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3 लाख रुपये सैलरी का जिक्र कर सुप्रीम कोर्ट जज ने कही बड़ी बात, बयान चर्चा में

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट में वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान पत्नी की ओर से अतिरिक्त 1500 डॉलर की मांग पर जज ने दिलचस्प टिप्पणी की। जज साहब अपनी ही सैलरी बताने लगे और कहा कि ऐसे आइडिया पत्नियों को नहीं दिए जाने चाहिए। इस मामले की सुनवाई 4 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में हुई। मामले की सुनवाई जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ कर रही थी। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, पीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा, ‘‘क्या पति को पॉकेट मनी भी देनी होगी? यह बेहद खतरनाक स्थिति है। कल को हमारी पत्नियां भी कहेंगी कि हमें पॉकेट मनी चाहिए। हमारी तो महीने की सैलरी ही महज 3 लाख रुपये है, 15 हजार डॉलर महीने की नहीं।’’ जज ने पत्नी की ओर से पेश वकील से यह भी कहा कि यहां मौजूद महिलाओं को ऐसे शानदार आइडिया मत दीजिए। पत्नी ने अन्य खर्चों के अलावा मांगे 1500 डॉलर मामले में पत्नी की ओर से पति से पहले से मिल रहे अन्य खर्चों के अतिरिक्त 1500 डॉलर की मांग की गई थी। इसी मांग पर सुनवाई के दौरान जज ने पॉकेट मनी का सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि अगर पति को पहले से ही अन्य खर्चों का भुगतान करना पड़ रहा है और इसके ऊपर पॉकेट मनी की मांग भी की जा रही है, तो यह बेहद खतरनाक स्थिति होगी। जज ने अपनी टिप्पणी में 3 लाख रुपये महीने की सैलरी का जिक्र करते हुए कहा कि यह 15 हजार डॉलर महीने की कमाई नहीं है। उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि कल को उनकी पत्नियां भी पॉकेट मनी मांगने लगेंगी। वैवाहिक संबंध में सुधार की गुंजाइश न होने के आधार पर विदेशी अदालत का तलाक का आदेश अमान्य: न्यायालय एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि वैवाहिक संबंधों में सुधार की कोई उम्मीद नहीं होने के आधार पर किसी विदेशी अदालत द्वारा दिया गया तलाक का आदेश कानूनी रूप से मान्य नहीं है। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने एक व्यक्ति की उस याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की, जिसमें उसने अपने खिलाफ द्विविवाह और आपराधिक साजिश के तहत दर्ज मामले को रद्द करने की मांग की थी। पीठ ने कहा, "हमारी राय में, विदेशी तलाक की डिक्री भारत में मौजूदा वैवाहिक कानून के उल्लंघन में और एक ऐसे आधार पर पारित की गई थी जिसे कानूनन मान्यता भी नहीं प्राप्त है। यह न केवल सीपीसी की धारा 13 की कानूनी सीमा का उल्लंघन करता है, जिससे होकर हर विदेशी डिक्री को गुजरना पड़ता है, बल्कि भारत में लागू होने के लिए किसी विदेशी डिक्री द्वारा पूरी की जाने वाली शर्तों के संबंध में इस अदालत द्वारा की गई टिप्पणियों का भी उल्लंघन करता है।" पीठ ने कहा, "हम इस दलील को इस तरह से स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि आरोपी नंबर 1/पति की शादी भारत में हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार प्रतिवादी नंबर 2/पहली पत्नी से हुई थी। इसलिए, भले ही दूसरी शादी भारत से बाहर हुई हो, भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के तहत आरोपों को कमजोर नहीं माना जा सकता, क्योंकि द्विविवाह के अपराध की जांच केवल दूसरी शादी के स्थान तक सीमित नहीं हो सकती, बल्कि इसमें मौजूदा वैवाहिक संबंधों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।"

