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राज्यसभा चुनाव: तेजस्वी की रणनीति क्या—एक सीट पर दांव या NDA करेगी पूरा कब्जा?

नई दिल्ली राज्यसभा की 37 सीटों के लिए 16 मार्च को 10 राज्यों में होने वाले चुनाव के ऐलान के साथ बिहार में यह चर्चा तेज हो गई है कि राज्य की 5वीं सीट के लिए लालू यादव और तेजस्वी यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) कैंडिडेट उतारेगी या सीएम नीतीश कुमार की अगुवाई वाले सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को वॉकओवर दे देगी। बिहार से 5 राज्यसभा सांसद हरिवंश, उपेंद्र कुशवाहा, रामनाथ ठाकुर, प्रेमचंद गुप्ता और एडी सिंह का कार्यकाल अप्रैल में खत्म हो रहा है। लालू यादव की पार्टी से जिन दो सांसद प्रेमचंद गुप्ता और अमरेंद्र धारी सिंह का कार्यकाल खत्म हो रहा है, वो दोनों राजद के खजाने के मजबूत खंभे हैं। बिहार विधानसभा चुनाव के बाद 243 सीटों की विधानसभा में 202 विधायक एनडीए के पास हैं। बचे हुए 41 एमएलए में महागठबंधन के 35 ही हैं। बाकी 6 असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम और मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के हैं। राज्यसभा सांसद चुनाव के तय नियमों के अनुसार इन 5 सीट पर होने वाले चुनाव में 41 विधायकों का वोट हासिल करने वाला ही संसद पहुंच पाएगा। एनडीए कैंप में बीजेपी के 89, जेडीयू के 85, लोजपा-आर के 19, हम के 5 और रालोमो के 4 कुल 202 विधायक हैं। एनडीए कैंप से तीन सांसद रिटायर हो रहे हैं, जिनमें दो जेडीयू के हरिवंश और रामनाथ गुप्ता जबकि तीसरे रालोमो अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा खुद हैं। एनडीए के पास 202 विधायक हैं तो चार सीट तो उनकी पक्की है। सारा मसला 5वीं सीट को लेकर फंस रहा है, जिसे जीतने के लिए एनडीए के पास जरूरत से 3 वोट कम हैं। 41-41 वोट के हिसाब से एनडीए के 164 विधायक 4 सांसद जिता सकते हैं। इसके बाद एनडीए के पास 38 वोट बचते हैं, जो 5वीं सीट के लिए सीधे तौर पर काफी नहीं हैं। लेकिन मजेदार बात यह भी है कि एनडीए से बाहर पूरे विपक्ष के पास कुल 41 वोट ही है। तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन के पास राजद के 25, कांग्रेस के 6, सीपीआई-एमएल के 2, सीपीएम और आईआईपी के 1-1 कुल 35 विधायक ही हैं। इसके पास एक सांसद को जिताने के 41 वोट से 6 कम वोट हैं। विपक्ष में एआईएमआईएम के 5 और बसपा के 1 विधायक हैं, लेकिन वो विपक्षी गठबंधन के साथ रहें, तभी राजद के एक सांसद की मुश्किल से बात बन सकती है। लालू और तेजस्वी के सामने मुश्किल ये है कि राज्यसभा लड़ना है तो पहले तो वो प्रेमचंद गुप्ता और एडी सिंह में से किसी को कैंडिडेट चुनें। उसके बाद ओवैसी और मायावती के विधायकों का समर्थन भी हासिल करें। लेकिन, 5वीं सीट के लिए राजद के चुनाव लड़ते ही विपक्षी विधायकों के बीच खेला होने का खतरा बहुत ज्यादा है। एनडीए का सबसे बड़ा दल भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) इस खेल में अपना हुनर पहले के राज्यसभा चुनावों में भी दिखा चुकी है। बिहार में एनडीए के नेता रह-रहकर राजद और कांग्रेस में टूट की बातें करते ही रहते हैं। इस बार राज्यसभा चुनाव में तेजस्वी के राजनीतिक सूझ-बूझ और समन्वय की परीक्षा हो सकती है, अगर वो राजद की तरफ से एक सीट के लिए कैंडिडेट देते हैं। बीजेपी की राजनीति के तौर-तरीकों से यह तय है कि एनडीए 5 की 5 सीट लड़ेगी। अगर तेजस्वी किसी को लड़ाते हैं तो चुनाव में कुल 6 कैंडिडेट होंगे और फिर वोटिंग हो जाएगी। नजदीकी नंबर के जटिल खेल में वोटिंग को अपने पक्ष में करना बीजेपी को बहुत अच्छे से आता है। महागठबंधन में तोड़-फोड़ हो या मायावती या ओवैसी की पार्टियों में, ऑपरेशन लोटस की सूरत में तेजस्वी को नुकसान के गंभीर आसार हैं। इसलिए चर्चा यह होने लगी है कि राजद विपक्ष को एकजुट रखने की कीमत पर चुनावी एडवेंचर से दूर रह सकता है।  

