विधानसभा चुनाव में शामिल, अगर जीतते हैं तो राज्यसभा की 4 सीटों पर चुनाव होगा

भोपाल  प्रदेश की सियासत में इन दिनों सबकी नजरें दक्षिण भारत के चुनावी नतीजों पर टिकी हैं। इसकी वजह यह है कि मध्य प्रदेश से राज्यसभा के दो सांसद जॉर्ज कुरियन और डॉ. एल मुरुगन केरल और तमिलनाडु से विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं।  खाली होने वाली सीटों का गणित वर्तमान में मध्य प्रदेश से राज्यसभा की तीन सीटें आधिकारिक तौर पर खाली होना तय मानी जा रही हैं। इनमें दिग्विजय सिंह, डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी और जॉर्ज कुरियन का कार्यकाल शामिल है, जो 9 अप्रैल को समाप्त हो चुका है। हालांकि, पेंच चौथी सीट पर फंसा है। वर्तमान में केंद्रीय मंत्री डॉ. एल मुरुगन का राज्यसभा कार्यकाल अभी 4 साल (अप्रैल 2030 तक) बाकी है। नियम के अनुसार यदि वे तमिलनाडु से विधानसभा चुनाव जीत जाते हैं, तो उन्हें राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देना होगा। ऐसी स्थिति में मध्य प्रदेश की चौथी राज्यसभा सीट भी खाली हो जाएगी और उस पर उपचुनाव की नौबत आएगी। मप्र के नेताओं के लिए खुल सकते हैं 'टीम मोदी' के द्वार 4 मई को आने वाले चुनावी नतीजे न केवल इन दोनों नेताओं का भविष्य तय करेंगे, बल्कि मध्य प्रदेश भाजपा के अन्य वरिष्ठ नेताओं के लिए भी नए अवसर खोल सकते हैं। चर्चा है कि यदि केंद्रीय मंत्रिमंडल से इन दो चेहरों की विदाई होती है, तो मोदी कैबिनेट में मध्य प्रदेश के किसी नए चेहरे को जगह मिल सकती है। कई वरिष्ठ नेता और प्रदेश के कुछ दिग्गज नाम पहले से ही दिल्ली की दौड़ में शामिल बताए जा रहे हैं। राज्यसभा की सीटों का सियासी समीकरण भी समझिए सुमेर की जगह आदिवासी नेता की तलाश एमपी में होने वाले राज्यसभा के चुनाव में उम्मीदवारों के नामों पर मंथन चल रहा है। सुमेर सिंह सोलंकी की जगह आदिवासी नेता की खोजबीन चल रही है। पिछले बार राज्यसभा चुनाव के पहले राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष हर्ष चौहान का नाम तय हो गया था लेकिन, उन्होंने बीमारी के कारण राज्यसभा जाने से इनकार कर दिया था। उस समय पूर्व मंत्री रंजना बघेल का नाम भी चर्चा में आया था। फिर पार्टी ने डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी का नाम राज्यसभा के लिए तय किया था। इस बार पार्टी में अंदरूनी तौर पर आदिवासी नेताओं के नामों पर मंथन चल रहा है। संघ की ओर से कुछ नामों पर चर्चा हुई है। कुरियन जीते तो मेनन जा सकते हैं राज्यसभा बीजेपी के एक सीनियर लीड़र बताते हैं कि बीजेपी के पास जो दो सीटें हैं उनमें से एक पर जॉर्ज कुरियन सांसद हैं। वे केरल से विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं। अगर कुरियन जीत जाते हैं तो एमपी से बीजेपी के पूर्व प्रदेश संगठन महामंत्री अरविंद मेनन को भी राज्यसभा भेजा जा सकता है। मेनन भी केरल के रहने वाले हैं। दिग्विजय वाली सीट पर उम्मीदवार उतारेगी बीजेपी     एमपी में कांग्रेस के कब्जे वाली राज्यसभा सीट से दिग्विजय सिंह सांसद हैं। वे राज्यसभा जाने से इनकार कर चुके हैं।     इसके बाद कांग्रेस में एक दर्जन नेता दावेदार हैं। इस सीट को जीतने के लिए 58 विधायकों की जरूरत है।     विधानसभा में आंकड़ों के हिसाब से बीजेपी के 164, कांग्रेस के 65 और एक भारत आदिवासी पार्टी के विधायक हैं।     बीना विधायक निर्मला सप्रे दलबदल के भंवर में झूल रहीं हैं।     दतिया विधायक राजेंद्र भारती को सजा सुनाए जाने के बाद उनकी सीट रिक्त घोषित हो चुकी है।     विजयपुर विधायक मुकेश मल्होत्रा को आपराधिक मामले छिपाने के मामले में मतदान से वंचित रहना होगा।     कांग्रेस के पास वर्तमान में 62 विधायक बचे हैं।     यदि चार-पांच विधायक इधर से उधर हुए तो कांग्रेस की राज्यसभा सीट खतरे में पड़ सकती है।

