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मशरूम से अगरबत्ती-साबुन तक का कारोबार, डोंगरगढ़ की दिनेश्वरी बनीं लखपति दीदी

लखपति दीदी डोंगरगढ़ की दिनेश्वरी सोरी ने 'बिहान' योजना से बदली तकदीर मशरूम उत्पादन से लेकर अगरबत्ती, साबुन और गोबर के दीये निर्माण तक कई आजीविका गतिविधियों से बढ़ाई आय रायपुर ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने में स्वसहायता समूह किस प्रकार मील का पत्थर साबित हो रहे हैं, इसकी एक प्रेरणादायक मिसाल राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ विकासखंड स्थित ग्राम धनडोंगरी की लखपति दीदी श्रीमती दिनेश्वरी सोरी ने पेश की है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ से जुड़कर उन्होंने सामान्य गृहिणी से लेकर एक सफल स्वरोजगार संचालक बनने का सफर तय किया है। समूह के सहयोग से शुरू किया कारोबार          श्रीमती दिनेश्वरी सोरी ‘जय सेवा जय बूढ़ा देव स्वसहायता समूह’ से जुड़ीं। शुरुआती दौर में पूंजी की कमी उनके सामने बड़ी चुनौती थी, लेकिन समूह और ग्राम संगठन से मिले वित्तीय सहयोग ने उनकी राह आसान कर दी। समूह से प्राप्त ऋण और अनुदान की मदद से उन्होंने अगरबत्ती बनाने की मशीन खरीदी और व्यवस्थित उत्पादन शुरू किया। इसके बाद बैंक से एक लाख रुपये का अतिरिक्त ऋण लेकर उन्होंने अपने कारोबार का और विस्तार किया। इन उत्पादों से हो रही है बंपर कमाई         स्थानीय बाजार की मांग और अपनी रुचि को ध्यान में रखते हुए श्रीमती सोरी ने कई आजीविका गतिविधियों को एक साथ अपनाया है। वर्तमान में वे मशरूम उत्पादन, अगरबत्ती और साबुन निर्माण, निरमा, गुलाल और मोमबत्ती, गोबर के दीये और चूड़ी निर्माण संबंधी उत्पादों का निर्माण कर रही हैं। वार्षिक आय हुई डेढ़ लाख रुपये           बिहान योजना से जुड़ने से पहले उनका परिवार मुख्य रूप से कृषि और मजदूरी पर निर्भर था, जिससे वार्षिक पारिवारिक आय महज 52 हजार रुपये थी। लेकिन स्वरोजगार के नए साधन विकसित होने से अब उनकी वार्षिक आय बढ़कर लगभग 1 लाख 50 हजार रुपये हो गई है। नियमित आमदनी होने से न केवल परिवार की दैनिक जरूरतें आसानी से पूरी हो रही हैं, बल्कि आर्थिक स्थिति भी बेहद मजबूत हुई है।            श्रीमती दिनेश्वरी की यह सफलता आज ग्रामीण इलाके की अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन रही है। उन्होंने इस मुकाम तक पहुंचने और मिले सहयोग के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी तथा मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के प्रति गहरा आभार व्यक्त किया है।

हरियाणा BJP विधायकों की PM मोदी से मुलाकात, 3 अक्टूबर को दिल्ली में होगा कार्यक्रम

