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प्राइवेट मेडिकल कॉलेज फीस मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, EWS याचिका खारिज

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने EWS आय सीमा और निजी मेडिकल कॉलेज फीस को लेकर याचिका खारिज कर दी है. सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि निजी कॉलेजों को सरकारी कॉलेजों जैसी फीस लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता क्योंकि सरकारी संस्थानों को सरकार से अनुदान मिलता है. जस्टिस बी वी नागरत्ना ने टिप्पणी करते हुए कहा कि निजी कॉलेजों में अगर कोई छात्र फीस वहन नहीं कर सकते तो स्कॉलरशिप समेत अन्य विकल्प जैसे सबवेंशन या अन्य वित्तीय सहायता के विकल्प उपलब्ध हैं. जस्टिस नागरत्ना ने यह भी कहा कि सरकारी संस्थानों को सरकार से अनुदान मिलता है, जबकि निजी संस्थान अपनी फीस से चलते हैं और अगर निजी मेडिकल कॉलेजों को पर्याप्त फीस लेने से रोका गया तो चिकित्सा शिक्षा में उनका योगदान प्रभावित होगा।  जो वहन नहीं कर सकते हैं फीस  इस मु्द्दे पर फैसला देते हुए जस्टिस नागरत्ना ने यह भी कहा कि अगर कोई छात्र फीस वहन नहीं कर सकता है, तो स्कॉलरशिप, सबवेंशन या अन्य वित्तीय सहायता के विकल्प उपलब्ध हैं।  देश को डॉक्टरों की जरूरत उन्होंने आगे कहा कि देश को अधिक डॉक्टरों की जरूरत है और निजी मेडिकल कॉलेज इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. ऐसे में निजी कॉलेजों की फीस अधिक है केवल इसलिए उन्हें सरकारी कॉलेजों के बराबर फीस लेने का आदेश नहीं दिया जा सकता. हालांकि,  सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए यह स्पष्ट किया कि इस मामले से जुड़ा कोई व्यापक कानूनी प्रश्न भविष्य में उठाया जा सकता है।  राजस्थान का भी उठा मामला वहीं, राजस्थान हाईकोर्ट ने भी निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस संरचना को वैध माना था और कहा था कि राज्य की फीस नियामक समिति द्वारा सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के अनुसार ही फीस तय की गई है. दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की 8 लाख रुपये के वार्षिक आय सीमा और निजी मेडिकल कॉलेजों की ऊंची फीस के बीच कथित विरोधाभास को लेकर राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दाखिल की गई अपील पर सुनवाई के बाद उसे खारिज कर दिया। 

पैदल यात्रियों के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, फुटपाथ को बताया मौलिक सुविधा

नई दिल्ली देश के करोड़ों पैदल यात्रियों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. शीर्ष अदालत ने शुक्रवार (19 जून 2026) को माना कि फुटपाथ पर चलने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले ‘जीवन के अधिकार’ का हिस्सा है. अदालत ने कहा कि नागरिकों को सुरक्षित, बाधारहित और दिव्यांगों की सुविधा के मुताबिक फुटपाथ उपलब्ध कराना सरकारों की जिम्मेदारी है।  लीगल वेबसाइट लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने ये बातें सड़क सुरक्षा से जुड़ी एक याचिका की सुनवाई के दौरान कही. याचिकाकर्ता ने अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया कि देश के कई शहरों में या तो फुटपाथ हैं ही नहीं, और जहां हैं भी वहां अतिक्रमण, पार्किंग या अन्य बाधाओं के कारण पैदल चलना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में लोगों को मजबूर होकर सड़क पर चलना पड़ता है, जिससे सड़क हादसों का खतरा बढ़ जाता है।  अदालत ने और क्या कहा? जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर की बेंच ने कहा, “संविधान के भाग-III के तहत पैदल चलने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है. यह अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत प्राप्त आवागमन की स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है. इसे अनुच्छेद 19(1)(a), अनुच्छेद 19(1)(b), अनुच्छेद 19(1)(c) और अनुच्छेद 21 के साथ पढ़ा जाना चाहिए. पैदल चलने के इस मौलिक अधिकार के दायरे में स्पष्ट रूप से चिन्हित फुटपाथों का अधिकार भी शामिल है. ये अधिकार प्राथमिक हैं और इन्हें मोटर चालित वाहनों की आवाजाही पर वरीयता प्राप्त होगी।  कोर्ट ने कहा, “यह वास्तव में अजीब है कि हम पैदल चलने के अधिकार को पहचानने और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते. शायद इसकी वजह यह है कि पहियों ने हमारी सोच पर कब्जा कर लिया है. हमारी नगरपालिकाएं ऐसी सड़कें बनाने में व्यस्त रहीं जो मोटर वाहनों के लिए अधिक उपयुक्त हों।  दिव्यांगजनों की सुविधा पर दिया जोर कोर्ट ने अपने आदेश में विशेष रूप से दिव्यांगजनों के अधिकारों पर भी जोर दिया. अदालत ने कहा कि फुटपाथ ऐसे होने चाहिए, जिनका इस्तेमाल व्हीलचेयर या अन्य सहायक उपकरणों का इस्तेमाल करने वाले लोग भी आसानी से कर सकें. सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे फुटपाथों की उपलब्धता, रखरखाव और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश तैयार करें. साथ ही, फुटपाथों से अतिक्रमण हटाने को भी अनिवार्य बताया गया है।  सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि अगर उचित फुटपाथ नहीं होंगे, तो पैदल यात्रियों को सड़क का इस्तेमाल करना पड़ेगा, जो उनकी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है. इसलिए सुरक्षित फुटवे और फुटपाथ उपलब्ध कराना सिर्फ प्रशासनिक सुविधा का विषय नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व है। 

