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मिशन ईरान के करीब, ट्रंप ने सैन्य अभियान समेटने की ओर इशारा किया

वाशिंगटन अमेरिका-ईरान युद्ध के 21वें दिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक चौंकाने वाला 'एग्जिट प्लान' साझा किया है.  'ट्रुथ सोशल' पर जारी एक विस्तृत पोस्ट में ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका अपने सैन्य उद्देश्यों को पूरा करने के 'बेहद करीब' है और अब वह मध्य पूर्व में जारी अपने बड़े सैन्य अभियानों को धीरे-धीरे कम करने (Winding Down) पर विचार कर रहा है।  ट्रंप ने अपनी पोस्ट में उन उपलब्धियों को गिनाया जिन्हें वे जीत का आधार मान रहे हैं' उन्होंने कहा, 'हमने ईरान की मिसाइल क्षमता, रक्षा औद्योगिक आधार, नौसेना और वायुसेना को पूरी तरह से नष्ट कर दिया है' ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका यह सुनिश्चित करेगा कि ईरान कभी भी परमाणु हथियारों के करीब न पहुंच सके।  इस दौरान ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका ने अपने क्षेत्रीय सहयोगियों-इजरायल, सऊदी अरब, कतर, यूएई, बहरीन और कुवैत की सुरक्षा सुनिश्चित की है और आगे भी उनकी रक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहेगा।  ट्रंप के इस बयान का सबसे अहम हिस्सा 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' की सुरक्षा को लेकर था. उन्होंने साफ लहजे में कहा कि जो देश इस समुद्री रास्ते का इस्तेमाल अपने तेल और व्यापार के लिए करते हैं, अब सुरक्षा और पुलिसिंग की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि अमेरिका जरूरत पड़ने पर मदद कर सकता है, लेकिन यह जिम्मेदारी अन्य देशों को निभानी चाहिए।  ट्रंप ने तर्क दिया, 'अमेरिका इस रास्ते का उपयोग नहीं करता है, इसलिए अन्य देशों को आगे आना चाहिए'' उन्होंने इसे उन देशों के लिए एक 'आसान सैन्य अभियान' बताया और कहा कि ईरान का खतरा खत्म होने के बाद अमेरिका की मुख्य भूमिका की आवश्यकता नहीं रह जाएगी।  आपको बता दें कि 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम मार्ग है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल और गैस की सप्लाई होती है. हाल के हफ्तों में यहां हमलों और तनाव के कारण वैश्विक बाजारों पर भी असर पड़ा है. ट्रंप के इस बयान को ऐसे समय में देखा जा रहा है जब युद्ध को लगभग तीन हफ्ते हो चुके हैं और क्षेत्र में अस्थिरता बनी हुई है। 

ईरान जंग में अमेरिका का खून के आंसू रोने का कारण, 16 मिलिट्री जेट्स और टैंकर हुए तबाह

वाशिंगटन  ईरान जंग में अमेरिका को बहुत गहरी चोट लगी है. यह एक ऐसा जख्म है, जिसे डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिका जमाने तक याद रखेंगे. जी हां, ईरान युद्ध की शुरुआत से अब तक अमेरिका के 16 मिलिट्री जेट्स तबाह यानी नष्ट हो चुके हैं. इनमें ड्रोन और लड़ाकू विमान भी शामिल हैं. इसमें एक नया नाम एफ-35 फाइटर जेट का भी जुड़ गया है. इसे ईरान ने हिट किया है. इसके कारण इस विमान की इमरजेंसी लैंडिंग हुई है और इसे नुकसान पहुंचा है. इन नुकसान को देखकर लगता है कि बहुत कुछ खोकर भी ईरान ने युद्ध में अमेरिका को खून के आंसू रुला दिए हैं. ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच युद्ध 20 दिन से जारी है. 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने एक साथ मिलकर ईरान पर अटैक किया था. उस अटैक में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई मारे गए थे. तब से ही यह ईरान जंग जारी है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के साथ जंग शुरू होने के बाद से कम से कम 16 अमेरिकी सैन्य विमान नष्ट हो गए हैं. इनमें 10 MQ-9 रीपर ड्रोन शामिल हैं. इन्हें ईरान की गोलीबारी में मार गिराया गया है. अमेरिका के कई ऐसे विमान भी हैं, जिनमें क्रू मौजूद था और वे दुर्घटनाओं या हमलों में नष्ट हो गए. दावा किया गया कि सबसे अधिक नुकसान दुर्घटनाओं की वजह से हुआ. बताया गया कि कुवैत में तीन F-15 लड़ाकू विमान ‘फ्रेंडली फायर’ यानी अपनी ही सेना की गोलीबारी में गिर गए, जबकि एक KC-135 टैंकर विमान ईंधन भरने के ऑपरेशन के दौरान नष्ट हो गया, जिसमें सवार सभी छह क्रू सदस्यों की मौत हो गई. इसके अलावा सऊदी अरब के एक एयरफ़ील्ड पर ईरानी मिसाइल हमले में पांच KC-135 विमान क्षतिग्रस्त हो गए. हालांकि, ईरानी पक्ष का दावा है कि फ्रेंडली फायर नहीं, बल्कि उनके अटैक में अमेरिकी लड़ाकू विमान नष्ट हुए हैं। ईरान जंग में अमेरिका को गहरे जख्म मिले अब तक ईरानी एयर डिफेंस सिस्टम ने युद्ध के दौरान केवल बिना पायलट वाले ‘रीपर’ ड्रोन को ही सफलतापूर्वक निशाना बनाया है. इनमें से कम से कम नौ ड्रोन को हवा में ही मार गिराया गया, जबकि एक अन्य ड्रोन जॉर्डन के एक एयरफ़ील्ड पर बैलिस्टिक मिसाइल का शिकार हो गया. इसके अलावा दो अन्य ड्रोन अलग-अलग दुर्घटनाओं में नष्ट हो गए. ‘रीपर’ ड्रोन को विशेष रूप से अत्यधिक जोखिम वाले मिशनों के लिए डिजाइन किया गया है, क्योंकि इनमें कोई पायलट नहीं होता और इन्हें बदलने का खर्च भी अपेक्षाकृत कम होता है। ईरान जंग में अब भी अमेरिका का पूरा कंट्रोल नहीं ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम को बेअसर करने के लिए अमेरिका और इजराय के शुरुआती प्रयासों के बावजूद पूरी तरह से हवाई वर्चस्व हासिल करना मुश्किल साबित हुआ है. ईरानी हिट के बाद एक अमेरिकी F-35 लड़ाकू विमान को मध्य-पूर्व में स्थित एक सैन्य अड्डे पर आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी. विमान का पायलट सुरक्षित बच गया और बताया जा रहा है कि उसकी हालत स्थिर है। अमेरिका ने कबूला सच अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि ईरानी हवाई क्षेत्र पर उनका नियंत्रण अभी भी सीमित है. जॉइंट चीफ ऑफ स्टाफ के चेयरमैन डैन केन ने कहा कि अमेरिका के पास फिलहाल केवल कुछ ही जगहों पर हवाई बढ़त हासिल है. उसका नियंत्रण पूरे क्षेत्र के बजाय केवल कुछ ही इलाकों तक सीमित है। आखिर अमेरिका को हुए नुकसान की वजह क्या विशेषज्ञों का कहना है कि ऑपरेशन्स का पैमाना और उनकी तीव्रता ही शायद अधिक नुकसान की वजह हो सकती है. रॉयल ऑस्ट्रेलियन एयर फोर्स के पूर्व अधिकारी पीटर लेटन ने कहा कि इस अंतर की वजह शायद कहीं अधिक जोरदार कोशिशें हो सकती हैं. हर दिन पहले के मुकाबले अधिक उड़ानें भरी जा रही हैं. यह नुकसान अमेरिकी सेना के सामने मौजूद चुनौतियों को उजागर करता है. खास तौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम मार्गों को सुरक्षित करने के प्रयासों में, जहां सक्रिय हवाई सुरक्षा प्रणालियां अभी भी एक बड़ा खतरा बनी हुई हैं ईरान के निशाने पर आया एफ-35 जी हां, एफ-35 को अमेरिका का सबसे एडवांस फाइटर जेट माना जाता है. ईरान जंग में अब यह भी सेफ नहीं रहा. गुरुवार को ईरान की जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी F-35 स्टील्थ फाइटर जेट को निशाना बनाया गया. इसके बाद उसे मजबूरन इमरजेंसी लैंडिंग करनी पड़ी. सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, यह घटना तब हुई जब यह पांचवीं पीढ़ी का घातक फाइटर जेट ईरान के ऊपर कॉम्बैट मिशन पर उड़ान भर रहा था. अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रवक्ता कैप्टन टिम हॉकिन्स ने बताया कि ईरानी फायर के बाद विमान को मिडिल ईस्ट में स्थित अमेरिकी एयरबेस पर आपात लैंडिंग करनी पड़ी. फिलहाल, इस फाइटर जेट के नुकसान की जांच की जा रही है।

