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महिला स्व-सहायता समूहों की अनूठी पहल, डिप्टी सीएम अरुण साव को भेंट किया गया विशेष चावल

रायपुर.  गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही जिले की ग्रामीण महिलाओं द्वारा तैयार किया जा रहा जैविक विष्णुभोग चावल अब राज्य स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान बना रहा है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत महिला स्व-सहायता समूहों की आजीविका गतिविधियों को बढ़ावा देने के प्रयासों के तहत जिला पंचायत उपाध्यक्ष राजा उपेन्द्र बहादुर सिंह ने उप मुख्यमंत्री अरुण साव को जिले का प्रसिद्ध जैविक विष्णुभोग चावल भेंट किया। यह चावल अरपा बिहान महिला स्व-सहायता समूह की महिलाओं द्वारा जैविक विधि से तैयार किया गया है। इस अवसर पर उपेन्द्र बहादुर सिंह ने उप मुख्यमंत्री को जिले में महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा संचालित आजीविका संवर्धन गतिविधियों की जानकारी देते हुए बताया कि स्थानीय स्तर पर पारंपरिक एवं विशिष्ट कृषि उत्पादों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से विष्णुभोग धान का जैविक उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन किया जा रहा है। इस पहल से ग्रामीण महिलाओं को रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं और उनकी आय में भी निरंतर वृद्धि हो रही है। उन्होंने बताया कि महिला समूहों द्वारा तैयार किए जा रहे उत्पाद न केवल गुणवत्ता और शुद्धता के लिए पहचान बना रहे हैं, बल्कि स्थानीय कृषि परंपराओं को भी संरक्षित करने का कार्य कर रहे हैं। जैविक खेती को बढ़ावा देने के साथ-साथ समूहों द्वारा उत्पादों की पैकेजिंग, ब्रांडिंग और विपणन पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जिससे बाजार में उनकी मांग लगातार बढ़ रही है। उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने महिला स्व-सहायता समूहों की इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि ग्रामीण महिलाओं के ऐसे प्रयास आत्मनिर्भरता और आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में प्रेरणादायी उदाहरण हैं। उन्होंने कहा कि महिला समूहों द्वारा तैयार किए जा रहे स्थानीय उत्पाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के साथ-साथ प्रदेश की विशिष्ट कृषि पहचान को भी राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर रहे हैं। साव ने जिले में संचालित इस अभिनव गतिविधि की प्रशंसा करते हुए महिला स्व-सहायता समूहों और जिला प्रशासन को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि ऐसे प्रयासों से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और स्थानीय उत्पादों को व्यापक बाजार उपलब्ध होगा। गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही जिले में महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा तैयार किया जा रहा जैविक विष्णुभोग चावल आज ग्रामीण उद्यमिता, महिला सशक्तिकरण और स्थानीय कृषि उत्पादों के संवर्धन का सफल उदाहरण बनकर उभर रहा है। यह पहल न केवल महिलाओं की आजीविका को सुदृढ़ कर रही है, बल्कि जिले की विशिष्ट पहचान को भी नई ऊंचाइयों तक पहुंचा रही है।

महिला उत्पीड़न मामलों पर MP महिला आयोग की सख्ती, 6 साल बाद सुनवाई में तेज हुई कार्रवाई

भोपाल   मध्यप्रदेश राज्य महिला आयोग में करीब छह साल के लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर जनसुनवाई की शुरुआत होने से पीड़ित महिलाओं में न्याय की नई उम्मीद जगी है. भोपाल में सोमवार को आयोजित पहले सत्र में आयोग की नवनियुक्त अध्यक्ष रेखा यादव और सदस्य साधना स्थापक की संयुक्त बेंच ने घरेलू हिंसा, पारिवारिक विवाद और उत्पीड़न से जुड़े गंभीर मामलों की सुनवाई की. पहले ही दिन बड़ी संख्या में महिलाएं अपनी शिकायतें लेकर पहुंचीं, जहां उनकी समस्याएं विस्तार से सुनी गईं और संबंधित पक्षों को भी बुलाकर जवाब-तलब किया गया।  छह साल बाद शुरू हुई जनसुनवाई, महिलाओं को राहत की उम्मीद महिला आयोग के नए गठन के बाद यह पहला मौका है, जब जनसुनवाई आयोजित की गई. लंबे समय से लंबित मामलों और शिकायतों के कारण पीड़ित महिलाओं को काफी इंतजार करना पड़ा था. ऐसे में इस पहल को बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है।  पहले दिन 40 मामलों की सुनवाई आयोग कार्यालय में आयोजित इस जनसुनवाई में भोपाल जिले के करीब 40 प्रकरण प्रस्तुत किए गए. अध्यक्ष रेखा यादव और सदस्य साधना स्थापक ने एक-एक कर सभी मामलों को गंभीरता से सुना. आवेदिकाओं की शिकायतों के साथ-साथ दूसरे पक्ष के बयान भी दर्ज किए गए, ताकि मामलों का निष्पक्ष समाधान किया जा सके।  बेटी से मिलने नहीं देने का मामला बना चर्चा का केंद्र जनसुनवाई के दौरान एक संवेदनशील मामला सामने आया, जिसमें एक महिला ने आरोप लगाया कि शादी के बाद उसे अपनी बेटी से मिलने नहीं दिया जा रहा है. महिला ने बताया कि ससुराल पक्ष उस पर मानसिक दबाव बना रहा है. वहीं, दामाद पर आरोप है कि वह अपनी पत्नी के जरिए मायके वालों के खिलाफ झूठे केस दर्ज कराने की कोशिश कर रहा है. इस मामले में एक और चौंकाने वाला पहलू सामने आया, जहां बहू पर ससुराल पक्ष के खिलाफ झूठी घरेलू हिंसा की शिकायत करने के लिए दबाव बनाया जा रहा था और इसके बदले एक करोड़ रुपए के लेन-देन की बात कही गई. आयोग ने मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रशासन को आवश्यक निर्देश दिए।  समझौते के बावजूद भरण-पोषण विवाद एक अन्य मामले में घरेलू हिंसा के साथ आर्थिक विवाद भी जुड़ा हुआ था. सुनवाई में सामने आया कि पहले ही समझौते के तहत महिला को राशि दी जा चुकी है और बच्ची के नाम पर एक प्लॉट भी रजिस्टर्ड किया गया है. इसके बावजूद आवेदिका अतिरिक्त भरण-पोषण की मांग कर रही थी. आयोग ने दोनों पक्षों को सुनकर नियमानुसार आगे की कार्रवाई के निर्देश दिए।  आयोग की सख्त चेतावनी आयोग ने स्पष्ट किया कि महिलाओं के अधिकारों का हनन किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा. शिकायतों के निराकरण में देरी नहीं होने दी जाएगी और हर मामले में निष्पक्ष कार्रवाई की जाएगी।  मंगलवार को भी जारी रहेगी सुनवाई सोमवार की तरह मंगलवार को भी जनसुनवाई का सिलसिला जारी रहेगा. इसके लिए करीब 42 नए मामलों को सूचीबद्ध किया गया है. ऐसे में आने वाले दिनों में और भी कई पीड़ित महिलाओं को अपनी बात रखने और न्याय पाने का अवसर मिलेगा। 

