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महिला स्व-सहायता समूहों की सफलता: सीताफल से बढ़ी आमदनी

सफलता की कहानी सीताफल उत्पादन एवं प्रसंस्करण से महिला स्व-सहायता समूहों की आर्थिक स्थिति में सुधार सिवनी जिला आजीविका संवर्धन के क्षेत्र में एक आदर्श मॉडल के रूप में उभरा भोपाल  वर्तमान में मांगलिक आयोजनों, विशेषकर विवाह समारोहों में सीताफल से निर्मित व्यंजनों, जैसे सीताफल रबड़ी की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा रही है। इस बढ़ती मांग की पूर्ति के लिये ऑफ-सीज़न में भी सीताफल पल्प का प्रसंस्करण किया जा रहा है। मध्यप्रदेश के सिवनी जिला में उत्पादित सीताफल ने स्थानीय स्तर पर महिला स्व-सहायता समूहों के माध्यम से आजीविका संवर्धन का प्रभावी माध्यम स्थापित किया है। पूर्व में आर्थिक रूप से कमजोर स्थिति में जीवन यापन कर रहीं महिलाओं की आय एवं जीवन स्तर में उल्लेखनीय सुधार आया है। आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में पहल सिवनी जिले के वन क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होने वाले सीताफल के संग्रहण, प्रसंस्करण एवं विपणन का कार्य वर्तमान में स्व-सहायता समूहों द्वारा संचालित किया जा रहा है। छपारा विकासखंड के अंतर्गत खेरमटाकोल (भूतबंधानी) स्थित महादेव ग्राम संगठन की अध्यक्ष श्रीमती अभिलाषा ने बताया कि समूह से जुड़ने के पश्चात महिलाओं को स्थायी रोजगार उपलब्ध हुआ है। वे सीताफल की पैकिंग एवं विपणन के माध्यम से वार्षिक रूप से उल्लेखनीय आय अर्जित कर रही हैं। उत्पादों का विपणन स्थानीय बाजारों के साथ-साथ राज्य के प्रमुख शहरों एवं छत्तीसगढ़ तक किया जा रहा है। सिवनी जिले में उत्पादित सीताफल की गुणवत्ता एवं स्वाद के कारण इसकी मांग राष्ट्रीय स्तर, विशेषकर महानगरों में भी बढ़ रही है। वन क्षेत्रों में सीताफल पौधों के संरक्षण एवं रखरखाव का कार्य भी महिला समूहों द्वारा किया जा रहा है। आय के स्थायी स्रोत का सृजन बरोड़ा सिवनी विकासखंड के मां दुर्गा महिला आजीविका ग्राम संगठन की अध्यक्ष श्रीमती रामप्यारी ने बताया कि सीताफल आधारित गतिविधियों से महिलाओं की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है तथा वे प्रतिवर्ष एक से डेढ़ लाख रुपये तक की आय अर्जित कर रही हैं। रोजगार सृजन एवं कौशल विकास आजीविका मिशन के अंतर्गत छपारा विकासखंड में 13 स्व-सहायता समूहों से जुड़ी सैकड़ों महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराया गया है। प्रारंभिक चरण में 200 से अधिक महिलाओं को प्रत्यक्ष रोजगार मिला। समूहों को विपणन, ग्रेडिंग, प्रसंस्करण एवं पैकेजिंग संबंधी प्रशिक्षण प्रदान किया गया है। गुणवत्तापूर्ण पैकेजिंग के माध्यम से उत्पादों को अन्य राज्यों तक सफलतापूर्वक भेजा जा रहा है। जिला परियोजना प्रबंधक श्री संजय रस्तोगी ने बताया कि सिवनी का सीताफल प्राकृतिक रूप से अत्यंत स्वादिष्ट एवं मीठा होता है। इस उत्पाद को “एक जिला एक उत्पाद” योजना में भी शामिल किया गया है, जिससे इसकी ब्रांड पहचान सुदृढ़ हुई है। सीताफल पल्प प्रसंस्करण की व्यवस्था बढ़ती मांग को ध्यान में रखते हुए सीताफल के गूदे (पल्प) का प्रसंस्करण एवं संरक्षण किया जा रहा है। जिले में स्थापित दो प्रसंस्करण इकाइयों में पल्प को निम्न तापमान पर संरक्षित कर वर्षभर उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है। इससे बड़े आयोजनों एवं बाजार की मांग के अनुरूप निरंतर आपूर्ति संभव हो पाती है। आत्मनिर्भरता की दिशा में अग्रसर सिवनी एसआरएलएम भोपाल के राज्य परियोजना प्रबंधक (कृषि) श्री मनीष पंवार ने बताया कि सिवनी जिले की महिलाएं स्व-सहायता समूहों के माध्यम से आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति कर रही हैं। अनुकूल जलवायु के कारण यहां उत्पादित सीताफल की गुणवत्ता उत्कृष्ट है, जिससे इसकी मांग निरंतर बढ़ रही है। सिवनी जिला वर्तमान में आजीविका संवर्धन के क्षेत्र में एक आदर्श मॉडल के रूप में उभर रहा है।  

