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किसानों पर विवादित बयान: कंगना रनौत को सुप्रीम कोर्ट से झटका

मंडी  बॉलीवुड एक्ट्रेस और BJP सांसद कंगना राणावत को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है. कंगना रनौत के खिलाफ चल रहा मानहानि केस जारी रहेगा. सुप्रीम कोर्ट ने कंगना रनौत की मानहानि केस को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है. बता दें कि किसान आंदोलन के दौरान कंगना रनौत ने किसानों के खिलाफ विवादित टिप्पणी की थी, जिसके चलते उनके खिलाफ मानहानि का केस दायर किया गया था.   कंगना के वकील ने पेश की यह दलील बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में कगंना रनौत का पक्ष रखते हुए उनके वकील ने दलील दी थी कि उन्होंने महज एक ट्वीट को रि-ट्वीट किया था. कई और लोगों ने भी उस ट्वीट को रि-ट्वीट किया था. इस दलील के जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह महज रि-ट्वीट नहीं था, बल्कि इसमे कंगना रनौत की टिप्पणी भी शामिल थी. यह ट्रायल का विषय है तो आप निचली अदालत में अपनी बात रखिए. वहां से फैसला आने के बाद ही आगे मामले को देखा जाएगा, अगर बेंच के पास आया तो.   कंगना के खिलाफ क्या है मामला? बता दें कि कंगना रनौत के खिलाफ मानहानि की शिकायत साल 2021 में पंजाब की बठिंडा कोर्ट में 73 साल की महिंदर कौर ने दर्ज कराई थी. शिकायत में कहा गया कि कंगना ने एक पोस्ट को रि-ट्वीट करके उनके खिलाफ टिप्पणी की, जिससे उनकी मानहानि हुई है. कंगना ने अपने रि-ट्वीट में महिंदर कौर की फोटो वाले ट्वीट को रि-ट्वीट करके कहा था कि यह वही बिलिकिस बानो दादी हैं, जो शाहीन बाग प्रदर्शन का हिस्सा थीं. यह 100 रुपये में उपलब्ध हो जाती हैं. हाई कोर्ट खारिज कर चुकी याचिका बता दें कि सुप्रीम कोर्ट से पहले पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट भी कंगना रनौत की याचिका खारिज कर चुकी है. हाई कोर्ट ने कंगना की याचिका खारिज करते हुए कहा था कि कंगना रनौत एक्ट्रेस हैं. उनके खिलाफ शिकायतकर्ता की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने के आरोप लगे हैं. शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि कंगना के रि-ट्वीट और टिप्पणी से उसकी इमेज खराब हुई है. रि-ट्वीट और टिप्पणी करके कंगना की इमेज पर भी असर पड़ रहा है, शिकायतकर्ता ने किसी दुर्भावना से केस दर्ज नहीं कराया है। इसलिए मामले की जांच होनी चाहिए.  

धर्म और जाति भूलो, वर्दी की गरिमा निभाओ! सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र पुलिस को लगाई फटकार