Women Become Owner: जिले में 65% संपत्ति हिस्सेदारी महिलाओं के नाम, रोज हो रहे 75 पंजीयन

भोपाल  मौजूदा वित्तवर्ष में हुई रजिस्ट्री में आधी आबादी की संपत्ति की हिस्सेदारी 65 फीसदी तक हो गई है। हर साल 7 फीसदी की दर से ये बढ़ोतरी हो रही है। हालांकि, कुल संपत्तियों में महिलाओं का हिस्सा 19 फीसदी ही है। मध्य प्रदेश के भोपाल जिले में पंजीयन को लेकर सामने आ रही रोजाना की रिपोर्ट से ये स्थिति सामने आ रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह महिलाओं को रजिस्ट्री में दो फीसदी तक मिलने वाली छूट को बताया जा रहा है। संपत्ति के क्रय विक्रय को लेकर हो रहे पंजीयन में रोजाना महिलाओं के नाम जिले में औसतन 75 नए पंजीयन किए जा रहे हैं। ये क्रय विक्रय के औसत पंजीयन का 65 फीसदी है। बीते साल महिलाओं के नाम 38 हजार करोड़ रुपए की संपत्ति हुई भोपाल की शहरी संपत्ति में महिलाओं की हिस्सेदारी साल दर साल बढ़ोतरी कर रही है। बीते वित्तीय वर्ष 2025-26 की बात करें तो प्रदेश भर में महिलाओं के नाम 38 हजार करोड़ रुपए की संपत्ति खरीदी गई थी। इसमें भोपाल में 5900 करोड़ रुपए की संपत्ति महिलाओं के नाम पर दर्ज हुई थी। वित्त वर्ष 2024-25 की तुलना में ये दो फीसदी ज्यादा था। जिले में महिलाओं के नाम पर संपत्ति खरीदकर छूट का लाभ नियम से 128 करोड़ रुपए की स्टांप ड्यूटी बचाई जा सकी थी। पंद्रह दिन में महिलाओं के नाम 9000 संपत्तियां इस संबंध में जिला पंजीयक स्वप्नेश शर्मा का कहना है कि, पंजीयन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि, हर पंद्रह दिन में प्रदेश भर में महिलाओं के नाम पर 9400 संपत्तियां रजिस्टर्ड हो रही है। जबकि पुरुषों के नाम 7700 संपत्तियां दर्ज हो रही हैं। जाहिर है कि, महिलाओं के नाम 626 संपत्तियां रोजाना रजिस्टर्ड हो रही है। शासन के तय नियमों के अनुसार, संपदा 2.0 से पंजीयन की प्रक्रिया की जा रही है। अब पोर्टल पर किसी प्रकार की दिक्कत नहीं आ रही है। हर तरह की प्रॉपर्टी की डिमांड ज्यादा खास बात ये है कि, मौजूदा समय में जिलेभर में फ्लैट, प्लॉट, डुप्लेक्स, फार्म हाउस और कृषि भूमि हर श्रेणी की प्रॉपर्टी की खरीदारी हो रही है। खासकर शहर के विस्तार वाले इलाकों में निवेशकों की रुचि सबसे ज्यादा देखी जा रही है। रजिस्ट्री कार्यालय के अफसरों का कहना है कि, ज्यादा संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। हालांकि, उनका ये भी कहना कि, भारतीय कल्चर के के चलते यहां आम दिनों के मुकाबले त्योहारी सीजन में लोग प्रॉपर्टी की खरीदी ज्यादा करते हैं।

महिला स्व-सहायता समूहों ने बदली गांवों की तस्वीर, आत्मनिर्भरता और पोषण का बन रहीं नया आधार

