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मध्य प्रदेश के नौरादेही टाइगर रिजर्व में अनोखी पहल, एक्स-आर्मी मैन संभालेंगे वन्यजीव सुरक्षा

सागर  मध्य प्रदेश के सबसे बड़े टाइगर रिजर्व वीरांगना रानी दुर्गावती (नौरादेही) टाइगर रिजर्व की बात करें, तो ये तीन जिलों में फैला हुआ है. नौरादेही वन्य जीव अभ्यारण को टाइगर रिजर्व में तब्दील तो कर दिया गया है. लेकिन 2 साल से ज्यादा वक्त बीतने के बाद भी आज यहां पर वही फील्ड स्टाफ काम कर रहा है. जो नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण्य के समय पर कर रहा था. जबकि नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण्य का क्षेत्रफल आज के टाइगर रिजर्व से आधा भी नहीं था. ऐसे में टाइगर रिजर्व में बढ़ती बाघों की संख्या और आने वाले मेहमान चीतों की सुरक्षा की चिंता लाजिमी है।  वहीं पिछले दिनों में कुछ ऐसे घटनाक्रम भी सामने आए हैं. जो वन अपराधियों के बेलगाम हौसले की तरफ इशारा करते हैं. ऐसी स्थिति में वन अपराध जैसे लकड़ी तस्करी और वन्यजीवों के शिकार के साथ-साथ बाघों और आने वाले चीतों की सुरक्षा को लेकर प्रबंधन ने भूतपूर्व सैनिकों की मदद लेना शुरू किया है. टाइगर रिजर्व की सुरक्षा की कमान वनरक्षक तो संभाली रहे हैं. वहीं अब एक्स आर्मी मैन वन रक्षकों के कंधे से कंधे मिलाकर वन और वन्यजीव की सुरक्षा करेंगे।  वन्यजीवों की सुरक्षा और वन अपराध चिंता का विषय नौरादेही टाइगर रिजर्व की बात करें, तो इसका कुल क्षेत्रफल 2339 वर्ग किलोमीटर है. यह सागर, दमोह और नरसिंहपुर जिले तक फैला हुआ है. यहां बाघों का कुनबा 30 पहुंच गया है. चीता प्रोजेक्ट के तहत इसे मध्य प्रदेश में चीतों के तीसरे घर के तौर पर विकसित किया जा रहा है. जुलाई में यहां चीता छोड़े जाना प्रस्तावित है. ऐसे में वन और वन्यजीवों की सुरक्षा के साथ यहां की बेशकीमती वनसंपदा की सुरक्षा एक बड़ी चुनौती है।  वन्यप्राणियों की सुरक्षा पूर्व सैनिकों के जिम्मे  राष्ट्रीय बाघ संरक्षण योजना में 2018 में शामिल किए जाने और यहां चीतों के तीसरा घर बनाने का फैसला केंद्र और राज्य सरकार ने तो कर लिया. लेकिन सुरक्षा और प्रबंधन की दृष्टि से यहां वन अमले की पदस्थापना आज तक नहीं की गयी है. ये जब वन्यजीव अभ्यारण्य था, वहीं वन अमला आज भी यहां सुरक्षा और प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाल रहा है. यहां या तो श्रमिक या आउटसोर्सिंग के जरिए कर्मचारियों से काम लिया जा सकता है. ऐसे में वन अपराध रोकना और वनसंपदा की सुरक्षा के लिए प्रबंधन एक्स आर्मी मैन की तैनाती की गयी है. जो वन अमले के साथ सुरक्षा का दायित्व भी संभाल रहे हैं।  क्या कहना है प्रबंधन का नौरादेही टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर रजनीश कुमार सिंह कहते हैं कि, ''पहली बात तो ये कोई नया प्रयोग नहीं है, मध्य प्रदेश के दूसरे टाइगर रिजर्व और जब नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण्य हुआ करता था. तब भी यहां एक्स आर्मी मैन जिला सैनिक कल्याण बोर्ड के जरिए नियुक्त किए गए थे और वो वनकर्मियों के साथ कदम से कदम और कंधे से कंधा मिलाकर वन्यप्राणी क्षेत्र की सुरक्षा में अपना योगदान दे रहे हैं. ये बात कोई छिपी नहीं है कि हमारी सेना और सेना के जवानों का एक अनुशासन है और काम करने का अपना तरीका है।  जब हम उनके साथ जुड़कर वनकर्मी काम करते हैं, तो उनका अनुशासन और दक्षता का स्तर ऊपर होता है. सेना की दक्षता है, वो हमारे क्षेत्र में मेहनत के साथ जुटती है तो अपराधी तत्व डिफेंस में आ जाते हैं. वो जानते हैं कि कोई भी तरह का अपराध करेंगे, तो सेना के लोग छोड़ेगे नहीं. हमारी वन और वन्यप्राणी सुरक्षा मजबूत होती है. पूर्व में हम पेंच, कान्हा और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में ये प्रयोग हो चुका है। 

नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क: बाघ बाघिन ‘रानी’ के पांच शावकों का खास जश्न

जयपुर राजधानी जयपुर के आमेर स्थित नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क में इन दिनों जश्न का माहौल है. बाघिन ‘रानी' के पांचों शावकों का मंगलवार (28 अप्रैल) को पहला बर्थडे सेलिब्रेशन हुआ. 27 अप्रैल को जन्मे शावक विजय, शौर्य, सूर्या, अंबे और वृंदा का जन्मदिन पार्क प्रशासन ने उत्साह के साथ मनाया. मौका इसलिए भी खास है क्योंकि पार्क में 2 सफेद बाघों समेत बाघों की कुल संख्या 15 तक पहुंच गई है. यह किसी भी बायोलॉजिकल पार्कों की तुलना में अधिक है, जिससे नाहरगढ़ को वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक मजबूत पहचान मिली है. आकर्षण का केंद्र है 'विजय' नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क के एसीएफ देवेंद्र सिंह राठौड़ ने बताया कि पांचों शावकों में ‘विजय' सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. क्योंकि वह एक व्हाइट टाइगर है, जबकि बाकी चार शावक गोल्डन रंग के हैं. ‘विजय' अपनी मां रानी के साथ पार्क में अठखेलियां करता नजर आता है, जिसे देखने के लिए स्टाफ भी उत्साहित रहता है. पहली बार एक साथ जन्मे 5 शावक वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ.अरविंद माथुर ने बताया कि देश में यह पहला मौका था, जब किसी बाघिन ने एक साथ पांच शावकों को जन्म दिया है. सभी शावकों का नियमित टीकाकरण किया गया है और उन्हें प्राकृतिक वातावरण में विकसित करने के लिए रोजाना कुछ समय खुले क्षेत्र में छोड़ा जाता है. इससे उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर हो रहा है. पर्यटक भी जल्द कर सकेंगे दीदार व्इन पांचों शावकों को पर्यटकों के लिए डिस्प्ले में लाया जाएगा. इससे न केवल पर्यटकों को नया आकर्षण मिलेगा, बल्कि जयपुर में पर्यटन गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा. 

54 बाघों की मौत के बाद सिस्टम में हड़कंप, रिजर्व के बाहर मिलेगा स्पेशल प्रोटेक्शन, जानें नई TOTR स्कीम

भोपाल  मध्य प्रदेश में बाघों की लगातार हो रही मौतों ने वन्यजीव प्रेमियों और सरकार की नींद उड़ा दी है। साल 2025 में रिकॉर्ड 54 बाघों की मौत के मामले में नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में एक विस्तृत हलफनामा दाखिल किया है। इसमें बाघों को बचाने के लिए एक नई और हाईटेक सुरक्षा नीति का खुलासा किया गया है, जो अब रिजर्व की सीमाओं से बाहर भी लागू होगी। रिजर्व के बाहर भी टाइगर की सुरक्षा NTCA ने कोर्ट को बताया कि अब केवल टाइगर रिजर्व ही नहीं, बल्कि उनसे सटे जंगलों, गलियारों और क्षेत्रीय डिवीजनों में भी वही सुरक्षा मिलेगी जो रिजर्व के अंदर उपलब्ध होती है। इसके लिए टाइगर आउटसाइड टाइगर रिजर्व योजना शुरू की गई है। सबसे अहम बात यह है कि साल 2025-26 के पहले चरण के लिए मध्य प्रदेश के 8 फॉरेस्ट डिविजन को चुना गया है। AI और आधुनिक हथियारों से होगी घेराबंदी बाघों के अंगों की तस्करी और शिकार रोकने के लिए अब पुराने तरीके नहीं चलेंगे। NTCA ने राज्यों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम और वायरलेस संचार को मजबूत करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही, इंटेलिजेंस गैदरिंग, स्ट्राइक फोर्स की तैनाती और अपराध का पता लगाने के लिए आधुनिक हथियारों के उपयोग पर जोर दिया गया है। इन्वायलेट रहेगा कोर एरिया हाईकोर्ट में दायर हलफनामे में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 38 V (4)(i) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया गया कि नेशनल पार्क और अभयारण्यों के कोर क्षेत्रों को इन्वायलेट रखा जाना अनिवार्य है। यानी बाघों के संरक्षण के लिए इन क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप पूरी तरह वर्जित रहेगा। प्रोजेक्ट टाइगर के तहत हम अब उन इलाकों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जहां बाघ रिजर्व से बाहर निकलकर जा रहे हैं। इन कॉरिडोर क्षेत्रों में सुरक्षा को अभेद्य बनाना और AI का उपयोग करना हमारी प्राथमिकता है। नंदकिशोर काले, सहायक महानिरीक्षक (वन), NTCA गौरतलब है कि भारत फिलहाल दुनिया में बाघों का सबसे बड़ा गढ़ है, जहां 3,682 बाघ मौजूद हैं। एमपी में बाघों की संख्या 6% सालाना की दर से बढ़ रही है, लेकिन हालिया 54 मौतों ने सिस्टम की खामियों को उजागर कर दिया है।  