हवाई किराये में भारी बढ़ोतरी पर SC सख्त, तत्काल सुनवाई से किया इनकार

नई दिल्ली दिवाली, छठ पूजा और होली के मौके पर हवाई जहाजों के किराये में कई गुना की वृद्धि हो जाती है. हालात ऐसे हो जाते हैं कि बड़े त्‍योहारों में प्‍लेन से सफर करना अच्‍छे-अच्‍छों के बस की बात नहीं रह जाती है. सुप्रीम कोर्ट में इसी बात को लेकर याचिका दायर की गई थी, जिसपर देश की शीर्ष अदालत ने दो टूक जवाब देते हुए तत्‍काल सुनवाई से इनकार कर दिया. याची ने अपनी याचिका में कहा था कि दिवाली के समय हवाई जहाज के किराये में 700 फीसद तक की वृद्धि हो जाती है. याचिका में इसपर नकेल कसने को लेकर व्‍यवस्‍था देने का अनुरोध किया गया था. तीन जजों की पीठ ने स्‍पष्‍ट शब्‍दों में कहा कि जब हवाई जहाज का किराया ज्‍यादा है तो प्‍लेन से सफर मत कीजिए. इसके साथ ही केस को खारिज कर दिया गया।  सुप्रीम कोर्ट ने दिवाली के दौरान घरेलू हवाई किरायों में कथित तौर पर 700 प्रतिशत तक बढ़ोतरी को लेकर दायर याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया. न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि यदि किराया बहुत अधिक है तो यात्री हवाई यात्रा नहीं करें. पीठ ने टिप्पणी की, ‘हवाई यात्रा मत कीजिए. अगला मामला.’ जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की पीठ के समक्ष आवेदन का उल्लेख किया गया था. याची की ओर से पेश वकील ने कहा कि दिवाली के त्योहार के दौरान हवाई टिकटों के दाम 700 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं. उन्होंने दलील दी कि हवाई यात्रा अब आवश्यक सेवा बन चुकी है और किरायों में इस तरह की अत्यधिक वृद्धि संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है. वकील ने देशभर में यात्रियों को राहत दिलाने के लिए मामले की तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया, लेकिन पीठ ने इसे स्वीकार नहीं किया।  क्‍या थे सवाल यह अंतरिम आवेदन नागरिक उड्डयन क्षेत्र में कथित अपारदर्शी, शोषणकारी और एल्गोरिदम बेस्‍ड मूल्य निर्धारण सिस्‍टम को चुनौती देने वाली लंबित जनहित याचिका (पीआईएल) में दाखिल किया गया है. याचिका में किरायों में अनिश्चित उतार-चढ़ाव, आखिरी समय में भारी बढ़ोतरी और एयरलाइनों द्वारा लगाए जाने वाले अतिरिक्त शुल्कों पर सवाल उठाए गए हैं. इससे पहले एक मामले की सुनवाई में शीर्ष अदालत ने निजी एयरलाइनों द्वारा वसूले जाने वाले किरायों के ‘युक्तिसंगत बनाने’ की जरूरत बताई थी. पीठ ने कहा था कि एक ही दिन, एक ही डेस्टिनेशन के लिए अलग’अलग विमान कंपनियां अर्थव्यवस्था श्रेणी में अलग किराया वसूल रही हैं. बेंच ने कहा था, ‘लोगों को कुछ राहत देने की कोशिश कीजिए. एक ही दिन, एक ही डेस्टिनेशन की उड़ान के लिए एक एयरलाइन 8,000 रुपये और दूसरी 18,000 रुपये लेती है. इसमें कुछ युक्तिसंगतता होनी चाहिए.’ उस सुनवाई के दौरान केंद्र ने अदालत को बताया था कि भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024 के तहत हवाई किरायों और अतिरिक्त शुल्कों से संबंधित नियम बनाए जा रहे हैं. केंद्र ने 16 अक्टूबर को कहा कि किरायों और एयरलाइनों के अतिरिक्त शुल्कों को नियंत्रित करने वाले नियम अंतिम रूप दे दिए गए हैं और उन्हें प्रशासनिक मंजूरी मिल गई है तुषार मेहता ने क्‍या कहा सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ को आश्वासन दिया था कि नियम दो सप्ताह के भीतर प्रकाशित कर दिए जाएंगे. अदालत ने केंद्र को अगली सुनवाई पर प्रकाशित नियम पेश करने का निर्देश दिया और मामले को 16 नवंबर के लिए सूचीबद्ध किया. सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद केंद्र ने भारतीय वायुयान नियम, 2026 अधिसूचित किए हैं. ये नियम लगभग नौ दशक से लागू विमान नियम, 1937 का स्थान लेंगे और एक जनवरी, 2027 से प्रभावी होंगे. नए ढांचे के तहत एयरलाइनों को टिकट की कुल देय कीमत तथा मूल किराया, कर, शुल्क, कैंसिलेशन फी और रिफंड पॉलिसी का अलग-अलग विवरण यात्रियों को बताना होगा. एयरलाइन टैरिफ पर नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) की निगरानी बनी रहेगी। 

