samacharsecretary.com

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर सख्ती, ब्रिटेन PM ने सोशल मीडिया प्रतिबंध का किया ऐलान

लंदन  ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने एक बड़ा ऐलान कर दिया है, उन्होंने बताया है कि वह अब 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन करने जा रहे हैं. ब्रिटेन अपने इस फैसले की मदद से बच्चों पर सोशल मीडिया की वजह से पड़ने वाले नकारात्मक असर को खत्म करना चाहता है।  बीते साल ऑस्ट्रेलिया ने टीनएजर्स और बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को बैन किया था. फिर उसके बाद यूरोप समेत कई देशों ने इस फैसले की तारीफ की थी. हाल ही में कनाडा ने भी ऐलान किया था कि वह सोशल मीडिया के लिए नियम बदलने जा रहा है और बच्चों के इस्तेमाल करने को लेकर नियम बदलेगा।  ब्रिटेन प्रधानमंत्री ने कहा- आसान नहीं था फैसला  कीर स्टारमर ने आगे बताया है कि यह फैसला उनके लिए आसान नहीं है. कई बड़ी कंपनियां सरकार को अपना फैसला वापस लेने के लिए दबाव डाल रही हैं, लेकिन ये फैसला होकर रहेगा।  ब्रिटेन प्रधानमंत्री ने X प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करके इस फैसले के बारे में जानकारी दी है और बताया है कि अधिकतर माता-पिता ने उनको बताया है कि उनके बच्चे स्मार्टफोन चलाने का आदि हो चुके हैं।  ब्रिटेन प्रधानमंत्री का पोस्ट  ब्रिटेन प्रधानमंत्री ने अपने पोस्ट में लिखा है कि हम 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया एक्सेस को बैन करने जा रहे हैं।   आज के दौर में बच्चों को ऐसी दुनिया में खुद को ढालना पड़ रहा है, जहां तकनीक उनकी जिंदगी के हर पहलू में दखल दे रही है. मैं अब इसे और जारी नहीं रहने दे सकता. इसलिए हम बच्चों को उनका बचपन वापस देने जा रहे हैं।  टेक कंपनियों को कई नियम लागू करने को कहा  ब्रिटेन ने हाल ही के दिनों में टेक कंपनियों के ऊपर दबाव बनाया है. सरकार ने इन कंपनियों से उम्र सत्यापन लागू करने और अपने एल्गोरिद्म में बदलाव करने के लिए के लिए कहा है. साथ ही बच्चों को अश्लील तस्वीर आदि से दूर रखने के लिए नए कदम उठाने को कहा है।  ब्रिटेन की सरकार चाहती है की ऑनलाइन गेमिंग और वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर होने वाले लाइव स्ट्रीमिंग को भी बच्चों के लिए प्रतिबंधित किया जाए। 

