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आधे दाम में तैयार हुआ ‘S-400’, IAF ने थोक में ऑर्डर दिया, रूस चौंका

बेंगलुरु  रूस का एस-400 दुनिया का एक सबसे बेहतर एयर डिफेंस सिस्टम है. रूस के साथ चीन और भारत भी इस सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं. बीते साल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने इसकी झांकी दिखाई थी. इसके बाद कुछ ही घंटों के भीतर पाकिस्तान घुटनों पर आ गया था. उसने सीज फायर की गुहार लगाई थी. एस-400 ने पाकिस्तान की सीमा से करीब 300 किमी भीतर जाकर उसके एक बड़े अवॉक्स सिस्टम को तबाह कर दिया था. खैर हम इस जंग की बात नहीं कर रहे है. हमारा आज का फोकस एस-400 है. भारत ने रूस से इस डिफेंस सिस्टम के पांच स्क्वाड्रन खरीदे है. इसमें से तीन की डिलिवरी हो गई है. चौथे की डिलिवरी लेने एयरफोर्स की टीम रूस जा चुकी है. वहीं पांचवें स्क्वाड्रन की डिलिवरी भी इसी साल होने की उम्मीद है. भारत इसके अलावा एस-400 के ही पांच और स्क्वाड्रन खरीदे की योजना पर काम रहा है।  इस बीच भारत अपना देसी एस-400 बना रहा है. इसका नाम प्रोजेक्ट कुश है. इस डिफेंस सिस्टम को डीआरडीओ विकसित कर रहा है. यह कई मामलों में एस-400 से बेहतर सिस्टम है. इसको पूरी तरह भारतीय एयरफोर्स की जरूरत के हिसाब से डेवलप किया गया है. एयरफोर्स ने पहली बार में ही इस सिस्टम के पांच स्क्वाड्रन के ऑर्डर दे दिए हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि इस सिस्टम की लागत एस-400 की तुलना में आधी से भी कम है. ऐसे में रूस के चेहरे पर हैरानी साफ नजर आ रही है. रूस के हथियार कारोबार के लिए एस-400 एक सबसे प्रीमियम हथियार है।  प्रोजेक्ट कुश की खासियत एस-400 की तुलना में कुश न केवल लागत में कम है बल्कि यह राष्ट्रीय संप्रभुता, सॉफ्टवेयर स्वतंत्रता और लॉन्ग-टर्म मेंटेनेंस के मामले में भी कहीं बेहतर है. भारत ने 2018 में रूस से एस-400 के पांच स्क्वाड्रन की डील की थी. उस वक्त उसकी लागत करीब 5.45 अरब डॉलर यानी करीब 45 हजार करोड़ रुपये थी. वहीं प्रोजेक्ट कुश के पांच स्क्वाड्रन की कीमत सिर्फ 21,700 करोड़ रुपये है. यानी यह लागत आधी से भी कम है. यह बचत न केवल सिस्टम की खरीद पर हो रही बल्कि इसमें इस्तेमाल होने वाली मिसाइलें भी काफी सस्ती हैं. यह कुश सिस्टम तीन लेयर वाली इंटरसेप्टर मिसाइलों पर आधारित हैं. इसमें एम-1 मिसाइल की रेंज 150 किमी, एम-2 मिसाइल की रेंज 250 किमी और सबसे भारी एम-3 मिसाइल की रेंज 350 से 400 किमी के बीच है. इन मिसाइलों की कीमत 40 से 50 करोड़ के बीच है जबकि एस-400 की रूसी मिसाइलों की कीमत करीब 100 करोड़ रुपये हैं।  क्यों सस्ता है ये सिस्टम दरअसल, इन मिसाइलों का उत्पादन भारत डायनामिक्स लिमिटेड कर रहा है, जबकि एडवांस मल्टी-फंक्शन कंट्रोल रडार का निर्माण भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड (बीईएल) कर रहा है. ये दोनों कंपनियां डुअल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर्स जैसी उन्नत तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं।  पूर्ण सॉफ्टवेयर और टेक्टिकल स्वतंत्रता रूसी सिस्टम एस-400 में सोर्स कोड लॉक रहता है. इनका उपयोग काफी हद तक विदेशी सप्लायर की मर्जी पर निर्भर करता है. कुश प्रोजेक्ट पूरी तरह स्वदेशी है. ऐसे में एयरफोर्स का मिशन अल्गोरिदम और कोर सॉफ्टवेयर पर पूरा नियंत्रण मिलता है. इससे किसी भी स्थिति में इसमें किल स्विच का खतरा नहीं रहता है. इसमें सबसे बड़ा फायदा यह है कि अगर दुश्मन नई स्टेल्थ टेक्नोलॉजी या इलेक्ट्रॉमिक वारफेयर का इस्तेमाल करता है तो भारत अपना रडार डिटेक्शन और ट्रैकिंग सॉफ्टवेयर तुरंत अपडेट कर सकता है. उदाहरण के तौर पर अगर चीन अपने पांचवीं पीढ़ी के जे-20 या जे-35 फाइटर जेट का इ्स्तेमाल करे तो ये डिफेंस सिस्टम तुरंत अपने रडार डिटेक्शन और ट्रैकिंग सॉफ्टवेयर को अपडेट कर देंगे।  लाइफ साइकल इकोनॉमी इस मामले में भी कुश एस-400 से काफी आगे हैं. दरअसल, लाइफ साइकल इनोनॉमी का मतलब एक सिस्टम को उसकी पूरी उम्र तक ऑपरेट करने में आने वाला खर्च से है. एस-400 और कुश जैसे बेहद आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम 25 से 30 सालों तक अपनी सेवा देते हैं. ऐसे में एस-400 जैसे विदेश प्लेटफॉर्म के मेंटेनेंस, स्पेयर पार्ट्स और अपग्रेड में बहुत पैसे खर्च होंगे. ऐसे में कई भार पार्ट्स उपलब्ध नहीं होने के कारण पूरा सिस्टम ठप हो जाता है. वहीं कुश का पूरा मेंटेनेंस भारत में होगा. इस कारण कुश के ठप होने की संभावना न के बराबर है।  