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ईरान युद्ध को लेकर ट्रंप का कड़ा आदेश: ‘जल्द निपटाओ, और भी काम हैं

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सहयोगियों से कहा है कि वह ईरान के साथ जारी युद्ध को लंबा नहीं खींचना चाहते और आने वाले कुछ हफ्तों में इसे खत्म करने की कोशिश में हैं. ट्रंप आने वाले कुछ हफ्तों में इस संघर्ष पर पूर्णविराम लगाना चाहते हैं ताकि वे अपने अन्य घरेलू और राजनीतिक एजेंडों पर ध्यान केंद्रित कर सकें।  Wall Street Journal की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप का मानना है कि युद्ध अपने अंतिम चरण में है और उन्होंने अपने सहयोगियों को सार्वजनिक रूप से बताए गए 4-6 हफ्तों के टाइमलाइन पर टिके रहने के निर्देश दिए हैं. व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने मई के मध्य में चीनी नेता शी जिनपिंग के साथ बीजिंग में एक शिखर सम्मेलन की योजना बनाई है. उम्मीद की जा रही है कि इस बैठक के शुरू होने से पहले ईरान युद्ध समाप्त हो जाएगा।  समस्या यह है कि ट्रंप के पास युद्ध समाप्त करने के आसान विकल्प नहीं हैं और शांति वार्ता अभी शुरुआती चरण में है. बाहरी राजनीतिक सहयोगियों के साथ बातचीत के दौरान उनका ध्यान कई बार अन्य मुद्दों पर भी गया, जिनमें आने वाले मध्यावधि चुनाव, हवाई अड्डों पर इमिग्रेशन एजेंट भेजने का उनका फैसला और मतदाता पात्रता नियमों को कड़ा करने वाले कानून को कांग्रेस से पारित कराने की रणनीतियां शामिल हैं।  एक ओर तो ट्रंप युद्ध खत्म करने के लिए कूटनीतिक रास्ते तलाश रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अमेरिका ने मध्यपूर्व में अतिरिक्त सैनिक तैनात कर दबाव भी बढ़ाया है. मध्यस्थ देशों के जरिए शुरुआती बातचीत शुरू हुई है, लेकिन अभी शांति वार्ता शुरुआती दौर में ही है और कोई ठोस समझौता नहीं हुआ है।   तेल और रणनीति रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने अपने सलाहकारों के सामने ये बात रखी कि युद्ध खत्म करने के किसी समझौते के तहत अमेरिका को ईरान के तेल तक पहुंच मिल सकती है. हालांकि, इस पर अभी कोई ठोस योजना नहीं बनी है।  ट्रंप जमीनी स्तर पर अमेरिकी सैनिक भेजने के विकल्प को पूरी तरह खारिज नहीं कर रहे हैं, लेकिन इससे युद्ध लंबा खिंच सकता है, जिसे वह टालना चाहते हैं. अब तक लगभग 300 अमेरिकी सैनिक घायल और 13 की मौत हो चुकी है, जो उनकी चिंता का एक बड़ा कारण है.ट्रंप के करीबी सहयोगियों में इस बात को लेकर मतभेद है कि आगे क्या रणनीति होनी चाहिए. कुछ लोग कूटनीतिक समाधान चाहते हैं, जबकि कुछ सख्त सैन्य कार्रवाई और यहां तक कि ईरान में शासन परिवर्तन की बात कर रहे हैं।  अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, ट्रंप ईरान की जमीन पर अमेरिकी सैनिक भेजने का आदेश देने को तैयार हैं, लेकिन ऐसा करने से हिचक रहे हैं क्योंकि इससे युद्ध जल्दी खत्म करने का उनका लक्ष्य प्रभावित हो सकता है. उन्हें चिंता है कि यदि युद्ध जारी रहा तो अमेरिकी सैनिकों के मारे जाने या घायल होने की संख्या बढ़ सकती है. अब तक लगभग 300 अमेरिकी सैनिक घायल हुए हैं और 13 की मौत हो चुकी है।  वैश्विक असर और जोखिम यदि जल्द समझौता नहीं होता, तो होर्मुज में रुकावट जारी रह सकती है, जिससे वैश्विक तेल बाजार प्रभावित होगा. वहीं इजरायल और खाड़ी देशों की भूमिका भी इस संघर्ष को और जटिल बना सकती है।  इस युद्ध का असर अमेरिकी राजनीति पर भी दिख रहा है. आगामी चुनावों और बढ़ती महंगाई के बीच ट्रंप पर दबाव है. अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी के लिए राजनीतिक स्थिति चुनौतीपूर्ण होती जा रही है. हाल ही में फ्लोरिडा की एक महत्वपूर्ण सीट डेमोक्रेट्स के खाते में जाने से हड़कंप मचा है. विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध के कारण बढ़ी महंगाई और जीवनयापन की लागत आगामी चुनावों में ट्रंप की पार्टी के लिए बड़ी मुसीबत बन सकती है।  रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप खुद भी मानते हैं कि युद्ध उनके अन्य एजेंडे से ध्यान भटका रहा है. व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने चेतावनी दी है कि अगर तेहरान समझौते के लिए आगे नहीं बढ़ता, तो अमेरिका पहले से भी ज्यादा कड़ा हमला कर सकता है। 

ईरान से जंग खत्म करने के लिए ट्रंप की 15 शर्तें: एक महीने का सीजफायर, नो न्यूक्लियर और होर्मुज