सोशल मीडिया पर नाबालिगों की एंट्री पर रोक, मलेशिया ने लागू किए सख्त नियम

कुआलालंपुर  मलेशिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट बनाने पर रोक लगाने वाले नए नियम लागू करना शुरू कर दिया है. यह कदम बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को मजबूत बनाने की ग्लोबल कोशिशों का हिस्सा माना जा रहा है. हालांकि इस फैसले को लेकर सभी लोग सहमत नहीं हैं और कुछ लोगों ने डेटा सुरक्षा तथा संभावित निगरानी को लेकर चिंता भी जताई है. नए नियमों के तहत मलेशिया में कम से कम 80 लाख यूजर्स वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को उम्र की जांच करने वाली व्यवस्था लागू करनी होगी. इसमें फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक और यूट्यूब जैसे बड़े प्लेटफॉर्म शामिल हैं. इन कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि 16 साल से कम उम्र के बच्चे नया अकाउंट न बना सकें।  मलेशिया सरकार ने जारी किए निर्देश मलेशिया के कम्युनिकेशन और मल्टीमीडिया कमीशन के अनुसार मौजूदा यूजर्स की उम्र का सत्यापन अगले 6 महीनों के भीतर शुरू किया जाएगा. जिन यूजर्स की उम्र 16 साल से कम है, उन्हें अपने फोटो, वीडियो और अन्य डेटा डाउनलोड या ट्रांसफर करने के लिए एक महीने का समय दिया जाएगा. इसके बाद उनके अकाउंट पर प्रतिबंध या अन्य कार्रवाई लागू की जा सकती है. सरकार ने स्पष्ट किया है कि जो सोशल मीडिया कंपनियां इन नियमों का पालन नहीं करेंगी, उन पर 1 करोड़ रिंगिट यानी लगभग 25 लाख अमेरिकी डॉलर तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. वहीं यदि कोई बच्चा नियमों को दरकिनार कर अकाउंट बनाने में सफल हो जाता है, तो उसके माता-पिता के खिलाफ कोई सजा नहीं होगी।  मलेशिया के अलावा अन्य देशों में बैन मलेशियाई सरकार का कहना है कि इन नियमों का मुख्य मकसद बच्चों को नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री, साइबर बुलिंग और सोशल मीडिया के अत्यधिक इस्तेमाल से बचाना है. सरकार का मानना है कि कुछ प्लेटफॉर्म फीचर्स बच्चों को लंबे समय तक ऑनलाइन रहने के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे उनके मानसिक और सामाजिक जीवन पर असर पड़ सकता है. दुनिया के कई अन्य देश भी बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर ऐसे कदम उठा रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील और इंडोनेशिया जैसे देशों ने सोशल मीडिया इस्तेमाल के लिए उम्र आधारित नियम लागू किए हैं या उनकी घोषणा की है. वहीं ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन, डेनमार्क, थाईलैंड और दक्षिण कोरिया जैसे देश भी इसी तरह की नीतियों पर विचार कर रहे हैं।  सोशल मीडिया को बैन करने का खास मकसद क्या है? मलेशिया के रेगुलेटरी बोर्ड ने कहा है कि इन नियमों का मकसद बच्चों को डिजिटल तकनीक से दूर करना नहीं है. बल्कि सोशल मीडिया कंपनियों को यूजर सुरक्षा बढ़ाने, अत्यधिक उपयोग को रोकने और कम उम्र के यूजर्स व नुकसान पहुंचाने वाले कंटेंट के खिलाफ प्रभावी कदम उठाने के लिए बाध्य करना है. हालांकि टेक्नोलॉजी कंपनियों ने अभी तक यह नहीं बताया है कि वे इन नियमों का पालन किस तरह करेंगी. इस बीच, क्लारा कोह ने चेतावनी दी है कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर पूरी तरह रोक लगाने से उल्टा असर भी हो सकता है. उनके अनुसार इससे किशोर सुरक्षित और नियंत्रित प्लेटफॉर्म छोड़कर इंटरनेट के ऐसे हिस्सों की ओर जा सकते हैं, जहां निगरानी और सुरक्षा के उपाय कम होते हैं।  ऑस्ट्रेलिया समेत इंडोनेशिया में सोशल मीडिया पर बैन ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध लागू किया है. यह नियम 10 दिसंबर 2025 से प्रभावी हुआ. इसके बाद इंडोनेशिया ने 28 मार्च 2026 से 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर कानूनी रोक लागू की. फ्रांस में 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध का विधेयक निचले सदन से पारित हो चुका है, हालांकि इसे अभी सीनेट की मंजूरी मिलनी बाकी है. डेनमार्क भी 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन की योजना पर काम कर रहा है।  दुनिया के कई देशों में बैन ग्रीस ने जनवरी 2027 से 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध लागू करने की तैयारी शुरू कर दी है. वहीं स्पेन, ऑस्ट्रिया, पोलैंड, स्लोवेनिया, तुर्की और ब्रिटेन जैसे देश भी बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को सीमित करने के लिए नए नियमों और संभावित प्रतिबंधों पर विचार कर रहे हैं. इटली में 14 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया इस्तेमाल करने के लिए माता-पिता की अनुमति जरूरी है. फ्रांस में पहले से लागू नियमों के तहत 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए अभिभावकों की सहमति आवश्यक है. जर्मनी में भी 13 से 16 साल की उम्र के बीच के बच्चों के लिए सोशल मीडिया अकाउंट बनाने या इस्तेमाल करने के लिए माता-पिता की अनुमति जरूरी है।   

तुर्किये ने 15 साल से कम बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन किया, संसद में विधेयक पारित

