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दिग्विजय सिंह के RSS वाले बयान पर थरूर साथ, बोले— संगठन की ताकत को नकारा नहीं जा सकता

नई दिल्ली  कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह इन दिनों संघ और भाजपा के संगठन पर दिए बयान के बाद चर्चा में बने हुए हैं। कांग्रेस पार्टी में ही कई लोग उनके इस बयान पर सवाल उठा रहे हैं। हालांकि इसी बीच केरल से कांग्रेस सांसद शशि थरूर अपने साथी के समर्थन में आगे आए हैं। थरूर ने कहा कि किसी भी पार्टी में अनुशासन जरूरी होता है। इस मामले में कांग्रेस का इतिहास 140 साल पीछे जाता है, हम इससे बहुत कुछ सीख सकते हैं।   थरूर ने कहा, "हमारी पार्टी का 140 साल पुराना इतिहास है। हम इससे बहुत कुछ सीख सकते हैं। किसी भी पार्टी में अनुशासन बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। मैं भी चाहता हूं कि हमारा संगठन मजबूत हो, हमारे संगठन में अनुशासन होना चाहिए, दिग्विजय सिंह इस मामले में खुलकर अपनी बात कह सकते हैं।" थरूर ने अपनी बात को आगे रखते हुए कहा कि कांग्रेस में सभी का लक्ष्य अपने संगठन को मजबूत करना ही होना चाहिए। कांग्रेस के भीतर सुधार की जरूरत पर बयान देकर विवादों में आए मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री के तर्क का थरूर ने समर्थन किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान राजनीतिक चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए कांग्रेस को पार्टी को आतंरिक अनुशासन और संगठन की मजबूती पर ध्यान देना चाहिए। मीडिया से बात कर रहे थरूर से जब पूछा गया कि क्या इस मामले में उन्होंने दिग्विजय सिंह से बात की है। इस पर उन्होंने कहा कि उनके बीच बातचीत होना स्वाभाविक है। थरूर ने कहा, "हम दोस्त हैं और बातचीत होती रहती है। संगठन को मजबूत किया जाना चाहिए, इसमें कोई विवाद वाली बात नहीं है और न ही कोई सवाल है।" क्या है विवाद? मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अक्सर अपने बयानों को लेकर चर्चा में बने रहते हैं। आम तौर पर उनके इन बयानों के निशाने पर भाजपा होती है, लेकिन इस बार उन्होंने भाजपा और संघ की तारीफ की। शनिवार को उन्होंने 1995 में प्रधानमंत्री मोदी की एक तस्वीर साझा कि, जिसमें पीएम तत्तकालीन भाजपा नेताओं के आगे जमीन पर बैठे हैं। इसके साथ दिग्विजय सिंह ने लिखा कि यहां से कांग्रेस सीख सकती है कि संघ और भाजपा किस तरह से जमीनी स्तर के कार्यकर्ता को भी शीर्ष पदों पर पहुंचने का अवसर देती है। दिग्विजय सिंह की इस पोस्ट के बाद विवाद बढ़ गया। इसके बाद उन्होंने अपनी सफाई दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह भाजपा और संघ के कट्टर विरोधी बने हुए हैं। हालांकि इसके बाद भी पार्टी की तरफ से लगातार उन पर परोक्ष हमले होते रहे। दरअसल, कांग्रेस पार्टी के भीतर कई बार नेताओं ने दरकिनार किए जाने के आरोप लगाए हैं। कई वरिष्ठ नेताओं ने भी इस तरह की शिकायत की है कि नेतृत्व संगठन की मजबूती पर ध्यान नहीं दे रहा है। इतना ही नहीं इसी तरह के आरोपों के चलते कई बड़े नेता कांग्रेस छोड़कर दूसरे दलों में भी शामिल हो गए हैं।  

