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भजनलाल शर्मा ने यमुना जल समझौते को बताया ऐतिहासिक, प्रधानमंत्री मोदी का जताया आभार

जयपुर  मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने दिल्ली जोधपुर हाउस में यमुना जल समझौते को लेकर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि राजस्थान को सबसे अधिक पानी की आवश्यकता है, और यह समझौता प्रदेश के लिए ऐतिहासिक साबित होगा. उन्होंने कहा कि 29 जून का दिन राजस्थान के लिए ऐतिहासिक है, और प्रदेश की जनता की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार व्यक्त किया.  "कांग्रेस ने नहीं किया समाधान"  मुख्यमंत्री ने कहा कि कांग्रेस सरकारों ने वर्षों तक इस मुद्दे का समाधान नहीं किया, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजस्थान की पानी की पीड़ा को समझते हुए इसे प्राथमिकता दी. उन्होंने कहा कि इस समझौते से राजस्थान की प्यासी धरती को पानी मिलेगा.  सीएम भजनलाल ने गृह मंत्री का जताया आभार  भजनलाल शर्मा ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल और हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी का भी सहयोग के लिए धन्यवाद दिया. उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार के समन्वय से यह महत्वपूर्ण पहल संभव हो सकी.  "राजस्थान कर रहा विकास" मुख्यमंत्री ने कहा कि राजस्थान ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, और प्रदेश विकास योजनाओं के कारण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है. उन्होंने दावा किया कि पिछले ढाई वर्षों में राज्य में अनेक विकास कार्य हुए हैं, और डबल इंजन की सरकार जनता के विश्वास पर खरी उतरी है.  उन्होंने कांग्रेस पर विकास कार्यों में बाधा डालने का आरोप लगाते हुए कहा कि विपक्ष ने कभी जनता के हित में काम नहीं किया. मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि 4 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजस्थान में रिफाइनरी परियोजना का उद्घाटन करेंगे. 

यमुना जल बंटवारे पर बनी सहमति, 32 साल बाद हरियाणा-राजस्थान करेंगे समझौता

जयपुर /चंडीगढ़  हरियाणा और राजस्थान के बीच पिछले 32 वर्षों से लंबित यमुना जल बंटवारे का विवाद आखिरकार सुलझ गया है. दोनों राज्यों ने वर्ष 1994 के यमुना जल समझौते को लागू करने पर सहमति बना ली है. इस ऐतिहासिक सहमति को औपचारिक रूप देने के लिए सोमवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में दोनों राज्यों के बीच एक आधिकारिक MoU पर हस्ताक्षर किए जाएंगे।  इस मौके पर केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल, राजस्थान सीएम भजनलाल शर्मा और हरियाणा सीएम नायब सिंह सैनी भी मौजूद रहेंगे. समझौते से पहले दिल्ली में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय त्रिपक्षीय बैठक आयोजित की गई, जिसमें विवाद के स्थायी समाधान पर अंतिम सहमति बनी।  बैठक में राजस्थान और हरियाणा सरकारों ने आपसी समन्वय के साथ दशकों पुराने गतिरोध को समाप्त करने की कार्ययोजना को मंजूरी दी. यह विवाद मुख्य रूप से वर्ष 1994 में हुए यमुना जल समझौते के क्रियान्वयन को लेकर था. उस समझौते के तहत मॉनसून के दौरान यमुना में उपलब्ध अतिरिक्त पानी में राजस्थान को भी हिस्सेदारी दी गई थी।  हालांकि, आवश्यक बुनियादी ढांचे के अभाव और तकनीकी बाधाओं के चलते यह योजना पिछले 32 वर्षों से लागू नहीं हो सकी थी. इसका सबसे अधिक असर राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र पर पड़ा, जहां चूरू, झुंझुनूं और सीकर जिले लंबे समय से पेयजल संकट का सामना कर रहे हैं।  अब हाल ही में हुई उच्च स्तरीय बैठक में बनी सहमति के बाद हथिनिकुंड बैराज से राजस्थान तक पाइपलाइन बिछाकर पानी पहुंचाने का रास्ता साफ हो गया है. इस परियोजना के पूरा होने पर शेखावाटी क्षेत्र के लाखों लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है।  सरकारों का मानना है कि यह समझौता न केवल दोनों राज्यों के बीच लंबे समय से चले आ रहे जल विवाद का समाधान करेगा, बल्कि राजस्थान के जल-संकटग्रस्त इलाकों के लिए भी एक बड़ी उपलब्धि साबित होगा. इससे क्षेत्र में पेयजल उपलब्धता बढ़ेगी और भविष्य में जल प्रबंधन को लेकर राज्यों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो सकेगा। 