होममेकर महिलाओं को मिला बड़ा सम्मान, मौत के मामलों में मुआवजे पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

नई दिल्ली एक्सीडेंट में जब किसी इंसान की मौत होती है, तब उसकी कमाई या सैलरी के हिसाब से मुआवजा तय होता है. लेकिन होम मेकर महिलाओं से जुड़े केस में यह मामला उलझ जाता है, क्योंकि होम मेकर महिलाओं की कोई तय कमाई नहीं होती. अब सुप्रीम कोर्ट ने होम मेकर (गृहिणियों) के मुआवजे को लेकर एक बड़ा फैसला दिया है. अदालत ने कहा कि जब किसी दुर्घटना के कारण गृहिणी की मौत हो जाती है, तब उसका मुआवजा तय करते हुए उनके योगदान का आकलन आवश्यक है. अदालत ने कहा कि गृहिणियों का योगदान केवल परिवार तक सीमित नहीं होता, बल्कि वो मानव संसाधन और राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.  ऐसे में उन्हें केवल “होममेकर” कहने के बजाय “नेशन बिल्डर” कहा जाना चाहिए।  होम मेकर की मौत पर 30 हजार रुपए मंथली के हिसाब से तय हो मुआवजा अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि गृहिणी द्वारा किए जाने वाले घरेलू काम और देखभाल की सेवाओं का आर्थिक मूल्य है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. दुर्घटना की शिकार गृहणियों के मामले में मुआवजे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने नई गाइडलाइन जारी करते हुए होम मेकर महिलाओं की मौत पर 30 हजार रुपए महीना के हिसाब से मुआवजा तय करने की बात कही।  एक्सीडेंट से जुड़े एक दावे की अपील पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला  वाहन दुर्घटना के दावों से जुड़ी एक अपील पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन.के. सिंह की बेंच ने कहा कि घर संभालने वाली महिला (होममेकर) का योगदान सिर्फ घर तक ही सीमित नहीं होता, बल्कि देश के निर्माण में भी उनकी अहम भूमिका होती है. कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजा तय करते समय घर संभालने वाली महिला की मौत या अक्षमता के कारण परिवार को घरेलू देखभाल के मामले में जो नुकसान होता है, उसे अलग से मान्यता दी जानी चाहिए।  जस्टिस संजय करोल की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसी उद्देश्य से घरेलू देखभाल के नुकसान (Loss of Domestic Care) का मूल्य ₹30,000 प्रति माह निर्धारित किया है. पीठ ने यह भी कहा कि यह सिद्धांत पहले दिए गए फैसले में निर्धारित मानकों के अतिरिक्त है।  मुआवजा निर्धारण के लिए एक नया मार्गदर्शक सिद्धांत प्रदान करता है।  2001 में पंजाब की महिला की हादसे में मौत पर आया फैसला यह फैसला पंजाब में एक मोटर एक्सीडेंट दावे से जुड़ी अपील पर आया, जिसमें नवंबर 2001 में रेशमा नाम की एक महिला की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी. उसके पति और तीन बच्चों ने मुआवज़े के लिए मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल का दरवाज़ा खटखटाया था. ट्रिब्यूनल ने 2003 में मुआवजा दिया, लेकिन यह मामला सालों तक मुकदमे में उलझा रहा, और पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने अपील पर दिसंबर 2024 में जाकर फैसला सुनाया।  दुर्घटना के दो दशक से भी ज्यादा समय बाद इस तरह की देरी पर चिंता जताते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर एक्सीडेंट मुआवजे के दाले पर आम तौर पर एक साल के अंदर फैसला हो जाना चाहिए. बेंच ने कहा ऐसे मामलों का फैसला आम तौर पर एक साल के अंदर हो जाना चाहिए।      कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से मोटर एक्सीडेंट क्लेम मामलों की मॉनिटरिंग करने और यह पक्का करने के लिए सही एडमिनिस्ट्रेटिव निर्देश जारी करने को कहा कि ऐसे मामलों का निपटारा तय समय में हो जाए।      इस फैसले के दूरगामी असर होने की उम्मीद है क्योंकि पूरे भारत में कोर्ट आम तौर पर मृतक होममेकर्स के लिए मौजूदा न्यूनतम वेतन के आधार पर उन्हें एक काल्पनिक इनकम देकर मुआवजा तय करते हैं, और अक्सर उन्हें स्किल्ड या अनस्किल्ड वर्कर्स के बराबर मानते हैं।      सुप्रीम कोर्ट का फैसला उस तरीके से अलग है, यह मानते हुए कि घरेलू देखभाल के काम को पारंपरिक लेबर-मार्केट बेंचमार्क तक कम नहीं किया जा सकता।      कोर्ट की ये बातें उन मिसालों पर आधारित हैं जिनमें सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि होममेकर्स के योगदान की, बिना पेमेंट के भी, मापने लायक आर्थिक वैल्यू है।      कीर्ति बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2021) और अरुण कुमार अग्रवाल बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2010) सहित कई पिछले फैसलों में, सुप्रीम कोर्ट कोर्ट ने होममेकर्स द्वारा दी जाने वाली सेवाओं को गैर-कानूनी मानने के खिलाफ चेतावनी दी थी।      अदालत का यह ताजा फैसला एक कदम और आगे बढ़कर घरेलू देखभाल के नुकसान का आकलन करने के लिए हर महीने ₹30,000 का एक ठोस न्यूनतम बेंचमार्क तय करता है।      यह बेंचमार्क नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रणय सेठी (2017) में संविधान बेंच द्वारा तय किए गए सिद्धांतों के साथ काम करेगा, जो मोटर व्हीकल एक्ट के तहत मुआवजा तय करने के लिए एक मिसाल है। 