खिवनी अभयारण्य में बाघ परिवार का दुर्लभ दृश्य, सड़क पर निकले, टूरिस्ट की सांसें 20 मिनट तक थमी रहीं

खिवनी खिवनी अभयारण्य में ऐसा नजारा सामने आया, जिसने जंगल सफारी के रोमांच को चरम पर पहुंचा दिया। घनी घास के बीच से अचानक निकला बाघ युवराज सड़क पर आकर ठहर गया और कुछ ही क्षणों में उसके पीछे बाघिन मीरा अपने तीनों शावकों के साथ नजर आई। देखते ही देखते पूरा बाघ परिवार एक साथ सडक़ पार करता दिखा, एक ऐसा दुर्लभ दृश्य, जिसे देख पर्यटक रोमांच और उत्साह से भर उठे। 20 मिनट तक थमा रहा रोमांच शाम करीब 5.30 बजे का समय था, जब यह अद्भुत दृश्य सामने आया। पर्यटकों के वाहन सुरक्षित दूरी पर रुक गए और सभी ने करीब 20 मिनट तक इस शाही परिवार के दीदार किए। इस दौरान एक पर्यटक ने पूरे परिवार को एक ही फ्रेम में कैद कर लिया, जो अब चर्चा का विषय बना हुआ है। दिन में विश्राम, शाम को शिकार की तैयारी देवास के खिवनी अभयारण्य के अधीक्षक विकास माहोरे के अनुसार, बाघ युवराज दिन में नाले के पास वाले क्षेत्र में अपने परिवार के साथ आराम करता है और शाम होते ही सक्रिय हो जाता है। बुधवार को भी वह अचानक सडक़ पर आकर रुका, मानो अपने साम्राज्य का निरीक्षण कर रहा हो, और फिर अपने परिवार के साथ आगे बढ़ गया। जंगल का ‘रॉयल मोमेंट’ बना यादगार बाघ परिवार का इस तरह एक साथ नजर आना बेहद दुर्लभ होता है। खिवनी अभयारण्य में यह दृश्य पर्यटकों के लिए किसी ‘रॉयल मोमेंट’ से कम नहीं रहा, जिसने उनके सफारी अनुभव को यादगार बना दिया। यह नजारा दुर्लभ और खास क्यों? वन विशेषज्ञों का कहना है, कि आमतौर पर बाघों को जंगलों में अकेले घूमते देखना आसान है, लेकिन परिवार के साथ खुले में रास्ता पार करते देखना एक बेहद दुर्लभ नजारा है। उनका कहना है कि सड़क पार कराते समय खास तौर पर बाघिन अपने बच्चों को लेकर सतर्क रहती है। नर बाघ अपने परिवार की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए आगे चलकर जहां तक नजर जाती है, वहां तक के पूरे एरिया को स्कैन कर लेता है। वन विभाग ने टूरिस्ट से की अपील शांत रहें इस दौरान वन विभाग के कर्मचारियों ने टूरिस्ट को अलर्ट कर दिया कि वे शांत रहें, उनकी जरा सी लापरवाही जान पर भारी पड़ सकती है या फिर ये दुर्लभ दृश्य देखने का मजा किरकिरा हो सकता है। ये भी जानें -विकास माहोरे बताते हैं कि खिवनी अभयारण्य मध्य प्रदेश के देवास और सीहोर जिले में फैला हुआ है। वहीं सतपुड़ा लैंडस्कैप का हिस्सा माना जाता है। इसका क्षेत्रफल करीब 130-140 वर्ग किमी है। -यहां ड्राय डेसिड्डुअस यानी पर्णपाती जंगल है। यहां स्थायी टाइगर रिजर्व जैसा आधिकारिक आंकड़ा नहीं होता है। लेकिन सतपुड़ा और आसपास के जंगलों से बाघों का मूवमेंट यहां तक हो जाता है। -मोहरे का कहना है कि यहां पिछले कुछ वर्षों में बाघों का मूवमेंट बढ़ा है। इसे बेहतर संरक्षण और सुरक्षित आवास का संकेत माना जाता है। वन्य जीव प्रेमियों के लिए खिवनी भी अब एक उभरता हुआ या कहें कि हिडन टाइगर स्पॉट बनता जा रहा है। जहां अचानक दुर्लभ नजारे वाइल्डलाइफ लवर्स को रोमांच से भर देते हैं।   