अंकारा कई देशों ने बच्चों की सुरक्षा और ऑनलाइन जोखिम कम करने के लिए सोशल मीडिया पर उम्र आधारित प्रतिबंध या सख्त नियम लागू किए हैं। इसी कड़ी में एक और देश का नाम जुड़ गया है।  तुर्किये की संसद ने देर रात एक विधेयक पारित किया, जिसमें 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया मंचों तक पहुंच सीमित करने का प्रावधान शामिल है। सरकारी मीडिया ने यह जानकारी दी। यह कानून बच्चों और किशोरों को ऑनलाइन खतरनाक गतिविधियों से बचाने की वैश्विक प्रवृत्ति के मद्देनजर लाया गया है।  सोशल मीडिया कंपनियों को चेतावनी यह विधेयक ऐसे समय में पारित हुआ है जब एक सप्ताह पहले काहरामानमाराश (दक्षिणी तुर्किये) में हुई गोलीबारी की घटना में 14 वर्षीय एक लड़के ने स्कूल में नौ छात्रों और एक शिक्षक की हत्या कर दी थी। इस घटना में हमलावर की भी मौत हो गई थी। पुलिस हमलावर की ऑनलाइन गतिविधियों की जांच कर रही है ताकि हमले के पीछे की मंशा का पता लगाया जा सके। तुर्किये की सरकारी समाचार एजेंसी अनाडोलू के अनुसार नए कानून के तहत सोशल मीडिया कंपनियों को आयु सत्यापन प्रणाली लागू करनी होगी, अभिभावक नियंत्रण (पैरेंटल कंट्रोल) के साधन उपलब्ध कराने होंगे और हानिकारक मानी जाने वाली सामग्री (कंटेंट) पर तेजी से कार्रवाई करनी होगी। अब इस विधेयक को कानून बनने के लिए राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन की मंजूरी की आवश्यकता है, जिन्हें 15 दिनों के भीतर इस पर निर्णय लेना होगा। काहरामानमाराश की घटना के बाद एर्दोआन ने बच्चों की सुरक्षा और निजता के लिए ऑनलाइन जोखिम कम करने की आवश्यकता पर बल दिया था।  सोशल मीडिया मंच  गंदगी का अड्डा बनेः एर्दोआन एर्दोआन ने सोमवार को टेलीविजन पर अपने एक संबोधन में कहा, "हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म हमारे बच्चों के दिमाग को खराब कर रहे हैं और सोशल मीडिया मंच साफ शब्दों में कहें तो गंदगी का अड्डा बन गए हैं।" मुख्य विपक्षी दल रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी (सीएचपी) ने इस प्रस्ताव की आलोचना करते हुए कहा है कि बच्चों की सुरक्षा प्रतिबंधों से नहीं बल्कि अधिकार-आधारित नीतियों से सुनिश्चित की जानी चाहिए। कानून के तहत यूट्यूब, टिकटॉक, फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया मंच 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को अकाउंट बनाने से रोकेंगे और अभिभावक नियंत्रण प्रणाली लागू करेंगे। इसके अलावा, ऑनलाइन गेम कंपनियों को भी तुर्किये में एक प्रतिनिधि नियुक्त करना होगा ताकि वे नए नियमों का पालन सुनिश्चित कर सकें। उल्लंघन की स्थिति में इंटरनेट बैंडविड्थ में कमी और जुर्माने जैसे दंड का प्रावधान है। तुर्किये सरकार पर हाल में ऑनलाइन मंचों पर प्रतिबंध लगाने के आरोप लगते रहे हैं, खासकर जब ये प्लेटफॉर्म असहमति व्यक्त करने का माध्यम बने हैं।  इन देशों में भी सख्ती कई देशों ने बच्चों की सुरक्षा और ऑनलाइन जोखिम कम करने के लिए सोशल मीडिया पर उम्र आधारित प्रतिबंध या सख्त नियम लागू किए हैं। यह सिर्फ तुर्केए  तक सीमित नहीं है, बल्कि एक वैश्विक ट्रेंड बनता जा रहा है।     Australia ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर सख्त नियम लागू किए हैं। ऑस्ट्रेलिया 10 दिसंबर 2025 से 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध (NPR) लगाने वाला विश्व का पहला देश बना।       फ्रांस की संसद 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया (टिकटॉक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट) पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक कड़े कानून पर काम कर रही है, जो BBC के अनुसार सितंबर 2026 तक लागू हो सकता है।      China सबसे सख्त देशों में शामिल है। वहां बच्चों के लिए सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग पर समय सीमा तय है और रात में उपयोग पर भी रोक है।     ब्रिटेन सरकार 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध लगाने या सख्त नियम लागू करने पर सक्रिय रूप से विचार कर रही है।   ब्रिटेन ने भी सोशल मीडिया उपयोग पर सख्त   “Online Safety” कानून के तहत प्लेटफॉर्म्स पर दबाव बढ़ाया है कि वे बच्चों को हानिकारक कंटेंट से बचाएं और उम्र सत्यापन लागू करें।

