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साइबर पुलिस ने सोशल मीडिया से 1616 आपत्तिजनक लिंक हटाए

चंडीगढ़. हरियाणा पुलिस द्वारा सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अवैध, आपत्तिजनक एवं भ्रामक गतिविधियों के विरुद्ध प्रारंभ किया गया विशेष अभियान एक माह सफलतापूर्वक पूर्ण कर चुका है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (Ministry of Electronics and Information Technology) के सहयोग से संचालित यह अभियान डिजिटल सुरक्षा और जिम्मेदार ऑनलाइन वातावरण सुनिश्चित करने की दिशा में अत्यंत प्रभावी एवं परिणामकारी सिद्ध हुआ है। सोशल मीडिया पर भ्रामक, उकसाने वाली तथा समाज में भ्रम या तनाव उत्पन्न करने वाली सामग्री की बढ़ती प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए यह सुनियोजित और सकारात्मक पहल शुरू की गई थी। पिछले लगभग एक माह के दौरान साइबर टीम द्वारा निरंतर मॉनिटरिंग एवं त्वरित समन्वय के माध्यम से कुल 2052 लिंक एवं प्रोफाइल रिपोर्ट किए गए, जिनमें से 1616 आपत्तिजनक सामग्री को संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स द्वारा हटाया या ब्लॉक किया जा चुका है। शेष 436  लिंक विभिन्न समीक्षा चरणों में हैं और उन पर भी शीघ्र कार्रवाई सुनिश्चित की जा रही है। अभियान के अंतर्गत साइबर टीम प्रतिदिन सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो, लिंक एवं प्रोफाइल की पहचान कर रही है जिनमें भ्रामक जानकारी, उकसाने वाली भाषा या सार्वजनिक शांति भंग करने वाला कंटेंट पाया जाता है। ऐसे मामलों में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79(3)(बी) के तहत संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को तत्काल नोटिस जारी कर सामग्री हटाने की मांग की जाती है। पूरी प्रक्रिया समयबद्ध, पारदर्शी और बिना किसी ढिलाई के संचालित की जा रही है। डीजीपी अजय सिंघल ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि सोशल मीडिया पर गलत, भ्रामक या भड़काऊ सामग्री फैलाने वालों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया आज समाज के हर वर्ग को प्रभावित करता है और किसी भी प्रकार की उकसाने वाली सामग्री सामाजिक सौहार्द एवं शांति के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि किसी भी संदिग्ध लिंक पर क्लिक न करें, निवेश से पूर्व किसी भी ऐप या प्लेटफॉर्म की विश्वसनीयता की जांच अवश्य करें, बिना पुष्टि के कोई भी संवेदनशील सामग्री साझा न करें तथा संदिग्ध पोस्ट या ऐप की सूचना तुरंत पुलिस या साइबर हेल्पलाइन पर दें।

