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GB रियल्टी ग्रुप की शिकायत पर कार्रवाई, मोहाली में 35 सोशल मीडिया अकाउंट जांच के घेरे में

मोहाली मोहाली के एक इमिग्रेशन सलाहकार और उससे जुड़े कारोबारी समूह को इंटरनेट मीडिया पर कथित तौर पर बदनाम करने के मामले में पंजाब पुलिस ने 35 अकाउंट के खिलाफ केस दर्ज किया है। आरोप है कि इन अकाउंट के माध्यम से बिना सत्यापन वाली सामग्री प्रसारित कर कंपनी को कनाडा में कथित धोखाधड़ी के मामले से जोड़ा गया। संबंधित कारोबारी समूह जीबी रियल्टी ग्रुप शैक्षणिक संस्थान चलाने के साथ मोहाली और न्यू चंडीगढ़ में रियल एस्टेट कारोबार से जुड़ा है। इस मामले में FIR नंबर 29, 13 अक्टूबर को एसएएस नगर के सेक्टर-79 स्थित साइबर क्राइम थाने में दर्ज की गई है। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 356(2) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66 के तहत मामला दर्ज किया है। कंपनी-एमडी के बारे में झूठी अफवाहें फैलाईं जीबी रियल्टी ग्रुप की ओर से अधिवक्ता पारस शर्मा ने पुलिस को शिकायत दी है। शिकायत के अनुसार, अज्ञात व्यक्तियों ने यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया मंचों पर कंपनी और उसके प्रबंध निदेशक के बारे में कथित तौर पर झूठी अफवाहें फैलाईं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इन पोस्ट में कंपनी को कनाडा में हुए कथित धोखाधड़ी के मामले से जोड़कर पेश किया गया। कंपनी के अनुसार ये आरोप निराधार हैं। शिकायतकर्ता ने पुलिस को उन सोशल मीडिया अकाउंट और पोस्ट के लिंक भी दिए हैं, जिनके माध्यम से कथित सामग्री साझा की जा रही थी। इसके साथ ही संबंधित सामग्री हटाने और अकाउंट ब्लॉक करने की मांग की गई। पुलिस ने शिकायत के आधार पर केस दर्ज किया है। हालांकि, एफआईआर में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। कनाडा के ओंटारियो में भी चल रही जांच यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब कनाडा के ओंटारियो प्रांत में निजी करियर कॉलेजों को विद्यार्थियों की आर्थिक सहायता देने वाली योजना में संभावित अनियमितताओं की जांच चल रही है। प्रांतीय सरकार ने शुरुआती ऑडिट में सामने आई आशंकाओं के बाद मामला ओंटारियो प्रांतीय पुलिस (ओपीपी) को जांच के लिए सौंपा है। ऑडिट फर्म केपीएमजी को नियुक्त किया गया ओंटारियो के कॉलेज एवं विश्वविद्यालय मंत्री नोलन क्विन के अनुसार, ओंटारियो स्टूडेंट असिस्टेंस प्रोग्राम के इस्तेमाल को लेकर बढ़ती चिंताओं के बाद सरकार ने निरीक्षण शुरू किए थे। इसके बाद मामले की विस्तृत समीक्षा के लिए ऑडिट फर्म केपीएमजी को नियुक्त किया गया। अधिक आवेदन आने जैसे बिंदुओं पर चिंता जताई शुरुआती निष्कर्षों में कुछ निजी करियर कॉलेजों के बीच साझा स्वामित्व, कॉलेजों और इमिग्रेशन भर्ती सेवाओं के बीच संबंध, विद्यार्थियों के सत्यापन की कमजोर प्रक्रिया और कुछ क्षेत्रों से ओएसएपी के तहत असामान्य रूप से अधिक आवेदन आने जैसे बिंदुओं पर चिंता जताई गई। प्रांतीय सरकार ने मामले की जानकारी ऑडिटर जनरल को भी दी है। रिपोर्ट के अनुसार, 7 करियर कॉलेजों को शैक्षणिक सत्र 2024-25 में ओएसएपी के तहत लगभग 385 मिलियन कनाडाई डॉलर की अनुदान राशि मिली थी। हालांकि, इस जांच और मोहाली में दर्ज एफआईआर के बीच किसी सीधे संबंध की पुष्टि नहीं हुई है।  