विशेष लेख आत्मनिर्भरता, पोषण और बदलाव की नई पहचान बनीं महिला स्व-सहायता समूह रायपुर छत्तीसगढ़ में महिला सशक्तिकरण और कुपोषण मुक्ति को एक साथ जोड़ते हुए राज्य सरकार ने एक ऐसी पहल शुरू की है, जिसने ग्रामीण महिलाओं के जीवन में आशा, आत्मविश्वास और आर्थिक स्थिरता की नई रोशनी जगाई है। आंगनबाड़ी केंद्रों के लिए पूरक पोषण आहार (रेडी-टू-ईट) के निर्माण एवं वितरण का दायित्व महिला स्व-सहायता समूहों को सौंपकर सरकार ने महिलाओं को केवल रोजगार ही नहीं दिया, बल्कि उन्हें विकास की मुख्यधारा में सशक्त भागीदारी का अवसर भी प्रदान किया है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में प्रारंभ की गई यह पहल राज्य में महिला सशक्तिकरण और पोषण सुरक्षा के समन्वित मॉडल के रूप में उभर रही है। पहले जहां पूरक पोषण आहार निर्माण का कार्य बाहरी एजेंसियों के माध्यम से किया जाता था, वहीं अब यह जिम्मेदारी गांव की महिलाओं ने संभाल ली है, इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजित हुआ है और महिलाओं की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिल रही है। राज्य सरकार ने प्रथम चरण में रायगढ़, कोरबा, सूरजपुर, बस्तर, दंतेवाड़ा और बलौदाबाजार-भाटापारा जिलें में इस योजना को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया है। इन छह जिलें के 42 महिला स्व-सहायता समूहों को रेडी-टू-ईट पोषण आहार निर्माण एवं वितरण की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इन समूहों के माध्यम से हजारों महिलाओं को रोजगार मिली है और वे अब संगठित रूप से उत्पादन, पैकेजिंग, गुणवत्ता नियंत्रण और वितरण का कार्य संभाल रही हैं। प्रदेश का पहला रेडी-टू-ईट उत्पादन रायगढ़ जिले में प्रारंभ हुआ, जिसने पूरे राज्य के लिए एक प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत किया। कोरबा जिले में 10, रायगढ़ में 10, सूरजपुर एवं बलौदाबाजार-भाटापारा में 7-7, बस्तर में 6 तथा दंतेवाड़ा में 2 महिला स्व-सहायता समूह इस कार्य से जुड़ी हुई हैं। इन समूहों के माध्यम से आंगनबाड़ी केंद्रों तक समय पर गुणवत्तापूर्ण पूरक पोषण आहार पहुंचाया जा रहा है। इस पहल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे महिलाओं की भूमिका केवल श्रमिक तक सीमित नहीं रही, बल्कि वे प्रबंधन और निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा भी बनी हैं। उत्पादन इकाइयों में कार्यरत महिलाओं को मशीन संचालन, गुणवत्ता परीक्षण, पैकेजिंग, भंडारण वितरण और लेखा प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया गया है। आधुनिक तकनीकों से सुसज्जित इन इकाइयों ने ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया है। सूरजपुर जिले में संचालित रेडी-टू-ईट निर्माण संयंत्र इस बदलाव की सशक्त तस्वीर प्रस्तुत कर रही हैं। भैयाथान, प्रतापपुर और सूरजपुर विकासखंडों में संचालित संयंत्रों में महिलाएं पौष्टिक नमकीन दलिया और मीठा शक्ति आहार तैयार कर रही हैं। इन खाद्य पदार्थों में विटामिन ‘ए’, विटामिन ‘डी’, आयरन, कैल्शियम, जिंक और फोलिक एसिड जैसे आवश्यक पोषक तत्व शामिल हैं, जो बच्चों, गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। इन संयंत्रों में कार्यरत महिलाएं अब केवल अपने परिवार की जिम्मेदारियां नहीं निभा रहीं, बल्कि जिले के पोषण अभियान में महत्वपूर्ण भागीदार बन चुकी हैं। सूरजपुर जिले में निर्माण के साथ-साथ वितरण की जिम्मेदारी भी महिला समूहों को सौंपी गई है, जिससे बड़ी संख्या में ग्रामीण महिलाएं आजीविका से जुड़ सकी हैं। लगभग 430 महिलाएं आंगनबाड़ी केंद्रों तक पोषण आहार पहुंचाने के कार्य में सक्रिय रूप से लगी हुई हैं। महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े ने इस पहल को महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता और बच्चों के बेहतर पोषण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। उनका कहना है कि यह योजना महिलाओं को रोजगार देने के साथ-साथ राज्य के पोषण स्तर में सुधार लाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। दरअसल, यह पहल केवल पोषण आहार निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक बदलाव की एक सशक्त कहानी भी है, जिन महिलाओं की पहचान कभी केवल घरेलू कार्यों तक सीमित थी, वे आज उत्पादन इकाइयों का संचालन कर रही हैं। समूहों का नेतृत्व कर रही हैं और अपने परिवार की आर्थिक मजबूती का आधार बन रही हैं। नियमित आय ने उनके जीवन में स्थिरता लाई है, आत्मविश्वास बढ़ाया है और समाज में उनकी भागीदारी को मजबूत किया है। छत्तीसगढ़ में महिला स्व-सहायता समूहों के माध्यम से संचालित यह मॉडल “पोषण के साथ सशक्तिकरण” की अवधारणा को वास्तविक रूप दे रहा है। यह पहल साबित कर रही है कि जब महिलाओं को अवसर और विश्वास मिलता है, तो वे न केवल अपने जीवन को बदलती हैं, बल्कि पूरे समाज के विकास की दिशा भी तय करती हैं। • डॉ. दानेश्वरी संभाकर • उप संचालक (जनसंपर्क)