टाइगर कॉरीडोर बरेठा घाट को फोर-लेन बनाने के लिए मिली केंद्र से मंजूरी, 51 हादसों में 18 मौतें

बैतूल  मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के बरेठा घाट से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग-46 (NH-46) के महत्वपूर्ण हिस्से को अब फोरलेन बनाने की मंजूरी मिल गई है। यह वही इलाका है, जहां पिछले दो साल में सड़क हादसे हुए और 18 लोगों की जान चली गई। लगातार बढ़ते हादसों और ट्रैफिक दबाव को देखते हुए इस सड़क को चौड़ा और सुरक्षित बनाने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। यह सड़क ग्वालियर से बैतूल तक करीब 634 किलोमीटर लंबा एक अहम हाईवे है, जो पूरी तरह मध्यप्रदेश के अंदर आता है। यह राज्य के उत्तर और दक्षिण हिस्सों को जोड़ने वाला बड़ा मार्ग है और भोपाल से नागपुर जाने वाले कॉरिडोर का भी हिस्सा है। इस पर ज्यादातर काम पूरा हो चुका है, लेकिन बरेठा घाट समेत करीब 21 किलोमीटर का हिस्सा बाकी था।  हाईकोर्ट के आदेश के बाद शुरू होगा काम  दरअसल, यह इलाका टाइगर कॉरिडोर में आता है, यानी यहां से जंगली जानवरों की आवाजाही होती है। इसी कारण 1 अप्रैल 2022 को हाईकोर्ट ने यहां सड़क निर्माण पर रोक लगा दी थी। इसके बाद भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) को वन्यजीव और पर्यावरण से जुड़ी कई मंजूरियां लेनी पड़ीं। अब वाइल्डलाइफ बोर्ड और केंद्र सरकार से सभी जरूरी अनुमति मिल चुकी है। जैसे ही हाईकोर्ट से स्टे हटाने का अंतिम आदेश आएगा, निर्माण काम शुरू कर दिया जाएगा। संकरी और घुमावदार सड़क, लगता है जाम  बरेठा घाट का यह हिस्सा अभी केवल दो लेन का है, जो बहुत संकरा और घुमावदार है। यहां भारी वाहनों का दबाव ज्यादा रहता है, जिससे अक्सर जाम की स्थिति बन जाती है। साथ ही, दो जगह ऐसे ब्लैक स्पॉट हैं, जहां बार-बार हादसे होते हैं। कम चौड़ाई, तेज मोड़, ढलान और कम विजिबिलिटी इस रास्ते को और खतरनाक बनाते हैं। ब्लैक स्पॉट को ठीक करने भी बनाया प्लान  पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, जनवरी 2022 से दिसंबर 2024 के बीच यहां 51 एक्सीडेंट हुए, जिनमें 18 लोगों की मौत हुई और करीब 62 लोग घायल हुए। कई छोटे हादसे तो रिकॉर्ड में भी नहीं आ पाते, जिससे असली स्थिति और गंभीर हो सकती है। अब इस पूरे हिस्से को 4 लेन में बदला जाएगा, जिससे सड़क चौड़ी होगी और ट्रैफिक आसानी से चल सकेगा। इसके साथ ही ब्लैक स्पॉट्स को ठीक करने के लिए खास प्लान बनाया गया है। यहां 3 छोटे पुल (माइनर ब्रिज), 38 बॉक्स कलवर्ट, 1 रेलवे अंडरब्रिज, 2 रोड ओवरब्रिज और 1 व्हीकल अंडरपास बनाए जाएंगे। इससे ट्रैफिक सुचारू होगा और दुर्घटनाओं में कमी आएगी। वन्य जीवों की सुरक्षा का ख्याल, बनेंगे 10 अंडरपास, 1 ओवरपास  सबसे खास बात यह है कि इस प्रोजेक्ट में वन्यजीवों की सुरक्षा का भी पूरा ध्यान रखा गया है। जानवरों की आवाजाही के लिए 10 अंडरपास और 1 ओवरपास बनाए जाएंगे, ताकि वे बिना खतरे के सड़क पार कर सकें। इसके अलावा सड़क पर क्रैश बैरियर, साइन बोर्ड, रंबल स्ट्रिप, नॉइज बैरियर और फेंसिंग जैसी सुविधाएं भी लगाई जाएंगी, जिससे यात्रियों और पर्यावरण दोनों की सुरक्षा हो सके। पर्यटन स्थलों पर पहुंच भी बेहतर होगी  इस परियोजना के पूरा होने से न सिर्फ सड़क हादसे कम होंगे, बल्कि व्यापार, पर्यटन और आवागमन भी आसान हो जाएगा। सांची, भीमबेटका, सतपुड़ा टाइगर रिजर्व जैसे पर्यटन स्थलों तक पहुंच बेहतर होगी। साथ ही, उद्योगों और व्यापार को भी इसका बड़ा फायदा मिलेगा। कुल मिलाकर, बरेठा घाट का यह फोरलेन प्रोजेक्ट आम लोगों के लिए सुरक्षित और आसान सफर की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा। 