सोशल मीडिया ने प्रस्तुत किया अर्धसत्य का नया तथ्य: सीएम योगी

गोरखपु गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि सामान्य जीवन में व्यक्ति यह तय नहीं कर पाता है कि सत्य क्या है और असत्य क्या है। आज के समय में सोशल मीडिया प्लेटफार्म ने सत्य और असत्य के बीच एक नया तथ्य प्रस्तुत कर दिया है, अर्धसत्य का, जो कभी सत्य नहीं होता। ऐसी स्थितियों में पूरी दुनिया की मानवता अवसाद की शिकार है, उसके सामने चुनौती है। सीएम योगी गोरखनाथ मंदिर में युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 57वीं एवं राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 12वीं पुण्यतिथि समारोह के उपलक्ष्य में बुधवार अपराह्न श्रीमद्भागवत महापुराण कथा ज्ञानयज्ञ के शुभारंभ अवसर पर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। दिग्विजयनाथ स्मृति भवन सभागार में व्यासपीठ का पूजन करने के बाद उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि आज विज्ञान भले ही कितना ही आगे बढ़ चुका हो, लेकिन जीवन में स्थायी शांति के लिए विश्व की मानवता केवल भारत भूमि को ही देखती है। भारत भूमि पर पावन कथाओं की परंपरा कठिन चुनौतियों में व्यक्ति का मार्ग सुगम बनाने के लिए मार्गदर्शन करती है। पवित्र कथाओं के वाचन और श्रवण की परंपरा, हजारों वर्षों की विरासत को समझने का भी अवसर होती है। मुख्यमंत्री ने कहा कि व्यक्ति के जीवन में जब आचरण और विचार के बीच साम्यता प्रभावकारी होती है। व्यक्ति जब मनसा, वाचा, कर्मणा से एक दिशा में चलता है तो उसे सफलता प्राप्त होती है। मन, वचन और कर्म में एकरूपता न रहने पर भ्रम की स्थिति पैदा होती है। क्या करना है और क्या नहीं करना है, इसे लेकर भ्रम पैदा होने पर ‘न घर का, न घाट का’ वाली स्थिति बन जाती है। श्रीमद्भागवत की कथा मनुष्य के इसी भ्रम को दूर करती है। भक्ति, ज्ञान और निष्काम कर्म की प्रेरणा देती है श्रीमद्भागवत कथा कथा व्यास मलूकपीठाधीश्वर श्री राजेंद्रदास जी महाराज का गोरक्षपीठ में स्वागत करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि श्रीमद्भागवत महापुराण के वाचन और श्रवण की परंपरा 5000 वर्ष पुरानी है। भारत का श्रद्धालु इस कथा के माध्यम से ज्ञान, भक्ति व निष्काम कर्म की प्रेरणा प्राप्त करता है। जीवन के उद्देश्य व रहस्यों को समझने के लिए यह कथा अत्यंत महत्वपूर्ण है। 5000 वर्ष पहले शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को इस कथा का श्रवण कराया, तबसे एक लंबा कालखंड बीत गया। सनातन संस्कृति ने सम-विषम परिस्थितियों सहित तमाम चुनौतियों का सामना किया। उत्थान-पतन की कहानियों के बीच भी यह कथा हम सबकी स्मृतियों में बची रही। यह कथा जीवन की वास्तविकता का एहसास करते हुए अज्ञानता से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। मुख्यमंत्री के संबोधन के उपरांत व्यासपीठ पर विराजमान कथा व्यास, वृंदावन से पधारे मलूकपीठाधीश्वर श्रीमदजगद्गुरु द्वाराचार्य अग्रपीठाधीश्वर स्वामी श्री राजेंद्रदास जी महाराज ने श्रद्धालुओं को श्रीमद्भागवत कथा का रसपान कराया। कथा प्रतिदिन अपराह्न 3 बजे से शाम 6 बजे तक सुनाई जाएगी। इसका विराम 29 सितंबर को होगा।  वैदिक मंत्रोच्चार के बीच निकली श्रीमद्भागवत महापुराण की शोभायात्रा श्रीमद्भागवत महापुराण कथा ज्ञानयज्ञ के शुभारंभ से पूर्व गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में मुख्य मंदिर से कथा स्थल (दिग्विजयनाथ स्मृति भवन सभागार) तक शंख ध्वनि की गूंज तथा वेदपाठी विद्यार्थियों के वैदिक मंत्रोच्चार के बीच महापुराण की शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा के कथा स्थल पहुंचने पर अखंड ज्योति स्थापित की गई। पोथी प्रतिष्ठा और कथा व्यास के विराजमान होने के उपरांत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व अन्य यजमान ने व्यासपीठ और कथा व्यास की पूजा की। इस अवसर पर जगद्गुरु स्वामी सुग्रीव किलाधीश अयोध्या के विश्वेश प्रपन्नाचार्य, रामलला सदन अयोध्या के जगद्गुरु राघवाचार्य, स्वामी श्रीधराचार्य, महंत नारायण गिरी, अवधेश दास, रामलखन दास, राजू दास, रामानंद दास, बालक दास, जयबख्श दास सहित अनेक संत, यजमानगण और बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

Instagram-Facebook पर नाबालिगों की एंट्री होगी बंद? बच्चों की सोशल मीडिया पहुंच पर SC ने केंद्र से पूछा सवाल