राज्यसभा चुनाव में 4 सीटों पर हो सकता है चुनाव, 4 मई को होगी सियासी ताकतों की परीक्षा

भोपाल   मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। फिलहाल राज्य से तीन सीटें खाली होना तय है, लेकिन परिस्थितियां ऐसी बन रही हैं कि यह संख्या चार तक पहुंच सकती है। इसका पूरा दारोमदार तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजों पर टिका है। तीन सीटें तय, चौथी पर सस्पेंस मध्य प्रदेश से वर्तमान में दिग्विजय सिंह, सुमेर सिंह सोलंकी और जॉर्ज कुरियन की राज्यसभा सीटें खाली हो रही हैं। इनका कार्यकाल 9 अप्रैल को पूरा हो चुका है। लेकिन अब नजरें एल मुरुगन पर टिकी हैं, जो फिलहाल मध्य प्रदेश से राज्यसभा सांसद हैं और केंद्र में राज्य मंत्री भी हैं। यदि वे तमिलनाडु विधानसभा चुनाव जीत जाते हैं, तो उनकी राज्यसभा सीट भी खाली हो जाएगी जिससे कुल सीटों की संख्या चार हो सकती है। तमिलनाडु चुनाव से जुड़ा गणित एल मुरुगन इस बार तमिलनाडु की अविनाशी सीट से विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं। राज्य में 23 अप्रैल 2026 को मतदान होगा और 4 मई को नतीजे घोषित किए जाएंगे। 4 मई की तारीख इसलिए अहम मानी जा रही है क्योंकि उसी दिन यह तय होगा कि मध्य प्रदेश में तीन सीटों पर चुनाव होगा या चार पर। यदि मुरुगन जीतते हैं, तो उन्हें विधायक पद के कारण राज्यसभा सीट छोड़नी पड़ेगी।  मुरुगन का राजनीतिक सफर एल मुरुगन भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं।     साल 2021 में उन्हें केंद्र सरकार में मंत्री बनाया गया और उसी दौरान वे मध्य प्रदेश से राज्यसभा पहुंचे।     वे सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं।     इससे पहले वे मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय में भी राज्य मंत्री रह चुके हैं। हालांकि, विधानसभा और लोकसभा चुनावों में उनका रिकॉर्ड मिश्रित रहा है। वे पहले भी कई चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन जीत हासिल नहीं कर पाए। अब एक बार फिर वे अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। भाजपा की रणनीति और संभावनाएं अगर एल मुरुगन चुनाव जीतते हैं, तो संभावना है कि भाजपा उन्हें दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु में संगठन मजबूत करने की बड़ी जिम्मेदारी दे सकती है। ऐसी स्थिति में मध्य प्रदेश से राज्यसभा की चौथी सीट खाली होगी, जिसका कार्यकाल 2030 तक है। यह भाजपा के लिए एक अतिरिक्त अवसर भी बन सकता है। राजनीतिक समीकरणों पर असर इस पूरे घटनाक्रम का असर न सिर्फ मध्य प्रदेश बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। राज्यसभा सीटों की संख्या बढ़ने या घटने से दलों के बीच संतुलन बदल सकता है। अब सबकी नजर 4 मई पर टिकी है, जब यह साफ होगा कि मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव का गणित क्या रूप लेता है।

हरिवंश को फिर मिला राज्यसभा उपसभापति का कार्यकाल, इस बार राष्ट्रपति ने किया मनोनयन