चरित्र पर सवाल नहीं उठाए जा सकते! सहमति से बने संबंधों पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा बयान

हैदराबाद सुप्रीम कोर्ट ने अपनी एक टिप्पणी में कहा है कि आपसी सहमति से दो अविवाहित व्यस्कों के बीच बने शारीरिक संबंध किसी व्यक्ति के खराब चरित्र का प्रमाण नहीं हो सकता है. न्यायाधीश मनमोहन और मनोज मिश्रा की पीठ ने यह टिप्पणी तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड को एक ऐसे उम्मीदवार की नियुक्ति का निर्देश देते हुए की, जिसका पुलिस कांस्टेबल के रूप में चयन एक आपराधिक मामले की वजह से रद्द कर दिया गया था।  इस उम्मीदवार पर शादी का झांसा देकर रेप का आरोप लगा था, जो बाद में अदालत के बाहर सुलझ गया था. लेकिन तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड ने उस आरोप को देखते हुए खराब चरित्र का आधार देकर उम्मीदवार की भर्ती को रोक दिया था. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, "सहमति से बने दो अविवाहित वयस्कों के बीच शारीरिक संबंध अपने आप में किसी व्यक्ति के चरित्र के खराब होने का आधार नहीं हो सकता है और न ही ऐसा होना चाहिए. ऐसा कोई कानून नहीं है जो सहमति से बने दो अविवाहित वयस्कों को अपनी पसंद का संबंध रखने से रोकता हो।  उम्मीदवार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी इस मामले में उम्मीदवार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी. सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीदवार की ओर से दायर अपील को स्वीकार कर लिया और तेलंगाना उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें बोर्ड को पुलिस कांस्टेबल के पद पर उसकी नियुक्ति पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया गया था. तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड ने उनकी नियुक्ति इस आधार पर रद्द कर दी थी कि उनके खिलाफ 2014 में दर्ज विवाह का वादा करके बलात्कार का मामला दर्ज कराया गया था।  हर संबंध शादी में तबदील नहीं होता है सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस उम्मीदवार का अपनी पड़ोसी के महिला के साथ संबंध था. आरोप लगने के बाद दोनों पक्षों के बीच समझौता भी हो गया था. साल 2015 में लोक अदालत में इसका निपटारा भी हो गया था. आईपीसी की धारा 376 के तहत कोई आरोप नहीं लगाया गया था. ऐसे में उस आधार पर उम्मीदवार को भर्ती न करने का फैसला सही नहीं है।  कोर्ट ने कहा "हर रिश्ता शादी में तब्दील नहीं होता है. इसलिए, केवल इसलिए कि रिश्ता शादी में तब्दील नहीं हुआ, यह मानने का कोई आधार नहीं है कि एक पक्ष ने दूसरे को धोखा दिया है. इस आधार पर यह भी नहीं कहा जा सकता है कि उस व्यक्ति का चरित्र खराब था। 

संपत्ति के बाद नौकरी में भी बेटियों के अधिकार मजबूत, जानिए Supreme Court का अहम फैसला

 नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने विवाह के बाद बेटियों के अधिकार को लेकर बड़ा फैसला दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि विवाह के बाद भी बेटी परिवार का ही अंग है. किसी बेटी को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के लिए सिर्फ इसलिए अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता है, क्योंकि वह विवाहित है. सुप्रीम कोर्ट के इस बड़े फैसले ने विवाहित बेटियों के अधिकार को लेकर छाई भ्रम की धुंध हटा दी है।  सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने इस दलील को खारिज कर दिया कि निवास एक अलग पात्रता शर्त है, जिसका मूल्यांकन प्रत्येक मामले के तथ्यों पर किया जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सभी विवाहित बेटियों के अधिकार खारिज किए जाने को इस धारणा के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता कि हर विवाहित बेटी जरूरी रूप से कहीं और रहती है।  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक निर्णय उन अनुमानों पर आधारित नहीं किया जा सकता, जो व्यापक हैं और जीवंत वास्तविकताओं से कटे हुए हैं. सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता निशा ने तर्क दिया कि विवाहित बेटियों को एक लाभकारी योजना से बाहर करने का कोई तर्कसंगत आधार नहीं है और यह समानता की संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन करता है. सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि विवाहित बेटियाँ आम तौर पर अपने वैवाहिक घरों में चली जाती हैं।  सरकार की ओर से दलील यह भी दी गई कि विवाह के बाद बेटियां स्थानीय निवास की आवश्यकता को पूरा नहीं कर सकती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा का उद्देश्य उत्तराधिकार का अधिकार बनाना नहीं, एक मृतक के परिवार को तत्काल वित्तीय राहत देना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में निरंतरता सुनिश्चित करना है. एक बार जब निर्भरता को मानक रूप में स्वीकार कर लिया जाता है, तो एक विवाहित बेटी को केवल इसलिए बहिष्कृत करना तर्कहीन हो जाता है।  सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर फैसला सुनाया कि क्या विवाहित बेटियों को संवैधानिक रूप से 'परिवार' की परिभाषा से बाहर रखा गया है? क्या अनुकंपा के आधार पर उन्हें उचित मूल्य की दुकान का लाइसेंस दिया जा सकता है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2025 में दिए अपने निर्णय में कहा था कि केवल अविवाहित बेटी को ही अनुकंपा के आधार पर माता या पिता के नाम से लाइसेंस वाली उचित मूल्य की राशन दुकान का आवंटन अनुकंपा के आधार पर ट्रांसफर हो सकता है।  याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. अपनी याचिका में विवाहित बेटी ने यह तर्क दिया था कि वह अपने पिता की मृत्यु के बाद मां और एक विकलांग बहन की देखभाल कर रही है। 

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, सहमति से सेक्स वर्क को लेकर पुलिस को दी नसीहत

 नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट की वेकेशन (अवकाश) बेंच ने महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा की बेंच ने स्पष्ट कर दिया है कि अब कोई भी वरिष्ठ वकील इस बेंच के सामने मामलों की जल्द सुनवाई (अर्जेंट मेंशनिंग) के लिए पेश नहीं होगा।  बेंच ने कहा कि वरिष्ठ वकीलों को कोर्ट के सामने मौखिक या लिखित रूप से अर्जेंसी दिखाते हुए मामले को जल्द सूचीबद्ध करने की मांग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। मर्जी से सेक्स वर्क अपराध नहीं सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह दिया है कि अपनी मर्जी से सेक्स वर्क करना गैरकानूनी नहीं है। वहीं वेश्यालय या कोठे चलाना गैरकानूनी है। बता दें कि इमोरल ट्रैफिक प्रिवेंशन ऐक्ट 1956 में बनाया गया था। इसके तहत कई धाराएं हैं और कोठे और वेश्यालय चलाने का अपराध बताया गया है। इस ऐक्ट की धारा 3 में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति देह व्यापार के लिए अपनी जगह को किराए पर देता है या फिर उपयोग की अनुमति देता है तो उसे 1 से 3 साल तक की कैद और जुर्माना हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट में अवकाश के दौरान मामलों की सुनवाई कर रही जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली दो अलग-अलग जजों की पीठ ने सोमवार को एक बड़ा निर्देश जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि मामलों पर जल्द सुनवाई या किसी भी प्रकार की अर्जेंट मेंशनिंग के लिए कोई भी वरिष्ठ वकील (सीनियर एडवोकेट) अब सीधे बेंच के सामने पेश नहीं होगा।  दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में आमतौर पर सीनियर वकील अर्जेंट मामलों में बेंच के सामने मेंशनिंग करते हैं और अर्जेंसी यानी अति आवश्यकता का हवाला देकर किसी भी मामले को तय समय से पहले सुनने की गुहार लगाते हैं. इस प्रक्रिया को मेंशनिंग कहा जाता है, जिसे अमूमन वरिष्ठ वकील कोर्ट रूम में मौखिक या लिखित रूप से जजों के सामने उठाते थे, जिसके बाद कोर्ट मामले की गंभीरता को तय कर जल्द सुनवाई या आदेश पारित करने पर विचार करता है।  सर्वोच्च न्यायालय ने अब इस पूरी व्यवस्था पर फिलहाल के लिए रोक लगा दी है. कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वरिष्ठ वकीलों को मामलों की जल्द सुनवाई के लिए पीठ के सामने आने की इजाजत नहीं होगी, जिसके बाद अब वह मेंशनिंग नहीं कर पाएंगे  ITPA में क्या है इसकी धारा 4 में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति सेक्स वर्कर की कमाई का इस्तेमाल करता है तो यह अपराध है। यह धारा सेक्स वर्कर के परिवार के लोगों पर भी लागू होती है। धारा 5 में कहा गया है कि जबरदस्ती, बहलाकर या फिर मजबूर करके किसी को देह व्यापार के लिए मजबूर करना भी अपराध है। धारा 7 में कहा गया है कि सार्वजनिक स्थान या किसी धार्मिक स्थान के 200म ीटर के दायरे में सेक्स वर्क करना अपराध है। हालांकि इस कानून में कहीं भी सहमतिसे सेक्स का जिक्र नहीं किया गया है। जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस एएस बोपन्ना की बेंच ने बुद्धदेव कर्माकर बनाम बंगाल सरकार के मामले में भी बड़ा फैसला सुनाया था। यह मामला सेक्स वर्करों के पुनर्वास और अधिकारों को लेकर था। कोर्ट ने कहा था कि जिस तरह से संविधान के अनुच्छेद 21 में हर व्यक्ति को जीवन जीने का अधिकार मिला है उसी तरह सेक्स वर्कर भी भारत के नागरिक हैं और उन्हें कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए। लॉ कमीशन ऑफ इंडिया की जांच में कई बार सामने आया है कि सेक्स वर्कर्स के साथ पुलिस का रवैया ठीक नहीं होता है। यह उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाता है। कोर्ट कई बार कह चुका है कि सहमित से सेक्स वर्क करना अपराध नहीं है। ऐसे में अगर कोई आईटीपीए की बाकी धाराओं का उल्लंघन नहीं कर रहा है तो उसे परेशान नहीं करना चाहिए। इस फैसले में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन ने कहा कि अगर कोई अपनी मर्जी से सेक्स वर्क कर रहा है तो उसे हिरासत में रखने, सुधार गृह बेजने की जरूरत नहीं है।