चूल्हे-चौके से व्यवसाय तक: गायत्री समूह की 12 महिलाओं ने टेंट हाउस से बनाई सफलता की नई कहानी

सफलता की कहानी  चूल्हे-चौके से बिजनेस तक गायत्री समूह की 12 महिलाओं ने टेंट हाउस के जरिए लिखी सफलता की नई दास्तां आत्मनिर्भरता और सशक्तिकरण की मिसाल बना गायत्री महिला स्व-सहायता समूह रायपुर आत्मनिर्भरता और सशक्तिकरण की जीवंत मिसाल स्वयं सहायता समूहों  और सरकारी योजनाओं से जुड़कर अपने भाग्य को बदलने वाली ग्रामीण महिलाएं हैं। महिलाओं की संघर्ष यह दर्शाती है कि आत्मनिर्भरता से न केवल आर्थिक स्थिति सुधरती है, बल्कि उन्हें समाज में सम्मान और निर्णय लेने का अधिकार भी मिलता है। जहाँ महिलाएं घर से निकलकर उद्यमी बन रही हैं, आत्मनिर्भर भारत का आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।                 छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के सीपत क्षेत्र स्थित ग्राम कर्रा (हि.) की महिलाओं ने साबित कर दिया है कि यदि इरादे फौलादी हों, तो सफलता कदम चूमती है। बिहान योजना से जुड़कर गायत्री महिला स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने सामूहिक प्रयास और दृढ़ आत्मविश्वास के बल पर न केवल आर्थिक स्वावलंबन प्राप्त किया है, बल्कि समाज के सामने सशक्तिकरण का एक जीवंत उदाहरण भी पेश किया है।  ये मिसालें साबित करती हैं कि कौशल विकास, आत्मविश्वास, और वित्तीय स्वतंत्रता जैसे मुद्रा ऋण से महिलाएं न केवल अपने परिवार को बल्कि समाज को भी मजबूत कर रही हैं।  कुशल नेतृत्व और सरकारी योजनाओं का संगम              श्रीमती गौरी यादव (अध्यक्ष) और श्रीमती पांचो श्रीवास (सचिव) के कुशल नेतृत्व में संचालित इस 12 सदस्यीय समूह को शासन की योजनाओं से संबल मिला । बिहान योजना से  6 लाख रुपये का ऋण और एकीकृत महिला एवं बाल विकास विभाग से 4 लाख रुपये का ऋण। कुल निवेश 10 लाख रुपये की राशि से महिलाओं ने “श्री राम टेंट हाउस” के नाम से अपने उद्यम की शुरुआत की। विस्तार और सेवाएँ- एक सफल बिजनेस मॉडल              वर्ष 2025 में रामनवमी के अवसर पर शुरू हुआ यह व्यवसाय आज एक विशाल रूप ले चुका है। वर्तमान में समूह के पास निम्नलिखित संसाधन उपलब्ध हैं। 30×30 फीट का मंच, 60×120 फीट का विशाल पंडाल, 60 टेबल, 500 कुर्सियां और 10 जम्बो कूलर है। वैवाहिक कार्यक्रम, सामाजिक आयोजन, शोक सभा और शासकीय शिविरों (जैसे- श्सुशासन तिहारश् और जनसमस्या निवारण शिविर) में टेंट व बर्तन आपूर्ति। *लाभ के साथ सेवा भी और बर्तन बैंक का संचालन *            समूह केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी सामाजिक जिम्मेदारी भी बखूबी निभा रहा है। गरीब और जरूरतमंद परिवारों को सामाजिक कार्यों हेतु बर्तन निःशुल्क उपलब्ध कराए जाते हैं। ग्रामीणों के लिए बर्तन बैंक का संचालन किया जा रहा है, जहाँ बेहद कम दरों पर सामग्री उपलब्ध है। बिहान योजना से जुड़कर गायत्री महिला स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने सामूहिक प्रयास और दृढ़ आत्मविश्वास के माध्यम से टेंट हाउस की सेवा गाँव.गाँव पहुँचाकर आर्थिक आत्मनिर्भरता का नया अध्याय लिखा है। 10 लाख रुपये तक पहुंची वार्षिक आय           बेहतर प्रबंधन और कड़ी मेहनत का परिणाम यह है कि समूह की वार्षिक आय अब 10 लाख रुपये के करीब पहुंच गई है। स्थानीय प्रशासन के कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी ने इनकी आय और प्रतिष्ठा दोनों में वृद्धि की है। समूह की महिलाओं ने आर्थिक सशक्तिकरण की इस राह को सुगम बनाने के लिए मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय और प्रदेश सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया है। आज गायत्री महिला स्व-सहायता समूह की ये महिलाएं न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि जिले में अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनकर उभरी हैं।

