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रेलवे का हाईटेक प्लान! नए सिस्टम से बुलेट जैसी स्पीड में दौड़ेंगी मध्य प्रदेश की ट्रेनें

ग्वालियर भारतीय रेलवे ने अपनी पारंपरिक कछुआ चाल को अलविदा कहकर डिजिटल और हाईस्पीड युग में कदम रख दिया है। झांसी-हेतमपुर रेलखंड पर ऑटोमेटिक सिग्नलिंग सिस्टम (स्वचालित सिग्नल प्रणाली) के लागू होने से ट्रेनों के संचालन का पूरा गणित ही बदल गया है। लगभग 155 किलोमीटर लंबे इस व्यस्त रूट पर अब ट्रैक के हर एक किलोमीटर पर रेलवे की तीसरी आंख तैनात है। पहले जहां इस दूरी में केवल 34 सिग्नल थे, वहीं अब इनकी संख्या बढ़ाकर 162 कर दी गई है। इस बदलाव से न केवल ट्रेनों की रफ्तार बढ़ेगी, बल्कि यात्रियों को स्टेशन के बाहर (आउटर पर) बेवजह खड़े रहने की झंझट से भी मुक्ति मिल जाएगी। क्या है नया सिस्टम? एक के पीछे एक दौड़ेंगी ट्रेनें पुरानी व्यवस्था में एक स्टेशन से दूसरी ट्रेन तब तक रवाना नहीं की जाती थी, जब तक कि आगे चल रही ट्रेन अगले स्टेशन तक न पहुंच जाए।  अब क्या बदला: नई तकनीक में ट्रैक को छोटे-छोटे ब्लॉक (करीब 1-1 किमी) में बांट दिया गया है। ■ इलेक्ट्रॉनिक नजर: आधुनिक सेंसर्स और इलेक्ट्रॉनिक नेटवर्क के जरिए ट्रेन की लोकेशन बदलते ही सिग्नल का रंग अपने आप बदल जाता है। अब एक ही ट्रैक पर सुरक्षित दूरी बनाकर एक के पीछे दूसरी ट्रेनें आसानी से दौड़ सकेंगी। इससे ट्रैक की क्षमता कई गुना बढ़ गई है। लोको पायलट को ग्रीन सिग्नल की राहत, आउटर का रेड सिग्नल गायब 1. ड्राइवर्स का बढ़ा भरोसा: अब लोको पायलट को काफी पहले ही आगे के सिग्नल की सटीक स्थिति का पता चल जाता है। खराब मौसम या धुंध में भी ड्राइवर पूरे आत्मविश्वास के साथ ट्रेन की रफ्तार बनाए रख सकेंगे। 2. आउटर पर नो वेटिंग: अक्सर अगले स्टेशन से हरी झंडी न मिलने के कारण ट्रेनों को आउटर पर रोक दिया जाता था। अब ऑटोमेटिक ब्लॉक सिस्टम के कारण ट्रेनें एक-दूसरे के पीछे चलती रहेंगी, जिससे स्टेशन मास्टर को भी मैन्युअली सिग्नल ऑपरेट नहीं करना पड़ेगा। ग्वालियर में ट्रैक लोड हर दिन गुजरती हैं 236 ट्रेनें ग्वालियर से गुजरने वाले ट्रैफिक का दबाव इतना ज्यादा है कि यह सिस्टम 'लाइफलाइन' साबित होगा- ■ झांसी-आगरा रूट: 170 ट्रेनें ■ ग्वालियर-गुना रूट: 28 ट्रेनें ■ ग्वालियर-भिंड रूट: 06 ट्रेनें ■ ग्वालियर-कैलारस : 06 ट्रेनें ■ थ्रू (बिना रुके) ट्रेनें: 26 ट्रेनें ■ कुल: 236 ट्रेनें प्रतिदिन हर किलोमीटर पर ऑटोमेटिक सिग्नलिंग सिस्टम रेलवे ट्रैक के हर किलोमीटर पर ऑटोमेटिक सिग्नलिंग सिस्टम लगाया जा रहा है। इससे ट्रैक की कैपेसिटी और ट्रेनों की स्पीड दोनों बढ़ती है। सबसे बड़ा फायदा यह है कि ट्रेनों को अब किसी स्टेशन या आउटर पर बेवजह इंतजार नहीं करना पड़ता। झांसी मंडल में यह काम लगभग पूरा हो चुका है। -शशिकांत त्रिपाठी, सीपीआरओ, उत्तर मध्य रेलवे 

मोटापे और खर्राटों पर बड़ा दावा! एक इंजेक्शन ने स्टडी में दिखाया असरदार परिणाम