बीमारी और इंतजार के बाद सक्रिय, शशि थरूर ने CWC मीटिंग में दिखाई तेज़ी

नई दिल्ली कांग्रेस की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) की शनिवार को बैठक हो रही है. इंदिरा भवन में हो रही इस बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, केसी वेणुगोपाल सहित पार्टी के कई वरिष्ठ नेता शरीक हुए हैं. इस बैठक में शामिल होने के लिए शशि थरूर भी पहुंचे. पार्टी की कई अहम बैठकों से नदारद रहने के बाद थरूर का इस बैठक में पहुंचना खासा चर्चा में है. थरूर यहां भागकर कांग्रेस मुख्यालय यानी इंदिरा भवन में दाखिल होते दिखे. सीडब्लूसी की बैठक में कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी शामिल हो रहे हैं. तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी, कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू कांग्रेस मुख्यालय पहुंच चुके हैं. इसके अलावा पार्टी के वरिष्ठ नेता दीपेंद्र सिंह हुड्डा, दिग्विजय सिंह, गौरव गोगोई, कुमारी सैलजा, सचिन पायलट, वीरप्पा मोइली, चरणजीत सिंह चन्नी और अभिषेक मनुसिंघवी भी सीडब्लूसी बैठक में शामिल होने पहुंचे हैं. कांग्रेस की बैठक से कब-कब दूर रहे थरूर? इसी महीने कांग्रेस के लोकसभा सांसदों की अहम बैठक हुई थी, जिसकी अध्यक्षता राहुल गांधी ने की थी. इस बैठक में संसद के शीतकालीन सत्र से पहले पार्टी की रणनीति पर चर्चा की गई थी. हालांकि शशि थरूर इसमें शामिल नहीं हुए थे. बाद में थरूर ने सफाई देते हुए कहा था कि वे निजी कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के चलते कोलकाता में थे, जिस वजह से बैठक में शामिल नहीं हो सके. कभी बीमार, कभी बिजी थे थरूर? इसके बाद 30 नवंबर को कांग्रेस की एक और अहम रणनीतिक बैठक बुलाई गई, जिसकी अध्यक्षता सोनिया गांधी ने की थी. इस बैठक का मकसद पार्टी की समग्र रणनीति और राजनीतिक दिशा पर मंथन करना था. इस बैठक में भी शशि थरूर अनुपस्थित रहे. थरूर की ओर से बताया गया कि वे उस समय केरल से उड़ान पर थे, और इसी कारण समय पर बैठक में नहीं पहुंच पाए. इससे पहले 18 नवंबर SIR वोटर री-वेरिफिकेशन जैसे मुद्दे पर कांग्रेस नेतृत्व की एक अहम बैठक हुई थी. इस बैठक में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे, लेकिन शशि थरूर इसमें भी शामिल नहीं हो सके. इस बार उनकी गैरहाजिरी की वजह स्वास्थ्य कारण बताई गई थी. फिर चर्चा में थरूर का बयान इस बीच शशि थरूर एक बयान खूब चर्चा में है. उन्होंने इंडिया टुडे से बातचीत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन करते हुए कहा कि विदेश नीति भाजपा या कांग्रेस नहीं, बल्कि भारत की होती है. अगर प्रधानमंत्री हारते हैं, तो यह पूरे देश की हार है और पीएम मोदी की हार का जश्न मनाना भी भारत की हार का जश्न मनाने जैसा ही है. थरूर ने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के शब्दों को दोहराते हुए कहा, ‘अगर भारत मर गया, तो फिर कौन जिंदा रहेगा?’ CWC की बैठक में किन-किन मुद्दों पर चर्चा यह बैठक ऐसे समय हो रही है, जब केंद्र सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को खत्म कर उसकी जगह विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) यानी ‘जी राम जी’ कानून लागू किया है. हाल ही में संसद के शीतकालीन सत्र में यह विधेयक पारित हुआ और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी भी मिल चुकी है. कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इस नए कानून पर कड़ा ऐतराज जताया है. पार्टी का आरोप है कि मनरेगा से महात्मा गांधी का नाम हटाना न सिर्फ गांधी जी का अपमान है, बल्कि ग्रामीण गरीबों के अधिकारों पर भी सीधा हमला है. जी राम जी कानून पर क्या आपत्ति? इस नए कानून के तहत हर ग्रामीण परिवार को एक वित्तीय वर्ष में 125 दिन के रोजगार की कानूनी गारंटी दी गई है, लेकिन इसमें केंद्र और राज्यों के बीच 60:40 के फंडिंग अनुपात का प्रावधान किया गया है. कांग्रेस का कहना है कि इससे राज्यों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा और योजना की मूल भावना कमजोर होगी. CWC बैठक में मनरेगा के मुद्दे पर सरकार के खिलाफ रणनीति को अंतिम रूप दिए जाने की संभावना है. इसके अलावा मौजूदा राजनीतिक हालात और संगठनात्मक मुद्दों पर भी चर्चा होगी. बिहार में हार के बाद CWC की पहली बैठक यह बिहार चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस वर्किंग कमेटी की पहली बैठक है. ऐसे में आत्ममंथन और आगे की रणनीति पर भी गंभीर चर्चा होने की उम्मीद है. यह बैठक अगले साल होने वाले असम, केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी विधानसभा चुनावों के लिहाज से भी अहम मानी जा रही है. पार्टी इन राज्यों में अपनी सियासी दिशा और चुनावी रणनीति को लेकर भी मंथन कर सकती है.  