ट्रंप को चार दोस्तों ने दिया धोखा, होर्मुज में अकेले पड़े! तेल संकट में डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति हुई विफल

वाशिंगटन दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक समुद्री मार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) पर ईरान के साथ जारी तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक बड़ा कूटनीतिक झटका लगा है. ट्रंप ने उम्मीद जताई थी कि ईरान के खिलाफ मोर्चाबंदी में दुनिया की महाशक्तियां और उनके पुराने सहयोगी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होंगे, लेकिन हकीकत इसके उलट निकली।   दरअसल, ट्रंप ने सोशल मीडिया के जरिए चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन और अन्य देशों से अपील की थी कि वे भी इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग की सुरक्षा के लिए अपने नौसैनिक जहाज तैनात करें।   स्ट्रेट ऑफ होर्मुज वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम मार्ग माना जाता है और यहां से दुनिया के बड़े हिस्से तक तेल और गैस की आपूर्ति होती है. ट्रंप का तर्क था कि चूंकि इन देशों का तेल और व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है, इसलिए इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी इनकी ही होनी चाहिए. ट्रंप ने ट्वीट किया था, "दुनिया के बाकी देश अपने जहाजों की सुरक्षा खुद क्यों नहीं करते? हम सालों से उनकी रक्षा कर रहे हैं।  जापान का दो टूक जवाब सबसे बड़ा झटका टोक्यो से लगा. जापान सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह होर्मुज में किसी भी तरह के समुद्री सुरक्षा अभियान (Maritime Security Operations) पर विचार नहीं कर रही है। ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया ने भी खींचे हाथ ऑस्ट्रेलिया, जिसे प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका का सबसे वफादार साथी माना जाता है, उसने भी ट्रंप की मांग को ठुकरा दिया है. ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने स्पष्ट किया कि वे होर्मुज में अपना युद्धपोत नहीं भेजेंगे. वहीं, दक्षिण कोरिया ने थोड़ी कूटनीतिक भाषा का इस्तेमाल किया लेकिन मंशा साफ कर दी. सियोल ने कहा कि वे इस अनुरोध की 'बारीकी से समीक्षा' करेंगे, लेकिन फिलहाल युद्धपोत भेजने की कोई योजना नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अमेरिका के घटते प्रभाव का संकेत है. जिस 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' से दुनिया का 20% तेल गुजरता है, वहां सुरक्षा के नाम पर ट्रंप का साथ देने के लिए कोई भी अपना युद्धपोत जोखिम में डालने को तैयार नहीं है। तेल और गैस संकट पर फेल हुए डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान ने पुरी दुनिया के लिए अहम जलमार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद करने का फैसला किया था। अब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे खुलवाने के लिए दूसरे देशों से साथ आने की अपील कर रहे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने 7 देशों का नाम लिया और कहा कि अमेरिका तो यहां से सिर्फ 1 फीसदी तेल ही लेता है। उन्होंने कहा कि ये रास्ता चीन समेत कई देशों के लिए जरूरी है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन समेत अन्य देश जो इस समस्या से प्रभावित हैं वो इस क्षेत्र में अपने युद्धपोत भेजेंगे और रास्ता खुलवाने में अहम भूमिका निभाएंगे। अमेरिका के साथ मिलकर कई देश युद्धपोत भेजेंगे तो होर्मुज खुला रहेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने पहले ही ईरान की सैन्य क्षमता का 100 फीसदी नष्ट कर दिया है, लेकिन उनके लिए एक- दो ड्रोन भेजना, बारूदी सुरंग फोड़ना या जलमार्ग के आसपास कहीं भी कम दूरी की मिसाइल दागना आसान है, चाहे वे कितनी ही बुरी तरह हार चुके हों। क्या है प्लान ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी युद्धपोत तट पर बमबारी करते रहेंगे और ईरानी पोत को निशाने पर लेते रहेंगे। अमेरिकी नौसेना ईरानी पोतों को पानी में डुबाने का सिलसिला जारी रखेगी। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि किसी तरह से हम जल्द ही होर्मुज को खुलवा लेंगे और ये रास्ता सुरक्षित रास्ता और स्वतंत्र होगा। मालूम हो अमेरिका लंबे समय से इस रास्ते को दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल अवरोध बिंदु बताता रहा है। पल्ला झड़ाया और मदद का वादा भी किया ट्रंप ने कहा, 'मैं इन देशों से मांग कर रहा हूं कि वे आगे आएं और अपने क्षेत्र की सुरक्षा करें क्योंकि यह उनका ही क्षेत्र है।' फ्लोरिडा से वाशिंगटन लौटते समय एयर फोर्स वन विमान में पत्रकारों से बातचीत में यह भी दावा किया कि यह समुद्री मार्ग अमेरिका के लिए उतना जरूरी नहीं है, क्योंकि अमेरिका के पास तेल तक अपनी पहुंच है। ट्रंप ने कहा कि चीन को लगभग 90 प्रतिशत तेल इसी मार्ग से मिलता है, जबकि अमेरिका को वहां से बहुत कम तेल मिलता है। हालांकि उन्होंने यह बताने से इनकार कर दिया कि क्या चीन इस गठबंधन में शामिल होगा। अब तक कोई नहीं हुआ तैयार तेल की कीमतों में तेजी के बावजूद उनकी अपील पर अभी तक किसी देश ने ठोस प्रतिबद्धता नहीं जताई है। ऑस्ट्रेलिया ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दोबारा खुलवाने के लिए अपने पोत भेजने से इनकार कर दिया है। प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज की कैबिनेट की सदस्य कैथरीन किंग ने एक इंटरव्यू में कहा, 'हम स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अपना जहाज नहीं भेजेंगे। हम जानते हैं कि वह इलाका कितना अहम है, लेकिन न तो हमसे ऐसा करने के लिए कहा गया है और न ही हम इसमें अपना योगदान दे रहे हैं। जापानी संसद में प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची ने कहा कि जापान की युद्धपोत तैनात करने की कोई योजना नहीं है। उन्होंने कहा, 'जहाज भेजने को लेकर हमने अब तक कोई फैसले नहीं लिए हैं। हम अभी पता लगा रहे हैं कि जापान स्वतंत्र रूप से क्या कर सकता है और कानून के दायरे में रहकर क्या किया जा सकता है।' कुछ देश अभी विचार कर रहे हैं दक्षिण कोरिया ने संकेत दिए हैं कि वॉशिंगटन के साथ चर्चाएं जारी हैं। साथ ही कहा गया है कि कोई भी कदम गहन समीक्षा के बाद ही उठाया जाएगा। ट्रंप टाल सकते हैं चीन यात्रा रविवार को ट्रंप ने फाइनेंशियल टाइम्स को बताया कि वह उम्मीद कर रहे हैं की राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात से पहले चीन मदद के लिए तैयार हो सकता है। साथ ही उन्होंने कहा कि अगर सहयोग नहीं किया गया, तो वह अपनी यात्रा टाल सकते हैं। ट्रंप ने कहा, 'मुझे लगता है कि चीन को भी मदद करनी चाहिए, क्योंकि चीन को स्ट्रेट्स से 90 फीसदी तेल मिलता है।'    

