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सिद्धीक सैत द्वारा दान की गई भूमि पर 600 परिवारों को बेदखली का खतरा, SC में वक्फ बोर्ड ने की अपील

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने  केरल के एर्नाकुलम जिले की मुनंबम भूमि को वक्फ संपत्ति न मानने संबंधी केरल हाईकोर्ट की टिप्पणी पर अंतरिम रोक लगा दी। न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने इस मामले में अगली सुनवाई तक भूमि की यथास्थिति बनाए रखने का भी आदेश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 27 जनवरी, 2026 को होगी। हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट किया कि केरल सरकार द्वारा गठित जस्टिस सी.एन. रामचंद्रन नायर जांच आयोग के कामकाज पर कोई रोक नहीं लगाई गई है और आयोग अपनी जांच जारी रख सकता है। पीठ ने अपने आदेश में कहा- नोटिस जारी किया जाए, छह हफ्ते में जवाब दाखिल हो। मामले को 27 जनवरी 2026 को सूचीबद्ध किया जाए। तब तक हाईकोर्ट के उस आदेश की घोषणा कि विवादित संपत्ति वक्फ नहीं है, स्थगित रहेगी और यथास्थिति बनाए रखी जाए। यह स्पष्ट किया जाता है कि हमने जांच आयोग के काम पर कोई रोक नहीं लगाई है। अदालत ने यह अंतरिम आदेश केरल वक्फ संरक्षण वेदी की विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर पारित किया। याचिका में केरल हाईकोर्ट की उस डिवीजन बेंच के फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसने राज्य सरकार द्वारा गठित जांच आयोग को वैध ठहराया था और साथ ही यह टिप्पणी की थी कि मुनंबम की जमीन वक्फ संपत्ति नहीं है। क्या है पूरा विवाद? यह मामला मुनंबम की करीब 135 एकड़ भूमि से जुड़ा है, जिसे वर्ष 1950 में सिद्दीक सैत नामक व्यक्ति ने फारूक कॉलेज को दान में दिया था। उस समय इस भूमि पर स्थानीय परिवार पहले से ही रह रहे थे। बाद में कॉलेज ने भूमि के कुछ हिस्से इन्हीं निवासियों को बेच दिए। विवाद तब गहराया जब 2019 में केरल वक्फ बोर्ड ने इस जमीन को वक्फ संपत्ति के रूप में पंजीकृत कर दिया, जिससे पहले की गई बिक्री को अवैध माना गया। इसके चलते 600 से अधिक परिवारों को बेदखली का डर सताने लगा और बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। वक्फ बोर्ड के इस फैसले को कोझिकोड वक्फ ट्रिब्यूनल में चुनौती दी गई, जहां मामला अभी लंबित है। हाईकोर्ट में क्या हुआ? भूमि विवाद और बढ़ते तनाव के बीच, नवंबर 2024 में केरल सरकार ने इस मुद्दे का समाधान तलाशने के लिए पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सी.एन. रामचंद्रन नायर की अध्यक्षता में एक जांच आयोग गठित किया। इसके खिलाफ केरल वक्फ संरक्षण वेदी ने हाईकोर्ट का रुख किया और तर्क दिया कि वक्फ अधिनियम के तहत आने वाले मामलों में राज्य सरकार को हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है। हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने इस दलील से सहमति जताते हुए आयोग को रद्द कर दिया। हालांकि, अक्टूबर 2025 में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने एकल न्यायाधीश के फैसले को पलट दिया। डिवीजन बेंच ने न केवल राज्य सरकार के आयोग को वैध ठहराया, बल्कि यह भी कहा कि 2019 में वक्फ बोर्ड द्वारा जमीन का पंजीकरण कानून के विपरीत था। अदालत ने यह टिप्पणी भी की कि जमीन को वक्फ घोषित करना एक तरह की जमीन पर कब्जा करने की रणनीति जैसा प्रतीत होता है और 1950 का दस्तावेज वक्फनामा नहीं, बल्कि एक गिफ्ट डीड था। सुप्रीम कोर्ट में याचिका डिवीजन बेंच के इन निष्कर्षों को चुनौती देते हुए वक्फ संरक्षण वेदी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका में कहा गया कि हाईकोर्ट ने यह तय करके कि जमीन वक्फ है या नहीं, अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर फैसला दिया, जबकि यह मुद्दा पहले से ही वक्फ ट्रिब्यूनल में विचाराधीन है। साथ ही, यह भी तर्क दिया गया कि हाईकोर्ट का फैसला कार्यपालिका को ऐसे मामलों में हस्तक्षेप की अनुमति देता है, जहां कानूनन एक अलग वैधानिक प्रक्रिया निर्धारित है। संक्षिप्त सुनवाई के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए भूमि की स्थिति को यथावत रखने का आदेश दिया, लेकिन जांच आयोग को अपना काम जारी रखने की अनुमति दे दी। अब सभी की निगाहें 27 जनवरी, 2026 को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां इस संवेदनशील भूमि विवाद की आगे की दिशा तय होगी।  

