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नए वित्तीय वर्ष में इंटरनेट सेवाओं में हो सकती है परेशानी, 100, 200, 500 रुपये के नए नोट होंगे बाजार में

नर्मदापुरम अमरीका और ईरान के बीच चल रहे तनाव का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है, लेकिन भारत में करंसी पेपर बनाने वाली नर्मदापुरम स्थित प्रतिभूति कागज कारखाना (एसपीएम) ने उत्पादन बढ़ाकर स्थिति संभालने का संकेत दिया है। एसपीएम ने निर्धारित लक्ष्य से अधिक करंसी पेपर तैयार किया है, जिससे जल्द ही 100, 200 और 500 रुपए के नए नोट बाजार में उपलब्ध हो सकेंगे। इससे आमजन और व्यापारियों को लेनदेन में सुविधा मिलेगी। एसपीएम देश का प्रमुख करंसी पेपर कारखाना है, जहां नोटों के लिए कागज तैयार किया जाता है। 7 मीट्रिक टन करंसी पेपर तैयार पहले भी किल्लत के समय यहां 10 और 20 रुपए के नोटों के लिए कागज तैयार किया था। अब 100, 200 और 500 रुपए के नोटों के लिए कागज का उत्पादन किया गया है। एसपीएम ने 31 मार्च 2025 से 31 मार्च 2026 के बीच 7 मीट्रिक टन करंसी पेपर तैयार किया है, जबकि लक्ष्य 6 मीट्रिक टन का था। प्रबंधन और कर्मचारियों के बेहतर तालमेल से यह संभव हुआ। नए वित्तीय वर्ष के लिए उत्पादन जारी है। इंटरनेट सेवाएं प्रभावित होने की आशंका के बीच नकद लेनदेन में ये नए नोट सहायक होंगे। विशेषज्ञों के अनुसार, 500 रुपए के नोट के बाद सबसे अधिक उपयोग 100 रुपए के नोट का होता है। इसके बाद 200 रुपए के नोट का स्थान आता है। इसी कारण एटीएम में 500, 100 रुपए के नोट अधिक रखे जाते हैं। अर्थव्यवस्था को मिल रही मजबूती प्रतिभूति कागज कारखाना एसपीएम देश की महत्वपूर्ण इकाई है। इसी कारखाने ने 1000 रुपए के नोट का कागज तैयार किया था। साथ ही पासपोर्ट पेपर, स्टांप पेपर निर्माण में भी आत्मनिर्भरता का आधार बना है। प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच बेहतर तालमेल है। कारखाना हर स्थिति में काम करने में सक्षम है। वित्तीय वर्ष में लक्ष्य से अधिक 7 मीट्रिक टन करंसी पेपर का उत्पादन किया है।- संजय भवसार, उप महाप्रबंधक (पीआरओ), एसपीएम नर्मदापुरम बाजार में 500 और 100 रुपए के नोटों का सबसे अधिक उपयोग होता है। एटीएम में भी इनकी पर्याप्त उपलब्धता जरूरी है।– रमेश बाघेला, लीड बैंक मैनेजर, सेंट्रल बैंक, नर्मदापुरम बाजार में 50 फीसदी लेनदेन डिजिटल होता है, बाजार मेंनए नोट आने से आमजन और व्यापारियों को सुविधा मिलेगी।- महेंद्र चौकेसे अध्यक्ष, किराना व्यापारी संघ, नर्मदापुरम जानिए जरूर प्वॉइंट्स वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा असर एसपीएम) ने उत्पादन बढ़ाकर स्थिति संभालने का दिया संकेत जल्द ही 100, 200 और 500 रुपए के नए नोट बाजार में होंगे 7 मीट्रिक टन करंसी पेपर तैयार 

रुपया हुआ मजबूती से ऊंचा, डॉलर के मुकाबले 12 साल की सबसे बड़ी वृद्धि, RBI के कदमों का असर