होर्मुज संकट में ट्रंप को झटका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने मना किया, साउथ कोरिया ने दिया असमंजसपूर्ण जवाब

वाशिंगटन अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध (US-Iran War) में ईरानी घमकियों के मद्देनजर डोनाल्ड ट्रंप ने सहयोगी देशों से Hormuz Strait की सुरक्षा के लिए युद्धपोत भेजने की अपील की थी. दुनिया के 20% तेल की आवाजाही के लिए जरूरी इस समुद्री रूट को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति आर-पार के मूड में हैं और बड़ा बयान देते हुए कहा कि ये देखना दिलचस्प होगा कि कौन से देश हमारे अनुरोध को ठुकराते हैं और हमारी मदद के लिए युद्धपोत नहीं भेजता है. इस बीच बता दें कि जापान से लेकर ऑस्ट्रेलिया और तुर्की तक ने होर्मुज में अपने युद्धपोत भेजने से लगभग इनकार कर दिया है। ट्रंप बोले- हम 7 देशों से कर रहे बात  होर्मुज को लेकर ईरान की धमकियों (Iran Warnings On Hormuz) के बीच ट्रंप ने कई देशों से युद्धपोत भेजने का आह्वान बीते दिनों किया था. इस बीच एयर फोर्स वन में बोलते हुए Donald Trump ने कहा कि वह होर्मुज की निगरानी के लिए अन्य देशों से सहयोग के लिए बातचीत कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि उनका प्रशासन Hormuz Strait की सुरक्षा को लेकर 7 देशों से बातचीत कर रहा है. ट्रंप ने ईरान युद्ध के तीसरे हफ्ते में प्रवेश करने के साथ क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर इसके प्रभाव पर जोर दिया। 'मदद करे तो अच्छा, न करे तो बहुता अच्छा' Donald Trump होर्मुज स्ट्रेट को लेकर पूरी तर अब आर-पार के मूड में नजर आ रहे हैं और सहयोगी देशों से मदद की अपील में भी उनकी सख्ती साफ झलक रही है. उन्होंने कहा है कि अगर ये देश हमारी मदद करते हैं तो बहुत अच्छा है और अगर नहीं करते हैं, तो भी बहुत अच्छा है. ट्रंप ने आगे कहा कि यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन सा देश Hormuz Strait को खुला रखने जैसे छोटे से प्रयास में हमारी मदद नहीं करेगा। इन देशों से सहयोग की आस राष्ट्रपति ने कहा कि खाड़ी देशों के तेल पर निर्भर देशों को होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेनी ही चाहिए. मैं मांग करता हूं कि ये देश आगे आएं और अपने क्षेत्र की रक्षा करें, क्योंकि यह उनका क्षेत्र है, यह वह स्रोत है जहां से उन्हें ऊर्जा मिलती है. हालांकि ट्रंप ने सभी 7 देशों का नाम नहीं लिया, लेकिन उन्होंने उम्मीद जताते हुए कहा कि कई देश होर्मुज के जरिए होने वाले तेल यातायात को सुचारू रखने के लिए युद्धपोत भेजेंगे. उन्होंने चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन का नाम उन देशों में लिया, जिनसे उन्हें सहयोग की उम्मीद है. हालांकि, किसी भी देश ने अभी तक ट्रंप की इस अपील पर आगे आकर अपनी प्रतिक्रिया नहीं दी है और न ही युद्धपोत भेजे हैं। जापान-ऑस्ट्रेलिया से तुर्की तक का इनकार ट्रंप के युद्धपोत भेजने की अपील पर जापान का कहना है कि अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दूसरे देशों से होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा में मदद के लिए वॉरशिप भेजने को कहा था, लेकिन वह समुद्री सुरक्षा ऑपरेशन पर विचार नहीं कर रहा है. जापानी प्रधानमंत्री (Japan PM) का कहना है कि जापान को अभी तक US से होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों को एस्कॉर्ट करने के लिए अपनी नेवी भेजने का रिक्वेस्ट नहीं मिला है, इसलिए जवाब देना मुश्किल है। वहीं दूसरी ओर एएफपी की रिपोर्ट की मानें, तो ऑस्ट्रेलिया का कहना है कि ट्रंप के रिक्वेस्ट के बाद वह होर्मुज स्ट्रेट में नेवी शिप नहीं भेजेगा. नाटो में अमेरिका के पार्टनर तुर्की ने इस जंग से पहले ही पल्ला झाड़ लिया है. वहीं साउथ कोरिया इस बात पर ध्यान से विचार करने की बात कह रहा है कि होर्मुज स्ट्रेट में अपना वॉरशिप तैनात किया जाए या नहीं। फ्रांस ने भी झाड़ लिया पल्ला  न सिर्फ जापान, कोरिया, तुर्की और ऑस्ट्रेलिया, बल्कि अब फ्रांस की रक्षा मंत्री कैथरीन वॉट्रिन ने भी ट्रंप के अनुरोध पर दो टूक जबाव दिया है. उन्होंने कहा है कि जब तक युद्ध बढ़ता रहेगा, फ्रांस Hormuz Strait में अपने जंगी जहाज नहीं भेजेगा. वहीं जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वेडेफुल ने ऑपरेशन के बढ़ने की संभावना पर शक जताया और जर्मन ब्रॉडकास्टर ARD को बताया कि EU मिशन असरदार नहीं था, इसीलिए मुझे बहुत शक है कि एस्पाइड्स को होर्मुज तक बढ़ाने से ज्यादा सुरक्षा मिलेगी। ईरान की झमता लगभग खत्म! अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपनी बात को दोहराते हुए कहा कि ईरान की उत्पादन क्षमता लगभग खत्म हो चुकी है, यही कारण