हाईकोर्ट की सख़्ती से बढ़ी परेशानी: 600 परिवारों पर बेदखली का साया, वक्फ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट पहुँचा

नई दिल्ली  केरल वक्फ संरक्षण वेधि ने केरल हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की है, जिसमें राज्य सरकार द्वारा मुनंबम की विवादित जमीन को लेकर एक जांच आयोग गठित करने के फैसले को सही ठहराया गया था। 10 अक्टूबर को केरल हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने एकल-न्यायाधीश के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें सरकार द्वारा सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सी.एन. रामचंद्रन नायर की अध्यक्षता में स्थापित किए गए जांच आयोग को अवैध ठहराया गया था। एकल-न्यायाधीश ने मार्च में आयोग के गठन को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि वक्फ संपत्तियों से जुड़े मामले वक्फ ऐक्ट, 1995 के अधीन वक्फ बोर्ड व ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और सरकार के पास समानांतर जांच कराने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है। हालांकि डिवीजन बेंच ने फैसला उलटते हुए कहा कि केरल वक्फ बोर्ड (KWB) का 2019 में जमीन को वक्फ घोषित करना कानूनन गलत था। बेंच ने यह भी कहा कि 1950 में जमीन का जो हस्तांतरण हुआ था, वह वक्फ नहीं बल्कि एक उपहार (गिफ्ट डीड) था, और भूमि को वक्फ घोषित करने की प्रक्रिया जमीन हथियाने का प्रयास प्रतीत होती है। पूरा विवाद समझ लीजिए बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, मुनंबम की यह जमीन मूल रूप से 404.76 एकड़ थी, जो समुद्री कटाव की वजह से घटकर 135.11 एकड़ रह गई है। 1950 में सिद्धीक सैत नामक व्यक्ति ने यह जमीन फारूक कॉलेज को दान में दी थी। लेकिन तब तक यहां कई परिवार बस चुके थे, जो जमीन का उपयोग करते रहे। वक्फ बोर्ड का दावा है कि यह जमीन वक्फ से संबंधित थी, लेकिन कॉलेज द्वारा बाद के वर्षों में जो भूमि बिक्री स्थानीय निवासियों को की गई, उनमें कहीं भी वक्फ का उल्लेख नहीं था। 2019 में केरल वक्फ बोर्ड ने औपचारिक रूप से भूमि को वक्फ संपत्ति के रूप में पंजीकृत किया। इससे पहले हुए सभी बिक्री सौदे अवैध माने गए और लगभग 600 परिवारों पर बेदखली का खतरा मंडराने लगा। इस निर्णय के खिलाफ अपील कोझिकोड के वक्फ ट्रिब्यूनल में लंबित है। राज्य सरकार की कार्रवाई और विरोध परिवारों के विरोध को देखते हुए केरल सरकार ने नवंबर 2024 में न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) रामचंद्रन नायर की अध्यक्षता में एक जांच आयोग गठित किया था, ताकि विवाद का समाधान सुझाया जा सके। इसी आयोग को चुनौती देते हुए वक्फ संरक्षण समिति ने हाईकोर्ट का रुख किया था। सुप्रीम कोर्ट में दायर SLP में क्या कहा गया? केरल वक्फ संरक्षण वेधि ने अपनी याचिका में कहा है कि:     डिवीजन बेंच ने अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया, जबकि मामला वक्फ ट्रिब्यूनल में लंबित है।     हाईकोर्ट ने विवादित संपत्ति की प्रकृति (वक्फ है या नहीं) पर टिप्पणी की, जबकि यह मुद्दा उसकी सुनवाई का हिस्सा ही नहीं था।     जांच आयोग को सही ठहराकर हाईकोर्ट ने कार्यपालिका के अवैधानिक हस्तक्षेप को वैधता दे दी, जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।     यह निर्णय वैधानिक अंतिमता के सिद्धांत का उल्लंघन है, क्योंकि वक्फ मामलों पर अंतिम निर्णय ट्रिब्यूनल का होता है, न कि राज्य सरकार का। याचिका अधिवक्ता अब्दुल्ला नसीह वीटी के माध्यम से दायर की गई है। अब आगे क्या? सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि:     क्या राज्य सरकार वक्फ विवादों में जांच आयोग गठित कर सकती है?     क्या हाईकोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर भूमि की प्रकृति पर टिप्पणी की?     और क्या यह निर्णय वक्फ बोर्ड व ट्रिब्यूनल की शक्तियों का हस्तक्षेप है?     मामले पर शीर्ष अदालत की सुनवाई के बाद आगे की दिशा तय होगी। मुनंबम भूमि को वक्फ के रूप में अधिसूचित करना केरल वक्फ बोर्ड की ‘जमीन हड़पने का हथकंडा’: अदालत इसी साल 10 अक्टूबर को केरल उच्च न्यायालय ने कहा था कि मुनंबम भूमि को वक्फ के रूप में अधिसूचित करना केरल वक्फ बोर्ड की भूमि हड़पने का हथकंडा था। इसी के साथ अदालत ने विवादित भूमि के स्वामित्व का पता लगाने के लिए एक जांच आयोग नियुक्त करने के सरकारी आदेश को बरकरार रखा। न्यायमूर्ति सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति श्याम कुमार वी एम की पीठ ने कहा कि अनिवार्य प्रक्रिया और वक्फ अधिनियम 1954 और 1955 के प्रावधानों के अनुपालन के अभाव में संबंधित संपत्ति को कभी भी वक्फ संपत्ति के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता था। इसने कहा कि विवादित भूमि को वक्फ के रूप में अधिसूचित करना वक्फ अधिनियम 1954 और 1995 के प्रावधानों के विरुद्ध है और ‘केरल वक्फ बोर्ड (केडब्ल्यूबी) की भूमि हड़पने के हथकंडे से कम नहीं है।’ पीठ ने कहा कि इस कदम से उन सैकड़ों परिवारों और वास्तविक निवासियों की आजीविका प्रभावित हुई है, जिन्होंने वक्फ संपत्ति की अधिसूचना जारी होने से दशकों पहले भूखंड खरीदे थे। पीठ ने 17 मार्च के एकल न्यायाधीश के आदेश के खिलाफ अपील स्वीकार करते हुए कहा कि इन परिस्थितियों में, राज्य सरकार को जांच आयोग (आईसी) गठित करने और रिपोर्ट पेश करने से नहीं रोका जा सकता था। एकल न्यायाधीश ने अपने फैसले में जांच आयोग की नियुक्ति को रद्द कर दिया था। जांच आयोग की नियुक्ति को बरकरार रखते हुए, पीठ ने कहा कि राज्य सरकार कानून के अनुसार समिति की सिफारिशों को लागू करने के लिए स्वतंत्र है।  