साइबर पुलिस ने सोशल मीडिया से 1616 आपत्तिजनक लिंक हटाए

चंडीगढ़. हरियाणा पुलिस द्वारा सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अवैध, आपत्तिजनक एवं भ्रामक गतिविधियों के विरुद्ध प्रारंभ किया गया विशेष अभियान एक माह सफलतापूर्वक पूर्ण कर चुका है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (Ministry of Electronics and Information Technology) के सहयोग से संचालित यह अभियान डिजिटल सुरक्षा और जिम्मेदार ऑनलाइन वातावरण सुनिश्चित करने की दिशा में अत्यंत प्रभावी एवं परिणामकारी सिद्ध हुआ है। सोशल मीडिया पर भ्रामक, उकसाने वाली तथा समाज में भ्रम या तनाव उत्पन्न करने वाली सामग्री की बढ़ती प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए यह सुनियोजित और सकारात्मक पहल शुरू की गई थी। पिछले लगभग एक माह के दौरान साइबर टीम द्वारा निरंतर मॉनिटरिंग एवं त्वरित समन्वय के माध्यम से कुल 2052 लिंक एवं प्रोफाइल रिपोर्ट किए गए, जिनमें से 1616 आपत्तिजनक सामग्री को संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स द्वारा हटाया या ब्लॉक किया जा चुका है। शेष 436  लिंक विभिन्न समीक्षा चरणों में हैं और उन पर भी शीघ्र कार्रवाई सुनिश्चित की जा रही है। अभियान के अंतर्गत साइबर टीम प्रतिदिन सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो, लिंक एवं प्रोफाइल की पहचान कर रही है जिनमें भ्रामक जानकारी, उकसाने वाली भाषा या सार्वजनिक शांति भंग करने वाला कंटेंट पाया जाता है। ऐसे मामलों में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79(3)(बी) के तहत संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को तत्काल नोटिस जारी कर सामग्री हटाने की मांग की जाती है। पूरी प्रक्रिया समयबद्ध, पारदर्शी और बिना किसी ढिलाई के संचालित की जा रही है। डीजीपी अजय सिंघल ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि सोशल मीडिया पर गलत, भ्रामक या भड़काऊ सामग्री फैलाने वालों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया आज समाज के हर वर्ग को प्रभावित करता है और किसी भी प्रकार की उकसाने वाली सामग्री सामाजिक सौहार्द एवं शांति के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि किसी भी संदिग्ध लिंक पर क्लिक न करें, निवेश से पूर्व किसी भी ऐप या प्लेटफॉर्म की विश्वसनीयता की जांच अवश्य करें, बिना पुष्टि के कोई भी संवेदनशील सामग्री साझा न करें तथा संदिग्ध पोस्ट या ऐप की सूचना तुरंत पुलिस या साइबर हेल्पलाइन पर दें।