नई दिल्ली रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के सख्त कदमों के बाद रुपये ने 12 साल की सबसे बड़ी तेजी दर्ज की है, जिससे बाजार में नई हलचल पैदा हो गई है। आज 6 अप्रैल को रुपया 0.3% मजबूत होकर 92.83 प्रति डॉलर पर पहुंच गया। इससे पहले गुरुवार को इसमें 1.8% की तेज छलांग दर्ज की गई थी, जो सितंबर 2013 के बाद सबसे बड़ी एक दिन की बढ़त है। ब्लूमबर्ग ने सीआर फॉरेक्स के प्रबंध निदेशक अमित पबारी के हवाले से बताया है कि 10 अप्रैल की समयसीमा से पहले बैंक अपनी डॉलर की स्थिति समाप्त करेंगे, जिससे रुपया और मजबूत होकर 91.50 से 92 के दायरे में पहुंच सकता है। शुक्रवार को गुड फ्राइडे के कारण स्थानीय बाजार बंद थे। RBI के सख्त फैसलों से बदला खेल रुपये की मजबूती के पीछे सबसे बड़ा कारण RBI के हालिया कड़े कदम हैं। केंद्रीय रिजर्व बैंक ने बैंकों की डॉलर पोजीशन $100 मिलियन तक सीमित की और ऑफशोर ट्रेडिंग के बड़े माध्यम NDF पर रोक लगाई साथ ही सट्टेबाजी वाले सौदों पर भी सख्ती बढ़ाई। आरबीआई के इन कदमों से बाजार में डॉलर की मांग घटी और रुपया मजबूत हुआ। ईरान युद्ध का असर अब भी बना खतरा हालांकि, पश्चिम एशिया में जारी अमेरिका-ईरान तनाव अभी भी रुपये के लिए बड़ा जोखिम बना हुआ है। तेल की कीमतों में तेजी, भारत का बढ़ता आयात बिल और देशी निवेशकों की बिकवाली, जैसे ये सभी फैक्टर रुपये पर दबाव बना सकते हैं। पिछले एक साल में कितना कमजोर हुआ रुपया तेजी के बावजूद, रुपया पिछले एक साल में करीब 8.2% गिर चुका है और एशिया की कमजोर मुद्राओं में शामिल रहा है। रुपये को सपोर्ट देने के लिए RBI को भारी हस्तक्षेप करना पड़ा, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार में भी गिरावट आई है। RBI की बैठक पर टिकी बाजार की नजर अब निवेशकों की नजर RBI की आगामी मौद्रिक नीति बैठक पर है। खास तौर पर गवर्नर संजय मल्होत्रा के बयान महत्वपूर्ण होंगे। यह तय करेगा कि रुपया आगे और मजबूत होगा या दबाव में आएगा। समिति की बैठक सोमवार से शुरू होगी और बुधवार को इसके नतीजे की घोषणा की जाएगी। क्या फिर कमजोर होगा रुपया? विशेषज्ञों के अनुसार, अगर ईरान युद्ध लंबा चलता है तो रुपया फिर दबाव में आ सकता है। मुथूट फिनकॉर्प लिमिटेड की मुख्य अर्थशास्त्री अपूर्व जावडेकर का कहना है, "मुझे उम्मीद है कि अगर ईरान युद्ध लंबा चलता है, जिससे कम से कम एक तिमाही तक तेल की कीमतें ऊंची रहेंगी, तो रुपया 96 प्रति डॉलर के स्तर तक कमजोर हो जाएगा, जब तक कि आरबीआई और हस्तक्षेप न करे।" एशियाई देशों की करेंसी पर दबाव भारत अकेला नहीं है। थाईलैंड, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर जैसे देश भी ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं, जिससे उनकी मुद्राएं भी दबाव में हैं। RBI के सख्त कदमों से रुपये को मजबूती जरूर मिली है, लेकिन वैश्विक हालात, खासकर तेल और युद्ध आगे की दिशा तय करेंगे। निवेशकों को अभी सतर्क रहने की जरूरत है।

