samacharsecretary.com

सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: सरकार को कानून बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकते

नईदिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने  हेट स्पीच से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कुछ बेहद अहम टिप्पणियां की हैं। SC ने कहा है कि कोर्ट सरकार को इस मामले में कानून बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। उच्चतम न्यायालय ने इस दौरान देश भर में नफरती भाषण पर रोक लगाने के लिए कोई भी नई दिशा-निर्देश जारी करने से मना कर दिया। SC ने कहा कि अदालतें संसद या राज्य विधानसभाओं को नए कानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकतीं। वे ज्यादा से ज्यादा सुधार की जरूरत की ओर ध्यान आकर्षित कर सकती हैं, लेकिन कानून बनाने का फैसला सरकार का ही होगा। सुप्रीम कोर्ट में याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई चल रही थी। इनमें केंद्र सरकार को हेट स्पीच के लिए लागू मौजूदा कानून की जांच करने और इन्हें और ज्यादा असरदार बनाने का निर्देश देने की मांग वाली याचिकाएं भी थीं। याचिका खारिज करते हुए जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने कहा, "हालांकि अदालत कार्रवाई की जरूरत की ओर ध्यान दिला सकती है, लेकिन वह विधायिका को कानून बनाने का काम करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।” पीठ ने आगे इस बात पर जोर दिया कि कानून बनाना और उसे लागू करना पूरी तरह से लेजिस्लेचर के अधिकार क्षेत्र में आता है। बेंच ने कहा, “ज्यादा से ज्यादा, कोर्ट विधायिका का ध्यान बढ़ती हुई चिंता की ओर दिला सकती है और यह सिफारिश कर सकती है कि उचित उपायों पर विचार किया जाए। लेकिन सरकार इन टिप्पणियों पर कार्रवाई करती है या नहीं, और किस तरीके से करती है, यह पूरी तरह से उनके विवेक पर निर्भर करता है।” हेट स्पीच पर पहले से कानून कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसा नहीं है कि हेट स्पीच की समस्या से निपटने के लिए कोई कानून नहीं है या मौजूदा कानूनी ढांचे में ऐसे अपराधों से निपटने के लिए कोई सिस्टम नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि असली चिंता कानून का अभाव नहीं, बल्कि उसे लागू करने को लेकर है। पीठ ने कहा कि कई स्तरों पर कानन बनाए गए हैं। अगर पुलिस एफआईआर नहीं दर्ज करती है, तो पीड़ित व्यक्ति वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से संपर्क कर सकता है और उसके बाद मजिस्ट्रेट के पास गुहार लगा सकता है। पीठ ने आगे कहा कि समस्या कानूनी प्रावधानों की कमी से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर उनके लागू न होने से पैदा होती है।

अतिक्रमण कार्रवाई पर Supreme Court of India ने हस्तक्षेप से किया इनकार

गुरुग्राम गुरुग्राम में अतिक्रमण के खिलाफ चल रही तोड़फोड़ कार्रवाई के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने हस्तक्षेप से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता को संबंधित हाईकोर्ट का रुख करने की सलाह दी है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर हाईकोर्ट के आदेश की गलत व्याख्या हो रही है, तो वहीं उचित मंच है जहां इस पर तत्काल सुनवाई कराई जा सकती है. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच के समक्ष वरिष्ठ वकील गोपाल शंकर नारायण ने दलील दी कि गुरुग्राम में स्थानीय प्रशासन बिना नोटिस दिए तोड़फोड़ कर रहा है और यह कार्रवाई सुबह 9 बजे से जारी है. उन्होंने कोर्ट से कम से कम चार दिन के लिए यथास्थिति बनाए रखने का अनुरोध किया. इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, ‘अगर हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश की गलत व्याख्या की जा रही है तो उसे वहीं चुनौती दी जानी चाहिए. यह मांग सीधे यहां क्यों लाई गई?’ कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि अगर निर्माण अनाधिकृत हैं और हाईकोर्ट अपने संवैधानिक दायित्व को निभा रहा है, तो सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की जरूरत क्यों होनी चाहिए. याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि संबंधित निर्माण पूरी तरह वैध हैं और मौके पर परिवार व बच्चे मौजूद हैं, ऐसे में तत्काल राहत जरूरी है. हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को सुनने के बाद याचिकाकर्ता को दिन में ही हाईकोर्ट के समक्ष मेंशनिंग करने की स्वतंत्रता दे दी. सुप्रीम कोर्ट ने मामले की विशेष अनुमति याचिका (SLP) का निपटारा करते हुए कहा कि हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से दोपहर 1 बजे या लंच के तुरंत बाद सुनवाई का अनुरोध किया जा सकता है. अब इस पूरे मामले में अगली अहम सुनवाई हाईकोर्ट में होने की संभावना है, जिस पर सभी की नजरें टिकी हैं.  