2 पुरुषों से गर्भवती हुई महिला, जुड़वां बच्चे पैदा, डॉक्टर भी हैरान

कोलंबिया आज के समय में कई ऐसे कपल्स हैं जिनके जुड़वां बच्चे हैं. आमतौर पर जुड़वां बच्चों का पिता एक ही होता है लेकिन हाल ही में आए एक मामले ने मेडिकल साइंस को भी हैरत में डाल दिया है.  दरअसल, कोलंबिया एक मां ने 2 बच्चं को जन्म दिया था जो जुड़वां थे. लेकिन जब उसने डीएनए टेस्ट कराया तो सामने आया कि दोनों के पिता अलग-अलग हैं. दुनिया भर में अभी तक ऐसे सिर्फ 20 मामले ही सामने आए हैं।  डॉक्टर्स के मुताबिक इसे  'हेटेरोपैटर्नल सुपरफेकंडेशन' की स्थिति कहते हैं जो काफी दुर्लभ है जिसमें एक महिला की कोख से जन्मे 2 बच्चों के पिता के डीएनए अलग-अलग होते हैं. आखिर ये पूरा मामला क्या है, एक ही समय पर एक महिला 2 अलग-अलग पुरुषों से कैसे प्रेगनेंट हो सकती है, इस बारे में जान लीजिए।  क्या है 'सुपरफेकंडेशन' का पूरा मामला? मेडिकल साइंस की भाषा में इस स्थिति को हेटेरोपैटर्नल सुपरफेकंडेशन कहा जाता है. आमतौर पर एक महिला के ओव्यूलेशन पीरियड के दौरान एक ही एग्स रिलीज होता है लेकिन कभी-कभी शरीर 2 अंडे रिलीज कर देता है. अगर महिला बेहद कम समय के गैप में 2 अलग-अलग पुरुषों के साथ रिलेशन बना लेती है तो दोनों अंडे अलग-अलग स्पर्म से फर्टिलाइज हो सकते हैं. कोलंबिया की नेशनल यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने दावा किया है कि यह मामला 100 प्रतिशत सही है।  डॉक्टरों और रिसर्च का क्या कहना है? एक्सपर्ट का मानना है कि यह स्थिति जितनी हैरान करने वाली है, उतनी ही दुर्लभ भी है. जेनेटिक्स एक्सपर्ट्स और डॉक्टरों के अनुसार, स्पर्म महिला के शरीर में कई दिनों तक जीवित रह सकते हैं. कोलंबिया के नेशनल यूनिवर्सिटी में 'लेबोरेटरी ऑफ पॉपुलेशन जेनेटिक्स एंड आइडेंटिफिकेशन' के रिसचर्स ने बताया कि पिता को बच्चों के पितृत्व पर संदेह था जिसके बाद डीएनए जांच कराई गई. रिपोर्ट में पाया गया कि बच्चों के 'Y' क्रोमोसोम अलग-अलग पिताओं से मैच कर रहे थे जिसने इस दुर्लभ मेडिकल कंडीशन को पक्का कर दिया। 

