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जामनगर को वन्यजीव संरक्षण हेतु सुप्रीम कोर्ट से हरी झंडी

अहमदाबाद  सुप्रीम कोर्ट ने जामनगर वन्यजीव संरक्षण को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जामनगर को एक बार फिर वन्यजीव संरक्षण के लिए आदर्श और सुरक्षित जगह माना गया है. विशेषज्ञों ने यह भी पुष्टि की है कि यहां का मौसम, हवा-पानी की गुणवत्ता और आसपास का प्राकृतिक वातावरण, वंतारा में रह रहे अलगअलग प्रजातियों के लिए अनुकूल है. रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि दुनिया के कई मशहूर ज़ूलॉजिकल पार्क और नेशनल पार्क भी बड़े शहरों या औद्योगिक क्षेत्रों के पास बने हुए हैं. जैसे- ब्रॉन्क्स ज़ू (न्यूयॉर्क), टियरपार्क बर्लिन (जर्मनी) और लंदन ज़ू (यूके). इसके अलावा, दक्षिण अफ्रीका का ह्लुह्लुवेइम्फोलोज़ी पार्क, स्पेन का डोनाना नेशनल पार्क और अमेरिका का एवरग्लेड्स नेशनल पार्क भी शहरी या औद्योगिक इलाकों के पास होने के बावजूद सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं. SIT की रिपोर्ट में क्या है सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि वंतारा की सुविधाएं पहले से ही एक बड़े रेज़िडेंशियल टाउनशिप, कई गांवों और घनी आबादी वाले इलाकों के पास हैं. इससे कभी कोई स्वास्थ्य या पर्यावरणीय समस्या नहीं हुई है. इसलिए यह कहना गलत है कि औद्योगिक क्षेत्र के पास होने से वंतारा असुरक्षित है. संरक्षण के क्षेत्र में एक नया मानक अनंत अंबानी के नेतृत्व में वंतारा ने पशु देखभाल और संरक्षण के क्षेत्र में एक नया मानक स्थापित किया है. उनकी सक्रिय भागीदारी और वैज्ञानिक तरीकों पर आधारित कार्य यह सुनिश्चित करता है कि वंतारा का हर प्रयास- चाहे वह संरक्षण हो या पशुओं के आवास को बेहतर बनाना सकारात्मक परिणाम लाए. इसी वजह से वंतारा आज अपने प्रयासों के लिए प्रशंसनीय उदाहरण बन गया है.  