संसद में गरजे शशि थरूर: राम के नाम पर राजनीति बंद हो, कांग्रेस लाइन में लौटे नेता

नई दिल्ली लोकसभा में मनरेगा का नाम बदलने समेत कई प्रावधानों में फेरबदल वाले विधेयक को पेश किया गया है। इस विधेयक में मनरेगा को अब 'विकसित भारत- जी राम जी' योजना नाम देने की तैयारी है। इसे लेकर संसद में दिलचस्प बहस देखने को मिली है। कांग्रेस की ओर से सांसद प्रियंका गांधी ने तीखा विरोध किया तो वहीं उनके बाद बोलने खड़े हुए शशि थरूर ने भी लंबे समय बाद पार्टी के सुर में सुर मिलाया। उन्होंने कहा कि मैं मनरेगा स्कीम से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का नाम बदलने के खिलाफ हूं। उन कारणों पर मैं विस्तार से नहीं जाऊंगा क्योंकि पूर्व के वक्ताओं ने उस पर काफी बोला है।   शशि थरूर ने कहा कि मैं जी राम जी विधेयक का विरोध करता हूं। मेरी पहली शिकायत यह है कि इसका नाम बदला जा रहा है, जो पहले महात्मा गांधी के ऊपर था। महात्मा गांधी का राम राज्य का विजन राजनीतिक आयोजन नहीं था बल्कि सामाजिक सुधार था। वह चाहते थे कि हर गांव सशक्त हो और राम राज्य जैसी स्थिति बने। उनके नाम को हटाना गलत है और नैतिकता के खिलाफ है। मेरे बचपन में गाते थे- देखो ओ दिवानों ये काम ना करो, राम का नाम बदनाम ना करो। तिरुअनंतपुरम से कांग्रेस के सांसद ने कहा कि इसके अलावा 40 फीसदी बजट सीधे राज्य सरकार के हिस्से में डालना भी गलत है। इससे उन राज्यों के लिए संकट की स्थिति पैदा होगी, जिनके पास राजस्व का संग्रह कम है। ऐसे राज्य जो पहले ही किसी तरह की मदद पर निर्भर हैं, आखिर वे कैसे इस स्कीम के लिए फंडिंग कर पाएंगे। कांग्रेस सांसद का पार्टी के स्टैंड से मिलता हुआ यह रुख लंबे समय बाद देखने को मिला है। वह कई बार पीएम नरेंद्र मोदी की तारीफ कर चुके हैं। इसके अलावा कांग्रेस की लगातार तीन मीटिंगों से गैरहाजिर रहे हैं। ऐसे में उनके भविष्य को लेकर कयास लगते रहे हैं। इसलिए जब वह संसद में इस पर बोलने खड़े हुए और कांग्रेस का समर्थन किया तो यह महत्वपूर्ण था। उन्होंने साफ कर दिया कि वह वैचारिक तौर पर अब भी अडिग हैं।  