इसके अलावा कुश को इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम के साथ सहजता से इंटीग्रेट किया जा सकता है. इसे नेटा अवाक्स, भविष्य के अवाक्स, तेजस मार्क-2 देसी फाइटर जेट और ग्राउंड रडार के साथ तुरंत डेटा शेयर किया जा सकेगा।  प्रोजेक्ट कुश की रफ्तार भारत ने प्रोजेक्ट कुश को बेहद तेज गति से विकास कर रहा है. इस साल के शुरू में इसके एम1 इंटरसेप्टर का फ्लाइट टेस्ट पूरा हो गया है. रिपोर्ट के मुताबिक एम1, एम2 और एम3 वैरिएंट 2028 से 2030 के बीच सेना को सौंपे जाएंगे. अगर भारत के सिस्टम 100 फीसदी सफल हो जाते हैं तो यह मित्र देश रूस के लिए एक बड़ी चुनौती होगी. भारत का यह सिस्टम काफी सस्ता है. ऐसे में संभावना है कि कम बजट वाले मुल्कों के लिए भारत ने एक शानदार एयर डिफेंस सिस्टम को विकसित किया है। 

रूस करेगा S-400 का अपग्रेड, नई तकनीक से भारत का रक्षा कवच होगा और भी ताकतवर

नई दिल्ली रूस दुनिया का सबसे ताकतवर एयर डिफेंस सिस्टम S-400 ट्रायम्फ को और मजबूत बनाने की योजना बना रहा है. यूक्रेन युद्ध में इस सिस्टम के इस्तेमाल से मिली सीखों को अपनाकर रूस इसे नई चुनौतियों के खिलाफ और प्रभावी बनाने पर काम कर रहा है.  यह अपग्रेड न सिर्फ रूस की सेना के लिए फायदेमंद होगा, बल्कि भारत जैसे खरीदार देशों के लिए भी खुशखबरी है. भारत ने 2018 में 5.43 अरब डॉलर के सौदे में पांच S-400 स्क्वाड्रन खरीदे हैं, जिनमें से तीन पहले ही तैनात हैं. बाकी दो 2026 तक मिलने की उम्मीद है. S-400 क्या है और क्यों खास? S-400 एक मोबाइल सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम है, जो दुश्मन के विमान, मिसाइल, ड्रोन और यहां तक कि हाइपरसोनिक हथियारों को 400 किलोमीटर दूर से नष्ट कर सकता है. यह 600 किलोमीटर तक टारगेट को डिटेक्ट कर सकता है. इसकी खासियत यह है कि यह एक साथ 80 टारगेट ट्रैक कर सकता है. 36 को एक साथ मार गिरा सकता है. भारत में इसे 'सुदर्शन चक्र' नाम दिया गया है. यह सिस्टम अमेरिकी पैट्रियट या इजरायली आयरन डोम से भी ज्यादा एडवांस्ड माना जाता है. रूस का दावा है कि कोई विदेशी सिस्टम अभी तक इसके मुकाबले नहीं टिक पाया. यूक्रेन युद्ध ने कैसे बदला S-400 का खेल? यूक्रेन युद्ध (जिसे रूस 'स्पेशल मिलिट्री ऑपरेशन' कहता है) में S-400 ने कमाल कर दिखाया. रूसी सेना ने इसे अमेरिकी ATACMS मिसाइलों और यूक्रेनी ड्रोन हमलों को रोकने के लिए इस्तेमाल किया. अगस्त 2025 से इसकी प्रभावशीलता में इजाफा हुआ है. नवंबर 2025 में रूसी सीमा पर ATACMS हमलों को सफलतापूर्वक रोका गया. युद्ध ने कमजोरियां भी उजागर कीं. यूक्रेन ने ड्रोन और क्रूज मिसाइलों से कई S-400 रडार और लॉन्चर नष्ट किए, जैसे सितंबर 2025 में क्रीमिया में. इससे रूस को एहसास हुआ कि सिस्टम को जैमिंग और लो-फ्लाइंग थ्रेट्स के खिलाफ मजबूत बनाना जरूरी है. युद्ध से मिली सीखों से S-400 को नई क्षमताएं दी जा रही हैं, जो एयर डिफेंस सिस्टम में आमतौर पर नहीं होतीं. अपग्रेड की क्या डिटेल्स हैं? अल्माज-एंटे ग्रुप के सीईओ यान नोविकोव ने हाल ही में कहा कि तकनीकी क्रांति की रफ्तार से हम नई चुनौतियों का तुरंत जवाब दे सकते हैं. S-400 का अपग्रेड पोटेंशियल इतना बड़ा है कि हम युद्ध के दौरान ही उभरती धमकियों को खत्म कर सकते हैं.   विशेषज्ञों का अनुमान है कि अपग्रेड में ये बदलाव हो सकते हैं…     बेहतर रडार: एंटी-जैमिंग तकनीक मजबूत, ड्रोन और लो-लेवल मिसाइलों को बेहतर डिटेक्ट करने की क्षमता.     नई मिसाइलें: लंबी रेंज वाली 40N6 मिसाइलें, जो 400 किमी से ज्यादा दूर टारगेट मार सकें.     नेटवर्किंग: AWACS (एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम) से बेहतर कनेक्शन, ताकि ज्यादा दुश्मन टारगेट एक साथ हैंडल हो सकें.     मोबिलिटी: सिस्टम को जल्दी मूव करने और छिपाने की सुविधा, ताकि दुश्मन इसे आसानी से निशाना न बना सके. ये बदलाव S-400 को और अजेय बना देंगे. रूस का कहना है कि यह अपग्रेड एक्सपोर्ट के लिए भी फायदेमंद होगा. भारत के लिए क्या मतलब? Operation Sindoor में दिखाया कमाल भारत के लिए यह अपग्रेड किसी तोहफे से कम नहीं. 2018 के सौदे के तहत भारत को पांच स्क्वाड्रन मिलने हैं. तीन आ चुके हैं जो पंजाब, राजस्थान और पूर्वोत्तर सीमाओं पर तैनात हैं. लेकिन मई 2025 में हुए Operation Sindoor ने S-400 की ताकत साबित कर दी.  