SC ने दहेजखोरों को लगाई फटकार, कहा- शादी के नाम पर वसूली बर्दाश्त नहीं

 नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने दहेज प्रताड़ना को लेकर समाज को कड़ा संदेश दिया है. कोर्ट ने बहू-बेटियों के अपमान पर बेहद सख्त रुख अपनाया है. एक मामले की सुनवाई के दौरान देश की सबसे बड़ी अदालत ने साफ कहा कि लड़कों को शादी के बाद दूसरों की बेटियों और उनके परिवार का अपमान करने का कोई हक नहीं है. सुनवाई के दौरान अदालत ने बेहद कड़े शब्दों में पूछा, 'आप जिनसे पैसे लेते हो, आखिर उनको ही भिखारी कैसे कह सकते हो?' इसी सख्त रुख के साथ जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने आरोपी पति तथा उसके परिवार को कोई राहत देने से इनकार करते हुए उन्हें जेल भेजने का फैसला लिया। दरअसल, यह पूरा मामला दहेज हत्या और खुदकुशी के लिए उकसाने से जुड़ा हुआ था. इस केस में आरोपी पक्ष कोर्ट से कानूनी राहत की उम्मीद कर रहा था. हालांकि, सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने लड़के वालों के पुराने बर्ताव पर बार-बार गहरी नाराजगी जताई. जजों का साफ मानना था कि ऐसे गंभीर मामलों में ढिलाई बरतने से समाज में गलत संदेश जाता है. इसी वजह से अदालत ने आरोपियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया. इस दौरान जस्टिस नागरत्ना ने हमारे समाज की इस कड़वी हकीकत पर गहरी चिंता जताई. उन्होंने सवाल किया, 'आखिर लड़के, लड़कियों से शादी ही क्यों करते हैं, जब उन्हें बाद में लड़की और उसके पूरे परिवार का अपमान ही करना होता है? इसी बीच, जब याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल पर तो सिर्फ आईपीसी की धारा 498A (दहेज प्रताड़ना) के तहत आरोप लगे हैं, तब सुप्रीम कोर्ट ने इसे सिरे से खारिज कर दिया. जस्टिस नागरत्ना ने वकील की दलील पर तीखी टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि आपको तो खुश होना चाहिए कि आप पर सिर्फ धारा 498A लगी है और इसमें केवल तीन साल की ही सजा का प्रावधान है।  बहू को पैसा निकालने वाली मशीन न समझें: सुप्रीम कोर्ट इसके आगे सुप्रीम कोर्ट ने शादियों के बाद लड़कियों के ससुराल में होने वाले आर्थिक शोषण पर भी गहरी चिंता जताई. इस दौरान जस्टिस नागरत्ना ने लड़के वालों की मानसिकता पर चोट करते हुए टिप्पणी की कि आजकल शादी के बाद ससुराल में दुल्हन तथा उसके माता-पिता को पूरी तरह से निचोड़ लेने यानी पैसे ऐंठने की कोशिश की जाती है।  इतना ही नहीं, अदालत ने लड़की के मायके वालों से पैसे मांगने और फिर उन्हें ही नीचा दिखाने वाले रवैए को बेहद शर्मनाक माना है. बेंच ने स्पष्ट कर दिया कि समाज में अब यह मैसेज जाना चाहिए कि कोई भी परिवार किसी की बेटी को लाकर उसका या उसके माता-पिता का मानसिक तथा आर्थिक उत्पीड़न नहीं कर सकता. आरोपियों की याचिका को खारिज करते हुए पीठ ने यह जता दिया कि देश का कानून अब बहू-बेटियों के सम्मान की रक्षा के लिए पूरी तरह से मुस्तैद है। 