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को उस याचिका पर नोटिस जारी किया है, जिसमें मांग की गई है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाने की इजाजत नहीं होनी चाहिए. याचिका में सोशल मीडिया के इस्तेमाल करने के लिए सुरक्षा उपायों की भी मांग की गई है, जिसमें माता-पिता या लीगल गार्जियन की सहमति जरूरी होनी चाहिए.  याचिकामें कहा गया है कि मेटा और दूसरी सोशल मीडिया कंपनियों ने बच्चों के अकाउंट बनाने की आयुसीमा 13 साल तय की है, जो अमेरिकी कानून के मुताबिक है।  याचिका में क्या कहा गया है? NGO जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस की फाइल की गई याचिका में कहा गया है कि फेसबुक और स्नैपचैट (इंडिया) जैसे प्लेटफॉर्म यूजर्स को 13 साल की उम्र से अकाउंट बनाने की इजाजत देते हैं, जबकि भारतीय कानून 18 साल से कम उम्र के लोगों को नाबालिग मानता है.  याचिका में इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस और डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल्स, 2021 में बदलाव करने या खास गाइडलाइंस बनाने के निर्देश देने की मांग की गई है. जिससे ये सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी डिजिटल प्लेटफॉर्म माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सहमति के बिना 18 साल से कम उम्र के बच्चे के साथ सोशल मीडिया कॉन्ट्रैक्ट न कर सके, या ये कॉन्टेक्ट माता-पिता या अभिभावक के वेरिफिकेशन/e-KYC के अधीन होनी चाहिए।  बच्चों को सीधे एक्सेस देने पर सवाल याचिका में ये भी मांग की गई है कि ऐसी गाइडलाइंस बनाई जाएं जो ये जरूरी करें कि जहां भी किसी नाबालिग को डिजिटल प्लेटफॉर्म एक्सेस करने या इस्तेमाल करने की इजाजत हो, तो ऐसा एक्सेस कानूनी तौर पर मान्यता प्राप्त तरीके से हो, जिसमें माता-पिता या कानूनी अभिभावक शामिल हों. इसमें भी माता-पिता या अभिभावक का वेरिफिकेशन/e-KYC शामिल हो, जो सर्विस के नेचर और रिस्क के हिसाब से हो।  याचिका में कहा गया है कि बच्चों का डिजिटल प्लेटफॉर्म तक खुद से एक्सेस उन्हें ऑनलाइन ग्रूमिंग, यौन शोषण, ट्रैफिकिंग, बिहेवियरल प्रोफाइलिंग, पर्सनल डेटा का गलत इस्तेमाल, साइबरबुलिंग और उम्र के हिसाब से गलत कंटेंट जैसे रिस्क के खतरे में डालता है। 

लोगों को भ्रमित कर रही एआई जनित खबरें एनएमसी से जुड़ी फेक न्यूज़ सोशल मीडिया पर वायरल

लखनऊ सोशल मीडिया लोगों की दिनचर्या का एक हिस्सा बन गया है। जहां दिन भर तरह-तरह की खबरें प्रसारित और प्रचारित होती रहती हैं। देखने और पढऩे में सामान्य सी लगने वाले कई समाचार सच से कोसों दूर होते हैं। यह खबरें केवल न्यूज पेपर कटिंग तक सीमित नहीं है घटना-दुर्घटना के वीडियो भी एआई से बनाकर व्यूज बटोरने के लिए सोशल मीडिया पर वायरल किए जा रहे हैं। खबरों से प्रभावित होने वाले जब उसकी पड़ताल करते हैं तो पता चलता है कि वह समाचार एआई यानि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बना है।  तकनीक के हमेशा से ही दो पहलू रहे हैं। एक वह जो मानव सभ्यता के लिए लाभदायक होता है तो दूसरा आम आदमी का जीवन खतरे में डाल सकता है। इसी तकनीक का ताजा उदाहरण है एआई। आज के समय में हर कोई एआई का मास्टर बनना चाहता है। एआई आपकी तस्वीर को सुन्दर बनाने से लेकर कपड़े और लोकेशन तक बदल सकता है। इतना ही नहीं आप एआई की मदद से कोई भी वीडियो बना सकते हैं। आज इसी तकनीक का सहारा लेकर कई लोग फेक न्यूज़ और वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड कर व्यूज बढ़ा रहे हैं। यही लोग समाचार पत्र की कटिंग सी लगने वाली खबर भी एआई से बनाकर सोशल मीडिया में पोस्ट कर रहे हैं। कई समाचार पत्र सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली खबरों के फैक्ट जांचे बगैर ही उन्हें अखबार में जगह दे देते हैं। जो लोगों की परेशानी का सबब बन जाता ह है। फर्जी खबरों की कड़ी में एक न्यूज सोशल मीडिया पर वायरल हुई जो राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) से जुड़ी थी । जिसमें NMC द्वारा डमी फैकल्टी की लिस्ट तैयार किये जाने की जानकारी दी गयी थी। लिस्ट उन डॉक्टरों की जो तैनात तो हैं पर कॉलेज नहीं जाते। अब प्रभावित लोगों ने इसकी पड़ताल की हकीकत सामने आई कि समाचार फर्जी और एआई जनित है। लोगों का कहना है कि इससे होने वाली परेशानी से मानसिक दबाव बनाता है। कभी किसी दुर्घटना की फर्जी खबर आ जाती है तो कभी किसी प्रतियोगी परीक्षा का रिजल्ट आ जाता है। यहां तक की एआई से लोग अफसरों के नियुक्ति और आदेश पत्र बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड कर रहे हैं। और ऐसे लोगों की भी संख्या कम नहीं है जो बगैर सच को जाने समझे उस पत्र को शेयर करते चले जाते हैं। आए दिन ऐसी दर्जनों पोस्ट वायरल होती हैं जिनका सच से कोई लेना देना नहीं। किसी कोई भी जागरूक नागरिक इसकी पड़ताल करता है तब यह पता चला है कि समाचार पत्र या वीडियो एआई से जेनरेट किया गया है।