आगरा मोटापा से मधुमेह, खर्राटे, युवतियों में मासिक धर्म अनियमित होने के साथ ही फैटी लिवर की समस्या तेजी से बढ़ी है। एसएन मेडिकल कॉलेज में मोटापे के साथ इन बीमारियों से पीड़ित मरीजों पर स्टडी की गई, मरीजों को तीन महीने तक हर सप्ताह तिरजेपाइड इंजेक्शन दिया गया। तीन महीने में 10 प्रतिशत तक वजन वजन कम हो गया। इसके साथ ही खर्राटे की समस्या और पाली सिस्टिक ओवरी डिसऑर्डर (पीसीओएस ) से मासिक धर्म अनियमित होने की समस्या भी ठीक हो गई। यह स्टडी इसी वर्ष जर्नल ऑफ मिड टर्म में प्रकाशित हुई है। एसएन मेडिकल कॉलेज में 93 मरीजों पर की गई स्टडी के चौंकाने वाले नतीजे मधुमेह रोगियों में शुगर का स्तर नियंत्रित रखने के लिए तिरजेपाइड इंजेक्शन का इस्तेमाल किया जाता है। यह इंजेक्शन सप्ताह में एक बार लेना होता है। मरीज को दवाएं और इंसुलिन लेने की जरूरत नहीं पड़ती है। इससे वजन भी कम होता है। एसएन मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के डॉ. प्रभात अग्रवाल ने बताया कि मोटापे के कारण मधुमेह, खर्राटे, पीसीओएस, फैटी लिवर से पीड़ित 18 वर्ष से अधिक आयु के 93 मरीजों पर स्टडी की गई। इसमें मधुमेह रोगी 23 मरीज थे जबकि 70 मरीजों को मधुमेह नहीं था उन्हें खर्राटे सहित अन्य बीमारियां थी। इन्हें तीन महीने तक हर सप्ताह तिरजेपाइड इंजेक्शन दिया गया, पहले महीने 2.5 एमजी, दूसरी महीने 5 एमजी और तीसरे महीने 7.5 एमजी दिया गया। तीन महीने तक एक इंजेक्शन हर सप्ताह देने से सात किलोग्राम तक वजन हुआ कम डॉक्टर प्रभात अग्रवाल ने बताया कि तीन महीने में जिन मरीजों को मधुमेह की समस्या नहीं थी उनका सात किलोग्राम से अधिक वजन (10 प्रतिशत ) और जिनको मधुमेह की समस्या थी उनका वजन छह किलोग्राम तक कम हो गया। इससे खर्राटे और फैटी लिवर की समस्या में आराम मिल गया। एसएन की स्त्री रोग विभाग की डॉ. रुचिका गर्ग ने बताया कि स्टडी में 10 प्रतिशत युवतियों को शामिल किया गया था, इन्हें पीसीओ के कारण वजन अधिक होने से मासिक धर्म अनियमित थे। वजन कम होने से मासिक धर्म की समस्या भी ठीक हो गई। 72 सप्ताह में 20 प्रतिशत तम वजन हो सकता है कम डॉ. प्रभात अग्रवाल ने बताया कि इंजेक्शन 72 सप्ताह तक लिया जाए तो 20 प्रतिशत तक वजन कम हो सकता है। इसके साथ ही जीवनशैली में बदलाव, चिकनाई युक्त भोजन ना लेने और नियमित व्यायाम करने से इंजेक्शन बंद करने के बाद वजन बढ़ने से भी रोका जा सकता है। रक्त शर्करा, इंसुलिन और चयापचय पर प्रभाव वजन घटाने वाले इंजेक्शन आपके शरीर के रक्त शर्करा के प्रबंधन को भी बेहतर बनाते हैं।  ये इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार करते हैं, जिससे कोशिकाएं ऊर्जा का अधिक कुशलता से उपयोग कर पाती हैं। इससे पूरे दिन रक्त शर्करा का स्तर स्थिर रहता है। इंसुलिन प्रतिरोध होने पर , ग्लूकोज ऊर्जा के रूप में उपयोग होने के बजाय रक्तप्रवाह में ही रहता है। शरीर अधिक इंसुलिन का उत्पादन करके प्रतिक्रिया करता है, जिससे शरीर वसा-भंडारण मोड में बना रहता है। इंसुलिन प्रतिरोध से पीड़ित कई लोगों के लिए, अस्थिर रक्त शर्करा के कारण वजन कम करना बहुत मुश्किल हो जाता है। शरीर वसा-भंडारण मोड में बना रहता है। इंसुलिन प्रतिक्रिया में सुधार करके, वजन घटाने वाले इंजेक्शन अतिरिक्त इंसुलिन के स्तर को कम करने में मदद करते हैं जो शरीर को वसा-भंडारण मोड में बनाए रखता है। जब इंसुलिन संकेत अधिक संतुलित हो जाते हैं, तो कोशिकाएं ऊर्जा के लिए संग्रहित वसा का अधिक आसानी से उपयोग कर पाती हैं, जिससे वजन कम करना अधिक स्थिर और लंबे समय तक बनाए रखना आसान हो जाता है। एक सिरिंज पकड़े हुए हाथ और एक संदेश जिसमें लिखा है "वजन घटाने वाले इंजेक्शन कितनी जल्दी असर करते हैं" वजन घटाने वाले इंजेक्शन कितनी जल्दी असर दिखाना शुरू कर देते हैं? वजन घटाने वाले इंजेक्शन अक्सर पहले एक से दो हफ्तों में असर दिखाना शुरू कर देते हैं। शुरुआती बदलाव आमतौर पर आंतरिक होते हैं, न कि वजन मापने वाली मशीन पर दिखाई देते हैं।  