दिवाली पर दिल्लीवालों को राहत, सुबह 1 और शाम 2 घंटे जला सकेंगे ग्रीन पटाखे

नईदिल्ली  दिल्ली-एनसीआर में पटाखों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने दीपावली के उपलक्ष्य में  7 और 8 नवंबर को ग्रीन पटाखे जलाने की इजाजत दी है। कोर्ट के आदेश के मुताबिक सुबह 6 से 7 और रात 8 बजे से 10 बजे तक ग्रीन पटाखे चलाने की इजाजत रहेगी। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने 29 अक्टूबर 2026 के अपने आदेश में यह साफ किया कि पटाखों से होने वाले प्रदूषण को रोकना जरूरी है, लेकिन केवल पूरी तरह रोक लगाने से समस्या का हल नहीं निकला है। कोर्ट ने कहा कि पहले लगाए गए बैन के बावजूद पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल पर प्रभावी तरीके से रोक नहीं लग पाई। ऐसे में कुछ समय के लिए नियमों के तहत ग्रीन पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल की इजाजत दी जा रही है। अस्पतालों और स्कूलों के पास नहीं जला सकेंगे पटाखे सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि अस्पतालों, नर्सिंग होम, स्वास्थ्य केंद्रों, बुजुर्गों के घरों और तय किए गए शांत इलाकों के 300 मीटर के दायरे में पटाखे नहीं जलाए जा सकेंगे। स्कूलों और दूसरे शिक्षण संस्थानों पर भी यह रोक लागू होगी। इन जगहों को पटाखे जलाने के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि पटाखों के कारण बीमार लोगों को परेशानी नहीं होनी चाहिए। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों पर प्रदूषण का ज्यादा असर पड़ सकता है। इसलिए नियमों का सख्ती से पालन कराया जाना जरूरी है। सिर्फ मंजूरी वाले ग्रीन पटाखे ही बिकेंगे कोर्ट के आदेश के मुताबिक, सिर्फ उन्हीं ग्रीन पटाखों को बनाने की इजाजत होगी, जिन्हें CSIR-NEERI और PESO से जरूरी मंजूरी मिली है। ऐसे पटाखे 2 से 6 नवंबर के बीच बनाए जा सकेंगे, बशर्ते वे तय नियमों के मुताबिक हों। पटाखों के डिब्बे पूरी तरह सील होने चाहिए, ताकि उनमें दूसरे पटाखे मिलाकर न बेचे जा सकें। हर डिब्बे पर एक खास QR कोड होना जरूरी है। इस कोड को स्कैन करने पर पटाखे के निर्माता, रजिस्ट्रेशन, लाइसेंस और जांच से जुड़ी जानकारी मिलनी चाहिए। कोर्ट ने पटाखों की लड़ियां और माला बनाने तथा बेचने पर भी रोक लगाई है। बेरियम वाले और मंजूरी नहीं पाए पटाखों का इस्तेमाल भी नहीं किया जा सकेगा। तय दुकानों पर ही होगी बिक्री दिल्ली-NCR में पटाखों की बिक्री के लिए प्रशासन तय जगहों की पहचान करेगा। इन जगहों के अलावा कहीं और पटाखे नहीं बेचे जा सकेंगे। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए पटाखों की बिक्री पर भी रोक रहेगी, जिन दुकानदारों के लाइसेंस रद्द किए गए थे, उन्हें 4 से 6 नवंबर तक कुछ शर्तों के साथ अस्थायी तौर पर बिक्री की इजाजत दी जा सकती है। लेकिन अगर कोई दुकानदार नियम तोड़ता पाया गया, तो उसका लाइसेंस दोबारा रद्द कर दिया जाएगा। कोर्ट ने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया है कि दिल्ली-NCR में बाहर से आने वाले वाहनों की जांच की जाए, ताकि गैरकानूनी और सामान्य पटाखों की सप्लाई रोकी जा सके। प्रदूषण पर रखी जाएगी नजर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को हवा की गुणवत्ता पर नजर रखने का निर्देश दिया है। इसके लिए दिवाली से पहले, दिवाली के दौरान और उसके बाद की रिपोर्ट तैयार की जाएगी। 2 से 6 नवंबर तक दिवाली से पहले की हवा की गुणवत्ता की रिपोर्ट बनाई जाएगी। 7 और 8 नवंबर की अलग रिपोर्ट तैयार होगी। वहीं, 9 से 30 नवंबर तक दिवाली के बाद प्रदूषण की स्थिति पर नजर रखी जाएगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि जिन अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में प्रदूषण के कारण मरीजों की संख्या बढ़ती है, उसका आंकड़ा जुटाया जाए। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि पटाखों का लोगों की सेहत पर कितना असर पड़ा। 9 नवंबर से फिर पूरी रोक सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कर दिया है कि ग्रीन पटाखों को लेकर दी गई छूट अस्थायी है। 9 नवंबर 2026 से पटाखों पर पूरी रोक फिर लागू हो जाएगी। दिल्ली-NCR के अधिकारियों को कोर्ट के आदेशों के पालन की जानकारी और प्रदूषण से जुड़ी रिपोर्ट 14 दिसंबर तक जमा करनी होगी। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि आदेशों का पालन नहीं करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है। कोर्ट ने लोगों से भी की अपील सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिवाली खुशियों और उम्मीदों का त्योहार है, लेकिन प्रदूषण के कारण लोगों की सेहत को नुकसान पहुंचाना त्योहार की भावना के खिलाफ है। कोर्ट ने फिल्मी सितारों, खिलाड़ियों और दूसरे जाने-माने लोगों से भी अपील की कि वे लोगों को सुरक्षित और प्रदूषण कम करने वाली दिवाली मनाने के लिए जागरूक करें। कोर्ट का कहना है कि प्रदूषण की समस्या का हल सिर्फ आदेश जारी करने से नहीं होगा। इसके लिए सरकार, प्रशासन, दुकानदारों और आम लोगों को मिलकर काम करना होगा।

अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा चोरी केस में SC का दखल खत्म, निचली अदालत को दिए निर्देश