चंडीगढ़  हरियाणा की राजनीति में 3 अक्टूबर का दिन भाजपा के लिए अहम रहने वाला है। प्रदेश के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अर्चना गुप्ता की अगुवाई में पार्टी के सभी विधायक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करेंगे। प्रधानमंत्री के साथ विधायकों की यह मुलाकात दोपहर 3 बजे प्रस्तावित है। इसके लिए प्रदेश भाजपा ने विधायकों को दिल्ली पहुंचने के निर्देश दिए हैं। प्रधानमंत्री से मुलाकात से करीब एक घंटे पहले दोपहर 2 बजे सभी विधायक हरियाणा भवन में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के साथ लंच करेंगे। इसके बाद मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष और सभी विधायक प्रधानमंत्री से मिलने जाएंगे। एक साथ होने वाली इस मुलाकात को सरकार और संगठन के बीच समन्वय के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विधायकों के साथ प्रधानमंत्री की सीधी बातचीत का कार्यक्रम मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रदेश के भाजपा विधायकों से सीधे संवाद कर सकते हैं। हालांकि, बैठक का विस्तृत एजेंडा अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन हरियाणा की मौजूदा राजनीतिक और प्रशासनिक परिस्थितियों को देखते हुए प्रदेश सरकार के कामकाज, विकास योजनाओं और संगठनात्मक गतिविधियों से जुड़े मुद्दे चर्चा में आने की संभावना है। मुख्यमंत्री नायब सैनी की अगुवाई में भाजपा सरकार के कार्यों और आगामी कार्यक्रमों को लेकर भी प्रधानमंत्री के समक्ष जानकारी रखे जाने की संभावना है। लंच से लेकर प्रधानमंत्री मुलाकात तक सियासी मायने विधायकों का पहले हरियाणा भवन में मुख्यमंत्री के साथ एक साथ बैठना भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। विधानसभा के भीतर और अपने-अपने क्षेत्रों में विधायकों की भूमिका, जनता से जुड़े मुद्दों और सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर मुख्यमंत्री के साथ अनौपचारिक चर्चा का अवसर मिलेगा। इसके बाद प्रधानमंत्री के साथ सामूहिक मुलाकात से केंद्रीय नेतृत्व, प्रदेश सरकार और विधायकों के बीच सीधा संवाद स्थापित होगा। हरियाणा में भाजपा सरकार बनने के बाद यह मुलाकात ऐसे समय हो रही है, जब पार्टी सरकार और संगठन के स्तर पर अपने कामकाज को आगे बढ़ा रही है। ऐसे में 3 अक्टूबर का कार्यक्रम केवल शिष्टाचार मुलाकात तक सीमित रहने के बजाय प्रदेश के राजनीतिक और संगठनात्मक मुद्दों पर संवाद का अवसर भी बन सकता है।  

बिहार में ₹6,282 करोड़ की कोसी-मेची परियोजना, 39,548 हेक्टेयर खेतों को मिलेगा सिंचाई का पानी