संघर्ष से सफलता तक : बीजापुर की महिलाओं को मिले सपनों के नए पंख

नक्सल मुक्त बीजापुर में विकास की नई सुबह, पुनर्वासित महिलाओं को सिलाई प्रशिक्षण से मिल रहा रोजगार का अवसर रायपुर, कभी नक्सल हिंसा की छाया से प्रभावित रहा बीजापुर अब विकास, विश्वास और आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रहा है। माओवाद के अंत के बाद जिला तेजी से मुख्यधारा की ओर बढ़ रहा है। सुरक्षाबलों के साहस, शासन की प्रभावी पुनर्वास नीति और प्रशासन की सतत पहल ने बीजापुर को शांति एवं विकास के नए दौर में प्रवेश कराया है। राज्य शासन की पुनर्वास नीति केवल आत्मसमर्पण या पुनर्वास तक सीमित नहीं रही, बल्कि पुनर्वासित परिवारों को आर्थिक रूप से सक्षम और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। इसी कड़ी में बीजापुर जिले की पुनर्वासित महिलाओं को मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना के तहत स्थानीय गारमेंट फैक्ट्री में सिलाई प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है। मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना से बदल रही जिंदगी मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना के तहत प्रशिक्षण प्राप्त कर रही महिलाएं अब आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रही हैं। उन्हें आधुनिक सिलाई तकनीक, मशीन संचालन और परिधान निर्माण का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। विशेष बात यह है कि प्रशिक्षण पूरा होने के बाद महिलाओं को उसी गारमेंट फैक्ट्री में रोजगार भी उपलब्ध कराया जाएगा। इस पहल से महिलाओं को न केवल रोजगार मिलेगा, बल्कि वे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। प्रशिक्षण पूर्ण होने के पश्चात उन्हें प्रतिमाह लगभग 5 से 8 हजार रुपये तक का पारिश्रमिक दिया जाएगा।  जिससे वे आर्थिक रूप से निरंतर सशक्त बनी रहें। आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम पुनर्वासित महिलाओं के चेहरे पर अब भविष्य को लेकर नई उम्मीद और आत्मविश्वास दिखाई दे रहा है। जो महिलाएं कभी हिंसा और असुरक्षा के माहौल में जीवन व्यतीत कर रही थीं, वे आज रोजगार और सम्मानजनक जीवन की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। यह पहल केवल रोजगार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज की मुख्यधारा से जोड़ते हुए महिलाओं को सम्मानजनक जीवन देने का सशक्त माध्यम बन रही है। बीजापुर बन रहा विकास और विश्वास का प्रतीक बीजापुर में चल रही पुनर्वास एवं कौशल विकास की यह पहल शासन की संवेदनशील सोच और दूरदर्शी नीति का उदाहरण है। जिला प्रशासन द्वारा पुनर्वासित परिवारों को शिक्षा, रोजगार और स्वरोजगार से जोड़ने के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। नक्सलवाद से मुक्त होकर अब बीजापुर विकास, शांति और आत्मनिर्भरता की नई पहचान बना रहा है। पुनर्वासित महिलाओं की सफलता यह संदेश दे रही है कि अवसर और सहयोग मिलने पर जीवन की दिशा बदली जा सकती है।

करमजीत कौर ने कहा: महिलाओं को 50% आरक्षण, सशक्तीकरण की ओर ऐतिहासिक मोड़

होशियारपुर  पंजाब के होशियारपुर से आम आदमी पार्टी की लोकसभा प्रभारी चेयरमैन करमजीत कौर ने महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने के प्रस्ताव का स्वागत किया है। उन्होंने इसे महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक और निर्णायक कदम बताया। करमजीत कौर ने समाचार एजेंसी  से बात करते हुए कहा कि आम आदमी पार्टी इस फैसले का पूरी तरह समर्थन करती है और लंबे समय से महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की पक्षधर रही है। उनका मानना है कि यदि लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण मिलता है, तो इससे न केवल उनकी राजनीतिक भागीदारी बढ़ेगी बल्कि नीति निर्माण में भी महिलाओं की आवाज अधिक प्रभावी ढंग से सामने आएगी। उन्होंने यह भी बताया कि देश के कई राज्यों में पहले से ही पंचायत और स्थानीय निकाय स्तर पर लाखों महिलाएं आरक्षण के तहत काम कर रही हैं और बेहतरीन नेतृत्व का परिचय दे रही हैं। ऐसे में इस व्यवस्था को संसद व विधानसभा तक विस्तारित करना स्वाभाविक और आवश्यक कदम है। उन्होंने कहा कि इससे समाज में सकारात्मक बदलाव आएगा और महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया में बराबरी का अधिकार मिलेगा। हालांकि, करमजीत कौर ने इस प्रस्ताव के भविष्य को लेकर कुछ आशंकाएं भी जताईं। उन्होंने कहा कि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि यह बिल संसद में पास हो पाएगा या नहीं क्योंकि राजनीतिक परिस्थितियां अक्सर ऐसे महत्वपूर्ण फैसलों को प्रभावित करती हैं। फिर भी उन्होंने उम्मीद जताई कि सभी दल इस मुद्दे पर एकजुट होकर इसे समर्थन देंगे। राजनीतिक असर के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह मुद्दा किसी एक पार्टी, जैसे भारतीय जनता पार्टी के फायदे तक सीमित नहीं है। अगर यह बिल पास होता है, तो इसका लाभ सभी राजनीतिक दलों और उनके कार्यकर्ताओं को मिलेगा। राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद की दौड़ से रोकने के संदर्भ में पूछे गए सवाल पर उन्होंने स्पष्ट किया कि इस विषय को राजनीति से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। यह महिलाओं के अधिकारों और उनके सशक्तीकरण से जुड़ा मुद्दा है, जिसका सभी को समर्थन करना चाहिए। अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए करमजीत कौर ने कहा कि आम आदमी पार्टी ने उन्हें एक वॉलंटियर के रूप में आगे बढ़ाकर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी हैं, जो पार्टी की महिला सशक्तीकरण की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