AI क्रिएटर्स के लिए बड़ा झटका? सरकार का नया नियम सोशल मीडिया का नियम बदल देगा

 नई दिल्ली सरकार ने AI से बने कंटेंट को लेकर नए नियम लागू कर दिए हैं. अब सोशल मीडिया पर जो भी फोटो, वीडियो या ऑडियो AI टूल्स से बनेगा, उस पर साफ लेबल दिखाना जरूरी होगा. इसके लिए कंपनियों को 20 फरवरी तक का डेडलाइन मिला है.  प्लेटफॉर्म्स को यह भी पक्का करना होगा कि यूज़र सच बता रहा है या नहीं कि कंटेंट AI से बना है. भ्रामक या गैरकानूनी AI कंटेंट को तीन घंटे के अंदर हटाने का नियम भी लाया गया है. मतलब डीपफेक और फेक वीडियो पर अब ढील नहीं चलेगी. ये बदलाव 20 फरवरी 2026 से लागू होंगे. सोशल मीडिया कंपनियों के लिए असली चुनौती इन नियमों के बाद इंस्टाग्राम, यूट्यूब और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स का काम करने का तरीका बदलेगा. अभी तक AI कंटेंट अक्सर बिना पहचान के घूमता रहा है. कई बार यूज़र को पता भी नहीं चलता कि वीडियो या फोटो असली है या मशीन से बना है. अब अपलोड के वक्त ही यह जानकारी लेनी होगी कि उस वीडियो में कितना AI यूज हुआ है. यहां अब सिर्फ यूज़र की बात पर भरोसा नहीं चलेगा. प्लेटफॉर्म्स को टेक्निकल तरीके से भी चेक करना होगा. दिक्कत यह है कि हाई क्वालिटी डीपफेक आज इतने रियल लगते हैं कि सिस्टम भी कन्फ्यूज हो जाता है. ऊपर से तीन घंटे में कंटेंट हटाने की डेडलाइन बहुत टाइट है. इतने बड़े प्लेटफॉर्म पर हर केस में इतनी तेजी से एक्शन लेना आसान नहीं होगा. AI कंटेंट क्रिएटर्स के लिए क्या मुश्किलें बढ़ेंगी इन नियमों का सबसे सीधा असर उन लोगों पर पड़ेगा जो AI से रील्स, फेसस्वैप वीडियो, फेक वॉइस या जनरेटेड क्लिप्स बनाकर ग्रो कर रहे थे. अब कंटेंट पर AI का लेबल दिखेगा. मतलब जो लोग जानबूझकर रियल जैसा दिखाकर वीडियो वायरल करते थे, उनकी ट्रिक पकड़ी जाएगी. इससे क्लिकबेट और शॉक वैल्यू कम होगी. अगर नोटिस के बावजूद कोई कंटेंट क्रिएटर इसे इग्नोर करेगा तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स उन्हें हमेशा के लिए बैन कर सकती हैं. क्योंकि सरकार की तरफ से सख्त हिदायत मिल चुकी है.  AI क्रिएटर्स को अब यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी असली इंसान का चेहरा या आवाज बिना परमिशन यूज न करें. आज जो मजाक या ट्रेंड लग रहा है, वही कल कानूनी परेशानी बन सकता है. अगर प्लेटफॉर्म ने पकड़ लिया कि आपने जानबूझकर AI कंटेंट को छुपाया है, तो अकाउंट पर स्ट्राइक या बैन का रिस्क भी रहेगा. यानी अब AI से कंटेंट बनाना सिर्फ क्रिएटिव काम नहीं रहेगा. उसमें जिम्मेदारी भी जुड़ जाएगी. यूज़र का एक्सपीरियंस कैसे बदलेगा नए नियम यूज़र की आदतें भी बदलेंगे. अब फीड में दिखने वाले वीडियो या फोटो पर लेबल देखना पड़ेगा. अगर AI लिखा है, तो समझना होगा कि यह असली घटना या असली व्यक्ति का वीडियो नहीं है. इससे लोग थोड़ा रुककर सोचेंगे. अभी तक बहुत से लोग डीपफेक को सच मानकर शेयर कर देते थे. अब शायद वह आदत बदले. हालांकि एक खतरा यह भी है कि अगर हर दूसरी पोस्ट पर AI टैग दिखने लगे, तो लोग उसे इग्नोर करना शुरू कर दें. तब लेबल का असर धीरे धीरे कम हो सकता है. प्लेटफॉर्म्स के बिजनेस पर असर यह बदलाव सिर्फ टेक्निकल नहीं है. यह बिजनेस का भी सवाल है. AI कंटेंट आज सोशल मीडिया की ग्रोथ का बड़ा हिस्सा बन चुका है. रील्स और शॉर्ट्स में AI ट्रेंड्स खूब चलते हैं. अब अगर हर AI कंटेंट पर सख्त लेबल और चेकिंग होगी, तो एंगेजमेंट पैटर्न बदल सकता है. कुछ यूज़र AI कंटेंट से दूरी बना सकते हैं. वहीं ब्रांड्स और एडवर्टाइज़र ज्यादा सेफ फील करेंगे क्योंकि फेक और भ्रामक कंटेंट पर कंट्रोल बढ़ेगा. प्लेटफॉर्म्स को अब ग्रोथ और रेगुलेशन के बीच बैलेंस बनाना होगा. आगे क्या बदलेगा आने वाले वक्त में सोशल मीडिया पर कुछ भी चलेगा वाला माहौल खत्म होगा. डीपफेक, फेक डॉक्यूमेंट और बिना सहमति वाली तस्वीरों पर पहले जैसी ढील नहीं मिलेगी. सरकार साफ कह चुकी है कि प्लेटफॉर्म्स को जिम्मेदारी लेनी होगी. इसका मतलब ज्यादा मॉडरेशन टीम, बेहतर टेक और भारत के हिसाब से अलग सिस्टम बनाना पड़ेगा. कुल मिलाकर, नए AI कंटेंट नियम सोशल मीडिया को ज्यादा जिम्मेदार बनाने की कोशिश हैं. यह बदलाव एकदम परफेक्ट नहीं होगा. शुरुआत में टेक्निकल दिक्कतें आएंगी. गलतियां भी होंगी. लेकिन लंबे वक्त में सोशल मीडिया का माहौल बदलेगा. कंटेंट बनाना अब सिर्फ क्रिएटिविटी का खेल नहीं रहेगा. उसमें जवाबदेही भी जुड़ जाएगी. यही इस पूरे बदलाव की असली दिशा है. रास्ता आसान नहीं है भले ही सरकार ने डेडलाइन दे दी है, लेकिन टेक्निकल तौर पर बात करें तो ये तुरंत इंप्लिमेंट करना आसान नहीं है. क्योंकि लेबल लगाए हुए वीडियो को डाउनलोड करके फिर से अपलोड किया जा सकता है. AI डिटेक्शन सिस्टम भी पूरी तरह ठीक से काम नहीं करते हैं. कई बार वो असली को नकली और नकली को असली समझने की भी गलती कर रहे हैं.  