जमीन घोटाले में फंसे आईएएस विनय चौबे को बेल, शराब केस बना रुकावट

रांची  झारखंड के प्रशासनिक गलियारे से बड़ी खबर है। जमीन घोटाला मामले में आरोपी आईएएस विनय कुमार चौबे को देश की सर्वोच्च अदालत से जमानत मिल गई है। हालांकि कोर्ट का यह आदेश उनके लिए आधी राहत जैसा है, क्योंकि बेल मिलने के बावजूद वे फिलहाल सलाखों के पीछे ही रहेंगे। विनय चौबे के खिलाफ केवल एक ही मामला नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने हजारीबाग जमीन मामले में उन्हें बेल दी है, लेकिन वे एक अन्य बड़े घोटाले (शराब नीति से जुड़े मामले) में भी आरोपी हैं। तकनीकी तौर पर जब तक किसी व्यक्ति को उन सभी मामलों में जमानत नहीं मिल जाती जिनमें वह न्यायिक हिरासत में है, तब तक उसकी रिहाई मुमकिन नहीं होती। इसी कारण उन्हें अभी बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार (होटवार जेल) में ही वक्त बिताना होगा। कोर्ट की सख्त शर्तें: पासपोर्ट और गवाहों पर नजर सुप्रीम कोर्ट ने विनय चौबे को जमानत देते हुए कुछ कड़ी शर्तें लागू की हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि:     वे बिना पूर्व अनुमति के देश छोड़कर बाहर नहीं जा सकते।     मामले से जुड़े किसी भी गवाह से संपर्क करने या उन्हें डराने-धमकाने पर उनकी जमानत रद्द की जा सकती है।     जांच एजेंसी जब भी बुलाएगी, उन्हें सहयोग करना होगा। flashback: पद का दुरुपयोग और जमीन की हेराफेरी विनय कुमार चौबे पर लगे आरोपों की जड़ें उनके हजारीबाग में उपायुक्त (DC) रहने के कार्यकाल से जुड़ी हैं। यह मामला झारखंड के उस बड़े लैंड स्कैम का हिस्सा है जिसने पूरे राज्य की राजनीति को गरमा रखा है। 1. हजारीबाग जमीन घोटाला आरोप है कि हजारीबाग में डीसी पद पर तैनात रहते हुए विनय चौबे ने भू-माफियाओं के साथ साठगांठ की। उन पर प्रतिबंधित श्रेणी की सरकारी जमीनों (गैर-मजरूआ) के अवैध हस्तांतरण, म्यूटेशन और बिक्री में नियमों की अनदेखी करने का आरोप है। जांच एजेंसियों के अनुसार, फर्जी दस्तावेजों के जरिए कीमती जमीनों को निजी हाथों में सौंपने का खेल उनके कार्यकाल में बड़े पैमाने पर हुआ। 2. शराब घोटाले का साया जमीन के अलावा विनय चौबे झारखंड के बहुचर्चित 'शराब घोटाले' में भी मुख्य अभियुक्तों में से एक हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने उत्पाद विभाग के सचिव रहते हुए छत्तीसगढ़ की तर्ज पर झारखंड में शराब की नई नीति लागू कराई, जिससे सरकारी राजस्व को करोड़ों का नुकसान हुआ और चुनिंदा सिंडिकेट को फायदा पहुँचाया गया। इसी मामले की वजह से उनकी रिहाई अटकी हुई है। 3. रसूख से जेल तक का सफर झारखंड कैडर के 1999 बैच के आईएएस अधिकारी विनय चौबे सत्ता के बेहद करीब माने जाते थे। वे मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे। भ्रष्टाचार के इन गंभीर आरोपों और प्रवर्तन निदेशालय (ED) व एसीबी की कार्रवाई ने उनकी चमक कम कर दी और आखिरकार उन्हें जेल जाना पड़ा।  

चुनाव के कारण हम अंधे नहीं हो सकते: सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, निर्वाचन आयोग को दिया जवाब देने का आदेश