Rupee vs Dollar: RBI का बड़ा फैसला, रुपये में आई 12 साल की सबसे बड़ी तेजी

नई दिल्‍ली भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये को लेकर कुछ कड़े फैसले लिए हैं, जिस कारण रुपये में गिरावट सिर्फ थमी ही नहीं, बल्कि बड़ी उछाल आई है. RBI द्वारा करेंसी में अस्थिरता को कम करने के लिए अतिरिक्‍त उपाय पेश करने के लिए एक दिन बाद यह तेजी आई है।  2 अप्रैल को डॉलर की तुलना में रुपये में 12 सालों से ज्‍यादा समय में सबसे अधिक तेजी देखी गई है, जबकि बैंक अपने ऑफशोर लॉन्ग डॉलर पोजीशन को कम करना जारी रखे हुए थे. करेंसी मार्केट खुलने के बाद करेंसी ट्रेड फिर से शुरू होने पर रुपया डॉलर के मुकाबले 1.8 प्रतिशत तक बढ़कर 93.17 पर पहुंच गया, जो सितंबर 2013 के बाद सबसे ज्‍यादा है।  क्‍यों आई इतनी बड़ी तेजी?  1 अप्रैल को, RBI ने फॉरेक्‍स मार्केट के नियम को कड़ा किया है. आरबीआई ने बैंकों को रेजिडेंस और नॉन-रेजिडेंस कस्‍टमर्स को रुपये के नॉन-डिलीवर फॉरवर्ड (एक तरह का फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट) जारी करने से रोक दिया. नॉन-डिलीवर फॉरवर्ड एक तरह का कॉन्‍ट्रैक्‍ट है, जो  फ्यूचर में रुपया का स्‍तर क्‍या होगा? उस आधार पर खरीदारी करने की अनुमति देता है. एक तरह से आप इसे करेंसी में डेरिवेटिव ट्रेडिंग भी कह सकते हैं. बस इसी कॉन्‍ट्रैक्‍ट को जारी करने से आरबीआई ने रोक लगा दी है. आरबीआई ने यह भी कहा कि कंपनियां रद्द किए गए विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव कॉन्‍ट्रैक्‍ट को दोबारा बुक नहीं कर सकतीं।  रुपये में गिरावट के कई कारण  सबसे बड़ा कारण विदेशी संस्‍थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली रही है. मार्च महीने में ही विदेशी संस्‍थागत निवेशकों ने 1.11 लाख करोड़ रुपये की सेलिंग कर डाली थी. इसके साथ ही जंग के शुरू होने से दुन‍िया भर में महंगाई बढ़ने का खतरा बढ़ गया है. साथ ही होमुर्ज के रास्‍ते के बंद होने की वजह से कच्‍चे तेल के दाम में लगातार तेजी रही है, जिस कारण रुपये में लगातार गिरावट रही है।  वहीं रुपये पर बैंकों के शुद्ध खुले पदों के जोखिम को सीमित करने के लिए आरबीआई द्वारा कदम उठाए जाने के बावजूद, 30 मार्च को करेंसी में 95 डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर लिया. हालांकि, ट्रंप के ईरान वॉर को लेकर दिए गए संबोधन के बाद कच्‍चे तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है।   कच्‍चे तेल के भाव में उछाल  ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी सेना ने ईरान जंग को लेकर अपने लक्ष्‍यों को लगभग हासिल कर ही लिया है. 2 से 3 हफ्तों के दौरान हम एक बड़ा कदम उठाएंगे. हालांकि उन्‍होंने जंग को समाप्‍त करने की कोई समयसीमा नहीं बताई, जिस कारण कच्‍चे तेल के भाव में तगड़ी उछाल देखने को मिली और यह 106 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चला गया। 