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर सख्ती, ब्रिटेन PM ने सोशल मीडिया प्रतिबंध का किया ऐलान

लंदन  ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने एक बड़ा ऐलान कर दिया है, उन्होंने बताया है कि वह अब 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन करने जा रहे हैं. ब्रिटेन अपने इस फैसले की मदद से बच्चों पर सोशल मीडिया की वजह से पड़ने वाले नकारात्मक असर को खत्म करना चाहता है।  बीते साल ऑस्ट्रेलिया ने टीनएजर्स और बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को बैन किया था. फिर उसके बाद यूरोप समेत कई देशों ने इस फैसले की तारीफ की थी. हाल ही में कनाडा ने भी ऐलान किया था कि वह सोशल मीडिया के लिए नियम बदलने जा रहा है और बच्चों के इस्तेमाल करने को लेकर नियम बदलेगा।  ब्रिटेन प्रधानमंत्री ने कहा- आसान नहीं था फैसला  कीर स्टारमर ने आगे बताया है कि यह फैसला उनके लिए आसान नहीं है. कई बड़ी कंपनियां सरकार को अपना फैसला वापस लेने के लिए दबाव डाल रही हैं, लेकिन ये फैसला होकर रहेगा।  ब्रिटेन प्रधानमंत्री ने X प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करके इस फैसले के बारे में जानकारी दी है और बताया है कि अधिकतर माता-पिता ने उनको बताया है कि उनके बच्चे स्मार्टफोन चलाने का आदि हो चुके हैं।  ब्रिटेन प्रधानमंत्री का पोस्ट  ब्रिटेन प्रधानमंत्री ने अपने पोस्ट में लिखा है कि हम 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया एक्सेस को बैन करने जा रहे हैं।   आज के दौर में बच्चों को ऐसी दुनिया में खुद को ढालना पड़ रहा है, जहां तकनीक उनकी जिंदगी के हर पहलू में दखल दे रही है. मैं अब इसे और जारी नहीं रहने दे सकता. इसलिए हम बच्चों को उनका बचपन वापस देने जा रहे हैं।  टेक कंपनियों को कई नियम लागू करने को कहा  ब्रिटेन ने हाल ही के दिनों में टेक कंपनियों के ऊपर दबाव बनाया है. सरकार ने इन कंपनियों से उम्र सत्यापन लागू करने और अपने एल्गोरिद्म में बदलाव करने के लिए के लिए कहा है. साथ ही बच्चों को अश्लील तस्वीर आदि से दूर रखने के लिए नए कदम उठाने को कहा है।  ब्रिटेन की सरकार चाहती है की ऑनलाइन गेमिंग और वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर होने वाले लाइव स्ट्रीमिंग को भी बच्चों के लिए प्रतिबंधित किया जाए। 