 नई दिल्ली पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले चल रहे वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिव्यू' (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है. कोर्ट ने कहा कि मतदाताओं का चुनावी सूची में बने रहने का अधिकार लगातार बना रहता है. इसे किसी भी हाल में चुनावी दबाव के कारण प्रभावित नहीं किया जा सकता।  सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि लोकतंत्र में वोटर का अधिकार केवल कानूनी नहीं, बल्कि भावनात्मक महत्व भी रखता है. कोर्ट की टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब राज्य में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और मतदाता सूची को लेकर लगातार विवाद सामने आया है।  यह मामला उन मतदाताओं की याचिका से जुड़ा है, जिनके नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं. उनकी अपीलें अभी अपीलीय ट्रिब्यूनल के सामने लंबित हैं. याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि वोटर लिस्ट को अंतिम रूप देने की कट-ऑफ तारीख आगे बढ़ाई जाए, ताकि अपील मंजूर होने पर वे मतदान कर सकें।  चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि चुनावों की गहमागहमी और दबाव के बीच भी अदालत मतदाताओं के अधिकारों को नजरअंदाज नहीं कर सकती. बेंच ने कहा, ''जिस देश में आपका जन्म हुआ है, वहां वोटर बने रहने का अधिकार केवल संवैधानिक नहीं है।  कोर्ट ने कहा कि ये एक भावनात्मक अधिकार भी है. हमें इसकी रक्षा करनी होगी. भारत निर्वाचन आयोग ने बताया कि वोटर लिस्ट को 9 अप्रैल की तारीख के आधार पर अंतिम रूप दे दिया गया है. हालांकि, कोर्ट ने इस प्रक्रिया में कुछ कमियों की ओर इशारा किया. लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी जैसी नई श्रेणी पर सवाल उठाए।  बेंच ने यह भी याद दिलाया कि पहले के मामलों में आयोग ने 2002 की मतदाता सूची के लोगों से अतिरिक्त दस्तावेज मांगने की जरूरत नहीं बताई थी. याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि भारत निर्वाचन आयोग अपील प्रक्रिया में जरूरी दस्तावेज समय पर उपलब्ध नहीं करा रहा है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।  जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने इस पर जोर देते हुए कहा कि इतनी बड़ी संख्या में मामलों की जांच के दौरान त्रुटियों की संभावना बनी रहती है, इसलिए एक मजबूत और प्रभावी अपीलीय तंत्र बेहद जरूरी है. उन्होंने कहा कि जब एक दिन में सैकड़ों-हजारों दस्तावेजों की जांच होती है, तो पूर्ण सटीकता की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं है।  पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव दो चरणों में 23 और 29 अप्रैल को होने हैं, जबकि मतगणना 4 मई को होगी. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी बेहद अहम है. इसका सीधा असर उन मतदाताओं पर पड़ सकता है, जिनकी चुनावी भागीदारी फिलहाल अनिश्चित बनी हुई है. कोर्ट का अंतिम रुख चुनावी प्रक्रिया की दिशा तय कर सकता है। 

कर्मचारियों के प्रतिनिधिमंडल को स्कूल शिक्षा मंत्री ने दिया भरोसा, पात्रता परीक्षा पर सरकार सुप्रीम कोर्ट में रखेगी पक्ष