किशनगंज  कोसी नदी में मानसून के दौरान तबाही मचाने वाले अतिरिक्त पानी को सीमांचल के खेतों की प्यास बुझाने के काम में लाने वाली महत्वाकांक्षी 'कोसी-मेची इंट्रा-स्टेट लिंक परियोजना' अब धरातल पर उतरने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। किशनगंज जिले में परियोजना के निर्माण कार्य को लेकर कुल 571 एकड़ भूमि चिह्नित कर ली गई है। इसमें 552 एकड़ रैयती (निजी) भूमि का अधिग्रहण किया जाएगा, जबकि 19 एकड़ सरकारी भूमि शामिल है। भूमि का सबसे बड़ा हिस्सा बहादुरगंज अंचल से अधिग्रहित किया जाएगा। परियोजना की कार्ययोजना के तहत कोसी नदी के अतिरिक्त पानी को नियंत्रित नहर प्रणाली के जरिए महानंदा नदी बेसिन तक पहुंचाया जाना है। 117.50 किलोमीटर लंबी इस लिंक नहर का अंतिम छोर किशनगंज जिले के माखनपुर गांव के समीप मेची नदी में होगा। कोसी से निकला पानी नहर के रास्ते किशनगंज पहुंचेगा और मेची नदी में विसर्जित होकर महानंदा नदी तंत्र का हिस्सा बन जाएगा। बहादुरगंज अंचल में सबसे अधिक 454 एकड़ जमीन का होगा अधिग्रहण प्रशासन द्वारा तैयार किए गए भूमि विवरणी के अनुसार, बहादुरगंज अंचल में सर्वाधिक 454 एकड़ जमीन चिह्नित की गई है, जिसमें 13 एकड़ सरकारी जमीन है। इसके अलावा टेढ़ागाछ अंचल में 99 एकड़ (3 एकड़ सरकारी) और ठाकुरगंज अंचल के एक गांव में 17 एकड़ (2 एकड़ सरकारी) भूमि अधिग्रहण के दायरे में आएगी। कोसी-मेची लिंक परियोजना     चिह्नित कुल भूमि: 571 एकड़ (552 एकड़ निजी + 19 एकड़ सरकारी)।     अंचलवार भूमि विवरण:         बहादुरगंज अंचल: 454 एकड़ (13 एकड़ सरकारी)।         टेढ़ागाछ अंचल: 99 एकड़ (3 एकड़ सरकारी)।         ठाकुरगंज अंचल: 17 एकड़ (2 एकड़ सरकारी)।     नहर की संरचना (कुल लंबाई 117.50 किमी):         भाग-1: वीरपुर बराज से फारबिसगंज तक पूर्वी कोसी मुख्य नहर (41.30 किमी) का विस्तार।         भाग-2: फारबिसगंज से किशनगंज के माखनपुर तक नई नहर (76.20 किमी)।     अंतिम पड़ाव: किशनगंज का माखनपुर गांव (मेची नदी संगम)।     लागत व समय-सीमा: अनुमानित 6,282.32 करोड़ रुपये (केंद्र अंशदान ₹3,652.56 करोड़); मार्च 2029 तक लक्ष्य।     लाभान्वित प्रखंड (किशनगंज): टेढ़ागाछ, दिघलबैंक, बहादुरगंज और कोचाधामन। 41.30 किमी पुरानी नहर का विस्तार, 76.20 किमी बनेगी नई नहर कोसी-मेची लिंक परियोजना को दो मुख्य भागों में बांटा गया है। पहले हिस्से में वीरपुर बराज से फारबिसगंज तक पूर्वी कोसी मुख्य नहर (ईकेएमसी) के 41.30 किलोमीटर हिस्से का जीर्णोद्धार और क्षमता विस्तार होगा। इसके बाद फारबिसगंज से लेकर किशनगंज के माखनपुर तक 76.20 किलोमीटर लंबी पूरी तरह नई नहर का निर्माण किया जाएगा। इस परियोजना के जरिए पूर्वी कोसी मुख्य नहर की जल वहन क्षमता को 15 हजार क्यूसेक से बढ़ाकर 20 हजार क्यूसेक किया जाएगा। किशनगंज के 4 प्रखंडों में 39,548 हेक्टेयर भूमि होगी सिंचित इस परियोजना से किशनगंज जिले के चार प्रमुख प्रखंडों—टेढ़ागाछ, दिघलबैंक, बहादुरगंज और कोचाधामन के किसानों को सीधा लाभ मिलेगा। जिले के 39,548 हेक्टेयर कृषि क्षेत्र में सालोंभर सिंचाई की सुनिश्चित सुविधा उपलब्ध होगी। खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए चार मुख्य शाखा नहरों और छह वितरणियों (डिस्ट्रीब्यूटरी) का विस्तृत नेटवर्क बिछाया जाएगा। बाढ़ प्रबंधन के साथ 2.14 लाख हेक्टेयर में सिंचाई का लक्ष्य मानसून के दौरान कोसी नदी से लगभग 2,050 मिलियन क्यूबिक मीटर अतिरिक्त बाढ़ के पानी को डायवर्ट कर सीमांचल भेजा जाएगा। इससे कोसी क्षेत्र में बाढ़ की विभीषिका कम होगी और अररिया, पूर्णिया, किशनगंज व कटिहार जिलों के 2,14,813 हेक्टेयर खेतों को पानी मिलेगा। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना-त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (PMKSY-AIBP) में शामिल इस परियोजना की कुल अनुमानित लागत 6,282.32 करोड़ रुपये है, जिसमें केंद्र सरकार 3,652.56 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता दे रही है। इसे मार्च 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। जिले में कोसी-मेची लिंक परियोजना के फेज-टू के तहत भूमि अधिग्रहण की आवश्यक प्रक्रिया शुरू की जा रही है। इसका औपचारिक प्रस्ताव तैयार कर संबंधित विभाग को भेजा गया है। भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी होते ही नहर निर्माण का कार्य तेजी से शुरू कराया जाएगा। — नवीन कुमार, जिलाधिकारी, किशनगंज

झारखंड की महिलाओं को डेयरी और इंटीग्रेटेड फार्मिंग से जोड़ने की तैयारी, जल्द आएगी नई योजना