सोशल मीडिया पर नाबालिगों की एंट्री पर रोक, मलेशिया ने लागू किए सख्त नियम

कुआलालंपुर  मलेशिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट बनाने पर रोक लगाने वाले नए नियम लागू करना शुरू कर दिया है. यह कदम बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को मजबूत बनाने की ग्लोबल कोशिशों का हिस्सा माना जा रहा है. हालांकि इस फैसले को लेकर सभी लोग सहमत नहीं हैं और कुछ लोगों ने डेटा सुरक्षा तथा संभावित निगरानी को लेकर चिंता भी जताई है. नए नियमों के तहत मलेशिया में कम से कम 80 लाख यूजर्स वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को उम्र की जांच करने वाली व्यवस्था लागू करनी होगी. इसमें फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक और यूट्यूब जैसे बड़े प्लेटफॉर्म शामिल हैं. इन कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि 16 साल से कम उम्र के बच्चे नया अकाउंट न बना सकें।  मलेशिया सरकार ने जारी किए निर्देश मलेशिया के कम्युनिकेशन और मल्टीमीडिया कमीशन के अनुसार मौजूदा यूजर्स की उम्र का सत्यापन अगले 6 महीनों के भीतर शुरू किया जाएगा. जिन यूजर्स की उम्र 16 साल से कम है, उन्हें अपने फोटो, वीडियो और अन्य डेटा डाउनलोड या ट्रांसफर करने के लिए एक महीने का समय दिया जाएगा. इसके बाद उनके अकाउंट पर प्रतिबंध या अन्य कार्रवाई लागू की जा सकती है. सरकार ने स्पष्ट किया है कि जो सोशल मीडिया कंपनियां इन नियमों का पालन नहीं करेंगी, उन पर 1 करोड़ रिंगिट यानी लगभग 25 लाख अमेरिकी डॉलर तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. वहीं यदि कोई बच्चा नियमों को दरकिनार कर अकाउंट बनाने में सफल हो जाता है, तो उसके माता-पिता के खिलाफ कोई सजा नहीं होगी।  मलेशिया के अलावा अन्य देशों में बैन मलेशियाई सरकार का कहना है कि इन नियमों का मुख्य मकसद बच्चों को नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री, साइबर बुलिंग और सोशल मीडिया के अत्यधिक इस्तेमाल से बचाना है. सरकार का मानना है कि कुछ प्लेटफॉर्म फीचर्स बच्चों को लंबे समय तक ऑनलाइन रहने के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे उनके मानसिक और सामाजिक जीवन पर असर पड़ सकता है. दुनिया के कई अन्य देश भी बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर ऐसे कदम उठा रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील और इंडोनेशिया जैसे देशों ने सोशल मीडिया इस्तेमाल के लिए उम्र आधारित नियम लागू किए हैं या उनकी घोषणा की है. वहीं ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन, डेनमार्क, थाईलैंड और दक्षिण कोरिया जैसे देश भी इसी तरह की नीतियों पर विचार कर रहे हैं।  सोशल मीडिया को बैन करने का खास मकसद क्या है? मलेशिया के रेगुलेटरी बोर्ड ने कहा है कि इन नियमों का मकसद बच्चों को डिजिटल तकनीक से दूर करना नहीं है. बल्कि सोशल मीडिया कंपनियों को यूजर सुरक्षा बढ़ाने, अत्यधिक उपयोग को रोकने और कम उम्र के यूजर्स व नुकसान पहुंचाने वाले कंटेंट के खिलाफ प्रभावी कदम उठाने के लिए बाध्य करना है. हालांकि टेक्नोलॉजी कंपनियों ने अभी तक यह नहीं बताया है कि वे इन नियमों का पालन किस तरह करेंगी. इस बीच, क्लारा कोह ने चेतावनी दी है कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर पूरी तरह रोक लगाने से उल्टा असर भी हो सकता है. उनके अनुसार इससे किशोर सुरक्षित और नियंत्रित प्लेटफॉर्म छोड़कर इंटरनेट के ऐसे हिस्सों की ओर जा सकते हैं, जहां निगरानी और सुरक्षा के उपाय कम होते हैं।  ऑस्ट्रेलिया समेत इंडोनेशिया में सोशल मीडिया पर बैन ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध लागू किया है. यह नियम 10 दिसंबर 2025 से प्रभावी हुआ. इसके बाद इंडोनेशिया ने 28 मार्च 2026 से 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर कानूनी रोक लागू की. फ्रांस में 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध का विधेयक निचले सदन से पारित हो चुका है, हालांकि इसे अभी सीनेट की मंजूरी मिलनी बाकी है. डेनमार्क भी 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन की योजना पर काम कर रहा है।  दुनिया के कई देशों में बैन ग्रीस ने जनवरी 2027 से 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध लागू करने की तैयारी शुरू कर दी है. वहीं स्पेन, ऑस्ट्रिया, पोलैंड, स्लोवेनिया, तुर्की और ब्रिटेन जैसे देश भी बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को सीमित करने के लिए नए नियमों और संभावित प्रतिबंधों पर विचार कर रहे हैं. इटली में 14 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया इस्तेमाल करने के लिए माता-पिता की अनुमति जरूरी है. फ्रांस में पहले से लागू नियमों के तहत 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए अभिभावकों की सहमति आवश्यक है. जर्मनी में भी 13 से 16 साल की उम्र के बीच के बच्चों के लिए सोशल मीडिया अकाउंट बनाने या इस्तेमाल करने के लिए माता-पिता की अनुमति जरूरी है।   

तुर्किये ने 15 साल से कम बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन किया, संसद में विधेयक पारित