 नई दिल्ली राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश का बतौर सदस्य कार्यकाल आज यानी 10 अप्रैल को समाप्त हो रहा है. रिक्त हो रही सीट के लिए निर्वाचन की प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी है. हरिवंश की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) ने इस बार उनको राज्यसभा नहीं भेजा था. हरिवंश की उच्च सदन से विदाई तय मानी जा रही थी, लेकिन ऐन मौके पर उनको एक और कार्यकाल का तोहफा मिल गया है।  हरिवंश को राष्ट्रपति ने अपने कोटे से राज्यसभा सांसद मनोनीत कर दिया है. इस संबंध में गजट नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया गया है. राष्ट्रपति कोटे से मनोनयन के बाद अब यह तय हो गया है कि अगले छह साल तक उच्च सदन में हरिवंश की आवाज अभी गूंजती रहेगी. हरिवंश का राज्यसभा सदस्य के रूप में यह तीसरा कार्यकाल होगा।  गृह मंत्रालय की ओर से जारी गजट नोटिफिकेशन में कहा गया है कि राष्ट्रपति एक नामित सदस्य की सेवानिवृत्ति के कारण हुई रिक्ति को भरने के लिए राज्यसभा में हरिवंश को नामित करती हैं. गौरतलब है कि संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू राज्यसभा में 12 सदस्यों को मनोनीत कर सकती हैं।  साहित्य, कला, विज्ञान और समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले प्रतिष्ठित व्यक्तियों को मनोनीत किए जाने का प्रावधान संविधान में है. मनोनीत सदस्यों का कार्यकाल भी निर्वाचित सदस्यों की ही तरह छह साल का होता है. बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू अध्यक्ष नीतीश कुमार के करीबी माने जाने वाले हरिवंश पेशे से पत्रकार रहे हैं।  उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के जयप्रकाश नगर निवासी हरिवंश अप्रैल, 2014 में पहली बार राज्यसभा सांसद निर्वाचित हुए थे. तब उनको जेडीयू ने ही उच्च सदन में भेजा था. जेडीयू ने हरिवंश को लगातार दो बार राज्यसभा भेजा, लेकिन पार्टी ने तीसरा कार्यकाल नहीं दिया था. इसके बाद उच्च सदन में उनकी संसदीय पारी खत्म मानी जा रही थी, लेकिन ऐन वक्त पर सरकार ने राष्ट्रपति के कोटे से उनको मनोनीत करा दिया।  हरिवंश साल 2018 में 9 अगस्त को राज्यसभा के उपसभापति निर्वाचित हुए थे. 14 सितंबर 2020 को उन्हें लगातार दूसरी बार उच्च सदन का उपसभापति चुना गया था. अब उनको उच्च सदन में तीसरा कार्यकाल भी मिल गया है, ऐसे में क्या उनको लगातार तीसरी बार उपसभापति भी चुना जाएगा? अब नजरें इस पर हैं। 

राज्यसभा चुनाव में आज चुने जाएंगे सीएम नीतीश कुमार, पहले भी बना चुके हैं अनोखा राजनीतिक रिकॉर्ड