पेट के मोटापे की समस्या: भारत में 10 में से 6 महिलाएं शिकार, कमर के साइज से जानें खतरा

भोपाल  भारत में 30 से 49 साल की हर दस में पांच-छह महिलाओं को पेट की चर्बी की समस्या है. पुरुषों से कहीं ज्यादा महिलाएं इससे जूझ रही हैं. डायबिटीज एंड मेटाबॉलिक सिंड्रोम जर्नल में छपी स्टडी के मुताबिक, यह ट्रेंड टीनएजर्स और युवा लड़कियों में भी तेजी से बढ़ रहा है. अर्बन लाइफस्टाइल, ज्यादा कमाई और नॉन-वेज डाइट इसका बड़ा कारण. BMI से बेहतर कमर नापना जरूरी, क्योंकि एशियन इंडियंस में बॉडी फैट ज्यादा होता है. भारत में मोटापे की परिभाषा बदल रही है क्योंकि एक्सपर्ट अब सिर्फ वेट मशीन पर दिखने वाले वजन से ही लोगों को ओवरवेट या मोटापे का शिकार नहीं मान रहे हैं, बल्कि वे अब कमर के बढ़ते साइज से भी मोटापे का पता लगा रहा हैं।  डायबिटीज एंड मेटाबॉलिक सिंड्रोम जर्नल में पब्लिश हुई स्टडी के मुताबिक, भारत में पुरुषों की तुलना में महिलाएं 'एब्डोमिनल ओबेसिटी' यानी पेट के मोटापे का ज्यादा शिकार हो रही हैं. स्थिति इतनी गंभीर है कि 30 से 49 साल की उम्र वाली 10 में से करीब 6 महिलाएं इस समस्या से घिरी हुई हैं।  एक्सपर्ट्स इसे एक मेटाबॉलिक इमरजेंसी मान रहे हैं।  क्या कहती है रिसर्च? आमतौर पर हम मोटापे को बॉडी मास इंडेक्स (BMI) से नापते हैं, लेकिन यह स्टडी बताती है कि BMI शरीर की असल स्थिति छुपा सकता है क्योंकि एशियन इंडियंस में बॉडी फैट ज्यादा होता है. कई बार वजन सामान्य होने के बावजूद पेट पर जमी चर्बी अंदरूनी अंगों के लिए खतरनाक होती है इसलिए कमर की माप मापना सही रहेगा।  स्टडी के मुताबिक, यह ट्रेंड टीनएजर्स और युवा लड़कियों में भी तेजी से बढ़ रहा है. अर्बन लाइफस्टाइल, ज्यादा कमाई और नॉन-वेज डाइट इसका बड़ा कारण है।  स्टडी बताती है कि भारत में महिलाओं में एब्डॉमिनल ऑबेसिटी पुरुषों से ज्यादा है. NFHS-5 (2019-21) डेटा से पता चलता है कि भारत में 40% महिलाएं और 12% पुरुष पेट के मोटापे से ग्रस्त हैं. महिलाओं के लिए 80 सेमी और पुरुषों के लिए 94 सेमी से अधिक कमर का घेरा इस खतरे की श्रेणी में आता है. यह समस्या अब गांवों और मिडिल क्लास तक फैल चुकी है।  फोर्टिस C-DOC के चेयरमैन डॉ. अनूप मिश्रा कहते हैं, 'कमर नापना आसान है. हर डॉक्टर को मेजरमेंट टेप रखना चाहिए. यह डायबिटीज, हार्ट डिजीज और कैंसर का संकेत देता है. BMI एशियंस के लिए सटीक नहीं इसलिए वेस्ट सर्कम्फरेंस (कमर का घेरा) पर फोकस करें. यह ट्रेंड टीनएजर्स में भी दिख रहा, जो बचपन की कुपोषण के बाद फास्ट लाइफस्टाइल से प्रभावित हैं।  कारण और जोखिम रिसर्च के मुताबिक, उम्र बढ़ना, शहरों में रहना, अधिक कमाई और नॉन-वेज खाना महिलाओं में पेट की चर्बी बढ़ा रहा. लीवर-पैंक्रियास के आसपास फैट मेटाबॉलिक रिस्क बढ़ाता है. स्टडी चेतावनी देती है इससे टाइप-2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, किडनी की बीमारी और यहां तक कि ब्रेस्ट कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।  खासकर मिड एज की लड़कियों में यह ट्रेंड अधिक देखा जा रहा है जो कम उम्र में खराब न्यूट्रिशन और फिर अचानक बदली हुई लाइफस्टाइल का नतीजा है।  कैसे रोक सकते हैं इस समस्या को एक्सपर्ट्स कहते हैं, टेप से कमर नापें और रूटीन चेकअप कराएं. हेल्दी डाइट, एक्सरसाइज से इस समस्या को कंट्रोल किया जा सकता है. अब जनरल ऑबेसिटी नहीं बल्कि एब्डॉमिनल पर भी ध्यान देने की जरूरत है. ये समस्या ग्रामीण क्षेत्रों में भी बढ़ रही है इसलिए शहरी महिलाओं को खास ध्यान देने की जरूरत है. एक्सपर्ट्स अब सलाह दे रहे है कि वजन चेक करने के साथ-साथ अपनी कमर का घेरा नापना भी उतना ही जरूरी हो गया है। 