पंजाब के छात्रों पर रुपये की गिरावट का असर, विदेश में पढ़ाई अब और महंगी

जालंधर  भारतीय रुपये के लगातार कमजोर होने और डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक निचले स्तर (करीब 93 रुपये प्रति डॉलर) तक पहुंच गया है। इसका सीधा असर विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों, खासकर पंजाब के विद्यार्थियों और उनके परिवारों पर पड़ रहा है।   पहले से ही महंगी विदेशी शिक्षा अब और अधिक बोझिल होती जा रही है, जिससे कई परिवार आर्थिक दबाव में आ गए हैं। रुपये की इस गिरावट ने न केवल कुल शिक्षा बजट को बढ़ाया है, बल्कि सालाना खर्च, लोन की अदायगी और अन्य छिपे हुए शुल्कों के रूप में भी अतिरिक्त बोझ डाल दिया है, जिससे विदेश में पढ़ाई का सपना पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा महंगा हो गया है। विदेशी मुद्रा का कारोबार करने वाले हेमंत का कहना है कि रुपये में गिरावट के कारण विदेश में पढ़ाई का कुल बजट औसतन 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ गया है। उदाहरण के तौर पर, जो कोर्स पहले लगभग 1.2 करोड़ रुपये में पूरा हो जाता था, अब उसी पर करीब 1.5 करोड़ रुपये तक खर्च आ रहा है। यह वृद्धि केवल मुद्रा विनिमय दर में बदलाव के कारण हुई है, जिससे अभिभावकों की पहले से बनाई गई वित्तीय योजनाएं प्रभावित हो रही हैं और उन्हें अतिरिक्त संसाधन जुटाने पड़ रहे हैं। डॉलर महंगा होने से छात्रों को हर साल अतिरिक्त राशि चुकानी पड़ रही है। उदाहरण के लिए, 55,000 डॉलर सालाना फीस वाले कोर्स में छात्रों को सिर्फ एक्सचेंज रेट की वजह से करीब 4.11 रुपये लाख अधिक देने पड़ रहे हैं। यह अतिरिक्त खर्च पूरे कोर्स अवधि में लाखों रुपये तक पहुंच जाता है, जो मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए एक बड़ा आर्थिक झटका साबित हो रहा है। विदेशी एजुकेशन की माहिर परमजीत का कहना है कि मुद्रा विनिमय के दौरान लगने वाले छिपे हुए शुल्क (हिडन चार्जेज) भी छात्रों के लिए बड़ी समस्या बनकर उभरे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वर्ष 2024 में भारतीय छात्रों को पारदर्शिता की कमी और अतिरिक्त शुल्कों के कारण 1,700 रुपये करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ। इन शुल्कों में बैंक मार्जिन, ट्रांसफर फीस और एक्सचेंज रेट में अंतर जैसी चीजें शामिल हैं, जिनके बारे में अधिकतर छात्रों और अभिभावकों को पहले से स्पष्ट जानकारी नहीं होती। एजुकेशन लोन पर भी असर रुपये के कमजोर होने का असर एजुकेशन लोन पर भी पड़ रहा है। लोन की कुल लागत और उसकी अदायगी पर सालाना 3 से 5 प्रतिशत तक अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है, जिससे छात्रों के लिए पढ़ाई पूरी करने के बाद कर्ज चुकाना और मुश्किल हो सकता है। ब्याज के साथ-साथ मूलधन की राशि भी बढ़ने से कुल देनदारी पहले के मुकाबले काफी अधिक हो जाती है। पंजाब से विदेश जाने वाले छात्रों के रुझान में भी हाल के समय में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। वर्ष 2023 में भारत से करीब 3.19 लाख छात्र कनाडा गए थे, जिनमें से लगभग 1.8 लाख यानी करीब 56 प्रतिशत अकेले पंजाब से थे। लेकिन 2024-25 में सख्त नियमों और बढ़ते खर्च के कारण पंजाब से कनाडा जाने वाले छात्रों के आवेदनों में करीब 50 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट इस बात का संकेत है कि बढ़ती लागत और नीतिगत बदलावों ने छात्रों के फैसलों को सीधे प्रभावित किया है। अमेरिका के मामले में स्थिति कुछ अलग नजर आती है। 2024-25 शैक्षणिक वर्ष में अमेरिका में लगभग 3.63 लाख भारतीय छात्र नामांकित रहे, जो पिछले वर्ष की तुलना में 10 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। हालांकि, इसके बावजूद 2025 की पहली छमाही में भारतीय छात्रों को जारी किए जाने वाले एफ-1 वीजा में 44 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है, जो भविष्य में वहां जाने वाले छात्रों की संख्या पर असर डाल सकती है। अमेरिका में पढ़ाई पर चार लाख का अतिरिक्त बोझ खर्च के स्तर पर देखा जाए तो अमेरिका में पढ़ाई की औसत वार्षिक लागत 25,000 डॉलर से 55,000 डॉलर के बीच है, जिसमें रुपये की गिरावट के कारण 4 लाख तक का सीधा अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है। वहीं कनाडा में ग्रेजुएशन की औसत फीस 33,417 और पोस्ट ग्रेजुएशन की 16,321 डॉलर है, जबकि जीआईसी फंड बढ़कर 20,635 कनाडाई डॉलर यानी करीब 13 लाख रुपये हो गया है, जो छात्रों के लिए शुरुआती निवेश को और भारी बना देता है। विकल्प बदलने लगे छात्र एजुकेशन एक्सपर्ट पूजा सिंह का कहना है कि “रुपये की गिरावट ने विदेशी शिक्षा को मिडिल क्लास परिवारों की पहुंच से धीरे-धीरे दूर कर दिया है। कई छात्र अब अपने विकल्प बदल रहे हैं या अपनी पढ़ाई को टाल रहे हैं। आने वाले समय में छात्र सस्ते देशों की ओर रुख कर सकते हैं या भारत में ही बेहतर अवसर तलाशेंगे।” कुल मिलाकर, डॉलर की मजबूती और रुपये की कमजोरी ने पंजाब के छात्रों के विदेशी शिक्षा के सपनों पर गंभीर आर्थिक दबाव डाल दिया है। यदि यही स्थिति बनी रहती है, तो आने वाले समय में विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या में और गिरावट देखने को मिल सकती है, और उच्च शिक्षा के लिए वैश्विक विकल्प चुनना पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।   

डॉलर के आगे नहीं टिक पाया रुपया, 93.94 तक लुढ़का—क्या हैं इसके पीछे के कारण?