जैसे-जैसे हार्मोन और चयापचय स्थिर होने लगते हैं, अगले कुछ हफ्तों में वजन में स्पष्ट कमी आने लगती है।   सप्ताह 1-2: भूख में कमी आमतौर पर पहले एक से दो हफ्तों में ही लक्षण दिखने लगते हैं।  भूख में कमी अक्सर शुरुआत में ही शुरू हो जाती है। शोध परीक्षणों में, जिन लोगों को सेमाग्लूटाइड का इंजेक्शन दिया गया, उन्होंने जानबूझकर कैलोरी कम किए बिना भी अपनी कैलोरी की मात्रा में 24-35% की कमी देखी। आपको पाचन क्रिया में भी शुरुआती बदलाव नज़र आ सकते हैं।  जल्दी पेट भर जाना या लंबे समय तक पेट भरा रहना आम बात है। कई लोगों के लिए, यही वह पल होता है जब उन्हें एहसास होता है कि भूख कम होने में अब महीनों नहीं लगे हैं। यह अक्सर दिखने वाले पहले बदलावों में से एक होता है।   सप्ताह 3-6: वजन में स्पष्ट कमी शुरू होती है तीसरे और छठे सप्ताह के बीच, शारीरिक बदलाव अक्सर अधिक स्पष्ट होने लगते हैं।  यही वह समय होता है जब वजन घटाने वाले इंजेक्शन के परिणाम वास्तविक लगने लगते हैं। वजन में लगातार बदलाव आना शुरू हो सकता है। कपड़े पहले की तरह फिट होने लग सकते हैं। कुछ लोगों को रक्त शर्करा के स्थिर होने के साथ-साथ ऊर्जा में वृद्धि का अनुभव होता है। पहले महीने में आपका कितना वजन कम होता है,  यह अलग-अलग हो सकता है। शुरुआती वजन, इंसुलिन प्रतिरोध और जीवनशैली में बदलाव जैसे कारक महत्वपूर्ण होते हैं।    सप्ताह 8-12 और उसके बाद: स्थायी वसा हानि पहले दो से तीन महीनों के बाद, वज़न कम होना ज़्यादा स्थिर और अनुमानित लगने लगता है।  वसा का कम होना तेज़ गति के बजाय ज़्यादा नियमित हो जाता है। यही वो समय होता है जब दीर्घकालिक वज़न प्रबंधन आकार लेना शुरू करता है। चयापचय में समय के साथ सुधार होता रहता है। भूख का नियंत्रण स्थिर हो जाता है। रक्त शर्करा नियंत्रण में सुधार होता है। क्योंकि यह एक साप्ताहिक इंजेक्शन द्वारा ली जाने वाली वज़न घटाने की दवा है, इसलिए खुराक का समायोजन परिणामों और सहनशीलता दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सही तरीके से इस्तेमाल करने पर, … Read more

बुंडीबुग्यो स्ट्रेन से फैला ईबोला: लक्षण, खतरा और WHO की चेतावनी

नई दिल्ली विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने हाल ही में डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और युगांडा में फैले ईबोला वायरस इंटरनेशनल इमरजेंसी ऑफ कंसर्न यानी सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति की अंतरराष्ट्रीय चिंता की घोषित कर दी है. यह बीमारी बुंडीबुग्यो वायरस के कारण हो रही है, जो ईबोला वायरस का ही एक घातक स्ट्रेन है.   यह स्ट्रेन पहले की ज्यादातर महामारियों में फैलने वाले जैरे (Zaire) स्ट्रेन से अलग है. बुंडीबुग्यो स्ट्रेन की खोज 2007-2008 में युगांडा के बुंडीबुग्यो जिले में हुई थी, जहां यह पहली बार सामने आया. तब इसने 116 से ज्यादा लोगों को संक्रमित किया था और करीब 34-40 प्रतिशत मौतें हुई थीं. अब DRC के इटुरी प्रांत में यह 17वीं बार ईबोला का प्रकोप है, लेकिन इस बार वायरस का प्रकार अलग है. इस स्ट्रेन के लिए कोई स्पेशन वैक्सीन या खास दवा नहीं है, जो इसे और भी चुनौतीपूर्ण बनाता है. ईबोला वायरस कई प्रकार का होता है, लेकिन इंसानों में बड़े प्रकोप मुख्य रूप से तीन स्ट्रेन से होते हैं – ज़ैरे, सूडान और बुंडीबुग्यो. ज़ैरे स्ट्रेन सबसे