SC का बड़ा आदेश: महाराष्ट्र में 31 जनवरी तक पूरे हों नगर निकाय चुनाव

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार (16 सितंबर) को महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव को लेकर अहम सुनवाई हुई. कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार और राज्य चुनाव आयोग को 31 जनवरी, 2026 तक राज्य में स्थानीय निकाय चुनाव कराने का आदेश दिया है. कोर्ट ने साफ किया है कि 31 जनवरी के बाद कोई और समय सीमा नहीं दी जाएगी. चुनाव टालने के राज्य चुनाव आयोग के अनुरोध को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने कहा है कि इसके बाद वह तारीख आगे बढ़ाने पर विचार नहीं करेगा. इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग को SC द्वारा निर्धारित पूर्व समय-सीमा के मुताबिक कदम न उठाने पर फटकार लगाई. जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने महाराष्ट्र के अधिकारियों को इस साल 10 अक्टूबर तक राज्य में परिसीमन प्रक्रिया पूरी करने का भी निर्देश दिया. कोर्ट ने कहा कि लंबित परिसीमन 31 अक्टूबर तक पूरा किया जाए इसके बाद कोई और विस्तार नहीं दिया जाएग. ‘परिसीमन प्रक्रिया चुनाव स्थगित करने का आधार नहीं’ कोर्ट ने कहा कि परिसीमन प्रक्रिया चुनाव स्थगित करने का आधार नहीं होगी. चूंकि स्कूल बोर्ड परीक्षाएं मार्च 2026 में होंगी, इसलिए हम चुनाव स्थगित करने के इस आधार को अस्वीकार करते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र के मुख्य सचिव आवश्यकतानुसार रिटर्निंग अधिकारियों और अन्य सहायक कर्मचारियों के कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए आवश्यक कर्मचारियों को तुरंत तैनात करें. सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि 6 मई को जारी उसके आदेश, जिसमें स्थानीय निकाय चुनावों की अधिसूचना चार सप्ताह के अंदर और चुनाव चार महीने के भीतर कराने का निर्देश दिया गया था के बावजूद राज्य चुनाव आयोग इस संबंध में जल्द कार्रवाई करने में विफल रहा. सुप्रीम कोर्ट ने किए सवाल जस्टिस सूर्यकांत ने महाराष्ट्र सरकार से पूछा- क्या चुनाव हो चुके हैं?. इस पर सरकार के वकील ने कहा कि प्रक्रिया चल रही है. मई में आदेश पारित हुआ था. चुनाव 4 महीने में होने थे. परिसीमन हो चुका है और राज्य चुनाव आयोग कुछ समय विस्तार की मांग कर रहा है. एक अंतरिम अर्जी दायर की गई है. कोर्ट ने लगाई फटकार सरकार के वकील का जवाब सुनकर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि हम आपको जनवरी तक का समय क्यों दें?. सुनवाई के दौरान एक वकील ने कहा कि 29 नगर निगम हैं. पहली बार एक साथ चुनाव हो रहे हैं. जस्टिस सूर्यकांत ने कहा-आपकी निष्क्रियता अक्षमता को दर्शाती है. हमें मौखिक रूप से कारण बताएं. इस पर वकील ने कहा कि हमारे पास 65 हजार EVM मशीनें हैं, 50 हजार और चाहिए, हमने ऑर्डर दे दिए हैं. दरअसल, मई में सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकाय चुनाव कराने के लिए एक अंतरिम आदेश पारित किया था, जो ओबीसी के लिए आरक्षण लागू करने से संबंधित मुकदमेबाजी के कारण 2022 से रुके हुए थे.  

मई के आदेश का पालन नहीं हुआ, सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग को सुनाई खरी-खोटी