अंकारा कई देशों ने बच्चों की सुरक्षा और ऑनलाइन जोखिम कम करने के लिए सोशल मीडिया पर उम्र आधारित प्रतिबंध या सख्त नियम लागू किए हैं। इसी कड़ी में एक और देश का नाम जुड़ गया है।  तुर्किये की संसद ने देर रात एक विधेयक पारित किया, जिसमें 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया मंचों तक पहुंच सीमित करने का प्रावधान शामिल है। सरकारी मीडिया ने यह जानकारी दी। यह कानून बच्चों और किशोरों को ऑनलाइन खतरनाक गतिविधियों से बचाने की वैश्विक प्रवृत्ति के मद्देनजर लाया गया है।  सोशल मीडिया कंपनियों को चेतावनी यह विधेयक ऐसे समय में पारित हुआ है जब एक सप्ताह पहले काहरामानमाराश (दक्षिणी तुर्किये) में हुई गोलीबारी की घटना में 14 वर्षीय एक लड़के ने स्कूल में नौ छात्रों और एक शिक्षक की हत्या कर दी थी। इस घटना में हमलावर की भी मौत हो गई थी। पुलिस हमलावर की ऑनलाइन गतिविधियों की जांच कर रही है ताकि हमले के पीछे की मंशा का पता लगाया जा सके। तुर्किये की सरकारी समाचार एजेंसी अनाडोलू के अनुसार नए कानून के तहत सोशल मीडिया कंपनियों को आयु सत्यापन प्रणाली लागू करनी होगी, अभिभावक नियंत्रण (पैरेंटल कंट्रोल) के साधन उपलब्ध कराने होंगे और हानिकारक मानी जाने वाली सामग्री (कंटेंट) पर तेजी से कार्रवाई करनी होगी। अब इस विधेयक को कानून बनने के लिए राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन की मंजूरी की आवश्यकता है, जिन्हें 15 दिनों के भीतर इस पर निर्णय लेना होगा। काहरामानमाराश की घटना के बाद एर्दोआन ने बच्चों की सुरक्षा और निजता के लिए ऑनलाइन जोखिम कम करने की आवश्यकता पर बल दिया था।  सोशल मीडिया मंच  गंदगी का अड्डा बनेः एर्दोआन एर्दोआन ने सोमवार को टेलीविजन पर अपने एक संबोधन में कहा, "हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म हमारे बच्चों के दिमाग को खराब कर रहे हैं और सोशल मीडिया मंच साफ शब्दों में कहें तो गंदगी का अड्डा बन गए हैं।" मुख्य विपक्षी दल रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी (सीएचपी) ने इस प्रस्ताव की आलोचना करते हुए कहा है कि बच्चों की सुरक्षा प्रतिबंधों से नहीं बल्कि अधिकार-आधारित नीतियों से सुनिश्चित की जानी चाहिए। कानून के तहत यूट्यूब, टिकटॉक, फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया मंच 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को अकाउंट बनाने से रोकेंगे और अभिभावक नियंत्रण प्रणाली लागू करेंगे। इसके अलावा, ऑनलाइन गेम कंपनियों को भी तुर्किये में एक प्रतिनिधि नियुक्त करना होगा ताकि वे नए नियमों का पालन सुनिश्चित कर सकें। उल्लंघन की स्थिति में इंटरनेट बैंडविड्थ में कमी और जुर्माने जैसे दंड का प्रावधान है। तुर्किये सरकार पर हाल में ऑनलाइन मंचों पर प्रतिबंध लगाने के आरोप लगते रहे हैं, खासकर जब ये प्लेटफॉर्म असहमति व्यक्त करने का माध्यम बने हैं।  इन देशों में भी सख्ती कई देशों ने बच्चों की सुरक्षा और ऑनलाइन जोखिम कम करने के लिए सोशल मीडिया पर उम्र आधारित प्रतिबंध या सख्त नियम लागू किए हैं। यह सिर्फ तुर्केए  तक सीमित नहीं है, बल्कि एक वैश्विक ट्रेंड बनता जा रहा है।     Australia ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर सख्त नियम लागू किए हैं। ऑस्ट्रेलिया 10 दिसंबर 2025 से 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध (NPR) लगाने वाला विश्व का पहला देश बना।       फ्रांस की संसद 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया (टिकटॉक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट) पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक कड़े कानून पर काम कर रही है, जो BBC के अनुसार सितंबर 2026 तक लागू हो सकता है।      China सबसे सख्त देशों में शामिल है। वहां बच्चों के लिए सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग पर समय सीमा तय है और रात में उपयोग पर भी रोक है।     ब्रिटेन सरकार 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध लगाने या सख्त नियम लागू करने पर सक्रिय रूप से विचार कर रही है।   ब्रिटेन ने भी सोशल मीडिया उपयोग पर सख्त   “Online Safety” कानून के तहत प्लेटफॉर्म्स पर दबाव बढ़ाया है कि वे बच्चों को हानिकारक कंटेंट से बचाएं और उम्र सत्यापन लागू करें।

साइबर पुलिस ने सोशल मीडिया से 1616 आपत्तिजनक लिंक हटाए

चंडीगढ़. हरियाणा पुलिस द्वारा सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अवैध, आपत्तिजनक एवं भ्रामक गतिविधियों के विरुद्ध प्रारंभ किया गया विशेष अभियान एक माह सफलतापूर्वक पूर्ण कर चुका है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (Ministry of Electronics and Information Technology) के सहयोग से संचालित यह अभियान डिजिटल सुरक्षा और जिम्मेदार ऑनलाइन वातावरण सुनिश्चित करने की दिशा में अत्यंत प्रभावी एवं परिणामकारी सिद्ध हुआ है। सोशल मीडिया पर भ्रामक, उकसाने वाली तथा समाज में भ्रम या तनाव उत्पन्न करने वाली सामग्री की बढ़ती प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए यह सुनियोजित और सकारात्मक पहल शुरू की गई थी। पिछले लगभग एक माह के दौरान साइबर टीम द्वारा निरंतर मॉनिटरिंग एवं त्वरित समन्वय के माध्यम से कुल 2052 लिंक एवं प्रोफाइल रिपोर्ट किए गए, जिनमें से 1616 आपत्तिजनक सामग्री को संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स द्वारा हटाया या ब्लॉक किया जा चुका है। शेष 436  लिंक विभिन्न समीक्षा चरणों में हैं और उन पर भी शीघ्र कार्रवाई सुनिश्चित की जा रही है। अभियान के अंतर्गत साइबर टीम प्रतिदिन सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो, लिंक एवं प्रोफाइल की पहचान कर रही है जिनमें भ्रामक जानकारी, उकसाने वाली भाषा या सार्वजनिक शांति भंग करने वाला कंटेंट पाया जाता है। ऐसे मामलों में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79(3)(बी) के तहत संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को तत्काल नोटिस जारी कर सामग्री हटाने की मांग की जाती है। पूरी प्रक्रिया समयबद्ध, पारदर्शी और बिना किसी ढिलाई के संचालित की जा रही है। डीजीपी अजय सिंघल ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि सोशल मीडिया पर गलत, भ्रामक या भड़काऊ सामग्री फैलाने वालों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया आज समाज के हर वर्ग को प्रभावित करता है और किसी भी प्रकार की उकसाने वाली सामग्री सामाजिक सौहार्द एवं शांति के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि किसी भी संदिग्ध लिंक पर क्लिक न करें, निवेश से पूर्व किसी भी ऐप या प्लेटफॉर्म की विश्वसनीयता की जांच अवश्य करें, बिना पुष्टि के कोई भी संवेदनशील सामग्री साझा न करें तथा संदिग्ध पोस्ट या ऐप की सूचना तुरंत पुलिस या साइबर हेल्पलाइन पर दें।