मुंबई  सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र पुलिस को फटकार लगाई है. पुलिस को यह फटकार साल 2023 के मारपीट के एक मामले की जांच ना करने पर लगाई गई है. कोर्ट ने कहा, पुलिस की वर्दी पहनने के बाद व्यक्ति को धर्म और जाति सहित सभी तरह के पूर्वाग्रहों से ऊपर उठना चाहिए और कानून के अनुसार कर्तव्य निभाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के गृह सचिव को निर्देश दिया है. कोर्ट ने कहा है हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोगों के साथ वरिष्ठ अधिकारियों की एक SIT गठित कर जांच कराए. कोर्ट ने क्यों लगाई फटकार? दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश उस याचिका पर दिया है जिसमें मई 2023 में महाराष्ट्र के अकोला में हुए सांप्रदायिक दंगे की जांच में लापरवाह पुलिसवालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई थी. अपने कर्तव्यों की निष्क्रियता और पक्षपातपूर्ण जांच के लिए दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग की गई थी. याचिकाकर्ता ने खुद को हत्या का चश्मदीद बताया और कहा कि असली दोषी के बजाय मुस्लिम व्यक्तियों पर FIR दर्ज की गई. याचिकाकर्ता ने दंगों के दौरान खुद पर हमले का भी आरोप लगाया था. इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी थी, यह कहते हुए कि याचिकाकर्ता ने समय पर पुलिस को जानकारी नहीं दी. हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि पीड़ित के परिजन खुद कोर्ट नहीं पहुंचे और याचिका किसी “छिपे मकसद” से दायर लगती है. क्या था पूरा मामला? दरअसल, महाराष्ट्र के अकोला में 13 मई को दो समुदाय में सांप्रदायिक हिंसा हुई थी. जिसमें एक शख्स की मौत हो गई थी और 8 लोग घायल हुए थे. इस मामले में शुरू में पुलिस ने 6 FIR दर्ज की थी. इस मामले में महाराष्ट्र के अकोला दंगों में गंभीर रूप से घायल मोहम्मद अफजल मोहम्मद शरीफ ने याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की थी. याचिका में आरोप लगाया गया है कि पुलिस ने मामले की सही जांच नहीं की और गंभीर चोटों के बावजूद मेडिकल रिपोर्ट की अनदेखी की. याचिका में पुलिस जांच में खामियों और न्याय मिलने में विफलता का मुद्दा उठाया गया है. याचिका में इसका भी ज़िक्र है कि घायल चश्मदीद गवाह (मो हम्मद अफ़ज़ल) को अभियोजन पक्ष के गवाहों की सूची से बाहर रखना और घटनाओं की जांच उसके पक्ष में न करना पुलिस अधिकारियों की बदनीयती का संकेत है. अब सुप्रीम कोर्ट नें इसी मामले में सुनवाई करते हुए पुलिस को फटकार लगाई है.  

अब दिवालिया प्रोजेक्ट में फंसे होमबायर्स को राहत, सुप्रीम कोर्ट ने दिया बड़ा फैसला

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए घर खरीदारों की बड़ी राहत दी है. कोर्ट के फैसले से उन होमबायर्स को बड़ी राहत मिली है जो दिवालिया हो चुकी हाउसिंग प्रोजेक्ट में फंसे हुए हैं. कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऐसे खरीदारों को उनकी संपत्ति का कब्ज़ा पाने का अधिकार है, बशर्ते उनके दावे को रेजोल्यूशन प्रोफेशनल ने वित्तीय लेनदारों की सूची में स्वीकार कर लिया हो. यह फैसला होमबायर्स के अधिकारों को सुरक्षित करता है और दिवालियापन की कार्यवाही के दौरान उनके हितों को प्राथमिकता देता है. हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक अदालत ने यह आदेश चंडीगढ़ के एक मामले में सुनवाई करते हुए पारित किया. इस केस में, दो लोगों ने मोहाली के Ireo Rise (Gardenia) प्रोजेक्ट में 2010 में एक फ्लैट बुक किया था, उन्होंने 60 लाख की पूरी राशि का भुगतान भी कर दिया था, लेकिन 2018 में दिवालियापन की कार्यवाही शुरू होने के कारण उन्हें फ्लैट का कब्ज़ा नहीं मिल पाया.  सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? कोर्ट ने इस मामले को बड़े परिप्रेक्ष्य में देखा, क्योंकि इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) की ऐसी व्याख्या उन होमबायर्स के साथ अन्याय होगी, जो समझौते के अपने हिस्से का सम्मान करने के बावजूद फ्लैट पर कब्जे का इंतजार कर रहे हैं. न्यायमूर्ति संजय कुमार और सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने कहा, "इस मामले के तथ्य उन आम होमबायर्स की दुर्दशा को उजागर करते हैं, जो अपने सिर पर छत पाने की उम्मीद में अपनी जीवन भर की बचत का निवेश करते हैं.' अपीलकर्ताओं ने 2011 में ही लगभग पूरी राशि का भुगतान कर दिया था, उनके दावे को सही तरह से सत्यापित और स्वीकार किए जाने के बावजूद, आज उन्हें कब्जा देने से इनकार करना, उनके साथ अनुचित और अनावश्यक अन्याय होगा. कोर्ट ने पाया कि NCLT and NCLAT  ने याचिकाकर्ताओं को गलत तरीके से क्लॉज 18.4(xi) के तहत वर्गीकृत किया. यह क्लॉज उन होमबायर्स पर लागू होता है, जिन्होंने दावा नहीं किया, देर से दावा किया या जिनका दावा बिल्डर द्वारा सत्यापित नहीं किया गया. कोर्ट ने ने माना कि इस वर्गीकरण में गलतियां थीं. कोर्ट ने बताया कि इस क्लॉज में सत्यापित दावों और देरी से या असत्यापित दावों के बीच एक स्पष्ट अंतर है, क्योंकि क्लॉज 18.4(vi)(a) उन आवंटियों के मामलों को नियंत्रित करता है जिनके दावे सत्यापित और स्वीकार कर लिए गए हैं. ये आवंटी अपने अपार्टमेंट या उसके बराबर किसी वैकल्पिक यूनिट पर कब्जा पाने के हकदार हो जाते हैं.  अपीलकर्ताओं ने 27 मई 2011 को बिल्डर के साथ समझौता किया था और लगभग 60 लाख रुपये की पूरी कीमत में से 57,56,684 रुपये का भुगतान कर दिया था. NCLAT ने अपने फैसले में कहा था कि अपीलकर्ताओं का दावा देर से आया था, क्योंकि यह उस तारीख के बाद मिला था जब 23 अगस्त 2019 को कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (लेनदारों की समिति) द्वारा समाधान योजना (Resolution Plan) को पहले ही मंजूरी दी जा चुकी थी. याचिकाकर्ताओं ने इसी फैसले को चुनौती देते हुए कोर्ट का रुख किया था.

चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट की हिदायत, SIR डॉक्यूमेंट्स में आधार को किया शामिल

पटना  बिहार में चुनाव आयोग की ओर से चल रहे SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण में अब आधार को भी मान्यता रहेगी। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में आदेश दिया और चुनाव आयोग से कहा कि 11 अन्य दस्तावेजों की तरह आधार को भी मान्यता दी जाए। जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने कहा कि चुनाव आयोग किसी की ओर से दिए गए आधार की वैधता की जांच कर सकता है। इस तरह अब वोटर लिस्ट में शामिल करने के लिए आधार को भी मान्यता मिल गई है, जिसकी डिमांड लंबे समय से की जा रही थी। बेंच ने स्पष्ट किया कि आधार कार्ड को SIR के लिए वैध दस्तावेज के तौर पर स्वीकार किया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि SIR के लिए आधार कार्ड को पहचान और पते के प्रमाण के तौर पर स्वीकार किया जाए। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग के पास यह अधिकार रहेगा कि वह आधार कार्ड की प्रमाणिकता के बारे में जांच कर ले। इस तरह आधार कार्ड को जन्म प्रमाण पत्र, पासपोर्ट, राशन कार्ड समेत अन्य 11 दस्तावेजों की तरह ही मान्यता मिलेगी। बेंच ने चुनाव आयोग से कहा है कि वह आज ही आधार कार्ड को लेकर नोटिफिकेशन जारी कर दे ताकि स्पष्ट संदेश दिया जा सके। बेंच ने यह भी कहा कि आधार कार्ड सिर्फ पहचान का ही प्रमाण है। सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग का पक्ष रख रहे वकील ने यह भी कहा कि SIR के दौरान ऐसे लोग भी पाए गए हैं, जो यहां के वोटर बने हुए थे। लेकिन वास्तव में वे घुसपैठिए हैं और अवैध तौर पर भारत में प्रवेश कर के आए हैं। इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि यह एक समस्या है। इसी को लेकर उन्होंने कहा कि आधार कार्ड का वेरिफिकेशन चुनाव आयोग की ओर से किया जा सकता है। बता दें कि यही वजह है कि चुनाव आयोग कहता रहा है कि आधार कार्ड को पता या फिर नागरिकता का आधार नहीं माना जा सकता। गौरतलब है कि चुनाव आयोग का कहना है कि SIR की प्रक्रिया में वोटर्स को पूरा वक्त दिया जाएगा और नामांकन से एक दिन पहले तक यह जारी रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस से पूछा- राइफल से खुद को गोली मारना कैसे संभव?