मुंबई रुपये में एक बार फिर भारी गिरावट देखने को मिली है। सोमवार को शुरुआती कारोबार में रुपया 41 पैसे गिरकर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 93.94 के अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया। भारतीय मुद्रा (रुपया बनाम डॉलर) पर दो कारणों से दबाव बना हुआ है। पहला, पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में बढ़ोतरी, और दूसरा अमेरिकी डॉलर का लगातार मजबूत होना। फॉरेक्स ट्रेडर्स ने बताया कि सुबह के सत्र के दौरान पूंजी का लगातार बाहर जाना और घरेलू शेयर बाजारों में आई भारी गिरावट ने स्थानीय मुद्रा को और कमजोर कर दिया। रुपया 93.84 पर खुला, फिर और नीचे गिरा इंटर-बैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया डॉलर के मुकाबले 93.84 पर खुला और उसके बाद फिसलकर 93.94 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। यह इसकी पिछली बंद कीमत से 41 पैसे की गिरावट दर्शाता है। शुक्रवार को रुपये ने डॉलर के मुकाबले पहली बार 93 का स्तर तोड़ा था। अंततः 64 पैसे की गिरावट के साथ 93.53 के अब तक के सबसे निचले स्तर पर बंद हुआ था। इस बीच, डॉलर इंडेक्स, जो छह प्रमुख मुद्राओं की एक टोकरी के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की मजबूती को मापता है, 99.66 पर रहा, जिसमें 0.02 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क माने जाने वाले ब्रेंट क्रूड की कीमत 112.90 डॉलर प्रति बैरल रही, जिसमें 0.60 प्रतिशत की गिरावट आई। शेयर बाजार के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) शुक्रवार को शुद्ध बिकवाल रहे, जिन्होंने 5,518.39 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। रुपये में गिरावट के 3 मुख्य कारण केडिया एडवाइजरी के सीनियर कमोडिटी एक्सपर्ट और MD अजय केडिया के अनुसार, रुपये में और गिरावट की संभावना बनी हुई है। उनका कहना है कि मुद्रा बाजार (currency market) इस समय बेहद उथल-पुथल भरे दौर से गुजर रहा है, जहाँ कई कारक एक साथ रुपये पर दबाव डाल रहे हैं। 1 – कच्चे तेल की कीमतें: पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) में बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊँचे स्तर पर बनी हुई हैं। ब्रेंट क्रूड इस समय 112.90 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है, जिससे भारत का आयात बिल बढ़ रहा है। 2 – विदेशी निवेशकों की बिकवाली: शुक्रवार को, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भारतीय शेयर बाज़ार में लगभग ₹5,518.39 करोड़ के शेयर बेचे; इस कदम का रुपये की सेहत पर सीधा असर पड़ा। 3 – मजबूत होता डॉलर: ‘डॉलर इंडेक्स’, जो छह प्रमुख वैश्विक मुद्राओं की एक टोकरी के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की मजबूती को मापता है, यह बढ़कर 99.66 पर पहुंच गया है। भारत पर इसका क्या असर होगा? रुपये के कमजोर होने और तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के मेल से भारत का आयात बिल बढ़ सकता है। अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो पेट्रोल, डीजल और परिवहन की बढ़ती लागत आम आदमी की आर्थिक स्थिति पर और भी भारी बोझ डालेगी। आखिरकार, इसका असर आम नागरिक पर पड़ना तय है।

मिडिल ईस्ट संकट का असर, रुपया टूटा — डॉलर के मुकाबले 92.5 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर

नई दिल्ली भारतीय रुपया सोमवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और डॉलर की बढ़ती मांग के कारण रुपये पर दबाव बढ़ गया। शुरुआती कारोबार में रुपया 92.20 प्रति डॉलर पर खुला, लेकिन जल्दी ही गिरकर 92.528 तक पहुंच गया। कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उछाल वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त तेजी देखने को मिली। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 25% से ज्यादा उछलकर 118 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया। अमेरिका-इस्राइल और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध ने तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि तेल की कीमतें बढ़ने से भारत जैसे आयातक देशों में डॉलर की मांग बढ़ जाती है, जिससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार आयातकों और तेल कंपनियों की ओर से डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर दबाव बना हुआ है। विश्लेषकों का कहना है कि अगर बाजार में ज्यादा उतार-चढ़ाव होता है तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) हस्तक्षेप कर स्थिति को संभाल सकता है। एनरिच मनी के सीईओ पोनमुदी आर के मुताबिक, डॉलर-रुपया जोड़ी फिलहाल अपने नए ऑल-टाइम हाई के आसपास 92.30-92.32 के दायरे में कारोबार कर रही है। उनका कहना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के कारण निवेशक सुरक्षित निवेश के रूप में डॉलर की ओर रुख कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए महंगा कच्चा तेल और मजबूत डॉलर रुपये पर लगातार दबाव बना रहे हैं। तकनीकी चार्ट के आधार पर फिलहाल ट्रेंड अमेरिकी डॉलर के पक्ष में मजबूत दिखाई दे रहा है। विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली जारी फॉरेक्स ट्रेडर्स के मुताबिक विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की बिकवाली और शेयर बाजार में भारी गिरावट ने भी रुपये की कमजोरी को बढ़ाया है। इससे पहले शुक्रवार को रुपया 18 पैसे गिरकर 91.82 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। घेरलू शेयर बाजार में दिखी बड़ी गिरावट इधर डॉलर इंडेक्स, जो छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की मजबूती को दर्शाता है, 0.66% बढ़कर 99.64 पर पहुंच गया। वहीं घरेलू शेयर बाजार में भी भारी बिकवाली देखने को मिली। शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 2,400 से ज्यादा अंक गिर गया, जबकि निफ्टी 708.75 अंक टूटकर 24,000 के नीचे पहुंच गया। एक्सचेंज के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशकों ने शुक्रवार को 6,030.38 करोड़ रुपये के शेयरों की शुद्ध बिकवाली की। हालांकि इस बीच एक सकारात्मक संकेत यह है कि भारतीय रिजर्व बैंक के मुताबिक 27 फरवरी को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 4.885 अरब डॉलर बढ़कर रिकॉर्ड 728.494 अरब डॉलर पर पहुंच गया।  

रुपया मचाने लगा धमाल: एक हफ्ते में शानदार तेजी, India-US ट्रेड डील का प्रभाव

 नई दिल्‍ली ,    शुक्रवार को डॉलर की संभावित निकासी और व्यापारियों द्वारा लॉन्ग पोजीशन कम करने के कारण भारतीय रुपया गिरावट पर बंद हुआ, लेकिन इस सप्‍ताह के दौरान भारतीय करेंसी ने शानदार तेजी दिखाई है. इस सप्‍ताह की तेजी ने 3 साल में सबसे तेज बढ़ोतरी को दर्ज किया है.  डॉलर की तुलना में रुपया शुक्रवार को 90.6550 पर बंद हुआ, जो दिन में 0.3% की गिरावट के साथ सप्ताह में 1.4% की तेजी को दिखाता है. जनवरी 2023 के बाद यह इसकी सबसे बड़ी वीकली ग्रोथ है. यह तेजी भारत और अमेरिका के बीच डील पर सहमति बनने के बाद आई है.  आरबीआई का बड़ा फैसला रुपया में तेज उछाल के साथ ही भारत के केंद्रीय बैंक (RBI) ने पॉजिटिव आर्थिक नजरिया, अमेरिका और यूरोप के साथ व्यापार समझौतों के बाद कम हुए दबावों से उत्साहित होकर रेपो दर को अपरिवर्तित रखा है. एक्‍सपर्ट्स का कहना है कि हमारा मानना ​​है कि एमपीसी बदलती व्यापक आर्थिक स्थितियों और नई श्रृंखला के आंकड़ों पर आधारित नजरिए से मौद्रिक नीति की भविष्य की दिशा तय करेगी.  वहीं कुछ एक्‍सपर्ट्स का कहना है कि आरबीआई रेपो रेट को कम रखकर बैंकों और लोन लेने वाले लोगों को सपोर्ट देना चाहता है. यह लोन लेने वाले लोगों के लिए एक बड़ी राहत होगी. वहीं व्‍यापारियों का कहना है कि रेपो रेट में अनचेंज रखने से रुपया के गिरावट में ज्‍यादा योगदान नहीं रहेगा.  मंगलवार को आई थी उछाल मंगलवार को अमेरिका और भारत द्वारा महीनों की बातचीत के बाद व्यापार समझौते की घोषणा के बाद भारतीय करेंसी में बड़ी उछाल आई थी, लेकिन शुक्रवार को  इसमें थोड़ी कमी आई.  हालांकि व्यापारियों और विश्लेषकों का कहना है कि इस व्यापारिक सफलता ने रुपये पर छाए संकट को दूर किया है. एक स्थायी तेजी विदेशी निवेश में उछाल पर निर्भर करेगी.  4 अरब डॉलर के शेयर बेचे गौरतलब है कि विदेशी निवेशकों ने पिछले महीने 4 अरब डॉलर के स्थानीय शेयरों की नेट सेलिंग के बाद फरवरी में अब तक लगभग 1 अरब डॉलर के स्थानीय शेयर खरीदे हैं. वैश्विक बाजारों में, डॉलर सूचकांक थोड़ा नीचे 97.8 पर था, जबकि एशियाई मुद्राओं में मिला-जुला असर देखने को मिला.  बता दें शेयर बाजार शुक्रवार को तेजी पर बंद हुआ. निफ्टी 50 अंक ऊपर चढ़कर 25,693 पर बंद हुआ, जबकि सेंसेक्‍स 266 अंक चढ़कर 83580 पर क्‍लोज हुआ. निफ्टी बैंक भी 56 अंक चढ़कर क्‍लोज हुआ. 