वाशिंगटन इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला करने के करीब 25 दिन बाद अमेरिका अब सीजफायर की उम्मीद कर रहा है। बीते दिनों ईरान युद्ध में जीत का दावा करने वाले ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि ईरान के साथ उनकी बातचीत जारी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप सरकार ने समझौते के लिए ईरान को एक 15-सूत्रीय युद्धविराम योजना की पेशकश की है, जिसमें युद्ध में एक महीने का सीजफायर का जिक्र है। इस घटनाक्रम से अवगत एक अधिकारी ने यह जानकारी दी है। अधिकारी ने अपनी पहचान गोपनीय रखे जाने की शर्त पर बताया कि युद्धविराम योजना पाकिस्तान के मध्यस्थों के जरिए ईरान को सौंपी गई। बता दें कि इससे पहले पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में मध्यस्थता की पेशकश की थी। इसके बाद ट्रंप ने भी इसे हरी झंडी दे दी है और कहा है कि ईरानी नेतृत्व के ‘अच्छे लोगों’ के साथ उनकी बातचीत जारी है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने मंगलवार को अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि 15-सूत्रीय योजना ईरानी अधिकारियों को सौंप दी गई है। ट्रंप की योजना में क्या? हालांकि पूरा दस्तावेज अभी आधिकारिक तौर पर जारी नहीं किया गया है, लेकिन कई रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि इस 15-सूत्रीय योजना का ढांचा तीन बड़ी मांगों पर आधारित है। इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने की मांग की गई है। ट्रंप कई मौकों पर यह कह चुके हैं कि ईरान को अपनी परमाणु क्षमताओं को खत्म करना होगा। इसमें यूरेनियम संवर्धन को पूरी तरह रोकना, नतान्ज, फ़ोर्डो और इस्फहान जैसी अहम सुविधाओं को बंद करना और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण की अनुमति देना शामिल है। प्रॉक्सी मॉडल को छोड़ने की बात भी इसके अलावा अमेरिका चाहता है कि ईरान अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों की मारक क्षमता और संख्या को सीमित करे। यह मांग ईरान की प्रतिरोधक क्षमता को निशाना बनाती है, ना कि सिर्फ उसकी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को। एक और बड़ी मांग यह है कि ईरान हिजबुल्लाह और हूती जैसे क्षेत्रीय गुटों को पैसे देना और हथियार मुहैया कराना बंद करे और पूरे मिडिल ईस्ट में अपने प्रॉक्सी मॉडल को छोड़ दे। इसके अलावा प्लान में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खुला रखने, और सीजफायर की समय-सीमा तय करने की बात भी है। वहीं इन सब के बदले अमेरिका ईरान को प्रतिबंधों में पूरी तरह राहत दे सकता है। USA के कदम से इजरायल हैरान उधर, अमेरिका के इस अचानक सीजफायर प्रस्ताव ने इजरायली अधिकारियों को हैरान कर दिया है जो युद्ध जारी रखने के पक्ष में थे. दूसरी ओर, कूटनीतिक कोशिशों के बावजूद पेंटागन क्षेत्र में 3,000 अतिरिक्त सैनिक तैनात कर रहा है. वर्तमान में मिडिल ईस्ट में लगभग 50,000 अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं. ईरान ने पहले ही चेतावनी दी है कि यदि सैन्य गतिविधियां बढ़ीं, तो वह खाड़ी में समुद्री बारूद (नेवल माइंस) बिछा सकता है।  नया नहीं है पीस प्लान विशेषज्ञों का कहना है कि ये 15-सूत्रीय ढांचा पूरी तरह नया नहीं है, बल्कि मई 2025 के उस प्रस्ताव पर आधारित है जो इजरायली हमलों के बाद विफल हो गया था. पहले की योजना में कथित तौर पर व्यापक शर्तें लगाई गई थीं, जिनमें ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों पर सख्त सीमाएं लगाना, यूरेनियम भंडार को बाहर भेजना, संवर्धन सुविधाओं को निष्क्रिय करना और प्रतिबंध राहत निधि के इस्तेमाल को प्रतिबंधित करना शामिल था, जबकि केवल आंशिक प्रतिबंधों में ढील और संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में एक नागरिक परमाणु कार्यक्रम की पेशकश की गई थी।  इस बात को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है कि क्या ये प्रस्ताव औपचारिक रूप से ईरान को प्रस्तुत किया गया है. कुछ राजनयिकों को शक है कि कोई ठोस नया प्रस्ताव मौजूद भी है या नहीं और यदि है भी, तो संभवत इसे अभी तक तेहरान के साथ साझा नहीं किया गया है।  वहीं, ट्रंप ने दावा किया कि पिछले दो दिनों में हुई बहुत अच्छी और सार्थक बातचीत से ईरान के साथ प्रगति हुई है. हालांकि, तेहरान ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि बातचीत को फिर से शुरू करने के बारे में सीमित अप्रत्यक्ष संपर्कों के अलावा कोई गुप्त वार्ता नहीं हुई है।  विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप इस युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता (ऑफ-रैंप) तलाश रहे हैं. हालांकि, दोनों देशों के बीच गहरे अविश्वास और ईरान के अंदर वार्ता के अधिकार को लेकर अनिश्चितता इस शांति प्रक्रिया में बड़ी बाधा है।  मानेगा ईरान? ईरान ने अब तक अमेरिका के साथ बातचीत की संभावना को खारिज ही किया है। ऐसे में इसकी बेहद कम संभावना है कि ईरान ट्रंप की इन मांगों को समर्थन देगा। इसकी वजह यह है कि यह प्रस्ताव किसी नई शांति पहल से ज्यादा, पहले नाकाम हो चुकी परमाणु वार्ताओं का ही एक नया रूप लगता है। ईरान का तर्क है कि पिछली बार बातचीत के बीच ही अमेरिका ने हमला कर दिया, जिससे नई गारंटियों पर विश्वास करना मुश्किल हो जाता है।

ईरान का अमेरिका को चेतावनी, युद्ध खत्म करने की दो बड़ी शर्तें, 9 अप्रैल तक होगा युद्ध समाप्त?

