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उदंती-सीतानदी में बाघिन की दस्तक, टाइगर रिजर्व के सुनहरे भविष्य की जगी उम्मीद

उदंती-सीतानदी में बाघिन की दस्तक, टाइगर रिजर्व के सुनहरे भविष्य की जगी उम्मीद   कैमरा ट्रैप में लगातार कैद हो रही बाघिन, संरक्षण प्रयासों को मिली बड़ी सफलता रायपुर  उदंती- सीतानदी टाइगर रिजर्व के लिए ऐतिहासिक खबर सामने आई है। हाल में विभिन्न स्थानों पर लगाए गए कैमरा ट्रैप में एक बाघिन की तस्वीरें और वीडियो लगातार कैद हुए हैं। वन विभाग के अनुसार बाघिन प्राकृतिक रूप से विचरण करते हुए इस क्षेत्र तक पहुंची है और अब इसे अपना स्थायी आशियाना बनाने की ओर बढ़ रही है। संरक्षण प्रयासों का दिखने लगा सकारात्मक परिणाम             मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व तथा वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री केदार कश्यप के निर्देशानुसार प्रदेश में वन्यजीव संरक्षण एवं संवर्धन के लिए लगातार प्रभावी कार्य किए जा रहे हैं। उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में बाघिन की उपस्थिति इन प्रयासों की सफलता का महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है। वन विभाग द्वारा पिछले कुछ वर्षों में वन्यजीवों के लिए सुरक्षित और अनुकूल वातावरण तैयार करने के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण पहल की गई हैं, जिनका सकारात्मक परिणाम अब सामने आने लगा है। बेहतर आवास का मिला प्रमाण             लंबे समय से बाघों की वापसी की प्रतीक्षा कर रहे उदंती-सीतानदी के लिए यह घटनाक्रम बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक बाघ या बाघिन का किसी वन क्षेत्र को स्थायी निवास चुनना वहां के बेहतर आवास, पर्याप्त शिकार आधार और सुरक्षित वातावरण का प्रमाण होता है। बाघिन की नियमित उपस्थिति पूरे परिदृश्य के पुनर्जीवन और संरक्षण प्रयासों की सफलता का संकेत है। बाघों की स्थायी मौजूदगी का साक्षी बनेगा           वन अधिकारियों के मुताबिक कैमरा ट्रैप में बाघिन स्वस्थ और आत्मविश्वास से भरी दिख रही है। उसकी गतिविधियों से स्पष्ट है कि वह क्षेत्र का निरीक्षण कर प्रभाव क्षेत्र स्थापित करने की प्रक्रिया में है। परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो यह क्षेत्र फिर से बाघों की स्थायी मौजूदगी का साक्षी बनेगा। संरक्षण प्रयासों का मिला परिणाम           पिछले कुछ वर्षों में उदंती-सीतानदी में आवास सुधार और वन्यजीव संरक्षण के लिए व्यापक कार्य हुए हैं। सघन गश्त, एंटी-पोचिंग नेटवर्क को मजबूती, सैकड़ों कृत्रिम जलस्रोत-झिरियों का निर्माण, क्षतिग्रस्त वन क्षेत्रों का पुनर्स्थापन, अतिक्रमण हटाकर वनभूमि की वापसी और वन्यजीवों के लिए सुरक्षित माहौल तैयार करने जैसे कदम उठाए गए हैं। बाघिन की मौजूदगी को इन्हीं प्रयासों का सकारात्मक परिणाम माना जा रहा है। निगरानी और सुरक्षा बढ़ाई जाएगी             कैमरा ट्रैप की तस्वीरों-वीडियो ने वन अधिकारियों और वन्यजीव प्रेमियों में नई ऊर्जा भर दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि बाघिन के स्थायी बसने से यह रिजर्व मध्य भारत के प्रमुख बाघ आवासों में फिर अपनी पहचान बना सकता है और भविष्य में अन्य बाघों के आगमन का मार्ग प्रशस्त होगा। बाघिन की सुरक्षा और अनुकूल आवास सुनिश्चित करने प्रयास             वन विभाग ने बाघिन की सुरक्षा और अनुकूल आवास सुनिश्चित करने के लिए निगरानी व संरक्षण गतिविधियां और सुदृढ़ करने का निर्णय लिया है। विभाग का कहना है कि यह सिर्फ एक बाघिन की मौजूदगी नहीं, बल्कि प्रकृति की सकारात्मक प्रतिक्रिया और जंगलों के पुनर्जीवन की कहानी है।

वन्यजीव संरक्षण में चरवाहों की बढ़ेगी भूमिका, टाइगर फाउंडेशन ने 22.79 करोड़ रुपये की योजनाओं को दी हरी झंडी