इंदौर के जंगलों में बाघ लौटे, बन रहा है एक नया वाइल्डलाइफ कॉरिडोर

 इंदौर  वर्ल्ड वाइल्डलाइफ डे के मौके पर इंदौर वनमंडल से एक सकारात्मक संकेत सामने आया है। यहां के जंगल इन दिनों बाघों और तेंदुओं के लिए तेजी से अनुकूल बनते जा रहे हैं। घने वन, पर्याप्त जल स्रोत और शिकार की उपलब्धता ने चोरल-महू-मानपुर क्षेत्र को फिर से बड़े वन्यजीवों का ठिकाना बना दिया है। जनवरी से फरवरी के बीच चोरल क्षेत्र में बाघ की मौजूदगी के पुख्ता प्रमाण मिले हैं। कई स्थानों पर बाघ के पंजों के निशान और विष्ठा पाई गई है, जबकि तेंदुओं की गतिविधियां लगातार देखी जा रही हैं। उदयनगर से बड़वाह तक नया टेरीटरी विकसित कर रहे दिसंबर में हुई बाघ गणना के दौरान भी इंदौर वनमंडल के नाहरझाबुआ-भड़किया, उमठ-वेका और मलेंडी-मांगलिया क्षेत्रों में बाघ की हलचल दर्ज की गई। वन अधिकारियों के अनुसार बाघ अब उदयनगर से बड़वाह तक नया टेरीटरी विकसित कर रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि खिवनी अभयारण्य से लेकर उदयनगर-बड़वाह तक का क्षेत्र एक संभावित वाइल्डलाइफ कारिडोर के रूप में उभर रहा है। देहरादून स्थित वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया भी इस क्षेत्र को महत्वपूर्ण कॉरिडोर मानता है। हालांकि, विकास परियोजनाओं के कारण जंगलों का दायरा प्रभावित हुआ है। नए सुरक्षित क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे हैं इंदौर-खंडवा मार्ग, महू-सनावद रेल लाइन और अन्य परियोजनाओं से वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास बाधित हुआ, जिससे वे नए सुरक्षित क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे हैं। यही कारण है कि 2022 से 2024 के बीच कई बार बाघ इन इलाकों में नजर आए हैं। चोरल, महू और इंदौर के कई क्षेत्रों में कैमरा ट्रैप लगाए वन विभाग ने बाघ और तेंदुए की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए चोरल, महू और इंदौर के कई क्षेत्रों में कैमरा ट्रैप लगाए हैं। इनसे मिली तस्वीरों का अध्ययन देहरादून स्थित संस्थान में किया जा रहा है, ताकि बाघों की संख्या और मूवमेंट का सटीक आकलन हो सके। इसलिए बढ़ रही है गतिविधि विशेषज्ञों के अनुसार क्षेत्र में सांभर, चीतल, हिरण और नीलगाय जैसे शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या बढ़ने से बाघों को पर्याप्त शिकार मिल रहा है। वहीं जंगलों में बढ़ती मानव गतिविधियों और निर्माण कार्यों के कारण वन्यजीव नए सुरक्षित आवास की तलाश में हैं। मांचल और मोरोद जैसे क्षेत्रों में औद्योगिक और अन्य प्रस्तावित गतिविधियों से भी वनक्षेत्र पर दबाव बढ़ा है। सुरक्षा बनी बड़ी चुनौती विशेषज्ञ अभय जैन का कहना है कि यदि इस उभरते कारिडोर को संरक्षित किया जाए तो बाघों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित की जा सकती है। इसके लिए विकास और संरक्षण के बीच संतुलन जरूरी है।     सूचना तंत्र मजबूत किया जा रहा है और गर्मियों में आग, अतिक्रमण व अवैध कटाई को रोकने के लिए विशेष रणनीति बनाई जा रही है। इंदौर-चोरल-महू क्षेत्र में बाघों की बढ़ती मौजूदगी एक ओर जहां संरक्षण प्रयासों की सफलता का संकेत है, वहीं यह जिम्मेदारी भी बढ़ाती है कि इन जंगलों और वन्यजीवों को सुरक्षित रखा जाए।     -लाल सुधाकर सिंह, डीएफओ, इंदौर वनमंडल  