क्या हम प्लास्टिक पी रहे हैं? यमुना वॉटर में खतरनाक माइक्रोप्लास्टिक का खुलासा

नई दिल्ली  जिसे आप पानी समझकर पी रहे हैं वह पानी नहीं प्लास्टिक है.हाल ही में आई द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (TERI) की एक रिसर्च काफी डराने वाली है. टेरी की ओर से एक साल तक किए गए वैज्ञानिक अध्ययन में दिल्ली से गुजरने वाली यमुना नदी, नलों से आने वाले भूजल, शहर के खुले नालों और बाढ़ क्षेत्र की मिट्टी में बड़ी मात्रा में माइक्रोप्लास्टिक के कण मिले हैं. टेरी की स्टडी ऑन माइक्रोप्लास्टिक्स इन रिवर यमुना एंड ग्राउंडवॉटर इन दिल्ली (2024–25) बताती है कि शोधकर्ताओं ने दिल्ली के सभी 11 जिलों की विभिन्न जगहों से 88 नमूने लिए थे और उनकी जांच की थी, जिनमें से हर सैंपल में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा काफी ज्यादा मिली है. इस स्टडी को दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग ने करवाया था. जिसके परिणाम काफी डराने वाले आए हैं. खबर के मुताबिक टेरी की ये रिपोर्ट पिछले साल के अंत में दिल्ली सरकार को सौंप दी गई थी. रिपोर्ट बताती है कि मौसम के अनुसार यमुना जल सहित बाकी जल स्त्रोतों में प्रदूषण का स्तर बदलता रहता है. जहां बारिश यानि मानसून से पहले यमुना नदी के पानी में बहाव और जल की आपूर्ति बढ़ने के कारण माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा ज्यादा देखी गई और मॉनसून के बाद यह कम हो जाती है क्योंकि यह गंदगी और प्लास्टिक आसपास की मिट्टी में फैल जाती है. माइक्रोप्लास्टिक क्या होती है? माइक्रोप्लास्टिक 5 मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक के कण होते हैं जो पानी में मिले रहते हैं और दिखाई भी नहीं देते लेकिन अगर इस पानी को पीया जाता है तो यह कण अपने साथ जहरीले रसायनों को चिपका कर शरीर के अंदर ले जाते हैं और भारी नुकसान पहुंचाते हैं. माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा शरीर में पहुंचने के चलते काफी सारी गंभीर बीमारियां सामने आ सकती हैं. जांच में पाया गया कि करीब 95 फीसदी कण माइक्रोफाइबर (बहुत छोटे रेशे) थे. इससे अंदाजा लगाया गया कि घरों से निकलने वाला कपड़े धोने का पानी और कपड़ा उद्योग से निकलने वाला कचरा भी इस प्रदूषण का बड़ा कारण हो सकता है. सबसे खास बात है कि इस परीक्षण में पानी के अंदर 13 तरह के प्लास्टिक कण पाए गए, जिससे पता चलता है कि ये कण घरों के कचरे, फैक्ट्रियों के गंदे पानी और पैकेजिंग सामग्री जैसे कई स्रोतों से आकर मिल रहे हैं. मौसम के अनुसार बदला स्तर स्टडी कहती है कि मॉनसून में यानि मई–जून 2024 में यमुना के पानी में औसतन 6,375 माइक्रोप्लास्टिक कण प्रति घन मीटर मिले. जबकि दिसंबर 2024 से जनवरी 2025 (मानसून के बाद) यह घटकर 3,080 कण प्रति घन मीटर रह गए. यानी लगभग 50 फीसदी की कमी देखी गई. शोधकर्ताओं का कहना है कि यह कमी प्लास्टिक कम बनने से नहीं, बल्कि बारिश के कारण पानी बढ़ने से कण बह जाने और पतले पड़ने (डायल्यूशन) की वजह से हुई. मानसून के दौरान तेज बहाव कणों को नीचे की ओर बहा देता है, लेकिन सबसे बड़ी बात है कि नदी किनारे की मिट्टी में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा चार गुना से ज्यादा बढ़ गई. मानसून से पहले औसतन 24.5 कण प्रति किलो मिट्टी थे, जो बाद में बढ़कर 104.45 कण प्रति किलो हो गए.