थरूर का मीटिंग से लगातार तीसरी बार दूरी—तिवारी की गैरहाज़िरी ने बढ़ाई पार्टी की चिंता

नई दिल्ली  कांग्रेस के साथ खराब रिश्तों के दौर से गुजर रहे शशि थरूर ने लगातार तीसरी बार पार्टी की मीटिंग छोड़ दी है। शुक्रवार को कांग्रेस के लोकसभा सांसदों की मीटिंग थी, जिसमें वह नहीं पहुंचे। यह लगातार तीसरा मौका है, जब शशि थरूर ने पार्टी की बैठक छोड़ दी है। शशि थरूर ने कई बार पीएम नरेंद्र मोदी की तारीफ की है। माना जा रहा है कि इसके चलते ही उन्हें लेकर कांग्रेस में असहजता की स्थिति है। इस बीच उनका लगातार कांग्रेस की बैठकों से दूर रहना आशंकाओं को बढ़ावा दे रहा है। शीत सत्र का 19 दिसंबर को समापन होना है और उससे पहले राहुल गांधी ने कांग्रेस के सभी 99 लोकसभा सांसदों की मीटिंग बुलाई थी। इस मीटिंग में यह तय होना था कि कैसे शीत सत्र के आगामी दिनों में सत्ता पक्ष को घेरा जाए। इस मीटिंग में शशि थरूर नहीं पहुंचे। इस बीच शशि थरूर के एक्स पर गुरुवार को कोलकाता में रहने की जानकारी दी गई थी। उन्होंने लिखा था कि लंबे समय तक मेरे सहयोगी रहे जॉन कोशी की कोलकाता में शादी है। इसके अलावा मेरी बहन स्मिता थरूर का जन्मदिन भी है। इस बीच मैं एक आयोजन में भी हिस्सा लूंगा। कांग्रेस की इस बैठक में सांसद मनीष तिवारी भी मौजूद नहीं रहे। उनको लेकर भी अकसर चर्चाएं होती रही हैं। इसस पहले नवंबर में हुई दो बैठकों में शशि थरूर ने हिस्सा नहीं लिया था। इनमें से एक बैठक तो 30 नवंबर को ही थी, जिसे सोनिया गांधी ने बुलाया था। अगस्त 2020 में शशि थरूर और अन्य नेताओं ने सोनिया गांधी के खिलाफ भी मोर्चा खोला था। इस पर जब सवाल हुआ था तो शशि थरूर का कहना था कि मैंने मीटिंग छोड़ी नहीं थी बल्कि पहुंच नहीं सका था। मैं केरल से दिल्ली लौट रहा था और प्लेन में था। इसके बाद उनके ऑफिस से बताया गया था कि वह अपनी 90 वर्षीया मां के साथ दिल्ली लौट रहे थे और उनकी फ्लाइट को रीशेड्यूल किया गया था। इस मीटिंग में कांग्रेस के महासचिव केसी वेणुगोपाल भी मौजूद नहीं थे। SIR पर भी मीटिंग से रहे थे दूर, सोनिया गांधी ने किया था संबोधित इससे पहले 18 नवंबर को भी वह पार्टी की एक मीटिंग में नहीं गए थे, जिसमें विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR पर चर्चा की जानी थी। इस मीटिंग में भी सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने सांसदों से बात की थी, लेकिन शशि थरूर के कार्यालय ने बताया कि वह खराब सेहत के चलते गैरहाजिर रहे।  

वीर सावरकर अवॉर्ड पर शशि थरूर का खुलासा—क्या कांग्रेस सांसद होंगे सम्मानित?