भोपाल  मध्य प्रदेश के जंगलों में इंसानों और वन्यजीवों के बीच बढ़ते टकराव (मानव-वन्यजीव संघर्ष) को रोकने के लिए वन विभाग अब एक बेहद जमीनी स्तर का प्लान तैयार कर रहा है। इसके तहत प्रदेश में पहली बार क्षेत्रीय स्तर पर 'चरवाहा सम्मेलन' आयोजित किए जाएंगे। इन सम्मेलनों के जरिए उन ग्रामीणों और चरवाहों को सीधे जागरूक किया जाएगा, जो मवेशी चराने के लिए अक्सर जंगलों के भीतर या संरक्षित क्षेत्रों के आसपास जाते हैं। उन्हें वन्यजीवों के संरक्षण, संवर्धन और खुद की सुरक्षा के गुर सिखाए जाएंगे। यह महत्वपूर्ण फैसला वन विभाग के प्रमुख सचिव संदीप यादव की अध्यक्षता में मंत्रालय में आयोजित 'मध्य प्रदेश टाइगर फाउंडेशन समिति' की 22वीं बैठक में लिया गया। प्रमुख सचिव ने स्पष्ट निर्देश दिए कि फील्ड में पारदर्शिता और काम की रफ्तार बढ़ाने के लिए अब हर तीन महीने में यह बैठक अनिवार्य रूप से आयोजित की जाए। 22.79 करोड़ से सुधरेंगे जंगल के हालात बैठक में वन्यजीवों की सुरक्षा और उनके रहन-सहन (आवास विकास) को बेहतर बनाने के लिए 22.79 करोड़ रुपये के बड़े बजट को मंजूरी दी गई। इस राशि का उपयोग इन मुख्य कामों में होगा: मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करना: इंसानों और जंगली जानवरों के बीच टकराव रोकने के लिए आधुनिक तकनीक और स्थानीय स्तर पर जागरूकता अभियान। ब्लैक बक कैप्चर ऑपरेशन: काले हिरणों के संरक्षण और उनके सुरक्षित रेस्क्यू/स्थानांतरण के लिए विशेष अभियान चलाना। रिसर्च और क्षमता संवर्धन: वन्यजीवों के व्यवहार पर अध्ययन करना और वन अमले को आधुनिक तकनीकों से लैस करना। वार्षिक कार्ययोजना मंजूर: इसके साथ ही समिति ने वर्ष 2026-27 के लिए अपनी एनुअल प्लानिंग को भी हरी झंडी दे दी है। बैठक के दौरान प्रदेश के तमाम टाइगर रिजर्वों (जैसे कान्हा, बांधवगढ़, पेंच आदि) के संचालकों ने भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हिस्सा लिया और अपने-अपने क्षेत्रों की जमीनी रिपोर्ट पेश की। बैठक में वन बल प्रमुख सुभरंजन सेन, मुख्य वन्यप्राणी अभिरक्षक डॉ. समीता राजौरा, टाइगर सेल के अध्यक्ष एवं अपर पुलिस महानिदेशक सहित राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के सदस्य सचिव भी शामिल हुए। प्रदेश के विभिन्न टाइगर रिजर्वों के संचालकों ने वर्चुअल माध्यम से बैठक में भागीदारी की।  

भोपाल के बाघ बने वैश्विक चर्चा का विषय, काठमांडू सम्मेलन में 42 देशों के विशेषज्ञ जानेंगे उनका व्यवहार

भोपाल  मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में शहरीकरण के बीच बाघों के जिंदा रहने और इंसानों के साथ उनके अनोखे तालमेल पर हुई एक बेहद अहम स्टडी को नेपाल की राजधानी काठमांडू में पेश किया गया है। काठमांडू में 3 से 5 जून 2026 तक चल रहे छठे कंजर्वेशन एशिया कांग्रेस में इस रिसर्च को दुनिया भर के वैज्ञानिकों के सामने रखा गया। इस ग्लोबल इवेंट को 'सोसाइटी फॉर कंजर्वेशन बायोलॉजी एशिया रीजन', नेपाल चैप्टर और बुरहान फाउंडेशन मिलकर आयोजित कर रहे हैं, जिसमें 42 देशों के 600 से ज्यादा एक्सपर्ट्स शामिल हुए हैं। खास बात यह है कि इस संस्था के एशिया चैप्टर के प्रेसिडेंट डॉ. कौस्तुभ शर्मा खुद भोपाल के रहने वाले हैं। कैमरा ट्रैप और जीआईएस मैपिंग से खुला राज वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और मध्य प्रदेश वन विभाग के सहयोग से हुई इस रिसर्च में बायो-सोशल तरीका अपनाया गया। इसमें फील्ड सर्वे, कैमरा ट्रैप, जीआईएस मैपिंग और स्थानीय लोगों के इंटरव्यू शामिल किए गए। स्टडी में यह जानने की कोशिश की गई कि भोपाल के जंगल, तालाब और हरियाली वाले इलाके कैसे बाघों की आवाजाही में मददगार साबित हो रहे हैं। रिसर्च में सामने आया कि भोपाल में प्राकृतिक जमीन का सही इस्तेमाल, आपस में जुड़े नदी-तालाब और हरियाली (ब्लू-ग्रीन स्पेस), जंगलों में पर्याप्त शिकार, स्थानीय लोगों की स्वीकार्यता और बाघों के बदलते बर्ताव की वजह से ही वे इस शहरी माहौल में भी खुद को बचाए हुए हैं। बढ़ते हाईवे और इंफ्रास्ट्रक्चर से बड़ा खतरा जहाँ एक तरफ भोपाल में बाघों का बचना बड़ी कामयाबी है, वहीं रिसर्चर्स ने एक गंभीर चेतावनी भी दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, शहर में तेजी से फैल रही सड़कों और लीनियर इंफ्रास्ट्रक्चर, जैसे रेलवे लाइन या बिजली के तार की वजह से बाघों के आने-जाने के रास्ते बदल रहे हैं और उनके जंगल छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट रहे हैं।