वाशिंगटन/ तेहरान  अमेरिका अब ईरान जंग खत्म करने को रेडी है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने का दावा है कि कि ईरान अब युद्ध नहीं लड़ना चाहता. वह समझौता करना चाहता है. उनकी मानें तो अमेरिका सीजफायर को लेकर ईरानी नेता के साथ बातचीत कर रहा है. डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि ईरान के साथ प्रोडक्टिव बातचीत हो रही है. वहीं ईरान ने ट्रंप के दावों को फेक ही बता दिया है. ईरान का कहना है कि मार्केट को मेनुपुलेट करने के लिए ट्रंप ईरान जंग पर ऐसा दावा कर रहे हैं. अब सवाल है कि क्या सच में ईरान जंग खत्म करने को तैयार नहीं हैं? वह भी तब जब उसके सारे टॉप लीडर्स मारे जा चुके हैं. अब ईरान ने भी अपनी मंशा जाहिर कर दी है. ईरान ने ट्रंप को सीधा जवाब दिया है कि वह भी युद्ध खत्म करने को तैयार है, मगर उसकी कुछ शर्तें हैं।  जी हां, ईरान भी अमेरिका और इजरायल संग युद्ध खत्म करना चाहता है. मगर वह ऐसे ही जंग खत्म नहीं करना चाहता. उसकी कुछ शर्तें हैं. ईरान का कहना है कि युद्ध तब तक जारी रहेगा जब तक सभी प्रतिबंध हटा नहीं दिए जाते और अमेरिका द्वारा युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई नहीं कर दी जाती. जी हां, ईरान अब अमेरिका से युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई चाहता है. साथ ही वह अपने ऊपर लगे सारे सैंक्शन्स हटवाना चाहता है. ये दोनों चीजें अमेरिका मान लेता है तो फिर ईरान इस युद्ध को आगे नहीं बढ़ाएगा और डोनाल्ड ट्रंप की बात मान लेगा।  क्या मानेंगे डोनाल्ड ट्रंप? मगर सवाल है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप ईरान की इन शर्तों को मानेंगे? दरअसल, ईरान के एक सीनियर अधिकारी का कहना है कि युद्ध का अंत ईरान के हाथ में है. ईरान इसे तभी समाप्त मानेगा जब अमेरिका से पूर्ण मुआवजा मिले और भविष्य में हस्तक्षेप न करने की गारंटी हो. यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने युद्ध को ‘समाप्त करने की दिशा में’ विचार करने की बात कही थी. ट्रंप प्रशासन ने तेल की कीमतों में भारी उछाल को नियंत्रित करने के लिए ईरानी तेल पर कुछ प्रतिबंध अस्थायी रूप से हटाए हैं, जिससे लगभग 140 मिलियन बैरल तेल बाजार में आ सकता है. लेकिन ईरान इसे अपनी जीत के रूप में देख रहा है और अपनी शर्तों पर अड़ा हुआ है।  ईरानी विदेश मंत्री ने क्या कहा? ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी दोहराया कि युद्ध अमेरिका द्वारा शुरू किया गया था और इसके सभी परिणामों के लिए वाशिंगटन जिम्मेदार है. उन्होंने मुआवजे, क्षेत्र से अमेरिकी सैन्य अड्डों की वापसी और भविष्य में हमलों की गारंटी की मांग की है. ईरान का कहना है कि बिना इन शर्तों के कोई युद्धविराम स्वीकार नहीं किया जाएगा।  ट्रंप का क्या दावा? वहीं, डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को उस ईरानी नेता का नाम बताने से इनकार कर दिया, जिसके साथ अमेरिका तीन सप्ताह से जारी युद्ध को समाप्त करने के लिए बातचीत कर रहा है. ट्रंप ने कहा कि वार्ताकार एक ‘शीर्ष व्यक्ति’ है, जो उस देश में ‘सबसे सम्मानित’ है. खबरों के मुताबिक, ईरान ने अमेरिका के साथ बातचीत होने से इनकार किया है, लेकिन यह स्वीकार किया है कि क्षेत्र के कुछ देश तनाव कम करने के प्रयास कर रहे हैं।  व्हाइट हाउस का जवाब इधर, समाचार एजेंसी ANI ने व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट से संपर्क किया और पूछा कि क्या अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस शांति मिशन के लिए अमेरिका के विशेष राष्ट्रपति दूत स्टीव विटकॉफ, और व्यवसायी व अमेरिका के राष्ट्रपति के पूर्व वरिष्ठ सलाहकार जेरेड कुशनर इस सप्ताह इस्लामाबाद में ईरानी अधिकारियों से मुलाकात करेंगे? इस पर व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने जवाब दिया, ‘ये संवेदनशील कूटनीतिक चर्चाएं हैं और अमेरिका प्रेस के माध्यम से बातचीत नहीं करेगा. यह एक बदलती हुई स्थिति है और मुलाकातों के बारे में की जा रही अटकलों को तब तक अंतिम नहीं माना जाना चाहिए जब तक कि व्हाइट हाउस द्वारा उनकी औपचारिक घोषणा न कर दी जाए।  9 अप्रैल तक खत्म हो जाएगा युद्ध?  मध्य पूर्व में जारी युद्ध को लेकर एक नई और दिलचस्प जानकारी सामने आ रही है. इजराइली मीडिया आउटलेट वाईनेट ने एक अधिकारी के हवाले से दावा किया है कि अमेरिका ईरान के साथ चल रहे युद्ध को अप्रैल महीने की 9 तारीख तक खत्म करने की योजना बना रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने 9 अप्रैल को युद्ध समाप्त करने की संभावित तारीख तय की है. अगर सब कुछ प्लान के मुताबिक ही चलता है तो इसका मतलब है कि लड़ाई और बातचीत में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है।  रिपोर्ट ये भी कहती है कि ईरान और अमेरिका के बीच वार्ता इसी हफ्ते के अंत में पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हो सकती है. इसे लेकर न्यूज एजेंसी रॉयटर्स ने भी जानकारी दी है कि दोनों पक्षों में बात के लिए इस्लामाबाद को चुना जा सकता है. हालांकि इजरायली रिपोर्ट में ये भी कहा है कि डोनाल्ड ट्रंप को इजरायल डे के मौके पर नेतन्याहू सम्मानित करने का वादा कर चुके हैं. अगर तब तक ये युद्ध रुका नहीं, तो ये सम्मान समारोह भी टल जाएगा और ट्रंप ऐसा बिल्कुल नहीं चाहते।  क्यों 9 अप्रैल तक खत्म होगा युद्ध? दरअसल दिसंबर, 2025 के अंत में इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार न मिलने के बाद एक विशेष सम्मान देने का वादा किया था. यदि 9 अप्रैल तक युद्ध खत्म होता है, तो यह ट्रंप के लिए इजराइल के स्वतंत्रता दिवस यानि 21-22 अप्रैल के दौरान वहां यात्रा करने और इजराइल प्राइज लेने का मौका देगा. ये देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इसके बाद भी आने वाले तीन हफ्तों के लिए आगे की योजनाएं बनाई जा रही हैं।  इजरायल-अमेरिका के बीच बात भी नहीं? इजराइल डिफेंस फोर्स के प्रवक्ता एफी डेफ्रिन ने कहा कि उनकी सेना ईरान के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई यहूदी त्योहार पासओवर तक जारी रखेगी, जो इस साल 1 से 8 अप्रैल के बीच पड़ रहा है. उन्होंने यह भी … Read more

डेडलाइन आज पूरी: क्या ट्रंप के अल्टीमेटम के बाद ईरान पर एक्शन लेगा अमेरिका?

ईरान ईरान-इजरायल युद्ध के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के मेसेज से पूरी दुनिया सकते में है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को युद्ध रोकने और होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह खोलने के लिए 48 घंटे का वक्त दिया था। और इसकी समय सीमा आज खत्म हो रही है। ये डेडलाइन खत्म होने से पहले ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया ट्रुथ सोशल पर एक लाइन लिखा है जिससे इस बात का अंदेशा बढ़ गया है कि अमेरिका ईरान के खिलाफ कड़े कदम उठा सकता है। ट्रंप के सोशल मीडिया 'ट्रुथ' पर लिखा है PEACE THROUGH STRENGTH, TO PUT IT MILDLY!!! इन शब्दों के मायने हैं कि ‘अगर आसान शब्दों में कहें तो शक्ति से शांति आती है।’ट्रंप ने ये फ्रेज रोनाल्ड रीगन के निरोध सिद्धांत (Doctrine of deterrence) से लिया है। रीगन का मानना था कि अगर आपके पास सैन्य और आर्थिक शक्ति पर्याप्त है तो दुश्मनों को संघर्ष करने से रोका जा सकता है। कोल्ड वॉर के दौरान इसे ही अहम रणनीति माना गया था। ईरान ने भी दे डाली जवाबी हमले की धमकी डोनाल्ड ट्रंप के अल्टिमेटम के जवाब में ईरान ने कहा है कि अगर अमेरिका अपने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बिजली संयंत्रों पर हमले की धमकी पर अमल करता है, तो तेल और अन्य निर्यात के लिए महत्वपूर्ण जलमार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य को तत्काल ''पूरी तरह से बंद'' कर दिया जाएगा। ईरान ने इजराइल के एक गुप्त परमाणु अनुसंधान स्थल पर मिसाइल हमला किया और इस हमले में आस पास के स्थानों पर रहने वाले लोग बड़ी संख्या में घायल हुए, जिसके बाद इजराइल के नेताओं ने वहां जा कर लोगों से मुलाकात की और उनका हाल चाल जाना। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि हमले में किसी की जान नहीं गई और यह एक "चमत्कार" है। नेतन्याहू ने दावा किया कि इजराइल और अमेरिका अपने युद्ध लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। इन लक्ष्यों में ईरान के परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल कार्यक्रम और सशस्त्र समर्थन को कमजोर करना तथा ईरान की जनता को धार्मिक शासन व्यवस्था को उखाड़ फेंकने में सक्षम बनाना शामिल है। ईरान में 2000 से ज्यादा की मौत इजराइल की मंशा के विपरीत ईरान में न तो किसी विद्रोह का कोई संकेत मिला है और न ही उस लड़ाई के अंत का जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है, तेल की कीमतों में भारी उछाल ला दिया है और दुनिया के कुछ सबसे व्यस्त हवाई मार्गों को खतरे में डाल दिया है। अमेरिका और इजराइल द्वारा 28 फरवरी को शुरू किए गए इस युद्ध में 2,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। इस बीच, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात ने सोमवार तड़के कहा कि उनकी हवाई रक्षा प्रणाली मिसाइल और ड्रोन हमलों से निपट रही है, वहीं बहरीन में हवाई हमले के संकेत देने वाले सायरन बज रहे हैं। ईरान ने फारस की खाड़ी को शेष विश्व से जोड़ने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद कर दिया है और कहा है कि शत्रु देशों को छोड़कर अन्य देशों के जहाजों को वहां से गुजरने की अनुमति है, लेकिन जहाजों पर हमलों ने लगभग सभी टैंकर यातायात को रोक दिया है। वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। ट्रंप ने कहा है कि अगर ईरान जलडमरूमध्य नहीं खोलता है तो अमेरिका उसके ''ऊर्जा संयंत्रों को नष्ट कर देगा, शुरुआत सबसे बड़े संयंत्र से होगी।'' अमेरिका का तर्क है कि ईरान का रिवोल्यूशनरी गार्ड देश के अधिकांश बुनियादी ढांचे को नियंत्रित करता है और इसका उपयोग युद्ध अभियानों को शक्ति प्रदान करने के लिए करता है। वहीं ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर कलीबाफ ने 'एक्स' पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यदि ईरान के बिजली संयंत्रों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया जाता है, तो पूरे क्षेत्र के अहम बुनियादी ढांचे को वैध लक्ष्य माना जाएगा और उन्हें नष्ट कर दिया जाएगा, जिसमें खाड़ी देशों में पीने के पानी के लिए महत्वपूर्ण ऊर्जा और जल शोधन प्रतिष्ठान शामिल हैं।  