मुंबई  सुप्रीम कोर्ट ने मई में दिए अपने आदेश का पालन नहीं करने पर महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग को कड़ी फटकार लगाई है। शीर्ष अदालत ने मंगलवार को राज्य निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि 2022 से रुके हुए राज्य के स्थानीय निकाय चुनावों को बिना किसी और समय विस्तार के 31 जनवरी, 2026 तक संपन्न करा लिए जाएं। कोर्ट राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा लंबित स्थानीय निकाय चुनावों को समय पर संपन्न कराने के उसके आदेश का पालन करने में विफल रहने से काफी नाखुश थी। देश के भावी मुख्य न्यायाधीश (Next CJI) जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने कहा, “जिला परिषदों, पंचायत समितियों और सभी नगर पालिकाओं सहित सभी स्थानीय निकायों के चुनाव 31 जनवरी, 2026 तक करा लिए जाएं। राज्य और राज्य निर्वाचन आयोग को और समय नहीं दिया जाएगा। अगर किसी अन्य रसद सहायता की जरूरत हो, तो 31 अक्टूबर, 2025 से पहले तुरंत अर्जी दायर की जा सकती है। उसके बाद किसी भी प्रार्थना पर विचार नहीं किया जाएगा।” 'आपकी निष्क्रियता दर्शाती है कि आप अक्षम हैं' इससे पहले पीठ को सूचित किया गया था कि नगर पालिकाओं का परिसीमन कार्य प्रगति पर है और राज्य निर्वाचन आयोग ने बोर्ड परीक्षाओं के कारण स्कूल परिसरों की अनुपलब्धता के अलावा अपर्याप्त ईवीएम सहित अन्य आधारों पर समय-सीमा बढ़ाने का अनुरोध किया है। इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, “क्या आप ये चुनाव पहली बार करा रहे हैं? यह बात आपको उस समय भी पता थी जब हमने पहला आदेश पारित किया था। आपकी निष्क्रियता दर्शाती है कि आप अक्षम हैं। सबसे पहले, परिसीमन कोई वैध कारण नहीं है कि आपको चुनाव रोकना चाहिए।” कोर्ट ने 6 मई को 4 महीने का समय दिया था जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने राज्य निर्वाचन आयोग पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि इस कोर्ट ने 6 मई को आपको चार महीने का समय दिया था और अब आप समय सीमा खत्म होने के 10 दिन बाद और समय मांगने के लिए नया बहाने बना रहे हैं। पीठ ने कहा, “हम इस बात पर गौर करने के लिए बाध्य हैं कि राज्य निर्वाचन आयोग निर्धारित समय-सीमा में न्यायालय के निर्देशों का पालन करने के लिए त्वरित कार्रवाई करने में विफल रहा। हालांकि, एकमुश्त रियायत के रूप में हम निम्नलिखित निर्देश जारी करना उचित समझते हैं।” न्यायालय ने कहा, “लंबित परिसीमन हर हाल में 31 अक्टूबर, 2025 तक पूरे किया जाएं। इसके बाद कोई और समय-सीमा नहीं दी जाएगी। परिसीमन प्रक्रिया चुनाव स्थगित करने का आधार नहीं होगी।” आयोग की अर्जी खारिज कोर्ट ने आगामी बोर्ड परीक्षाओं के कारण स्कूल परिसर उपलब्ध न होने के आधार पर चुनाव स्थगित करने की अर्जी खारिज कर दी और कहा कि परीक्षाएं अगले साल मार्च में होंगी। पीठ ने निर्देश दिया, “महाराष्ट्र के मुख्य सचिव, आवश्यकतानुसार चुनाव अधिकारियों और अन्य सहायक कर्मचारियों के कर्तव्यों का पालन करने के लिए आवश्यक कर्मचारियों को तुरंत तैनात करें।” पीठ ने राज्य निर्वाचन आयोग से चुनाव के लिए आवश्यक कर्मचारियों का विवरण दो सप्ताह के भीतर मुख्य सचिव को प्रस्तुत करने को भी कहा। ईवीएम पर हलफनामा दें पीठ ने कहा कि अगर आवश्यक हो तो मुख्य सचिव अन्य विभागों के सचिवों के परामर्श से निर्वाचन आयोग द्वारा अनुरोध किए जाने के चार सप्ताह के भीतर आवश्यक कर्मचारी उपलब्ध कराएंगे। पीठ ने आदेश दिया, “आवश्यक ईवीएम की अनुपलब्धता के संबंध में, हम राज्य निर्वाचन आयोग को आवश्यक व्यवस्था करने और 30 नवंबर, 2025 तक ईवीएम की उपलब्धता के संबंध में अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का निर्देश देते हैं।” पीठ, महाराष्ट्र में लंबित निकाय चुनावों से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इससे पहले शीर्ष अदालत ने मई में एक अंतरिम आदेश जारी कर चार महीने यानी सितंबर तक चुनाव संपन्न कराने का निर्देश दिया था लेकिन ऐसा नहीं हो सका। इस पर जस्टिस कांत भड़क उठे। उन्होंने राज्य के अधिकारियों को पहले दी गई समय-सीमा की याद दिलाते हुए कहा, “क्या चुनाव हो चुके हैं? आदेश मई में पारित किया गया था, चुनाव चार महीने में होने थे।” परिसीमन प्रक्रिया जारी है महाराष्ट्र सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग के वकील ने कहा कि परिसीमन प्रक्रिया जारी है और उन्होंने समय-सीमा बढ़ाने का अनुरोध किया। पीठ ने कहा, “आपकी निष्क्रियता अक्षमता को दर्शाती है। ये मुद्दे आपको तब भी पता थे जब हमने पहला आदेश पारित किया था।” राज्य निर्वाचन आयोग के वकील ने स्वीकार किया कि वर्तमान में 65,000 ईवीएम उपलब्ध हैं, जबकि 50,000 ईवीएम की अभी भी आवश्यकता है और उनका ऑर्डर दे दिया गया है। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि राज्य निर्वाचन आयोग निर्धारित दो सप्ताह के भीतर चुनावों की अधिसूचना जारी करने में विफल रहा और त्योहारों से लेकर कर्मचारियों की कमी तक के बहाने बताते हुए पूरी प्रक्रिया को दोबारा कर रहा है। बता दें कि 6 मई को, जस्टिस कांत की अगुवाई वाली पीठ ने जुलाई 2010 से पहले लागू ओबीसी आरक्षण के आधार पर चुनाव कराने की अनुमति दे दी थी, क्योंकि राज्य द्वारा बंठिया आयोग की सिफारिशों को पूरी तरह से लागू नहीं किया गया था। राज्य के अध्यादेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट के अगस्त 2022 की यथास्थिति आदेश के कारण कई स्थानीय निकायों में वर्षों से चुनाव नहीं हुए थे, जिसमें बंठिया आयोग की सिफारिश के आधार पर स्थानीय निकायों में 27% ओबीसी आरक्षण का प्रावधान किया गया था।