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर बड़ा कदम: ऑस्ट्रेलिया के बाद स्पेन-ग्रीस में सोशल मीडिया पर रोक की योजना

मैड्रिड  ऑस्ट्रेलिया के बाद अब स्पेन और ग्रीस भी नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया पर बैन लगाने की तैयारी कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया ने दिसंबर में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक पहुंच पर प्रतिबंध लगा दिया था, और अब यूरोप में भी इसी तरह की सख्ती देखने को मिल रही है। स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ ने कहा कि उनका देश 16 साल से कम उम्र के बच्चों को हानिकारक कंटेंट जैसे पोर्नोग्राफी और हिंसा से बचाने के लिए सोशल मीडिया बैन करना चाहता है। वहीं ग्रीस भी 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा कर सकता है। स्पेन और ग्रीस की यह घोषणा ऐसे समय आई है जब कई देश सोशल मीडिया को एडिक्टिव और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मान रहे हैं। यूरोप में ब्रिटेन और फ्रांस भी सोशल मीडिया पर सख्त रुख अपनाने की दिशा में हैं, जबकि ऑस्ट्रेलिया पहले ही इस दिशा में कदम उठा चुका है। स्पेन के इस प्रस्ताव पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ के मालिक एलन मस्क ने कड़ी प्रतिक्रिया दी।  मस्क ने प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ को सोशल मीडिया पर अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया और उन्हें “तानाशाह” करार दिया। मस्क ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया और सरकार के इस कदम का विरोध किया। हाल के समय में AI-जेनरेटेड कंटेंट और बिना सहमति के यौन छवियों के निर्माण की रिपोर्टों ने सोशल मीडिया के जोखिमों को उजागर किया है। विशेष रूप से नाबालिगों से जुड़ी घटनाओं ने सरकारों को सख्त नियमों की तरफ प्रेरित किया है। इस पूरे विवाद में बच्चों की सुरक्षा और डिजिटल स्वतंत्रता के बीच बहस और तेज हो गई है।

16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए गोवा सरकार की तैयारी, सोशल मीडिया पर प्रतिबंध जल्द लागू

पणजी मोबाइल और सोशल मीडिया बच्चों की जिंदगी का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं। छोटे बच्चे भी घंटों Instagram, Facebook, YouTube और अन्य सोशल मीडिया ऐप्स पर समय बिता रहे हैं। इसी को देखते हुए अब गोवा सरकार एक बड़ा कदम उठाने की सोच रही है। गोवा सरकार 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक लगाने पर विचार कर रही है। इस बात का संकेत खुद राज्य के मंत्री ने दिया है। उनका कहना है कि बच्चों को मोबाइल की लत, गलत कंटेंट और मानसिक दबाव से बचाना जरूरी है। सरकार का मानना है कि कम उम्र में सोशल मीडिया का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों के दिमाग और व्यवहार पर गलत असर डाल सकता है। इसी वजह से गोवा में इस तरह के नियम पर चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि अभी यह फैसला पूरी तरह लागू नहीं हुआ है, लेकिन इस खबर के सामने आते ही पूरे देश में चर्चा तेज हो गई है। माता-पिता, शिक्षक और सोशल मीडिया यूजर्स इस मुद्दे पर अपनी राय दे रहे हैं। गोवा सरकार सोशल मीडिया पर रोक क्यों लगाना चाहती है? गोवा सरकार का कहना है कि आजकल बच्चे बहुत कम उम्र में ही मोबाइल और सोशल मीडिया के आदी हो रहे हैं। घंटों स्क्रीन देखने से उनकी आंखों, नींद और दिमाग पर बुरा असर पड़ता है। इसके अलावा सोशल मीडिया पर कई बार गलत वीडियो, गलत बातें और गलत लोग भी मिल जाते हैं। बच्चे आसानी से इनके प्रभाव में आ जाते हैं। साइबर बुलिंग यानी ऑनलाइन परेशान करना भी एक बड़ी समस्या बन रही है। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए सरकार सोच रही है कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखा जाए। इससे पहले ऑस्ट्रेलिया उठा चुका ऐसा कदम ऑस्ट्रेलिया जैसे देश ने पहले ही 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर सख्त नियम बना दिए हैं। वहां बच्चों को Instagram, Facebook और TikTok जैसे ऐप्स इस्तेमाल करने की मनाही है। सरकार का कहना है कि इससे बच्चों का बचपन सुरक्षित रहेगा और वे मोबाइल से ज्यादा किताबों, खेल और परिवार के साथ समय बिताएंगे।