 अयोध्या /नई दिल्ली    अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के आरोपों से जुड़ी याचिकाओं का सुप्रीम कोर्ट ने निपटारा कर दिया है. उत्तर प्रदेश सरकार ने शीर्ष अदालत को बताया कि इस मामले में आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है. इसके बाद चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने संबंधित मजिस्ट्रेट को कानून के मुताबिक आगे की कार्यवाही करने का निर्देश दिया. कोर्ट एसआईटी जांच पर दाखिल याचिकाओं का सुप्रीम कोर्ट ने निपटारा करते हुए मामले की सुनवाई बंद कर दी है।  सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत को कानून के मुताबिक कार्रवाई करने को कहा है साथ ही याचिकाकर्ताओं को निचली अदालत की सहायता करने की इजाजत दी है. सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जानकारी दी कि इस मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम गहराई से छानबीन कर रही है. ​मंदिर में भक्तों द्वारा किए गए दान और नकदी की गिनती के समय कथित तौर पर चोरी और हेराफेरी की जा रही थी।  ​पुलिस और जांच एजेंसियों ने आरोपियों और उनके रिश्तेदारों के बैंक खातों की वित्तीय ट्रेकिंग की है. जांच में सामने आया है कि कुछ कर्मचारियों ने भारी मात्रा में संपत्ति खरीदी. कोर्ट को बताया गया को एक मामले में कर्मचारी ने 50 लाख रुपये की संपत्ति की खरीद की. उसमें केवल 15 लाख रुपये बैंक ट्रांजैक्शन के जरिए दिखाए गए. बाकी का भुगतान इस चोरी के जरिए जमा किए गए काले धन/नकद से किया गया।  क्या बोले चीफ जस्टिस सूर्यकांत? चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने याचिकाकर्ताओं को आगाह करते हुए कहा, 'हमने आपको इजाजत दे दी है सिविल कोर्ट में जाकर बात रखने की. उसका सदुपयोग कीजिएगा, दुरुपयोग मत कीजिएगा.' सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने इस मामले के गुण-दोष या आरोपों की सत्यता पर कोई राय व्यक्त नहीं की है. शीर्ष अदालत ने याचिकाओं का निपटारा करते हुए आगे की कार्यवाही संबंधित निचली अदालत पर छोड़ दी।  पांच जजों के फैसले की समीक्षा का मुद्दा भी उठा सुनवाई के दौरान अयोध्या ट्रस्ट से जुड़े पांच न्यायाधीशों की पीठ के फैसले की समीक्षा के लिए दाखिल एक नई याचिका का मुद्दा भी उठा. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि पांच जजों की पीठ के फैसले के संबंध में इस तरह सिविल मुकदमा दाखिल करना उचित तरीका नहीं है. वहीं, राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी कार्यवाही समाप्त कर दी है. अब आरोपपत्र के आधार पर संबंधित अदालत में आगे की सुनवाई होगी। 

सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की चेतन-नितिन सभरवाल की अपील, आयकर विभाग करेगा पुराने सौदों की जांच

 नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने भारत के पूर्व चीफ जस्टिस वाईके सभरवाल के दो बेटों चेतन सभरवाल और नितिन सभरवाल से जुड़े आयकर मामले में अहम फैसला सुनाया है. अदालत ने शेयरों की खरीद-बिक्री से मिले पैसे के इस्तेमाल और दिल्ली के सिकंदरा रोड पर खरीदी गई प्रॉपर्टी के मामले में आयकर विभाग की दोबारा असेसमेंट की कार्रवाई को हरी झंडी दे दी है. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने दोनों भाइयों की ओर से दायर चार अपीलों को खारिज कर दिया. इसके साथ ही वित्त वर्ष 2008-09 और 2009-10 के लिए जारी री-असेसमेंट नोटिस को बरकरार रखा गया है।  क्या है पूरा मामला? यह मामला साल 2010 में दिल्ली के सिकंदरा रोड पर खरीदी गई एक प्राइम प्रॉपर्टी से जुड़ा है. आयकर विभाग को शक था कि इस प्रॉपर्टी को खरीदने के लिए इस्तेमाल की गई रकम दो कंपनियों के शेयरों की बिक्री से हासिल हुई थी. विभाग ने शेयरों की बिक्री में तय की गई कीमत और उनकी वास्तविक कीमत के बीच बड़े अंतर को लेकर सवाल उठाए थे. जांच में यह भी सामने आया कि शेयर बेचकर मिली रकम का एक बड़ा हिस्सा प्रॉपर्टी खरीदने में लगाया गया था. इसके बाद आयकर विभाग ने दोनों भाइयों के टैक्स असेसमेंट की दोबारा जांच शुरू की थी।  2007 में हुआ था समझौता मामले के मुताबिक, अक्टूबर 2007 में चेतन सभरवाल, नितिन सभरवाल और दो अन्य शेयरधारकों ने पवन इम्पेक्स प्राइवेट लिमिटेड (Pawan Impex Pvt Ltd) और एसवीआईआईटी सॉफ्टवेयर प्राइवेट लिमिटेड (SVIIT Software Pvt Ltd) के शेयर बेचने का समझौता किया था. ये शेयर जीवाईएस रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड (GYS Real Estate Pvt Ltd) को बेचे जाने थे. दोनों कंपनियों के शेयरों की बिक्री के लिए क्रमशः 195 करोड़ रुपये और 60 करोड़ रुपये की कीमत तय की गई थी. समझौते के मुताबिक, प्रत्येक शेयरधारक को बिक्री की कुल रकम में एक चौथाई हिस्सा मिलना था।  शेयरों की कीमत पर हुआ शक बाद में आयकर विभाग ने इस शेयर ट्रांजैक्शन की जांच की. जांच के दौरान विभाग ने पाया कि शेयरों की बिक्री से मिलने वाली रकम उन कंपनियों की संपत्तियों में मौजूद जमीन और इमारतों की वास्तविक कीमत के मुकाबले काफी ज्यादा दिखाई दे रही थी. विभाग ने शुरुआती तौर पर माना कि शेयरों की कीमत तय करने में वास्तविक मूल्य से काफी अधिक रकम दिखाई गई हो सकती है. इसी आधार पर शेयरों की बिक्री से प्राप्त रकम और उससे जुड़े टैक्स के पहलुओं की जांच की गई. विभाग ने इस मामले में डायरेक्टर जनरल की जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की।  प्रॉपर्टी खरीदने में इस्तेमाल हुई रकम आयकर विभाग की जांच में यह भी सामने आया कि शेयरों की बिक्री से मिली रकम का एक बड़ा हिस्सा अप्रैल 2010 में दिल्ली के सिकंदरा रोड स्थित प्रॉपर्टी खरीदने में इस्तेमाल किया गया था. इस निवेश के आधार पर सभरवाल भाइयों ने इनकम टैक्स एक्ट की धारा 54F के तहत कैपिटल गेन टैक्स से छूट का दावा किया था. धारा 54F के तहत कुछ निर्धारित शर्तों को पूरा करने पर संपत्ति की बिक्री से हुए दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ पर आवासीय संपत्ति में निवेश के आधार पर छूट मिल सकती है. आयकर विभाग ने अब इस पूरे लेनदेन की जांच और टैक्स छूट के दावे को दोबारा परखने की जरूरत बताई थी।  स्वीकार हो चुका था चेतन सभरवाल का रिटर्न इस मामले में चेतन सभरवाल का असेसमेंट ईयर 2008-09 का इनकम टैक्स असेसमेंट दिसंबर 2010 में पूरा कर लिया गया था. उस समय उनके द्वारा घोषित आय को आयकर विभाग ने स्वीकार कर लिया था. हालांकि, बाद में विभाग की जांच में शेयरों की बिक्री की कीमत और उससे प्राप्त रकम के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठे. इसके बाद विभाग ने पुराने असेसमेंट को दोबारा खोलने की प्रक्रिया शुरू की. इसी कार्रवाई को चेतन और नितिन सभरवाल ने अदालत में चुनौती दी थी।  क्यों बरकरार है री-असेसमेंट नोटिस? सुप्रीम कोर्ट ने 28 अक्टूबर को दिए अपने फैसले में कहा कि आयकर विभाग की ओर से 31 मार्च 2015 को जारी नोटिस के पीछे पर्याप्त आधार मौजूद था. बेंच ने कहा कि इनकम टैक्स एक्ट, 1961 की धारा 147 और 148 के तहत असेसमेंट दोबारा खोलने के लिए अधिकारी के पास यह मानने का उचित कारण होना चाहिए कि टैक्स के दायरे में आने वाली आय का आकलन नहीं हो पाया है. अदालत के मुताबिक, इस मामले में डायरेक्टर जनरल की जांच रिपोर्ट ने असेसिंग ऑफिसर को ऐसा विश्वास बनाने के लिए ठोस सामग्री उपलब्ध कराई थी. इसलिए नोटिस जारी करने की कार्रवाई को अवैध नहीं कहा जा सकता।  'रीजन टू बिलीव' का मतलब अंतिम सबूत होना नहीं सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि 'रीजन टू बिलीव' का अर्थ किसी अधिकारी के पास यह मानने का उचित कारण या आधार होना है कि टैक्स योग्य आय का आकलन छूट गया है. इसके लिए असेसिंग ऑफिसर को नोटिस जारी करने से पहले ही यह अंतिम रूप से साबित करना जरूरी नहीं है कि टैक्स चोरी हुई है या कोई आय छिपाई गई है. अदालत ने कहा कि इस स्तर पर अधिकारी के पास उपलब्ध सामग्री के आधार पर जांच की जरूरत का उचित आधार होना पर्याप्त है. कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायिक अदालतें इस बात का मूल्यांकन नहीं कर सकतीं कि अधिकारी के पास मौजूद कारण पर्याप्त हैं या नहीं।  कीमत बढ़ाकर दिखाने की दलील भी खारिज PTI के मुताबिक, अदालत ने इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया कि शेयरों की कीमत ज्यादा दिखाए जाने भर से टैक्स योग्य आय के आकलन से छूटने का मामला नहीं बन सकता. बेंच ने कहा कि शेयर बेचने वाले के हाथ में हुई आय का टैक्स असेसमेंट भी इस मामले में महत्वपूर्ण है. शेयरों की बिक्री से मिली रकम का इस्तेमाल बाद में कैपिटल एसेट खरीदने और टैक्स छूट का दावा करने के लिए किया गया था. ऐसे में अगर बिक्री की रकम वास्तविक कीमत से काफी ज्यादा थी, तो इस पूरे लेनदेन की जांच जरूरी हो सकती है. अदालत ने कहा कि बिक्री से मिली रकम की आड़ में आय को दूसरी तरह दिखाए जाने की आशंका को नजरअंदाज … Read more

‘पीड़ित को पूरे पैसे वापस मिलें’, डिजिटल ठगी पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