22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 26 नागरिकों की हत्या के बाद भारत ने पाकिस्तान में आतंकी कैंपों पर मिसाइल हमले किए. चार दिनों (7-10 मई) की इस जंग में S-400 ने चमत्कार किया…     300 किमी दूर पाकिस्तानी JF-17 फाइटर जेट, F-16 और एक AWACS (SAAB-2000 एरेये) विमान को मार गिराया.     पाकिस्तानी ड्रोन और मिसाइलों को 15 भारतीय शहरों पर हमलों से रोका.     लाहौर में चीनी LY-80 सिस्टम और कराची में HQ-9 को नष्ट किया. भारतीय वायुसेना के चीफ एयर मार्शल अमर प्रीत सिंह ने कहा कि यह अब तक का सबसे बड़ा सरफेस-टू-एयर किल रिकॉर्ड है. Operation Sindoor के बाद भारत ने और S-400 खरीदने का फैसला किया. दिसंबर 2025 में PM मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की मुलाकात में पांच और स्क्वाड्रन और 10,000 करोड़ रुपये के मिसाइल डील पर बात होगी.  साथ ही, S-500 (S-400 का अपग्रेड वर्जन) खरीदने की चर्चा भी है. रूस ने आश्वासन दिया है कि यूक्रेन युद्ध के बावजूद बाकी डिलीवरी 2026 तक हो जाएगी. भारत S-400 को Akash, Spyder और MRSAM से जोड़कर लेयर्ड डिफेंस बना रहा है. चुनौतियां और भविष्य S-400 की कीमत और रखरखाव महंगा है. अमेरिका ने CAATSA सैंक्शंस की धमकी दी थी, लेकिन भारत ने इसे नजरअंदाज किया है. यूक्रेन युद्ध ने दिखाया कि कोई सिस्टम परफेक्ट नहीं – यूक्रेन ने कई S-400 नष्ट किए. लेकिन अपग्रेड से यह कमजोरी दूर हो सकती है. विशेषज्ञ कहते हैं कि यह अपग्रेड भारत-पाक और भारत-चीन बॉर्डर पर गेम-चेंजर बनेगा. रूस का दावा है कि S-400 अब असामान्य क्षमताओं वाला हो गया है. अगर भारत को अपग्रेड वर्जन मिला, तो हमारी एयर डिफेंस दुनिया की सबसे मजबूत हो जाएगी.

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का बयान: S-400 खरीद और 50,000 करोड़ का हथियार निर्यात लक्ष्य

नई दिल्ली रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि भारत अपनी सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करेगा और आने वाले समय में रूस से और एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदेगा. इसी साल मई में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एस-400 डिफेंस सिस्टम ने अपनी ताकत दिखाई थी. इस डिफेंस सिस्टम के बदले भारत ने पाकिस्तानी क्षेत्र में सैकड़ों किमी भीतर जाकर उसके लड़ाकू विमानों को मार गिराया था. एस-400 की इस सफलता के बाद से इस डिफेंस सिस्टम की दुनिया में चर्चा होने लगी. भारत ने 2018 में रूस के साथ पांच एस-400 डिफेंस सिस्टम की डील की थी. इसमें से तीन सिस्टम भारत को मिल चुके हैं. इस पुरानी डील के दो सिस्टम की डिलिवरी में यूक्रेन युद्ध के कारण देरी हो रही है. इस बीच भारत ने अपने आसमान को और सुरक्षित बनाने के लिए और एस-400 सिस्टम खरीदने की बात कही है. 50 हजार करोड़ के निर्यात का लक्ष्य  राजनाथ सिंह ने रूस से और एस-400 डिफेंस सिस्टम खरीदने की बात कही. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि भारत आज 25000 करोड़ रुपये का एर्म्स एक्सपोर्ट कर रहा है और उसका लक्ष्य इसको बढ़ाकर 50 हजार करोड़ रुपये करने का है. सिंह ने  कहा कि देसी न्यूक्लियर सबमरीन प्रोजेक्ट में थोड़ा समय लग रहा है लेकिन इसमें बहुत अधिक देरी नहीं हुई है. इसमें हम अच्छी प्रगति कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य आने वाले वक्त में हथियारों को लेकर किसी अन्य देश पर निर्भर रहने की नहीं है. हम आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं. उन्होंने एक अन्य सवाल पर कहा कि थिएटराइजेशन की दिशा में अच्छी प्रगति हो रही है. उन्होंने यह भी कहा कि ऑपरेशन त्रिशूल एक रूटीन एक्सरसाइज है. भारत इस वक्त ऑपरेशन त्रिशूल चला रहा है. नए S-400 पर दिसंबर में डील हो सकती है भारत रूस से कुछ और S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीद सकता है। ऐसे पांच सिस्टम्स की डील पहले ही हुई थी, जिनमें से 3 भारत को मिल चुके हैं। चौथे स्क्वाड्रन की डिलीवरी रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण रुकी हुई है। नई डील इनके अलावा होगी। न्यूज एजेंसी PTI के सोर्स के मुताबिक, दिसंबर में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत दौरे के समय डील पर बातचीत हो सकती है। भारत ने अक्टूबर 2018 में रूस के साथ 5 अरब डॉलर का समझौता किया था। उस समय अमेरिका ने चेतावनी दी थी कि इस सौदे को आगे बढ़ाने पर वह CAATSA कानून के तहत भारत पर