खतरनाक कैनाइन डिस्टेंपर बीमारी का खतरा, पेंच टाइगर रिजर्व में शुरू हुआ बड़ा वैक्सीनेशन अभियान

छिंदवाड़ा  पेंच टाइगर रिजर्व के बफर जोन से लगे गांव के पालतू और आवारा कुत्तों को पकड़कर वन और पशु विभाग के कर्मचारी इन दिनों इंजेक्शन लगाते हुए दिखाई दे रहे हैं. दरअसल कुछ दिनों पहले कान्हा टाइगर रिजर्व और दूसरे नेशनल पार्क में कैनाइन डिस्टेंपर बीमारी के इंफेक्शन देखे गए थे. जिसके बाद सुरक्षा के लिहाज ये कदम उठाए गए हैं।  छिंदवाड़ा सिवनी के 1500 कुत्तों का होगा वैक्सिनेशन पेंच टाइगर रिजर्व के डायरेक्टर देव प्रसाद जे. ने बताया कि, ''वन्यजीव स्वास्थ्य की देखभाल के लिए पेंच टाइगर रिजर्व द्वारा सिवनी एवं छिंदवाड़ा जिलों के बफर क्षेत्र के गांवों में कैनाइन डिस्टेंपर की रोकथाम के लिए व्यापक टीकाकरण अभियान प्रारंभ किया गया है. इस अभियान के अंतर्गत पेंच टाइगर रिजर्व के फील्ड स्टाफ द्वारा बफर क्षेत्र के लगभग 1500 पालतू एवं आवारा कुत्तों की पहचान कर उनका टीकाकरण एवं निगरानी की कार्यवाही शुरू की गई है. टीकाकरण अभियान की शुरुआत 31 मई 2026 को सिवनी जिले के टुरिया एवं सावंगी ग्राम तथा छिंदवाड़ा जिले के कुंभपानी गांव से की गई है।  कुछ टाइगर रिजर्व में फैला इन्फेक्शन, बरती जा रही सावधानी हाल ही में कुछ टाइगर रिजर्व में कैनाइन डिस्टेंपर इंफेक्शन फैला था. जिसके बाद राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) द्वारा सभी टाइगर रिजर्व को बीमारी की रोकथाम एवं कंट्रोल के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश एवं अलर्ट जारी किए गए हैं. इसी के चलते पेंच टाइगर रिजर्व प्रबंधन द्वारा यह टीकाकरण अभियान एक एहतियाती एवं सुरक्षा कदम के रूप में शुरू किया गया है, जिससे रिजर्व क्षेत्र एवं आसपास के वन्यजीवों को इंफेक्शन से सुरक्षित रखा जा सकेगा।  कैसे पहचाने कैनाइन डिस्टेंपर बीमारी पेंच टाइगर रिजर्व के अधिकारियों ने लोंगो से अपील की है कि यदि किसी कुत्ते में कैनाइन डिस्टेंपर रोग के लक्षण जैसे आंख, नाक अथवा मुंह से पानी का बहाव होना, असामान्य व्यवहार करना, दौरे आना, लगातार गोल-गोल घूमना या अन्य असामान्य गतिविधियां दिखाई दें, तो इसकी सूचना तत्काल वन विभाग के फील्ड स्टाफ अथवा निकटतम वन अधिकारी को दें, जिससे समय रहते आवश्यक कार्रवाई की जा सके।  बाघों के लिए खतरा है कैनाइन डिस्टेंपर इंफेक्शन पशु चिकित्सक डॉक्टर अंकित मेश्राम ने बताया कि, "यह बीमारी कुत्तों, सियार और लोमड़ियों में होने की वजह से फैलती है. जब जंगल या टाइगर रिजर्व में बाघ इन जानवरों का शिकार करके खाते हैं तो यह बीमारी बाघों में भी पहुंच जाती है. जिसकी वजह से बाघों की मौत होने की आशंका होती है. भारत में कान्हा नेशनल पार्क और राजस्थान के सरिस्का जैसे टाइगर रिजर्व में इस बीमारी से बाघों की मौत के मामले सामने आ चुके हैं. इसके बाद ही राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण यानी NTCA ने सुरक्षा के लिहाज से कदम उठाए हैं।  कैसे फैलता है कैनाइन डिस्टेंपर इंफेक्शन पशु चिकित्सक डॉक्टर अंकित मेश्राम ने बताया कि, ''यह बीमारी ज्यादातर कुत्तों से फैलती है. यह इन्फेक्शन वाली बीमारी बहुत जल्दी जानवरों में सर्कुलेट होती है जो जानवरों के लिए जानलेवा साबित होती है. जब कोई संक्रमित कुत्ता या जंगली जानवर खांसता, छींकता या भौंकता है, तो वायरस हवा में बूंदों के रूप में फैल जाते हैं. स्वस्थ कुत्ते सांस के जरिए इस वायरस को अंदर खींच लेते हैं।  इसके साथ ही संक्रमित कुत्ते के मूत्र, मल, लार, आंखों या नाक से निकलने वाली लार के संपर्क में आने से स्वस्थ कुत्ते भी संक्रमित हो सकते हैं. ये वायरस भोजन के बर्तन, पानी के कटोरे, खिलौनों और बिस्तर पर जीवित रह सकता है. यदि कोई गर्भवती फीमेल डॉगी इस वायरस से संक्रमित है, तो प्लेसेंटा के माध्यम से यह बीमारी उसके अजन्मे पिल्लों तक भी फैल सकती है। 