नई दिल्ली  कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने मंगलवार को एक ट्वीट के जरिए यह खुलासा किया है कि उन्हें दिल्ली में आज दिए जाने वाले “वीर सावरकर अवॉर्ड” के बारे में न तो कोई आधिकारिक सूचना मिली है और न ही उन्होंने इसे स्वीकार किया है। थरूर ने लिखा कि उन्हें केवल मीडिया रिपोर्टों से पता चला कि उनका नाम पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं में शामिल किया गया है। थरूर ने बताया कि वे स्थानीय निकाय चुनावों में मतदान के लिए केरल गए थे, जहां उन्हें पहली बार इस अवॉर्ड के बारे में मीडिया से पता चला। उन्होंने कहा, “मैं न इस अवॉर्ड से अवगत था, न ही इसे स्वीकार किया है। आयोजकों द्वारा मेरी सहमति के बिना मेरा नाम घोषित करना पूरी तरह गैर-जिम्मेदाराना है।” उन्होंने कहा, “अवॉर्ड की प्रकृति, आयोजकों या किसी भी संदर्भ के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई। ऐसे में कार्यक्रम में भाग लेने या अवॉर्ड स्वीकार करने का प्रश्न ही नहीं उठता।” आपको बता दें कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर अक्सर सुर्खियों में रहते हैं। हाल ही में उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए आयोजित राजकीय भोज में “गर्मजोशी भरा और आत्मीय” माहौल था तथा कई लोगों से बातचीत करना आनंददायक था। थरूर की यह टिप्पणी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा पुतिन के सम्मान में दिए गए भोज के एक दिन बाद आई थी। थरूर ने शनिवार को सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, "शुक्रवार रात राष्ट्रपति पुतिन के लिए राष्ट्रपति भवन में आयोजित भोज में शामिल हुआ। माहौल बेहद गर्मजोशी भरा और आत्मीय था। वहां उपस्थित कई लोगों से बातचीत करने का आनंद लिया, खासतौर पर रूसी प्रतिनिधिमंडल से आए साथी बेहद अच्छे थे।’’  

थरूर की गैरमौजूदगी से कांग्रेस परेशान, लगातार दूसरी अहम बैठक में नहीं पहुंचे

नई दिल्ली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर बीते कुछ समय से कांग्रेस से किनारा कसते नजर आ रहे हैं। वहीं वह कई बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मोदी सरकार के फैसलों की ताराीफ कर चुके हैं। हाल ही में एसआईआर के विरोध में रणनीत बनाने के लिए बुलाई गई कांग्रेस की मीटिंग में भी शशि थरूर शामिल नहीं हुए। इसके लिए उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया था। वहीं अब संसद के शीतकालीन सत्र की रणनीति को लेकर हुई बैठक में भी वह गैरहाजिर रहे। अब सवाल यह है कि एक दिन पहले ही वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम में हाजिर थे। वहीं एक दिन बाद ही कांग्रेस की बैठक से किनारा कर गए। शशि थरूर ने प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ करते हुए इन्स्टाग्राम पर पोस्ट भी किया था। पीएम मोदी की तारीफ को लेकर कांग्रेस के अन्य नेताओं ने उन्हें निशाने पर भी लिया था। थरूर ने सफाई देते हुए बताया कि वह केरल में थे। वह 90 वर्षीय मां के साथ थे और इसलिए बैठक में शामिल नहीं हो सके। इस बैठख में कांग्रेस के महासचिव केसी वेणुगोपाल भी शामिल नहीं हो पाए थे। वह स्थानीय चुनाव प्रचार में व्यस्त थे। कांग्रेस नेता ने कहा कि असल समस्या यह है कि वह देश को ठीक से समझते ही नहीं हैं। उन्हें यही लगता है कि बीजेपी की नीतियां बहुत अच्छीा हैं। अगर ऐसा ही है तो वह कांग्रेस में क्यों हैं? वह दोहरा रवैया अपना रहे हैं। कांग्रेस की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि प्रधानमंत्री के भाषण में कोई प्रशंसा करने वाली बात नहीं थी इसके बाद भी शशि थऱूर को अच्छी लगी। मझे समझ में नहीं आता कि कांग्रेस पर निशाना साधना उन्हें क्यों अच्छा लगा? सोशल मीडिया पर भी शशि थरूर के रवैये को लेकर हलचल है। लोगों का कहना है कि क्या शशि थरूर बीजेपी में जाने का प्लान कर रहे हैं? बीते दिनों जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली के एक कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे तब शशि थरूर ने उनका भाषण सुना और फिर जमकर तारीफ की। उन्होंने शिक्षा पर की गई उनकी टिप्पणी को भी सराहा था। जबकि इस भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुलामी की मानसिकता बताते हुए कांग्रेस की खूब आलोचना की थी।