नई दिल्ली  देशभर में 'डिजिटल अरेस्ट' के बढ़ते मामलों और आम जनता से करोड़ों की ठगी पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने चिंता व्यक्त की कि लगातार जन-जागरूकता के बावजूद लोग लगातार इस फर्जीवाड़े के जाल में फंस रहे हैं। सर्वोच्च अदालत ने ऐसी वित्तीय धोखाधड़ी को पहले ही चरण में विफल करने के लिए कड़े नियम बनाने और लापरवाही बरतने वाले बैंकों पर पीड़ितों को हर्जाना देने की जवाबदेही तय करने का संकेत दिया है। फोन पर गिरफ्तारी पर अदालत ने जताया आश्चर्य सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने सवाल किया कि तकनीकी जागरूकता के इस दौर में लोग यह कैसे स्वीकार कर लेते हैं कि कोई एजेंसी किसी को फोन कॉल के माध्यम से हिरासत में ले सकती है। पीठ को जब यह अवगत कराया गया कि हाल ही में एक महिला इस तरह के झांसे में आकर ढाई करोड़ रुपये गंवा चुकी है, तो कोर्ट ने अचरज जताया कि व्यापक सूचना तंत्र के बावजूद नागरिक इन चालों को समय रहते क्यों नहीं भांप पा रहे हैं। असामान्य लेन-देन पर तुरंत रोक जरूरी- कोर्ट अदालत ने वित्तीय संस्थानों और बैंकों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। पीठ ने स्पष्ट किया कि जब किसी खाते से अचानक ऐसा बड़ा और असामान्य लेन-देन होता है, जो खाताधारक के सामान्य वित्तीय व्यवहार से बिल्कुल मेल नहीं खाता, तो बैंक का सिस्टम उसे स्वतः रोककर सत्यापन क्यों नहीं करता? कोर्ट ने टिप्पणी की कि रकम ट्रांसफर हो जाने के बाद महज औपचारिक रिपोर्ट बना लेना पर्याप्त नहीं है, व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो अपराध घटित होने से पहले ही सक्रिय हो जाए। स्थानीय पुलिस को सूचना और पहले चरण में ही सत्यापन का निर्देश अदालत ने जोर देकर कहा कि किसी भी संदिग्ध वित्तीय गतिविधि की त्वरित जानकारी संबंधित थाने को उपलब्ध कराई जानी चाहिए। साथ ही, खाते से रकम जारी होने से पूर्व लेन-देन की प्रामाणिकता जांचने का एक मजबूत तंत्र विकसित किया जाए। कोर्ट का मानना है कि यदि वित्तीय संस्थान अपनी प्राथमिक जांच व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त रखें, तो मासूम नागरिकों को जीवन भर की जमा-पूंजी गंवाने से बचाया जा सकता है। लापरवाही पर बैंकों को भरनी पड़ सकती है भरपाई सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि वह ऐसे दिशा-निर्देश तय करने पर विचार कर रही है, जिसके तहत बैंक की विफलता के कारण होने वाली ठगी का हर्जाना संबंधित बैंक को ही भुगतना पड़े। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि यदि संस्थान अपनी विनियामक सावधानियां बरतने में विफल रहते हैं और ग्राहक को नुकसान होता है, तो बैंकों पर पीड़ित का धन वापस करने की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी डाली जाएगी और उन्हें कानूनी कार्रवाई के दायरे में भी लाया जा सकेगा।

OBC जातियों के लिए जनगणना में अलग विकल्प की मांग वाली याचिका का निपटारा, सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

   नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने जनगणना में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC की जातियों को सूचीबद्ध करने के तरीके को लेकर दाखिल याचिका का निपटारा कर दिया है. यह याचिका OBC फेडरेशन ऑफ इंडिया की तरफ से दाखिल की गई थी. याचिका में मांग की गई थी कि ऑनलाइन जनगणना फॉर्म में OBC जातियों की सूची ड्रॉप-डाउन मेनू के रूप में उपलब्ध कराई जाए, ताकि अलग-अलग पिछड़ी जातियों को सूचीबद्ध किया जा सके।  बुधवार को सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि यह मामला नीतिगत निर्णय से जुड़ा है और इस पर सरकार ही विचार कर सकती है. हालांकि, पीठ ने याचिकाकर्ताओं को भारत के जनगणना रजिस्ट्रार जनरल के सामने अपनी मांग रखने की छूट दे दी।  याचिकाकर्ताओं ने क्या दलील दी फेडरेशन की तरफ से पेश वकील अंजनी अयंगर ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता पिछड़े वर्गों से आते हैं. उन्होंने सरकार के सामने मांग रखी थी कि चल रही ऑनलाइन जनगणना प्रक्रिया में OBC जातियों के लिए ड्रॉप-डाउन मेनू की व्यवस्था की जाए।  याचिका में कहा गया कि जनगणना के शेड्यूल के कॉलम नंबर 10 में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और जाति से जुड़ी जानकारी मांगी गई है. लेकिन SC और ST के अलावा अन्य लोगों के लिए जाति दर्ज करने का विकल्प ओपन टेक्स्ट फील्ड के रूप में दिया गया है. इसमें लोगों को अपनी जाति का नाम खुद लिखना पड़ता है।  2011 की जनगणना का दिया गया हवाला याचिकाकर्ताओं का कहना है कि OBC जातियों के लिए भी ड्रॉप-डाउन मेनू होना चाहिए, जैसा कि 2011 की जनगणना में SC और ST जातियों के लिए किया गया था. उनके मुताबिक, इससे विभिन्न OBC जातियों को सूचीबद्ध करने में मदद मिलेगी। 