भोपाल  स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने राज्य कर्मचारी संघ और शिक्षकों के प्रतिनिधिमंडल से कहा है कि तकनीकी एवं विधि सम्मत कार्यवाही की प्रकिया के उपरांत सरकार शीघ्र ही उच्चतम न्यायालय में प्रदेश के शिक्षकों का पक्ष रखेगी। सरकार जल्दबाजी में शिक्षकों की विपरीत कोई भी निर्णय नहीं करेगी। शिक्षकों की पात्रता परीक्षा को लेकर मध्यप्रदेश राज्य कर्मचारी संघ एवं शिक्षक संघ के प्रतिनिधियों ने स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप से मुलाकात कर समस्याएं बताईं। प्रतिनिधि मंडल ने संयुक्त रूप शिक्षा मंत्री से पात्रता परीक्षा को लेकर प्रदेश के शिक्षकों का पक्ष रखा तथा सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट मे पक्ष रखने का आग्रह किया। इसके बाद शिक्षा मंत्री ने आश्वस्त किया कि सरकार शिक्षकों के साथ है, हम शिक्षकों के पक्ष में पूरी तरह से खड़े हुए हैं। सरकार जल्दबाजी में कोई निर्णय नहीं करेगी राज्य कर्मचारी संघ के प्रदेश प्रवक्ता डॉ. अनिल भार्गव वायु ने जानकारी दी है कि तकनीकी एवं विधि सम्मत कार्यवाही की प्रकिया के उपरांत सरकार शीघ्र ही उच्चतम न्यायालय में प्रदेश के शिक्षकों का पक्ष रखेगी। सरकार जल्दबाजी में कोई भी शिक्षकों की विपरीत निर्णय नहीं करेगी। प्रतिनिधि मंडल मे भारतीय मजदूर संघ के प्रदेश महामंत्री कुलदीप सिंह गुर्जर, मध्य प्रदेश शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष क्षत्रवीर सिंह राठौड़, मध्य प्रदेश राज्य कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत श्रीवास्तव एवं प्रदेश महामंत्री जितेंद्र सिंह उपस्थित रहे। प्रदेश के समस्त शिक्षक एकजुट हैं मध्य प्रदेश राज्य कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत श्रीवास्तव ने कहा कि “प्रदेश के समस्त शिक्षक एकजुट हैं और अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं। हमें विश्वास है कि सरकार शिक्षकों के हितों की रक्षा करते हुए न्याय दिलाएगी।” शिक्षकों का पक्ष मजबूती से रखेंगे मध्य प्रदेश शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष क्षत्रवीर सिंह राठौड़ ने भी कहा कि “शिक्षकों का पक्ष पूरी मजबूती से रखा है और हमें पूर्ण विश्वास है कि सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे। प्रदेश महामंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि “सरकार के सकारात्मक रुख से प्रदेश के शिक्षकों में विश्वास मजबूत हुआ है। हम सभी शिक्षक एकजुट होकर अपने अधिकारों की रक्षा के लिए प्रयासरत हैं और न्याय मिलने की पूरी आशा है।” '28 साल बाद मांग रहे योग्यता का प्रमाण' रायसेन जिले में बतौर शिक्षक सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाली नेहा पटेल टेट परीक्षा के खिलाफ लोक शिक्षण संचालनालय पर प्रदर्शन करने पहुंची. वह कहती हैं कि "उन्हें स्कूलों में बच्चों को पढ़ाते हुए 28 साल का वक्त बीत चुका है. इस दौरान उनके पढ़ाए हुए कई बच्चे सरकारी नौकरी में हैं और कुछ बच्चे अच्छे पदों तक पहुंचे हैं लेकिन आज मुझे ही मेरी योग्यता का प्रमाण पात्रता परीक्षा के रूप में मांगा जा रहा है।  महाराष्ट्र राज्य से संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय केन्द्र सरकार ने 2009 में शिक्षा का अधिकार कानून पूरे देश में लागू किया था. सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र राज्य से संबंधित एक मामले में और अन्य याचिकाओं पर निर्णय दिया था कि प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में कार्यरत सभी शिक्षकों को टीईटी परीक्षा पास करना जरूरी होगा. जिन शिक्षकों का रिटायरमेंट 5 साल रह गया है, उन्हें इससे छूट दी गई है. परीक्षा पास न होने पर टीचर्स को रिटायर्ड कर दिया जाएगा. सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद मध्य प्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा भी परीक्षा को पास करने का आदेश जारी कर दिया गया।  सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए मध्य प्रदेश के सभी शिक्षकों को टीईटी परीक्षा पास करने के निर्देश दिए गए हैं. यह परीक्षा संभवता जुलाई और अगस्त माह में होगी. हालांकि इसको लेकर सवाल उठाया जा रहा है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय महाराष्ट्र के संबंध में दिया और मध्य प्रदेश इसमें पक्षकार ही नहीं था, तब भी इसे प्रदेश में क्यों लागू कर दिया गया।  नई परीक्षा शर्त लागू करना अनुचित शिक्षकों ने बताया कि वह वर्षों से शिक्षा विभाग में नौकरी कर रहे हैं और सभी पात्रता मापदंड को पूरा करने के बाद ही भर्ती हुए हैं। उनके द्वारा विषय के अनुसार बच्चों को पढ़ाया जा रहा है, लेकिन अचानक से नई परीक्षा की शर्त उनके ऊपर थोप देना कहीं से भी न्याय ओचित्य नहीं है। आदेश के बाद लाखों शिक्षकों के भविष्य पर संकट खड़ा हो रहा है। इधर पात्रता परीक्षा का आदेश जारी होने के बाद शिक्षकों के लिए काम करने वाले संगठन भी एकजुट हो गए हैं। उन्होंने भी आदेश के विरोध में कहा है कि प्रदेश में कई शिक्षक 20-25 साल से विभाग को अपनी सेवाएं दे रहे हैं, जब उनकी नियुक्ति हुई थी तब सेवा शर्तों में पात्रता परीक्षा की अनिवार्यता नहीं थी। ऐसे में इतने वर्ष बाद नई शर्त को लागू कर परीक्षा लेना नियमों के विपरीत है। संयुक्त संगठन का आरोप है की डीपीआई जो आदेश परीक्षा को लेकर जारी किया है। उसमें राज्य सरकार से औपचारिक मंजूरी नहीं ली गई है। दरअसल लोक शिक्षण संचनालय ने 3 मार्च को एक आदेश जारी किया था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए वर्तमान में सेवाएं दे रहे। शिक्षकों के लिए जुलाई अगस्त में टीईटी परीक्षा आयोजित करने के निर्देश दिए गए थे। निर्देश मिलने के बाद से ही शिक्षकों के बीच हड़कंप मचा हुआ है। शिक्षकों ने लगाया परेशान करने का आरोप डीपीआई पहुंचे शिक्षकों ने अपने विभाग पर परेशान करने का आरोप लगाते हुए कहा कि हर काम में शिक्षकों को आगे किया जाता है। चुनाव ड्यूटी, बीएलओ, एसआईआर,जनगणना जैसे महत्वपूर्ण कामों में शिक्षकों की ड्यूटी लगाई जाती है और वह बच्चों को पढ़ाने के साथ पूरी ईमानदारी से दिए हुए कामों को पूरा करते हैं। कुछ शिक्षकों ने कहा कि वर्तमान समय में जनगणना का काम चल रहा है, उसमें उनकी ड्यूटी लगाई गई है। इसके ऊपर विभाग ने आदेश जारी कर जुलाई अगस्त में परीक्षा लेने की बात कही है। शिक्षक स्कूल में बच्चों की पढ़ाई भी करवा रहे हैं, जनगणना भी कर रहे हैं। ऐसे में उन्हें परीक्षा के लिए पढ़ाई का समय कैसे मिलेगा यह सोचने वाली बात है। शिक्षकों ने कहा कि विभाग उन्हें परेशान करने का काम कर रहा है। कई शिक्षक परीक्षा की बात से चिंतित होकर तनाव में आ रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट की लताड़: जाति मुक्त समाज का वादा, अब हम खुद बांटने लगे