AI क्रिएटर्स के लिए बड़ा झटका? सरकार का नया नियम सोशल मीडिया का नियम बदल देगा

 नई दिल्ली सरकार ने AI से बने कंटेंट को लेकर नए नियम लागू कर दिए हैं. अब सोशल मीडिया पर जो भी फोटो, वीडियो या ऑडियो AI टूल्स से बनेगा, उस पर साफ लेबल दिखाना जरूरी होगा. इसके लिए कंपनियों को 20 फरवरी तक का डेडलाइन मिला है.  प्लेटफॉर्म्स को यह भी पक्का करना होगा कि यूज़र सच बता रहा है या नहीं कि कंटेंट AI से बना है. भ्रामक या गैरकानूनी AI कंटेंट को तीन घंटे के अंदर हटाने का नियम भी लाया गया है. मतलब डीपफेक और फेक वीडियो पर अब ढील नहीं चलेगी. ये बदलाव 20 फरवरी 2026 से लागू होंगे. सोशल मीडिया कंपनियों के लिए असली चुनौती इन नियमों के बाद इंस्टाग्राम, यूट्यूब और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स का काम करने का तरीका बदलेगा. अभी तक AI कंटेंट अक्सर बिना पहचान के घूमता रहा है. कई बार यूज़र को पता भी नहीं चलता कि वीडियो या फोटो असली है या मशीन से बना है. अब अपलोड के वक्त ही यह जानकारी लेनी होगी कि उस वीडियो में कितना AI यूज हुआ है. यहां अब सिर्फ यूज़र की बात पर भरोसा नहीं चलेगा. प्लेटफॉर्म्स को टेक्निकल तरीके से भी चेक करना होगा. दिक्कत यह है कि हाई क्वालिटी डीपफेक आज इतने रियल लगते हैं कि सिस्टम भी कन्फ्यूज हो जाता है. ऊपर से तीन घंटे में कंटेंट हटाने की डेडलाइन बहुत टाइट है. इतने बड़े प्लेटफॉर्म पर हर केस में इतनी तेजी से एक्शन लेना आसान नहीं होगा. AI कंटेंट क्रिएटर्स के लिए क्या मुश्किलें बढ़ेंगी इन नियमों का सबसे सीधा असर उन लोगों पर पड़ेगा जो AI से रील्स, फेसस्वैप वीडियो, फेक वॉइस या जनरेटेड क्लिप्स बनाकर ग्रो कर रहे थे. अब कंटेंट पर AI का लेबल दिखेगा. मतलब जो लोग जानबूझकर रियल जैसा दिखाकर वीडियो वायरल करते थे, उनकी ट्रिक पकड़ी जाएगी. इससे क्लिकबेट और शॉक वैल्यू कम होगी. अगर नोटिस के बावजूद कोई कंटेंट क्रिएटर इसे इग्नोर करेगा तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स उन्हें हमेशा के लिए बैन कर सकती हैं. क्योंकि सरकार की तरफ से सख्त हिदायत मिल चुकी है.  AI क्रिएटर्स को अब यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी असली इंसान का चेहरा या आवाज बिना परमिशन यूज न करें. आज जो मजाक या ट्रेंड लग रहा है, वही कल कानूनी परेशानी बन सकता है. अगर प्लेटफॉर्म ने पकड़ लिया कि आपने जानबूझकर AI कंटेंट को छुपाया है, तो अकाउंट पर स्ट्राइक या बैन का रिस्क भी रहेगा. यानी अब AI से कंटेंट बनाना सिर्फ क्रिएटिव काम नहीं रहेगा. उसमें जिम्मेदारी भी जुड़ जाएगी. यूज़र का एक्सपीरियंस कैसे बदलेगा नए नियम यूज़र की आदतें भी बदलेंगे. अब फीड में दिखने वाले वीडियो या फोटो पर लेबल देखना पड़ेगा. अगर AI लिखा है, तो समझना होगा कि यह असली घटना या असली व्यक्ति का वीडियो नहीं है. इससे लोग थोड़ा रुककर सोचेंगे. अभी तक बहुत से लोग डीपफेक को सच मानकर शेयर कर देते थे. अब शायद वह आदत बदले. हालांकि एक खतरा यह भी है कि अगर हर दूसरी पोस्ट पर AI टैग दिखने लगे, तो लोग उसे इग्नोर करना शुरू कर दें. तब लेबल का असर धीरे धीरे कम हो सकता है. प्लेटफॉर्म्स के बिजनेस पर असर यह बदलाव सिर्फ टेक्निकल नहीं है. यह बिजनेस का भी सवाल है. AI कंटेंट आज सोशल मीडिया की ग्रोथ का बड़ा हिस्सा बन चुका है. रील्स और शॉर्ट्स में AI ट्रेंड्स खूब चलते हैं. अब अगर हर AI कंटेंट पर सख्त लेबल और चेकिंग होगी, तो एंगेजमेंट पैटर्न बदल सकता है. कुछ यूज़र AI कंटेंट से दूरी बना सकते हैं. वहीं ब्रांड्स और एडवर्टाइज़र ज्यादा सेफ फील करेंगे क्योंकि फेक और भ्रामक कंटेंट पर कंट्रोल बढ़ेगा. प्लेटफॉर्म्स को अब ग्रोथ और रेगुलेशन के बीच बैलेंस बनाना होगा. आगे क्या बदलेगा आने वाले वक्त में सोशल मीडिया पर कुछ भी चलेगा वाला माहौल खत्म होगा. डीपफेक, फेक डॉक्यूमेंट और बिना सहमति वाली तस्वीरों पर पहले जैसी ढील नहीं मिलेगी. सरकार साफ कह चुकी है कि प्लेटफॉर्म्स को जिम्मेदारी लेनी होगी. इसका मतलब ज्यादा मॉडरेशन टीम, बेहतर टेक और भारत के हिसाब से अलग सिस्टम बनाना पड़ेगा. कुल मिलाकर, नए AI कंटेंट नियम सोशल मीडिया को ज्यादा जिम्मेदार बनाने की कोशिश हैं. यह बदलाव एकदम परफेक्ट नहीं होगा. शुरुआत में टेक्निकल दिक्कतें आएंगी. गलतियां भी होंगी. लेकिन लंबे वक्त में सोशल मीडिया का माहौल बदलेगा. कंटेंट बनाना अब सिर्फ क्रिएटिविटी का खेल नहीं रहेगा. उसमें जवाबदेही भी जुड़ जाएगी. यही इस पूरे बदलाव की असली दिशा है. रास्ता आसान नहीं है भले ही सरकार ने डेडलाइन दे दी है, लेकिन टेक्निकल तौर पर बात करें तो ये तुरंत इंप्लिमेंट करना आसान नहीं है. क्योंकि लेबल लगाए हुए वीडियो को डाउनलोड करके फिर से अपलोड किया जा सकता है. AI डिटेक्शन सिस्टम भी पूरी तरह ठीक से काम नहीं करते हैं. कई बार वो असली को नकली और नकली को असली समझने की भी गलती कर रहे हैं.  

