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दिल्ली-एनसीआर की हवा हुई खतरनाक, AQI 421 तक पहुंचा, खाप ने किसानों के खिलाफ केस पर उठाए सवाल

जींद दिवाली की रौनक अभी ठंडी भी न हुई थी कि जींद की हवा जहरीली हो चुकी है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार, मंगलवार शाम तक शहर का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 421 तक पहुँच गया, जो 'गंभीर' श्रेणी में है। यह देश का सबसे प्रदूषित शहर बन गया, जबकि रेवाड़ी के धारूहेड़ा में AQI 412 दर्ज किया गया।  विशेषज्ञों का कहना है कि पटाखों का धुआँ और हवा में ठहराव मुख्य कारण हैं। हरियाणा के 22 शहरों में AQI 'खराब' से 'गंभीर' स्तर पर पहुँच गया, जिससे ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP-2) लागू हो गया। निर्माण कार्य सीमित हो गए हैं और प्रदूषण स्रोतों पर निगरानी तेज कर दी गई है। बिना लाइसेंस के 4 करोड़ के जले पटाखें  दिवाली से पहले जींद जिले में अवैध पटाखों की बिक्री चरम पर थी। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, बिना लाइसेंस के बिना लाइसेंस के 4 करोड़ के पटाखें जले हैं, जो मुख्य रूप से पड़ोसी राज्यों से लाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद 'ग्रीन पटाखों' की सीमित अनुमति का उल्लंघन हुआ। जिला प्रशासन ने कई दुकानों पर छापेमारी की, लेकिन अवैध व्यापारियों ने सड़कों और फुटपाथों पर बिक्री जारी रखी। इससे न केवल प्रदूषण बढ़ा, बल्कि आगजनी का खतरा भी मंडराया। पुलिस ने चेतावनी दी है कि दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी, जिसमें सामान जब्ती और जुर्माना शामिल है। किसानों पर पराली जलाने के 3 मुकदमे  जींद जिले में फसल अवशेष जलाने के 3 मामले सामने आए हैं। सफीदों सदर थाना पुलिस ने मुआना गांव के साहब सिंह के खिलाफ 19 अक्तूबर को फसल अवशेष जलाने का मामला कृषि अधिकारी अमित वर्मा की शिकायत पर दर्ज किया है। जींद सदर थाना पुलिस ने बड़ौदी गांव के रविंद्र के खिलाफ 20 अक्तूबर को फसल अवशेष जलाने का मामला कृषि विभाग में सहायक तकनीकी प्रबंधक ऋषि पाल की शिकायत पर दर्ज किया है जबकि नरवाना सदर थाना पुलिस ने दनौदा कलां गांव के किसान पवन के खिलाफ 11 अक्तूबर को फसल अवशेष जलाने का मामला दर्ज किया है। माजरा खाप का तीखा प्रहार: 'सरकार किसानों को बदनाम कर रही, पटाखों पर क्यों चुप? 'इस कार्रवाई पर माजरा खाप के प्रेस प्रवक्ता ने सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा, "सरकार किसानों को बदनाम करने की कोशिश कर रही है। जब सरकार पटाखे जलाने की इजाजत दे सकती है, तो किसानों को भी पराली जलाने की इजाजत देनी चाहिए।" प्रवक्ता ने सवाल उठाया कि सैटेलाइट से किसानों की जलती पराली तो दिखाई देती है, लेकिन कंपनियों का धुआँ या दिवाली के पटाखों का धुआँ ट्रैक करने के लिए कोई सैटेलाइट क्यों नहीं? "अब कोई किसान पराली नहीं जलाता, लेकिन सरकार केवल किसानों को निशाना बना रही है।"  क्या कहते हैं विशेषज्ञ? वायु गुणवत्ता विशेषज्ञों का मानना है कि पटाखों से PM2.5 का स्तर 675 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक पहुँच गया, जो 2021 के बाद सबसे अधिक है।  पराली जलाने का योगदान 20-30% है, जबकि वाहन उत्सर्जन और उद्योग 50% से अधिक। सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्यों को चेतावनी दी है कि किसानों पर सख्ती के साथ वैकल्पिक प्रबंधन (जैसे सुपर एसएमएस मशीन) को बढ़ावा दें। जिला प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि मास्क पहनें, बाहर कम निकलें और प्रदूषण स्रोतों से दूर रहें। अगले 48 घंटों में हवा की स्थिति और बिगड़ सकती है, इसलिए सतर्क रहें।  