रांची  गव्य विकास निदेशालय द्वारा डेयरी के माध्यम से महिला सशक्तीकरण विषय पर आयोजित कार्यशाला में कृषि सचिव अबु बक्कर सिद्दीख ने कहा कि राज्य सरकार महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने घोषणा की कि जल्द ही झारखंड में 'महिला किसान खुशहाली योजना' लागू की जाएगी, जिसके तहत महिलाओं को इंटीग्रेटेड फार्मिंग (एकीकृत कृषि) से जोड़कर उनकी आय बढ़ाई जाएगी। कृषि सचिव ने जोर देकर कहा कि डेयरी का दायरा केवल दूध उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि गाय पालन से जुड़े अन्य उत्पाद और दुग्ध प्रसंस्करण भी इसका मुख्य हिस्सा हैं। किसानों व महिलाओं को डेयरी व्यवसाय को लाभदायक बनाने के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। डेयरी उत्पादों से तीन गुना अधिक मुनाफा नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (NDRI), करनाल के निदेशक डॉ. धीर सिंह ने कहा कि पूर्वी भारत और विशेषकर झारखंड में डेयरी क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं। हरियाणा और पंजाब की तर्ज पर झारखंड की महिलाओं को भी को-ऑपरेटिव (सहकारिता) बनाकर काम करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि NDRI झारखंड की महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए तैयार है और जल्द ही महिलाओं के एक दल को प्रशिक्षण के लिए हरियाणा ले जाया जाएगा। 3 लाख लीटर से अधिक दूध संग्रह कर रहा झारखंड मिल्क फेडरेशन नेशनल मिल्क फेडरेशन के अध्यक्ष सुधीर सिंह ने बताया कि झारखंड में पशुओं के नस्ल सुधार कार्य से बड़ा बदलाव आया है। वर्तमान में झारखंड मिल्क फेडरेशन प्रतिदिन 3 लाख लीटर से अधिक दूध का संग्रह कर रहा है। वहीं, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (BAU) के कुलपति डॉ. एस. सी. दुबे ने कहा कि झारखंड का समग्र विकास महिलाओं की भागीदारी के बिना संभव नहीं है। सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने की अपील कार्यक्रम की शुरुआत में गव्य निदेशक डॉ. संजीव कुमार ने अतिथियों का स्वागत किया और विभाग द्वारा संचालित कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी देते हुए महिलाओं से इनका लाभ उठाने का आह्वान किया। इस अवसर पर पशुपालन निदेशक रोबिन टोप्पो, मत्स्य निदेशक अमरेंद्र कुमार और गव्य विभाग के उप निदेशक डॉ. मनोज तिवारी समेत कई वरिष्ठ अधिकारी व महिला पशुपालक उपस्थित थे।

बीकानेर में सेना का बड़ा अभ्यास, NH-911 पर उतरे रुद्र-ध्रुव और चेतक हेलीकॉप्टर

बीकानेर भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा के नजदीक पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तानी भूभाग में मंगलवार को एक अनूठा और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण नजारा देखने को मिला। बीकानेर जिले के दंतौर क्षेत्र में आम दिनों की तरह दौड़ने वाला नेशनल हाइवे-911 कुछ समय के लिए पूरी तरह से एक अस्थायी मिलिट्री रनवे में तब्दील हो गया। भारतीय सेना की एविएशन इकाइयों ने इस राष्ट्रीय राजमार्ग पर विशेष हाईवे लैंडिंग अभ्यास को अंजाम दिया। इस दौरान देश के आधुनिक सैन्य बेड़े में शामिल रुद्र, ध्रुव और चेतक हेलीकॉप्टरों ने निर्धारित हाईवे स्ट्रेच पर न केवल सफलतापूर्वक लैंडिंग की, बल्कि सटीक टेकऑफ प्रक्रिया भी पूरी की। सीमावर्ती रेगिस्तान में इस तरह का प्रशिक्षण भारतीय सेना की ऑपरेशनल तैयारियों और त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता का एक बड़ा प्रमाण माना जा रहा है। रेगिस्तानी वातावरण और सामरिक चुनौतियों के बीच अभ्यास दंतौर का यह क्षेत्र भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा के काफी करीब स्थित है। पश्चिमी राजस्थान के इस रेगिस्तानी इलाके में लंबी दूरियां, गर्म और शुष्क मौसम, धूलभरी आंधियां और तेज हवाएं सैन्य अभियानों के सामने हमेशा से एक अलग तरह की चुनौतियां पेश करती रही हैं। ऐसे कठिन भौगोलिक वातावरण में सैन्य एविएशन इकाइयों के लिए पारंपरिक एयरबेस या हेलीपैड के अलावा वैकल्पिक लैंडिंग क्षेत्रों की पहचान करना और उनका सुरक्षित उपयोग करना बेहद जरूरी होता है। इसी सामरिक जरूरत को ध्यान में रखते हुए यह अभ्यास किया गया, ताकि युद्ध या आपातकालीन परिस्थितियों में पारंपरिक रनवे उपलब्ध न होने की स्थिति में इन वैकल्पिक स्थानों से भी सुरक्षित संचालन किया जा सके। अभ्यास की मुख्य विशेषताएं और तकनीकी प्रक्रिया सड़क पर हेलीकॉप्टर उतारना केवल पायलट की व्यक्तिगत दक्षता का मामला नहीं होता, बल्कि इसके लिए बेहद सटीक योजना और तकनीकी समन्वय की आवश्यकता होती है। इस अभ्यास के दौरान निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं पर विशेष जोर दिया गया। सतह और दृश्यता का आकलन: लैंडिंग से पहले एयरक्रू द्वारा हाईवे की सतह, आसपास के दायरे, हवा की गति और दृश्यता का बारीकी से मूल्यांकन किया गया। सटीक समन्वय: सुरक्षित लैंडिंग से लेकर दोबारा उड़ान भरने तक हवा में मौजूद एयरक्रू और जमीन पर तैनात ग्राउंड क्रू के बीच तालमेल बिठाया गया। विविध प्लेटफार्मों की भूमिका: अभ्यास में शामिल रुद्र, ध्रुव और चेतक हेलीकॉप्टरों ने अलग-अलग सैन्य भूमिकाओं—जैसे सैनिकों की आवाजाही, लॉजिस्टिक सहायता और निगरानी—के तहत अपनी दक्षता का प्रदर्शन किया। ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी और सैन्य गतिशीलता आधुनिक सैन्य अभियानों में किसी एक स्थायी बुनियादी सुविधा पर निर्भरता को कम करना और परिस्थितियों के अनुसार तुरंत वैकल्पिक विकल्पों का इस्तेमाल करना सबसे अहम माना जाता है। हेलीकॉप्टरों की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि वे बेहद सीमित स्थानों से भी सुगमता से संचालित हो सकते हैं। हाईवे लैंडिंग जैसे प्रशिक्षण एयरक्रू को गैर-पारंपरिक और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में काम करने का अमूल्य अनुभव प्रदान करते हैं। बीकानेर के इस राष्ट्रीय राजमार्ग पर हुए इस सैन्य अभ्यास ने यह साबित कर दिया है कि भारतीय सेना हर परिस्थिति में देश की रक्षा और त्वरित कार्रवाई के लिए पूरी तरह मुस्तैद है।