छत्तीसगढ़ में आर्थिक और सामाजिक सशक्त हो रहीं महिला श्रमिक

सुरक्षा, सम्मान और स्वावलंबन की बन रही नई पहचान छत्तीसगढ़ में आर्थिक और सामाजिक सशक्त हो रहीं महिला श्रमिक रायपुर हर वर्ष 1 मई को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस श्रमिकों के योगदान को सम्मान देने का अवसर होता है। छत्तीसगढ़ में यह दिवस इसलिए भी खास है, क्योंकि यहां की अर्थव्यवस्था में महिला श्रमिकों की भागीदारी लगातार बढ़ रही है और उनका योगदान पहले से अधिक प्रभावी होता जा रहा है।           राज्य के ग्रामीण अंचलों में महिलाएं लंबे समय से कृषि कार्य, वनोपज संग्रहण, तेंदूपत्ता तोड़ने और हस्तशिल्प जैसे कार्यों में सक्रिय रही हैं, वहीं शहरी क्षेत्रों में उनकी उपस्थिति निर्माण कार्य, घरेलू सेवाओं और लघु व्यवसायों में तेजी से बढ़ी है। यह बदलाव केवल रोजगार तक सीमित नहीं है, बल्कि महिलाओं की सामाजिक पहचान और आत्मनिर्भरता को भी नई मजबूती दे रहा है। इसके बावजूद यह भी सच है कि असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिला श्रमिकों को लंबे समय तक उचित वेतन, सुरक्षित कार्यस्थल और सामाजिक सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहना पड़ा। वेतन असमानता, सीमित स्वास्थ्य सुविधाएं, मातृत्व लाभों की कमी और पारंपरिक सोच जैसी बाधाएं उनके सामने बनी रहीं।           मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए महिला श्रमिकों के सशक्तिकरण को प्राथमिकता दी है। नई श्रमिक नीतियों के जरिए असंगठित क्षेत्र की महिलाओं के लिए न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करने और कार्यस्थल पर सुरक्षा मानकों को लागू करने की दिशा में ठोस पहल की गई है। महिला शक्ति केंद्रों को केवल सहायता केंद्र नहीं, बल्कि परामर्श, कानूनी सहयोग और रोजगार मार्गदर्शन के प्रभावी माध्यम के रूप में विकसित किया गया है। वहीं सखी वन स्टॉप सेंटर के जरिए हिंसा से प्रभावित महिलाओं को त्वरित सहायता और पुनर्वास की सुविधा मिल रही है।          राज्य में संचालित विभिन्न योजनाएं महिला श्रमिकों के जीवन में सुरक्षा और आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार तैयार कर रही हैं। मिनीमाता महतारी जतन योजना के तहत पंजीकृत महिला निर्माण श्रमिकों को प्रसूति के बाद 20 हजार रुपये की सहायता दी जा रही है, जिससे आर्थिक दबाव कम होता है। मुख्यमंत्री सिलाई मशीन सहायता योजना महिलाओं को स्वरोजगार की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रही है, जबकि निर्माण मजदूर सुरक्षा उपकरण सहायता योजना कार्यस्थल पर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करती है।            महतारी वंदन योजना के अंतर्गत महिलाओं को प्रतिमाह 1000 रुपये की आर्थिक सहायता दी जा रही है, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति मजबूत हो रही है। दीदी ई-रिक्शा सहायता योजना के तहत 18 से 50 वर्ष आयु वर्ग की पंजीकृत निर्माण महिला श्रमिकों को, जिनका कम से कम तीन वर्षों का पंजीयन है, एक लाख रुपये तक की सहायता देकर उन्हें स्वरोजगार से जोड़ा जा रहा है।           इसके साथ ही राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे महिलाओं को आय के साधन मिलने के साथ-साथ नेतृत्व क्षमता विकसित करने का अवसर भी मिल रहा है। राज्य सरकार के कौशल विकास कार्यक्रम महिला श्रमिकों को प्रशिक्षण देकर रोजगार से जोड़ रहे हैं। घरेलू कामगारों, ठेका श्रमिकों और हमाल परिवारों के लिए विशेष योजनाएं चलाई जा रही हैं, जबकि सक्षम योजना के जरिए विधवा, परित्यक्ता और तलाकशुदा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया जा रहा है।          आज छत्तीसगढ़ में महिला श्रमिक केवल श्रमशक्ति नहीं रहीं, बल्कि विकास की सक्रिय भागीदार बन चुकी हैं। उनकी भूमिका अब सहायक तक सीमित नहीं, बल्कि निर्णय लेने तक पहुंच रही है। योजनाओं की बढ़ती पहुंच और जागरूकता के कारण उनके भीतर आत्मविश्वास बढ़ा है, जिससे समाज में उनका सम्मान भी लगातार बढ़ रहा है।            छत्तीसगढ़ में महिला श्रमिकों के लिए किए जा रहे प्रयास यह स्पष्ट करते हैं कि संवेदनशील नीतियों और प्रभावी क्रियान्वयन के जरिए सकारात्मक बदलाव संभव है। सुरक्षा, सम्मान और रोजगार के अवसरों के साथ महिला श्रमिक आज राज्य के विकास की मजबूत आधारशिला बन रही हैं। यह परिवर्तन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और सशक्तिकरण का भी प्रतीक बनकर उभर रहा है। डॉ. दानेश्वरी सम्भाकर उप संचालक (जनसंपर्क)

योगी सरकार के 9 वर्षों में विकास के पहिए ने पकड़ी रफ्तार, तराई के 1500 गांवों में फैला दूध का कारोबार