महाराष्ट्र में नगर निकाय चुनाव पर सुप्रीम कोर्ट का फटकार, जल्द कराए जाएं चुनाव

मुंबई  महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव कराने की मांग वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि 31 जनवरी 2026 तक महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव कराए जाएं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य चुनाव आयोग स्थानीय निकाय के चुनाव की तारीख आगे नहीं बढ़ाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने 31 अक्टूबर तक परिसीमन की प्रक्रिया पूरा किए जाने का आदेश दिया है. कोर्ट ने महाराष्ट्र के मुख्य सचिव को आदेश दिया है कि कर्मचारियों को रिटर्निंग ऑफिसर के तौर पर तुरंत नियुक्त करे. राज्य निर्वाचन आयोग दो सप्ताह में कर्मचारियों की लिस्ट मुख्य सचिव को सौंपनी है. राज्य चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि ईवीएम की उपलब्धता पर 31 नवंबर तक सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल करें. कोर्ट ने पूछा- क्या हो चुके चुनाव? यह आदेश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने दिया है. कोर्ट ने मई में स्थानीय निकाय चुनाव कराने के लिए एक अंतरिम आदेश पारित किया था, जो ओबीसी के लिए आरक्षण लागू करने से संबंधित मुकदमेबाजी के कारण 2022 से रुके हुए थे. कोर्ट ने पूछा कि क्या चुनाव हो चुके हैं? मई में आदेश दिया गया था कि चुनाव 4 महीने (सितंबर के अंत तक) में होने थे. महाराष्ट्र के वकील ने कोर्ट को बताया कि प्रक्रिया चल रही है, परिसीमन हो चुका है. राज्य चुनाव आयोग कुछ समय बढ़ाने की मांग कर रहा है, इसके लिए एक अर्जी भी दाखिल की गई है. SC ने महाराष्ट्र सरकार से पूछा कि हम आपको जनवरी तक का समय क्यों दें? महाराष्ट्र सरकार की तरफ से कहा गया कि 29 नगर निगम हैं, पहली बार एक साथ चुनाव हो रहे हैं. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए महाराष्ट्र सरकार के वकील से कहा कि आपकी निष्क्रियता आपकी अक्षमता को दर्शाती है, हमें कारण बताया जाए. महाराष्ट्र सरकार के वकील ने कहा कि हमारे पास 65,000 ईवीएम मशीनें हैं, 50,000 और चाहिए, इसके लिए हमने ऑर्डर दे दिए हैं.  