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में सुनवाई के दौरान पुलिस से कड़ा सवाल पूछा। कोर्ट ने पूछा कि क्या कोई व्यक्ति राइफल से अपने सीने में गोली मार सकता है? शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश से पुलिस से यह सवाल पूछा है। यह मामला मौत के मामले को सुसाइड की तरह पेश करने से जुड़ा हुआ है। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या क्या सभी एंगल पर जांच हो चुकी है? क्या यह एंगल भी देखा जा चुका है कहीं यह मामला मर्डर का तो नहीं है? सुनवाई के वक्त बेंच ने क्या कहा जस्टिस मनोज मिश्रा और उज्जल भुयान की बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा कि हमारी समझ से यह जांच का विषय है कि क्या कोई व्यक्ति अपने सीने में राइफल से गोली मारने में सक्षम है? अभियोजन पक्ष के अनुसार, ऐसा प्रतीत हुआ कि मृतक ने राइफल से अपनी छाती में गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी। इस पर, हाई कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत आरोपी-प्रतिवादी नंबर 2 को अग्रिम जमानत दे दी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट को इस बात पर संदेह था कि क्या कोई व्यक्ति राइफल से अपनी छाती में खुद को गोली मार सकता है। इसलिए उसने राज्य के हलफनामे, मृतक की ऑटोप्सी रिपोर्ट और जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री को तलब किया। अदालत ने कहा कि हलफनामे में राइफल की जब्ती और उसकी लंबाई के बारे में जानकारी का खुलासा होना चाहिए। यह है पूरा मामला यह मामला याचिकाकर्ता के 17 वर्षीय बेटे से संबंधित है। उसके बेटे ने भोपाल की एक अकादमी में शॉटगन शूटिंग प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में दाखिला लिया था। यहां पर प्रतिवादी नंबर दो ने बेटे के ऊपर 40 हजार रुपए चुराने का आरोप लगाया। आरोपों के अनुसार, प्रतिवादी नंबर 2 और अकादमी के अन्य छात्रों ने याचिकाकर्ता के बेटे को अपना अपराध स्वीकार करने की धमकी दी। उन्होंने उसका फोन छीन लिया और अपराध स्वीकार करने वाले संदेश भेजे, साथ ही उसकी पिटाई भी की। उनके इस व्यवहार से दुखी और असमर्थ होकर, याचिकाकर्ता के बेटे ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। घटना से पहले मृतक ने क्या किया इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना से पहले, मृतक ने अपने एक दोस्त और अपनी बहन को बताया था कि वह आत्महत्या कर रहा है। उसने अपने दोस्त के पास एक सुसाइड नोट भी छोड़ा था, जिसमें उसने अकादमी के छात्रों (प्रतिवादी नंबर 2 सहित) को दोषी ठहराया था। लगभग एक महीने के बाद, भारतीय न्याय संहिता की धारा 107 के तहत एक एफआईआर दर्ज की गई थी। शुरुआत में, सत्र न्यायालय ने प्रतिवादी नंबर 2 की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया था। हालांकि बाद में हाई कोर्ट ने उसे यह राहत प्रदान कर दी। उम्र के संबंध में भी गलती याचिकाकर्ता के अनुसार, हाई कोर्ट ने न केवल उसके बेटे की आत्महत्या की घटना को मामूली बना दिया, बल्कि मृतक को दबाव न झेल पाने का दोषी ठहराया और आरोपी के कृत्यों का बचाव किया। यह दावा किया गया है कि हाई कोर्ट ने मृतक की उम्र 18 मानकर गलती की, जबकि घटना के समय वह 17 साल का था, और इस प्रकार, एक नाबालिग को आत्महत्या के लिए उकसाने का गंभीर अपराध लागू होता है। याचिकाकर्ता का यह भी तर्क है कि प्रतिवादी नंबर 2 एक प्रभावशाली परिवार से संबंधित है। उसकी हिरासत में पूछताछ आवश्यक है क्योंकि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद भी उसने जांच में सहयोग नहीं किया।  

