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चर्चा में रहे 90 डिग्री ओवरब्रिज को सुधारने की जिम्मेदारी IIT भुवनेश्वर को, दूसरे पुलों की सुरक्षा पर बहस तेज

भोपाल मध्य प्रदेश में रेलवे ओवर ब्रिज (आरओबी) और फ्लाईओवर के निर्माण में सामने आ रही तकनीकी खामियों को दूर करने के लिए पीडब्ल्यूडी अब देश के प्रतिष्ठित आईआईटी संस्थानों की मदद ले रहा है. विभाग ने राज्य के कई बड़े प्रोजेक्ट्स की डिजाइन और तकनीकी जांच के लिए अलग-अलग आईआईटी के साथ अनुबंध किया है. अब तक आईआईटी दिल्ली, मुंबई, भुवनेश्वर और इंदौर को इस काम में शामिल किया जा चुका है।  भोपाल के ऐशबाग रेलवे ओवर ब्रिज का मामला सबसे ज्यादा चर्चा में रहा. इस ब्रिज के डिजाइन में 90 डिग्री का मोड़ होने के कारण इसकी काफी आलोचना हुई थी. अब इस बिगड़े हुए डिजाइन को सुधारने की जिम्मेदारी आईआईटी भुवनेश्वर को सौंपी गई है. पीडब्ल्यूडी इस ब्रिज की नई डिजाइन तैयार करवा रहा है ताकि भविष्य में लोगों को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।  एलीवेटेड कॉरिडोर का सर्वे आईआईटी दिल्ली को रीवा और जबलपुर के महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स की जिम्मेदारी दी गई है. दिल्ली आईआईटी विशेषज्ञों की टीम रीवा के एक प्रोजेक्ट और जबलपुर के एलीवेटेड कॉरिडोर का सर्वे कर रही है. इन तीनों परियोजनाओं की लागत करीब 500 करोड़ रुपए बताई जा रही है. इन प्रोजेक्ट्स का पहला सर्वे पूरा हो चुका है और तकनीकी सुधारों पर काम जारी है।  इटारसी के सांवलखेड़ा में बन रहे रेलवे ओवर ब्रिज में भी कुछ तकनीकी खामियां सामने आई थीं. इस परियोजना में आईआईटी मुंबई, आईआईटी दिल्ली के विशेषज्ञों के साथ मिलकर समाधान पर काम कर रहा है. एक्सपर्ट ब्रिज की डिजाइन और निर्माण गुणवत्ता की जांच कर रहे हैं।  कई गंभीर तकनीकी समस्याएं इसी तरह इंदौर में एलआईजी चौराहे से नवलखा तक बनने वाले 6.2 किलोमीटर लंबे एलीवेटेड कॉरिडोर में भी कई गंभीर तकनीकी समस्याएं मिली थीं. इस परियोजना की जांच और सुधार का काम आईआईटी इंदौर को दिया गया है।  पीडब्ल्यूडी का मानना है कि आईआईटी जैसे बड़े तकनीकी संस्थानों की मदद से ब्रिज और फ्लाईओवर की गुणवत्ता बेहतर होगी और भविष्य में डिजाइन संबंधी गलतियों को रोका जा सकेगा। 