नई दिल्ली बिहार की राजनीति में फिर एक बड़ा दिन। राज्यसभा चुनाव तो भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा भी लड़ रहे हैं, लेकिन सबसे ज्यादा ध्यान जनता दल यूनाईटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष व बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर है। नितिन विधायक रहते सांसदी का यह चुनाव लड़ रहे तो नीतीश विधान परिषद् सदस्य रहते। नीतीश कुमार की चर्चा इसलिए सबसे ज्यादा हो रही है, क्योंकि दिल्ली जाने के लिए उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ेगा और पहली बार भारतीय जनता पार्टी इस कुर्सी पर अपना आदमी बैठाएगी। ऐसे में रोचक है कि नीतीश कुमार आज के बाद फैसला क्या लेते हैं? बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार को समझना असंभव जब 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री के रूप में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम प्रचारित होना शुरू होता, इससे पहले नीतीश कुमार ही ऐसे बड़े नेता थे जिन्होंने पुराने रिश्ते छोड़ दिए थे। नीतीश कुमार अटल-आडवाणी के समय से भाजपा से जुड़े थे, लेकिन नमो युग की शुरुआत से पहले एनडीए से निकल गए थे। तब भी अंदाजा नहीं लग रहा था। फिर 2017 में लौटे तो 2022 में छोड़ गए। फिर 2024 में वापस साथ आए। इस साल होली के एक दिन पहले जिस तरह से वह बिहार चुनाव 2025 के तीन महीने बाद ही राज्यसभा जाने के लिए तैयार हुए, वह भी अचरज में डालने वाला था। और, अब खरमास शुरू होने से पहले उनका इस्तीफा नहीं आना भी भाजपा के लिए सिरदर्द बना हुआ है। खरमास में वह फैसला लेते भी हैं तो यही माना जा रहा है कि 15 अप्रैल तक भाजपा नए सीएम की कुर्सी पर अपना आदमी बैठाने का 'जतरा' नहीं बनाएगी। केंद्रीय मंत्री रहे नीतीश एक बार सांसद रहते विधायक भी बने थे नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री हैं। वह केंद्रीय मंत्री भी रह चुके हैं। वह पटना जिले की बाढ़ सीट से लोकसभा सदस्य हुआ करते थे। नालंदा जिले की हरनौत विधानसभा सीट से विधायक हुआ करते थे। इस सदी में वह कभी विधानसभा चुनाव में नहीं उतरे। विधान पार्षद ही चुने जाते रहे। अब राज्य सभा के चुनाव में हैं। नीतीश कुमार के बारे में यह जानना बेहद रोचक है कि वह 1991 में तत्कालीन जनता दल के टिकट पर बाढ़ से कांग्रेस प्रत्याशी को हराकर सांसद बने थे। इसके बावजूद उन्होंने 1995 में तत्कालीन समता पार्टी के चुनाव चिह्न पर हरनौत से विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीते भी। विधायक चुने जाने के बाद जब लोग सांसद के रूप में उनके इस्तीफे का इंतजार कर रहे थे, लेकिन उन्होंने विधायक की शपथ नहीं ली। नतीजतन हरनौत सीट के लिए 1996 में उप चुनाव हुआ, जिसमें फिर समता पार्टी के अरुा कुमार सिंह विधायक बने। कब केंद्र में मंत्री बने और कब-कब बिहार की राजनीति का रुख किया? नीतीश कुमार 1985 में हरनौत विधायक चुने गए थे। इसके बाद दिल्ली की राजनीतिक यात्रा के लिए पहली बार 28 नवंबर 1989 को पटना जिले के बाढ़ संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित हुए थे। तब, सांसद के रूप में उनका कार्यकाल 2 दिसंबर 1989 से 13 मार्च 1991 तक रहा था। अप्रैल 1990 में तत्कालीन विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार में उन्हें केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री बनाया गया था। बाद में वीपी सिंह सरकार सदन में बहुमत साबित नहीं कर सकी तो केंद्रीय राज्यमंत्री के तौर पर नीतीश कुमार का कार्यकाल भी 10 नवंबर 1990 को खत्म हो गया। 13 मार्च 1991 को लोकसभा भंग हुआ तो फिर अगले चुनाव में नीतीश कुमार फिर बाढ़ से ही सांसद चुने गए। इसके बाद, बिहार की राजनीति में वापस वह सक्रिय होते दिखे। 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में वह हरनौत से फिर उतरे और विधायक चुने गए, हालांकि उन्होंने लोकसभा सदस्य रहना ही उचित समझा। इसके बाद, 1996 में फिर बाढ़ से ही नीतीश कुमार सांसद बने। तब अटल बिहारी वाजपेयी 7 दिन के लिए पीएम बने और फिर मौजूदा विपक्ष सत्ता में आ गया। 15 मार्च 1998 को अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो नीतीश कुमार की समता पार्टी उनके साथ थी। नीतीश कुमार को केंद्रीय रेल एवं भूतल परिवहन मंत्री बनाया गया। अगस्त 1999 में गैसाल में रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने मंत्रीपद से इस्तीफा दे दिया। फिर करगिल युद्ध के बाद 1999 के लोकसभा चुनाव कराना पड़ा तो भाजपा बड़े दल के उभरी। पहली बार पांच साल भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार रही। नीतीश केंद्रीय मंत्री रहे। नई सदी में पहली बार जब वह चुनाव में उतरे तो 2004 के बाढ़ ने उन्हें हरा दिया। इसके बाद परिस्थितियां देख वह बिहार को सुधारने के लिए यहां उतर गए। फिर तो 2005 से बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार बतौर मुख्यमंत्री अब तक कुर्सी पर हैं। बीच में एक बार जीतन राम मांझी को उन्होंने ही सीएम बनाया था, वह भी लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हुए।  