‘दहेज प्रताड़ना के आरोप बेबुनियाद’, सुप्रीम कोर्ट ने बहू की सास को दी राहत

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने कथित तौर पर दहेज के लिए बहू के साथ क्रूरता करने के 24 साल पुराने केस में ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा दोषी करार दी गई एक सास को बरी कर दिया। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ससुराल वालों द्वारा बहू को दहेज के लिए प्रताड़ित की बातें हवा से भी अधिक तेज फैलती हैं। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ शुक्रवार को एक याचिका पर यह फैसला सुनाया, जिसमें महिला की दोषसिद्धि और तीन साल की सजा बरकरार रखी गई थी। आरोपी सास को आईपीसी की धारा 498ए के तहत इस आधार पर दोषी ठहराया गया था कि उसकी मृत बहू ने अपने मायके वालों को दहेज उत्पीड़न होने की बातें बताई थीं।आईपीसी की धारा 498-ए, विवाहित महिला के प्रति उसके पति या उसके ससुरालवालों द्वारा की गई क्रूरता के अपराध से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट ने पड़ोसन की गवाही को माना अहम सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि ने इस बात पर गौर किया कि केस में गवाह के तौर पर पेश हुई आरोपी महिला की पड़ोसी ने दावा किया कि बहू से कभी दहेज की मांग नहीं की गई थी। बेंच ने कहा, ‘‘सास के साक्ष्य को निचली अदालत और हाईकोर्ट द्वारा इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि वह दहेज की मांग के संबंध में कोई तथ्य पेश नहीं कर सकी थी, क्योंकि यह चारदीवारी के भीतर होता है, जो एक गलत निष्कर्ष है, विशेष रूप से ऐसे मामलों में जब सास-ससुर द्वारा दहेज के लिए बहू को परेशान किए जाने की बातें हवा से भी तेज फैलती हैं।" जून 2001 में दर्ज कराई गई थी शिकायत मृतक बहू के पिता ने जून 2001 में दर्ज कराई अपनी शिकायत में बताया था कि उनकी बेटी ससुराल में मृत पाई गई थी। पिता ने आरोप लगाया था कि मौत के समय उनकी बेटी गर्भवती थी और वह अक्सर मायकेवालों को बताती थी कि उसकी सास दहेज के लिए उसे ताने ताने मारती है। शिकायतकर्ता ने यह भी कहा कि घटना के वक्त उसका दामाद शहर में नहीं था। मृतका के सास-ससुर और देवर को इस मामले में आरोपी बनाया गया था। हालांकि, निचली अदालत ने ससुर और देवर को बरी कर दिया, लेकिन यह माना कि सास के उत्पीड़न के कारण बहू ने जान दी थी। दोषी करार दी गई सास ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट का रुख किया, जिसने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी रूप में दहेज की मांग अपने आप में आईपीसी की धारा 498ए के तहत केस दर्ज करने के लिए काफी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "इसी प्रकार, किसी विवाहित महिला को या उसके रिश्तेदार को किसी अवैध मांग को पूरा करने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से परेशान करना भी 'क्रूरता' की श्रेणी में आएगा।'' बेंच ने आरोपी महिला की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और उसे बरी कर दिया।  

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में रह रहे पाकिस्तानी हिंदुओं को हटाने के मामले में सरकार से मांगा जवाब

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दिल्ली के मजनू का टीला इलाके में रह रहे पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थियों को बड़ी राहत दी है। अदालत ने उन्हें बेदखल करने पर फिलहाल रोक लगा दी है। यह आदेश दिल्ली हाईकोर्ट के 30 मई के फैसले पर रोक लगाते हुए दिया गया, जिसमें शरणार्थियों की याचिका को खारिज कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। शरणार्थियों की ओर से अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी और एक-पक्षीय अंतरिम रोक लगाने की मांग की थी। विष्णु शंकर जैन के मुताबिक, दिल्ली के 'मजनू का टीला' इलाके में एक हजार से अधिक पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थी रह रहे थे। डीडीए ने इन परिवारों को हटाने के लिए नोटिस जारी किया था। शरणार्थियों ने डीडीए के नोटिस को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए याचिका दाखिल की थी, लेकिन राहत नहीं मिली। हाईकोर्ट ने शरणार्थियों की याचिका को खारिज कर दिया था। उन्होंने बताया, "पहले सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा था कि सरकार इस मामले में कोई स्पष्ट नीति नहीं बना पा रही है और नीति निर्माण कोर्ट का कार्यक्षेत्र नहीं है, इसलिए अदालत कोई प्रभावी आदेश पारित नहीं कर सकती।" अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने बताया कि यह सबसे अहम है कि जब यह मामला पहली बार हाईकोर्ट पहुंचा था, तो कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। अब केंद्र सरकार की नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के तहत यह स्पष्ट नीति है कि 31 दिसंबर 2014 से पहले पाकिस्तान से भारत आए सभी विस्थापित हिंदुओं को भारतीय नागरिकता दी जाएगी। जैसे ही किसी को नागरिकता मिलती है, संविधान का अनुच्छेद 21, जीवन और सम्मान का अधिकार, उन पर लागू हो जाता है।

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का दावा- बंगाल में सुनियोजित घुसपैठ का खेल