AI क्रिएटर्स के लिए बड़ा झटका? सरकार का नया नियम सोशल मीडिया का नियम बदल देगा

 नई दिल्ली सरकार ने AI से बने कंटेंट को लेकर नए नियम लागू कर दिए हैं. अब सोशल मीडिया पर जो भी फोटो, वीडियो या ऑडियो AI टूल्स से बनेगा, उस पर साफ लेबल दिखाना जरूरी होगा. इसके लिए कंपनियों को 20 फरवरी तक का डेडलाइन मिला है.  प्लेटफॉर्म्स को यह भी पक्का करना होगा कि यूज़र सच बता रहा है या नहीं कि कंटेंट AI से बना है. भ्रामक या गैरकानूनी AI कंटेंट को तीन घंटे के अंदर हटाने का नियम भी लाया गया है. मतलब डीपफेक और फेक वीडियो पर अब ढील नहीं चलेगी. ये बदलाव 20 फरवरी 2026 से लागू होंगे. सोशल मीडिया कंपनियों के लिए असली चुनौती इन नियमों के बाद इंस्टाग्राम, यूट्यूब और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स का काम करने का तरीका बदलेगा. अभी तक AI कंटेंट अक्सर बिना पहचान के घूमता रहा है. कई बार यूज़र को पता भी नहीं चलता कि वीडियो या फोटो असली है या मशीन से बना है. अब अपलोड के वक्त ही यह जानकारी लेनी होगी कि उस वीडियो में कितना AI यूज हुआ है. यहां अब सिर्फ यूज़र की बात पर भरोसा नहीं चलेगा. प्लेटफॉर्म्स को टेक्निकल तरीके से भी चेक करना होगा. दिक्कत यह है कि हाई क्वालिटी डीपफेक आज इतने रियल लगते हैं कि सिस्टम भी कन्फ्यूज हो जाता है. ऊपर से तीन घंटे में कंटेंट हटाने की डेडलाइन बहुत टाइट है. इतने बड़े प्लेटफॉर्म पर हर केस में इतनी तेजी से एक्शन लेना आसान नहीं होगा. AI कंटेंट क्रिएटर्स के लिए क्या मुश्किलें बढ़ेंगी इन नियमों का सबसे सीधा असर उन लोगों पर पड़ेगा जो AI से रील्स, फेसस्वैप वीडियो, फेक वॉइस या जनरेटेड क्लिप्स बनाकर ग्रो कर रहे थे. अब कंटेंट पर AI का लेबल दिखेगा. मतलब जो लोग जानबूझकर रियल जैसा दिखाकर वीडियो वायरल करते थे, उनकी ट्रिक पकड़ी जाएगी. इससे क्लिकबेट और शॉक वैल्यू कम होगी. अगर नोटिस के बावजूद कोई कंटेंट क्रिएटर इसे इग्नोर करेगा तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स उन्हें हमेशा के लिए बैन कर सकती हैं. क्योंकि सरकार की तरफ से सख्त हिदायत मिल चुकी है.  AI क्रिएटर्स को अब यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी असली इंसान का चेहरा या आवाज बिना परमिशन यूज न करें. आज जो मजाक या ट्रेंड लग रहा है, वही कल कानूनी परेशानी बन सकता है. अगर प्लेटफॉर्म ने पकड़ लिया कि आपने जानबूझकर AI कंटेंट को छुपाया है, तो अकाउंट पर स्ट्राइक या बैन का रिस्क भी रहेगा. यानी अब AI से कंटेंट बनाना सिर्फ क्रिएटिव काम नहीं रहेगा. उसमें जिम्मेदारी भी जुड़ जाएगी. यूज़र का एक्सपीरियंस कैसे बदलेगा नए नियम यूज़र की आदतें भी बदलेंगे. अब फीड में दिखने वाले वीडियो या फोटो पर लेबल देखना पड़ेगा. अगर AI लिखा है, तो समझना होगा कि यह असली घटना या असली व्यक्ति का वीडियो नहीं है. इससे लोग थोड़ा रुककर सोचेंगे. अभी तक बहुत से लोग डीपफेक को सच मानकर शेयर कर देते थे. अब शायद वह आदत बदले. हालांकि एक खतरा यह भी है कि अगर हर दूसरी पोस्ट पर AI टैग दिखने लगे, तो लोग उसे इग्नोर करना शुरू कर दें. तब लेबल का असर धीरे धीरे कम हो सकता है. प्लेटफॉर्म्स के बिजनेस पर असर यह बदलाव सिर्फ टेक्निकल नहीं है. यह बिजनेस का भी सवाल है. AI कंटेंट आज सोशल मीडिया की ग्रोथ का बड़ा हिस्सा बन चुका है. रील्स और शॉर्ट्स में AI ट्रेंड्स खूब चलते हैं. अब अगर हर AI कंटेंट पर सख्त लेबल और चेकिंग होगी, तो एंगेजमेंट पैटर्न बदल सकता है. कुछ यूज़र AI कंटेंट से दूरी बना सकते हैं. वहीं ब्रांड्स और एडवर्टाइज़र ज्यादा सेफ फील करेंगे क्योंकि फेक और भ्रामक कंटेंट पर कंट्रोल बढ़ेगा. प्लेटफॉर्म्स को अब ग्रोथ और रेगुलेशन के बीच बैलेंस बनाना होगा. आगे क्या बदलेगा आने वाले वक्त में सोशल मीडिया पर कुछ भी चलेगा वाला माहौल खत्म होगा. डीपफेक, फेक डॉक्यूमेंट और बिना सहमति वाली तस्वीरों पर पहले जैसी ढील नहीं मिलेगी. सरकार साफ कह चुकी है कि प्लेटफॉर्म्स को जिम्मेदारी लेनी होगी. इसका मतलब ज्यादा मॉडरेशन टीम, बेहतर टेक और भारत के हिसाब से अलग सिस्टम बनाना पड़ेगा. कुल मिलाकर, नए AI कंटेंट नियम सोशल मीडिया को ज्यादा जिम्मेदार बनाने की कोशिश हैं. यह बदलाव एकदम परफेक्ट नहीं होगा. शुरुआत में टेक्निकल दिक्कतें आएंगी. गलतियां भी होंगी. लेकिन लंबे वक्त में सोशल मीडिया का माहौल बदलेगा. कंटेंट बनाना अब सिर्फ क्रिएटिविटी का खेल नहीं रहेगा. उसमें जवाबदेही भी जुड़ जाएगी. यही इस पूरे बदलाव की असली दिशा है. रास्ता आसान नहीं है भले ही सरकार ने डेडलाइन दे दी है, लेकिन टेक्निकल तौर पर बात करें तो ये तुरंत इंप्लिमेंट करना आसान नहीं है. क्योंकि लेबल लगाए हुए वीडियो को डाउनलोड करके फिर से अपलोड किया जा सकता है. AI डिटेक्शन सिस्टम भी पूरी तरह ठीक से काम नहीं करते हैं. कई बार वो असली को नकली और नकली को असली समझने की भी गलती कर रहे हैं.  