खड़गे ने संसद में जताई चिंता, ऊर्जा सुरक्षा पर असर

नई दिल्ली राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सोमवार को एशिया के एक महत्वपूर्ण क्षेत्र में तेजी से बदल रही भू-राजनीतिक स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि यह हालात केवल उस क्षेत्र तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। साथ ही भारत की वैश्विक छवि और सामर्थ्य पर भी इसका असर दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि भारत अपनी कच्चे तेल की लगभग 55 प्रतिशत जरूरतें पश्चिम एशिया से होने वाले आयात से पूरी करता है। यदि उस क्षेत्र में संघर्ष बढ़ता है तो उसका सीधा असर हमारे देश की आर्थिक स्थिरता पर पड़ सकता है। खड़गे ने राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन से कहा, "मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे यह मुद्दा उठाने का अवसर दिया।" खड़गे ने कहा कि वह नियम 176 के तहत तहत उभरती चुनौतियों के संदर्भ में भारत की ऊर्जा सुरक्षा के विषय पर अल्पकालिक चर्चा की अनुमति का अनुरोध करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि एशिया के उस क्षेत्र में लाखों भारतीय काम करते हैं, जिनकी सुरक्षा और आजीविका वहां की स्थिरता पर निर्भर करती है। हाल की घटनाओं में कुछ भारतीय नागरिकों के मारे जाने या लापता होने की खबरें भी सामने आई हैं। उन्होंने कहा कि रसोई गैस सिलेंडर के दाम में लगभग 60 रुपये की बढ़ोतरी भी आम लोगों पर अतिरिक्त बोझ डाल सकती है। भारत हर साल लगभग 51 बिलियन अमेरिकी डॉलर का तेल आयात करता है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था और परिवारों के जीवन से सीधे जुड़ा हुआ विषय है। इसलिए इन अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का असर अब भारत में भी दिखाई देने लगा है। इस बीच बाद सभापति द्वारा नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को बैठ जाने के लिए कहा गया। सभापति ने खड़गे को बाद में बोलने का अवसर देने की बात कही और कहा कि फिलहाल विदेश मंत्री एस जयशंकर सदन में अपनी बात रखने जा रहे हैं। इस बार विपक्षी सांसदों ने जमकर हंगामा किया। हंगामे के बीच एस जयशंकर ने अपनी बात रखी। लेकिन विपक्षी सांसद लगातार नारेबाजी करते रहे इसके उपरांत विपक्ष ने सदन से वॉकआउट किया। दरअसल, नेता प्रतिपक्ष और विपक्षी सांसद इस मुद्दे पर सदन में अपनी बात रखना चाहते थे। सभापति ने मल्लिकार्जुन खड़गे को शुरुआत में बोलने का अवसर दिया और इसके बाद उन्होंने कहा कि विदेश मंत्री द्वारा इस संदर्भ में आधिकारिक जानकारी दे रहे हैं। विदेश मंत्री द्वारा जानकारी दिए जाने के बाद वह खड़गे को बोलने का अवसर देंगे। लेकिन विपक्ष इसके लिए राजी नहीं हुआ और सदन में विपक्षी सांसद लगातार नारेबाजी करते रहे।

कांग्रेस का बड़ा फैसला, राज्यसभा के लिए सिंघवी, रेड्डी, फूलो और बौद्ध सहित 6 उम्मीदवार घोषित