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर बड़ा कदम: ऑस्ट्रेलिया के बाद स्पेन-ग्रीस में सोशल मीडिया पर रोक की योजना

मैड्रिड  ऑस्ट्रेलिया के बाद अब स्पेन और ग्रीस भी नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया पर बैन लगाने की तैयारी कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया ने दिसंबर में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक पहुंच पर प्रतिबंध लगा दिया था, और अब यूरोप में भी इसी तरह की सख्ती देखने को मिल रही है। स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ ने कहा कि उनका देश 16 साल से कम उम्र के बच्चों को हानिकारक कंटेंट जैसे पोर्नोग्राफी और हिंसा से बचाने के लिए सोशल मीडिया बैन करना चाहता है। वहीं ग्रीस भी 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा कर सकता है। स्पेन और ग्रीस की यह घोषणा ऐसे समय आई है जब कई देश सोशल मीडिया को एडिक्टिव और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मान रहे हैं। यूरोप में ब्रिटेन और फ्रांस भी सोशल मीडिया पर सख्त रुख अपनाने की दिशा में हैं, जबकि ऑस्ट्रेलिया पहले ही इस दिशा में कदम उठा चुका है। स्पेन के इस प्रस्ताव पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ के मालिक एलन मस्क ने कड़ी प्रतिक्रिया दी।  मस्क ने प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ को सोशल मीडिया पर अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया और उन्हें “तानाशाह” करार दिया। मस्क ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया और सरकार के इस कदम का विरोध किया। हाल के समय में AI-जेनरेटेड कंटेंट और बिना सहमति के यौन छवियों के निर्माण की रिपोर्टों ने सोशल मीडिया के जोखिमों को उजागर किया है। विशेष रूप से नाबालिगों से जुड़ी घटनाओं ने सरकारों को सख्त नियमों की तरफ प्रेरित किया है। इस पूरे विवाद में बच्चों की सुरक्षा और डिजिटल स्वतंत्रता के बीच बहस और तेज हो गई है।