लोहावट की 3 ढाणियों में पेयजल व्यवस्था मजबूत, ₹1.50 करोड़ से बने जलाशय और पाइपलाइन

जयपुर कभी पानी का इंतजार रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था। जरूरत के पानी के लिए व्यवस्था पर निर्भरता थी और हर किसी की उम्मीद यही रहती थी कि पानी की सुविधा बेहतर हो और समय पर मिले। फलोदी जिले के लोहावट क्षेत्र की सुथारों की ढाणी (इन्द्रनगर), डूडियो की ढाणी (सदरी) और पुनियों की ढाणी (नौसर) में अब इसी इंतजार की तस्वीर बदलती नजर आ रही है। इन ढाणियों में पेयजल व्यवस्था को मजबूत करने के लिए मुख्यमंत्री बजट घोषणा के तहत करीब 1.50 करोड रुपये की लागत से किए गए कार्यों ने ग्रामीण पेयजल तंत्र को नया आधार दिया है। तीन उच्च जलाशयों के निर्माण, पाइपलाइन बिछाने सहित अन्य आवश्यक कार्य पूरे होने के बाद इन क्षेत्रों में पेयजल व्यवस्था में सुधार आया है। आज 2,805 ग्रामीण इस योजना से लाभान्वित हो रहे हैं। बजट में घोषणा हुई और गांव तक पहुंचा बदलाव किसी गांव के लिए पानी की सुविधा केवल एक सरकारी परियोजना नहीं बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी जरूरत है। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए इन तीनों ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल तंत्र को सुदृढ़ करने का कार्य किया गया। 15 जनवरी, 2025 को कार्यादेश जारी होने के बाद प्रस्तावित कार्यों को पूरा किया गया। उच्च जलाशयों के निर्माण के साथ पाइपलाइन संबंधी जरूरी कार्य किए गए ताकि पेयजल आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत आधार मिल सके। तीन ढाणियां, हजारों ग्रामीणों की बदली तस्वीर सुथारों की ढाणी, डूडियो की ढाणी और पुनियों की ढाणी – नाम भले तीन हों लेकिन इनसे जुड़ी जरूरत एक ही थी – बेहतर और मजबूत पेयजल व्यवस्था। आज जब इन क्षेत्रों में पेयजल तंत्र पहले से मजबूत हुआ है और 2,805 ग्रामीणों तक योजना का लाभ पहुंच रहा है तो यह बदलाव सिर्फ बने हुए जलाशयों या बिछी पाइपलाइनों में नहीं बल्कि लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में दिखाई देता है। मुख्यमंत्री बजट घोषणा से विकास की असली तस्वीर बड़े शहरों की इमारतों में ही नहीं, बल्कि गांव की उन ढाणियों में भी दिखाई देती है, जहां एक बेहतर पेयजल सुविधा लोगों के लिए सुविधा, राहत और भरोसे का आधार बन जाती है।  

दिल्ली दंगा केस: उमर खालिद-शरजील इमाम को नहीं मिली राहत, हाईकोर्ट ने बेल की अपील ठुकराई