तराई में आई श्वेतक्रांति से 51 हजार महिलाएं बनीं उद्यमी योगी सरकार के 9 वर्षों में विकास के पहिए ने पकड़ी रफ्तार, तराई के 1500 गांवों में फैला दूध का कारोबार हर महीने 03, 13 और 23 तारीख को आता है सभी के खाते में पैसा तराई के छह जिलों में ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं बना रहीं रिकॉर्ड एक लाख लीटर से ज्यादा प्रतिदिन की बिक्री से महिलाओं ने किया सवा दो सौ करोड़ से ज्यादा का कारोबार लखनऊ  उत्तर प्रदेश के तराई और आसपास के क्षेत्र अब महिला सशक्तीकरण और आर्थिक क्रांति का नया केंद्र बन चुके हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में आई श्वेतक्रांति ने बरेली, लखीमपुर खीरी, पीलीभीत, शाहजहांपुर, सीतापुर और रामपुर जैसे जिलों की दिशा और दशा बदल दी है। यहां 1500 गांवों में फैले दुग्ध व्यवसाय के जरिए 51 हजार महिलाएं उद्यमी बनकर आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रही हैं। इन सभी महिलाओं के खाते में हर महीने 03, 13 और 23 तारीख को पैसा आ जाता है। सृजनी एमपीसीएल के नेतृत्व में तराई के इन जिलों में अब हर सुबह दूध संग्रहण किया जाता है, जहां महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से उत्पादन से लेकर संग्रहण और विपणन तक की पूरी जिम्मेदारी संभाल रहीं हैं। परिणामस्वरूप क्षेत्र में प्रतिदिन एक लाख लीटर से अधिक दूध का कारोबार हो रहा है और अब तक महिलाएं सवा दो सौ करोड़ रुपये से ज्यादा का व्यवसाय कर चुकीं हैं। जो क्षेत्र पहले विकास की दौड़ में पिछड़े माने जाते थे, वहीं योगी सरकार के कार्यकाल में अब महिलाओं की मेहनत से नई आर्थिक पहचान बन रही है और गांव-गांव में रोजगार के अवसर सृजित हो रहे हैं। गांव की अर्थव्यवस्था की प्रमुख संचालक बन रहीं महिलाएं इस परिवर्तन के पीछे उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन की महत्वपूर्ण भूमिका है, जिसने महिलाओं को प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और बाजार से जोड़ने का काम किया। इसी का परिणाम है कि महिलाएं अब केवल सहयोगी नहीं, बल्कि गांव की अर्थव्यवस्था की प्रमुख संचालक बन गईं हैं। छह हजार से अधिक गांवों में सक्सेज मॉडल  प्रदेश स्तर पर भी यह बदलाव साफ दिखाई दे रहा है। उत्तर प्रदेश आज दुग्ध उत्पादन में देश में अग्रणी बन चुका है, जहां ग्रामीण महिलाएं प्रतिदिन लगभग 10 लाख लीटर दूध का संग्रहण कर रहीं हैं। 31 जिलों में महिलाओं ने पांच हजार करोड़ रुपये का कारोबार किया है और छह हजार से अधिक गांवों में इस मॉडल ने अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। तराई की यह श्वेतक्रांति केवल आर्थिक उन्नति की कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का भी सशक्त उदाहरण है। महिलाएं अब आत्मनिर्भर बनकर न केवल अपने परिवार बल्कि पूरे प्रदेश की अर्थव्यवस्था को नई गति दे रही हैं।

महिला ने कहा- पति नहीं चाहिए, लेकिन उसके स्पर्म से बच्चा चाहती हूं, हाईकोर्ट का दिमाग हुआ चकराया