सुप्रीम कोर्ट की दो-टूक: प्रदूषण रोकने के लिए पूरे भारत में लागू हों सख्त नियम

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने वायु प्रदूषण को लेकर शुक्रवार को कड़ी टिप्पणी की। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) बी.आर. गवई ने कहा कि अगर दिल्ली-एनसीआर (एनसीआर) के लोगों को स्वच्छ हवा का अधिकार है, तो दूसरे शहरों के निवासियों को क्यों नहीं? उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रदूषण नियंत्रण की नीतियां सिर्फ राजधानी तक सीमित नहीं रह सकतीं, बल्कि पैन-इंडिया स्तर पर लागू होनी चाहिए। बेंच की सुनवाई के दौरान, जिसमें जस्टिस के. विनोद चंद्रन भी शामिल थे, सीजेआई बी.आर. गवई ने पटाखा निर्माताओं की उस याचिका पर विचार किया, जिसमें दिल्ली-एनसीआर में पटाखों की बिक्री और निर्माण पर पूरे साल के लिए लगे प्रतिबंध को चुनौती दी गई थी। बेंच ने कहा, "हम दिल्ली के लिए अलग नीति नहीं बना सकते, सिर्फ इसलिए क्योंकि वहां देश का संभ्रांत वर्ग रहता है।" सीजेआई ने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए बताया, "मैं पिछले साल सर्दियों में अमृतसर गया था। वहां प्रदूषण की स्थिति दिल्ली से भी बदतर थी। अगर पटाखों पर प्रतिबंध लगाना है, तो यह पूरे देश में लगना चाहिए।" कोर्ट ने यह टिप्पणी तब की जब एमिकस क्यूरिए एडवोकेट अपराजिता सिंह ने दिल्ली में सर्दियों के दौरान प्रदूषण की भयावह स्थिति का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि दिल्ली एक लैंडलॉक्ड शहर है, जहां हवा में प्रदूषक फंस जाते हैं, जिससे स्थिति चोकिंग लेवल तक पहुंच जाती है। लेकिन, सिंह ने स्वीकार किया कि एलीट वर्ग प्रदूषण के चरम दिनों में शहर छोड़ देता है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या नीतियां सिर्फ अमीरों के लिए बनाई जा रही हैं? बेंच ने स्पष्ट किया कि सभी नागरिकों को स्वच्छ हवा का समान अधिकार है, चाहे वे किसी भी शहर में रहें। इसी सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य याचिका पर एक्शन लिया, जिसमें पटाखों पर पूरे देश में प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी। कोर्ट ने कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट (सीएक्यूएम) को नोटिस जारी किया और दो हफ्तों में जवाब मांगा। यह नोटिस दिल्ली-एनसीआर में मौजूदा प्रतिबंध के खिलाफ दायर याचिकाओं के संदर्भ में भी जारी किया गया।

चुनावी विवाद बढ़ा: सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक पार्टियों के रजिस्ट्रेशन को लेकर चुनाव आयोग को नोटिस जारी

पटना  बिहार चुनाव से पहले चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा झटका दिया है. राजनीतिक दलों के रजिस्ट्रेशन और रेगुलेशन पर कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस भेजा है. मामले पर कोर्ट ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा है. बता दें कि कोर्ट में एक याचिका दाखिल हुई थी. इसमें याचिकाकर्ता ने कोर्ट से धर्मनिरपेक्षता, पारदर्शिता और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए राजनीतिक दलों के रजिस्ट्रेशन और रेगुलेशन के लिए नियम बनाने के निर्देश देने की मांग की है. याचिका दाखिल होते ही सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया है. 4 सप्ताह में मांगा जवाब याचिका को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है. इसके लिए कोर्ट ने आयोग को 4 सप्ताह का समय दिया है. याचिका में केंद्र को राजनीति में भ्रष्टाचार, जातिवाद और अपराधीकरण के खतरे को कम करने के लिए कदम उठाने का निर्देश देने की भी मांग की गई है.   राजनीतिक दल बनेंगे पक्षकार सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को गंभीरता से लिया है. याचिका के बाद कोर्ट ने चुनाव आयोग और राजनीतिक पार्टियों पर सख्ती दिखाई है. कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कहा है कि मामले में सभी रजिस्टर्ड राजनीतिक दलों को पक्षकार बनाया जाए. कोर्ट के इस रुख से साफ है कि राजनीतिक दलों के रजिस्ट्रेशन और रेगुलेशन को लेकर काफी सजग है. क्यों दाखिल हुई याचिका? एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने याचिका दाखिल की है। याचिका में कहा गया है कि 13 जुलाई को इनकम टैक्स ने दो राजनीतिक दलों इंडियन सोशल पार्टी और युवा आत्म निर्भर दल पर रेड डाली, तो 500 करोड़ की ब्लैक मनी का पता चला। याचिका में तर्क दिया गया है कि ऐसे में फर्जी राजनीतिक दल न केवल लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहे हैं, बल्कि कट्टर अपराधियों, अपहरणकर्ताओं, मादक पदार्थों के तस्करों और मनी लॉन्ड्रिंग करने वालों से भारी मात्रा में धन लेकर उन्हें पदाधिकारी नियुक्त करके देश की छवि भी खराब कर रहे हैं।  