पाबंदी लगा सकता है। भारत S-500 मिसाइल सिस्टम खरीदने पर भी विचार कर रहा है। S-400 और S-500 दोनों ही मॉडर्न मिसाइल सिस्टम हैं। इनका इस्तेमाल एयर डिफेंस और दुश्मन के हवाई हमलों से बचने के लिए किया जाता है। एयर चीफ मार्शल बोले थे- भारत जरूरत के हिसाब से सिस्टम खरीदेगा हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने और S-400 खरीदने के सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा था- भारत के पास अभी तीन स्क्वाड्रन इसी ऑपरेशन के साथ S-400 का कॉम्बैट डेब्यू भी हो गया. हलांकि भारत ने रूस से कुल 5 यूनिट्स की डील की थी, लेकिन अब तक केवल तीन स्क्वाड्रन ही भारतीय वायुसेना को मिल पाई हैं. पहली स्क्वाड्रन – दिसंबर 2021 में मिली तो दूसरी स्क्वाड्रन – अप्रैल 2022 में और तीसरी फरवरी 2023 में मिली हैं. ये स्क्वाड्रन क्रमशः आदमपुर (पंजाब), पूर्वी सेक्टर और पश्चिमी सेक्टर में तैनात की गई हैं. सूत्रों के मुताबिक चौथी यूनिट 2026 में और अंतिम पांचवी यूनिट 2027 तक भारत को मिलने की संभावना है. अगर एस-400 की खासियतों की बात करें तो यह 600 किलोमीटर तक दुश्मन की आसमानी गतिविधियों पकड़ने की क्षमता रखता है . साथ ही यह सिस्टम एक साथ 100 से अधिक लक्ष्यों पर नज़र रख सकता है. रूस से और S-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदेगा भारत, ऑपरेशन सिंदूर में पाक को चटाई थी धूल भारत ने 2018 में इस सौदे पर 39,000 करोड़ रुपये खर्च किए थे. अब एस-400 की बची हुई दो स्क्वाड्रन की तैनाती के बाद भारत की वायु रक्षा क्षमता और भी अभेद्य हो जाएगी. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान S-400 ने दिखाई अपनी ताकत एस-400 एक पावरफुल वेपन सिस्टम है, जो दुश्मन के हमने से बचाव कर उसके खिलाफ जवाबी कार्रवाई करते हुए जबरदस्त हमला भी करता है. इस लिहाज से देश के लिये S-400 वेपन सिस्टम काफी जरूरी हो जाता है. भारत ने साल 2018 में चीन और पाकिस्तान की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए रूस से लॉन्ग-रेंज एयर डिफेंस सिस्टम S-400 खरीदने का बड़ा निर्णय लिया था. यह फैसला ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पूरी तरह सही साबित हुआ, जब पाकिस्तान के हवाई हमलों को भारत की एस-400 बैटरी ने आसमान में ही नष्ट कर दिया था. भारत के पास अभी तीन स्क्वाड्रन इसी ऑपरेशन के साथ S-400 का कॉम्बैट डेब्यू भी हो गया. हलांकि भारत ने रूस से कुल 5 यूनिट्स की डील की थी, लेकिन अब तक केवल तीन स्क्वाड्रन ही भारतीय वायुसेना को मिल पाई हैं. पहली स्क्वाड्रन – दिसंबर 2021 में मिली तो दूसरी स्क्वाड्रन – अप्रैल 2022 में और तीसरी फरवरी 2023 में मिली हैं. ये स्क्वाड्रन क्रमशः आदमपुर (पंजाब), पूर्वी सेक्टर और पश्चिमी सेक्टर में तैनात की गई हैं. सूत्रों के मुताबिक चौथी यूनिट 2026 में और अंतिम पांचवी यूनिट 2027 तक भारत को मिलने की संभावना है. अगर एस-400 की खासियतों की बात करें तो यह 600 किलोमीटर तक दुश्मन की आसमानी गतिविधियों पकड़ने की क्षमता रखता है . साथ ही यह सिस्टम एक साथ 100 से अधिक लक्ष्यों पर नज़र रख सकता है. 400 किलोमीटर की दूरी तक वार की क्षमता एस-400 की मदद से 400 किलोमीटर की दूरी से ही दुश्मन के एयर एसैट्स को गिराने की क्षमता रखता है. एस-400 बॉम्बर, फाइटर जेट, ड्रोन, अर्ली वॉर्निंग एयरक्राफ्ट और बैलिस्टिक मिसाइल तक को ध्वस्त कर सकता है . इसमें मल्टी-रेंज मिसाइलें तैनात होती हैं. एस-400 की एक रेजिमेंट में 8 लॉन्च व्हीकल होते है . प्रत्येक में 4 मिसाइल ट्यूब यानी 32 मिसाइलों के साथ-साथ कमांड-एंड-कंट्रोल और एडवांस राडार भी होता है. 2018 में भारत ने 39 हजार करोड़ रुपए में किया था डील भारत ने 2018 में … Read 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अदृश्य ‘अभिमन्यु’ से बढ़ेगी भारत की शक्ति, S-400 और THAAD को झेलना होगा झटका