शशि थरूर बोले- ‘सच्चाई से कोई समझौता नहीं’ आडवाणी की प्रशंसा पर उठे सवालों का दिया करारा जवाब

नई दिल्ली  कांग्रेस सांसद शशि थरूर वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की तारीफ करके कई लोगों के निशाने पर आ गए हैं। थरूर द्वारा आडवाणी के जन्मदिन पर किए गए पोस्ट को लेकर लोग उनकी विचारधारा और भाजपा नेता के जीवन पर सवाल उठा रहे थे। ऐसे ही एक पोस्ट का जवाब देते हुए कांग्रेस सांसद ने कहा कि उनके (आडवाणी) के लंबे राजनैतिक जीवन को सिर्फ एक घटना के आधार पर नहीं जांचा जाना चाहिए। यह सही नहीं है। यह पूरा मामला तब शुरू हुआ, जब शशि थरूर ने लालकृष्ण आडवाणी के 98वें जन्मदिन पर उनके साथ एक तस्वीर शेयर की। इसके साथ ही उन्होंने भाजपा नेता की तारीफ करते हुए लिखा, सार्वजनिक सेवा के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता है। इसके साथ ही उनकी विनम्रता और शालीनता के साथ-साथ आधुनिक भारत कि दिशा तय करने में उनकी भूमिका अमिट है।' कांग्रेस सांसद के इस पोस्ट पर वकील संजय हेगड़े ने टिप्पणी करते हुए लिखा, माफ कीजिएगा थरूर, इस देश में नफरत और ड्रैगन के बीज बोना (खुशवंत सिंह की किताब से लेते हुए) कोई सार्वजनिक सेवा नहीं है।' यहां पर हेगड़े आडवाणी की राम मंदिर आंदोलन में भूमिका और रथ यात्रा का जिक्र कर रहे थे, जिसे बाबरी मस्जिद विध्वंस का प्रेरक माना जाता है। लेखक खुशवंत सिंह ने एक कार्यक्रम में लालकृष्ण आडवाणी के सामने ही कह दिया था कि 'आडवाणी जी आपने इस देश में नफरत और ड्रैगन के बीज बोएं हैं।' इसके बाद खुशवंत सिंह ने अपनी किताब द एंड ऑफ इंडिया में भी इसी बात को लिखा था। शशि थरूर ने हेगड़े की बात का जवाब देते हुए लिखा, "उनके(आडवाणी) पूरे सार्वजनिक जीवन को सिर्फ एक घटना तक सीमित रखना सही नहीं है। फिर चाहे वह कितनी ही महत्वपूर्ण न हो। यह सही नहीं है… नेहरू जी के पूरे कार्यकाल को केवल चीन से मिली हार पर नहीं आँका जा सकता है। और न ही इंदिरा गांधी के सार्वजनिक जीवन को आपातकाल से। अगर उनके लिए हम ऐसा नहीं करते, तो हमें आडवाणी जी के लिए भी वही शिष्टता दिखानी चाहिए।"  