डिजिटल स्क्रीन का खतरा: बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर एज लिमिट जल्द लागू हो सकती है

नई दिल्ली.  भारत में सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल और बच्चों में बढ़ती डिजिटल लत को लेकर सरकार अब उम्र के आधार पर नियम बनाने पर विचार कर सकती है. देश के चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने अपनी सलाह में कहा है कि बच्चों और कम उम्र के यूजर्स के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक एक्सेस सीमित करना जरूरी हो सकता है. इकोनॉमिक सर्वे में चेतावनी दी गई है कि कम उम्र के यूजर्स सोशल मीडिया के बहुत ज्यादा इस्तेमाल और हानिकारक कंटेंट के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं. ऐसे में उम्र आधारित एक्सेस लिमिट पर पॉलिसी बनाई जा सकती है. इसके साथ ही सोशल मीडिया कंपनियों को एज वेरिफिकेशन और उम्र के हिसाब से सुरक्षित डिफॉल्ट सेटिंग लागू करने की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए. सोशल मीडिया पर बच्चों की एंट्री सीमित हो सीईए ने परिवारों को भी भूमिका निभाने की बात कही है. उन्होंने स्क्रीन टाइम की सीमा तय करने, कुछ घंटों को डिवाइस-फ्री रखने और बच्चों के साथ ऑफलाइन गतिविधियों को बढ़ावा देने की सिफारिश की है. सोशल मीडिया कंपनियों के लिए बड़ा बाजार है भारत भारत इस समय सोशल मीडिया कंपनियों के लिए एक बड़ा बाजार है. देश में करीब 75 करोड़ स्मार्टफोन और लगभग 1 अरब इंटरनेट यूजर्स हैं. हालांकि, अभी सोशल मीडिया इस्तेमाल के लिए कोई एक समान मिनिमम एज लिमिट तय नहीं है. दुनिया के कई देश इस दिशा में कदम उठा चुके हैं. ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगाई है. फ्रांस 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए बैन की तैयारी में है, जबकि ब्रिटेन, डेनमार्क और ग्रीस भी इस मुद्दे पर विचार कर रहे हैं. इकोनॉमिक सर्वे में बच्चों की डिजिटल लत पर चिंता इकोनॉमिक सर्वे में यह भी बताया गया कि स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले युवाओं में आधे से ज्यादा डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल पढ़ाई के लिए करते हैं, जबकि करीब 75 फीसदी सोशल मीडिया के लिए. रिपोर्ट के मुताबिक डिजिटल लत पढ़ाई, कामकाज की प्रोडक्टिविटी, नींद और एकाग्रता पर निगेटिव असर डालती है. CEA की सिफारिशें सरकार पर बाध्यकारी नहीं हालांकि मुख्य आर्थिक सलाहकार की सिफारिशें सरकार पर बाध्यकारी नहीं होतीं, लेकिन आमतौर पर पॉलिसी मेकिंग में इन्हें गंभीरता से लिया जाता है, इस बीच गोवा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने भी बच्चों के स्क्रीन टाइम और सोशल मीडिया रेगुलेशन पर स्टडी शुरू कर दिया है.