अब नहीं चलेगी अनंत सुनवाई! SC ने हाईकोर्ट को मामलों के निपटारे की समयसीमा दी

 नई दिल्ली देश की न्यायपालिका में सुधार की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने एक कड़ा कदम उठाया है। अब देश के सभी हाईकोर्ट्स को किसी भी मामले में फैसला सुरक्षित रखने के बाद उसे अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाना होगा। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपिन एम पंचोली की पीठ ने स्पष्ट किया है कि अदालती कार्यवाही में बेवजह की देरी अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अदालतों में लंबित मामलों और फैसलों में होने वाली देरी पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाईकोर्ट के लिए अनिवार्य दिशा-निर्देश जारी किए हैं. शीर्ष अदालत ने आरक्षित फैसलों, जमानत आदेशों और उनके कारणों को सार्वजनिक करने के लिए स्पष्ट समयसीमा तय की है।  सुरक्षित फैसलों को अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाना होगा सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि किसी भी मामले में फैसला सुरक्षित (Reserved Judgment) रखे जाने के बाद उसे अधिकतम तीन महीने के भीतर सुनाया जाना चाहिए. वहीं जमानत से जुड़े मामलों में आदेश आदर्श रूप से अगले दिन जारी किया जाए और उसी दिन जेल प्रशासन तक पहुंचाया जाए।  जमानत के मामलों में ‘इमीडिएट’ कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता देते हुए जमानत (Bail) के मामलों में बेहद सख्त निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा है कि:     जमानत की अर्जी पर फैसला उसी दिन या अधिकतम अगले दिन सुनाया जाना चाहिए।     आदेश को तुरंत जेल अधिकारियों को भेजा जाए ताकि 24 से 48 घंटे के भीतर आरोपी की रिहाई सुनिश्चित हो सके।     ट्रायल कोर्ट्स को अब इन मामलों में अपनी अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) संबंधित हाईकोर्ट को सौंपनी होगी। फैसला न आने पर अब केस हो सकेगा ट्रांसफर सुप्रीम कोर्ट ने इन दिशानिर्देशों को सिर्फ एक सुझाव नहीं, बल्कि अनिवार्य नियम बनाया है। यदि किसी मामले में फैसला तीन महीने की समय सीमा के भीतर नहीं आता है, तो प्रक्रिया के तहत रजिस्ट्रार जनरल को मामले को तुरंत हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) के संज्ञान में लाना होगा। यदि इसके बाद भी देरी होती है, तो मामला किसी दूसरी बेंच को सौंप दिया जाएगा। इतना ही नहीं, यदि फैसला आने के 15 दिनों के भीतर विस्तृत आदेश वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया जाता, तो संबंधित पक्ष इसके लिए आवेदन कर सकते हैं। देरी के 30 दिन पूरे होने पर केस को दूसरी बेंच में स्थानांतरित (Transfer) करने का विकल्प भी खुला रहेगा। पारदर्शिता के लिए डिजिटल बदलाव न्यायालय ने यह भी अनिवार्य किया है कि अब हर हाईकोर्ट की वेबसाइट पर यह स्पष्ट रूप से दिखेगा कि किस तारीख को फैसला सुरक्षित रखा गया है। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को निर्देश दिया गया है कि वे अपने पोर्टल्स पर जरूरी तकनीकी बदलाव करें ताकि फैसले सुरक्षित रखने, सुनाने और अपलोड करने की तारीखें जनता के लिए पारदर्शी हों। क्यों पड़ी इस कदम की जरूरत? यह फैसला झारखंड हाईकोर्ट से जुड़े एक मामले के बाद आया है, जिसमें दिसंबर 2025 में फैसला होने के बावजूद वह महीनों तक न तो अपलोड हुआ और न ही वादी को मिल सका। सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने अपने 15 साल के अनुभव का उदाहरण देते हुए कहा कि वह अपने कार्यकाल में हमेशा तीन महीने के भीतर निर्णय देने के मानक का पालन करते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि ये निर्देश किसी जज या कोर्ट के खिलाफ नहीं, बल्कि न्यायिक कार्यकुशलता को बढ़ाने के लिए हैं। इससे पहले नवंबर 2025 से ही सुप्रीम कोर्ट सभी हाईकोर्ट्स से लंबित मामलों और उनके डेटा की रिपोर्ट मांग रहा था, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि न्याय मिलने में देरी न हो। जमानत पाए कैदियों कि रिहाई उसी दिन हो सुनिश्चित अदालत ने यह भी कहा कि जिन अंडरट्रायल कैदियों को जमानत मिल चुकी है, उनकी रिहाई उसी दिन या अधिकतम अगले दिन सुनिश्चित की जानी चाहिए. नए दिशानिर्देशों के अनुसार, अदालत पहले आदेश का प्रभावी हिस्सा (Operative Part) खुले कोर्ट में सुनाएगी और उसके विस्तृत कारण सात दिनों के भीतर वेबसाइट पर अपलोड किए जाएंगे. साथ ही, जिस दिन फैसला सुरक्षित रखा गया हो, उसकी जानकारी भी संबंधित हाईकोर्ट की वेबसाइट पर प्रदर्शित की जाएगी।  सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित समयसीमा का पालन नहीं किया जाता है तो मामला किसी अन्य पीठ को सौंपा जा सकता है. वहीं, यदि फैसले के कारण 30 दिनों के भीतर अपलोड नहीं किए जाते हैं तो मामला वापस लेकर नई पीठ के समक्ष भेजा जा सकता है. शीर्ष अदालत ने सभी हाईकोर्टों के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया है कि वे इन दिशानिर्देशों को संबंधित मुख्य न्यायाधीशों के समक्ष प्रस्तुत करें, ताकि उनका प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा सके। 