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को जमकर लताड़ा। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि देश में हमें एक जाति मुक्त समाज बनाना था, लेकिन हम लगातार बंटते जा रहे हैं। इसके साथ ही देश की सर्वोच्च अदालत ने 2027 की जनगणना में 'विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों' की अलग से गणना करने की मांग वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह एक नीतिगत निर्णय है और यह न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र का विषय नहीं है। हालांकि कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपनी बात रखने की छूट दी है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, "भारत एक बहुत ही अनूठा देश है। एक जातिविहीन समाज विकसित करने के बजाय, हम अधिक से अधिक वर्गीकरण बनाना चाहते हैं।" जब याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि सरकार भी इसके पक्ष में है तो सीजेआई ने संदेह जताते हुए कहा, "ये बहुत ही नपे-तुले कदम हैं। ये कोई साधारण दावे नहीं हैं जो अचानक हमारे सामने आ गए हैं। यह समाज को विभाजित करने की एक बहुत ही गहरी साजिश है। ये एजेंसियां भारत के भीतर की नहीं हैं। यदि हम जांच करेंगे, तो पता चल जाएगा कि इन्हें कहां से रूट किया जा रहा है।" DNT समुदाय के नेता दक्षकुमार बजरंगे और अन्य की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने दलील दी कि इन समुदायों ने ऐतिहासिक अन्याय सहा है। अंग्रेजों ने इन्हें आपराधिक जनजाति (Criminal Tribes) करार दिया था। वर्तमान जनगणना फॉर्म में केवल एससी, एसटी और 'अन्य' की श्रेणियां हैं। याचिकाकर्ताओं की मांग थी कि एक अलग विकल्प दिया जाए ताकि इन समुदायों की सटीक जनसंख्या का पता चल सके। अंतिम गणना 1913 में दवे ने कोर्ट को बताया कि आखिरी बार इन समुदायों की गणना 1913 में हुई थी। इदाते आयोग (2017) और रेनके आयोग (2008) जैसी कई समितियों ने भी इनकी अलग से गिनती की सिफारिश की है। याचिका में कहा गया है कि भारत में लगभग 10 से 12 करोड़ की आबादी वाले इन समुदायों को आजादी के बाद कभी अलग से नहीं गिना गया। आंकड़ों के अभाव के कारण ये समुदाय कल्याणकारी योजनाओं और आरक्षण का लाभ उठाने में असमर्थ हैं। 1871 के 'क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट' के कारण इन पर जो कलंक लगा था, वह कानून रद्द होने के बावजूद आज भी सामाजिक और आर्थिक रूप से इनका पीछा कर रहा है। कोर्ट का अंतिम फैसला पीठ ने मामले का निपटारा करते हुए कहा कि जनगणना की प्रक्रिया में वर्गीकरण या उप-वर्गीकरण करना पूरी तरह से केंद्र सरकार और विशेषज्ञों के कार्यक्षेत्र में आता है। कोर्ट ने कहा, "हमारी सुविचारित राय में याचिकाकर्ताओं द्वारा मांगी गई मांग नीतिगत दायरे में आती है, जिस पर निर्णय भारत सरकार के सक्षम प्राधिकारी को लेना है। यह न्यायसंगत मुद्दा नहीं है।" अदालत के इस फैसले के बाद अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है कि वह आगामी 2027 की जनगणना में इन समुदायों की पहचान के लिए क्या कदम उठाती है।

सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल को फटकार: हर चीज में ED मत घसीटिए, CM केस में जज सख्त