राज्यसभा चुनाव से पहले हरियाणा की सियासत गरमाई, कांग्रेस को झटका देने की तैयारी में भाजपा

चंडीगढ़ हरियाणा के राज्यसभा चुनाव में भाजपा ने दिसंबर 2024 में बड़ा खेल किया था। उसके पास एक ही सीट जीतने के लिए विधायकों की संख्या थी, लेकिन उसने अपने समर्थन वाले एक निर्दलीय कैंडिडेट को जिता दिया था और इस तरह कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। अब मार्च 2026 में एक बार फिर से दो सीटों पर राज्यसभा का चुनाव होने वाला है और यहां भी भाजपा पहले की तरह ही खेल कर सकती है। हरियाणा की दो राज्यसभा सीटें 9 अप्रैल को खाली हो रही हैं। भाजपा की किरण चौधरी और रामचंदर जांगड़ा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। विधायकों की मौजूदा संख्या के अनुसार हरियाणा में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही एक-एक सीट जीतने की स्थिति में हैं।   एक सीट पर जीत के लिए 31 विधायकों की संख्या चाहिए। भाजपा के पास अपने 48 विधायक हैं। कांग्रेस के पास 37 की संख्या है। इसके अलावा इनेलो के पास भी दो विधायक हैं और तीन निर्दलीय हैं, जो भाजपा को ही समर्थन करते रहे हैं। इस तरह भाजपा की ताकत 51 हो जाती है। ऐसे में दो सीटों को जीतने के लिए यदि 62 विधायक चाहिए तो भाजपा की ओर से कोशिश हो सकती है कि 9 और विधायकों का जुगाड़ करके कांग्रेस को जीरो पर रोक दिया जाए। फिलहाल हरियाणा की पांचों राज्यसभा सीटें भाजपा के पास ही हैं। इनमें से दो किरण चौधरी और रामचंदर जांगड़ा रिटायर हो रहे हैं। इसके अलावा तीन अन्य सांसद रेखा शर्मा, कार्तिकेय शर्मा और सुभाष बराला है। कार्तिकेय भाजपा समर्थित सांसद हैं। हरियाणा की राजनीति समझने वाले नेताओं का कहना है कि इस बार भाजपा किसी जाट नेता अथवा किसी अन्य ओबीसी या दलित को ही भेजेगी। फिलहाल दो ब्राह्मण नेता पहले ही राज्यसभा में हैं। इसके अलावा सुभाष बराला जाट हैं। राज्य में जाट केंद्रित राजनीति होने के चलते एक चेहरा जाट हो सकता है और किसी अन्य पिछड़ी या दलित बिरादरी के नेता को भी भेजा जा सकता है। इसके अलावा एक और चर्चा राजीव जेटली के नाम की भी है। वह सीएम नायब सिंह सैनी के मीडिया सलाहकार हैं और राष्ट्रीय प्रवक्ता भी हैं।   ओपी धनखड़ और जेपी दलाल के नाम भी हैं चर्चा में जाट चेहरे के तौर पर भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ओपी धनखड़ और पूर्व मंत्री जेपी दलाल का नाम भी चर्चा में है। फिलहाल यह भी कहा जा रहा है कि किरण चौधरी खुद भी अपने लिए एक कार्यकाल चाहती हैं। उन्हें दो साल ही हुए हैं और वह एक पूरा कार्यकाल चाहती हैं। चर्चा तो मोहन लाल बड़ौली और रामविलास शर्मा के नाम की भी है, लेकिन दोनों ब्राह्मण नेता हैं। पहले से ही दो ब्राह्मण नेता राज्यसभा सांसद हैं। इसलिए शायद ही इन लोगों का नंबर लग पाए। किसी दलित नेता के नाम की भी चर्चा चल रही है। हालांकि अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि दलित चेहरों के नाम पर किस पर विचार चल रहा है।  