चार चुनावी राज्यों में महिलाओं के लिए 24 हजार करोड़, तमिलनाडु में समर पैकेज, असम में बिहू बोनस

नई दिल्ली अगले महीने भारत के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इनमें से चार प्रमुख राज्य ऐसे हैं, जिन्होंने चुनावी रणनीति के तहत सीधे कैश ट्रांसफर करने का बड़ा निर्णय लिया है। ये चारों राज्य महिलाओं के बैंक खातों में कुल 24,500 करोड़ रुपये ट्रांसफर करने का वादा कर रहे हैं। इन राज्यों का कहना है कि अगर वे सत्ता में आए, तो यह सहायता चालू रहेगी। तमिलनाडु का समर पैकेज और बिहार बोनस तमिलनाडु में, DMK सरकार ने विशेष समर पैकेज के तहत महिलाओं के खातों में 2-2 हजार रुपये डाल दिए हैं। इस कार्यक्रम को लेने के पीछे सरकार का लक्ष्य है कि महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त हों। वहीं, असम की भाजपा सरकार ने बिहू समारोह के लिए महिलाओं को 4-4 हजार रुपये देने का ऐलान किया है, ताकि त्योहार का आनंद बढ़ सके। केरल और बंगाल की योजनाएं केरल में वामपंथी सरकार ने ‘स्त्री सुखम’ नकद योजना शुरू की है, जिसके तहत 10 लाख महिलाएं हर महीने 1,000 रुपये प्राप्त कर रही हैं। दूसरी ओर, बंगाल की तृणमूल सरकार ने लक्ष्मी भंडार स्कीम को लागू करते हुए फरवरी में 500 रुपये की वृद्धि की थी। ममता बनर्जी की सरकार का यह प्रयास अगले चुनाव में एक बार फिर से लाभ हुनाने का है। महिलाओं का प्रभाव और वोटिंग ट्रेंड इन चारों राज्यों में लगभग 4.1 करोड़ महिलाएं इन योजनाओं की लाभार्थी हैं, जो कुल वोटरों का 23% हैं। इसलिए ये योजनाएं चुनावी गणित में काफी महत्वपूर्ण मानी जा रहीं हैं। पिछले 5 साल में देखा गया है कि महिलाओं को नकद सहायता देने वाले राज्यों की संख्या 1 से बढ़कर 15 हो गई है। इन राज्यों में 13 करोड़ से ज्यादा महिलाएं लाभ उठा रही हैं। राज्य बजट और कैश ट्रांसफर की रुख इतना ही नहीं, झारखंड जैसा राज्य तो अपने ग्रामीण विकास बजट का 81% हिस्सा महिलाओं को कैश ट्रांसफर करने में खर्च कर रहा है। ये सभी योजनाएं जबकि खस्ताहाल अर्थव्यवस्था के बावजूद लागू हो रही हैं। हालांकि, यह भी देखने को मिल रहा है कि कई राज्य विकास योजनाओं को रोककर नकद स्कीमों पर ध्यान दे रहे हैं। अब 15 राज्य दे रहे महिलाओं को नगद सहायता बीते 5 साल में हुए चुनावों का ट्रेंड देखें तो पता चला है कि महिलाओं को कैश ट्रांसफर देने वाले राज्यों की संख्या एक से बढ़कर 15 हो गई है। ये राज्य 13 करोड़ से ज्यादा महिलाओं को 2.46 लाख करोड़ रु. तक सालाना नकद पैसा ट्रांसफर कर रहे हैं, जो इन राज्यों के कुल बजट का 0.7% है। झारखंड जैसा राज्य अपने ग्रामीण विकास के कुल बजट का 81% हिस्सा महिलाओं को कैश ट्रांसफर में दे रहा है। लेकिन, ट्रेंड ये भी है कि जो राज्य विकास योजनाओं को रोककर नकद स्कीमों पर खर्च कर रहे हैं, वहां कई योजनाएं शुरू नहीं हो पा रही हैं। नकद स्कीमों के चलते महाराष्ट्र-कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों को अपने अहम खर्चों में कटौती करनी पड़ी है। मुफ्त योजनाएं और अन्य लाभ महत्वपूर्ण बात यह है कि ये कैश ट्रांसफर योजनाएं केवल महिलाओं के लिए नहीं हैं। तमिलनाडु में 2.22 करोड़ राशन कार्डधारकों को मुफ्त फ्रिज, एजुकेशन लोन वेवर और हर साल तीन गैस सिलेंडर मुफ्त प्रदान किए जा रहे हैं। केरल में कल्याण पेंशन स्कीम अब 62 लाख लोगों को लाभ पहुंचा रही है, और पेंशन राशि में भी बढ़ोतरी की गई है। बेरोजगारी से निपटने के प्रयास बंगाल में करीब 1,500 करोड़ रुपये बेरोजगार युवाओं के लिए पेंशन योजना पर खर्च किए जा रहे हैं। इस तरह की योजनाओं का उद्देश्य युवाओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना और उन्हें नौकरी की तलाश में मदद करना है। इस समय चारों राज्यों में महिलाओं को केन्द्रित करके चुनावी जंग लड़ी जा रही है। इन राज्यों में गेमचेंजर बनीं कैश ट्रांसफर वाली योजनाएं     मध्य प्रदेश: (2023): ‘लाड़ली बहना’ योजना के तहत 1.31 करोड़ महिलाओं को 1250 रुपए/माह; कई सीटों पर बढ़त।     कर्नाटक (2023): ‘गृह लक्ष्मी’ योजना (2000 रु./माह) ने कांग्रेस को जीत दिलाई।     ओडिशा (2024): ‘सुभद्रा’ योजना से भाजपा को पहली बार सत्ता।     महाराष्ट्र (2024): ‘लाड़की बहिन’ योजना (1500 रुपए/माह), बड़ा महिला वोट आधार।     झारखंड (2024): ‘मैया सम्मान’ योजना का चुनावी असर। हेमंत सोरेन की वापसी हुई। चुनावी राज्यों में ये भी ‘मुफ्त’ योजनाएं… तमिलनाडु में 2.22 करोड़ राशनकार्डधारकों को मुफ्त ​फ्रिज, एजुकेशन लोन वेवर और हर साल तीन गैस ​सिलेंडर मुफ्त। केरल में कल्याण पेंशन स्कीम में अब 62 लाख लोग। पेंशन भी 600 रु. बढ़ाकर 2 हजार रु. की। बंगाल में 1500 करोड़ रु. बेरोजगार युवा पेंशन पर खर्च हो रहे हैं।