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर बड़ा कदम: ऑस्ट्रेलिया के बाद स्पेन-ग्रीस में सोशल मीडिया पर रोक की योजना

मैड्रिड  ऑस्ट्रेलिया के बाद अब स्पेन और ग्रीस भी नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया पर बैन लगाने की तैयारी कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया ने दिसंबर में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक पहुंच पर प्रतिबंध लगा दिया था, और अब यूरोप में भी इसी तरह की सख्ती देखने को मिल रही है। स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ ने कहा कि उनका देश 16 साल से कम उम्र के बच्चों को हानिकारक कंटेंट जैसे पोर्नोग्राफी और हिंसा से बचाने के लिए सोशल मीडिया बैन करना चाहता है। वहीं ग्रीस भी 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा कर सकता है। स्पेन और ग्रीस की यह घोषणा ऐसे समय आई है जब कई देश सोशल मीडिया को एडिक्टिव और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मान रहे हैं। यूरोप में ब्रिटेन और फ्रांस भी सोशल मीडिया पर सख्त रुख अपनाने की दिशा में हैं, जबकि ऑस्ट्रेलिया पहले ही इस दिशा में कदम उठा चुका है। स्पेन के इस प्रस्ताव पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ के मालिक एलन मस्क ने कड़ी प्रतिक्रिया दी।  मस्क ने प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ को सोशल मीडिया पर अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया और उन्हें “तानाशाह” करार दिया। मस्क ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया और सरकार के इस कदम का विरोध किया। हाल के समय में AI-जेनरेटेड कंटेंट और बिना सहमति के यौन छवियों के निर्माण की रिपोर्टों ने सोशल मीडिया के जोखिमों को उजागर किया है। विशेष रूप से नाबालिगों से जुड़ी घटनाओं ने सरकारों को सख्त नियमों की तरफ प्रेरित किया है। इस पूरे विवाद में बच्चों की सुरक्षा और डिजिटल स्वतंत्रता के बीच बहस और तेज हो गई है।

16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए गोवा सरकार की तैयारी, सोशल मीडिया पर प्रतिबंध जल्द लागू

पणजी मोबाइल और सोशल मीडिया बच्चों की जिंदगी का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं। छोटे बच्चे भी घंटों Instagram, Facebook, YouTube और अन्य सोशल मीडिया ऐप्स पर समय बिता रहे हैं। इसी को देखते हुए अब गोवा सरकार एक बड़ा कदम उठाने की सोच रही है। गोवा सरकार 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक लगाने पर विचार कर रही है। इस बात का संकेत खुद राज्य के मंत्री ने दिया है। उनका कहना है कि बच्चों को मोबाइल की लत, गलत कंटेंट और मानसिक दबाव से बचाना जरूरी है। सरकार का मानना है कि कम उम्र में सोशल मीडिया का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों के दिमाग और व्यवहार पर गलत असर डाल सकता है। इसी वजह से गोवा में इस तरह के नियम पर चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि अभी यह फैसला पूरी तरह लागू नहीं हुआ है, लेकिन इस खबर के सामने आते ही पूरे देश में चर्चा तेज हो गई है। माता-पिता, शिक्षक और सोशल मीडिया यूजर्स इस मुद्दे पर अपनी राय दे रहे हैं। गोवा सरकार सोशल मीडिया पर रोक क्यों लगाना चाहती है? गोवा सरकार का कहना है कि आजकल बच्चे बहुत कम उम्र में ही मोबाइल और सोशल मीडिया के आदी हो रहे हैं। घंटों स्क्रीन देखने से उनकी आंखों, नींद और दिमाग पर बुरा असर पड़ता है। इसके अलावा सोशल मीडिया पर कई बार गलत वीडियो, गलत बातें और गलत लोग भी मिल जाते हैं। बच्चे आसानी से इनके प्रभाव में आ जाते हैं। साइबर बुलिंग यानी ऑनलाइन परेशान करना भी एक बड़ी समस्या बन रही है। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए सरकार सोच रही है कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखा जाए। इससे पहले ऑस्ट्रेलिया उठा चुका ऐसा कदम ऑस्ट्रेलिया जैसे देश ने पहले ही 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर सख्त नियम बना दिए हैं। वहां बच्चों को Instagram, Facebook और TikTok जैसे ऐप्स इस्तेमाल करने की मनाही है। सरकार का कहना है कि इससे बच्चों का बचपन सुरक्षित रहेगा और वे मोबाइल से ज्यादा किताबों, खेल और परिवार के साथ समय बिताएंगे।

डिजिटल स्क्रीन का खतरा: बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर एज लिमिट जल्द लागू हो सकती है