नई दिल्ली साल 2020 के दिल्ली दंगे के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को दिल्ली हाईकोर्ट ने फिर से राहत देने से इनकार कर दिया है और दोनों की जमानत याचिका खारिज कर दी है। बता दें कि दोनों आरोपी फरवरी 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े यूएपीए मामले में लगभग 6 साल से बंद हैं।सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि यह कोर्ट न्यायिक अनुशासन से बंधा हुआ है। आदालत ने आगे कहा कि वह शरजील इमाम और उमर खालिद पर लगाई गई शर्तों में बदलाव नहीं कर सकता है। क्या थीं शर्तें दरअसल, जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस दिनेश भट्ट की बेंच ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित आदेश में किसी तरह का बदलाव नहीं कर सकते। उस आदेश में जमानत पाने के लिए कुछ शर्तें रखी गईं हैं, जिनमें पहली, संरक्षित गवाहों के बयान पूरे होने पर और दूसरी, आदेश पारित होने की तारीख 5 जनवरी, 2026 से एक साल पूरा होने पर ही जमानत पर विचार किया जा सकता है। बता दें कि दिल्ली हाईकोर्ट से पहले कड़कड़डूमा कोर्ट ने बीते 4 जुलाई 2026 को दोनों की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी 5 जनवरी 2026 को झटका दिया था। शरजील इमाम और उमर खालिद पर दिल्ली में दंगे भड़काने का आरोप बता दें कि शरजील इमाम और उमर खालिद पर मुख्य रूप से फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगों की बड़ी साजिश रचने का आरोप है। दोनों पर देश विरोधी भड़काऊ भाषण देने का भी आरोप है। दिल्ली पुलिस के मुताबिक दोनों ने CAA और NRC के विरोध प्रदर्शनों की आड़ में हिंसा भड़काने की सोची-समझी योजना बनाई थी।  

फरीदाबाद, गुरुग्राम और करनाल प्रगति योजना से जुड़े, शहरी सुविधाओं पर बढ़ेगा फोकस

 चंडीगढ़  हरियाणा के फरीदाबाद, गुरुग्राम और करनाल शहरों को केंद्र सरकार की प्रगति योजना से जुड़ी 50 शहरों की सूची में शामिल किया गया है। केंद्र की सूची में इन तीनों शहरों के संबंधित नगर निकायों को भी स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया है। फरीदाबाद नगर निगम, गुरुग्राम नगर निगम और करनाल नगर निगम इस सूची में शामिल हैं। प्रगति यानी प्रो एक्टिव गवर्नेस एंड टाइमली इंप्लीमेंटेशन केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय, परियोजनाओं की समयबद्ध निगरानी और जमीनी स्तर पर परिणाम सुनिश्चित करने के लिए इस्तेमाल होने वाला तंत्र है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में होने वाली प्रगति की बैठकों में महत्वपूर्ण परियोजनाओं और योजनाओं की प्रगति की समीक्षा की जाती है। केंद्र सरकार फरीदाबाद, गुरुग्राम और करनाल का चयन, नगर निकायों की भूमिका अहम के अनुसार प्रगति का जोर केवल योजनाएं बनाने पर नहीं, बल्कि उनके समयबद्ध क्रियान्वयन और नागरिकों को दिखाई देने वाले परिणामों पर है। प्रगति की सूची में शहरों को शामिल किए जाने का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि केंद्र सरकार शहरी क्षेत्रों में ठोस कचरा प्रबंधन, कचरा प्रसंस्करण, स्वच्छता, हरियाली और नागरिक सुविधाओं को मिशन मोड में आगे बढ़ा रही है। मई 2026 की प्रगति बैठक में प्रधानमंत्री ने राज्यों से ठोस कचरा प्रबंधन से जुड़ी आधारभूत सुविधाओं और कचरा प्रसंस्करण संयंत्रों को तेजी से पूरा करने पर जोर दिया था। साथ ही स्वच्छ भारत मिशन की राज्य स्तर पर नियमित समीक्षा की व्यवस्था भी शुरू की गई। हरियाणा के तीनों शहरों के लिए इसका सीधा मतलब शहरी व्यवस्थाओं को अधिक प्रभावी बनाने से है। इसमें कचरे का संग्रह और निस्तारण, सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता, सड़क और फुटपाथ व्यवस्था, हरित क्षेत्र बढ़ाना तथा नागरिक सेवाओं की निगरानी जैसे पहलू महत्वपूर्ण होंगे। फरीदाबाद और गुरुग्राम के मामले में स्वच्छता के साथ वायु प्रदूषण, सड़क की धूल, हरियाली और यातायात प्रबंधन भी महत्वपूर्ण होंगे।