नई दिल्ली भारतीय नौसेना अपनी कैरियर एयर विंग्स में अनमैन्ड एरियल सिस्टम्स को इंटीग्रेट करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है. बेंगलुरु स्थित न्यूस्पेस रिसर्च एंड टेक्नोलॉजीज (एनआरटी) द्वारा विकसित ‘अभिमन्यु’ ड्रोन इस पहल की अगुवाई कर रहा है. यह ड्रोन नेवल कोलैबोरेटिव कॉम्बैट एयर व्हिकल (एन-सीसीएवी) प्रोग्राम का आधार बन रहा है, जो भारत को वैश्विक ‘लॉयल विंगमैन’ ड्रोन्स की तर्ज पर क्रूड फाइटर एयरक्राफ्ट के साथ तैनाती करने वाला देश बनाने की दिशा में ले जा रहा है. साल 2026 तक उड़ान भरने की योजना वाले इस जेट-पावर्ड स्टील्थ ड्रोन में एआई-ड्रिवन क्षमताएं, मैन्‍ड-अनमैन्ड टीमिंग (एमयूएम-टी) और एयर-टू-एयर किल क्षमता शामिल होगी, जो नौसेना की स्ट्राइक ग्रुप्स को नई ताकत प्रदान करेगी. स्‍टील्‍थ होने की वजह से रडार और एयर डिफेंस सिस्‍टम के लिए इसे कैच कर पाना काफी मुश्किल होगा. दिलचस्‍प बात यह है कि ‘अर्जुन’ नाम से टैंक पहले से ही इंडियन आर्मी में अपनी सेवाएं दे रहा है. अब अभिमन्‍यु की बारी की बारी है. अभिमन्यु एक जेट-पावर्ड, लो रडार क्रॉस-सेक्शन (आरसीएस) ड्रोन है, जो विशेष रूप से भारतीय नौसेना के मौजूदा और भविष्य के कैरियर-बेस्ड फाइटर्स जैसे मिग-29K और आने वाले राफेल-M के साथ लॉयल विंगमैन के रूप में काम करने के लिए डिजाइन किया गया है. इसका डिजाइन स्वेप्ट विंग्स, हॉरिजॉन्टल स्टेबलाइजर्स, सिंगल वर्टिकल टेल और रियर फ्यूजलाज के दोनों तरफ ट्विन नैरो एयर इंटेक्स से युक्त है. एक खास फीचर है फ्यूजलाज के चारों ओर लपेटी गई कंटीन्यूअस चाइन-लाइन, जो रडार रिफ्लेक्शन्स को कम करके कंटेस्टेड एनवायरनमेंट्स में सर्वाइवेबिलिटी बढ़ाती है. हालांकि, अभिमन्यु में कई स्टील्थ-इंस्पायर्ड फीचर्स हैं, लेकिन यह पूरी तरह लो-ऑब्जर्वेबल प्लेटफॉर्म नहीं है. इसका कॉन्फिगरेशन रडार सिग्नेचर को कम करने और कॉस्ट-इफेक्टिवनेस के बीच संतुलन बनाता है. महंगे इंटरनेशनल समकक्षों की तुलना में यह रैपिड प्रोडक्शन और एक्सपेंडेबिलिटी पर फोकस करता है. एआई-ड्रिवन सिस्टम्स इसे ऑटोनॉमस ऑपरेशन्स के लिए सक्षम बनाते हैं, जबकि एयर-टू-एयर किल क्षमता इसे दुश्मन एयरक्राफ्ट को न्यूट्रलाइज करने में सक्षम बनाएगी. एमयूएम-टी कॉन्फिगरेशन में यह क्रूड पायलट्स के साथ टीम बनाकर काम करेगा, सेंसर रीच बढ़ाएगा और सिचुएशनल अवेयरनेस प्रदान करेगा. ऑपरेशनल रोल और स्ट्रैटेजिक विजन एन-सीसीएवी कार्यक्रम के तहत अभिमन्यु ड्रोन्स भारतीय नौसेना के फाइटर्स के साथ एमयूएम-टी में उड़ान भरेंगे. ये ड्रोन्स कैरियर स्ट्राइक ग्रुप्स की सेंसर रीच बढ़ाएंगे, सिचुएशनल अवेयरनेस को मजबूत करेंगे और कैरियर-बेस्ड तथा ऑनशोर ऑपरेशन्स में टैक्टिकल फ्लेक्सिबिलिटी प्रदान करेंगे. हाई-रिस्क या कॉम्प्लेक्स मिशन्स को संभालकर ये ह्यूमन पायलट्स के एक्सपोजर को कम करेंगे और कैरियर एयर विंग्स की ऑफेंसिव-डिफेंसिव क्षमताओं को बढ़ाएंगे. नौसेना एक फ्लीट ऑफ अभिमन्यु ड्रोन्स को विभिन्न क्षमताओं के साथ तैनात करने की योजना बना रही है, जो इटरेटिव डेवलपमेंट साइकिल्स से हासिल होगी. ‘इंडिया डिफेंस न्‍यूज’ की रिपोर्ट के अनुसार, इससे सर्विलांस, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, स्ट्राइक और स्वार्मिंग मिशन्स के लिए स्पेशलाइज्ड वैरिएंट्स उभर सकते हैं. यह वर्तमान और भविष्य की नौसेना ऑपरेशन्स को सपोर्ट करेगा, खासकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती चुनौतियों के मद्देनजर. अभिमन्यु न केवल फोर्स मल्टीप्लायर बनेगा, बल्कि स्वदेशी ड्रोन टेक्नोलॉजी में आगे की नींव रखेगा. इंडियन नेवी को और मजबूत बनाने की तैयारी है.  डेवलपमेंट स्टेटस और फंडिंग अभिमन्यु प्रोजेक्ट को रक्षा मंत्रालय की इनोवेशन्स फॉर डिफेंस एक्सीलेंस (आईडीईएक्स) पहल से आंशिक फंडिंग मिल रही है. साथ ही एनआरटी से इंटरनल फंडिंग भी की जा रही है. आईडीईएक्स के तहत वर्तमान फंडिंग सीलिंग करीब 2.85 मिलियन डॉलर है, लेकिन ऑपरेशनल स्टेटस और फ्यूचर वैरिएंट्स के लिए काफी अधिक निवेश की जरूरत होगी. भारतीय नौसेना ने एन-सीसीएवी के ऑपरेशनल रेडीनेस पर पहुंचने पर मिनिमम परचेज क्वांटिटी की प्रतिबद्धता जताई है, जो प्रोडक्शन और डिप्लॉयमेंट के लिए बेसलाइन सुनिश्चित करेगी. 2026 तक पहली उड़ान का लक्ष्य रखा गया है, जो प्रोजेक्ट की तेज गति को दर्शाता है. अभिमन्यु भारतीय वायुसेना के कॉम्बैट एयर टीमिंग सिस्टम (सीएटीएस) प्रोग्राम के लिए विकसित एचएएल वॉरियर से काफी छोटा और हल्का है. वॉरियर जहां हाई परफॉर्मेंस और ग्रेटर पेलोड कैपेसिटी पर जोर देता है, वहीं अभिमन्यु की ताकत मॉड्यूलैरिटी, कॉस्ट-इफेक्टिवनेस और लार्ज-स्केल डिप्लॉयमेंट में है. इंटरनेशनल स्तर पर यह चीन के जीजे-11 शार्प स्वॉर्ड या यूएस नेवी के एक्सपेंडेबल कोलैबोरेटिव कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (सीसीए) ड्रोन्स की तुलना में लोअर-एंड सॉल्यूशन है. फिर भी, यह भारत की जरूरतों के अनुरूप प्रैग्मैटिक अप्रोच अपनाता है, जहां अफोर्डेबिलिटी और रैपिड इटरेशन प्राथमिकता