कतर एनर्जी के CEO ने ट्रंप को दिया जवाब, बार-बार कहा गैस ठिकानों को हाथ मत लगाना

दोहा  इजरायल ने अमेरिका की मदद से बुधवार रात दुनिया के सबसे बड़े गैस फील्ड साउथ पार्स पर हमला कर ईरान को आगबबूला कर दिया. जवाबी कार्रवाई करते हुए ईरान ने कतर, सऊदी, यूएई और कुवैत के तेल और गैस ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया है. सबसे अधिक नुकसान कतर को हुआ है. सरकारी तेल और गैस कंपनी कतरएनर्जी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) साद अल-काबी का कहना है कि उन्होंने लगातार इसे लेकर अमेरिका को चेताया था।  साउथ पार्स पर हमले के कुछ ही घंटों के भीतर ईरान की मिसाइलों ने कतर के रास लाफान इलाके को निशाना बनाया, जहां लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की रिफाइनरी के मुख्य ठिकाने मौजूद हैं. कतर की सरकारी गैस कंपनी के अनुसार, ईरान के हमले से समुद्री मार्ग से गैस आपूर्ति करने वाली दुनिया के सबसे बड़े गैस सिस्टम को भारी नुकसान हुआ है।  इसके प्रमुख अल-काबी, जो देश के ऊर्जा मंत्री भी हैं, ने कहा कि ईरान के हमले से इतना नुकसान हुआ है जिसे ठीक करने में तीन से पांच साल का समय लग सकता है. अल-काबी ने कहा कि उन्होंने पहले ही अधिकारियों और एग्जीक्यूटिव्स को चेताया था कि अगर ईरान के तेल-गैस ठिकानों पर हमला होता है तो हमें ऐसे खतरे झेलने पड़ सकते हैं।  समाचार एजेंसी रॉयटर्स को दिए इंटरव्यू में साद अल-काबी ने कहा, 'मैं हमेशा चेतावनी देता रहा, हमारे साथ साझेदारी करने वाली तेल और गैस कंपनियों के अधिकारियों से बात करता रहा, अमेरिकी ऊर्जा मंत्री से बात करता रहा, ताकि उन्हें इस नतीजे के बारे में आगाह कर सकूं और बता सकूं कि यह हमारे लिए नुकसानदेह हो सकता है।  कतरएनर्जी के साझेदारों में एक्सॉनमोबिल और कोनोकोफिलिप्स जैसी बड़ी अमेरिकी ऊर्जा कंपनियां शामिल हैं।  कतरएनर्जी के प्रमुख को खतरे का अंदाजा था साद अल-काबी ने कहा कि अमेरिका और उसकी कंपनियों को अंदाजा था कि अगर ईरान के गैस फील्ड पर हमला हुआ तो वो कड़ा पलटवार करेगा. उन्होंने कहा, 'उन्हें खतरे की जानकारी थी, और मैं उन्हें लगभग रोजाना याद दिलाता था, उनसे कहता था कि तेल और गैस ठिकानों पर हमलों से हमें एकदम बचने की जरूरत है।  इस संबंध में सवाल पूछे जाने पर व्हाइट हाउस की प्रवक्ता टेलर रोजर्स ने रॉयटर्स से कहा, 'राष्ट्रपति ट्रंप और उनकी पूरी ऊर्जा टीम यह सच्चाई जानती थी कि ईरान में जारी ऑपरेशन के दौरान तेल और गैस की सप्लाई में कुछ समय के लिए रुकावटें आएंगी. हमें पहले से इन रुकावटों का अंदाजा था जिसे लेकर हमने प्लानिंग की थी।  कोनोकोफिलिप्स के एक प्रवक्ता ने कहा, 'हम अपनी लंबे समय से चली आ रही साझेदारी के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं. कतरएनर्जी के साथ मिलकर चीजों को फिर से ठीक करने के लिए मिलकर काम करते रहेंगे।  ईरान के साथ अमेरिका-इजरायल युद्ध के तीन हफ्तों के दौरान मिसाइल और ड्रोन हमलों ने टैंकरों, रिफाइनरियों और अन्य एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान पहुंचाया है।  इसमें अब तक सबसे बड़ा असर कतरएनर्जी के रास लाफान पर पड़ा है, जो दुनिया का सबसे बड़ा लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) कॉम्प्लेक्स है. अल-काबी ने कहा कि 26 अरब डॉलर की लागत से बने इन संयंत्रों को हुए नुकसान से यूरोप और एशिया को एलएनजी सप्लाई पांच साल तक प्रभावित हो सकती है।  बिना किसी चेतावनी के ईरान के गैस फील्ड को इजरायल ने बनाया निशाना बुधवार को इजरायल ने ईरान के मुख्य साउथ पार्स गैस फील्ड पर हमला किया. इसके जवाब में तेहरान ने कुवैत, यूएई, सऊदी अरब और कतर के रास लाफान में एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़े हमले किए।  काबी ने कहा कि उन्हें साउथ पार्स पर हमले की कोई पूर्व चेतावनी नहीं थी. उन्होंने कहा, 'मुझे किसी भी चीज की जानकारी नहीं थी, और मुझे नहीं लगता कि किसी को भी थी. राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि उन्हें नहीं पता था. तो क्या आपको लगता है कि हमें पता होता? साउथ पार्स दुनिया के सबसे बड़े गैस फील्ड का हिस्सा है, जिसे ईरान कतर के साथ साझा करता है. कतर में इसे नॉर्थ फील्ड कहा जाता है।  काबी ने कहा कि कतरएनर्जी ने अभी तक यह आकलन नहीं किया है कि क्या बीमा युद्ध से हुए नुकसान को कवर करेगा।  रास लाफान को कितना नुकसान हुआ है? अल-काबी ने कहा कि रास लाफान पर हमले से न केवल कतर की एलएनजी निर्यात क्षमता का 17 प्रतिशत हिस्सा ठप हो गया, बल्कि नुकसान के कारण इसका असर पांच साल तक रहेगा।  काबी ने कहा, 'कोल्ड बॉक्स खत्म हो गए हैं.' कोल्ड बॉक्स कूलिंग सिस्टम होता है जो गैस को शुद्ध और लिक्विड रूप में ठंडा कर देता है ताकि उसका ट्रांसपोर्टेशन किया जा सके. कतरएनर्जी के 14 ट्रेनें कोल्ड बॉक्स में से 2 को भारी नुकसान हुआ है।  उन्होंने कहा, 'यह मुख्य यूनिट है, यही एलएनजी का कूलिंग बॉक्स है, यह पूरी तरह नष्ट हो चुका है।  रास लाफान का विस्तार भी होने वाला था लेकिन इस महीने की शुरुआत में ईरानी हमले के बाद कंपनी ने अपने संयंत्रों को खाली करा लिया है. इस देरी की वजह से 2027 से फ्रांस, जर्मनी और चीन जैसे देशों को भेजी जाने वाली गैस प्रभावित होगी।  उन्होंने कहा, 'समंदर के बीच स्थित रिफाइनरी से सभी लोगों को हटाना आसान नहीं था, आप जानते हैं, 24 घंटों में 10,000 लोगों को निकाला गया और सभी ऑपरेशंस बंद कर दिए गए. मुझे बहुत खुशी है कि कोई इस दौरान घायल नहीं हुआ, कोई मौत नहीं हुई. यह हमारे उस फैसले की वजह से हुआ।  इस विस्तार के जरिए कतर शीर्ष एलएनजी निर्यातक की अपनी स्थिति को और मजबूत करना चाहता था. इसके तहत 2027 तक कतर की तरलीकरण क्षमता 77 मिलियन टन से बढ़ाकर 126 मिलियन टन प्रति वर्ष की जानी थी।  कतरएनर्जी में अब एलएनजी का उत्पादन कब शुरू होगा? काबी ने कहा कि कतरएनर्जी का उत्पादन तभी दोबारा शुरू हो सकता है जब शत्रुता समाप्त हो जाए, और तब भी पूरी तरह लोडिंग शुरू करने में कम से कम तीन से चार महीने लगेंगे।  काबी, जो कतर एयरवेज के चेयरमैन भी हैं, ने कहा कि इस युद्ध का व्यापक असर खाड़ी की सभी अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा।  उन्होंने कहा, 'इसने पूरे क्षेत्र को 10-20 साल पीछे धकेल दिया है. पर्यटन … Read more