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम सुनवाई के दौरान प्रवर्तन निदेशालय (ED) और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच चल रहे विवाद में महत्वपूर्ण सवाल उठाते हुए पूछा है कि क्या किसी सरकारी अधिकारी के मौलिक अधिकार नहीं होते हैं या केवल अधिकारी होने के कारण वे अपने मौलिक अधिकार खो देते हैं? जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि ED के कुछ अधिकारियों ने इस मामले में व्यक्तिगत रूप से भी याचिका दायर की है। ऐसे में यह तर्क देना कि प्रवर्तन निदेशालय अनुच्छेद 32 के तहत याचिका नहीं दायर कर सकती। यह याचिका पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर एक राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म I-PAC के खिलाफ की गई तलाशी अभियानों में कथित हस्तक्षेप के आरोप में दायर की गई थी। कोर्ट ने साफ कहा, “क्या ED के अधिकारी अधिकारी हो जाने की वजह से इस देश के नागरिक नहीं रह जाते? उनके मौलिक अधिकारों का क्या?” पीठ ने कहा कि ED के कुछ अधिकारियों ने अपनी व्यक्तिगत क्षमता में अदालत में याचिका दायर की है। पीठ ने यह भी चेताया कि केवल “ED, ED, ED” कहकर मामले को नहीं देखा जा सकता, बल्कि उन अधिकारियों के अधिकारों पर ध्यान देना जरूरी है जो कथित रूप से प्रभावित हुए हैं। सिर्फ 'ED, ED, ED' की रट न लगाएं बार एंड बेंच के मुताबिक, जस्टिस मिश्रा ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा, "कृपया ED के उन अधिकारियों के मौलिक अधिकारों पर ध्यान केंद्रित करें, जिनके संबंध में अपराध किया गया है। अन्यथा, आप मुख्य मुद्दे से भटक जाएंगे। आप उस दूसरी याचिका को नहीं भूल सकते, जिसे उन व्यक्तिगत अधिकारियों ने दायर किया है, जो इस अपराध के पीड़ित हैं। मैं आपको बता रहा हूं, आप मुश्किल में पड़ जाएंगे। सिर्फ 'ED, ED, ED' की रट न लगाएं।" राज्य सरकार का पक्ष पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि जांच करना कोई मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि एक वैधानिक (statutory) अधिकार है। उन्होंने कहा कि अगर जांच में बाधा आती है, तो उसका समाधान कानून के तहत है, न कि अनुच्छेद 32 के जरिए। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि हम किसी कानून की व्याख्या किसी विशेष परिस्थिति के संदर्भ में करके, आपराधिक कानून की मूल विशेषताओं के विपरीत जाकर 'मुसीबतों का पिटारा' (Pandora’s box) नहीं खोल सकते।" सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट रुख कोर्ट ने चुनावी समय का हवाला देकर सुनवाई टालने की मांग भी खारिज कर दी। जस्टिस मिश्रा ने कहा, “हम न चुनाव का हिस्सा बनना चाहते हैं, न किसी अपराध का।” यह टिप्पणी इस बात का संकेत है कि कोर्ट इस मामले को गंभीरता से देख रहा है और इसे टालने के पक्ष में नहीं है। पूरा मामला क्या है? यह विवाद जनवरी में तब शुरू हुआ, जब ED ने पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म I-PAC के ठिकानों पर छापेमारी की। आरोप है कि उस दौरान सीएम ममता बनर्जी मौके पर पहुंचीं थी और उन्होंने कुछ दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण वहां से हटा लिए थे। ED का दावा है कि इससे उनकी जांच प्रभावित हुई। यह जांच कथित कोयला तस्करी मामले से जुड़ी है, जिसमें कारोबारी अनूप माजी पर आरोप हैं। कानूनी पेच: अनुच्छेद 32 बनाम वैधानिक अधिकार इस केस का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कोई सरकारी एजेंसी या उसके अधिकारी मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का हवाला देकर सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं? या उन्हें केवल सामान्य कानूनी प्रक्रिया (जैसे FIR, पुलिस कार्रवाई) का सहारा लेना चाहिए? यह मामला सिर्फ एक जांच एजेंसी और राज्य सरकार के टकराव तक सीमित नहीं है, बल्कि केंद्र बनाम राज्य की शक्तियों, जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता और अधिकारियों के मौलिक अधिकार जैसे बड़े मुद्दों को भी छू रहा है। ऐसे में ED बनाम ममता बनर्जी का मामला अब एक महत्वपूर्ण संवैधानिक बहस में बदल चुका है। सुप्रीम कोर्ट का यह सवाल “क्या अधिकारी नागरिक नहीं हैं?” आने वाले समय में कानून की व्याख्या और जांच एजेंसियों की भूमिका दोनों को नई दिशा दे सकता है।

Kolkata Metro प्रोजेक्ट में देरी पर Supreme Court of India नाराज, बंगाल सरकार से मांगा जवाब