सिहाड़ा गांव में जमीन विवाद: वक्फ बोर्ड का दावा, ग्रामीणों का विरोध

 खंडवा  मध्य प्रदेश के खंडवा स्थित पूरे सिहाड़ा गांव की जमीन को वक्फ बोर्ड द्वारा अपनी संपत्ति बताने से ग्रामीणों में आक्रोश है। उनका कहना है कि हम यहां बरसों से रह रहे हैं। हमारी पुरखों की जमीन को कोई कैसे अपनी बता सकता है। कुछ लोग भोपाल जाकर सरकार के संज्ञान में भी इस मामले को लाएंगे। इस बीच, मन्यायालय मप्र स्टेट वक्फ ट्रिब्यूनल भोपाल से मिले नोटिस का जवाब देने के लिए सरपंच प्रतिनिधि भोपाल रवाना हो गए हैं। सोमवार को ट्रिब्यूनल के समक्ष पेश होकर सप्रमाण जवाब दाखिल करना है। इस विवाद की शुरुआत तब हुई, जब ग्राम पंचायत ने स्थानीय दरगाह के पास अतिक्रमण और तार फेंसिंग हटाने का नोटिस दिया था। कमेटी ने नोटिस का जवाब देने के बजाय भोपाल वक्फ बोर्ड में शिकायत कर दी। वक्फ बोर्ड द्वारा आनन-फानन में दुर्भावनावश पूरे गांव का खसरा क्रमांक 781 रकबा 14.0500 हेक्टेयर जमीन को अपनी संपत्ति बताने से ग्रामीणों में हड़कंप है। न्यायालय मप्र स्टेट वक्फ ट्रिब्यूनल भोपाल से मिले नोटिस के बाद सिहाड़ा ग्राम पंचायत की ओर से सरपंच कोकिला बाई के प्रतिनिधि हेमंत चौहान अधिवक्ता के साथ सोमवार को भोपाल में नोटिस का जवाब देंगे। चौहान ने बताया कि वक्फ बोर्ड के झूठे दावे के खिलाफ जवाब के साथ आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत किए जाएंगे। गांव नहीं दरगाह की जमीन का है विवाद जिला वक्फ बोर्ड के सचिव रियाज खान ने बताया कि ग्राम पंचायत द्वारा दरगाह की जमीन को अपनी बता कर कब्जा करने का प्रयास किया जा रहा है। विवाद इस जमीन को लेकर है, पूरे गांव की जमीन को लेकर पंचायत लोगों को गुमराह कर रही है। दरगाह कमेटी को अतिक्रमण हटाने का नोटिस     न्यायालय मप्र स्टेट वक्फ ट्रिब्यूनल भोपाल से प्रशासन को अभी तक कोई नोटिस नहीं मिला है। ग्राम पंचायत सिहाड़ा द्वारा इस संबंध में अवगत करवाया गया है। स्वामित्व योजना में ड्रोन सर्वे के रिकार्ड में खुली जमीन शासकीय रिकार्ड में दर्ज है। ग्राम पंचायत के आवेदन पर दरगाह के पास खाली जमीन से दरगाह कमेटी को अतिक्रमण हटाने के लिए नोटिस दिया है। -महादेव राठौड़, तहसीलदार (ग्रामीण) खंडवा ग्रामीण बोले     नरेंद्र सिंह ने बताया कि गांव की आबादी जमीन पर वक्फ बोर्ड का दावा समझ से परे है। हमारे पूर्वज यहां के मालगुजार रहे हैं। करीब 500 साल से हम पीढ़ी-दर-पीढ़ी यहां निवासरत हैं। इसके लिए हर संभव लड़ाई लड़ी जाएगी।     लखन मालाकार ने कहा कि वक्फ बोर्ड की मनमानी नहीं चलने देंगे। यहां हिंदू -मुस्लिम परिवार मिलकर बरसों से रह रहे हैं। गांव और सरकारी जमीन को अपनी बताने वालों पर कार्रवाई होना चाहिए।     किसान रोहित मालाकार ने बताया कि गांव सिहाड़ा में हमारे बाप -दादाओं की संपत्ति शासकीय रिकार्ड में दर्ज है। वक्फ बोर्ड इसे कैसे अपनी बात सकता है। हमारे पास दस्तावेज है।     सावन राजपाली का कहना है कि खसरा क्रमांक 781 में पूरा सिहाड़ा गांव दर्ज है। हमारी संपत्ति भी इसी में है। इसका शासन को टैक्स भी जमा कर रहे हैं। शासन-प्रशासन को वस्तु स्थिति स्पष्ट करना चाहिए।  