चेन्नई/नई दिल्ली देश के 10 राज्यों की 37 राज्यसभा सीटों के नामांकन का आज यानि गुरुवार को अंतिम दिन है. कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर दिया है. कांग्रेस ने तेलंगाना, तमिलनाडु, हरियाणा, हिमाचल और छत्तीसगढ़ की राज्यसभा सीट के लिए अपने पत्ते खोल दिए हैं. कांग्रेस ने राज्यसभा के लिए 6 उम्मीदवार घोषित कए हैं। कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी को तेलंगाना से दुबारा राज्यसभा भेजने का फैसला किया है. तेलंगाना से कांग्रेस ने सिंघवी के अलावा वेम नरेंद्र रेड्डी को राज्यसभा भेजने का फैसला किया है. सिंघवी को जहां गांधी परिवार का करीबी माना जाता है तो वेम रेड्डी तेलंगाना सीएम रेवंत रेड्डा के भरोसेमंद माने जाते हैं. पूर्व विधायक रेड्डी तेलंगाना कांग्रेस के उपाध्यक्ष भी हैं।   कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ से आदिवासी समुदाय से आने वाली फूलो देवी को दोबारा से राज्यसभा भेजने का निर्णय किया है. इसके अलावा कांग्रेस ने हरियाणा से करमवीर बौद्ध को राज्यसभा का टिकट दिया है, जो दलित समाज से आते हैं. हिमाचल प्रदेश से कांग्रेस ने अनुराग शर्मा को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया है तो तमिलनाडु से पार्टी ने एम क्रिस्टोफर तिलक को राज्यसभा का प्रत्याशी बनाया है।  हरियाणा में कर्मवीर बौद्ध के नाम पर लगी मुहर कांग्रेस के राज्यसभा उम्मीदवारों में सबसे चौंकाने वाला नाम है कर्मवीर सिंह बौद्ध का है, जिन्हें हरियाणा से राज्यसभा भेजा जा रहा है. दलित समाज से आने वाले कर्मवीर लो प्रोफाइल नेता हैं. अंबाला के रहने वाले कर्मवीर 2024 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में मुलाना से टिकट के दावेदार रहे हैं, लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिल पाया. अब कांग्रेस ने उन्हें संसद के उच्च सदन भेजने का फैसला किया है।  कर्मवीर बौद्ध हरियाणा सिविल सचिवालय से करीब 5 साल पहले सुपरिंटेंडेंट के पद से सेवानिवृत्त हुए थे. इनकी पत्नी लेबर डिपार्टमेंट में असिस्टेंट है. हरियाणा में दलित सामाज को संदेश देने के लिए कांग्रेस ने उनपर दांव लगाया है।  तेलंगाना से सिंघवी और रेड्डी को मिला मौका तेलंगाना की दो राज्यसभा सीटों के लिए कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार के नाम का ऐलान किया है, जिसमें एक नाम अभिषेक मनु सिंघवी का है तो दूसरा नाम पूर्व विधायक वेम नरेंद्र रेड्डी का है. सिंघवी का नाम पहले ही तय माना जा रहा था, क्योंकि उन्हें गांधी परिवार का करीबी माना जाता है. हिमाचल से चुनाव हारने के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें तेलंगाना से राज्यसभा भेजा था, जिसके लिए रेवंत रेड्डी ने बीआरएस के मौजूदा राज्यसभा सांसद की सीट खाली कराई थी। छत्तीसगढ़ से फिर जाएंगी फूलो देवी राज्यसभा वहीं, कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में एक बार फिर से फूलो देवी नेतम को राज्यसभा भेजने का निर्णय लिया है. कांग्रेस आसानी से एक सीट जीत लेगी. फूलो देवी को दोबारा से राज्यसभा भेजने के पीछे पहला उनका अदिवासी समुदाय से होना और दूसरा पार्टी किसी भी तरह से कोई गुटबाजी नहीं चाहती है. इसीलिए किसी नए चेहरे पर भरोसा नहीं जताया है.  हालांकि, कांग्रेस ने शुरू में उनके विकल्प पर पार्टी ने विचार कर रही थी, लेकिन नेताओं की गुटबाजी से पिंड छुड़ाने के लिए फूलो देवी नेताम को ही फिर से राज्यसभा भेजने का फैसला लिया गया.  कांग्रेस ने राज्यसभा से साधा जातीय समीकरण कांग्रेस ने राज्यसभा चुनाव के लिए बहुत ही सोची-समझी रणनीति के तहत उम्मीदवारों के नाम का ऐलान किया है. कांग्रेस ने जिन पांच नेताओं को राज्यसभा भेजने का फैसला किया है, उसमें पंजाबी ब्राह्मण समुदाय से आने वाले अभिषेक मनु सिंघवी हैं तो दूसरे तेलंगाना की सबसे प्रभावी जाति रेड्डी समुदाय के वेम नरेंद्र रेड्डी हैं।  कांग्रेस ने हरियाणा में दलित समुदाय से आने वाले कर्मवीर सिंह बौद्ध को प्रत्याशी बनाया है तो छत्तीसगढ़ में आदिवासी समुदाय से आने वाली फूलो देवी को दोबारा राज्यसभा भेजा है. कांग्रेस ने हरियाणा में दलित समुदाय को साधे रखने की चुनौती थी, जिसके चलते ही कर्मवीर बौद्ध पर भरोसा जताया है. ऐसे ही हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ने ब्राह्मण समाज से आने वाले अनुराग शर्मा को प्रत्याशी बनाया है जबकि सीएम ठाकुर समुदाय से हैं. इस तरह कांग्रेस ने ब्राह्मण और ठाकुर केमिस्ट्री बनाने की कवायद की है।