घातक माना जाता है, जिसमें 60-90 प्रतिशत तक मौतें हो सकती हैं. बुंडीबुग्यो स्ट्रेन में कम घातक है. पिछली घटनाओं में इसकी मृत्यु दर औसतन 32-40 प्रतिशत रही है, हालांकि कुछ रिपोर्ट्स में इसे 50 प्रतिशत तक बताया गया है. यह दर इलाज की उपलब्धता, मरीज की उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और संक्रमण की गंभीरता पर निर्भर करती है. फिर भी यह वायरस बहुत खतरनाक है क्योंकि यह तेजी से फैल सकता है. बिना उचित देखभाल के कई लोगों की जान ले सकता है. DRC के घने उष्णकटिबंधीय जंगलों में यह वायरस प्राकृतिक रूप से मौजूद रहता है. चमगादड़ जैसे जानवर इसके रिजर्वायर हो सकते हैं. बुंडीबुग्यो ईबोला के लक्षण क्या हैं? ईबोला के सभी स्ट्रेन के लक्षण लगभग एक जैसे होते हैं, लेकिन वे धीरे-धीरे बढ़ते हैं. शुरुआती लक्षण फ्लू जैसे दिखते हैं – अचानक तेज बुखार, सिरदर्द, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द, थकान और कमजोरी. कुछ दिनों बाद उल्टी, दस्त, पेट दर्द और गले में खराश जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं. बीमारी बढ़ने पर गंभीर लक्षण दिखते हैं जैसे आंखों, मसूड़ों या अन्य जगहों से बिना वजह खून बहना, शरीर में चोट के निशान, सांस लेने में तकलीफ और अंगों का फेल होना. संक्रमण के 2 से 21 दिनों के अंदर लक्षण दिख सकते हैं. वायरस शरीर के तरल पदार्थों (खून, उल्टी, दस्त, लार आदि) के सीधे संपर्क से फैलता है. मृत व्यक्ति के शरीर को छूने या दफनाने जैसी रस्मों के दौरान भी खतरा बहुत ज्यादा होता है. यह हवा, पानी या कीटों से नहीं फैलता. क्या यह ठीक हो सकता है?   बुंडीबुग्यो स्ट्रेन के लिए कोई खास एंटीवायरल दवा या वैक्सीन अभी नहीं है, जबकि ज़ैरे स्ट्रेन के लिए वैक्सीन और इलाज मौजूद हैं. इलाज मुख्य रूप से देखभाल पर निर्भर करता है. इसमें शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी पूरी करना, बुखार और दर्द की दवाएं देना, संक्रमण से बचाव के लिए एंटीबायोटिक्स अगर जरूरी हो, और गंभीर मामलों में ऑक्सीजन या ब्लड ट्रांसफ्यूजन शामिल है. जितनी जल्दी मरीज को अस्पताल में अलग-थलग करके इलाज शुरू किया जाए, उसके बचने की संभावना उतनी बढ़ जाती है. शुरुआती दिनों में सही देखभाल से कई मरीज बच जाते हैं. WHO और स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारी संपर्क ट्रेसिंग, संदिग्ध मरीजों को आइसोलेट करने और सुरक्षित दफनाने पर जोर दे रहे हैं. बीमारी को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय यात्रा पर पाबंदी नहीं लगानी चाहिए, बल्कि स्क्रीनिंग, जागरूकता और सीमा पर निगरानी बढ़ानी चाहिए. लोगों को सलाह दी जाती है कि संक्रमित क्षेत्र से आने वाले संपर्क में आए लोगों को 21 दिनों तक निगरानी में रखा जाए. हाथ धोना, संक्रमितों से दूरी बनाए रखना और जंगली जानवरों के संपर्क से बचना महत्वपूर्ण है. अफ्रीका के कई देशों में ईबोला बार-बार आता रहा है, लेकिन अच्छी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से इसे काबू में लाया जा सकता है. यह बीमारी इसलिए चिंताजनक है क्योंकि DRC और युगांडा की सीमा क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियां हैं, जो जांच और नियंत्रण को मुश्किल बनाती हैं. किंसासा और कंपाला में भी कुछ मामले सामने आए हैं. WHO ने सभी पड़ोसी देशों को अलर्ट रहने को कहा है. हालांकि यह महामारी स्तर का नहीं है, लेकिन सतर्कता जरूरी है.