हैंडशेक विवाद पर थरूर का संदेश – ‘शांति के लिए जरूरी है व्यवहार में समझदारी’

 नई दिल्ली एशिया कप के फाइनल में भारत और पाकिस्तान के आमने-सामने होने की संभावना के बीच, कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भारतीय खिलाड़ियों की ओर से पाकिस्तानी खिलाड़ियों के साथ हाथ न मिलाने को लेकर उठे विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया दी है.  बातचीत में थरूर ने कहा कि पाकिस्तान के खिलाफ भावनाएं समझ में आती हैं, लेकिन खेल की भावना को राजनीति और सैन्य संघर्ष से अलग रखना चाहिए. उन्होंने कहा, 'व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि अगर हमें पाकिस्तान के खिलाफ इतना गुस्सा है, तो हमें खेलना ही नहीं चाहिए था. लेकिन अगर हम खेल रहे हैं, तो खेल की भावना के तहत खेलना चाहिए और उनसे हाथ मिलाने चाहिए थे. हमने यह पहले 1999 में भी किया था, जब करगिल युद्ध चल रहा था. उसी दिन जब हमारे सैनिक देश के लिए जान गंवा रहे थे, हम इंग्लैंड में वर्ल्ड कप में पाकिस्तान के खिलाफ खेल रहे थे. तब भी हमने उनसे हाथ मिलाया था क्योंकि खेल की भावना अलग होती है और इसका देशों या सेनाओं के बीच चल रहे संघर्ष से कोई संबंध नहीं होता. यह मेरी राय है.' 'दोनों पक्षों में दिख रही खेल भावना की कमी' कांग्रेस नेता ने आगे कहा कि दोनों पक्षों की प्रतिक्रियाओं से खेल भावना की कमी झलक रही है. उन्होंने कहा, 'अगर पाकिस्तानी टीम ने पहले अपमानित होने के बाद दूसरी बार हमें अपमानित किया, तो यह दर्शाता है कि दोनों पक्षों में खेल भावना की कमी है.' गौरतलब है कि गुरुवार को भारतीय क्रिकेट बोर्ड (BCCI) ने पाकिस्तान के खिलाड़ियों साहिबजादा फरहान और हारिस रऊफ के खिलाफ एशिया कप सुपर फोर मुकाबले (21 सितंबर) में उनके अनुचित व्यवहार के लिए आधिकारिक शिकायत दर्ज की. BCCI ने इसे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) और मैच रेफरी एंडी पायक्रॉफ्ट के पास भेजा. भारतीय टीम ने दोनों खिलाड़ियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है.