नई दिल्ली.  भारत में सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल और बच्चों में बढ़ती डिजिटल लत को लेकर सरकार अब उम्र के आधार पर नियम बनाने पर विचार कर सकती है. देश के चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने अपनी सलाह में कहा है कि बच्चों और कम उम्र के यूजर्स के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक एक्सेस सीमित करना जरूरी हो सकता है. इकोनॉमिक सर्वे में चेतावनी दी गई है कि कम उम्र के यूजर्स सोशल मीडिया के बहुत ज्यादा इस्तेमाल और हानिकारक कंटेंट के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं. ऐसे में उम्र आधारित एक्सेस लिमिट पर पॉलिसी बनाई जा सकती है. इसके साथ ही सोशल मीडिया कंपनियों को एज वेरिफिकेशन और उम्र के हिसाब से सुरक्षित डिफॉल्ट सेटिंग लागू करने की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए. सोशल मीडिया पर बच्चों की एंट्री सीमित हो सीईए ने परिवारों को भी भूमिका निभाने की बात कही है. उन्होंने स्क्रीन टाइम की सीमा तय करने, कुछ घंटों को डिवाइस-फ्री रखने और बच्चों के साथ ऑफलाइन गतिविधियों को बढ़ावा देने की सिफारिश की है. सोशल मीडिया कंपनियों के लिए बड़ा बाजार है भारत भारत इस समय सोशल मीडिया कंपनियों के लिए एक बड़ा बाजार है. देश में करीब 75 करोड़ स्मार्टफोन और लगभग 1 अरब इंटरनेट यूजर्स हैं. हालांकि, अभी सोशल मीडिया इस्तेमाल के लिए कोई एक समान मिनिमम एज लिमिट तय नहीं है. दुनिया के कई देश इस दिशा में कदम उठा चुके हैं. ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रोक लगाई है. फ्रांस 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए बैन की तैयारी में है, जबकि ब्रिटेन, डेनमार्क और ग्रीस भी इस मुद्दे पर विचार कर रहे हैं. इकोनॉमिक सर्वे में बच्चों की डिजिटल लत पर चिंता इकोनॉमिक सर्वे में यह भी बताया गया कि स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले युवाओं में आधे से ज्यादा डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल पढ़ाई के लिए करते हैं, जबकि करीब 75 फीसदी सोशल मीडिया के लिए. रिपोर्ट के मुताबिक डिजिटल लत पढ़ाई, कामकाज की प्रोडक्टिविटी, नींद और एकाग्रता पर निगेटिव असर डालती है. CEA की सिफारिशें सरकार पर बाध्यकारी नहीं हालांकि मुख्य आर्थिक सलाहकार की सिफारिशें सरकार पर बाध्यकारी नहीं होतीं, लेकिन आमतौर पर पॉलिसी मेकिंग में इन्हें गंभीरता से लिया जाता है, इस बीच गोवा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने भी बच्चों के स्क्रीन टाइम और सोशल मीडिया रेगुलेशन पर स्टडी शुरू कर दिया है.

सोशल मीडिया पर कड़ा नियम: फ्रांस में अब 15 साल से कम उम्र वालों का प्रवेश बंद

फ्रांस फ्रांस ने बच्चों और किशोरों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर एक बड़ा और सख्त कदम उठाया है। देश की नेशनल असेंबली ने एक अहम विधेयक पारित किया है, जिसके तहत 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे अब टिकटॉक, इंस्टाग्राम, फेसबुक और स्नैपचैट जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। सरकार का कहना है कि यह फैसला बच्चों की मानसिक सेहत को बचाने, साइबर बुलिंग पर रोक लगाने और युवाओं में बढ़ती हिंसा व गलत व्यवहार की प्रवृत्तियों को कम करने के उद्देश्य से लिया गया है। उम्र सत्यापन अनिवार्य, नियम तोड़ने पर जुर्माना नए कानून के मुताबिक, सोशल मीडिया कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म पर उपयोगकर्ताओं की उम्र की सटीक जांच के लिए मजबूत तकनीकी व्यवस्था लागू करनी होगी। अगर कंपनियां इसमें विफल रहती हैं तो उन पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा। फ्रांसीसी अधिकारियों का कहना है कि पिछले 10 वर्षों में 13 से 15 वर्ष के बच्चों में डिप्रेशन और आत्महत्या के मामलों में करीब 60 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जिसमें सोशल मीडिया की भूमिका को एक बड़ा कारण माना गया है। राष्ट्रपति मैक्रोन का समर्थन फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रोन ने इस विधेयक का खुलकर समर्थन किया है। उन्होंने इसे बच्चों और किशोरों की सुरक्षा की दिशा में जरूरी कदम बताया। मैक्रोन ने कहा कि युवा वर्ग को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के नकारात्मक प्रभाव से बचाना समय की मांग है और स्क्रीन टाइम को सीमित करना बेहद जरूरी हो गया है। संसद में भारी बहुमत से पास हुआ बिल यह विधेयक नेशनल असेंबली में रात भर चली लंबी बहस के बाद पारित किया गया। मतदान में 130 सांसदों ने इसके पक्ष में जबकि 21 सांसदों ने इसके खिलाफ वोट दिया। अब यह प्रस्ताव कानून बनने से पहले मंजूरी के लिए सीनेट में भेजा जाएगा। 2026 से लागू होंगे नए नियम सरकार की योजना है कि ये नए नियम सितंबर 2026 से शुरू होने वाले शैक्षणिक सत्र से नए सोशल मीडिया खातों पर लागू किए जाएं। वहीं, जो मौजूदा खाते उम्र सीमा को पूरा नहीं करते हैं, उन्हें साल के अंत तक बंद कर दिया जाएगा। यूरोपीय संघ की भूमिका भी अहम यूरोपीय आयोग ने कहा है कि इस कानून का प्रभावी क्रियान्वयन यूरोपीय संघ के नियमों और भरोसेमंद आयु-सत्यापन प्रणालियों पर निर्भर करेगा। इस कानून के तहत शैक्षणिक प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन शिक्षा सेवाएं और डिजिटल विश्वकोश को छूट दी गई है, ताकि बच्चों की पढ़ाई और जानकारी तक पहुंच प्रभावित न हो।  