कोलकाता  पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बीते कुछ सप्ताह में लगातार यह आरोप लगाए हैं कि केंद्र सरकार के द्वारा बंगाली भाषाओं को निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने इसे ‘भाषाई आतंकवाद’ का नाम भी दिया है। इस बीच केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बड़ा दावा किया है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को कहा है कि पश्चिम बंगाल और आस-पास के कुछ क्षेत्रों में व्यवस्थित तरीके से घुसपैठ करवाया जा रहा है और इस काम के लिए कई एजेंट भी सक्रिय हैं। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में भारत के नागरिक ना होने के संदेह में बंगाली भाषी मुस्लिम प्रवासियों को हिरासत में लिए जाने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई चल रही थी। इस दौरान केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शुक्रवार को कहा कि सिर्फ बंगाल में ही नहीं बल्कि कई इलाकों में घुसपैठ हो रहा है। उन्होंने रोहिंग्याओं का भी जिक्र किया। तुषार मेहता ने आगे बताया," रोहिंग्याओं के साथ-साथ एक व्यवस्थित गिरोह भी है। कई आतंकवादी भी घुसपैठ कर रहे हैं।" वहीं याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण ने सुनवाई के दौरान कहा कि एक महिला को बिना जांच किए देश से बाहर निकाल दिया गया। उन्होंने कहा, “वह गर्भवती है। सिर्फ इसलिए कि वह बंगाली बोलती है, सरकार कह रही है कि वह एक बांग्लादेशी है। इस देश में कोई भी अधिकारी किसी व्यक्ति को बिना यह जांच किए सीमा पार कैसे धकेल सकता है कि वह विदेशी है या नहीं? ऐसा करना अंतर्राष्ट्रीय कानून के खिलाफ है।” केंद्र सरकार से सवाल इसके बाद जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाला बागची की पीठ ने केंद्र सरकार से सवाल किया कि क्या लोगों को भाषा के आधार पर उठाया जा रहा है। पर एसजी मेहता ने जवाब दिया कि भाषा के आधार पर किसी को निशाना नहीं बनाया जा रहा है। कोर्ट ने केंद्र से पूछा, "दो महत्वपूर्ण मसले हैं। एक राष्ट्र की सुरक्षा और अखंडता, और यह सर्वोपरि है। दूसरा प्रश्न विरासत और संस्कृति का है। पंजाब और बंगाल दोनों जगह भाषा एक ही है पर सीमा पर विभाजन है। हम चाहते हैं कि आप अपना रुख स्पष्ट करें।" इस पर जवाब देते हुए SG मेहता ने कहा कि फिर प्रभावित लोगों के बजाय कोई समूह ही सुप्रीम कोर्ट क्यों आते हैं? लोग व्यक्तिगत रूप से लोग क्यों नहीं आते? यह एक समस्या है। भारत दुनिया के अवैध प्रवासियों की जगह नहीं है। एक व्यवस्था होती है। उन्हें बताना होगा कि वे भारत में क्यों रह रहे हैं।"  