अब रेंज की टेंशन खत्म! BYD की नई Dolphin EV पेट्रोल पर भी दौड़ेगी

 नई दिल्ली BYD की नई टेक्नोलॉजी DM-i की चर्चा इन दिनों खूब हो रही है. कंपनी इस टेक्नोलॉजी के बदौलत लोगों की रेंज एंजायटी को दूर कर सकती है. इस टेक्नोलॉजी पर बेस्ड कार कंपनी भारत में भी लॉन्च करने वाली है. खैर फिलहाल कंपनी ने इस टेक्नोलॉजी पर बेस्ड Dolphin G DM-i प्लग-इन हाइब्रिड को अनवील किया है।  ये हैचबैक यूरोपीय बाजार के लिए तैयार की गई है. बीवाईडी ने इस कार को यूरोपीय मार्केट की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया है. भारत के लिए भी कंपनी इस टेक्नोलॉजी को टीज कर चुकी है. इसका मतलब है कि बीवाईडी जल्द ही भारतीय बाजार में अपनी पहली हाइब्रिड कार को लॉन्च कर सकती है।  किनसे है कार का मुकाबला?  बात करें डॉल्फिन जी डीएम-आई की, तो ये कार 4160 एमएम लंबी है. इस कार का यूरोप में सीधा मुकाबला फॉक्सवैगन पोलो, रेनो क्लिओ (Renault Clio) और टोयोटा यारिस से होगा. जहां इस कार से मुकाबला करने वाली दूसरी गाड़ियों में माइल्ड हाइब्रिड या स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड सिस्टम मिलता है. वहीं डॉल्फिन जी प्लग-इन हाइब्रिड सेटअप के साथ आएगी।  नई कार के जरिए कंपनी उन यूजर्स को टार्गेट कर रही है, जो ईवी जैसे ड्राइविंग तो चाहते हैं, लेकिन पूरी तरह से चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर नहीं रहना चाहते हैं. इस कार की डिलीवरी यूरोप में 2026 के अंत तक शुरू हो सकती है. कार की कीमतों का ऐलान फिलहाल नहीं हुआ है।  1000Km की रेंज कंपनी का दावा है कि ये कार 1000 किलोमीटर (621 मील) की रेंज के साथ आएगी. यूरोप में मिलने वाली ज्यादातर हैचबैक इलेक्ट्रिक कार के मुकाबले ये रेंज ज्यादा है. हालांकि, बीवाईडी ने अभी इस कार की सभी डिटेल्स को रिवील नहीं किया है।  ब्रांड ने बताया है कि DM-i सिस्टम इलेक्ट्रिक ड्राइविंग को तवज्जो देता है और पेट्रोल इंजन एक रेंज एक्सटेंडर की तरह काम करता है. इससे लंबी दूरी का सफर आसान से किया जा सकता है. डॉल्फिन जी डीएम-आई में भी कंपनी इसी सेटअप का इस्तेमाल कर सकती है. इसमें 1.5 लीटर का पेट्रोल इंजन दिया जा सकता है।  कार फ्रंट माउंटेड इलेक्ट्रिक मोटर और बीवाईडी ब्लेड बैटरी टेक्नोलॉजी के साथ आएगी. ऐटो 2 डीएम-आई में कंपनी इस टेक्नोलॉजी को ऑफर करती है. ये कार 164 पीएस और 212 पीएम की पावर वेरिएंट के हिसाब से ऑफर करती है. रिपोर्ट्स की मानें, तो इस कार को कंपनी यूरोप में ही तैयार कर सकती है।   