सुप्रीम कोर्ट की मध्य प्रदेश सरकार को फटकार, चंबल घड़ियाल सेंचुरी में जारी अवैध खनन पर सवाल

ग्वालियर  देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने चंबल घड़ियाल सेंचुरी में चल रहे बड़े पैमाने पर रेत के अवैध खनन और परिवहन मामले पर सुनवाई में मध्य प्रदेश सरकार पर नाराजगी जाहिर करते हुए फटकार लगायी है. अवैध रेत खनन को लेकर लगायी गई याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा की, राज्य सरकारों ने भले ही रेत खनन को रोकने के लिए प्रशासनिक सख्ती की हो, लेकिन अब भी रेत खनन की गतिविधियां बंद नहीं हुई हैं। रेत खनन से नुकसान पर चिंतित सर्वोच्च न्यायालय सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुप्रीम कोर्ट की स्वतः संज्ञान के तहत दायर सुओ मोटो रिट पिटीशन पर सुनवाई करते हुए कहा है कि, "नेशनल चंबल घड़ियाल सेंचुरी जैसे संवेदनशील क्षेत्र में अवैध खनन पर्यावरणीय अपराध ही नहीं, बल्कि जैव विविधता, दुर्लभ जलीय जीवों और महत्वपूर्ण सार्वजनिक ढांचे के लिए भी गंभीर खतरा है. ये सिर्फ जलीय जीवों तक नहीं बल्कि नेशनल हाईवे 44 पर स्थित चंबल पुल के लिए भी खतरा है. क्योंकि कोर्ट का मानना है की, नदी में लगातार रेत का खनन होने से नदी पर बने पुल की नीव और आसपास की स्टेब्लिटी पर भी इसका असर पड़ता है। सरकार के हलफनामे पर खड़े हुए सवाल चंबल घड़ियाल सेंचुरी में हो रहे अनियंत्रित अवैध रेत खनन को लेकर मध्य प्रदेश सरकार पर भी सर्वोच्च अदालत ने कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए पूछा कि, इन रिपोर्ट्स में कहा गया है कि, सुप्रीम कोर्ट के पहले सख्त आदेशों के बावजूद चंबल क्षेत्र में रेत का अवैध खनन जारी है. क्या सरकार ने इन पर ध्यान दिया? कोर्ट ने टिप्पणी की, अदालत की सख्ती के बाद रेत माफिया ने रास्ते जरूर बदल लिए हैं लेकिन रेत खनन और परिवहन की गतिविधियां अभी भी जारी हैं. हालांकि कोर्ट ने सख्त लहजे में मध्य प्रदेश सरकार से कहा कि, अगर मीडिया रिपोर्ट्स सही पायी जाती है तो इसका मतलब है राज्य सरकार द्वारा गलत हलफनामा दिया गया है. ऐसे में कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार तो एक ताजा हलफनामा दाखिल कर रिपोर्ट पर जवाब देने के निर्देश दिए हैं। मध्य प्रदेश सरकार की कार्रवाइयों को बताया अपर्याप्त सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार द्वारा चंबल क्षेत्र में हो रहे रेत के अवैध खनन और परिवहन पर की जा रही कार्रवाइयों को अपर्याप्त बताते हुए कहा है कि, अवैध परिवहन करने वाले बिना नंबर प्लेट या बिना रजिस्ट्रेशन वाले वाहनों पर जुर्माना या चालान काटना पर्यप्त कार्रवाई नहीं है, इस तरह की स्थिति में इन वाहनों को जब्त किया जाना चाहिए और साथ ही इन वाहन के मालिकों और फाइनैंसरों पर मुकदमा दर्ज होना चाहिए. कोर्ट ने ऐसे मामलों में वाहनों की जब्ती के साथ प्रॉसिक्यूशन को सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। SC के दखल के बाद चंबल में खनन पर लगाम! आपको बता दें की, राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल सेंचुरी में बड़े स्तर पर हो रहे अवैध रेत खनन पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद मध्य प्रदेश की चंबल नदी से लगे मुरैना में इन दिनों लगातार अवैध खनन और परिवहन पर पुलिस वन और खनिज विभाग की कार्रवाइयां जारी हैं, यही वजह है कि पिछले लगभग डेढ़ महीने से मुरैना के चंबल नदी स्थित राजघाट पर जहां पहले खुलेआम रेत का अवैध खनन होता था अब लगभग पूरी तरह बंद है. साथ हीं प्रशासन अंदरूनी इलाकों में भी रेत माफिया पर लगातार कार्रवाइयां कर रहा है। अब तक 25 करोड़ का अवैध भंडारण नष्ट, आधा सैकड़ा से ज़्यादा वाहन जब्त मुरैना खनिज विभाग के मुताबिक "पिछले एक महीने में प्रशासन ने रेत माफिया द्वारा चंबल क्षेत्र में नदी से अवैध उत्खनन कर अलग अलग इलाकों खुले में डंप किया गए रेत के विनिष्टीकरण की अलग अलग कार्रवाइयां की हैं. जिनमें लगभग 1.25 लाख ट्रॉली रेत का विनिष्टीकरण किया गया जिसकी कुल कीमत लगभग 25 करोड़ रुपये है. इन कार्रवाइयों में टीम ने 55 से अधिक ट्रैक्टर ट्रॉली ट्रक, लोडर और हाइड्रा सहित अन्य वाहन जब्त किया है और उन पर मामले दर्ज किए हैं. इस दौरान पुलिस ने अवैध रेत भंडारण पर 12 मामले दर्ज किए हैं. इनके अलावा प्रशासन ने 60 से ज़्यादा वाहन स्टोन माफिया के भी जब्त किए हैं. साथ ही मुड़ाईं कलेक्टर द्वारा पेट्रोल पम्प संचालकों को भी निर्देशित किया है कि, बिना नंबरप्लेट के ट्रैक्टर ट्रॉली को ईंधन न दिया जाए।