बिहार में घर बनाने के नियम आसान, 12 मीटर तक के मकान के लिए नक्शा पास कराने का झंझट खत्म

पटना बिहार में अब 12 मीटर की ऊंचाई (तिमंजिला) तक मकान बनाने के लिए नक्शा पास कराने के झंझट से मुक्ति मिलने वाली है। 12 मीटर ऊंचाई वाले भवन के लिए मानक के अनुरूप बना स्वप्रमाणित नक्शा ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड कर इसका निर्धारित शुल्क जमा करना होगा। इसके बाद स्वीकृति प्रमाणपत्र डाउनलोड किया जा सकेगा। बिहार भवन उपविधि के मसौदे में संशोधन करते हुए इस प्रावधान को शामिल किया गया है। जल्द ही इस पर राज्य मंत्रिमंडल की स्वीकृति ली जाएगी। उपविधि के मसौदे पर 118 आपत्तियां और सुझाव आए थे, जिनका निराकरण उपमुख्यमंत्री विजय चौधरी की अध्यक्षता में बने मंत्री समूह की बैठक में कर लिया गया है। मंत्री समूह ने नियमों को सरल और प्रक्रिया को आसान बनाते हुए उपविधि के अंतिम रूप को मंजूरी दी है। सेटबैक और एफएआर (फ्लोर एरिश रेशियो) के नियमों में भी छूट दी गई है। सूत्रों के अनुसार, भवन उपविधि के मसौदे में कई संशोधन किए गए हैं। सबसे महत्वपूर्ण संशोधन नक्शा की स्वीकृति से संबंधित है। अब 12 मीटर यानी तिमंजिला मकान बनाने के लिए नक्शा पास कराने की जरूरत नहीं होगी। इसमें तीन मंजिला या अधिकतम चार मंजिला मकान बनाया जा सकता है। भवन उपविधि के मसौदे में इसे 24 मीटर रखा गया था। इंजीनियरों और वास्तुविदों के सुझाव के बाद इसे घटाया गया है। जोखिम के लिहाज से भवनों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है। मध्यम जोखिम वाले भवन (12 से 24 मीटर ऊंचाई) के लिए इंजीनियर या वास्तुविद से नक्शा पास कराना होगा। उच्च जोखिम श्रेणी के भवनों (24 मीटर से ऊंचे) को नक्शा और एनओसी से संबंधित प्रक्रिया का पालन करना होगा। एफएआर और सेटबैक में छूट भवन नियमावली को सरल बनाते हुए मंत्री समूह ने एफएआर और सेटबैक नियमों में छूट को स्वीकृति दी है। आधार एफएआर 3 रखा गया है। यह सभी तरह के भूखंडों पर लागू होगा। अतिरिक्त शुल्क देने पर एफएआर में छूट मिलेगी। वहीं, 12 मीटर तक चौड़ाई और गहराई वाले भूखंड में सेटबैक नियमों से पूरी तरह छूट रहेगी। 15 मीटर ऊंचाई तक के भवनों में 3.7 मीटर सेटबैक जरूरी होगा। पहुंच मार्ग की न्यूनतम चौड़ाई 3.7 मीटर रखनी होगी अन्य संशोधनों में आवास तक के पहुंच मार्ग की चौड़ाई 3.7 मीटर यानी करीब 12 फीट रखना होगा। पहुंच मार्ग के लिए जमीन छोड़ने पर भू स्वामियों को एफएआर का लाभ दिया जाएगा। इसके अलावा नक्शे की वैधता को दो वर्ष से बढ़ाकर पांच वर्ष किया गया है। नक्शा की स्वीकृति 30 दिन में नहीं मिलने पर वह स्वीकृत माना जाएगा। यानी नक्शा पास कराने के लिए अब अधिकारियों के चक्कर काटने की जरूरत नहीं होगी। ऊंचाई के अनुसार तीन वर्गों में बांटे गए भवन 1. निम्न जोखिम : 12 मीटर ऊंचाई तक 2. मध्यम जोखिम : 12 से 24 मीटर तक ऊंचाई 3. उच्च जोखिम: 24 मीटर से ऊंचे भवन

फायर सेफ्टी में खामियां मिलीं, अंबाला के चमन वाटिका स्कूल के हॉस्टल पर बड़ा एक्शन