सरकारी योजना ने दिलाई नई पहचान, झाबुआ के अर्पित अब हर महीने कमा रहे 25 हजार रुपए

सफलता की कहानी भगवान बिरसा मुण्डा योजना से झाबुआ के अर्पित बने आत्मनिर्भर  शुरू किया अमूल पार्लर अब हर माह कमा रहे 25 हजार रुपए भोपाल  जिंदगी में अपने पैरों पर खड़े होने की इच्छा हर इंसान के मन में होती है। हर व्यक्ति आर्थिक एवं सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर बनना चाहता है, लेकिन सफलता उसी को मिलती है जो अपने लक्ष्य को ध्यान में रखकर निरंतर मेहनत करता है। ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी है झाबुआ के वार्ड क्रमांक 16, मेघनगर नाका, के अर्पित पिता पारसिंह मचार की। उन्होंने स्वरोजगार के माध्यम से आत्मनिर्भर बनने की दिशा में सतत् प्रयास किया। अर्पित ने स्नातक तक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद निजी क्षेत्र में कार्य किया, लेकिन वे अपने कार्य से पूर्णतः संतुष्ट नहीं थे। उनके मन में स्वयं का व्यवसाय स्थापित करने की इच्छा थी। इसी उद्देश्य से उन्होंने अमूल पार्लर (मिल्क पार्लर) प्रारंभ करने का निर्णय लिया। व्यवसाय शुरू करने के लिए आर्थिक सहायता की आवश्यकता होने पर उन्होंने शासन की “भगवान बिरसा मुण्डा स्वरोजगार योजना” के अंतर्गत ऋण प्राप्त करने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने आदिवासी वित्त एवं विकास निगम, झाबुआ कार्यालय में संपर्क किया। 5 लाख के ऋण से शुरू किया अमूल पार्लर, अब हर माह हो रही 25 हजार रूपये की आय मध्यप्रदेश आदिवासी वित्त एवं विकास निगम, झाबुआ द्वारा भगवान बिरसा मुण्डा स्वरोजगार योजना अंतर्गत ऋण प्रकरण एम.पी. ऑनलाइन के माध्यम से भारतीय स्टेट बैंक, राजवाड़ा शाखा, झाबुआ को प्रेषित किया गया। बैंक द्वारा प्रकरण का परीक्षण करने के उपरांत अर्पित को 5 लाख रुपये का ऋण स्वीकृत किया गया। ऋण स्वीकृति प्राप्त होने के तुरंत बाद अर्पित ने अमूल पार्लर प्रारंभ कर अपना व्यवसाय शुरू किया। आज वे अपने व्यवसाय से प्रतिमाह लगभग 25 हजार रुपये की आय अर्जित कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने अपनी इकाई में एक अन्य व्यक्ति को सहायक के रूप में रोजगार भी प्रदान किया है। रोजगार की तलाश से आत्मनिर्भरता तक, अर्पित ने युवाओं को दिया प्रेरणा का संदेश  अर्पित का कहना है कि पहले वे रोजगार की तलाश में भटकते थे, लेकिन आज स्वयं का व्यवसाय संचालित कर आत्मनिर्भर बन चुके हैं। वे अपनी सफलता का श्रेय मध्यप्रदेश आदिवासी वित्त एवं विकास निगम द्वारा संचालित भगवान बिरसा मुण्डा स्वरोजगार योजना को देते हैं। उनका मानना है कि यदि मन में दृढ़ संकल्प और मेहनत करने का जज्बा हो तो सफलता अवश्य मिलती है। शासन की योजनाओं का लाभ लेकर युवा आत्मनिर्भर बन सकते हैं। ''भगवान बिरसा मुण्डा स्वरोजगार'' योजना के बारे में जानकारी मध्यप्रदेश सरकार द्वारा अनुसूचित जनजाति वर्ग के बेरोजगार युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के उद्देश्य से “भगवान बिरसा मुण्डा स्वरोजगार योजना” संचालित की जा रही है। योजना के तहत पात्र युवाओं को स्वयं का व्यवसाय स्थापित करने के लिए बैंकों के माध्यम से आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाती है। योजना के अंतर्गत विनिर्माण इकाई स्थापित करने हेतु 1 लाख रुपये से 50 लाख रुपये तक का ऋण प्रदान किया जाता है। इसके साथ ही हितग्राहियों को 7 वर्षों तक 5 प्रतिशत ब्याज अनुदान दिया जाता है तथा गारंटी फीस का भुगतान मध्यप्रदेश शासन द्वारा किया जाता है। योजना का लाभ लेने के लिए आवेदक को अनुसूचित जनजाति वर्ग का सदस्य होना अनिवार्य है। आवेदक की आयु 18 से 45 वर्ष के बीच होनी चाहिए। साथ ही आवेदक के पास अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) द्वारा जारी जाति प्रमाण पत्र, वार्षिक आय 12 लाख रुपये से कम होने का प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, कक्षा 8वीं उत्तीर्ण की अंकसूची, बैंक पासबुक की छायाप्रति, आधार कार्ड, पैन कार्ड, समग्र आईडी, राशन कार्ड, पासपोर्ट साइज फोटो एवं मोबाइल नंबर होना आवश्यक है। इस योजना में सेवा इकाई एवं खुदरा व्यवसाय के लिए भी 1 लाख रुपये से 25 लाख रुपये तक की परियोजनाओं को शामिल किया गया है। इसके अंतर्गत ब्यूटी पार्लर, वाहन मरम्मत, साइकिल रिपेयरिंग, किराना दुकान, फोटोकॉपी, फोटोग्राफी, ऑफसेट प्रिंटिंग प्रेस, मोटरसाइकिल रिपेयरिंग, इलेक्ट्रिकल कार्य, टेंट हाउस, ढाबा, होटल आदि व्यवसाय शुरू किए जा सकते हैं। वाहन संबंधी योजनाओं के लिए वैध ड्राइविंग लाइसेंस होना अनिवार्य रहेगा। पात्र युवक-युवतियां एमपी ऑनलाइन के माध्यम से अथवा अपने जिले के आदिवासी वित्त विकास निगम कार्यालय में संपर्क कर आवेदन कर सकते हैं। 