सोशल मीडिया पर कड़ा नियम: फ्रांस में अब 15 साल से कम उम्र वालों का प्रवेश बंद

फ्रांस फ्रांस ने बच्चों और किशोरों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर एक बड़ा और सख्त कदम उठाया है। देश की नेशनल असेंबली ने एक अहम विधेयक पारित किया है, जिसके तहत 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे अब टिकटॉक, इंस्टाग्राम, फेसबुक और स्नैपचैट जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। सरकार का कहना है कि यह फैसला बच्चों की मानसिक सेहत को बचाने, साइबर बुलिंग पर रोक लगाने और युवाओं में बढ़ती हिंसा व गलत व्यवहार की प्रवृत्तियों को कम करने के उद्देश्य से लिया गया है। उम्र सत्यापन अनिवार्य, नियम तोड़ने पर जुर्माना नए कानून के मुताबिक, सोशल मीडिया कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म पर उपयोगकर्ताओं की उम्र की सटीक जांच के लिए मजबूत तकनीकी व्यवस्था लागू करनी होगी। अगर कंपनियां इसमें विफल रहती हैं तो उन पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा। फ्रांसीसी अधिकारियों का कहना है कि पिछले 10 वर्षों में 13 से 15 वर्ष के बच्चों में डिप्रेशन और आत्महत्या के मामलों में करीब 60 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जिसमें सोशल मीडिया की भूमिका को एक बड़ा कारण माना गया है। राष्ट्रपति मैक्रोन का समर्थन फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रोन ने इस विधेयक का खुलकर समर्थन किया है। उन्होंने इसे बच्चों और किशोरों की सुरक्षा की दिशा में जरूरी कदम बताया। मैक्रोन ने कहा कि युवा वर्ग को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के नकारात्मक प्रभाव से बचाना समय की मांग है और स्क्रीन टाइम को सीमित करना बेहद जरूरी हो गया है। संसद में भारी बहुमत से पास हुआ बिल यह विधेयक नेशनल असेंबली में रात भर चली लंबी बहस के बाद पारित किया गया। मतदान में 130 सांसदों ने इसके पक्ष में जबकि 21 सांसदों ने इसके खिलाफ वोट दिया। अब यह प्रस्ताव कानून बनने से पहले मंजूरी के लिए सीनेट में भेजा जाएगा। 2026 से लागू होंगे नए नियम सरकार की योजना है कि ये नए नियम सितंबर 2026 से शुरू होने वाले शैक्षणिक सत्र से नए सोशल मीडिया खातों पर लागू किए जाएं। वहीं, जो मौजूदा खाते उम्र सीमा को पूरा नहीं करते हैं, उन्हें साल के अंत तक बंद कर दिया जाएगा। यूरोपीय संघ की भूमिका भी अहम यूरोपीय आयोग ने कहा है कि इस कानून का प्रभावी क्रियान्वयन यूरोपीय संघ के नियमों और भरोसेमंद आयु-सत्यापन प्रणालियों पर निर्भर करेगा। इस कानून के तहत शैक्षणिक प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन शिक्षा सेवाएं और डिजिटल विश्वकोश को छूट दी गई है, ताकि बच्चों की पढ़ाई और जानकारी तक पहुंच प्रभावित न हो।  

16 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया प्रतिबंध की वकालत, मद्रास हाई कोर्ट ने केंद्र को दी सलाह