नई दिल्ली कोलकाता मेट्रो के निर्माण में देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को फटकार लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ अधिकारियों के अड़ियल रवैये को दिखाता है, जिसके तहत वे कोलकाता शहर में मेट्रो रेल प्रोजेक्ट में देरी करना और उसे रोकना चाहते हैं। सीजेआई ने कहा कि हर चीज का राजनीतिकरण न करें। यह विकास से जुड़ा मुद्दा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट द्वारा दिए गए आदेश में कोई कमी नहीं थी। हमें पूरा भरोसा है कि यह प्रोजेक्ट तय समय सीमा के भीतर ही पूरा किया जाएगा। जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने राज्य सरकार से कहा कि क्या आपके लिए विकास से ज़्यादा त्योहार जरूरी हैं? ऐसा नहीं है कि आप अपनी मर्ज़ी से कर रहे हैं, आप अपने कर्तव्य से बंधे हैं। आपने हाई कोर्ट से कहा था कि आपको त्योहारों का इंतजाम करना है। परिवहन के लिए एक अहम सड़क बनाने से ज्यादा जरूरी त्योहार हैं। हमें लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार से यह उम्मीद नहीं है कि सरकार यह कहे कि इस काम को फिलहाल नजरअंदाज़ कर दिया जाए। कोर्ट ने कहा अगर चुनाव आयोग को चुनाव कराने में कोई दिक्कत नहीं है तो यह प्रोजेक्ट तो आचार संहिता लागू होने से पहले का है। ऐसे में हम राज्य सरकार को यह बहाना बनाकर विकास के काम को फिर से रोकने की इजाज़त नहीं देंगे। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कोलकाता मेट्रो में देरी को लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट के ट्रैफिक ब्लॉक किए जाने के आदेश के खिलाफ सरकार की अपील पर सुनवाई से इनकार कर दिया। आज सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल सरकार ने कहा कि हमें मई तक का समय दें। अभी चुनाव चल रहे हैं, इसलिए देरी हो रही है। राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि उस रास्ते से एम्बुलेंस आती-जाती हैं। यहां तक कि अंग प्रत्यारोपण वाले वाहन भी उसी रास्ते से गुजरते हैं। सीजेआई ने कहा कि हाई कोर्ट ने बहुत नरमी बरती है। यह एक ऐसा मामला था जहां आपके मुख्य सचिव और डीजीपी के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए थी। यह अपने कर्तव्य के प्रति पूरी तरह से लापरवाही दिखाता है। यह सिर्फ एक ऐसे मुद्दे का राजनीतिकरण करने की कोशिश है, जहां असल में कोई मुद्दा ही नहीं है। वहीं कोलकाता मेट्रो के वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति दिए जाने का आग्रह किया। इस पर जस्टिस बागची ने कहा, "आपको वह मौका दिया गया था, लेकिन आपने उसका फायदा नहीं उठाया। हम आपको याचिका वापस लेने की अनुमति नहीं देंगे।" दरअसल, कोलकाता मेट्रो की ऑरेंज लाइन के एक अहम हिस्से को पूरा करने में हो रही अनिश्चित देरी को लेकर याचिका दाखिल की गई थी। इस याचिका में देरी का कारण पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा जरूरी मंजूरी नहीं दिए जाने को बताया गया था।

जजों की वफादारी पर सवाल! सुप्रीम कोर्ट के जज ने कही चौंकाने वाली बात

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जवल भुइयां ने रविवार को अहम टिप्प्णी की है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा है कि कुछ जज राजा से भी ज्यादा वफादार वाले सिंड्रोम से पीड़ित हैं। यहां तक कि सही मामलों तक में जमानत नहीं देते। इसकी वजह से लोगों को काफी समय तक जेल में रहना पड़ता है। उन्होंने यह भी कहा कि विकसित भारत में, असहमति और बहस के लिए ज्यादा जगह होनी चाहिए। असहमति को अपराध नहीं बनाया जा सकता। अलग-अलग विचारों के प्रति ज्यादा सहनशीलता होनी चाहिए। उन्होंने कहा, ''विकसित भारत में, ऐसा नहीं हो सकता कि माता-पिता यह कहें कि उनके बच्चे दलितों द्वारा बनाया गया खाना नहीं खाएंगे। विकसित भारत में, ऐसा नहीं हो सकता कि दलित पुरुषों को गलियारों में बिठाया जाए और लोग उन पर पेशाब करें। हर व्यक्ति के सम्मान की रक्षा जरूर होनी चाहिए।'' लाइव लॉ के अनुसार, जस्टिस भुइयां ने कहा कि अब छोटी-छोटी बातों-जैसे प्रदर्शन, सोशल मीडिया मीम्स या पोस्ट पर ही एफआईआर हो जा जाती है। यह मामले बाद में सुप्रीम कोर्ट तक आते हैं और फिर इसमें एसआईटी बनाने की बात कही जाती है। इन सबसे कोर्ट का समय काफी बर्बाद हो जाता है। जस्टिस भुइयां सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन नेशनल कॉन्फ्रेंस 2026 में अपनी बात कह रहे थे। इसमें विकसित भारत में न्यायपालिका की भूमिका विषय रखा गया था। उन्होंने कोर्ट में बड़ी संख्या में मामलों के पेंडिंग रहने के पीछे बेतुकी अपील और बेबुनियाद एफआईआर को भी वजह बताया। जस्टिस भुइयां ने कहा, ''यह देखा है कि हाल के समय में आपराधिक केसों और एफआईआर बहुत लापरवाही से की जा रही हैं। छोटी-मोटी बातों जैसे सार्वजनिक जगह पर हुए प्रदर्शन, आंदोलन चाहे वह छात्र ही क्यों न कर रहे हों और यहां तक कि कभी कभी तो मीम्स और सोशल मीडिया पोस्ट्स डालने के लिए भी एफआईआर दर्ज कर ली जाती हैं। फिर पुलिस जांच चलती रहती है। बाद में जब ये केस सुप्रीम कोर्ट पहुंचते हैं तो जांच के लिए एसआईटी का गठन करना पड़ता है, जहां पर न्यायपालिका का काफी समय बर्बाद हो जाता है।'' UAPA को बताया कठोर कानून जस्टिस भुइयां ने अपने भाषण में यूएपीए पर भी बात की और उसे एक कठोर कानून बताया। उन्होंने लोकसभा में दिए गए गृह मंत्रालय के आंकड़ों का जिक्र करते हुए कहा कि 2019 में इसके तहत 1984 अरेस्ट किए गए, लेकिन सिर्फ 34 को ही दोषी ठहराया जा सका। दोषसिद्धि दर 1.74 फीसदी थी। इसके बाद, 2020 में 1321 लोगों को अरेस्ट किया गया, जिसमें सिर्फ 80 को ही दोषी ठहराया जा सका। दोषसिद्धि की दर यहां भी तीन फीसदी ही रही। इसी तरह उन्होंने कई आगे के साल के भी आंकड़े रखे, जिसमें दोषसिद्धि दर काफी कम थी। जस्टिस भुइयां ने कहा कि इन आंकड़ों से मालूम चलता है कि दर लगातार चार फीसदी से भी कम रही है। इससे क्या पता चलता है। इससे कोर्ट पर काफी बोझ पड़ता है। पता चलता है कि गिरफ्तारियां बिना ठोस सबूत के जल्दबाजी में की गई थीं। इससे लंबित मामले और बढ़ते हैं।