मिशन ईरान के करीब, ट्रंप ने सैन्य अभियान समेटने की ओर इशारा किया

वाशिंगटन अमेरिका-ईरान युद्ध के 21वें दिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक चौंकाने वाला 'एग्जिट प्लान' साझा किया है.  'ट्रुथ सोशल' पर जारी एक विस्तृत पोस्ट में ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका अपने सैन्य उद्देश्यों को पूरा करने के 'बेहद करीब' है और अब वह मध्य पूर्व में जारी अपने बड़े सैन्य अभियानों को धीरे-धीरे कम करने (Winding Down) पर विचार कर रहा है।  ट्रंप ने अपनी पोस्ट में उन उपलब्धियों को गिनाया जिन्हें वे जीत का आधार मान रहे हैं' उन्होंने कहा, 'हमने ईरान की मिसाइल क्षमता, रक्षा औद्योगिक आधार, नौसेना और वायुसेना को पूरी तरह से नष्ट कर दिया है' ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका यह सुनिश्चित करेगा कि ईरान कभी भी परमाणु हथियारों के करीब न पहुंच सके।  इस दौरान ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका ने अपने क्षेत्रीय सहयोगियों-इजरायल, सऊदी अरब, कतर, यूएई, बहरीन और कुवैत की सुरक्षा सुनिश्चित की है और आगे भी उनकी रक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहेगा।  ट्रंप के इस बयान का सबसे अहम हिस्सा 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' की सुरक्षा को लेकर था. उन्होंने साफ लहजे में कहा कि जो देश इस समुद्री रास्ते का इस्तेमाल अपने तेल और व्यापार के लिए करते हैं, अब सुरक्षा और पुलिसिंग की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि अमेरिका जरूरत पड़ने पर मदद कर सकता है, लेकिन यह जिम्मेदारी अन्य देशों को निभानी चाहिए।  ट्रंप ने तर्क दिया, 'अमेरिका इस रास्ते का उपयोग नहीं करता है, इसलिए अन्य देशों को आगे आना चाहिए'' उन्होंने इसे उन देशों के लिए एक 'आसान सैन्य अभियान' बताया और कहा कि ईरान का खतरा खत्म होने के बाद अमेरिका की मुख्य भूमिका की आवश्यकता नहीं रह जाएगी।  आपको बता दें कि 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम मार्ग है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल और गैस की सप्लाई होती है. हाल के हफ्तों में यहां हमलों और तनाव के कारण वैश्विक बाजारों पर भी असर पड़ा है. ट्रंप के इस बयान को ऐसे समय में देखा जा रहा है जब युद्ध को लगभग तीन हफ्ते हो चुके हैं और क्षेत्र में अस्थिरता बनी हुई है। 

ईरान जंग में अमेरिका का खून के आंसू रोने का कारण, 16 मिलिट्री जेट्स और टैंकर हुए तबाह