मध्य प्रदेश की 22.77 लाख महिलाएं लखपति दीदी बनीं, देश के टॉप-5 राज्यों में चौथे स्थान पर

भोपाल  मध्य प्रदेश महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। केंद्र सरकार के 31 दिसंबर 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में ‘लखपति दीदी’ योजना के तहत 22,77,814 महिलाएं सालाना एक लाख रुपये या उससे अधिक आय अर्जित कर रही हैं। इसी के साथ मध्य प्रदेश देश में सबसे ज्यादा ‘लखपति दीदी’ वाली सूची में चौथे स्थान पर पहुंच गया है। उल्लेखनीय है कि एक वर्ष पहले राज्य इस सूची में आठवें स्थान पर था। यह जानकारी संसद में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में सामने आई है। क्या है ‘लखपति दीदी’ योजना यह योजना ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई है। इसके तहत स्वयं सहायता समूह (SHG) से जुड़ी महिलाओं को प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता, बाजार से जोड़ने की सुविधा और बैंक ऋण उपलब्ध कराया जाता है, ताकि वे सालाना न्यूनतम ₹1 लाख की आय हासिल कर सकें। प्रधानमंत्री Narendra Modi ने 15 अगस्त 2023 को इस योजना की घोषणा की थी। शुरुआत में इसका लक्ष्य 2 करोड़ महिलाओं को लखपति बनाना था, जिसे बाद में बढ़ाकर 3 करोड़ कर दिया गया। ड्रोन तकनीक से बढ़ी कमाई मध्य प्रदेश ने आधुनिक कृषि तकनीक अपनाने में भी बढ़त दिखाई है। ‘नमो ड्रोन दीदी’ योजना के तहत राज्य को 34 ड्रोन मिले हैं, जिससे यह देश में तीसरे स्थान पर है। राज्य के 89 स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं ने ड्रोन संचालन का प्रशिक्षण प्राप्त किया है। ये महिलाएं अब खेतों में ड्रोन के जरिए तरल उर्वरक और कीटनाशकों का छिड़काव कर रही हैं, जिससे उनकी आय में बढ़ोतरी हो रही है। ड्रोन वितरण के मामले में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्य आगे हैं, लेकिन मध्य प्रदेश तेजी से अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। वहीं, ड्रोन ट्रेनिंग के मामले में भी राज्य शीर्ष पांच में शामिल है। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक और वित्तीय सहायता का यह संयोजन ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक स्थिति बदलने में अहम भूमिका निभा रहा है। मध्य प्रदेश की यह उपलब्धि सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बदलाव का संकेत भी देती है। बड़ी संख्या में महिलाएं अब स्वरोजगार से जुड़ रही हैं और परिवार की आय में योगदान दे रही हैं। नमो ड्रोन दीदी को सरकार ने दिए 34 ड्रोन आधुनिक खेती और तकनीक के क्षेत्र में भी मध्य प्रदेश की महिलाएं पीछे नहीं हैं। 'नमो ड्रोन दीदी' योजना के तहत मध्य प्रदेश को 34 ड्रोन उपलब्ध कराए गए हैं, जो इसे देश में तीसरे स्थान (आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के बाद) पर खड़ा करता है। एमपी के 89 स्वयं सहायता समूहों (SHG) की महिलाओं ने ड्रोन से संबंधित प्रमाणित तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त किया है, जिससे वे अब खेतों में लिक्विड फर्टिलाइजर (तरल उर्वरकों) और कीटनाशकों का छिड़काव ड्रोन के जरिए कर रहीं हैं। क्या है 'लखपति दीदी' योजना? इस योजना का मुख्य उद्देश्य स्वयं सहायता समूहों (SHG) से जुड़ी ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है। इसके तहत हरेक महिला सदस्य को कम से कम चार कृषि ऋतुओं या व्यावसायिक चक्रों के आधार पर सालाना 1 लाख रुपये की न्यूनतम आय सुनिश्चित करने में सक्षम बनाना है । 2023 में पीएम ने किया था योजना का ऐलान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2023 को लाल किले की प्राचीर से 'लखपति दीदी' योजना की घोषणा की थी, जिसका लक्ष्य शुरुआती चरण में 2 करोड़ महिलाओं को लखपति बनाना था (बाद में इसे बढ़ाकर 3 करोड़ कर दिया गया)। कैसे काम करती है योजना इस पहल के तहत महिलाओं को वित्तीय सहायता, बाजार लिंकेज, कौशल विकास प्रशिक्षण और बैंक ऋण की सुविधा प्रदान की जाती है । इसमें 'नमो ड्रोन दीदी' जैसी सहायक योजनाएं भी शामिल हैं, जो महिलाओं को आधुनिक तकनीकों के माध्यम से आय बढ़ाने में मदद करती हैं। नमो ड्रोन दीदी: राज्यों में ड्रोन वितरण (Top 5) (योजना के तहत दिए गए 500 ड्रोनों के आधार पर) टॉप – 5 राज्य (जहां सबसे ज्यादा ड्रोन दिए गए)     आंध्र प्रदेश: 96     कर्नाटक: 82     तेलंगाना: 72     मध्य प्रदेश: 34     उत्तर प्रदेश: 32 नमो ड्रोन दीदी को ड्रोन ट्रेनिंग देने वाले टॉप – 5 राज्य     कर्नाटक: 145     उत्तर प्रदेश: 128     आंध्र प्रदेश: 108     हरियाणा: 102     मध्य प्रदेश: 89 (इन राज्यों में महिला लाभार्थियों/ SHG को ड्रोन चलाने का सर्टिफिकेट मिला)