मध्य प्रदेश के नौरादेही टाइगर रिजर्व में अनोखी पहल, एक्स-आर्मी मैन संभालेंगे वन्यजीव सुरक्षा

सागर  मध्य प्रदेश के सबसे बड़े टाइगर रिजर्व वीरांगना रानी दुर्गावती (नौरादेही) टाइगर रिजर्व की बात करें, तो ये तीन जिलों में फैला हुआ है. नौरादेही वन्य जीव अभ्यारण को टाइगर रिजर्व में तब्दील तो कर दिया गया है. लेकिन 2 साल से ज्यादा वक्त बीतने के बाद भी आज यहां पर वही फील्ड स्टाफ काम कर रहा है. जो नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण्य के समय पर कर रहा था. जबकि नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण्य का क्षेत्रफल आज के टाइगर रिजर्व से आधा भी नहीं था. ऐसे में टाइगर रिजर्व में बढ़ती बाघों की संख्या और आने वाले मेहमान चीतों की सुरक्षा की चिंता लाजिमी है।  वहीं पिछले दिनों में कुछ ऐसे घटनाक्रम भी सामने आए हैं. जो वन अपराधियों के बेलगाम हौसले की तरफ इशारा करते हैं. ऐसी स्थिति में वन अपराध जैसे लकड़ी तस्करी और वन्यजीवों के शिकार के साथ-साथ बाघों और आने वाले चीतों की सुरक्षा को लेकर प्रबंधन ने भूतपूर्व सैनिकों की मदद लेना शुरू किया है. टाइगर रिजर्व की सुरक्षा की कमान वनरक्षक तो संभाली रहे हैं. वहीं अब एक्स आर्मी मैन वन रक्षकों के कंधे से कंधे मिलाकर वन और वन्यजीव की सुरक्षा करेंगे।  वन्यजीवों की सुरक्षा और वन अपराध चिंता का विषय नौरादेही टाइगर रिजर्व की बात करें, तो इसका कुल क्षेत्रफल 2339 वर्ग किलोमीटर है. यह सागर, दमोह और नरसिंहपुर जिले तक फैला हुआ है. यहां बाघों का कुनबा 30 पहुंच गया है. चीता प्रोजेक्ट के तहत इसे मध्य प्रदेश में चीतों के तीसरे घर के तौर पर विकसित किया जा रहा है. जुलाई में यहां चीता छोड़े जाना प्रस्तावित है. ऐसे में वन और वन्यजीवों की सुरक्षा के साथ यहां की बेशकीमती वनसंपदा की सुरक्षा एक बड़ी चुनौती है।  वन्यप्राणियों की सुरक्षा पूर्व सैनिकों के जिम्मे  राष्ट्रीय बाघ संरक्षण योजना में 2018 में शामिल किए जाने और यहां चीतों के तीसरा घर बनाने का फैसला केंद्र और राज्य सरकार ने तो कर लिया. लेकिन सुरक्षा और प्रबंधन की दृष्टि से यहां वन अमले की पदस्थापना आज तक नहीं की गयी है. ये जब वन्यजीव अभ्यारण्य था, वहीं वन अमला आज भी यहां सुरक्षा और प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाल रहा है. यहां या तो श्रमिक या आउटसोर्सिंग के जरिए कर्मचारियों से काम लिया जा सकता है. ऐसे में वन अपराध रोकना और वनसंपदा की सुरक्षा के लिए प्रबंधन एक्स आर्मी मैन की तैनाती की गयी है. जो वन अमले के साथ सुरक्षा का दायित्व भी संभाल रहे हैं।  क्या कहना है प्रबंधन का नौरादेही टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर रजनीश कुमार सिंह कहते हैं कि, ''पहली बात तो ये कोई नया प्रयोग नहीं है, मध्य प्रदेश के दूसरे टाइगर रिजर्व और जब नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण्य हुआ करता था. तब भी यहां एक्स आर्मी मैन जिला सैनिक कल्याण बोर्ड के जरिए नियुक्त किए गए थे और वो वनकर्मियों के साथ कदम से कदम और कंधे से कंधा मिलाकर वन्यप्राणी क्षेत्र की सुरक्षा में अपना योगदान दे रहे हैं. ये बात कोई छिपी नहीं है कि हमारी सेना और सेना के जवानों का एक अनुशासन है और काम करने का अपना तरीका है।  जब हम उनके साथ जुड़कर वनकर्मी काम करते हैं, तो उनका अनुशासन और दक्षता का स्तर ऊपर होता है. सेना की दक्षता है, वो हमारे क्षेत्र में मेहनत के साथ जुटती है तो अपराधी तत्व डिफेंस में आ जाते हैं. वो जानते हैं कि कोई भी तरह का अपराध करेंगे, तो सेना के लोग छोड़ेगे नहीं. हमारी वन और वन्यप्राणी सुरक्षा मजबूत होती है. पूर्व में हम पेंच, कान्हा और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में ये प्रयोग हो चुका है। 

नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क: बाघ बाघिन ‘रानी’ के पांच शावकों का खास जश्न

जयपुर राजधानी जयपुर के आमेर स्थित नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क में इन दिनों जश्न का माहौल है. बाघिन ‘रानी' के पांचों शावकों का मंगलवार (28 अप्रैल) को पहला बर्थडे सेलिब्रेशन हुआ. 27 अप्रैल को जन्मे शावक विजय, शौर्य, सूर्या, अंबे और वृंदा का जन्मदिन पार्क प्रशासन ने उत्साह के साथ मनाया. मौका इसलिए भी खास है क्योंकि पार्क में 2 सफेद बाघों समेत बाघों की कुल संख्या 15 तक पहुंच गई है. यह किसी भी बायोलॉजिकल पार्कों की तुलना में अधिक है, जिससे नाहरगढ़ को वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक मजबूत पहचान मिली है. आकर्षण का केंद्र है 'विजय' नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क के एसीएफ देवेंद्र सिंह राठौड़ ने बताया कि पांचों शावकों में ‘विजय' सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. क्योंकि वह एक व्हाइट टाइगर है, जबकि बाकी चार शावक गोल्डन रंग के हैं. ‘विजय' अपनी मां रानी के साथ पार्क में अठखेलियां करता नजर आता है, जिसे देखने के लिए स्टाफ भी उत्साहित रहता है. पहली बार एक साथ जन्मे 5 शावक वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ.अरविंद माथुर ने बताया कि देश में यह पहला मौका था, जब किसी बाघिन ने एक साथ पांच शावकों को जन्म दिया है. सभी शावकों का नियमित टीकाकरण किया गया है और उन्हें प्राकृतिक वातावरण में विकसित करने के लिए रोजाना कुछ समय खुले क्षेत्र में छोड़ा जाता है. इससे उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर हो रहा है. पर्यटक भी जल्द कर सकेंगे दीदार व्इन पांचों शावकों को पर्यटकों के लिए डिस्प्ले में लाया जाएगा. इससे न केवल पर्यटकों को नया आकर्षण मिलेगा, बल्कि जयपुर में पर्यटन गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा. 

54 बाघों की मौत के बाद सिस्टम में हड़कंप, रिजर्व के बाहर मिलेगा स्पेशल प्रोटेक्शन, जानें नई TOTR स्कीम

भोपाल  मध्य प्रदेश में बाघों की लगातार हो रही मौतों ने वन्यजीव प्रेमियों और सरकार की नींद उड़ा दी है। साल 2025 में रिकॉर्ड 54 बाघों की मौत के मामले में नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में एक विस्तृत हलफनामा दाखिल किया है। इसमें बाघों को बचाने के लिए एक नई और हाईटेक सुरक्षा नीति का खुलासा किया गया है, जो अब रिजर्व की सीमाओं से बाहर भी लागू होगी। रिजर्व के बाहर भी टाइगर की सुरक्षा NTCA ने कोर्ट को बताया कि अब केवल टाइगर रिजर्व ही नहीं, बल्कि उनसे सटे जंगलों, गलियारों और क्षेत्रीय डिवीजनों में भी वही सुरक्षा मिलेगी जो रिजर्व के अंदर उपलब्ध होती है। इसके लिए टाइगर आउटसाइड टाइगर रिजर्व योजना शुरू की गई है। सबसे अहम बात यह है कि साल 2025-26 के पहले चरण के लिए मध्य प्रदेश के 8 फॉरेस्ट डिविजन को चुना गया है। AI और आधुनिक हथियारों से होगी घेराबंदी बाघों के अंगों की तस्करी और शिकार रोकने के लिए अब पुराने तरीके नहीं चलेंगे। NTCA ने राज्यों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम और वायरलेस संचार को मजबूत करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही, इंटेलिजेंस गैदरिंग, स्ट्राइक फोर्स की तैनाती और अपराध का पता लगाने के लिए आधुनिक हथियारों के उपयोग पर जोर दिया गया है। इन्वायलेट रहेगा कोर एरिया हाईकोर्ट में दायर हलफनामे में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 38 V (4)(i) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया गया कि नेशनल पार्क और अभयारण्यों के कोर क्षेत्रों को इन्वायलेट रखा जाना अनिवार्य है। यानी बाघों के संरक्षण के लिए इन क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप पूरी तरह वर्जित रहेगा। प्रोजेक्ट टाइगर के तहत हम अब उन इलाकों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जहां बाघ रिजर्व से बाहर निकलकर जा रहे हैं। इन कॉरिडोर क्षेत्रों में सुरक्षा को अभेद्य बनाना और AI का उपयोग करना हमारी प्राथमिकता है। नंदकिशोर काले, सहायक महानिरीक्षक (वन), NTCA गौरतलब है कि भारत फिलहाल दुनिया में बाघों का सबसे बड़ा गढ़ है, जहां 3,682 बाघ मौजूद हैं। एमपी में बाघों की संख्या 6% सालाना की दर से बढ़ रही है, लेकिन हालिया 54 मौतों ने सिस्टम की खामियों को उजागर कर दिया है।  