वाशिंगटन  ईरान जंग में अमेरिका को बहुत गहरी चोट लगी है. यह एक ऐसा जख्म है, जिसे डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिका जमाने तक याद रखेंगे. जी हां, ईरान युद्ध की शुरुआत से अब तक अमेरिका के 16 मिलिट्री जेट्स तबाह यानी नष्ट हो चुके हैं. इनमें ड्रोन और लड़ाकू विमान भी शामिल हैं. इसमें एक नया नाम एफ-35 फाइटर जेट का भी जुड़ गया है. इसे ईरान ने हिट किया है. इसके कारण इस विमान की इमरजेंसी लैंडिंग हुई है और इसे नुकसान पहुंचा है. इन नुकसान को देखकर लगता है कि बहुत कुछ खोकर भी ईरान ने युद्ध में अमेरिका को खून के आंसू रुला दिए हैं. ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच युद्ध 20 दिन से जारी है. 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने एक साथ मिलकर ईरान पर अटैक किया था. उस अटैक में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई मारे गए थे. तब से ही यह ईरान जंग जारी है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के साथ जंग शुरू होने के बाद से कम से कम 16 अमेरिकी सैन्य विमान नष्ट हो गए हैं. इनमें 10 MQ-9 रीपर ड्रोन शामिल हैं. इन्हें ईरान की गोलीबारी में मार गिराया गया है. अमेरिका के कई ऐसे विमान भी हैं, जिनमें क्रू मौजूद था और वे दुर्घटनाओं या हमलों में नष्ट हो गए. दावा किया गया कि सबसे अधिक नुकसान दुर्घटनाओं की वजह से हुआ. बताया गया कि कुवैत में तीन F-15 लड़ाकू विमान ‘फ्रेंडली फायर’ यानी अपनी ही सेना की गोलीबारी में गिर गए, जबकि एक KC-135 टैंकर विमान ईंधन भरने के ऑपरेशन के दौरान नष्ट हो गया, जिसमें सवार सभी छह क्रू सदस्यों की मौत हो गई. इसके अलावा सऊदी अरब के एक एयरफ़ील्ड पर ईरानी मिसाइल हमले में पांच KC-135 विमान क्षतिग्रस्त हो गए. हालांकि, ईरानी पक्ष का दावा है कि फ्रेंडली फायर नहीं, बल्कि उनके अटैक में अमेरिकी लड़ाकू विमान नष्ट हुए हैं। ईरान जंग में अमेरिका को गहरे जख्म मिले अब तक ईरानी एयर डिफेंस सिस्टम ने युद्ध के दौरान केवल बिना पायलट वाले ‘रीपर’ ड्रोन को ही सफलतापूर्वक निशाना बनाया है. इनमें से कम से कम नौ ड्रोन को हवा में ही मार गिराया गया, जबकि एक अन्य ड्रोन जॉर्डन के एक एयरफ़ील्ड पर बैलिस्टिक मिसाइल का शिकार हो गया. इसके अलावा दो अन्य ड्रोन अलग-अलग दुर्घटनाओं में नष्ट हो गए. ‘रीपर’ ड्रोन को विशेष रूप से अत्यधिक जोखिम वाले मिशनों के लिए डिजाइन किया गया है, क्योंकि इनमें कोई पायलट नहीं होता और इन्हें बदलने का खर्च भी अपेक्षाकृत कम होता है। ईरान जंग में अब भी अमेरिका का पूरा कंट्रोल नहीं ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम को बेअसर करने के लिए अमेरिका और इजराय के शुरुआती प्रयासों के बावजूद पूरी तरह से हवाई वर्चस्व हासिल करना मुश्किल साबित हुआ है. ईरानी हिट के बाद एक अमेरिकी F-35 लड़ाकू विमान को मध्य-पूर्व में स्थित एक सैन्य अड्डे पर आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी. विमान का पायलट सुरक्षित बच गया और बताया जा रहा है कि उसकी हालत स्थिर है। अमेरिका ने कबूला सच अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि ईरानी हवाई क्षेत्र पर उनका नियंत्रण अभी भी सीमित है. जॉइंट चीफ ऑफ स्टाफ के चेयरमैन डैन केन ने कहा कि अमेरिका के पास फिलहाल केवल कुछ ही जगहों पर हवाई बढ़त हासिल है. उसका नियंत्रण पूरे क्षेत्र के बजाय केवल कुछ ही इलाकों तक सीमित है। आखिर अमेरिका को हुए नुकसान की वजह क्या विशेषज्ञों का कहना है कि ऑपरेशन्स का पैमाना और उनकी तीव्रता ही शायद अधिक नुकसान की वजह हो सकती है. रॉयल ऑस्ट्रेलियन एयर फोर्स के पूर्व अधिकारी पीटर लेटन ने कहा कि इस अंतर की वजह शायद कहीं अधिक जोरदार कोशिशें हो सकती हैं. हर दिन पहले के मुकाबले अधिक उड़ानें भरी जा रही हैं. यह नुकसान अमेरिकी सेना के सामने मौजूद चुनौतियों को उजागर करता है. खास तौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम मार्गों को सुरक्षित करने के प्रयासों में, जहां सक्रिय हवाई सुरक्षा प्रणालियां अभी भी एक बड़ा खतरा बनी हुई हैं ईरान के निशाने पर आया एफ-35 जी हां, एफ-35 को अमेरिका का सबसे एडवांस फाइटर जेट माना जाता है. ईरान जंग में अब यह भी सेफ नहीं रहा. गुरुवार को ईरान की जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी F-35 स्टील्थ फाइटर जेट को निशाना बनाया गया. इसके बाद उसे मजबूरन इमरजेंसी लैंडिंग करनी पड़ी. सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, यह घटना तब हुई जब यह पांचवीं पीढ़ी का घातक फाइटर जेट ईरान के ऊपर कॉम्बैट मिशन पर उड़ान भर रहा था. अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रवक्ता कैप्टन टिम हॉकिन्स ने बताया कि ईरानी फायर के बाद विमान को मिडिल ईस्ट में स्थित अमेरिकी एयरबेस पर आपात लैंडिंग करनी पड़ी. फिलहाल, इस फाइटर जेट के नुकसान की जांच की जा रही है।

ट्रंप को चार दोस्तों ने दिया धोखा, होर्मुज में अकेले पड़े! तेल संकट में डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति हुई विफल