शशि थरूर बोले– आज का भारत अलग है, इमरजेंसी जैसे हालात दोहराए नहीं जा सकते

नई दिल्ली पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ओर से लगाए गए आपातकाल की कड़ी आलोचना करते हुए कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा कि इससे पता चलता है कि किस तरह से अक्सर आजादी को छीना जाता है. उन्होंने कहा कि आपातकाल यह भी दिखाता है कि कैसे दुनिया 'मानवाधिकारों के हनन' से अनजान रही. कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने 1975 की इमरजेंसी पर एक लेख लिखा है, जिसमें उन्होंने इंदिरा गांधी के इस फैसले की जमकर आलोचना की है. लोकतंत्र के समर्थक रहें सतर्क प्रोजेक्ट सिंडीकेट की तरफ से प्रकाशित लेख में थरूर ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सत्तावादी नजरिये ने सार्वजनिक जीवन को डर और दमन की स्थिति में धकेल दिया. थरूर ने लिखा कि पचास साल पहले प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ओर से लगाए गए आपातकाल ने दिखाया था कि कैसे आज़ादी को छीना जाता है, शुरू में तो धीरे-धीरे, भले-बुरे लगने वाले मकसद के नाम पर छोटी-छोटी लगने वाली आजादियों को छीन लिया जाता है. इसलिए यह एक ज़बरदस्त चेतावनी है और लोकतंत्र के समर्थकों को हमेशा सतर्क रहना चाहिए. थरूर ने लिखा, 'इंदिरा गांधी ने इस बात पर जोर दिया कि कठोर कदम जरूरी थे, सिर्फ आपातकाल की स्थिति ही आंतरिक अव्यवस्था और बाहरी खतरों से निपट सकती थी, और अराजक देश में अनुशासन और दक्षता ला सकती थी.' जून 1975 से मार्च 1977 तक करीब दो साल तक चले आपातकाल में नागरिक स्वतंत्रताएं निलंबित कर दी गईं और विपक्षी नेताओं को जेल में भर दिया गया.  उन्होंने कहा कि अनुशासन और व्यवस्था की चाहत अक्सर बिना कहे ही क्रूरता में तब्दील हो जाती थी, जिसका उदाहरण इंदिराजी के बेटे संजय गांधी की ओर से चलाए गए जबरन नसबंदी अभियान थे, जो गरीब और ग्रामीण इलाकों में केंद्रित थे, जहां मनमाने लक्ष्य हासिल करने के लिए ज़बरदस्ती और हिंसा का इस्तेमाल किया जाता था. इमरजेंसी में हजारों लोग हुए बेघर उन्होंने कहा कि दिल्ली जैसे शहरी केंद्रों में बेरहमी से की गई झुग्गी-झोपड़ियों को ढहाने की कार्रवाई ने हज़ारों लोगों को बेघर कर दिया और उनके कल्याण की कोई चिंता नहीं की गई. उन्होंने लिखा कि आपातकाल ने इस बात का ज्वलंत उदाहरण पेश किया कि लोकतांत्रिक संस्थाएं कितनी कमज़ोर हो सकती हैं, यहां तक कि ऐसे देश में भी जहां वे मज़बूत दिखती हैं. इसने हमें याद दिलाया कि एक सरकार अपनी नैतिक दिशा और उन लोगों के प्रति जवाबदेही की भावना खो सकती है जिनकी वह सेवा करने का दावा करती है. वरिष्ठ कांग्रेस नेता थरूर ने यह भी बताया कि किस तरह अहम लोकतांत्रिक स्तंभों को खामोश कर दिया गया और हिरासत में यातनाएं दी गईं. एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल हत्याएं बड़े पैमाने पर की गईं, जिससे उन लोगों के लिए 'काली सच्चाई' की तस्वीर सामने आई, जिन्होंने शासन की अवहेलना करने की हिम्मत दिखाई थी.  थरूर ने कहा कि न्यायपालिका भी भारी दबाव के आगे झुक गई, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण और नागरिकों के स्वतंत्रता के अधिकार को निलंबित कर दिया. उन्होंने कहा, 'पत्रकार, कार्यकर्ता और विपक्षी नेता सलाखों के पीछे पाए गए. व्यापक संवैधानिक उल्लंघनों ने मानवाधिकारों के हनन की एक भयावह सीरीज को को जन्म दिया. आज का भारत ज्यादा मजबूत अपने लेख में थरूर ने कहा कि आज का भारत 1975 का भारत नहीं है. हम ज़्यादा आत्मविश्वासी, ज़्यादा समृद्ध और कई मायनों में ज़्यादा मज़बूत लोकतंत्र हैं. फिर भी आपातकाल के सबक चिंताजनक रूप से प्रासंगिक बने हुए हैं. सत्ता को केंद्रीकृत करने, आलोचकों को चुप कराने और संवैधानिक सुरक्षा उपायों को दरकिनार करने का लालच कई रूपों में उभर सकता है. उन्होंने कहा कि अक्सर राष्ट्रीय हित, इस अर्थ में आपातकाल एक ज़बरदस्त चेतावनी के रूप में काम करना चाहिए और लोकतंत्र के समर्थकों को हमेशा सतर्क रहना चाहिए.