16 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया प्रतिबंध की वकालत, मद्रास हाई कोर्ट ने केंद्र को दी सलाह

मदुरै मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने केंद्र सरकार को बड़ा सुझाव दिया है कि वह ऑस्ट्रेलिया की तर्ज पर कानून लाने की संभावना तलाशे, जिसमें 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का उपयोग पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जाए. जस्टिस केके रामकृष्णन और जस्टिस जी जयचंद्रन की डिवीजन बेंच एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई कर रही थी, जिसमें इंटरनेट पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई गई. याचिकाकर्ता एस विजयकुमार ने कोर्ट में 'रिट ऑफ मैंडमस' की मांग की थी. उन्होंने पूरे देश में सभी इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स (ISP) को 'पैरेंटल विंडो' या पैरेंटल कंट्रोल सुविधा अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराने की मांग की. याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क था कि इंटरनेट पर अश्लील सामग्री और चाइल्ड सेक्शुअल अब्यूज मटेरियल (CSAM) आसानी से उपलब्ध है, जो नाबालिग बच्चों तक पहुंच रहा है. इससे बच्चों का मानसिक और भावनात्मक विकास खतरे में पड़ रहा है. हाई कोर्ट ने याचिका पर विस्तार से सुनवाई के बाद इसे निपटाते हुए कहा, 'हम समझते हैं कि ऑनलाइन CSAM वाली वेबसाइट्स और URL लगातार अपडेट होती रहती हैं और सक्रिय रहती हैं. हालांकि, इसके साथ-साथ यूजर एंड पर भी नियंत्रण जरूरी है. यह नियंत्रण केवल पैरेंट कंट्रोल ऐप या सुविधा से ही संभव है. इसके लिए अंतिम उपयोगकर्ताओं को चाइल्ड पोर्नोग्राफी के खतरे और बचाव के उपायों के बारे में जागरूक करना अनिवार्य है.' भारत में भी बने ऑस्ट्रेलिया जैसा कानून हाई कोर्ट ने आगे जोर देते हुए कहा, 'अंततः यह व्यक्तिगत चुनाव और अधिकार है कि कोई व्यक्ति ऐसी घृणित सामग्री देखे या न देखे. लेकिन बच्चों के मामले में जोखिम बहुत अधिक है, इसलिए माता-पिता की जिम्मेदारी भी उतनी ही बढ़ जाती है. याचिकाकर्ता के अधिवक्ता के सुझाव पर हम कहते हैं कि भारत सरकार ऑस्ट्रेलिया जैसे कानून की संभावना तलाश सकती है, जिसमें 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया का उपयोग वर्जित किया गया हो.' मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने अंतरिम राहत के तौर पर निर्देश दिया कि जब तक ऐसा कानून नहीं बनता, तब तक संबंधित अधिकारी जागरूकता अभियान को और अधिक प्रभावी बनाएं. सभी उपलब्ध माध्यमों से संवेदनशील समूहों, खासकर बच्चों और अभिभावकों तक संदेश पहुंचाया जाए. कोर्ट ने उम्मीद जताई कि केंद्र और राज्य स्तर पर बने आयोग इस दिशा में ठोस कार्ययोजना बनाकर उसे पूरी तरह लागू करेंगे. विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया का अंधाधुंध उपयोग बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं, साइबर बुलिंग और अनुचित सामग्री के संपर्क में आने का खतरा बढ़ा रहा है.