मुंबई  मुंबई की एक महिला का अनोखा कानूनी विवाद अब दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच गया है. 46 साल की यह महिला अपने अलग रह रहे पति के साथ बनाए गए 16 फ्रीज्ड भ्रूण (एम्ब्रियो) का इस्तेमाल कर मां बनना चाहती है. हालांकि पति इसके लिए रजामंदी नहीं दे रहा है. इसी को लेकर अब महिला ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है और कहा है कि उसकी ‘मातृत्व की आखिरी उम्मीद’ कानूनी अड़चनों के कारण खत्म हो रही है। यह मामला दक्षिण मुंबई के एक दंपती से जुड़ा है, जिन्होंने 2021 में शादी की थी. इसके बाद 2022 में दोनों ने आईवीएफ प्रक्रिया के तहत पति के स्पर्म और पत्नी के अंडाणु से 16 भ्रूण तैयार कर उन्हें एक फर्टिलिटी क्लिनिक में फ्रीज करवा दिया था. हालांकि 2023 में दोनों के रिश्ते खराब हो गए और वे अलग रहने लगे. इसके बाद इन भ्रूणों के इस्तेमाल को लेकर विवाद शुरू हो गया। महिला ने पहले बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, लेकिन बाद में इसे वापस लेकर राष्ट्रीय असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) और सरोगेसी बोर्ड के पास पहुंची. बोर्ड ने फरवरी 2026 में उसकी मांग को खारिज कर दिया. इसके बाद महिला ने अब दिल्ली हाईकोर्ट में नई याचिका दायर कर दी है। पति की सहमति बनी कानूनी अड़चन रिपोर्ट के मुताबिक, महिला का कहना है कि वह अपनी फ्रीज्ड एम्ब्रियो को एक क्लिनिक से दूसरे क्लिनिक में ट्रांसफर कराकर गर्भधारण करना चाहती है. लेकिन असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021 के तहत भ्रूण के इस्तेमाल या ट्रांसफर के लिए पति-पत्नी दोनों की सहमति जरूरी होती है. महिला का आरोप है कि उसका पति जानबूझकर सहमति नहीं दे रहा और इस तरह वह उसके मातृत्व के अधिकार को रोक रहा है। ‘मातृत्व का आखिरी मौका छिन रहा’ अपनी याचिका में महिला ने कहा कि उसकी उम्र 46 साल हो चुकी है और अब उसके पास मां बनने का बहुत कम समय बचा है. उसने अदालत से कहा कि अगर जल्द फैसला नहीं हुआ तो वह अपने ही जेनेटिक मटेरियल से मां बनने का मौका हमेशा के लिए खो सकती है. महिला ने यह भी बताया कि गर्भधारण की उम्मीद में उसने फरवरी 2024 में एक बड़ी गर्भाशय सर्जरी भी करवाई थी, जिसका पूरा खर्च उसने खुद उठाया। पति पर गंभीर आरोप याचिका में महिला ने अपने पति पर दुर्व्यवहार और छोड़ देने का आरोप लगाया है. उसका कहना है कि पति ने ‘दुर्भावना से’ अपनी सहमति रोक रखी है, जबकि उसके खिलाफ वैवाहिक और आपराधिक मामले पहले से चल रहे हैं. महिला के मुताबिक उसका पति पहले से ही अपनी पिछली शादी से एक बच्चे का पिता है, लेकिन फिर भी वह उसे मां बनने से रोक रहा है। महिला का कहना है कि एआरटी एक्ट के सेक्शन 22 के अनुसार शादी के दौरान बने भ्रूण के इस्तेमाल के लिए पति-पत्नी दोनों की सहमति जरूरी है, लेकिन कानून में यह साफ नहीं है कि अगर शादी पूरी तरह टूट चुकी हो या पति पत्नी को छोड़ चुका हो तो क्या होगा. याचिका में कहा गया है कि यह ‘कानूनी खालीपन’ उन महिलाओं के लिए बड़ी समस्या बन जाता है, जिनकी शादी खत्म होने की कगार पर है लेकिन कानूनी तौर पर तलाक नहीं हुआ है। मुस्लिम पर्सनल लॉ भी बना बाधा महिला ने अदालत को बताया कि उसके सामने दोहरी कानूनी समस्या है. एक तरफ पति की सहमति न होने के कारण वह एम्ब्रियो का इस्तेमाल नहीं कर सकती, दूसरी ओर मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत आईवीएफ जैसी प्रक्रिया सिर्फ वैध शादी के दौरान ही स्वीकार्य मानी जाती है. ऐसे में अगर वह तलाक ले लेती है तो भी आईवीएफ कराकर बच्चा पैदा करना संभव नहीं रहेगा। अदालत से क्या मांग की? महिला ने दिल्ली हाईकोर्ट से मांग की है कि उसे पति की सहमति के बिना एम्ब्रियो को दूसरे क्लिनिक में ट्रांसफर करने और उन्हें अपने गर्भ में प्रत्यारोपित कराने की अनुमति दी जाए. इसके अलावा उसने अदालत से यह भी कहा है कि एआरटी एक्ट की कुछ धाराओं की व्याख्या बदली जाए या फिर राष्ट्रीय एआरटी बोर्ड को निर्देश दिया जाए कि वह ऐसे मामलों के लिए कानून में संशोधन की सिफारिश करे। महिला ने अदालत से इस मामले में जल्द सुनवाई की मांग की है, क्योंकि उसकी उम्र और घटती प्रजनन क्षमता को देखते हुए समय बेहद महत्वपूर्ण है. बताया जा रहा है कि दिल्ली हाईकोर्ट आने वाले कुछ हफ्तों में इस याचिका पर सुनवाई कर सकता है।