वाशिंगटन दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक समुद्री मार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) पर ईरान के साथ जारी तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक बड़ा कूटनीतिक झटका लगा है. ट्रंप ने उम्मीद जताई थी कि ईरान के खिलाफ मोर्चाबंदी में दुनिया की महाशक्तियां और उनके पुराने सहयोगी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होंगे, लेकिन हकीकत इसके उलट निकली।   दरअसल, ट्रंप ने सोशल मीडिया के जरिए चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन और अन्य देशों से अपील की थी कि वे भी इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग की सुरक्षा के लिए अपने नौसैनिक जहाज तैनात करें।   स्ट्रेट ऑफ होर्मुज वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम मार्ग माना जाता है और यहां से दुनिया के बड़े हिस्से तक तेल और गैस की आपूर्ति होती है. ट्रंप का तर्क था कि चूंकि इन देशों का तेल और व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है, इसलिए इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी इनकी ही होनी चाहिए. ट्रंप ने ट्वीट किया था, "दुनिया के बाकी देश अपने जहाजों की सुरक्षा खुद क्यों नहीं करते? हम सालों से उनकी रक्षा कर रहे हैं।  जापान का दो टूक जवाब सबसे बड़ा झटका टोक्यो से लगा. जापान सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह होर्मुज में किसी भी तरह के समुद्री सुरक्षा अभियान (Maritime Security Operations) पर विचार नहीं कर रही है। ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया ने भी खींचे हाथ ऑस्ट्रेलिया, जिसे प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका का सबसे वफादार साथी माना जाता है, उसने भी ट्रंप की मांग को ठुकरा दिया है. ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने स्पष्ट किया कि वे होर्मुज में अपना युद्धपोत नहीं भेजेंगे. वहीं, दक्षिण कोरिया ने थोड़ी कूटनीतिक भाषा का इस्तेमाल किया लेकिन मंशा साफ कर दी. सियोल ने कहा कि वे इस अनुरोध की 'बारीकी से समीक्षा' करेंगे, लेकिन फिलहाल युद्धपोत भेजने की कोई योजना नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अमेरिका के घटते प्रभाव का संकेत है. जिस 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' से दुनिया का 20% तेल गुजरता है, वहां सुरक्षा के नाम पर ट्रंप का साथ देने के लिए कोई भी अपना युद्धपोत जोखिम में डालने को तैयार नहीं है। तेल और गैस संकट पर फेल हुए डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान ने पुरी दुनिया के लिए अहम जलमार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद करने का फैसला किया था। अब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे खुलवाने के लिए दूसरे देशों से साथ आने की अपील कर रहे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने 7 देशों का नाम लिया और कहा कि अमेरिका तो यहां से सिर्फ 1 फीसदी तेल ही लेता है। उन्होंने कहा कि ये रास्ता चीन समेत कई देशों के लिए जरूरी है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन समेत अन्य देश जो इस समस्या से प्रभावित हैं वो इस क्षेत्र में अपने युद्धपोत भेजेंगे और रास्ता खुलवाने में अहम भूमिका निभाएंगे। अमेरिका के साथ मिलकर कई देश युद्धपोत भेजेंगे तो होर्मुज खुला रहेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने पहले ही ईरान की सैन्य क्षमता का 100 फीसदी नष्ट कर दिया है, लेकिन उनके लिए एक- दो ड्रोन भेजना, बारूदी सुरंग फोड़ना या जलमार्ग के आसपास कहीं भी कम दूरी की मिसाइल दागना आसान है, चाहे वे कितनी ही बुरी तरह हार चुके हों। क्या है प्लान ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी युद्धपोत तट पर बमबारी करते रहेंगे और ईरानी पोत को निशाने पर लेते रहेंगे। अमेरिकी नौसेना ईरानी पोतों को पानी में डुबाने का सिलसिला जारी रखेगी। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि किसी तरह से हम जल्द ही होर्मुज को खुलवा लेंगे और ये रास्ता सुरक्षित रास्ता और स्वतंत्र होगा। मालूम हो अमेरिका लंबे समय से इस रास्ते को दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल अवरोध बिंदु बताता रहा है। पल्ला झड़ाया और मदद का वादा भी किया ट्रंप ने कहा, 'मैं इन देशों से मांग कर रहा हूं कि वे आगे आएं और अपने क्षेत्र की सुरक्षा करें क्योंकि यह उनका ही क्षेत्र है।' फ्लोरिडा से वाशिंगटन लौटते समय एयर फोर्स वन विमान में पत्रकारों से बातचीत में यह भी दावा किया कि यह समुद्री मार्ग अमेरिका के लिए उतना जरूरी नहीं है, क्योंकि अमेरिका के पास तेल तक अपनी पहुंच है। ट्रंप ने कहा कि चीन को लगभग 90 प्रतिशत तेल इसी मार्ग से मिलता है, जबकि अमेरिका को वहां से बहुत कम तेल मिलता है। हालांकि उन्होंने यह बताने से इनकार कर दिया कि क्या चीन इस गठबंधन में शामिल होगा। अब तक कोई नहीं हुआ तैयार तेल की कीमतों में तेजी के बावजूद उनकी अपील पर अभी तक किसी देश ने ठोस प्रतिबद्धता नहीं जताई है। ऑस्ट्रेलिया ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दोबारा खुलवाने के लिए अपने पोत भेजने से इनकार कर दिया है। प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज की कैबिनेट की सदस्य कैथरीन किंग ने एक इंटरव्यू में कहा, 'हम स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अपना जहाज नहीं भेजेंगे। हम जानते हैं कि वह इलाका कितना अहम है, लेकिन न तो हमसे ऐसा करने के लिए कहा गया है और न ही हम इसमें अपना योगदान दे रहे हैं। जापानी संसद में प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची ने कहा कि जापान की युद्धपोत तैनात करने की कोई योजना नहीं है। उन्होंने कहा, 'जहाज भेजने को लेकर हमने अब तक कोई फैसले नहीं लिए हैं। हम अभी पता लगा रहे हैं कि जापान स्वतंत्र रूप से क्या कर सकता है और कानून के दायरे में रहकर क्या किया जा सकता है।' कुछ देश अभी विचार कर रहे हैं दक्षिण कोरिया ने संकेत दिए हैं कि वॉशिंगटन के साथ चर्चाएं जारी हैं। साथ ही कहा गया है कि कोई भी कदम गहन समीक्षा के बाद ही उठाया जाएगा। ट्रंप टाल सकते हैं चीन यात्रा रविवार को ट्रंप ने फाइनेंशियल टाइम्स को बताया कि वह उम्मीद कर रहे हैं की राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात से पहले चीन मदद के लिए तैयार हो सकता है। साथ ही उन्होंने कहा कि अगर सहयोग नहीं किया गया, तो वह अपनी यात्रा टाल सकते हैं। ट्रंप ने कहा, 'मुझे लगता है कि चीन को भी मदद करनी चाहिए, क्योंकि चीन को स्ट्रेट्स से 90 फीसदी तेल मिलता है।'    

होर्मुज संकट में ट्रंप को झटका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने मना किया, साउथ कोरिया ने दिया असमंजसपूर्ण जवाब