पराली मुद्दे पर सख्त CJI गवई, बोले – किसानों को जेल भेजने से सुधरेगी स्थिति

नई दिल्ली जैसे ही पराली के सीजन की हलचल शुरू हुई है वैसे ही एक बार फिर दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण को लेकर डिबेट शुरू हो गई है. इसी कड़ी में एक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई है. मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली बेंच ने  सुनवाई के दौरान कहा कि किसानों का सम्मान किया जाता है क्योंकि वे हमारे अन्नदाता हैं. मगर किसी को भी पर्यावरण को प्रदूषित करने की छूट नहीं दी जा सकती. कोर्ट ने सरकार से पूछा कि पराली जलाने वालों पर दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं हो रही. क्या कुछ किसानों को जेल भेजना सही मैसेज नहीं देगा?  शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर पराली जलाने वाले कुछ को जेल भेजा तो सब ठीक हो जाएंगे क्योंकि यह मिसाल कायम करेगा। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि वह पराली जलाने वाले किसानों के खिलाफ कार्रवाई चाहता है। इसके साथ ही कोर्ट ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग को तीन महीने के भीतर सभी रिक्तियों को भरने का निर्देश दिया। दिल्ली-एनसीआर में हर साल अक्टूबर में होने वाले वायु प्रदूषण से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस बीआर गवई ने बुधवार को कहा कि कुछ किसानों को पराली जलाने के लिए जेल भेजना दूसरों के लिए एक कड़ा संदेश हो सकता है। उन्होंने पूछा कि किसानों पर कार्रवाई करने से कतरा क्यों रहे हैं? तीन महीने के भीतर भरें रिक्तियां सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों में रिक्तियों को लेकर राज्यों को फटकार भी लगाई और दिल्ली से सटे राज्यों उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और पंजाब को तीन महीने के भीतर रिक्तियों को भरने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने वायु प्रदूषण रोकने के उपायों पर वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग से तीन हफ्ते में रिपोर्ट भी मांगी है। इसके अलावा कोर्ट ने वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों से वायु प्रदूषण रोकने के लिए विचार-विमर्श कर योजनाएँ बनाने को कहा है। न्यायमित्र ने क्या कहा? इससे पहले, मामले में न्यायमित्र नियुक्त अपराजिता सिंह ने CJI गवई की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया कि पराली जलाने की समस्या से निपटने के लिए किसानों को सब्सिडी और उपकरण दिए गए हैं। उन्होंने कहा, “लेकिन किसानों की भी यही कहानी है। पिछली बार, किसानों ने कहा था कि उन्हें ऐसे समय पराली जलाने के लिए कहा गया था, जब उपग्रह उस क्षेत्र से नहीं गुज़र रहा था। मुझे यह कहते हुए दुख हो रहा है कि 2018 से सुप्रीम कोर्ट ने व्यापक आदेश पारित किए हैं, और वे आपके सामने केवल लाचारी जताते हैं।” पराली का इस्तेमाल ईंधन बनाने के लिए हो सकता है? CJI ने पूछा इस पर CJI ने सवाल किया कि अधिकारी इस मुद्दे को सुलझाने के लिए दंडात्मक प्रावधानों पर विचार क्यों नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा, "अगर कुछ लोग सलाखों के पीछे जाएंगे, तो इससे सही संदेश जाएगा। आप किसानों के लिए दंडात्मक प्रावधानों के बारे में क्यों नहीं सोचते? अगर पर्यावरण की रक्षा करने का आपका सच्चा इरादा है, तो फिर आप क्यों पीछे हट रहे हैं?" CJI ने आगे कहा, "किसान हमारे लिए खास हैं, और हम उनकी बदौलत खा रहे हैं… लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम पर्यावरण की रक्षा नहीं कर सकते।" सीजेआई बीआर गवई ने इस दौरान ये भू पूछा कि क्या जलाई जाने वाली पराली का इस्तेमाल ईंधन बनाने के लिए भी किया जा सकता है। उन्होंने कहा, “मैंने कुछ अखबारों में ऐसा पढ़ा है।” हर साल अक्टूबर-नवंबर में दिल्ली की हवा हो जाती है जहरीली बता दें कि पड़ोसी राज्य पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने के कारण साल अक्टूबर और नवंबर में दिल्ली की हवा जहरीली हो जाती है और प्रदूषण का स्तर खतरनाक स्थिति में पहुंच जाता है। किसान खेतों से पराली को हटाने के लिए उसे जला देते हैं। इसके विकल्प के तौर पर खेतों को साफ़ करने के लिए विशेष मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है। किसानों का तर्क है कि ये विकल्प काफ़ी महंगे हैं। इसलिए पराली जलाने की घटनाएँ हर साल सामने आती रहती हैं, हालाँकि दर्ज मामलों में कमी आई है।