देश की सर्वोच्च अदालत में नई नियुक्तियों की तैयारी, वरिष्ठ वकील वी. मोहना का नाम भी चर्चा में

भोपाल सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने चार हाई कोर्ट चीफ जस्टिस व एक वरिष्ठ अधिवक्ता को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत करने की सिफारिश की है. इस कॉलेजियम में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा समेत चार मुख्य न्यायधीशों को शामिल किया है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में 4 चीफ जस्टिस सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम ने 22 और 27 मई, 2026 को आयोजित अपनी बैठकों में निम्निलिखित मुख्य न्यायधीशों को सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत करने की अनुशंसा की है। मध्य प्रदेश के चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा बनेंगे सुप्रीम कोर्ट के जज     न्यायमूर्ति शील नागू, मुख्य न्यायाधीश, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय (पीएचसी: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय)     न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर, मुख्य न्यायाधीश, बॉम्बे उच्च न्यायालय (पीएचसी: झारखंड उच्च न्यायालय)     न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा, मुख्य न्यायाधीश, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (पीएचसी: दिल्ली उच्च न्यायालय)     न्यायमूर्ति अरुण पल्ली, मुख्य न्यायाधीश, जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय (पीएचसी: पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय)     वरिष्ठ अधिवक्ता वी. मोहना (सुप्रीम कोर्ट) चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा का दिल्ली से संबंध, चीफ जस्टिस नागू का एमपी से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा का संबंध दिल्ली उच्च न्यायालय से है. वर्तमान में चीफ जस्टिस रहते हुए उन्होंने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में कई चर्चित मामलों की सुनवाई की हैं और कई ऐतिहासिक फैसले भी दिए हैं. उन्हें भी इस कोलेजियम में शामिल किया गया है. वहीं, जस्टिस न्यायमूर्ति शील नागू वर्तमान में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस हैं और उनका मूल मध्य प्रदेश हाईकोर्ट है. इसके अलावा जम्मू और कश्मीर व लद्दाख उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अरुण पल्ली पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय से हैं। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में मध्य प्रदेश के चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा यदि केंद्र सरकार द्वारा कॉलेजियम की सिफारिशों को मंजूरी दे दी जाती है, तो सभी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत होंगे. वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता वी मोहना बार से सीधे सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत होने वाली दसवीं अधिवक्ता होंगी. वे सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ​​के बाद यह उपलब्धि हासिल करने वाली दूसरी महिला होंगी. 22 और 27 मई को हुई अपनी बैठक में, कॉलेजियम ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस जस्टिस शील नागू, बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस जस्टिस श्री चंद्रशेखर, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस जस्टिस संजीव सचदेवा, जम्मू कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस जस्टिस अरुण पल्ली, और सीनियर एडवोकेट वी मोहना को सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर नियुक्ति को मंजूरी दी। तमिलनाडु की रहने वाली मोहना, अगर केंद्र इन सिफारिशों को मंजूरी दे देता है, तो सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाली दूसरी महिला वकील होंगी जिन्हें सीधे सुप्रीम कोर्ट में प्रमोशन मिलेगा। इससे पहले, जस्टिस इंदु मल्होत्रा ​​पहली महिला सीनियर एडवोकेट थीं जिन्हें सीधे सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त किया गया था. 2021 में, तीन महिला जज, जस्टिस हिमा कोहली, बेला एम. त्रिवेदी, और बीवी नागरत्ना को सुप्रीम कोर्ट में प्रमोट (पदोन्नत) किया गया था। जस्टिस नागू मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से, जस्टिस चंद्रशेखर झारखंड हाई कोर्ट से, जस्टिस सचदेवा दिल्ली हाई कोर्ट से, और जस्टिस पल्ली पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट से थीं। आगे क्या होगा? कॉलेजियम की इस सिफारिश को अब केंद्रीय कानून मंत्रालय के पास भेजा जाएगा। राष्ट्रपति की अंतिम मुहर और वारंट जारी होने के बाद ये सभी नाम तय हो जाएंगे, जिसके बाद राष्ट्रपति भवन या सुप्रीम कोर्ट में इनका शपथ ग्रहण समारोह होगा।