कैंसर की दवाओं की कीमत और 30% व्यापार मार्जिन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से मांगा जवाब

नई दिल्ली कैंसर की दवाओं की कीमतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और निजी अस्पतालों से कड़े सवाल पूछे हैं. कोर्ट ने कहा कि दवाओं की कीमतों में भारी अंतर को लेकर सरकार अब तक कोई ठोस जवाब नहीं दे पाई है, जबकि इस मुद्दे पर बार-बार सवाल पूछे गए हैं।  सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने बताया कि कैंसर की दवाओं पर 30 फीसदी ट्रेड मार्जिन की सीमा खुदरा विक्रेता को दवा बेचने की कीमत यानी PTR पर नहीं, बल्कि अधिकतम खुदरा मूल्य यानी MRP पर लागू होती है।  केंद्र सरकार ने कहा कि वह सभी पक्षों के हितों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है. इस पर कोर्ट ने कहा, "यहां कोई संतुलन नहीं है." सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि जिस दवा का अधिकतम खुदरा मूल्य 100 रुपये है, उसे खुदरा विक्रेताओं को 10 से 20 रुपये में क्यों बेचा जाता है? कोर्ट ने यह भी पूछा कि सरकार गैर-अनुसूचित दवाओं के मामले में कीमत तय करने की ऐसी व्यवस्था की अनुमति क्यों देती है।  कोर्ट ने कहा कि निजी अस्पताल अपनी सेवाओं के लिए मरीजों से पैसे लेते हैं, लेकिन दवाओं की कीमत उनकी लागत से 100 या 200 गुना ज्यादा होने को सही नहीं ठहराया जा सकता. अदालत ने अस्पतालों से कहा कि उन्हें दूसरे तरीकों से भी अपना काम चलाना होगा, "इस तरह की लूट के जरिए नहीं।  निजी अस्पतालों ने क्या दलील दी? निजी अस्पतालों की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर बहुत ज्यादा दबाव है, इसलिए निजी अस्पतालों की जरूरत है. उन्होंने दलील दी कि निजी अस्पतालों की कमाई का बड़ा हिस्सा बीमा और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं से आता है, जबकि अपनी जेब से भुगतान करने वाले मरीजों की हिस्सेदारी करीब 30 फीसदी है।  रोहतगी ने यह भी कहा कि अस्पताल मरीजों को बाहर से दवाएं लाने के लिए नहीं कह सकते, क्योंकि नकली दवाओं का खतरा रहता है. इसके अलावा, अस्पतालों को चौबीसों घंटे सुविधाएं बनाए रखने पर भी खर्च करना पड़ता है।  हालांकि, कोर्ट ने साफ कहा कि अस्पतालों की सेवाओं और बुनियादी ढांचे का खर्च अपनी जगह है, लेकिन इससे दवाओं की कीमत लागत से 100 या 200 गुना ज्यादा रखने को सही नहीं ठहराया जा सकता। 

CG Conversion Law: धर्मांतरण कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, धार्मिक स्वतंत्रता के मुद्दे पर होगी सुनवाई

रायपुर  छत्तीसगढ़ के धर्मांतरण कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने पर सहमति जताई है. ईसाई आदिवासी महासभा ने छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम, 2026 के प्रावधानों को चुनौती देते हुए कहा है कि यह कानून धार्मिक गतिविधियों पर मनमानी और पाबंदियां लगाता है. याचिका में आरोप लगाया गया है कि इस कानून के तहत चर्च में रविवार को होने वाली प्रार्थना सभाओं पर भी अधिकारियों की तरफ से कार्रवाई की जा रही है।  सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस मामले में हाई कोर्ट के फैसले से भी मदद मिल सकती है. उन्होंने कहा कि कुछ याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट का रुख भी किया है. ऐसे में अगर सुप्रीम कोर्ट सीधे सुनवाई शुरू कर देता है, तो हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई प्रभावित हो सकती है. मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अगर हाई कोर्ट तय समय में मामले पर सुनवाई कर सके, तो उसके फैसले से सुप्रीम कोर्ट को भी मदद मिलेगी।  याचिकाकर्ताओं की तरफ से पेश वकील कॉलिन ने बताया कि इस मुद्दे पर सात याचिकाएं हैं. उन्होंने सुझाव दिया कि हाई कोर्ट में लंबित मामलों को भी सुप्रीम कोर्ट में लाया जा सकता है और सभी मामलों के लिए एक वकील को जिम्मेदारी दी जा सकती है. उन्होंने कहा कि वह दूसरे याचिकाकर्ताओं से बात करेंगे और वे मामले को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने के लिए याचिका दाखिल कर सकते हैं।  वकील ने कानून की भाषा को व्यापक बताते हुए कहा कि इसका असर दूर तक हो सकता है. मुख्य न्यायाधीश ने मामले में नोटिस जारी करने का निर्देश दिया. साथ ही रजिस्ट्री से कहा कि इसी मुद्दे पर दाखिल सभी मामलों की जानकारी जुटाई जाए।  कानून को हाई कोर्ट में भी दी गई है चुनौती छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम, 2026 को छत्तीसगढ़ विधानसभा ने मार्च 2026 में पारित किया था. अप्रैल में राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद इसने 1968 से लागू पुराने कानून की जगह ली. इसके नियमों को भी चुनौती दी गई है।  याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कानून अंतरात्मा की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, निजता और व्यक्तिगत आजादी के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है. उनका आरोप है कि स्वेच्छा से धर्म बदलने के लिए भी सार्वजनिक जानकारी देने और सरकारी मंजूरी से जुड़ी कई प्रक्रियाएं पूरी करनी पड़ती हैं।  याचिका में धर्मांतरण कराने वाले पादरियों और अन्य धार्मिक अगुवों के पंजीकरण की शर्त पर भी सवाल उठाए गए हैं. कानून में कुछ अपराधों के लिए कम से कम सात साल की कैद, जिसे उम्रकैद तक बढ़ाया जा सकता है, और 10 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है. याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इन प्रावधानों का इस्तेमाल धार्मिक स्थलों को बंद कराने और लोगों के पूजा-पाठ व धार्मिक सभाओं के अधिकार को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है. इस मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 8 अक्टूबर को राज्य सरकार को तीन हफ्ते के भीतर जवाब देने के लिए नोटिस जारी किया था। 