छत्तीसगढ़ की 2 राज्यसभा सीटों पर चुनाव की घोषणा

रायपुर. भारत निर्वाचन आयोग ने बुधवार को अप्रैल-2026 में सेवानिवृत्त होने वाले राज्यसभा सदस्यों की रिक्त सीटों को भरने के लिए द्विवार्षिक चुनाव की घोषणा कर दी गई है. (Rajya Sabha Election 2026) इसके माध्यम से देश के 10 राज्यों में कुल 37 राज्यसभा सदस्यों का निर्वाचन किया जाएगा. छत्तीसगढ़ से राज्यसभा की कुल 5 सीटों में से 2 सदस्यों, कवि तेजपाल सिंह तुलसी और फूलो देवी नेताम का कार्यकाल 9 अप्रैल 2026 को पूर्ण हो रहा है. इन दोनों सीटों के रिक्त होने के कारण निर्वाचन की कार्यवाही प्रारंभ करते हुए भारत निर्वाचन आयोग द्वारा राज्यसभा के द्विवार्षिक निर्वाचन कार्यक्रम की घोषणा की गई है. आयोग द्वारा जारी कार्यक्रम के अनुसार राज्यसभा सदस्यों के निर्वाचन के लिए 26 फरवरी को अधिसूचना जारी की जाएगी. नाम-निर्देशन पत्र 5 मार्च तक दाखिल किए जा सकेंगे. 6 मार्च को नामांकन पत्रों की संवीक्षा की जाएगी. अभ्यर्थी 9 मार्च तक अपना नाम वापस ले सकेंगे. 16 मार्च को सुबह 9 बजे से सायं 4 बजे तक मतदान होगा और उसी दिन शाम 5 बजे से मतगणना प्रारंभ की जाएगी. संपूर्ण निर्वाचन प्रक्रिया 20 मार्च 2026 शुक्रवार तक पूर्ण कर ली जाएगी. राज्यसभा निर्वाचन के लिए अभ्यर्थी अपना नाम-निर्देशन पत्र 26 फरवरी से 5 मार्च तक सुबह 11 बजे से दोपहर 3 बजे तक सार्वजनिक अवकाश को छोड़कर छत्तीसगढ़ विधानसभा भवन में निर्धारित स्थान पर रिटर्निंग ऑफिसर संचालक, छत्तीसगढ़ विधानसभा के समक्ष प्रस्तुत कर सकेंगे. राज्यसभा द्विवार्षिक निर्वाचन में राज्य के कुल 90 विधानसभा सदस्य अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे, जिनमें भारतीय जनता पार्टी के 54, इंडियन नेशनल कांग्रेस के 35 तथा गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के एक सदस्य शामिल हैं. सभी विधायक मतपत्र के माध्यम से मतपेटी में अपना मत प्रदान करेंगे. मतपत्र पर वरीयता अंकित करने के लिए केवल निर्वाचन अधिकारी द्वारा प्रदान किए गए बैंगनी रंग के स्केच पेन का उपयोग किया जाएगा. किसी अन्य पेन का उपयोग मान्य नहीं होगा. स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए पर्यवेक्षकों की नियुक्ति के माध्यम से चुनाव प्रक्रिया की कड़ी निगरानी की जाएगी. निर्वाचन की संपूर्ण प्रक्रिया आयोग के निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुरूप संपादित की जाएगी. अप्रैल 2026 में सेवानिवृत्त होने वाले सदस्यों का राज्यवार विवरण अनुलग्नक ‘A’ में पृथक रूप से संलग्न है.