मदुरै मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने केंद्र सरकार को बड़ा सुझाव दिया है कि वह ऑस्ट्रेलिया की तर्ज पर कानून लाने की संभावना तलाशे, जिसमें 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का उपयोग पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जाए. जस्टिस केके रामकृष्णन और जस्टिस जी जयचंद्रन की डिवीजन बेंच एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई कर रही थी, जिसमें इंटरनेट पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई गई. याचिकाकर्ता एस विजयकुमार ने कोर्ट में 'रिट ऑफ मैंडमस' की मांग की थी. उन्होंने पूरे देश में सभी इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स (ISP) को 'पैरेंटल विंडो' या पैरेंटल कंट्रोल सुविधा अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराने की मांग की. याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क था कि इंटरनेट पर अश्लील सामग्री और चाइल्ड सेक्शुअल अब्यूज मटेरियल (CSAM) आसानी से उपलब्ध है, जो नाबालिग बच्चों तक पहुंच रहा है. इससे बच्चों का मानसिक और भावनात्मक विकास खतरे में पड़ रहा है. हाई कोर्ट ने याचिका पर विस्तार से सुनवाई के बाद इसे निपटाते हुए कहा, 'हम समझते हैं कि ऑनलाइन CSAM वाली वेबसाइट्स और URL लगातार अपडेट होती रहती हैं और सक्रिय रहती हैं. हालांकि, इसके साथ-साथ यूजर एंड पर भी नियंत्रण जरूरी है. यह नियंत्रण केवल पैरेंट कंट्रोल ऐप या सुविधा से ही संभव है. इसके लिए अंतिम उपयोगकर्ताओं को चाइल्ड पोर्नोग्राफी के खतरे और बचाव के उपायों के बारे में जागरूक करना अनिवार्य है.' भारत में भी बने ऑस्ट्रेलिया जैसा कानून हाई कोर्ट ने आगे जोर देते हुए कहा, 'अंततः यह व्यक्तिगत चुनाव और अधिकार है कि कोई व्यक्ति ऐसी घृणित सामग्री देखे या न देखे. लेकिन बच्चों के मामले में जोखिम बहुत अधिक है, इसलिए माता-पिता की जिम्मेदारी भी उतनी ही बढ़ जाती है. याचिकाकर्ता के अधिवक्ता के सुझाव पर हम कहते हैं कि भारत सरकार ऑस्ट्रेलिया जैसे कानून की संभावना तलाश सकती है, जिसमें 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया का उपयोग वर्जित किया गया हो.' मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने अंतरिम राहत के तौर पर निर्देश दिया कि जब तक ऐसा कानून नहीं बनता, तब तक संबंधित अधिकारी जागरूकता अभियान को और अधिक प्रभावी बनाएं. सभी उपलब्ध माध्यमों से संवेदनशील समूहों, खासकर बच्चों और अभिभावकों तक संदेश पहुंचाया जाए. कोर्ट ने उम्मीद जताई कि केंद्र और राज्य स्तर पर बने आयोग इस दिशा में ठोस कार्ययोजना बनाकर उसे पूरी तरह लागू करेंगे. विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया का अंधाधुंध उपयोग बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं, साइबर बुलिंग और अनुचित सामग्री के संपर्क में आने का खतरा बढ़ा रहा है.

भारतीय सेना की सोशल मीडिया पॉलिसी में बड़ा बदलाव, जवानों की इंस्टाग्राम पोस्टिंग पर रोक