हैं. चुनौतियां भी कम नहीं मोमेंटम के बावजूद प्रोग्राम कई चुनौतियों का सामना कर रहा है. कैरियर एविएशन के डिमांडिंग एनवायरनमेंट में रिलायबल ऑटोनॉमस ऑपरेशन हासिल करना प्रमुख है. हाई-स्पीड, हाई-ऑल्टीट्यूड क्रूड फाइटर्स और अभिमन्यु के बीच परफॉर्मेंस गैप को ब्रिज करना भी जरूरी. इसके अलावा, सस्टेन्ड फंडिंग सुनिश्चित करना और भारत की ऐतिहासिक डिफेंस प्रोक्योरमेंट डिले को पार करना चुनौतीपूर्ण रहेगा. फिर भी अभिमन्यु प्रोजेक्ट भारतीय नौसेना एविएशन के लिए पिवोटल स्टेप है. यह अनमैन्ड सिस्टम्स को फ्यूचर कॉम्बैट ऑपरेशन्स में इंटीग्रेट करने की नौसेना की कमिटमेंट को सिग्नल करता है. सफल होने पर एन-सीसीएवी प्रोग्राम नौसेना की ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी, सर्वाइवेबिलिटी और स्ट्राइक कैपेबिलिटी को काफी बढ़ाएगा. साथ ही, यह स्वदेशी ड्रोन टेक्नोलॉजी में आगे की एडवांसमेंट्स की नींव बनेगा.

भारत रूस के साथ कर रहा 10,000 करोड़ की बड़ी रक्षा डील, S-400 की कामयाबी के बाद

नई दिल्ली भारत और रूस के बीच S-400 को लेकर जारी डील को और मजबूती देने की तैयारी चल रही है। इसके लिए करीब 10,000 करोड़ मूल्य के एक बड़े शस्त्र पैकेज की खरीद को लेकर काम चल रहा है। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि यह कदम वायु रक्षा क्षमता को और मजबूती देने के उद्देश्य से उठाया जा रहा है। इस संबंध में रूस के साथ बातचीत चल रही है। सैन्य सूत्रों ने दावा किया है कि भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान भारतीय वायुसेना के S-400 प्रणाली ने पाकिस्तान को परास्त करने में अहम भूमिका निभाई। उसी दौरान पाकिस्तान की 5-6 लड़ाकू विमान व एक जासूसी विमान को 300 किमी से अधिक दूरी पर ही मार गिराने में मदद मिली। अधिकारियों ने S-400 को भारत की वायु रक्षा रणनीति में गेम चेंजर बताया है। रक्षा मंत्रालय जल्द ही इस खरीद प्रस्ताव को मंजूरी के लिये डिफेंस अक्विजिशन काउंसिल (DAC) की बैठक में पेश करने की संभावना रहेगी, जिसकी अगली बैठक 23 अक्तूबर को प्रस्तावित है। सूत्रों का कहना है कि जरूरतों के मद्देनजर मिसाइलों की खरीद बड़ी संख्या में की जाने की योजना है। 2018 में रूस के साथ हुए समझौते के तहत कुल 5 स्क्वाड्रन S-400 प्राप्त करने पर सहमति बनी थीस जिनमें से तीन स्क्वाड्रन अब डिलीवर कर संचालित किए जा चुके हैं। चौथे स्क्वाड्रन की डिलीवरी रूस-युक्रेन युद्ध के प्रभाव से धीमी पड़ी थी। दोनों पक्षों के बीच आगे और S-400 तथा उन्नत S-500 प्रणालियों को शामिल करने पर भी विचार-विमर्श जारी है। इसके साथ ही भारतीय वायुसेना रूसी निर्मित बीयॉन्ड-विजुअल-रेंज (BVR) एयर-टू-एयर मिसाइलों की खरीद तथा ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और उसके विविध वेरिएंटों को और मजबूत करने के विकल्पों को भी परख रही है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इन कदमों से भारत और मजबूत होगा। रक्षा मंत्रालय ने आधिकारिक रूप से अभी तक किसी खरीद अनुबंध की पुष्टि नहीं की है; हालांकि बातचीत और आवश्यक तकनीकी, वित्तीय पहलुओं पर दोनों पक्ष सक्रिय हैं। रक्षा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि सीमाओं पर बदलते खतरों और तकनीकी गतिशीलता को देखते हुए देश की वायु रक्षा प्रणालियों का विस्तार आवश्यक बना हुआ है।

भारत में एस-400 का निर्माण शुरू, चीन-पाक के लिए चिंता की खबर, 10 रूसी रक्षा कवच से बढ़ेगी ताकत

नई दिल्ली पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर के दौरान S-400 ने पूरी दुनिया को अपना लोहा मनवाया. इस रूसी एयर डिफेंस सिस्टम ने भारतीय सेना को अपना कायल बना दिया है. एस-400 ने ऑपरेशन सिंदूर में न केवल दुश्मन पर हमले में अपनी ताकत दिखाई, बल्कि पाकिस्तान की हवाई हमले की क्षमता को भी पंगु कर दिया था. यहीं वजह से भारत अब रूस से 5 और एस-400 खरीदने की तैयारी कर रहा है. भारत ने रूस के साथ 2018 में ही पांच एस-400 सिस्टम के लिए 5.43 अरब डॉलर की डील की थी. इसके तहत अगले साल के अंत तक दो S-400 की सप्लाई होनी है. इसके साथ ही अब पांच और एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने पर बातचीत चल रही है. रक्षा मंत्रालय के शीर्ष अधिकारी इसके लेकर इस हफ्ते रूसी अधिकारियों से मुलाकात करने वाले हैं. इस मुलाकात में इस रूसी रक्षा कवच को मिलकर बनाने पर चर्चा किया जाएगा. माना जा रहा है कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की 