खिवनी अभयारण्य में बाघ परिवार का दुर्लभ दृश्य, सड़क पर निकले, टूरिस्ट की सांसें 20 मिनट तक थमी रहीं

खिवनी खिवनी अभयारण्य में ऐसा नजारा सामने आया, जिसने जंगल सफारी के रोमांच को चरम पर पहुंचा दिया। घनी घास के बीच से अचानक निकला बाघ युवराज सड़क पर आकर ठहर गया और कुछ ही क्षणों में उसके पीछे बाघिन मीरा अपने तीनों शावकों के साथ नजर आई। देखते ही देखते पूरा बाघ परिवार एक साथ सडक़ पार करता दिखा, एक ऐसा दुर्लभ दृश्य, जिसे देख पर्यटक रोमांच और उत्साह से भर उठे। 20 मिनट तक थमा रहा रोमांच शाम करीब 5.30 बजे का समय था, जब यह अद्भुत दृश्य सामने आया। पर्यटकों के वाहन सुरक्षित दूरी पर रुक गए और सभी ने करीब 20 मिनट तक इस शाही परिवार के दीदार किए। इस दौरान एक पर्यटक ने पूरे परिवार को एक ही फ्रेम में कैद कर लिया, जो अब चर्चा का विषय बना हुआ है। दिन में विश्राम, शाम को शिकार की तैयारी देवास के खिवनी अभयारण्य के अधीक्षक विकास माहोरे के अनुसार, बाघ युवराज दिन में नाले के पास वाले क्षेत्र में अपने परिवार के साथ आराम करता है और शाम होते ही सक्रिय हो जाता है। बुधवार को भी वह अचानक सडक़ पर आकर रुका, मानो अपने साम्राज्य का निरीक्षण कर रहा हो, और फिर अपने परिवार के साथ आगे बढ़ गया। जंगल का ‘रॉयल मोमेंट’ बना यादगार बाघ परिवार का इस तरह एक साथ नजर आना बेहद दुर्लभ होता है। खिवनी अभयारण्य में यह दृश्य पर्यटकों के लिए किसी ‘रॉयल मोमेंट’ से कम नहीं रहा, जिसने उनके सफारी अनुभव को यादगार बना दिया। यह नजारा दुर्लभ और खास क्यों? वन विशेषज्ञों का कहना है, कि आमतौर पर बाघों को जंगलों में अकेले घूमते देखना आसान है, लेकिन परिवार के साथ खुले में रास्ता पार करते देखना एक बेहद दुर्लभ नजारा है। उनका कहना है कि सड़क पार कराते समय खास तौर पर बाघिन अपने बच्चों को लेकर सतर्क रहती है। नर बाघ अपने परिवार की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए आगे चलकर जहां तक नजर जाती है, वहां तक के पूरे एरिया को स्कैन कर लेता है। वन विभाग ने टूरिस्ट से की अपील शांत रहें इस दौरान वन विभाग के कर्मचारियों ने टूरिस्ट को अलर्ट कर दिया कि वे शांत रहें, उनकी जरा सी लापरवाही जान पर भारी पड़ सकती है या फिर ये दुर्लभ दृश्य देखने का मजा किरकिरा हो सकता है। ये भी जानें -विकास माहोरे बताते हैं कि खिवनी अभयारण्य मध्य प्रदेश के देवास और सीहोर जिले में फैला हुआ है। वहीं सतपुड़ा लैंडस्कैप का हिस्सा माना जाता है। इसका क्षेत्रफल करीब 130-140 वर्ग किमी है। -यहां ड्राय डेसिड्डुअस यानी पर्णपाती जंगल है। यहां स्थायी टाइगर रिजर्व जैसा आधिकारिक आंकड़ा नहीं होता है। लेकिन सतपुड़ा और आसपास के जंगलों से बाघों का मूवमेंट यहां तक हो जाता है। -मोहरे का कहना है कि यहां पिछले कुछ वर्षों में बाघों का मूवमेंट बढ़ा है। इसे बेहतर संरक्षण और सुरक्षित आवास का संकेत माना जाता है। वन्य जीव प्रेमियों के लिए खिवनी भी अब एक उभरता हुआ या कहें कि हिडन टाइगर स्पॉट बनता जा रहा है। जहां अचानक दुर्लभ नजारे वाइल्डलाइफ लवर्स को रोमांच से भर देते हैं।   