SBI रिपोर्ट: डॉलर मजबूती के बावजूद रुपये में अगले 6 महीनों में होगा बदलाव

नई दिल्‍ली भारतीय रुपये की लगातार गिरावट ने एक्‍सपर्ट्स के बीच एक बहस छेड़ दी है कि आखिर ये कितना गिरेगा. SBI रिसर्च ने अपनी नई रिपोर्ट में एक बड़ा दावा किया है. एसबीआई ने 'इन रूपी वी ट्रस्‍ट' में कहा है कि भारतीय रुपया अभी डीवैल्‍यूवेशन के तीसरे चरण से गुजर रही है, जो रुपया और अमेरिकी डॉलर दोनों में एक साथ कमजोरी का दौर है.  एसबीआई ने कहा कि रुपये में गिरावट घरेलू व्यापक आर्थिक तनाव और वैश्विक अनिश्चितता, विशेष रूप से भू-राजनीतिक तनाव और व्यापार व्यवधानों के कारण हो रही है. रिपोर्ट में कहा गया है कि मार्कोव रिजीम-स्विचिंग मॉडल का उपयोग करते हुए, एसबीआई रिसर्च का अनुमान है कि रुपया लगभग छह महीने तक दबाव में रह सकता है. लेकिन इसके बाद इसमें शानदार तेजी आएगी. इसके बाद इसमें करीब 6.5 फीसदी की उछाल आ सकती है और संभावित तौर से  2026 में यह वापस 87 रुपये प्रति डॉलर की ओर बढ़ सकता है.  आरबीआई के एक्‍शन से उछला रुपया भारतीय रुपया मंगलवार को 91 प्रति डॉलर के स्तर को पार कर गया और सर्वकालिक निम्न स्तर पर पहुंच गया, लेकिन अगले दिन इसमें तेजी से सुधार हुआ.  बुधवार को मुद्रा 90.3475 प्रति अमेरिकी डॉलर पर कारोबार कर रही थी, जो इसके पिछले बंद भाव 91.0275 से 1 फीसदी  से ज्‍यादा की उछाल है. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के मजबूत हस्तक्षेप ने 17 दिसंबर को रुपये में सात महीनों में सबसे मजबूत तेजी आई, जिससे अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लंबे समय से चली आ लगातार गिरावट पर ब्रेक लग गई.  सरकारी बैंकों द्वारा डॉलर की लगातार बिक्री के बाद शुरुआती कारोबार में घरेलू मुद्रा में उछाल आया है. माना जा रहा है कि सरकारी बैंक ने केंद्रीय बैंक के हस्‍तक्षेप के बाद ऐसा फैसला किया है. इस हस्तक्षेप से अस्थिरता को कम करने और बाजार की भावना को स्थिर करने में मदद मिली. रुपये में 1.03% की वृद्धि हुई, जो 23 मई, 2025 के बाद से एक दिन में सबसे बड़ी तेजी है.  रुपये में गिरावट क्यों? एक्‍सपर्ट्स के अनुसार रुपये को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा संरचनात्मक परिवर्तन 2014 से पहले की अवधि की तुलना में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश में आई भारी गिरावट है. 2007 से 2014 के बीच, नेट पोर्टफोलियो निवेश औसतन 162.8 अरब डॉलर प्रति वर्ष था, जिससे करेंसी को मजबूती मिली थी. हालांकि, 2015 से 2025 तक, औसत निवेश घटकर 87.7 अरब डॉलर रह गया है, जिससे वैश्विक झटकों को झेलने की क्षमता कम हो गई है. अकेले 2025 में, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) का निवेश 10 अरब डॉलर से अधिक हो गया, जिससे रुपये पर लगातार दबाव बना रहा.  एसबीआई रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में भू-राजनीतिक तनाव और टैरिफ को भी रुपये में गिरावट की वजह बताई है.रिपोर्ट के मुताबिक, टैरिफ ऐलान के बाद से ही रुपये में 5.7 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है.   डॉलर की डिमांड रिपोर्ट में विदेशी मुद्रा बाजार के व्‍यापारी क्षेत्र में डॉलर की बढ़ती मांग पर भी प्रकाश डाला गया है. जुलाई 2025 से, अनिश्चितता के बीच आयातकों और निर्यातकों द्वारा हेजिंग बढ़ाने के कारण फॉरवर्ड बाजार में अतिरिक्त मांग में तेजी से वृद्धि हुई है. व्यापारी बाजार में कुल अतिरिक्त मांग 145 अरब डॉलर तक पहुंच गई, जिसके चलते भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को हस्तक्षेप करना पड़ा. क्या 2026 में रुपया 87 पर होगा? इस गिरावट के बाद भी एसबीआई रिसर्च रुपया पर पॉजिटिव बना हुआ है. इसके मार्कोव-स्विचिंग विश्लेषण से पता चलता है कि रुपया लगभग छह महीने बाद मौजूदा गिरावट के दौर से बाहर निकल सकता है. ऐतिहासिक रुझान बताते हैं कि एक बार ऐसा होने पर मुद्रा में उल्लेखनीय सुधार होता है. इसी आधार पर, रिपोर्ट भू-राजनीतिक जोखिमों में कमी और पूंजी प्रवाह में स्थिरता आने की स्थिति में, 2026 में लगभग 6.5% की संभावित वृद्धि का अनुमान है, जो 87 लेवल पर रुपया को पहुंचा देगा. 