5 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ होने वाली वार्षिक शिखर वार्ता से पहले इस सौदे को हरी झंडी मिल सकती है. भारत में भी बनेंगे S-400 हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के मुताबिक, भारत और रूस के बीच अतिरिक्त पांच सिस्टम की कीमत पर सहमति बन चुकी है. दोनों देश के बीच अब इस पर बातचीत चल रही है कि इनमें से तीन सिस्टम सीधे खरीदे जाएंगे और बाकी के दो S-400 टेक्नॉलजी ट्रांसफर के तहत निर्मित होंगे. यह सौदा सरकार-से-सरकार के बीच होगा और रखरखाव, मरम्मत और ओवरहॉल सुविधाएं भारतीय प्राइवेट सेक्टर की मदद से स्थापित की जाएंगी. Su-30 में लगेगा घातक हथियार वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह ने रूस की पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान Su-57 को लेने पर विचार की बात कही थी. हालांकि सरकार ने अब तक न Su-57 और न अमेरिकी F-35 लड़ाकू विमान को लेकर कोई निर्णय लिया है. उधर खबर है कि भारत रूस से 200 KM से अधिक रेंज वाली एयर-टू-एयर मिसाइल आरवीवी-बीडी (R-37) भी हासिल करना चाहता है, जिससे Su-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों की मारक क्षमता बढ़ाई जा सके. पाकिस्तान पहले ही चीन निर्मित 200 किमी रेंज वाली PL-15 मिसाइल का इस्तेमाल कर रहा है और इसे ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान भारत के खिलाफ भी तैनात किया था. R-37 मिसाइल को Su-30 एमकेआई में एकीकृत करने के लिए उसके ऑनबोर्ड रडार को अपग्रेड करना होगा. S-400 का ऑपरेशन सिंदूर में कमाल बता दें कि ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान एस-400 ट्रायम्फ सिस्टम ने पाकिस्तान के खिलाफ अपनी जबरदस्त क्षमता साबित की थी. पाकिस्तान ने 7 मई के हमले के बाद आदमपुर और भुज एयरबेस पर तैनात एस-400 को निशाना बनाने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हो पाया. इसके बाद 10 मई तक पाकिस्तान को अपने सभी एयर एसेट्स को भारतीय सीमा से 300 किमी दूर ले जाना पड़ा और मुश्किल से ही कोई विमान उड़ान भर सका. एस-400 की लंबी दूरी की मिसाइलों ने पाकिस्तान के एक विमान को पंजाब में 314 किमी की दूरी पर मार गिराया था और उत्तर में एफ-16 व जेएफ-17 लड़ाकू विमानों को भी ढेर किया था.  

S-400 की ढाल और Su-57 का वार… भारत का घातक कॉम्बो पाकिस्तान पर पड़ेगा भारी

नई दिल्ली भारतीय वायुसेना (IAF) अपनी ताकत को और मजबूत करने की योजना बना रही है. अगर रूस के साथ चल रही Su-57E स्टील्थ फाइटर जेट की बातचीत सफल होती है, तो यह S-400 ट्रायम्फ एयर डिफेंस सिस्टम के साथ मिलकर दक्षिण एशिया में सबसे खतरनाक जोड़ी बन सकता है. यह जोड़ा पाकिस्तान वायुसेना (PAF) के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है.  S-400: भारत का आसमानी कवच भारत ने रूस से 5 S-400 ट्रायम्फ सिस्टम खरीदे हैं, जिनमें से तीन 2025 तक तैनात हो चुके हैं. यह सिस्टम 400 किलोमीटर की दूरी तक हवाई हमलों को रोक सकता है. यह विमान, ड्रोन, क्रूज मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइल को ट्रैक और नष्ट कर सकता है. इसकी खासियत है…     लंबी रेंज: 600 किमी तक दुश्मन के विमान-मिसाइल को देख सकता है. 400 किमी तक नष्ट कर सकता है.     मल्टी-टारगेट: एक साथ 300 टारगेट ट्रैक और 36 को नष्ट कर सकता है.     मोबाइल सिस्टम: इसे फटाफट एक जगह से दूसरी पर ले जाया जा सकता है, जिससे दुश्मन के लिए निशाना बनाना मुश्किल है.  भारत ने इसे पाकिस्तान और चीन की सीमाओं पर तैनात किया है, जैसे पंजाब, राजस्थान और गुजरात में. इससे पाकिस्तान के F-16, JF-17 और नए J-10CE विमान भारतीय सीमा में घुसने से पहले ही पकड़े और नष्ट किए जा सकते हैं. S-400 को भारत में सुदर्शन चक्र नाम दिया गया है, जो इसका दमदार प्रभाव दर्शाता है.  Su-57E: भारत का स्टील्थ तलवार Su-57E रूस का पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट है. अगर भारत इसे खरीदता है, तो यह IAF का सबसे ताकतवर हथियार बन सकता है. इसकी खासियतें…     स्टील्थ टेक्नोलॉजी: इसका रडार क्रॉस-सेक्शन कम है, यानी दुश्मन के रडार इसे आसानी से नहीं पकड़ सकते.     लंबी रेंज हथियार: यह हवा से हवा और हवा से जमीन पर मार करने वाली मिसाइल ले जा सकता है.     सुपर मैन्यूवरेबिलिटी: यह तेज और चुस्त है, जिससे युद्ध में बेहतर प्रदर्शन करता है.     