मध्य प्रदेश में वक्फ बोर्ड की कमेटियों का लेन देन अब होगा पारदर्शी, खुलेंगे बैंक खाते, सेन्ट्रल बैंक से हुआ करार

भोपाल  मध्यप्रदेश वक्फ बोर्ड के अधीन 15 हजार वक़्फ सम्पतियां रजिस्टर्ड है। कमेटियों के बैंक खाता नहीं होने के कारण भारी अनियमिताएं होने की लगातार शिकायतें मिल रही थी। इस पर वफ्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ सनवर पटेल के सख्त निर्देश पर बोर्ड ने गहन छानबीन करते हुए बताया कि कमेटियों के बैंक खाते नहीं होने के कारण बोर्ड भारी असुविधा एवं आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा था। बैंक खाता अनिवार्य रूप से खुलवाने का फैसला राज्य के बोर्ड ने अपने काम में पारदर्शिता लाने, ऊपरी लेन देन रोकने और बोर्ड एवं कमेटियों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए बोर्ड की कमेटियों का बैंक खाता अनिवार्य रूप से खुलवाने का फैसला किया, परन्तु प्रदेश भर में कमेटियों के खाते खोलने को लेकर बैंक में बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ता था। अनेक स्थानों पर तो बैंक खाते खुल ही नहीं पाते थे। कमेटियों की इस परेशानी को दूर करने के लिए बोर्ड चेयरमैन डॉ सनवर पटेल ने बोर्ड की टीम के साथ सेन्ट्रल बैंक के जोनल हेड एवं मैनेजमेंट से अनेक दौर की चर्चा की। खाता खुलवाने का सरकुलर जारी उक्त कार्य में मध्यप्रदेश शासन के प्रमुख सचिव सहित वरिष्ठ अधिकारियों ने भी महत्वपूर्ण सहयोग एवं मार्गदर्शन किया। आज सेंट्रल बैंक ने बड़ा निर्णय लेते हुए बोर्ड के इतिहास में पहली बार अपनी सभी शाखाओं को बोर्ड की वैधानिक कमेटियों का खाता खुलवाने का सरकुलर जारी कर दिया है। ऐसी सभी वक्फ कमेटियां जिनको अपना बैंक खाता खुलवाने में परेशानी होती थी। कमेटियों के पदाधिकारी अब इस पत्र के साथ अपने जिले में सेन्ट्रल बैंक की अपने पास स्थित शाखा में जाये और अपनी वक्फ कमेटी का खाता बिना किसी परेशानी के खुलवाये।