है कि वह कम मिसाइलें दाग रहा है. ऐसे में होर्मुज की सुरक्षा और निगरानी का यह एक छोटा प्रयास है, हमने पहले ही ईरान की उत्पादन क्षमता को पूरी तरह नष्ट कर दिया है. उसकी ओर से मिसाइलें ही नहीं, बल्कि दागे जा रहे ड्रोनों की संख्या भी बहुत कम हो गई है और ये पहले की तुलना में करीब 20% रह गए हैं। इन देशों से सहयोग की उम्मीद हालांकि ट्रंप ने सभी सात सरकारों का नाम नहीं लिया, लेकिन उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि कई देश होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाले समुद्री यातायात को सुचारू रखने के लिए युद्धपोत भेजेंगे, जहां से दुनिया के 20 प्रतिशत तेल का परिवहन होता है। उन्होंने चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन का नाम उन देशों में लिया जिनसे उन्हें सहयोग की उम्मीद है।  इतना खास क्यों है Hormuz? स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से वो देश सबसे ज्यादा प्रभावित हैं जो सीधे तौर पर इस चोक पॉइंट से जुड़े हैं और तेल आयात पर निर्भर हैं. भारत और चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भी सीधे तौर पर इस रास्ते पर निर्भर हैं. ऐसे में यहां रुकावट इनकी आर्थिक हालात बिगड़ने में अहम रोल निभा सकती हैं. बता दें कि होर्मुज स्ट्रेट दुनिया का सबसे अहम चोक पॉइंट है, जहां से रोजाना लगभग 20 मिलियन बैरल तेल, यानी दुनिया की कुल खपत का करीब 20 प्रतिशत, गुजरता है. इसके साथ ही दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) भी इसी रास्ते से भेजी जाती है।

ट्रंप का ईरान में सीजफायर से इनकार, कहा- जंग बंद करने की शर्तें अस्वीकार्य

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि फिलहाल ईरान के साथ युद्ध खत्म करने के लिए किसी समझौते पर बात नहीं बनी है. ट्रंप का कहना है कि ईरान समझौता करना चाहता है, लेकिन उसकी शर्तें अभी अमेरिका के लिए स्वीकार करने लायक नहीं हैं. ईरान की तरफ से उनके इस ताजा बयान पर फिलहाल कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। NBC News को दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा, "ईरान समझौता करना चाहता है, लेकिन मैं अभी इसके लिए तैयार नहीं हूं, क्योंकि उसकी शर्तें अभी अच्छी नहीं हैं." उन्होंने यह भी कहा कि अगर भविष्य में कोई समझौता होता है तो उसकी शर्तें "बहुत मजबूत" होनी चाहिए. हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि हाल-फिलहाल ईरान की तरफ से क्या शर्तें रखी गई हैं और समझौते के लिए किस तरह उनसे संपर्क किया गया है। ट्रंप ने यह भी साफ किया कि किसी भी युद्धविराम या समझौते की एक बड़ी शर्त यह होगी कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह छोड़ दे. अमेरिका लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम का विरोध करता रहा है. यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और इजरायल की जंग तीसरे हफ्ते में प्रवेश कर गई है. इन हमलों की वजह से मध्य पूर्व में तनाव लगातार बढ़ रहा है. इसका असर वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार पर भी पड़ रहा है। जंग की वजह से तेल की कीमतों में भारी उछाल लगातार हमलों के कारण अंतरराष्ट्रीय शिपिंग पर असर पड़ा है और तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है. कई विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी चिंता का कारण बनती जा रही है. ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका उन देशों से मदद मांग रहा है जिनका तेल व्यापार होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है. उनका कहना है कि इन देशों को इस अहम समुद्री रास्ते को सुरक्षित रखने में योगदान देना चाहिए। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी संख्या में तेल के टैंकर गुजरते हैं. ट्रंप ने दावा किया कि कई देशों ने इस रास्ते की सुरक्षा में मदद करने का भरोसा दिया है, हालांकि उन्होंने इन देशों के नाम नहीं बताए। होर्मुज स्ट्रेट खुलवाने के लिए दुनिया के अन्य देशों से ट्रंप की अपील राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर भी लिखा कि जो देश इस रास्ते से तेल हासिल करते हैं, उन्हें इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उठानी चाहिए. ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि कई देश अपने युद्धपोत भेज सकते हैं ताकि इस मार्ग को खुला और सुरक्षित रखा जा सके। जब उनसे पूछा गया कि क्या अमेरिकी नौसेना जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों को सुरक्षा देगी, तो ट्रंप ने सीधे जवाब नहीं दिया. उन्होंने कहा कि इस बारे में अभी कुछ कहना उचित नहीं होगा, लेकिन ऐसा होना संभव है।