Bandhavgarh Tiger Reserve में बाघों की रहस्यमयी मौतें, 50% मामलों में समान कारण, हाईकोर्ट में सुनवाई

जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर की ओर से एक स्टेटस रिपोर्ट जमा की गई. इस रिपोर्ट ने राज्य के वन्यजीव संरक्षण के दावों की पोल खोल दी है. रिपोर्ट के अनुसार, 21 नवंबर 2025 से 2 फरवरी 2026 के बीच रिजर्व और उसके आसपास के इलाकों में कुल 8 बाघों की मृत्यु हुई. रिपोर्ट में कहा गया है कि बाघ अभ्यारण्य के भीतर चारों बाघों की मौत का कारण प्राकृतिक था, जबकि शेष चार बाघों की मौत सामान्य वन क्षेत्र में बिजली के झटके से हुई. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सभी बाघों के शव पूरी तरह से सुरक्षित थे. इस रिपोर्ट में बाघों की मौतों को दो हिस्सों में बांटा गया है. इसमें बताया गया है कि टाइगर रिजर्व के अंदर 4 मौतें हुई हैं. यहां हुईं सभी मौतें 'प्राकृतिक' बताई गई हैं. इनमें से 2 बाघ आपसी लड़ाई में मारे गए, एक की बीमारी से मौत हुई और एक कुएं में डूब गया. जबकि 4 मौतें जनरल फॉरेस्ट एरिया में हुईं. रिजर्व के बाहर सामान्य वन क्षेत्र में हुई ये सभी चार मौतें करंट लगने के कारण हुईं. 'संदिग्ध हालात' पर सवाल वाइल्डलाइफ एक्टिविस्ट अजय दुबे की ओर से दायर याचिका में राज्य सरकार और वन विभाग पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं. याचिका के अनुसार, 2025 में मध्य प्रदेश में 54 बाघों की मौत हुई, जो प्रोजेक्ट टाइगर शुरू होने के बाद से एक साल में सबसे बड़ा आंकड़ा है. आरोप है कि शिकारी बिजली के तारों का खुलेआम इस्तेमाल कर रहे हैं और विभाग का सर्विलांस सिस्टम पूरी तरह फेल हो चुका है. याचिकाकर्ता का दावा है कि अधिकारी अक्सर संदिग्ध मौतों को Territorial fight बताकर पल्ला झाड़ लेते है.  बिजली विभाग को चेतावनी स्टेटस रिपोर्ट में कहा गया है कि वन विभाग ने बिजली विभाग को बार-बार पत्र लिखे हैं ताकि संवेदनशील इलाकों में बिजली की लाइनों को मजबूत किया जा सके और वाइल्डलाइफ स्टैंडर्ड का पालन हो, ताकि करंट लगने की घटनाओं को रोका जा सके. मध्य प्रदेश में बाघों की स्थिति  कुल बाघ (MP): 785 भारत में कुल बाघ: 3,167 2025 में मौतें: 54 (याचिका के अनुसार) जनवरी 2026 (प्रथम सप्ताह): 6 बाघों की मौत

बांधवगढ़ की बाघिन का राजस्थान में रिश्ता तय, हेलीकॉप्टर से विदाई और मुकुंदरा हिल टाइगर रिजर्व में शिफ्ट