सफलता की मिसाल: पारंपरिक हस्तशिल्प ने बदल दी लोगों की आजीविका

सफलता की कहानी : पारंपरिक हस्तशिल्प उत्पाद बना आजीविका का साधन स्व सहायता समूह से जुड़कर कांसाबेल की महिलाओं ने स्वरोजगार की राह अपनाई रायपुर  पारंपरिक कौशल, जैसे मिट्टी के बर्तन, कढ़ाई और लकड़ी का काम, स्थानीय सामग्रियों का उपयोग कर पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों के माध्यम से न केवल रोजगार प्रदान करता है, बल्कि सांस्कृतिक विरासत को भी संरक्षित करता है। मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय के नेतृत्व में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन – बिहान योजना के तहत जशपुर जिले की ग्रामीण महिलाएं आत्मनिर्भरता की मिसाल गढ़ रही हैं। कांसाबेल विकासखंड के ग्राम सेम्हर कछार की हरियाली स्व-सहायता समूह की 11 महिलाओं ने छिंद कासा से आकर्षक टोकरी और अन्य पारंपरिक हस्तशिल्प उत्पाद तैयार कर अपनी आजीविका को मजबूत किया है।          समूह की सदस्य मती बालमुनि भगत ने बताया कि बिहान योजना से जुड़ने के बाद उन्हें स्वरोजगार का अवसर मिला। पहले महिलाएं केवल घरेलू कामकाज तक सीमित थीं, लेकिन अब वे अच्छी कमाई कर रही हैं। यह कार्य महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के साथ-साथ आत्मविश्वास भी दे रहा है। उन्होंने बताया कि यह न केवल एक व्यवसाय है, बल्कि यह परंपराओं, कौशल और सांस्कृतिक विरासत को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाता है।            महिलाओं ने बताया कि बिहान योजना ने उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया है। समूह के माध्यम से प्रशिक्षण, सहयोग और विपणन सुविधा मिलने से उनका उत्पाद अब स्थानीय हाट-बाजार और मेलों में लोकप्रिय हो चुका है। महिलाएं कहती हैं कि अब वे सिर्फ घर तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि अपनी पहचान खुद बना रही हैं।        समूह की दीदियों ने मुख्यमंत्री  विष्णुदेव साय और जिला प्रशासन का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि शासन की योजनाओं से हम सशक्त और आत्मनिर्भर हो रहे हैं। हम महिलाओं के लिए हस्तशिल्प उत्पाद आय का मुख्य जरिया है, जो लाखों लोगों को, विशेषकर महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रहा है।

Jalandhar में अकेली महिला ने दो बदमाशों का किया मुकाबला

जालंधर. जालंधर देहात के किशनगढ़–कर्टारपुर रोड पर गांव फरीदपुर स्टॉप के पास दिनदहाड़े लूट की वारदात सामने आई है। कपूरथला निवासी ज्योति रानी एक्टिवा पर दुगरी गांव जा रही थीं। रास्ते में मोटरसाइकिल सवार दो लुटेरों ने उनका पीछा किया। महिला को शक होने पर वह फरीदपुर स्टॉप पर रुककर दुकान की ओर गईं, तभी एक लुटेरे ने उनका पर्स छीनने की कोशिश की। विरोध करने पर आरोपी ने तेजधार हथियार से हमला कर दिया। घायल होने के बावजूद महिला ने साहस दिखाया, लेकिन बदमाश हथियार दिखाकर पर्स लेकर फरार हो गए। पर्स में करीब 20 हजार रुपये की विदेशी मुद्रा, पासपोर्ट और जरूरी दस्तावेज थे। वारदात के दौरान आसपास मौजूद लोग तमाशबीन बने रहे और किसी ने मदद नहीं की। पुलिस चौकी किशनगढ़ के प्रभारी एएसआई राजेंद्र शर्मा ने बताया कि सीसीटीवी फुटेज खंगाली जा रही है और आरोपियों की पहचान कर उनकी गिरफ्तारी के प्रयास किए जा रहे हैं।

मध्य प्रदेश में सरकारी नौकरी में महिलाओं की हिस्सेदारी 3 साल में ढाई फीसदी बढ़ी, आधी दुनिया की ताकत में इजाफा