डॉलर के मुकाबले रुपया गिरा, 90.58 पर पहुंचा ऑल टाइम लो, विदेशी फंड्स की निकासी से बढ़ा दबाव

मुंबई  डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 15 दिसंबर को अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया. शुरुआती कारोबार में रुपया 9 पैसे की गिरावट के साथ 90.58 प्रति डॉलर पर खुला. रुपये की इस ऐतिहासिक कमजोरी ने वित्तीय बाजारों में खलबली मचा दी है. विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात में घरेलू और वैश्विक दोनों ही कारणों से रुपये पर दबाव बना हुआ है. साल 2025 की शुरुआत में 1 जनवरी को रुपया 85.70 प्रति डॉलर के स्तर पर था. महज कुछ महीनों में इसमें 5 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की जा चुकी है. रुपये के कमजोर होने का सीधा असर देश के आयात बिल पर पड़ता है. भारत अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल, गैस और सोने के रूप में विदेशों से मंगाता है. कमजोर रुपया इन सभी आयातों को महंगा बनाता है, जिसका बोझ अंततः आम उपभोक्ता तक पहुंचता है. रुपये की गिरावट से पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है और महंगाई में भी तेजी आने की आशंका रहती है. इसके अलावा विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों और विदेश यात्रा करने वालों के लिए खर्च पहले की तुलना में काफी बढ़ गया है. अब एक डॉलर खरीदने के लिए 90 रुपये से ज्यादा खर्च करने पड़ रहे हैं, जिससे विदेशी विश्वविद्यालयों की फीस, रहने-खाने और अन्य खर्चों में भारी इजाफा हो गया है. रुपये में गिरावट की प्रमुख वजहें विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिकी टैरिफ नीति को लेकर बनी अनिश्चितता रुपये की कमजोरी की बड़ी वजह है. अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर लगाए गए ऊंचे टैरिफ से निर्यात पर असर पड़ने की आशंका है, जिससे विदेशी मुद्रा की आवक घट सकती है. दूसरी ओर, जुलाई 2025 से अब तक विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय बाजारों से बड़ी मात्रा में पूंजी निकाली है. इस बिकवाली के दौरान रुपये को डॉलर में बदलने से डॉलर की मांग बढ़ी और रुपया और कमजोर हो गया. इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और सोने की कीमतों में तेजी से भारत का आयात बिल बढ़ा है. कई कंपनियां और आयातक जोखिम से बचने के लिए डॉलर की हेजिंग कर रहे हैं, जिससे बाजार में डॉलर की मांग और बढ़ रही है. RBI की नीति पर टिकी बाजार की नजर बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार भारतीय रिजर्व बैंक का हस्तक्षेप अपेक्षाकृत सीमित रहा, जिससे रुपये की गिरावट तेज दिखाई दी. अब सभी की नजरें शुक्रवार को आने वाली RBI की मौद्रिक नीति पर टिकी हैं. उम्मीद जताई जा रही है कि सेंट्रल बैंक रुपये में स्थिरता लाने के लिए जरूरी कदम उठा सकता है. तकनीकी तौर पर रुपया फिलहाल ओवरसोल्ड जोन में है, ऐसे में आने वाले दिनों में सीमित सुधार की संभावना भी जताई जा रही है.