उमरिया  बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व की बाघिन का रेस्क्यू सफल रहा. इस बाघिन को राजस्थान के मुकुंदरा हिल टाइगर रिजर्व में शिफ्ट करने की योजना है. फिलहाल बाघिन को ऑब्जरवेशन में रखा गया है. राजस्थान सरकार ने केंद्र सरकार के सामने मध्य प्रदेश से 3 टाइगर की डिमांड रखी थी. राजस्थान को एक ऐसी बाघिन की तलाश है, जो मुकुंदरा हिल टाइगर रिजर्व में कुनबा बढ़ा सके. एयरफोर्स के हेलीकॉप्टर से राजस्थान जाएगी बाघिन बांधवगढ़ की बाघिन एयरफोर्स के हेलीकॉप्टर से राजस्थान जाएगी. यहां से उसकी दुल्हन की तरह धूमधाम से विदाई होगी. इसकी तैयारी के लिए एयरफोर्स के हेलीकॉप्टर का ट्रायल लैंडिंग भी हो चुका है. कुछ दिन पहले पेंच टाइगर रिजर्व से एक बाघिन को इसी तरह एयरफोर्स के हेलीकॉप्टर से राजस्थान के मुकुंदरा हिल टाइगर रिजर्व शिफ्ट किया गया था. रेस्क्यू के बाद बाघिन को रेडियो कॉलर पहनाया बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के डायरेक्टर अनुपम सहाय ने बताया "बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व प्रबंधन ने कक्ष क्रमांक RF-327, के दमना बीट के ताला परिक्षेत्र से एक बाघिन का रेस्क्यू किया है, जिसकी उम्र 3 से 4 वर्ष है. अब बाघिन के हर मूवमेंट पर नजर रहेगी. रेस्क्यू करने के बाद उसके स्वास्थ्य की जांच की गई है और रेडियो कॉलर पहनाया गया." बाघिन को अंडर ऑब्ज़र्वेशन रखने के लिए आगामी कुछ दिनों के लिए मगधी परिक्षेत्र के बहेरहा स्थित बाड़े में सुरक्षित रूप से रखा गया है. योजना के अनुसार सभी तरह की परमिशन मिलने के बाद बाघिन को राजस्थान भेजा जाएगा. मुकुंदरा टाइगर रिजर्व की शान बनेगी बाघिन बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से एक बाघिन को राजस्थान के मुकुंदरा हिल टाइगर रिजर्व में भेजने की योजना है. इसकी तैयारी लगभग पूरी हो चुकी है. इसी के तहत इस बाघिन का रेस्क्यू किया गया है. राजस्थान के मुकुंदरा हिल टाइगर रिजर्व को एक एडल्ट बाघिन चाहिए, जो बाघों का कुनबा बढ़ा सके. ऐसी बाघिन की उम्र 3 से 5 साल तक के बीच होनीचाहिए, जो प्रजनन करने योग्य हो. इस बारे में राजस्थान सरकार ने भारत सरकार के माध्यम से परमिशन लेकर मध्य प्रदेश से 03 टाइगर और महाराष्ट्र से 02 टाइगर मांगे हैं. इसी कड़ी में पेंच टाइगर रिजर्व से राजस्थान जा चुकी है. अब बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से बाघिन ले जाने की तैयारी है. 

कूनो नेशनल पार्क में चीतों के बीच बाघ की एंट्री, पहली बार कैमरे में कैद हुई तस्वीर

 श्योपुर देश-दुनिया में चीतों के घर के रूप में पहचान बनाने वाले मध्य प्रदेश के श्योपुर स्थित कूनो नेशनल पार्क में अब टाइगर की भी मौजूदगी है. एक दिन पहले कूनो नेशनल पार्क के टिकटोली गेट क्षेत्र के जंगल में एक बाघ नजर आया, जिसे पहली बार पर्यटकों ने देखा. इससे पहले कूनो में टाइगर की मौजूदगी के संकेत तो मिलते रहे थे, लेकिन यह पहला मौका है, जब पर्यटकों को बाघ का दीदार हुआ. गुरुवार सुबह टिकटोली गेट से निजी फ्लाइंग कैट सफारी के दौरान पर्यटक कूनो भ्रमण पर निकले थे. इसी दौरान जंगल क्षेत्र में एक टाइगर दिखाई दिया. बाघ बैठा हुआ था, लेकिन पर्यटकों की जिप्सी को देखकर चल पड़ा और कुछ ही देर में जंगल के भीतर ओझल हो गया. वन विभाग के अनुसार, यह बाघ राजस्थान के रणथंभौर टाइगर रिजर्व का टी-132 हो सकता है, जो करीब 6 महीने पहले रणथंभौर क्षेत्र से बाहर निकला था. इससे पहले भी कूनो में टाइगर के पगमार्क मिलने की पुष्टि हुई थी, लेकिन अब पहली बार उसकी प्रत्यक्ष मौजूदगी सामने आई है. कूनो नेशनल पार्क के डीएफओ आर. थिरुकुराल ने आजतक को फोन पर बताया कि कूनो नेशनल पार्क में एक टाइगर की मौजूदगी काफी समय से मानी जा रही थी, लेकिन हाल के दिनों में वह नजर नहीं आया था. संभव है कि वही टाइगर टिकटोली गेट के पास दिखाई दिया हो. कूनो में अब बिग कैट की तीन प्रजातियां दुनियाभर में बिग कैट की 6 प्रजातियां- शेर, बाघ, जगुआर, तेंदुआ, हिम तेंदुआ और चीता मानी जाती हैं. इनमें से अब कूनो नेशनल पार्क में तीन प्रजातियां मौजूद हैं. यहां पहले से ही तेंदुओं की अच्छी संख्या है. बीते साढ़े तीन साल से कूनो चीता प्रोजेक्ट का केंद्र बना हुआ है. अब बाघ की मौजूदगी ने पार्क की जैव विविधता को और समृद्ध कर दिया है.