टाइगर कॉरीडोर बरेठा घाट को फोर-लेन बनाने के लिए मिली केंद्र से मंजूरी, 51 हादसों में 18 मौतें

बैतूल  मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के बरेठा घाट से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग-46 (NH-46) के महत्वपूर्ण हिस्से को अब फोरलेन बनाने की मंजूरी मिल गई है। यह वही इलाका है, जहां पिछले दो साल में सड़क हादसे हुए और 18 लोगों की जान चली गई। लगातार बढ़ते हादसों और ट्रैफिक दबाव को देखते हुए इस सड़क को चौड़ा और सुरक्षित बनाने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। यह सड़क ग्वालियर से बैतूल तक करीब 634 किलोमीटर लंबा एक अहम हाईवे है, जो पूरी तरह मध्यप्रदेश के अंदर आता है। यह राज्य के उत्तर और दक्षिण हिस्सों को जोड़ने वाला बड़ा मार्ग है और भोपाल से नागपुर जाने वाले कॉरिडोर का भी हिस्सा है। इस पर ज्यादातर काम पूरा हो चुका है, लेकिन बरेठा घाट समेत करीब 21 किलोमीटर का हिस्सा बाकी था।  हाईकोर्ट के आदेश के बाद शुरू होगा काम  दरअसल, यह इलाका टाइगर कॉरिडोर में आता है, यानी यहां से जंगली जानवरों की आवाजाही होती है। इसी कारण 1 अप्रैल 2022 को हाईकोर्ट ने यहां सड़क निर्माण पर रोक लगा दी थी। इसके बाद भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) को वन्यजीव और पर्यावरण से जुड़ी कई मंजूरियां लेनी पड़ीं। अब वाइल्डलाइफ बोर्ड और केंद्र सरकार से सभी जरूरी अनुमति मिल चुकी है। जैसे ही हाईकोर्ट से स्टे हटाने का अंतिम आदेश आएगा, निर्माण काम शुरू कर दिया जाएगा। संकरी और घुमावदार सड़क, लगता है जाम  बरेठा घाट का यह हिस्सा अभी केवल दो लेन का है, जो बहुत संकरा और घुमावदार है। यहां भारी वाहनों का दबाव ज्यादा रहता है, जिससे अक्सर जाम की स्थिति बन जाती है। साथ ही, दो जगह ऐसे ब्लैक स्पॉट हैं, जहां बार-बार हादसे होते हैं। कम चौड़ाई, तेज मोड़, ढलान और कम विजिबिलिटी इस रास्ते को और खतरनाक बनाते हैं। ब्लैक स्पॉट को ठीक करने भी बनाया प्लान  पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, जनवरी 2022 से दिसंबर 2024 के बीच यहां 51 एक्सीडेंट हुए, जिनमें 18 लोगों की मौत हुई और करीब 62 लोग घायल हुए। कई छोटे हादसे तो रिकॉर्ड में भी नहीं आ पाते, जिससे असली स्थिति और गंभीर हो सकती है। अब इस पूरे हिस्से को 4 लेन में बदला जाएगा, जिससे सड़क चौड़ी होगी और ट्रैफिक आसानी से चल सकेगा। इसके साथ ही ब्लैक स्पॉट्स को ठीक करने के लिए खास प्लान बनाया गया है। यहां 3 छोटे पुल (माइनर ब्रिज), 38 बॉक्स कलवर्ट, 1 रेलवे अंडरब्रिज, 2 रोड ओवरब्रिज और 1 व्हीकल अंडरपास बनाए जाएंगे। इससे ट्रैफिक सुचारू होगा और दुर्घटनाओं में कमी आएगी। वन्य जीवों की सुरक्षा का ख्याल, बनेंगे 10 अंडरपास, 1 ओवरपास  सबसे खास बात यह है कि इस प्रोजेक्ट में वन्यजीवों की सुरक्षा का भी पूरा ध्यान रखा गया है। जानवरों की आवाजाही के लिए 10 अंडरपास और 1 ओवरपास बनाए जाएंगे, ताकि वे बिना खतरे के सड़क पार कर सकें। इसके अलावा सड़क पर क्रैश बैरियर, साइन बोर्ड, रंबल स्ट्रिप, नॉइज बैरियर और फेंसिंग जैसी सुविधाएं भी लगाई जाएंगी, जिससे यात्रियों और पर्यावरण दोनों की सुरक्षा हो सके। पर्यटन स्थलों पर पहुंच भी बेहतर होगी  इस परियोजना के पूरा होने से न सिर्फ सड़क हादसे कम होंगे, बल्कि व्यापार, पर्यटन और आवागमन भी आसान हो जाएगा। सांची, भीमबेटका, सतपुड़ा टाइगर रिजर्व जैसे पर्यटन स्थलों तक पहुंच बेहतर होगी। साथ ही, उद्योगों और व्यापार को भी इसका बड़ा फायदा मिलेगा। कुल मिलाकर, बरेठा घाट का यह फोरलेन प्रोजेक्ट आम लोगों के लिए सुरक्षित और आसान सफर की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा। 