नई दिल्ली  भारतीय सेना ने सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर अपनी नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया है। अब सेना के जवान और अधिकारी इंस्टाग्राम का उपयोग केवल देखने और निगरानी के उद्देश्य से कर सकेंगे। वे किसी भी प्रकार की पोस्ट नहीं कर पाएंगे और न ही किसी पोस्ट को लाइक या उस पर टिप्पणी कर सकेंगे। सूत्रों के मुताबिक, डिजिटल गतिविधियों को लेकर सेना के लिए पहले से लागू सभी अन्य नियम यथावत रहेंगे। सूत्रों ने बताया कि ये निर्देश सेना की सभी यूनिटों और विभागों को जारी कर दिए गए हैं। इसका उद्देश्य सैनिकों को सोशल मीडिया पर मौजूद सामग्री को देखने, उससे अवगत रहने और सूचनाएं जुटाने की सीमित अनुमति देना है, ताकि वे फर्जी या भ्रामक कंटेंट को पहचान सकें। नई व्यवस्था के तहत, सैनिक यदि सोशल मीडिया पर किसी फर्जी, भ्रामक या संदिग्ध पोस्ट को देखते हैं तो वे उसकी जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दे सकेंगे। इससे सूचना युद्ध और दुष्प्रचार के खिलाफ सेना की आंतरिक सतर्कता को मजबूत करने में मदद मिलेगी। भारतीय सेना समय-समय पर फेसबुक, एक्स (पूर्व में ट्विटर) और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के इस्तेमाल को लेकर दिशा-निर्देश जारी करती रही है। सुरक्षा कारणों से पहले इन पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए थे। हनी ट्रैप और सूचना लीक के चलते सख्ती इन सख्त नियमों की पृष्ठभूमि में ऐसे कई मामले सामने आए थे, जिनमें विदेशी एजेंसियों द्वारा बिछाए गए ‘हनी ट्रैप’ में फंसकर कुछ सैनिकों से अनजाने में संवेदनशील जानकारियां लीक हो गई थीं। इसी को देखते हुए सोशल मीडिया पर नियंत्रण को आवश्यक माना गया। हाल ही में भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने चाणक्य डिफेंस डायलॉग के दौरान सेना कर्मियों के सोशल मीडिया उपयोग को लेकर अपने विचार साझा किए थे। कार्यक्रम के दौरान उनसे पूछा गया कि जेनरेशन-Z के युवा सेना में आना चाहते हैं, लेकिन सेना और सोशल मीडिया के बीच एक विरोधाभास दिखाई देता है। इस पर जनरल द्विवेदी ने कहा, “यह वास्तव में एक चुनौती है। जब युवा कैडेट NDA आते हैं, तो सबसे पहले अपने कमरों में छिपे फोन ढूंढते हैं। उन्हें यह समझाने में तीन से छह महीने लगते हैं कि फोन के बिना भी जीवन है।” हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आज के दौर में स्मार्टफोन एक अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है। उन्होंने कहा, “मैं सैनिकों को स्मार्टफोन से कभी मना नहीं करता। हम अक्सर फील्ड में रहते हैं। बच्चे की स्कूल फीस भरनी हो, माता-पिता की तबीयत जाननी हो या पत्नी से बात करनी हो, ये सब फोन के जरिए ही संभव है।” सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देने को लेकर सेना प्रमुख ने कहा कि ‘रिएक्ट करना’ और ‘रिस्पॉन्ड करना’ दो अलग बातें हैं। उन्होंने बताया, “रिएक्ट करना मतलब तुरंत जवाब देना, जबकि रिस्पॉन्ड करना मतलब सोच-समझकर जवाब देना। हम नहीं चाहते कि हमारे सैनिक जल्दबाजी में किसी बहस में उलझें। इसलिए उन्हें एक्स जैसे प्लेटफॉर्म पर सिर्फ देखने की अनुमति दी गई है, जवाब देने की नहीं।” पहले भी लग चुके हैं कड़े प्रतिबंध 2017 में तत्कालीन रक्षा राज्य मंत्री सुभाष भामरे ने संसद को बताया था कि ये दिशा-निर्देश सूचनाओं की सुरक्षा और उनके दुरुपयोग को रोकने के लिए बनाए गए हैं। 2019 तक सेना के जवान किसी भी सोशल मीडिया ग्रुप का हिस्सा नहीं बन सकते थे। 2020 में नियम और सख्त किए गए और सैनिकों को फेसबुक व इंस्टाग्राम समेत 89 मोबाइल ऐप्स हटाने के निर्देश दिए गए थे। हालांकि, इसके बावजूद सेना ने कुछ प्लेटफॉर्म्स जैसे फेसबुक, यूट्यूब, एक्स, लिंक्डइन, क्वोरा, टेलीग्राम और व्हाट्सऐ के सीमित इस्तेमाल की अनुमति दी, वह भी कड़े निगरानी तंत्र के तहत।  

सोशल मीडिया यूजर्स सावधान! अप्रैल 2026 से आपकी ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखेगा ये विभाग