किसानों पर विवादित बयान: कंगना रनौत को सुप्रीम कोर्ट से झटका

मंडी  बॉलीवुड एक्ट्रेस और BJP सांसद कंगना राणावत को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है. कंगना रनौत के खिलाफ चल रहा मानहानि केस जारी रहेगा. सुप्रीम कोर्ट ने कंगना रनौत की मानहानि केस को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है. बता दें कि किसान आंदोलन के दौरान कंगना रनौत ने किसानों के खिलाफ विवादित टिप्पणी की थी, जिसके चलते उनके खिलाफ मानहानि का केस दायर किया गया था.   कंगना के वकील ने पेश की यह दलील बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में कगंना रनौत का पक्ष रखते हुए उनके वकील ने दलील दी थी कि उन्होंने महज एक ट्वीट को रि-ट्वीट किया था. कई और लोगों ने भी उस ट्वीट को रि-ट्वीट किया था. इस दलील के जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह महज रि-ट्वीट नहीं था, बल्कि इसमे कंगना रनौत की टिप्पणी भी शामिल थी. यह ट्रायल का विषय है तो आप निचली अदालत में अपनी बात रखिए. वहां से फैसला आने के बाद ही आगे मामले को देखा जाएगा, अगर बेंच के पास आया तो.   कंगना के खिलाफ क्या है मामला? बता दें कि कंगना रनौत के खिलाफ मानहानि की शिकायत साल 2021 में पंजाब की बठिंडा कोर्ट में 73 साल की महिंदर कौर ने दर्ज कराई थी. शिकायत में कहा गया कि कंगना ने एक पोस्ट को रि-ट्वीट करके उनके खिलाफ टिप्पणी की, जिससे उनकी मानहानि हुई है. कंगना ने अपने रि-ट्वीट में महिंदर कौर की फोटो वाले ट्वीट को रि-ट्वीट करके कहा था कि यह वही बिलिकिस बानो दादी हैं, जो शाहीन बाग प्रदर्शन का हिस्सा थीं. यह 100 रुपये में उपलब्ध हो जाती हैं. हाई कोर्ट खारिज कर चुकी याचिका बता दें कि सुप्रीम कोर्ट से पहले पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट भी कंगना रनौत की याचिका खारिज कर चुकी है. हाई कोर्ट ने कंगना की याचिका खारिज करते हुए कहा था कि कंगना रनौत एक्ट्रेस हैं. उनके खिलाफ शिकायतकर्ता की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने के आरोप लगे हैं. शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि कंगना के रि-ट्वीट और टिप्पणी से उसकी इमेज खराब हुई है. रि-ट्वीट और टिप्पणी करके कंगना की इमेज पर भी असर पड़ रहा है, शिकायतकर्ता ने किसी दुर्भावना से केस दर्ज नहीं कराया है। इसलिए मामले की जांच होनी चाहिए.  

धर्म और जाति भूलो, वर्दी की गरिमा निभाओ! सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र पुलिस को लगाई फटकार