रणवीर-रैना को सुप्रीम कोर्ट की नसीहत, कहा- दूसरों की कीमत पर मत कमाओ

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक लहजे में कहा है कि किसी को भी कमाई करने के मकसद से किसी का भी मजाक उड़ाने की आजादी नहीं दी सकती और उसे अभिव्यक्ति की आजादी के तहत संरक्षण नहीं दिया जा सकता है। कोर्ट ने इस मामले में तल्ख टिप्पणी की कि जब आप अपने भाषण का व्यवसायीकरण कर रहे हैं, तो आप इसके जरिए किसी समुदाय की भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचा सकते। शीर्ष अदालत ने इसके साथ ही कॉमेडिन समय रैना और अन्य हास्य कलाकारों को विकलांग व्यक्तियों का मज़ाक उड़ाने वाले चुटकुलों के लिए कड़ी फटकार लगाई। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ क्योर एसएमए फाउंडेशन ऑफ इंडिया की एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी से प्रभावित मरीजों और परिवारों की मदद करता है। याचिका में विकलांग व्यक्तियों का मज़ाक उड़ाने वाले चुटकुलों की ओर अदालत का ध्यान आकृष्ट कराया गया था। अदालत ने जिन हास्य कलाकारों की आलोचना की है, उनमें समय रैना, विपुन गोयल, बलराज परमजीत सिंह घई, सोनाली ठक्कर और निशांत जगदीश तंवर शामिल हैं। याचिका में आरोप लगाया गया था कि इन कॉमेडियन ने अपने शो में दिव्यांगों और दुर्लभ बीमारियों का मजाक उड़ाया है, जिससे पीड़ितों की भावनाएं आहत हुईं हैं। कोर्ट ने उन्हें दिव्यांगों (PwDs) और दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों का मजाक उड़ाने वाले असंवेदनशील चुटकुले सुनाने के लिए बिना शर्त माफी मांगने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि हर व्यक्ति की गरिमा की रक्षा की जानी चाहिए। सद्बुद्धि की जीत हुई इस याचिका को इंडियाज गॉट लेटेंट विवाद से जुड़े मामलों के साथ जोड़ दिया गया, जिसमें यूट्यूबर रणवीर इलाहाबादिया पर आरोप लगाए गए थे। फाउंडेशन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने कहा कि "सद्बुद्धि की जीत हुई है" और सभी हास्य कलाकारों ने माफी मांग ली है। कोर्ट ने इन कलाकारों से कहा है कि वे अपने चैनल पर माफीनामा प्रसारित करें। केंद्र को गाइडलाइंस बनाने का निर्देश कोर्ट में सुनवाई के दौरान समय रैना समेत सभी कॉमेडियन मौजूद थे। अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि सभी ने माफी मांग ली है।इस दौरान जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी की, "मजाक जीवन का हिस्सा है और हम अपने ऊपर बने मजाक को स्वीकार कर सकते हैं लेकिन जब आप दूसरों का मजाक बनाना शुरू करते हैं, तो यह संवेदनशीलता का उल्लंघन है।" सुप्रीम कोर्ट ने उनसे यह भी पूछा है कि इस अमानवीय अपराध के लिए उन पर कितना जुर्माना लगाया जाना चाहिए? कोर्ट ने इस मामले में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को गाइडलाइंस बनाने का भी निर्देश दिया।

असिस्टेंट प्रोफेसर की सैलरी पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतराज, गाने को भी बताया बेकार

नईदिल्ली  देश में शिक्षकों की स्थिति पर बड़ी टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर उन्हें सम्मानजनक वेतन भी नहीं मिल पा रहा है तो फिर 'गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरा' गाना ही बेकार है। गुजरात सरकार की आलोचना करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कॉन्ट्रैक्चुअल असिस्टेंट प्रोफेसर को मात्र 30 हजार रुपये की सैलरी दी जा रही है, जबकि ऐड हॉक और रेग्युलर असोसिएट प्रफेसर का वेतन 1.2 से 1.4 लाख रुपये के बीच है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा, जो शिक्षक हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य तय करते हैं और उन्हें आने वाले समय के लिए तैयार करते हैं, उनके साथ ही इस तरह का व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। बेंच ने कहा, किसी भी देश के लिए शिक्षक रीढ़ की हड्डी की तरह होते हैं जो कि हमारे बच्चों को भविष्य की चुनौतियों और अच्छा जीवन जीने के लिए तैयार करते हैं। शिक्षक ही इस समाज में अपनी रिसर्च, विचारों और मूल्यों के जरिए प्रगति का रास्ता दिखाता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह बड़ी ही चिंता की बात है कि समाज में शिक्षक के अमूल्य योगदान को पहचाना नहीं जा रहा है। कोर्ट ने कहा, अगर शिक्षकों को सम्मानजनक वेतन भी नहीं मिलेगा तो देश में ज्ञान और बौद्धिक सफलता को भी सही स्थान नहं मिल पाएगा। बता दें कि हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सरकार को निर्देश दिया था कि इस मामले में 'समान कार्य, समान वेतन' के सिद्धांत का पालन किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यह बड़ी ही चिंता की बात है कि असिस्टेंट प्रोफेसर को पिछले दो दशक से इतनी कम सैलरी दी जा रही है। हमें जानकारी मिली है कि 2720 रिक्तियां थीं जिनमें से अब तक 923 पोस्ट पर ही स्थायी भर्ती हुई है। शिक्षकों की कमी से शिक्षा का कार्य भी बाधित हो रहा है। जानकारी के मुताबिक 158 ऐड हॉक और 902 कॉन्ट्रैक्चुअल असिस्टेंट प्रोफेसर की भर्तियां हुई थीं। वहीं 737 पोस्ट अब भी खाली हैं। कोर्ट ने कहा कि बड़ी संख्या में जगहें खाली होने के बावजूद केवल ऐड हॉक और कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर शिक्षक रखे जा रहे हैं।