I love India, love Modi’, प्रेसिडेंट ट्रंप ने पाकिस्तान को आतंकवाद का सबसे बड़ा निर्यातक बताया

 नई दिल्ली अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कट्टर समर्थक और धुर-दक्षिणपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता लौरा लूमर ने कहा है कि दुनिया को पाकिस्तान का सबसे बड़ा निर्यात "इस्लामी आतंकवाद" है. लौरा लूमर ने सुझाव दिया कि अमेरिका को पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार के साथ बिल्कुल भी गलबहियां नहीं करनी चाहिए. लौरा लूमर अपनी मुस्लिम विरोधी बयानबाजी के लिए जानी जाती हैं. वे स्वयं को गौरवशाली प्राउड इस्लामोफोब कहती हैं. लौरा ने जिहाद फैलाने के लिए पाकिस्तान को खुले तौर पर लताड़ा। लौरा लूमर के साथ गरमागरम चर्चा हुई. इस्लामी आतंकवाद पर तीखी टिप्पणी करते हुए लूमर ने आरोप लगाया कि दुनिया भर में हुए कई आतंकवादी हमलों के तार पाकिस्तान से जुड़े हो सकते हैं. ट्रंप के चुनाव प्रचार के दौरान उनके साथ लगातार दिखने वालीं लौरा ने जोर देकर कहा कि भारत और ब्रिटेन में हाल ही में हुए आतंकवादी हमले पाकिस्तान में सक्रिय चरमपंथी नेटवर्क से जुड़े थे। लौरा ने कहा, "दुनिया को पाकिस्तान का सबसे बड़ा निर्यात इस्लामी आतंकवाद है, और मेरा मानना ​​है कि अमेरिका को पाकिस्तानी सरकार के साथ बिल्कुल भी नज़दीकी नहीं बढ़ानी चाहिए," लौरा ने कहा कि उन्होंने कई बार अमेरिकी सरकार की इस बात के लिए आलोचना की है।  लौरा लूमर ने बातचीत के बीच कहा कि, "पाकिस्तान एक खुले तौर पर जिहादी और शरिया-समर्थक देश के तौर पर काम करता है, और जब आप दुनिया भर में हुए कई इस्लामी आतंकी हमलों को देखते हैं, तो अक्सर उनका कोई न कोई तार पाकिस्तान से जुड़ा होता है।  'आतंकवाद ज्यादातर पाकिस्तान से आ रहा है' अपने दावे को मजबूत करने के लिए लूमर ने पिछले हफ़्ते एक पाकिस्तानी नागरिक आसिफ मर्चेंट को दोषी ठहराए जाने का ज़िक्र किया. मर्चेंट पर ट्रंप और अमेरिका के बड़े नेताओं की हत्या की साजिश रचने का आरोप था। लौरा लूमर ने आगे कहा कि इस घटना से एक बात साफ हो जाती है. ज़्यादातर आतंकवाद मुख्य रूप से पाकिस्तान से ही आ रहा है. उन्होंने कहा कि आप देखते हैं कि जब भी भारत पर इस्लामिक आतंक का हमला होता है, ब्रिटेन पर इस्लामिक आतंक का हमला होता है, आप देख रहे होंगे कि यूके का इस्लामिक टेकओवर हो गया है। अमेरिकी दक्षिणपंथी एक्टिविस्ट ने कहा कि उन्होंने इस बारे में राष्ट्रपति ट्रंप से बात की है, और उन्होंने कहा है कि वे ओवल ऑफिस में इस्लामिक नेताओं की मीटिंग नहीं देखना चाहती हैं. लेकिन वे अमेरिका के राष्ट्रपति हैं और मैं उन्हें नहीं कह सकती हूं कि उन्हें क्या नहीं करना चाहिए. राष्ट्रपति ट्रंप को डिप्लोमैटिक होना पड़ता है और उन्हें दुनिया भर के नेताओं से मिलना पड़ता है. मैं समझती हूं कि राष्ट्रपति ट्रंप को जो करना होता है वे वही करते हैं. कोई सबसे बड़ी गलती यही करेगा कि वह राष्ट्रपति को बताए कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए. मैं उनके लीडरशिप में विश्वास करती हूं। इमिग्रेशन पर अपनी विवादित टिप्पणियों और कट्टर विचारों के लिए जानी जाने वाली और ट्रंप की कट्टर समर्थक लूमर ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने संदेश में PM मोदी को "एक शानदार नेता और मेरा अच्छा दोस्त" बताया है। लौरा लूमर का ये पहला भारत दौरा है. कार्यक्रम के दौरान उनसे पूछा गया कि वे प्राय: कितनी बार राष्ट्रपति ट्रंप से बात करती हैं. तो लौरा ने कहा कि इस सप्ताह मैंने तीन बार उनसे बात की है. मैं व्हाइट हाउस में उनसे मिलती रहती हूं. कुल मिलाकर मेरी उनसे बात होती रहती है. लौरा लूमर ने कहा कि राष्ट्रपति के साथ हमारी दोस्ती इस वजह से महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वे मुझ पर भरोसा करते हैं कि मैं उन्हें सलाह दे सकती हूं कि कौन उनका वफादार है और कौन नहीं। कार्यक्रम में लौरा ने कहा कि वे काफी रिसर्च करती रहती हैं और देखती रहतीं है कि राष्ट्रपति के अंडर काम करने वाले कौन-कौन लोग हैं जो उनके एजेंडे को डिरेल करने में लगे रहते हैं या फिर अमेरिका फर्स्ट एजेंडा को नुकसान पहुंचाते हैं. मैं उनको तमाम चीजों पर अपडेट करती रहती हूं. लौरा से जब पूछा गया कि क्या वे ट्रंप प्रशासन में काम करना चाहेंगी. इस पर उन्होंने कहा कि ये उनके लिए गर्व की बात होगी. लौरा ने कहा कि ट्रंप प्रशासन के कई लोग उन्हें राष्ट्रपति तक पहुंचने से रोकते रहते हैं। लौरा लूमर ने कहा कि लोगों को बुरा लग सकता है लेकिन 'इस्लाम डेथ कल्ट' है और दुनिया के लिए कैंसर है।  

ट्रंप के मंत्री ने बदला सुर, भारत पर हाई टैरिफ को पहले सही बताया, अब किया कुछ और खुलासा