मुकुंदपुर टाइगर सफारी प्रबंधन पर उठे सवाल, मादा तेंदुआ की मौत से मचा हड़कंप

व्हाइट टाइगर सफारी में जश्न, जू सेंटर में सवाल: दो दिन बाद सामने आई तेंदुआ की मौत मुकुंदपुर टाइगर सफारी प्रबंधन पर उठे सवाल, मादा तेंदुआ की मौत से मचा हड़कंप  उम्र पूरी होने का दावा, लेकिन निगरानी पर सवाल: मुकुंदपुर जू सेंटर में तेंदुआ की मौत सतना  नए साल के आगमन पर जहां मार्तंड सिंह व्हाइट टाइगर सफारी एवं जू सेंटर में पर्यटकों की भारी भीड़ देखने को मिली और करीब 18 हजार सैलानी विभिन्न प्रजातियों के वन्य जीवों का दीदार करने पहुंचे, वहीं दूसरी ओर जू सेंटर से जुड़ी एक गंभीर और चौंकाने वाली खबर सामने आई है। जू सेंटर में एक मादा तेंदुआ की मौत रहस्यमय परिस्थितियों में हो गई, जिसकी जानकारी प्रबंधन को दो दिन बाद लग पाई। इस घटना के सामने आने के बाद जू प्रबंधन की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जू प्रबंधन से जुड़े सूत्रों के अनुसार मादा तेंदुआ की मौत करीब दो दिन पहले ही हो चुकी थी, लेकिन इसकी भनक प्रबंधन को सोमवार को लगी। हैरानी की बात यह है कि जू सेंटर में प्रत्येक जीव और प्राणी की नियमित निगरानी का दावा करने वाला प्रबंधन दो दिनों तक इस घटना से अनजान रहा। यह लापरवाही अपने आप में कई सवाल खड़े करती है, खासकर तब जब जू सेंटर में बड़ी संख्या में पर्यटक मौजूद थे और सुरक्षा एवं देखरेख के पुख्ता इंतजाम होने का दावा किया जाता रहा है। पहले इंकार अब कर रहे स्वीकार एसडीओ  इस पूरे मामले में उप वन मंडल अधिकारी रामेश्वर टेकाम को भी घटना की जानकारी समय पर नहीं मिल सकी, जो व्यवस्थागत चूक की ओर इशारा करती है। जू सेंटर के अधिकारियों का कहना है कि मृत मादा तेंदुआ की उम्र करीब 20 वर्ष थी, जो तेंदुए की औसत आयु के आसपास मानी जाती है। जानकारी के अनुसार तेंदुआ ने 2 जनवरी की तड़के करीब 3 बजकर 48 मिनट में अंतिम सांस ली। मुकुंदपुर में तैनात पशु चिकित्सक डॉ नितिन गुप्ता का कहना है कि मादा तेंदुआ ने अपनी प्राकृतिक आयु लगभग पूरी कर ली थी और मौत सामान्य प्रतीत होती है। पन्ना से आई थी मादा पन्ना नाम से ही जानते थे सब बताया गया कि मादा तेंदुआ को वर्ष 2020 में पन्ना से मुकुंदपुर लाया गया था और तब से वह जू सेंटर का हिस्सा थी। हालांकि मौत को सामान्य बताया जा रहा है, लेकिन जिस तरह से प्रबंधन को दो दिन तक इसकी जानकारी नहीं लग सकी और अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है, उसने जू सेंटर की निगरानी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। हालांकि मामला आने के बाद प्रबंधन ने आधिकारिक प्रेस नोट जारी कर दिया गया। दबाएं रहा मामला  बहुप्रतीक्षित और प्रतिष्ठित मुकुंदपुर टाइगर सफारी, जो प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर में अपनी पहचान बना चुका है, वहां इस तरह की लापरवाही सामने आना चिंताजनक है। वन्य जीव संरक्षण और उनकी देखरेख के दावों के बीच यह घटना व्यवस्थाओं की पोल खोलती नजर आ रही है। इसी मामले जू प्रबंधन को मामला दबाकर रखना।