नई दिल्ली  1 अप्रैल 2026 से भारत में इनकम टैक्स नियमों में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। नए नियमों के तहत इनकम टैक्स अधिकारियों को सिर्फ भौतिक संपत्तियों तक सीमित रहने की बजाय नागरिकों की डिजिटल गतिविधियों तक पहुंच बनाने का अधिकार मिलेगा। यह पहली बार होगा जब टैक्स अधिकारी औपचारिक रूप से डिजिटल दुनिया में भी जांच कर सकेंगे। दरअसल, यह बदलाव टैक्स चोरी रोकने और वित्तीय नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए किया जा रहा है। अब सिर्फ कैश और ज्वेलरी नहीं, डिजिटल स्पेस भी रडार पर पहले इनकम टैक्स अधिकारियों को छापेमारी के दौरान घर, प्रॉपर्टी, नकदी, दस्तावेज और गहनों जैसी भौतिक चीजों की जांच की अनुमति थी। यह अधिकार इनकम टैक्स एक्ट, 1961 की धारा 132 के तहत आता था। लेकिन नए प्रस्तावित नियमों के तहत अब अधिकारियों को वर्चुअल डिजिटल स्पेस तक पहुंच का अधिकार मिलेगा। इस डिजिटल स्पेस में शामिल होंगे: ईमेल अकाउंट, क्लाउड स्टोरेज , डिजिटल वॉलेट ट्रेडिंग और इन्वेस्टमेंट प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया प्रोफाइल और चैट्स, अन्य ऑनलाइन अकाउंट।  यानि Gmail, WhatsApp, Facebook और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म भी टैक्स जांच के दायरे में आ सकते हैं। सरकार ऐसा बदलाव क्यों कर रही है? सरकार का कहना है कि आज के समय में ज्यादातर वित्तीय लेनदेन ऑनलाइन हो चुके हैं।       बैंकिंग और निवेश     स्टॉक ट्रेडिंग     क्रिप्टो एसेट्स     ऑनलाइन खरीदारी इन सभी लेनदेन को फिजिकल जांच के जरिए पकड़ना अब प्रभावी नहीं रहा। इनकम टैक्स अधिकारियों का मानना है कि किसी व्यक्ति की पूरी वित्तीय गतिविधि डिजिटल फुटप्रिंट में छिपी होती है। डिजिटल डेटा तक पहुंच मिलने से टैक्स चोरी के मामलों को ज्यादा सटीक तरीके से पकड़ा जा सकेगा। क्या हर किसी का डेटा कभी भी चेक किया जा सकता है? सबसे बड़ा सवाल है प्राइवेसी का। सरकार ने स्पष्ट किया है कि टैक्स अधिकारी मनमाने तरीके से किसी का डिजिटल डेटा एक्सेस नहीं कर सकेंगे। जैसे पहले छापेमारी के लिए 'reason to believe' जरूरी होता था, वैसी ही शर्त अब डिजिटल अकाउंट्स पर भी लागू रहेगी। मतलब: जब तक किसी व्यक्ति के खिलाफ आय या वित्तीय लेनदेन में गड़बड़ी का ठोस आधार नहीं होगा, तब तक ईमेल, सोशल मीडिया या अन्य डिजिटल अकाउंट्स को एक्सेस नहीं किया जा सकेगा। टैक्सपेयर्स के लिए इसका क्या मतलब है?     टैक्स से जुड़ी पारदर्शिता बढ़ेगी।     लोगों को अपनी डिजिटल गतिविधियों में सावधानी बरतनी होगी।     अगर आपकी इनकम और लेनदेन साफ-सुथरे और सही तरीके से घोषित हैं, तो घबराने की जरूरत नहीं।  

स्वीट जन्नत विवादों में घिरीं, सोशल मीडिया पर वायरल हुए कथित वीडियो से मचा बवाल

 मेघालय  मेघालय की फेमस इन्फ्लुएंसर स्वीट जन्नत इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई हैं। दरअसल, बीते दिनों Viral MMS विवाद को लेकर वह सुर्खियों में है, जिसको लेकर उनको तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। MMS वाली लड़की समझकर उनके पोस्ट पर कमेंट्स किए जा रहे हैं। वायरल कपल की नहीं हुई पहचान दरअसल, हाल ही में एक कपल का 19 मिनट 34 सेकेंड का निजी वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ, जिसने इंटरनेट पर तहलका मचा दिया। 19 मिनट 34 सेकंड वाले वीडियो में एक कपल काफी वल्गर बातें कर रहे हैं। अब तक वीडियो में दिख रहे कपल की भी पहचान नहीं हुई है। ना यह पता चल पाया यह वीडियो कैसे वायरल हुआ। लेकिन MMS वाली लड़की समझकर मेघालय की फेमस इन्फ्लुएंसर स्वीट जन्नत की पोस्ट पर कमेंट्स किए जा रहे हैं। कई यूजर्स ने अंदाजा लगाकर दावा किया कि वीडियो में दिख रही लड़की स्वीट जन्नत हैं। वीडियो वायरल होने के बाद स्वीट जन्नत ने खुद स्पष्ट किया कि यह वीडियो AI Deepfake है। स्वीट जन्नत ने अफवाहों पर लगाया विराम अफवाहों पर विराम लगाते हुए स्वीट जन्नत ने कहा, पहले मेरी शक्ल देखो, फिर वीडियो वाली को देखो कोई मैच नहीं। उन्होंने कहा कि वायरल वीडियो में दिखाई देने वाली लड़की अंग्रेजी में बात कर रही है। दावा किया जा रहा है कि 19-मिनट MMS वाली लड़की ने शर्मिंदगी से सुसाइड कर लिया है। हालांकि सच्चाई क्या है, यह अब तक सामने नहीं आई है। बता दें कि मेघालय के महेंद्रगंज की रहने वाली स्वीट जन्नत एक इंस्टाग्राम इंफ्लूएंसर हैं, जो सोशल मीडिया पर अपनी डेली लाइफ वीडियो शेयर करती हैं।