भोपाल  मप्र में पुरुषों के मुकाबले सरकारी नौकरी में महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। बीते तीन साल में ही बढ़ोतरी तकरीबन ढाई प्रतिशत देखी गई। जबकि पुरुषों का प्रतिशत घट गया। आर्थिक सांख्यिकी विभाग की रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है। खास बात यह है कि क्लास-वन, क्लास-टू और क्लास-थ्री श्रेणी में महिलाओं की संख्या बीते वर्षों की तुलना में बढ़ी है। ये सब श्रेणियां अफसर के स्तर की होती हैं। तीनों में प्रतिशत 30 से ऊपर है, जबकि चतुर्थ श्रेणी में प्रतिशत 20.54 है। क्लास-टू में तो आंकड़ा 33 प्रतिशत से भी अधिक हो गया है। प्रदेश के कुल 22 विश्वविद्यालयों में जरूर महिलाओं की संख्या घटी है। दो विवि ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विवि और महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विवि उज्जैन में तो एक-एक ही महिला रह गई हैं। भोपाल के राष्ट्रीय विधि संस्थान विवि (एनएलआईयू) में सिर्फ तीन महिलाएं हैं। यह दस फीसदी से भी कम है। सर्वाधिक 37 से अधिक महिलाएं भोपाल के हिंदी विवि में हैं। नौकरियां घटीं… 2024 के मुकाबले 2025 में 16,396 नौकरी कम हुईं रिपोर्ट में यह जानकारी भी सामने आई कि सरकार के 54 विभागों में एक मार्च 2024 से एक मार्च 2025 के बीच सिर्फ 282 लोगों को नियमित (रेग्यूलर) नौकरी मिली है। यानी आंकड़ा 6 लाख 6 हजार 876 से बढ़कर 6 लाख 7 हजार 158 हुआ जो सिर्फ 0.05 प्रतिशत बढ़ोतरी बता रहा है। दूसरी तरफ सरकारी नौकरी से इतर राज्य के सार्वजनिक उपक्रम व अर्द्धशासकीय संस्थाओं में संख्या 3447 घट गई। पांच सालों में 2021 से 2025 के बीच सार्वजनिक उपक्रम व अर्द्धशासकीय संस्थाओं में 15 हजार लोगों की नौकरी घटी है। यही हाल नगरीय निकायों का भी है। यहां 450 नौकरी कम हुई। ग्रामीण निकायों में 38, विकास प्राधिकरण व विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण में 98 और विवि में 130 नौकरियां कम हुई हैं। तमाम वर्गों को देखें तो 2024 के मुकाबले मप्र में 2025 में 16 हजार 396 नौकरी कम हुई है। नियमित कर्मचारी… भोपाल-इंदौर में और स्कूल शिक्षा में सर्वाधिक सरकार के नियमित कर्मचारियों में 39.8% जिलों में काम करते हैं। इसमें भोपाल में सर्वाधिक नियमित कर्मियों की संख्या 6.65% है। दूसरे नंबर पर इंदौर 4.47, फिर ग्वालियर 3.50 और धार 3.36 प्रतिशत है। इसी तरह प्रदेश में कुल नियमित कर्मचारियों में सर्वाधिक 37.66% लोग स्कूल शिक्षा विभाग में पदस्थ हैं। दूसरा नंबर गृह विभाग का है, जहां 15.18% लोग हैं। इसके बाद तीसरे और चौथे नंबर पर क्रमश आदिम जाति व अनुसूचित जाति कल्याण एवं लोक स्वास्थ्य व परिवार कल्याण विभाग आते हैं।

अलीराजपुर में खौफनाक वारदात मां ने तीन बेटियों को दिया जहर, महिला ने खुद भी पीया जहर|

अलीराजपुर  मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के एक आदिवासी इलाके में शुक्रवार रात एक रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना सामने आई है। यहां एक मां ने कथित तौर पर अपनी तीन मासूम बेटियों को कीटनाशक (जहर) पिलाने के बाद खुद भी जान देने की कोशिश की। इस घटना में सात, पांच और तीन साल की तीनों बहनों की मौत हो गई, जबकि महिला की हालत बेहद गंभीर बनी हुई है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, अंबुआ थाना प्रभारी मोहन डावर के अनुसार, यह घटना अडवाड़ा गांव के माफीदार फलिया में हुई। आरोपी महिला ने अपनी बेटियों सावित्री, कार्तिका और दिव्या को जबरन कीटनाशक पिलाया और फिर खुद भी उसे पी लिया। परिजनों को जैसे ही इसकी भनक लगी, वे चारों को तुरंत जिला अस्पताल ले गए, जहां एक बच्ची को मृत घोषित कर दिया गया। अन्य दो बच्चियों की बिगड़ती हालत को देखते हुए उन्हें गुजरात के दाहोद रेफर किया गया, लेकिन उन्होंने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। पुलिस जांच में सामने आया है कि घटना के समय महिला का पति मजदूरी के सिलसिले में पिछले एक महीने से गुजरात में था। शुरुआती जांच में पुलिस इसे घरेलू विवाद का मामला मान रही है, हालांकि सभी पहलुओं से तफ्तीश की जा रही है। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और मृत बच्चों के पिता और अन्य रिश्तेदारों से पूछताछ की जा रही है ताकि इस खौफनाक कदम के पीछे की असली वजह का पता लगाया जा सके।