 चंडीगढ़  देश-प्रदेश में लगातार सामने आ रही भवन गिरने और आगजनी की घटनाओं से हरियाणा सरकार ने सबक लिया है। खासकर ऐसे भवन, जो पुराने हैं, बाढ़ या अन्य प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर चुके हैं अथवा जिनमें अग्नि सुरक्षा के मानक पूरे नहीं हैं, वे जांच के दायरे में हैं। इसके लिए सरकार ने भवनों का सुरक्षा और फायर सेफ्टी ऑडिट आरंभ कर दिया है। इस अभियान की पहली बड़ी कार्रवाई अंबाला के चमन वाटिका स्कूल में हुई है। चंडीगढ़-अंबाला हाईवे पर स्थित इस स्कूल परिसर में बने छात्रावासों में फिलहाल विद्यार्थियों के रहने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। अग्निशमन विभाग के निरीक्षण में सामने आया कि परिसर में अग्निशमन की बुनियादी सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं। अग्निशमन विभाग ने स्पष्ट किया है कि जब तक प्रदेश सरकार के निर्धारित फायर सेफ्टी मानकों का पूरी तरह पालन नहीं होता, तब तक स्कूल परिसर में किसी विद्यार्थी को रहने की अनुमति नहीं होगी। चमन वाटिका स्कूल का मामला इसलिए गंभीर है, क्योंकि हाल ही में अंबाला में एक भवन गिरा है, जिसमें कई लोग मारे गए। चमन वाटिका का करीब 35 वर्ष पुराना भवन तीन बार बाढ़ का सामना कर चुका है। छात्रावास और स्कूल भवन की जर्जर स्थिति को देखते हुए यहां छात्राओं के लिए संचालित आवासीय गुरुकुल को मार्च 2026 में बंद कर दिया गया था। गुरुकुल के तत्कालीन प्रबंधन ने चमन वाटिका से खुद को अलग कर लिया था, लेकिन स्कूल प्रबंधन की ओर से अभिभावकों को धोखे में रखकर अक्टूबर 2026 से इसमें दाखिले होने की सूचना प्रसारित की जा रही है, जिसे फायर सेफ्टी विभाग ने बेहद गंभीरता से लिया है। अंबाला के अग्निशमन अधिकारी की ओर से जारी पत्र में कहा गया कि स्कूल प्रबंधन के पास जो फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट है, वह केवल 374.86 वर्ग मीटर के ग्राउंड कवरेज के लिए है, जबकि मौके पर परिसर का वास्तविक कवर क्षेत्र इससे काफी अधिक पाया गया। परिसर के तीन गर्ल्स हास्टल ब्लॉक, मेस और स्विमिंग पूल क्षेत्र मौजूदा फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट के दायरे में नहीं आते। सरकार ने स्कूल को नया स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी सर्टिफिकेट तत्काल प्रस्तुत करने को कहा है। साथ ही हास्टल और स्कूल भवनों के सक्षम अधिकारी से स्वीकृत नक्शे भी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं। सिर्फ फायर सेफ्टी प्रमाणपत्र होना पर्याप्त नहीं अग्निशमन विभाग ने साफ कर दिया है कि सिर्फ फायर सेफ्टी प्रमाणपत्र होना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि परिसर के सभी भवन और वास्तविक क्षेत्र उसके दायरे में होने चाहिए। इसी तरह पुराने अथवा प्राकृतिक आपदा झेल चुके भवनों के लिए संरचनात्मक स्थिरता का प्रमाण भी जरूरी होगा। दिल्ली-अंबाला समेत हालिया घटनाओं के बाद शुरू हुआ सुरक्षा ऑडिट यह संकेत दे रहा है कि सरकार अब संभावित रूप से असुरक्षित भवनों की पहचान कर उन्हें हादसे का कारण बनने से पहले कार्रवाई के दायरे में ला रही है। मानकों पर खरे नहीं उतरने वाले भवनों की जांच पर रहेगा जोर हरियाणा में सुरक्षा ऑडिट की यह कवायद ऐसे समय शुरू हुई है, जब दिल्ली, अंबाला और देश के अन्य हिस्सों में भवन गिरने तथा आग लगने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इन घटनाओं ने खासतौर पर स्कूलों, हास्टलों और ऐसे सार्वजनिक भवनों की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए हैं, जहां बड़ी संख्या में बच्चे और लोग एकसाथ मौजूद रहते हैं। सरकार अब ऐसे भवनों की पहचान और जांच पर जोर दे रही है, जिनकी संरचनात्मक मजबूती संदिग्ध है या जिनमें अग्निरोधी व्यवस्था निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं है। सुरक्षा ऑडिट का उद्देश्य हादसा होने के बाद कार्रवाई करने की बजाय पहले ही जोखिम वाले भवनों की पहचान करना है।