नई दिल्ली मिडिल ईस्ट में भीषण जंग (Middle East Conflict) छिड़ी है. अमेरिका और इजरायल लगातार ईरान पर घातक हमले (US-Israel Iran War) कर रहे हैं, तो दूसरी ओर Iran भी जमकर मिसाइल अटैक करता नजर आ रहा है. युद्ध से बढ़ी ग्लोबल टेंशन के बीच भले भी डोनाल्ड ट्रंप के सख्त तेवर दिख रहे हैं, लेकिन उनके मंत्रियों के अब सुर बदले-बदले नजर आ रहे है. जी हां, दो महीने पहले तक अमेरिकी वित्त मंत्री भारत पर निशाना साधते हुए रूसी तेल की खरीद को लेकर लगाए गए 50% US Tariff को सही ठहरा रहे थे, तो वहीं अब कुछ अलग ही बात कहते हुए नजर आ रहे हैं। मिडिल ईस्ट जंग के बीच बड़ा बयान अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी Scott Bassent ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर (अब X) पर एक पोस्ट के जरिए जो नया बयान दिया है, वो उनकी दो महीने पहले के तेवरों से बिल्कुल अलग है. जी हां, बेसेंट, जो दो महीने पहले भारत पर निशाना साध रहे थे और ज्यादा टैरिफ को सही करार दे रहे थे, अब ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा बड़े कंज्यूमर देशों को दूसरे सोर्स खोजने के लिए बढ़ावा देने को सही ठहराते हुए नजर रहे हैं. उन्होंने कहा है कि अमेरिका दुनिया के एनर्जी मार्केट में स्थिरता के लिए मिलकर काम कर रहा है।  'हम सबसे बड़े उत्पादकों के साथ…' वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने अपनी पोस्ट में लिखा, 'US दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे ताकतवर इकोनॉमी है और अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े प्रोड्यूसर, कंज्यूमर और रिफाइनर के साथ मिलकर एनर्जी मार्केट में स्थिरता बनाए रखने के लिए काम कर रहा है, जबकि हम अपनी सेफ्टी और सिक्योरिटी के लिए खतरों को खत्म कर रहे हैं.' उन्होंने आगे कहा कि यह एक साझा मकसद है, जिसके लिए हम सब काम कर रहे हैं और हम इसी लक्ष्य को शेयर करने वाले अपने अंतरराष्ट्रीय साझेदारों को धन्यवाद देते हैं। ऐसे भारत पर साधते रहे थे निशाना गौरतलब है कि अब ट्रंप टैरिफ को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट गैरकानूनी करार दे चुका है, लेकिन बीते साल भारत पर लगाए गए 50 फीसदी के हाई टैरिफ को लेकर अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट लगातार निशाना साधते हुए नजर आ रहे थे और टैरिफ को सही ठहरा रहे थे. उन्होंने भी ट्रंप के सुर में सुर मिलाकर कहा था कि रूस से तेल खरीद कर भारत यूक्रेन युद्ध में रूसी को आर्थिक मदद पहुंचा रहा है। यही नहीं दावोस वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF Davos 2026) में भी उन्होंने रूसी तेल खरीदने वाले देशों के बारे में खुलकर बात की थी. एक इंटरव्यू के दौरान बेसेंट ने बड़ी धमकी देते हुए कहा था कि सीनेटर लिंडसे ग्राहम द्वारा सीनेट के समक्ष रखे गए उस प्रस्ताव में रूसी तेल खरीदना जारी रखने वालों को 500% टैरिफ लगाकर दंडित (500% Tariff For Buying Russian Oil) करने का प्रावधान है. हालांकि, टैरिफ पर ट्रंप को SC ने बड़ा झटका दे दिया और अब उनके मंत्री के भी सुर बदल गए हैं।

ट्रंप की हत्या की पाकिस्तान में ट्रेनिंग और ईरान से पैसा लेने वाला आतंकी आसिफ दोषी करार

तेहरान. ईरानी जासूसों द्वारा भर्ती किए गए 48 वर्षीय पाकिस्तानी नागरिक आसिफ मर्चेंट को शुक्रवार को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हत्या की साजिश रचने के आरोप में दोषी ठहराया गया है। ब्रुकलिन की एक जूरी ने दो घंटे से भी कम समय तक विचार-विमर्श करने के बाद उसे 'मर्डर-फॉर-हायर' (पैसे देकर हत्या करवाना) और आतंकवाद के आरोपों में दोषी पाया। जूरी ने मर्चेंट के उस दावे को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें उसने कहा था कि ईरान द्वारा उसके परिवार को 'धमकी' दिए जाने के कारण उसे मजबूरी में इस साजिश का हिस्सा बनना पड़ा था। बेतुकी योजना: जून 2024 में एफबीआई के खुफिया कैमरों ने क्वींस के फ्लोरल पार्क मोटर लॉज में मर्चेंट को अपने एक साथी (जो वास्तव में एफबीआई का मुखबिर था) के साथ रिपब्लिकन रैली में ट्रंप को मारने की योजना बनाते हुए कैद किया था। कागज और वेप से समझाया प्लान: मर्चेंट ने एक नोटबुक के पन्ने पर आयताकार बॉक्स बनाकर भीड़ और स्टेज को दर्शाया। फिर उसने एक तीर के निशान के ऊपर क्रीमसिकल रंग का वेप रखते हुए कहा- यह टारगेट है। यह कैसे मरेगा? एडवांस पेमेंट और गिरफ्तारी: पूर्व बैंकर रह चुके मर्चेंट ने भाड़े के हत्यारे (हिटमैन) बने दो अंडरकवर एफबीआई एजेंटों को 5000-5000 डॉलर का एडवांस भी दिया था। उसे अगस्त 2024 में अमेरिका से भागने की कोशिश करते समय गिरफ्तार कर लिया गया था। आसिफ मर्चेंट को पाकिस्तान में ट्रेनिंग मिली थी अदालत के दस्तावेजों और ट्रायल के दौरान दी गई गवाही के अनुसार, आसिफ मर्चेंट ने 2022 के अंत या 2023 की शुरुआत में पाकिस्तान में रहकर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के लिए काम करना शुरू किया था। इसी अवधि में उसे 'ट्रेडक्राफ्ट' (जासूसी और खुफिया काम करने के तरीके) का विशेष प्रशिक्षण दिया गया था, जिसमें काउंटर-सर्विलांस (निगरानी या खुफिया एजेंसियों से बचने की तकनीक) की ट्रेनिंग मुख्य रूप से शामिल थी। मर्चेंट ने अदालत में यह भी स्वीकार किया कि उसे इस बात की पूरी जानकारी थी कि IRGC एक घोषित आतंकी संगठन है। इस ट्रेनिंग को पूरा करने के बाद, 2023 में उसे ऐसे संभावित IRGC रंगरूटों की तलाश करने के लिए अमेरिका भेजा गया था, जो वहां रहकर संगठन के लिए काम कर सकें। इसके अलावा, इस पूरी अवधि के दौरान मर्चेंट अपने IRGC हैंडलर से मिलने और निर्देश प्राप्त करने के लिए बार-बार ईरान की यात्रा भी करता रहा था। मकसद और अदालत में दलीलें मर्चेंट ने अदालत में गवाही दी कि अप्रैल 2024 में उसके ईरानी हैंडलर ने उसे अमेरिका भेजा था। उसके हैंडलर ने स्पष्ट रूप से किसी एक का नाम नहीं लिया था, बल्कि तीन संभावित लक्ष्य बताए थे- डोनाल्ड ट्रंप, जो बाइडेन और निक्की हेली। इस काम के लिए उसे दस लाख डॉलर तक मिलने की उम्मीद थी। बचाव पक्ष का दावा: मर्चेंट के वकील एवी मोस्कोविट्ज ने इस साजिश को हास्यास्पद बताया और कहा कि मर्चेंट को लगा कि ईरान में उसका परिवार खतरे में है, इसलिए उसने केवल इस योजना का हिस्सा होने का नाटक किया। अदालत में 'नदीम अली' के नाम से गवाही देने वाले मुखबिर की टिप पर एफबीआई ने यह पूरा जाल बिछाया था। सरकारी वकीलों का पलटवार: एफबीआई एजेंट ने अदालत को बताया कि गिरफ्तारी के बाद मर्चेंट ने किसी धमकी का जिक्र नहीं किया था। इसके बजाय, उसने पैसे और 2020 में अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे गए शीर्ष ईरानी सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी की मौत का बदला लेने के लिए ट्रंप की हत्या की बात स्वीकार की थी। यह मुकदमा एक ऐसे समय में संपन्न हुआ है जब मध्य पूर्व में भारी तनाव है। अमेरिका और इजरायली सेनाओं के एक अभूतपूर्व सैन्य अभियान में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई और दर्जनों अन्य शीर्ष ईरानी अधिकारी मारे गए हैं, जिससे युद्ध की स्थिति और गंभीर हो गई है। इस मामले में दोषी पाए जाने के बाद, अब सजा सुनाए जाने पर आसिफ मर्चेंट को अधिकतम उम्रकैद तक की सजा हो सकती है।