इंदौर के जंगलों में बाघ लौटे, बन रहा है एक नया वाइल्डलाइफ कॉरिडोर

 इंदौर  वर्ल्ड वाइल्डलाइफ डे के मौके पर इंदौर वनमंडल से एक सकारात्मक संकेत सामने आया है। यहां के जंगल इन दिनों बाघों और तेंदुओं के लिए तेजी से अनुकूल बनते जा रहे हैं। घने वन, पर्याप्त जल स्रोत और शिकार की उपलब्धता ने चोरल-महू-मानपुर क्षेत्र को फिर से बड़े वन्यजीवों का ठिकाना बना दिया है। जनवरी से फरवरी के बीच चोरल क्षेत्र में बाघ की मौजूदगी के पुख्ता प्रमाण मिले हैं। कई स्थानों पर बाघ के पंजों के निशान और विष्ठा पाई गई है, जबकि तेंदुओं की गतिविधियां लगातार देखी जा रही हैं। उदयनगर से बड़वाह तक नया टेरीटरी विकसित कर रहे दिसंबर में हुई बाघ गणना के दौरान भी इंदौर वनमंडल के नाहरझाबुआ-भड़किया, उमठ-वेका और मलेंडी-मांगलिया क्षेत्रों में बाघ की हलचल दर्ज की गई। वन अधिकारियों के अनुसार बाघ अब उदयनगर से बड़वाह तक नया टेरीटरी विकसित कर रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि खिवनी अभयारण्य से लेकर उदयनगर-बड़वाह तक का क्षेत्र एक संभावित वाइल्डलाइफ कारिडोर के रूप में उभर रहा है। देहरादून स्थित वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया भी इस क्षेत्र को महत्वपूर्ण कॉरिडोर मानता है। हालांकि, विकास परियोजनाओं के कारण जंगलों का दायरा प्रभावित हुआ है। नए सुरक्षित क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे हैं इंदौर-खंडवा मार्ग, महू-सनावद रेल लाइन और अन्य परियोजनाओं से वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास बाधित हुआ, जिससे वे नए सुरक्षित क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे हैं। यही कारण है कि 2022 से 2024 के बीच कई बार बाघ इन इलाकों में नजर आए हैं। चोरल, महू और इंदौर के कई क्षेत्रों में कैमरा ट्रैप लगाए वन विभाग ने बाघ और तेंदुए की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए चोरल, महू और इंदौर के कई क्षेत्रों में कैमरा ट्रैप लगाए हैं। इनसे मिली तस्वीरों का अध्ययन देहरादून स्थित संस्थान में किया जा रहा है, ताकि बाघों की संख्या और मूवमेंट का सटीक आकलन हो सके। इसलिए बढ़ रही है गतिविधि विशेषज्ञों के अनुसार क्षेत्र में सांभर, चीतल, हिरण और नीलगाय जैसे शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या बढ़ने से बाघों को पर्याप्त शिकार मिल रहा है। वहीं जंगलों में बढ़ती मानव गतिविधियों और निर्माण कार्यों के कारण वन्यजीव नए सुरक्षित आवास की तलाश में हैं। मांचल और मोरोद जैसे क्षेत्रों में औद्योगिक और अन्य प्रस्तावित गतिविधियों से भी वनक्षेत्र पर दबाव बढ़ा है। सुरक्षा बनी बड़ी चुनौती विशेषज्ञ अभय जैन का कहना है कि यदि इस उभरते कारिडोर को संरक्षित किया जाए तो बाघों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित की जा सकती है। इसके लिए विकास और संरक्षण के बीच संतुलन जरूरी है।     सूचना तंत्र मजबूत किया जा रहा है और गर्मियों में आग, अतिक्रमण व अवैध कटाई को रोकने के लिए विशेष रणनीति बनाई जा रही है। इंदौर-चोरल-महू क्षेत्र में बाघों की बढ़ती मौजूदगी एक ओर जहां संरक्षण प्रयासों की सफलता का संकेत है, वहीं यह जिम्मेदारी भी बढ़ाती है कि इन जंगलों और वन्यजीवों को सुरक्षित रखा जाए।     -लाल सुधाकर सिंह, डीएफओ, इंदौर वनमंडल