विधानसभा से पास हुआ संशोधन, गुजरात में बढ़े काम के घंटे, महिलाओं को रात की ड्यूटी की इजाजत

अहमदाबाद  गुजरात विधानसभा (Gujarat Budget Session) में बजट सेशन जारी है। मुख्यमंत्री भूपेश पटेल की मौजूदगी में बजट 2026- 27 पेश किया जाएगा। इससे पहले मंगलवार को विधानसभा में  गुजरात दुकानें और प्रतिष्ठान रोजगार विनियमन और सेवा की शर्तें (संशोधन) विधेयक सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया है। इस बिल को श्रम एवं रोजगार मंत्री कुनवरजी भाई बावलिया ने सदन में पेश किया था। कानून लागू होने पर व्यापार और रोजगार सेवा क्षेत्र में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। यह कानून 10 या इससे अधिक वर्कर वाली दुकानों और स्थान पर लागू होगा। जबकि पहले यह कानून 20 या उससे ज्यादा स्टाफ वाले दुकानों या स्थान पर लागू होता था। रोजाना काम करने के रोजाना काम करने के घंटे के लिए में 9 से बढ़कर 10 कर दिया गया है। इन नए नियमों को भी जान लें महिलाओं को नाइट शिफ्ट में काम करने की अनुमति होगी। हालांकि दुकानदारों और कंपनियों को महिलाओं का सम्मान और सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।  इसके अलावा 3 महीने के कम समय में ओवर टाइम काम की ज्यादा से ज्यादा लिमिट 125 घंटे से बढ़ाकर 144 घंटे कर दी गई है। इस संशोधन बिल को आज के दौर के डिमांड और ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस के तहत पेश किया गया है। श्रम और रोजगार मंत्री का कहना है कि यह वर्कर, ट्रेडर्स मालिकों और नागरिकों सभी के लिए एक वरदान साबित हो सकता है। कृषि भूमि ट्रांसफर के नियम भी बदले  विधानसभा में सौराष्ट्र घरखेड़ एडमिनिस्ट्रेशन सेटलमेंट एंड एग्रीकल्चरल लैंड ऑर्डिनेशन 1949 अमेंडमेंट बिल भी पास हो चुका है। इसे रिवेन्यू स्टेट मिनिस्टर संजय सिंह माहिडा ने पेश किया था। गैर कानूनी ट्रांसफर के मामलों में एक साफ और सिस्टमैटिक प्रक्रिया निर्धारित की जाएगी। जिसके अनुसार कलेक्टर या तो अपनी पहल पर या जमीन में दिलचस्पी रखने वाले किसी व्यक्ति के एप्लीकेशन के आधार पर कार्रवाई शुरू कर सकेंगे। अगर ट्रांसफर गैर कानूनी पाया जाता है, तो कलेक्टर जमीन बेचने वाले से 3 महीने के अंदर जमीन वापस करने को कहेंगे। जिसके बाद खरीदने वाले को जमीन वापस करनी होगी। ऐसा न होंने पर कलेक्टर ट्रांसफर को गैर कानूनी घोषित कर देंगे और ऐसी जमीन सभी तरह के बोझ से मुक्त होकर सरकार के पास चली जाएगी। फिर इसे सरकार बंजर  जमीन के तौर पर बेच देगी। ओइस बदलाव से पेनल्टी लगने पर जो व्यक्ति या संस्थान किसान नहीं है, उसे एक महीने के अंदर जमीन की मौजूद मार्केट वैल्यू का 3 गुना अमाउंट देना होगा। नई परियोजना को मंजूरी मिली  बनासकांठा जिले में पालनपुर और लक्ष्मीपुरा रोड पर मॉडर्न रेलवे ओवर ब्रिज के लिए 46 करोड़ रुपये मंसूर किए गए हैं। 1212.19 मीटर लंबे रेलवे ओवरब्रिज से शहर के लगभग 1.81 लाख लोगों को लाभ होगा। रेलवे ब्रिज के बन जाने से ड्राइवर का समय और ईंधन बचेगा। यह प्रस्ताव मंत्री ऋषिकेश भाई पटेल द्वारा विधानसभा में पेश किया गया था।