वाशिंगटन अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध (US-Iran War) में ईरानी घमकियों के मद्देनजर डोनाल्ड ट्रंप ने सहयोगी देशों से Hormuz Strait की सुरक्षा के लिए युद्धपोत भेजने की अपील की थी. दुनिया के 20% तेल की आवाजाही के लिए जरूरी इस समुद्री रूट को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति आर-पार के मूड में हैं और बड़ा बयान देते हुए कहा कि ये देखना दिलचस्प होगा कि कौन से देश हमारे अनुरोध को ठुकराते हैं और हमारी मदद के लिए युद्धपोत नहीं भेजता है. इस बीच बता दें कि जापान से लेकर ऑस्ट्रेलिया और तुर्की तक ने होर्मुज में अपने युद्धपोत भेजने से लगभग इनकार कर दिया है। ट्रंप बोले- हम 7 देशों से कर रहे बात  होर्मुज को लेकर ईरान की धमकियों (Iran Warnings On Hormuz) के बीच ट्रंप ने कई देशों से युद्धपोत भेजने का आह्वान बीते दिनों किया था. इस बीच एयर फोर्स वन में बोलते हुए Donald Trump ने कहा कि वह होर्मुज की निगरानी के लिए अन्य देशों से सहयोग के लिए बातचीत कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि उनका प्रशासन Hormuz Strait की सुरक्षा को लेकर 7 देशों से बातचीत कर रहा है. ट्रंप ने ईरान युद्ध के तीसरे हफ्ते में प्रवेश करने के साथ क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर इसके प्रभाव पर जोर दिया। 'मदद करे तो अच्छा, न करे तो बहुता अच्छा' Donald Trump होर्मुज स्ट्रेट को लेकर पूरी तर अब आर-पार के मूड में नजर आ रहे हैं और सहयोगी देशों से मदद की अपील में भी उनकी सख्ती साफ झलक रही है. उन्होंने कहा है कि अगर ये देश हमारी मदद करते हैं तो बहुत अच्छा है और अगर नहीं करते हैं, तो भी बहुत अच्छा है. ट्रंप ने आगे कहा कि यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन सा देश Hormuz Strait को खुला रखने जैसे छोटे से प्रयास में हमारी मदद नहीं करेगा। इन देशों से सहयोग की आस राष्ट्रपति ने कहा कि खाड़ी देशों के तेल पर निर्भर देशों को होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेनी ही चाहिए. मैं मांग करता हूं कि ये देश आगे आएं और अपने क्षेत्र की रक्षा करें, क्योंकि यह उनका क्षेत्र है, यह वह स्रोत है जहां से उन्हें ऊर्जा मिलती है. हालांकि ट्रंप ने सभी 7 देशों का नाम नहीं लिया, लेकिन उन्होंने उम्मीद जताते हुए कहा कि कई देश होर्मुज के जरिए होने वाले तेल यातायात को सुचारू रखने के लिए युद्धपोत भेजेंगे. उन्होंने चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन का नाम उन देशों में लिया, जिनसे उन्हें सहयोग की उम्मीद है. हालांकि, किसी भी देश ने अभी तक ट्रंप की इस अपील पर आगे आकर अपनी प्रतिक्रिया नहीं दी है और न ही युद्धपोत भेजे हैं। जापान-ऑस्ट्रेलिया से तुर्की तक का इनकार ट्रंप के युद्धपोत भेजने की अपील पर जापान का कहना है कि अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दूसरे देशों से होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा में मदद के लिए वॉरशिप भेजने को कहा था, लेकिन वह समुद्री सुरक्षा ऑपरेशन पर विचार नहीं कर रहा है. जापानी प्रधानमंत्री (Japan PM) का कहना है कि जापान को अभी तक US से होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों को एस्कॉर्ट करने के लिए अपनी नेवी भेजने का रिक्वेस्ट नहीं मिला है, इसलिए जवाब देना मुश्किल है। वहीं दूसरी ओर एएफपी की रिपोर्ट की मानें, तो ऑस्ट्रेलिया का कहना है कि ट्रंप के रिक्वेस्ट के बाद वह होर्मुज स्ट्रेट में नेवी शिप नहीं भेजेगा. नाटो में अमेरिका के पार्टनर तुर्की ने इस जंग से पहले ही पल्ला झाड़ लिया है. वहीं साउथ कोरिया इस बात पर ध्यान से विचार करने की बात कह रहा है कि होर्मुज स्ट्रेट में अपना वॉरशिप तैनात किया जाए या नहीं। फ्रांस ने भी झाड़ लिया पल्ला  न सिर्फ जापान, कोरिया, तुर्की और ऑस्ट्रेलिया, बल्कि अब फ्रांस की रक्षा मंत्री कैथरीन वॉट्रिन ने भी ट्रंप के अनुरोध पर दो टूक जबाव दिया है. उन्होंने कहा है कि जब तक युद्ध बढ़ता रहेगा, फ्रांस Hormuz Strait में अपने जंगी जहाज नहीं भेजेगा. वहीं जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वेडेफुल ने ऑपरेशन के बढ़ने की संभावना पर शक जताया और जर्मन ब्रॉडकास्टर ARD को बताया कि EU मिशन असरदार नहीं था, इसीलिए मुझे बहुत शक है कि एस्पाइड्स को होर्मुज तक बढ़ाने से ज्यादा सुरक्षा मिलेगी। ईरान की झमता लगभग खत्म! अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपनी बात को दोहराते हुए कहा कि ईरान की उत्पादन क्षमता लगभग खत्म हो चुकी है, यही कारण है कि वह कम मिसाइलें दाग रहा है. ऐसे में होर्मुज की सुरक्षा और निगरानी का यह एक छोटा प्रयास है, हमने पहले ही ईरान की उत्पादन क्षमता को पूरी तरह नष्ट कर दिया है. उसकी ओर से मिसाइलें ही नहीं, बल्कि दागे जा रहे ड्रोनों की संख्या भी बहुत कम हो गई है और ये पहले की तुलना में करीब 20% रह गए हैं। इन देशों से सहयोग की उम्मीद हालांकि ट्रंप ने सभी सात सरकारों का नाम नहीं लिया, लेकिन उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि कई देश होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाले समुद्री यातायात को सुचारू रखने के लिए युद्धपोत भेजेंगे, जहां से दुनिया के 20 प्रतिशत तेल का परिवहन होता है। उन्होंने चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन का नाम उन देशों में लिया जिनसे उन्हें सहयोग की उम्मीद है।  इतना खास क्यों है Hormuz? स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से वो देश सबसे ज्यादा प्रभावित हैं जो सीधे तौर पर इस चोक पॉइंट से जुड़े हैं और तेल आयात पर निर्भर हैं. भारत और चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भी सीधे तौर पर इस रास्ते पर निर्भर हैं. ऐसे में यहां रुकावट इनकी आर्थिक हालात बिगड़ने में अहम रोल निभा सकती हैं. बता दें कि होर्मुज स्ट्रेट दुनिया का सबसे अहम चोक पॉइंट है, जहां से रोजाना लगभग 20 मिलियन बैरल तेल, यानी दुनिया की कुल खपत का करीब 20 प्रतिशत, गुजरता है. इसके साथ ही दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) भी इसी रास्ते से भेजी जाती है।

ट्रंप का ईरान में सीजफायर से इनकार, कहा- जंग बंद करने की शर्तें अस्वीकार्य

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि फिलहाल ईरान के साथ युद्ध खत्म करने के लिए किसी समझौते पर बात नहीं बनी है. ट्रंप का कहना है कि ईरान समझौता करना चाहता है, लेकिन उसकी शर्तें अभी अमेरिका के लिए स्वीकार करने लायक नहीं हैं. ईरान की तरफ से उनके इस ताजा बयान पर फिलहाल कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। NBC News को दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा, "ईरान समझौता करना चाहता है, लेकिन मैं अभी इसके लिए तैयार नहीं हूं, क्योंकि उसकी शर्तें अभी अच्छी नहीं हैं." उन्होंने यह भी कहा कि अगर भविष्य में कोई समझौता होता है तो उसकी शर्तें "बहुत मजबूत" होनी चाहिए. हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि हाल-फिलहाल ईरान की तरफ से क्या शर्तें रखी गई हैं और समझौते के लिए किस तरह उनसे संपर्क किया गया है। ट्रंप ने यह भी साफ किया कि किसी भी युद्धविराम या समझौते की एक बड़ी शर्त यह होगी कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह छोड़ दे. अमेरिका लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम का विरोध करता रहा है. यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और इजरायल की जंग तीसरे हफ्ते में प्रवेश कर गई है. इन हमलों की वजह से मध्य पूर्व में तनाव लगातार बढ़ रहा है. इसका असर वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार पर भी पड़ रहा है। जंग की वजह से तेल की कीमतों में भारी उछाल लगातार हमलों के कारण अंतरराष्ट्रीय शिपिंग पर असर पड़ा है और तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है. कई विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी चिंता का कारण बनती जा रही है. ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका उन देशों से मदद मांग रहा है जिनका तेल व्यापार होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है. उनका कहना है कि इन देशों को इस अहम समुद्री रास्ते को सुरक्षित रखने में योगदान देना चाहिए। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी संख्या में तेल के टैंकर गुजरते हैं. ट्रंप ने दावा किया कि कई देशों ने इस रास्ते की सुरक्षा में मदद करने का भरोसा दिया है, हालांकि उन्होंने इन देशों के नाम नहीं बताए। होर्मुज स्ट्रेट खुलवाने के लिए दुनिया के अन्य देशों से ट्रंप की अपील राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर भी लिखा कि जो देश इस रास्ते से तेल हासिल करते हैं, उन्हें इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उठानी चाहिए. ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि कई देश अपने युद्धपोत भेज सकते हैं ताकि इस मार्ग को खुला और सुरक्षित रखा जा सके। जब उनसे पूछा गया कि क्या अमेरिकी नौसेना जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों को सुरक्षा देगी, तो ट्रंप ने सीधे जवाब नहीं दिया. उन्होंने कहा कि इस बारे में अभी कुछ कहना उचित नहीं होगा, लेकिन ऐसा होना संभव है।