मुंबई  सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र पुलिस को फटकार लगाई है. पुलिस को यह फटकार साल 2023 के मारपीट के एक मामले की जांच ना करने पर लगाई गई है. कोर्ट ने कहा, पुलिस की वर्दी पहनने के बाद व्यक्ति को धर्म और जाति सहित सभी तरह के पूर्वाग्रहों से ऊपर उठना चाहिए और कानून के अनुसार कर्तव्य निभाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के गृह सचिव को निर्देश दिया है. कोर्ट ने कहा है हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोगों के साथ वरिष्ठ अधिकारियों की एक SIT गठित कर जांच कराए. कोर्ट ने क्यों लगाई फटकार? दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश उस याचिका पर दिया है जिसमें मई 2023 में महाराष्ट्र के अकोला में हुए सांप्रदायिक दंगे की जांच में लापरवाह पुलिसवालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई थी. अपने कर्तव्यों की निष्क्रियता और पक्षपातपूर्ण जांच के लिए दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग की गई थी. याचिकाकर्ता ने खुद को हत्या का चश्मदीद बताया और कहा कि असली दोषी के बजाय मुस्लिम व्यक्तियों पर FIR दर्ज की गई. याचिकाकर्ता ने दंगों के दौरान खुद पर हमले का भी आरोप लगाया था. इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी थी, यह कहते हुए कि याचिकाकर्ता ने समय पर पुलिस को जानकारी नहीं दी. हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि पीड़ित के परिजन खुद कोर्ट नहीं पहुंचे और याचिका किसी “छिपे मकसद” से दायर लगती है. क्या था पूरा मामला? दरअसल, महाराष्ट्र के अकोला में 13 मई को दो समुदाय में सांप्रदायिक हिंसा हुई थी. जिसमें एक शख्स की मौत हो गई थी और 8 लोग घायल हुए थे. इस मामले में शुरू में पुलिस ने 6 FIR दर्ज की थी. इस मामले में महाराष्ट्र के अकोला दंगों में गंभीर रूप से घायल मोहम्मद अफजल मोहम्मद शरीफ ने याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की थी. याचिका में आरोप लगाया गया है कि पुलिस ने मामले की सही जांच नहीं की और गंभीर चोटों के बावजूद मेडिकल रिपोर्ट की अनदेखी की. याचिका में पुलिस जांच में खामियों और न्याय मिलने में विफलता का मुद्दा उठाया गया है. याचिका में इसका भी ज़िक्र है कि घायल चश्मदीद गवाह (मो हम्मद अफ़ज़ल) को अभियोजन पक्ष के गवाहों की सूची से बाहर रखना और घटनाओं की जांच उसके पक्ष में न करना पुलिस अधिकारियों की बदनीयती का संकेत है. अब सुप्रीम कोर्ट नें इसी मामले में सुनवाई करते हुए पुलिस को फटकार लगाई है.  

अब दिवालिया प्रोजेक्ट में फंसे होमबायर्स को राहत, सुप्रीम कोर्ट ने दिया बड़ा फैसला

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए घर खरीदारों की बड़ी राहत दी है. कोर्ट के फैसले से उन होमबायर्स को बड़ी राहत मिली है जो दिवालिया हो चुकी हाउसिंग प्रोजेक्ट में फंसे हुए हैं. कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऐसे खरीदारों को उनकी संपत्ति का कब्ज़ा पाने का अधिकार है, बशर्ते उनके दावे को रेजोल्यूशन प्रोफेशनल ने वित्तीय लेनदारों की सूची में स्वीकार कर लिया हो. यह फैसला होमबायर्स के अधिकारों को सुरक्षित करता है और दिवालियापन की कार्यवाही के दौरान उनके हितों को प्राथमिकता देता है. हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक अदालत ने यह आदेश चंडीगढ़ के एक मामले में सुनवाई करते हुए पारित किया. इस केस में, दो लोगों ने मोहाली के Ireo Rise (Gardenia) प्रोजेक्ट में 2010 में एक फ्लैट बुक किया था, उन्होंने 60 लाख की पूरी राशि का भुगतान भी कर दिया था, लेकिन 2018 में दिवालियापन की कार्यवाही शुरू होने के कारण उन्हें फ्लैट का कब्ज़ा नहीं मिल पाया.  सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? कोर्ट ने इस मामले को बड़े परिप्रेक्ष्य में देखा, क्योंकि इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) की ऐसी व्याख्या उन होमबायर्स के साथ अन्याय होगी, जो समझौते के अपने हिस्से का सम्मान करने के बावजूद फ्लैट पर कब्जे का इंतजार कर रहे हैं. न्यायमूर्ति संजय कुमार और सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने कहा, "इस मामले के तथ्य उन आम होमबायर्स की दुर्दशा को उजागर करते हैं, जो अपने सिर पर छत पाने की उम्मीद में अपनी जीवन भर की बचत का निवेश करते हैं.' अपीलकर्ताओं ने 2011 में ही लगभग पूरी राशि का भुगतान कर दिया था, उनके दावे को सही तरह से सत्यापित और स्वीकार किए जाने के बावजूद, आज उन्हें कब्जा देने से इनकार करना, उनके साथ अनुचित और अनावश्यक अन्याय होगा. कोर्ट ने पाया कि NCLT and NCLAT  ने याचिकाकर्ताओं को गलत तरीके से क्लॉज 18.4(xi) के तहत वर्गीकृत किया. यह क्लॉज उन होमबायर्स पर लागू होता है, जिन्होंने दावा नहीं किया, देर से दावा किया या जिनका दावा बिल्डर द्वारा सत्यापित नहीं किया गया. कोर्ट ने ने माना कि इस वर्गीकरण में गलतियां थीं. कोर्ट ने बताया कि इस क्लॉज में सत्यापित दावों और देरी से या असत्यापित दावों के बीच एक स्पष्ट अंतर है, क्योंकि क्लॉज 18.4(vi)(a) उन आवंटियों के मामलों को नियंत्रित करता है जिनके दावे सत्यापित और स्वीकार कर लिए गए हैं. ये आवंटी अपने अपार्टमेंट या उसके बराबर किसी वैकल्पिक यूनिट पर कब्जा पाने के हकदार हो जाते हैं.  अपीलकर्ताओं ने 27 मई 2011 को बिल्डर के साथ समझौता किया था और लगभग 60 लाख रुपये की पूरी कीमत में से 57,56,684 रुपये का भुगतान कर दिया था. NCLAT ने अपने फैसले में कहा था कि अपीलकर्ताओं का दावा देर से आया था, क्योंकि यह उस तारीख के बाद मिला था जब 23 अगस्त 2019 को कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (लेनदारों की समिति) द्वारा समाधान योजना (Resolution Plan) को पहले ही मंजूरी दी जा चुकी थी. याचिकाकर्ताओं ने इसी फैसले को चुनौती देते हुए कोर्ट का रुख किया था.

चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट की हिदायत, SIR डॉक्यूमेंट्स में आधार को किया शामिल

पटना  बिहार में चुनाव आयोग की ओर से चल रहे SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण में अब आधार को भी मान्यता रहेगी। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में आदेश दिया और चुनाव आयोग से कहा कि 11 अन्य दस्तावेजों की तरह आधार को भी मान्यता दी जाए। जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने कहा कि चुनाव आयोग किसी की ओर से दिए गए आधार की वैधता की जांच कर सकता है। इस तरह अब वोटर लिस्ट में शामिल करने के लिए आधार को भी मान्यता मिल गई है, जिसकी डिमांड लंबे समय से की जा रही थी। बेंच ने स्पष्ट किया कि आधार कार्ड को SIR के लिए वैध दस्तावेज के तौर पर स्वीकार किया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि SIR के लिए आधार कार्ड को पहचान और पते के प्रमाण के तौर पर स्वीकार किया जाए। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग के पास यह अधिकार रहेगा कि वह आधार कार्ड की प्रमाणिकता के बारे में जांच कर ले। इस तरह आधार कार्ड को जन्म प्रमाण पत्र, पासपोर्ट, राशन कार्ड समेत अन्य 11 दस्तावेजों की तरह ही मान्यता मिलेगी। बेंच ने चुनाव आयोग से कहा है कि वह आज ही आधार कार्ड को लेकर नोटिफिकेशन जारी कर दे ताकि स्पष्ट संदेश दिया जा सके। बेंच ने यह भी कहा कि आधार कार्ड सिर्फ पहचान का ही प्रमाण है। सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग का पक्ष रख रहे वकील ने यह भी कहा कि SIR के दौरान ऐसे लोग भी पाए गए हैं, जो यहां के वोटर बने हुए थे। लेकिन वास्तव में वे घुसपैठिए हैं और अवैध तौर पर भारत में प्रवेश कर के आए हैं। इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि यह एक समस्या है। इसी को लेकर उन्होंने कहा कि आधार कार्ड का वेरिफिकेशन चुनाव आयोग की ओर से किया जा सकता है। बता दें कि यही वजह है कि चुनाव आयोग कहता रहा है कि आधार कार्ड को पता या फिर नागरिकता का आधार नहीं माना जा सकता। गौरतलब है कि चुनाव आयोग का कहना है कि SIR की प्रक्रिया में वोटर्स को पूरा वक्त दिया जाएगा और नामांकन से एक दिन पहले तक यह जारी रहेगा।