रूसी तेल से और बैन हटा सकता है US

नई दिल्ली. वैश्विक कूटनीति और ऊर्जा बाजार में पिछले कुछ दिनों में एक बड़ा और हैरान करने वाला बदलाव देखने को मिला है। हमेशा आक्रामक रुख अपनाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने अचानक रूसी तेल पर लगे प्रतिबंधों में ढील दे दी। इसके साथ ही, बिना किसी शोर-शराबे के भारत ने अपने लिए एक बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक जीत हासिल कर ली है। अमेरिकी ट्रेजरी (वित्त) मंत्री स्कॉट बेसेंट ने शुक्रवार को कहा कि अमेरिकी सरकार और अधिक रूसी तेल से प्रतिबंध हटाने पर विचार कर रही है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में भारी उछाल देखा जा रहा है। इससे ठीक एक दिन पहले, अमेरिका ने भारत को मॉस्को से तेल खरीदने की अस्थायी मंजूरी दी थी। बाजार में आपूर्ति बढ़ाने की रणनीति फॉक्स बिजनेस से बात करते हुए ट्रंप के मंत्री स्कॉट बेसेंट ने शुक्रवार को कहा, 'हम अन्य रूसी तेलों से भी प्रतिबंध हटा सकते हैं।' उन्होंने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि समुद्र में करोड़ों बैरल प्रतिबंधित कच्चा तेल जहाजों पर मौजूद है। अनिवार्य रूप से, उन पर से प्रतिबंध हटाकर ट्रेजरी बाजार में एक नई सप्लाई पैदा कर सकता है। अमेरिका ने इस बात पर जोर दिया है कि इन नए कदमों का उद्देश्य मॉस्को को राहत देना बिल्कुल नहीं है। रूस पर ये प्रतिबंध यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की बातचीत में उसके आचरण के कारण लगाए गए थे। अमेरिका का कहना है कि यह नई छूट केवल उस सप्लाई को प्रभावित करेगी जो पहले से ही ट्रांजिट में है या जहाजों पर लदी है। बेसेंट ने यह भी कहा कि इस संघर्ष के दौरान बाजार को राहत पहुंचाने के लिए अमेरिका लगातार नए कदमों की घोषणा करता रहेगा, क्योंकि तेल की ऊंची कीमतें अमेरिकी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों के लिए परेशानी का सबब बन गई हैं। भारत को मिली विशेष छूट इससे पहले गुरुवार को, अमेरिकी सरकार ने आर्थिक प्रतिबंधों में अस्थायी रूप से ढील दी थी ताकि समुद्र में फंसे रूसी तेल को भारत को बेचा जा सके। अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि विभिन्न प्रतिबंध व्यवस्थाओं द्वारा रोके गए जहाजों से होने वाले लेनदेन सहित इस तरह की खरीद-फरोख्त को 3 अप्रैल, 2026 के अंत तक के लिए अधिकृत किया गया है। अचानक क्यों ढीले पड़े ट्रंप के तेवर? (अमेरिका की मजबूरी) अमेरिका द्वारा रूसी तेल पर से प्रतिबंध हटाने या ढील देने के पीछे रूस से कोई प्रेम नहीं है, बल्कि यह एक भयंकर आर्थिक और भू-राजनीतिक मजबूरी है। अमेरिका और इजरायल का ईरान के साथ जो सीधा युद्ध छिड़ गया है, उसने खाड़ी क्षेत्र में आग लगा दी है। ईरान के जवाबी हमलों के कारण 'होर्मुज जलडमरूमध्य' से होने वाला व्यापार लगभग ठप हो गया है। दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है। इस चोकपॉइंट के बंद होने से महज एक हफ्ते में कच्चे तेल की कीमतों में 30% का भारी उछाल आया है। शुक्रवार को कच्चे तेल की कीमतों में 8.5 प्रतिशत का भारी उछाल दर्ज किया गया। यह उछाल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान के बाद आया जिसमें उन्होंने कहा था कि मध्य पूर्व का यह युद्ध केवल ईरान के बिना शर्त आत्मसमर्पण पर ही समाप्त होगा। अमेरिका में बढ़ती महंगाई और पेट्रोल की ऊंची कीमतें राष्ट्रपति ट्रंप के लिए घरेलू स्तर पर राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकती हैं। ट्रंप ने भले ही ईरान के बिना शर्त आत्मसमर्पण तक युद्ध जारी रखने की बात कही हो, लेकिन वे जानते हैं कि लंबे समय तक तेल की इतनी ऊंची कीमतें अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मंदी में धकेल सकती हैं। बाजार को शांत करने के लिए अमेरिका को तुरंत किसी भी कीमत पर बाजार में तेल की जरूरत है। रूसी तेल से और बैन हटा सकता है अमेरिका: इसका मतलब क्या है? अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट का बयान बहुत नपा-तुला लेकिन स्पष्ट है। अमेरिका रूस पर लगे मूल प्रतिबंधों को खत्म नहीं कर रहा है, बल्कि एक तकनीकी ढील निकाल रहा है। बेसेंट के अनुसार, प्रतिबंधों के कारण करोड़ों बैरल रूसी कच्चा तेल वर्तमान में जहाजों पर समुद्र में फंसा हुआ है। अमेरिका इन विशेष जहाजों पर से प्रतिबंध हटाकर इस तेल को बाजार में उतारना चाहता है। इससे वैश्विक आपूर्ति बढ़ेगी और तेल की कीमतों में कुछ नरमी आएगी। वाशिंगटन इसे रूस को राहत के तौर पर पेश नहीं कर रहा है। उनका तर्क है कि यह केवल ट्रांजिट में फंसे तेल के लिए है, न कि रूस के भविष्य के तेल उत्पादन के लिए। यह अमेरिका की मजबूरी में उठाया गया कदम है ताकि वैश्विक तेल संकट को टाला जा सके। खामोश रहकर भी भारत की जीत कैसे? इस पूरे वैश्विक उथल-पुथल में भारत सबसे बड़े विजेता के रूप में उभरा है, और वह भी बिना अमेरिका से कोई सीधा टकराव मोल लिए। भारत अपनी तेल जरूरतों का 85% से अधिक आयात करता है। महंगे तेल का सीधा असर भारत की महंगाई और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। अमेरिका ने भारत को 3 अप्रैल 2026 तक समुद्र में फंसे इस रूसी तेल को खरीदने की विशेष और अस्थायी छूट दे दी है। चूंकि यह तेल प्रतिबंधित और फंसा हुआ था, इसलिए भारत इसे रूस से भारी डिस्काउंट पर खरीद सकेगा। इससे भारत का आयात बिल काफी कम होगा। भारत ने इस पूरे संकट में 'स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी' बनाए रखी। भारत ने ना तो अमेरिका का विरोध किया और ना ही रूस से अपने संबंध तोड़े। खामोश रहकर भारत ने बस सही समय का इंतजार किया। अमेरिका को वैश्विक तेल बाजार को क्रैश होने से बचाने के लिए भारत जैसे बड़े खरीदार की जरूरत थी, जो इस तेल को खपा सके। पहले जो तेल खरीदने पर भारत पर अमेरिकी प्रतिबंधों का खतरा मंडराता था, अब वही तेल भारत अमेरिकी सरकार की 'आधिकारिक मंजूरी' से खरीदेगा।