संसद में उठी विरासत बचाने की आवाज, धरोहरों पर बढ़ते हमलों को लेकर चिंता जाहिर

नई दिल्ली राज्यसभा सदस्य मीनाक्षी जैन ने शुक्रवार को देश की अमूल्य धरोहरों की रक्षा का महत्वपूर्ण विषय सदन में उठाया। उन्होंने कहा कि सदन का ध्यान देश की अमूल्य धरोहर स्थलों पर बढ़ती हुई तोड़फोड़ और अपवित्रता के गंभीर खतरे की ओर आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि हाल के दिनों में ऐसी घटनाओं में वृद्धि हुई है, जो अत्यंत चिंताजनक है। मीनाक्षी जैन ने कहा कि हम्पी, जो 14वीं से 16वीं शताब्दी के बीच शासन करने वाले महान विजयनगर साम्राज्य की राजधानी था, हमारी समृद्ध सभ्यतागत विरासत का प्रतीक है। लगभग 16 वर्ग मील में फैला यह नगर मध्यकालीन विश्व के सबसे बड़े नगरों में से एक माना जाता था। अनेक विदेशी यात्रियों ने हम्पी की भव्यता और समृद्धि का वर्णन किया है। इस स्थल पर अनेक मंदिर, किले, मंडप, स्तंभयुक्त सभागार और अन्य भव्य संरचनाएं स्थित हैं। वर्ष 1986 में हम्पी को यूनेस्को की ओर से विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया। उन्होंने बताया कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ पर्यटक, इस स्थल के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व से अनभिज्ञ होकर, गैर-जिम्मेदाराना और विनाशकारी कृत्य कर रहे हैं। हाल ही में कुछ व्यक्तियों ने एक मंदिर के बाहर स्थित एक विशाल स्तंभ को तोड़ दिया, जबकि उनका एक साथी इस घटना का वीडियो बना रहा था। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने घोषणा की है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए मंदिरों के स्तंभों की सुरक्षा को और मजबूत किया जाएगा। यद्यपि संरचनात्मक सुदृढ़ीकरण आवश्यक है, किंतु जागरूकता और संवेदनशीलता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। राज्यसभा सांसद ने एक और उदाहरण देते हुए कहा, "इसी प्रकार की घटनाएं अन्य स्थानों से भी सामने आई हैं। मध्य प्रदेश स्थित उदयगिरि गुफाएं गुप्तकालीन धरोहर हैं। यहां भगवान विष्णु के वराह अवतार की देश की सबसे बड़ी एकाश्म प्रतिमा स्थित है, जिस पर अत्यंत सूक्ष्म और सुंदर नक्काशी की गई है। यह प्रतिमा 5वीं-6वीं शताब्दी की मानी जाती है। हाल ही में एक पर्यटक जूते पहनकर प्रतिमा के चबूतरे पर चढ़ गया और अपने मित्रों से फोटो खिंचवाई। उसने प्रतिमा पर चढ़ने का भी प्रयास किया। पूछने पर उन्होंने कहा कि उन्हें इस स्थल के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व की जानकारी नहीं थी। वे इसे केवल घूमने-फिरने का स्थान समझ रहे थे।" मीनाक्षी जैन ने कहा कि ऐसी घटनाएं स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि पर्यटकों के बीच जागरूकता और संवेदनशीलता की कमी है। यह जरूरी है कि आगंतुकों को उन स्थलों के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व के बारे में उचित जानकारी दी जाए। हमारी धरोहर का संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। यह विचार किया जा सकता है कि इन स्थलों पर तैनात सुरक्षाकर्मी और प्रशिक्षित गाइड आगंतुकों को जागरूक करने में सक्रिय भूमिका निभाएं। साथ ही, स्पष्ट सूचना-पट्ट, प्रारंभिक मार्गदर्शन और तोड़फोड़ के मामलों में कड़े दंड का प्रावधान भी प्रभावी सिद्ध हो सकता है। उन्होंने सदन में कहा कि हमारे ये धरोहर स्थल केवल पत्थर और संरचनाएं नहीं हैं, वे हमारे इतिहास, संस्कृति और पहचान के जीवंत प्रमाण हैं। इन्हें भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।