एडवांस सेंसर: इसके सेंसर और नेटवर्क-सेंट्रिक सिस्टम IAF के अन्य हथियारों के साथ मिलकर काम कर सकते हैं. Su-57E दुश्मन के इलाके में घुसकर हमला कर सकता है, बिना पकड़े गए. यह पाकिस्तान के रडार और डिफेंस सिस्टम को चकमा दे सकता है. S-400 और Su-57E का जोड़ा क्यों है खतरनाक? S-400 और Su-57E मिलकर भारत को डिफेंस और ऑफेंस में बेजोड़ ताकत देते हैं. इसे इस तरह समझें… S-400: आसमानी ढाल S-400 भारत के आसमान को दुश्मन के विमान, ड्रोन और मिसाइल से बचाता है. यह पाकिस्तान के विमानों को भारतीय सीमा के पास आने से पहले ही नष्ट कर सकता है. इसकी रेंज इतनी है कि पाकिस्तान के कई एयरबेस इसके निशाने पर हैं. सरगोधा और कामरा जैसे बेस से उड़ान भरते ही PAF के विमान पकड़े जा सकते हैं. Su-57E: हमलावर कटार Su-57E स्टील्थ होने से पाकिस्तान के रडार से बचकर उनके इलाके में घुस सकता है. यह PAF के विमान, बेस या अन्य टारगेट पर सटीक हमला कर सकता है. इसके हथियार लंबी दूरी तक मार कर सकते हैं, जिससे PAF जवाब देने से पहले ही नुकसान उठाए. PAF की रणनीति बेकार पाकिस्तान अक्सर अपने JF-17 और J-10CE विमानों की संख्या बढ़ाकर IAF की तकनीकी बढ़त को कम करने की कोशिश करता है. लेकिन S-400 की लंबी रेंज और Su-57E की स्टील्थ क्षमता के सामने यह रणनीति फेल हो सकती है. PAF के विमान न तो भारत में घुस पाएंगे और न ही अपने बेस पर सुरक्षित रहेंगे. मनोवैज्ञानिक दबाव युद्ध में तकनीक के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण है. S-400 और Su-57E की मौजूदगी से PAF का आत्मविश्वास कमजोर हो सकता है. उन्हें पता होगा कि भारत का डिफेंस सिस्टम उनके हर हमले को रोक सकता है. Su-57E उनके बेस पर चुपके से हमला कर सकता है. इससे उनकी रणनीति सीमित हो जाएगी. पाकिस्तान के लिए चुनौती पाकिस्तान के पास अभी F-16, JF-17 और J-10CE जैसे विमान हैं, लेकिन ये S-400 की रडार रेंज और Su-57E की स्टील्थ क्षमता के सामने कमजोर पड़ते हैं. पाकिस्तान के पास चीनी HQ-9 डिफेंस सिस्टम है, जिसकी रेंज 250 किमी है, लेकिन यह S-400 से कमजोर है.  भारत की रणनीति IAF अपनी रणनीति को लेयर्ड डिफेंस (कई परतों वाला रक्षा तंत्र) पर बना रही है. S-400 के साथ भारत के पास अकाश, बराक-8 और स्पाइडर जैसे सिस्टम भी हैं. Su-57E के आने से IAF को स्टील्थ हमले की ताकत मिलेगी. भारत की स्वदेशी नेत्रा AEW&C और अकाशतीर सिस्टम S-400 और Su-57E के साथ मिलकर एक मजबूत नेटवर्क बनाएंगे. यह नेटवर्क दुश्मन के हर हमले को रोक सकता है. जवाबी हमला कर सकता है.

रूस का संकेत: भारत को अतिरिक्त S-400 डिफेंस सिस्टम की सप्लाई होगी तेज

नई दिल्ली भारत और रूस के रिश्ते लगातार मजबूत होते जा रहे हैं. दोनों देशों के संबंधों में मजबूती का एक और प्रमाण है हथियारों की डील. ऐसे में रूस और भारत S-400 मिसाइल सिस्टम की सप्लाई बढ़ाने पर बातचीत कर रहे हैं.रूस के डिफेंस एक्सपोर्ट अधिकारी के मुताबिक, भारत और रूस के बीच सतह से हवा में मार करने वाली S-400 मिसाइल सिस्टम की अतिरिक्त सप्लाई के लिए बातचीत जारी है. रूस के मिलिट्री विभाग के एक बड़े अधिकारी दिमित्री शुगायेव का कहना है कि भारत के पास पहले से ही S-400 मिसाइल सिस्टम है और इसकी नई खेप के लिए बातचीत जारी है. दरअसल भारत ने पांच S-400 Triumf सिस्टम के लिए 2018 में रूस के साथ 5.5 अरब डॉलर के एग्रीमेंट पर साइन किया था. चीन की लगातार बढ़ती जा रही सैन्य शक्ति का मुकाबला करने के लिए भारत ने रूस के साथ यह एग्रीमेंट किया था. हालांकि, हथियारों की इस सप्लाई में देरी हुई. इस डील के तहत आखिरी दो यूनिट 2026 और 2027 तक मिलेगी.  बता दें कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के हर हमले को भारत के S-400 डिफेंस सिस्टम ने बखूबी ध्वस्त किया था. एयर डिफेंस में मजबूत साझेदारी S-400 ट्रायम्फ एयर डिफेंस सिस्टम रूस की सबसे उन्नत तकनीक है. इसकी रेंज 400 किलोमीटर है जो 36 लक्ष्यों को एक साथ नष्ट कर सकती है. साथ ही विमान, मिसाइल और ड्रोन से बचाव करती है.  S-400 मिसाइल सिस्टम भारत की हवाई सुरक्षा के लिए गेम चेंजर साबित हो रहा है. यह मिसाइल सिस्टम 80 लक्ष्यों को एक साथ ट्रैक और निशाना बना सकता है, जो इसे दुश्मन के लिए खतरनाक बनाता है. ऑपरेशन सिंदूर में इसकी सफलता ने भारत को क्षेत्र में हवाई वर्चस्व बनाए रखने में मदद की है.  भारत ने 2021 से पंजाब, राजस्थान और पूर्वोत्तर में S-400 को तैनात किया है. यह डील अमेरिका के दबाव के बावजूद भारत और रूस की रणनीतिक साझेदारी को दिखाती है.