“ईरान युद्ध के बाद…” ट्रंप ने बताया अपना अगला बड़ा टारगेट

वाशिंगटन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी विदेश नीति की प्राथमिकताओं को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। वाइट हाउस में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने स्पष्ट किया कि उनके प्रशासन का वर्तमान लक्ष्य ईरान के साथ चल रहे युद्ध को समाप्त करना है, जिसके तुरंत बाद अमेरिका का पूरा ध्यान क्यूबा की ओर मुड़ जाएगा। यह बयान अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अमेरिका के अगले रणनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है। मेजर लीग सॉकर चैंपियन 'इंटर मियामी सीएफ' के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने मध्य पूर्व के संघर्ष पर चर्चा की। उन्होंने कहा, "हम पहले ईरान युद्ध को खत्म करना चाहते हैं।" उन्होंने आगे संकेत दिया कि क्यूबा के साथ संबंधों में सुधार या वहां के राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव केवल समय की बात है। ट्रंप ने दावा किया कि क्यूबा की राजधानी हवाना वाशिंगटन के साथ समझौता करने के लिए बेहद उत्सुक है। उन्होंने कहा, "क्यूबा बहुत बुरी तरह से एक डील चाहता है। जल्द ही बहुत से अद्भुत लोग वापस क्यूबा जा सकेंगे।" ईरान युद्ध में बड़ी जीत का दावा राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के खिलाफ जारी सैन्य अभियान पर एक उत्साहजनक रिपोर्ट पेश की। उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी सेना और उनके इजरायली सहयोगी दुश्मन को समय से काफी पहले ही पूरी तरह से ध्वस्त कर रहे हैं। सैन्य प्रगति का विवरण देते हुए ट्रंप ने कहा ईरान के पास अब न तो कोई वायु सेना बची है और न ही प्रभावी हवाई रक्षा प्रणाली। राष्ट्रपति ने दावा किया कि अमेरिकी सेना ने मात्र तीन दिनों के भीतर ईरान के 24 जहाजों को नष्ट कर दिया है, जिससे उनकी नौसेना की शक्ति खत्म हो गई है। हालांकि, इन सैन्य दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन ट्रंप का लहजा पूरी तरह से आक्रामक और जीत के प्रति आश्वस्त नजर आया। वार्ता की मेज पर ईरान? ट्रंप ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि ईरानी नेतृत्व अब युद्ध समाप्त करने के लिए बातचीत का रास्ता तलाश रहा है। उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा, “वे फोन कर रहे हैं और पूछ रहे हैं कि डील कैसे की जाए? मैंने उनसे कहा कि आप थोड़ा देर कर चुके हैं, अब हम उनसे ज्यादा लड़ने के इच्छुक हैं।” इसके साथ ही उन्होंने ईरानी राजनयिकों को एक अवसर भी दिया। ट्रंप ने कहा कि जो लोग सहयोग करेंगे वे एक नए और बेहतर ईरान के निर्माण में मदद कर सकते हैं, जिसमें विकास की अपार संभावनाएं होंगी। उन्होंने चेतावनी भी दी कि संघर्ष जारी रखने के परिणाम और भी गंभीर हो सकते हैं। तेल बाजार की रणनीति युद्ध के आर्थिक प्रभावों, विशेषकर तेल की कीमतों पर बोलते हुए ट्रंप ने स्वीकार किया कि इस संघर्ष की वजह से उन्हें अपनी घरेलू प्राथमिकताओं से थोड़ा भटकाव लेना पड़ा। उन्होंने कहा, "तेल की कीमतें अब काफी हद तक स्थिर हो गई हैं। हमने कीमतों को बहुत कम रखा था, लेकिन इस युद्ध के कारण हमें यह छोटा सा मोड़ लेना पड़ा।" राष्ट्रपति ने यह भी संकेत दिया कि ऊर्जा बाजारों पर दबाव कम करने के लिए जल्द ही कुछ नए उपायों की घोषणा की जा सकती है।