‘CM दे रहे हैं धमकी’—महिला की SC में याचिका, जज बोले- आप भी तो नेता हैं

बेंगलुरु कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के खिलाफ शिकायत करने वाली महिला को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है। शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान शीर्ष न्यायालय ने महिला से कहा है कि अपनी लड़ाई कोर्ट में न लड़ें। साथ ही कहा है कि इस केस को उच्च न्यायालय में लेकर जाएं। महिला की तरफ से मांग की जा रही थी कि उन्हें सुरक्षा दी जाए। उन्होंने आरोप लगाए थे वह कर्नाटक से बाहर रहने के लिए मजबूर हैं। महिला ने क्या कहा बार एंड बेंच के अनुसार, महिला की तरफ से कोर्ट पहुंचे वकील ने कहा, 'मुझे धमकियां मिल रहीं हैं। मैं कर्नाटक में प्रवेश नहीं कर पा रहीं हूं। मेरी सुरक्षा से समझौता किया जा रहा है। मैं दिल्ली में रहने के लिए मजबूर हूं। मुझे बार-बार धमकियां मिल रहीं हैं।' उन्होंने कहा कि वह कर्नाटक में अपने ही घर में रहना चाहती हैं, लेकिन ऐसा नहीं कर पा रहीं हैं। उन्होंने संपत्ति पर कब्जा करने की कोशिश के आरोप लगाए हैं। वकील ने कहा, 'मैं वापस जाना चाहती हूं और अपने आवास में रहना चाहती हूं। मैंने शिकायतें दर्ज कराईं हैं, अपने पक्ष में कोर्ट के आदेश भी हासिल किए हैं, लेकिन इसके बाद भी धमकियां दी जा रहीं हैं। मेरे घर पर पत्थरबाजी हुई, गुंडे आए थे और तोड़फोड़ करके गए हैं। वो मेरी संपत्ति को हथियाना चाहते हैं।' क्या बोला कोर्ट कोर्ट ने कहा, 'कर्नाटक के मुख्यमंत्री आपके पीछे लोगों को दिल्ली भेज रहे हैं?' कोर्ट ने कहा, 'आप भी राजनेता हैं। आप अपनी लड़ाइयां कोर्ट में न लड़ें।' इसपर वकील ने जवाब दिया, 'मैं राजनीतिक व्यक्ति नहीं हूं।' सुप्रीम कोर्ट ने महिला को हाईकोर्ट जाने के लिए कहा है। वकील ने मांग की, 'कम से कम मेरी सुरक्षा की जाए।' इसपर कोर्ट ने अगले केस को सुनवाई के लिए बुलाया। फिल्म कहानी 2 पर भी हुई सुनवाई सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म 'कहानी 2' को लेकर फिल्मकार सुजॉय घोष के खिलाफ कथित कॉपीराइट उल्लंघन के एक मामले में झारखंड की एक अदालत के समक्ष लंबित कार्यवाही को शुक्रवार को रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने घोष की उस याचिका को स्वीकार कर लिया, जिसमें झारखंड उच्च न्यायालय के 22 अप्रैल 2025 के आदेश को चुनौती दी गई थी। उच्च न्यायालय ने घोष के खिलाफ लंबित कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया था। पीठ ने घोष की याचिका स्वीकार करते हुए कहा, 'मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) द्वारा सात जून, 2018 को पारित समन आदेश और उच्च न्यायालय द्वारा 22 अप्रैल, 2025 को पारित आदेश को रद्द किया जाता है तथा निरस्त किया जाता है।'