उमर अब्दुल्ला की मुश्किलें बढ़ीं — सतपाल शर्मा ने तोड़े 4 MLA, राज्यसभा समीकरण बदले

जम्मू-कश्मीर अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में हुए पहले राज्यसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने बड़ी जीत दर्ज की है। भाजपा के सतपाल शर्मा ने चौथी सीट जीतकर पार्टी के लिए ऐतिहासिक सफलता हासिल की। यह जीत केंद्र शासित प्रदेश में भाजपा की बढ़ती राजनीतिक पैठ का संकेत मानी जा रही है। भाजपा के पास यहां सिर्फ 28 विधायक हैं और जीत के लिए 32 की आवश्यक्ता थी। इसके बावजूद भगवा पार्टी के नेता यहां जीत दर्ज करने में सफल रहे। ऐसा कहा जा रहा है कि वह नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायकों का समर्थन हासिल करने में सफल रहे। कौन हैं सतपाल शर्मा? सतपाल शर्मा फिलहाल जम्मू-कश्मीर भाजपा अध्यक्ष हैं और लंबे समय से राजनीति में सक्रिय हैं। वह जम्मू पश्चिम विधानसभा क्षेत्र से 2014 में विधायक चुने गए थे और राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रह चुके हैं। पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट सतपाल शर्मा को 1986 में इंस्टिट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की सदस्यता मिली थी। वह डोगरा ब्राह्मण परिवार से हैं और जम्मू विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक हैं। हाल के विधानसभा चुनावों में उन्हें टिकट नहीं मिला था, जिसके बाद पार्टी ने उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया। नेशनल कॉन्फ्रेंस की तीन सीटों पर जीत जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस (JKNC) गठबंधन ने पहले तीन राज्यसभा सीटों पर जीत दर्ज की। पार्टी के नेता चौधरी मोहम्मद रमजान, साजद किचलू और शमी ओबेरॉय को जीत मिली है। रमजान ने 58 वोट हासिल किए। चुनाव में 88 में से 86 विधायकों ने मतदान किया, जबकि गिरफ्तार विधायक मेहराज मलिक ने डाक मतपत्र से वोट दिया। कांग्रेस, पीडीपी, सीपीआई(एम), एआईपी और छह निर्दलीयों के समर्थन से एनसी गठबंधन ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया। चौथी सीट पर मुकाबला नेशनल कॉन्फ्रेंस के इमरान नबी डार और भाजपा के सतपाल शर्मा के बीच हुआ, जिसमें शर्मा ने 32 वोट पाकर जीत हासिल की जबकि डार को सिर्फ 22 वोट मिले। यह जीत अनुच्छेद 370 हटने के बाद भाजपा की पहली राज्यसभा सीट है। इससे पहले भाजपा के शमशेर सिंह मनहास 2015 से 2021 तक राज्यसभा सदस्य रहे थे। चार साल बाद क्यों हुए चुनाव? जम्मू-कश्मीर में यह राज्यसभा चुनाव चार साल बाद हुआ क्योंकि इस अवधि में केंद्र शासित प्रदेश की विधानसभा भंग थी। राज्यसभा के सदस्य विधायकों द्वारा चुने जाते हैं, इसलिए विधानसभा न होने पर चुनाव संभव नहीं था। प्रदेश की चारों सीटें 2021 से खाली थीं। उस वर्ष गुलाम नबी आजाद, नजीर अहमद लावे, फय्याज अहमद मीर और शमशेर सिंह मनहास का कार्यकाल समाप्त हो गया था। राज्य के पुनर्गठन के बाद, जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम में तय किया गया कि इन चार सीटों को नए केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के हिस्से के रूप में माना जाएगा। सतपाल शर्मा की जीत को जम्मू-कश्मीर की बदलती राजनीतिक तस्वीर के रूप में देखा जा रहा है। जहां एक ओर एनसी गठबंधन ने तीन सीटों पर कब्जा बनाए रखा वहीं भाजपा की यह सफलता इस बात का संकेत है कि प्रदेश की राजनीति अब एकतरफा नहीं रही। विश्लेषकों का मानना है कि यह जीत भाजपा के लिए आने वाले विधानसभा चुनावों में संगठनात्मक ऊर्जा और आत्मविश्वास को बढ़ाने का काम करेगी।