राजस्थान में भ्रष्टाचार पर सख्ती, रिश्वत मांगने के आरोपी पुलिस कांस्टेबल को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं

जयपुर राजस्थान में रिश्वतखोर अधिकारियों और कर्मचारियों की मुश्किलें बढ़ने वाली है। सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि रिश्वत के मामले में सरकारी कार्मिकों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए सरकार से मंजूरी लेना अनिवार्य नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए का संरक्षण आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान लिए गए निर्णयों के संबंध में है, जिससे उन्हें अनावश्यक उत्पीड़न से बचाया जा सके। रिश्वत जैसे गंभीर मामले में ढाल के रूप में यह संरक्षण नहीं मिल सकता। न्यायाधीश एस.वी.एन. भट्टी व न्यायाधीश एन.वी. अंजारिया की खंडपीठ ने राजस्थान पुलिस के कांस्टेबल की अपील खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। कांस्टेबल ने 1.5 लाख रुपए की रिश्वत मांगने के मामले में अपने खिलाफ दर्ज एफआइआर और उसको लेकर कोर्ट में पेश आरोप-पत्र को चुनौती दी थी। राजस्थान की अतिरिक्त महाधिवक्ता संस्कृति पाठक ने इस अपील का विरोध किया। कोर्ट ने उनके तर्क स्वीकार करते हुए कहा कि रिश्वत मांगना पूरी तरह आपराधिक कृत्य है, जिसका आधिकारिक दायित्व से कोई लेना-देना नहीं है। कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में वर्ष 2018 में जोड़ी गई धारा 17ए लोक सेवक के दायित्वों के निर्वहन से जुड़े कृत्यों की जांच या पूछताछ शुरू करने के संबंध में है, जिसमें जांच या पूछताछ शुरू करने से पहले सक्षम अधिकारी की मंजूरी आवश्यक होती है। इस प्रावधान को हर आपराधिक मामले में लागू नहीं किया जा सकता। रिश्वत मांगना विशुद्ध रूप से एक अपराध होने के कारण कांस्टेबल के खिलाफ दर्ज यह मामला धारा 17ए के कानूनी संरक्षण के दायरे में नहीं आता। इन अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति लंबित क्र.सं.अधिकारी का नाम                      पद एवं विभाग                                             अभियोजन स्वीकृति का प्रस्ताव भेजने की तारीख 1    रामेश्वर सिंह                       अधीक्षण अभियंता, सार्वजनिक निर्माण विभाग                            29 दिसंबर 2023 2    सुरेश कुमार                        जिला आबकारी अधिकारी, अलवर                                            20 अगस्त 2024 3    अजय सिंह                          अधिशाषी अभियंता, सार्वजनिक निर्माण विभाग                          25 जून 2025 4    मंगतारा खन्ना                   तत्कालीन रजिस्ट्रार, सहकारी समिति, बीकानेर                            11 नवंबर 2025 5    डॉ. दिव्यम जाजोरिया     पशु चिकित्सा अधिकारी, राजकीय पशु चिकित्सालय, कुंभलगढ़, राजसमंद    12 दिसंबर 2025 6    श्रीकृष्ण अवतार गुप्त              अधिशाषी अभियंता, सार्वजनिक निर्माण विभाग                       7 जुलाई 2026 अभियोजन स्वीकृति के लंबित में सर्वाधिक सार्वजनिक निर्माण विभाग से अभियोजन स्वीकृति के लंबित में सर्वाधिक सार्वजनिक निर्माण विभाग से हैं। अधीक्षण अभियंता रामेश्वर सिंह के लिए 29 दिसंबर 2023, अधिशाषी अभियंता अजय सिंह के लिए 25 जून 2025 और अधिशाषी अभियंता श्रीकृष्ण अवतार गुप्त के लिए 7 जुलाई 2026, तत्कालीन रजिस्ट्रार सहकारी समिति, बीकानेर मंगतारा खन्ना, 11 नवंबर 2025; पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. दिव्यम जाजोरिया (राजकीय पशु चिकित्सालय, कुंभलगढ़), 12 दिसंबर 2025 व जिला आबकारी अधिकारी सुरेश कुमार (अलवर), 20 अगस्त 2024 से लंबित हैं।