मध्य भारत को मिलेगा नया हाईवे कॉरिडोर, सिवनी से सावनेर तक सफर होगा तेज और आसान

सिवनी/छिंदवाड़ा मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के बीच संपर्क पहले की तुलना में आधुनिक और सुरक्षित होगी। इस दिशा में सिवनी-छिंदवाड़ा-सावनेर फोरलेन परियोजना महत्वपूर्ण साबित होगी। एनएचआई की तरफ से एनएच-547 और एनएच-347 के अंतर्गत प्रास्तावित परियोजना के लिए डीपीआर का कार्य प्रगति पर है। 158 किमी लंबा है यह कॉरिडोर करीब 158 किलोमीटर लंबे इस प्रस्तावित कॉरिडोर का उद्देश्य महाराष्ट्र के सावनेर-नागपुर औद्योगिक क्षेत्र को मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा एवं सिवनी के माध्यम से मध्य और उत्तर-पूर्वी मध्य प्रदेश से बेहतर ढंग से जोड़ना है। वर्तमान में यह मार्ग महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के बीच यातायात, औद्योगिक परिवहन, कृषि व्यापार एवं पर्यटन गतिविधियों के लिए प्रमुख संपर्क माध्यम के रूप में उपयोग किया जाता है। अब इसे फोर लेन में परिवर्तित किया जा रहा है। दोनों राज्यों के औद्योगिक ग्रोथ को मिलेगी नई दिशा वहीं, सिवनी–छिंदवाड़ा–सावनेर कॉरिडोर केवल एक सड़क परियोजना नहीं, बल्कि महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के बीच आर्थिक, औद्योगिक एवं व्यापारिक संपर्क को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण मार्ग माना जा रहा है। यह कॉरिडोर नागपुर एवं सावनेर जैसे महाराष्ट्र के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों को छिंदवाड़ा, सिवनी, नरसिंहपुर एवं मध्य भारत के अन्य हिस्सों से जोड़ता है। फोरलेन निर्माण के बाद महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश की ओर माल परिवहन अधिक तेज और सुगम हो सकेगा। छिंदवाड़ा–नागपुर कनेक्टिविटी को मिलेगा बढ़ावा प्रस्तावित फोरलेन परियोजना छिंदवाड़ा और नागपुर के बीच संपर्क को नई गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। वर्तमान में दोनों शहरों के बीच यात्रा के दौरान भारी वाहनों का दबाव,सीमित सड़क क्षमता एवं कई स्थानों पर धीमी यातायात गति यात्रियों और व्यापारिक परिवहन के लिए चुनौती बनी रहती है। फोरलेन निर्माण के बाद नागपुर से छिंदवाड़ा की यात्रा अधिक तेज और सुगम हो सकेगी। यात्रियों को मिलेगी बड़ी राहत अभी छिंदवाड़ा से सिवनी, नागपुर और आसपास के क्षेत्रों की यात्रा करने वाले लोगों को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मार्ग अधिकांश हिस्सों में दो-लेन या सीमित क्षमता वाला है, जबकि भारी वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कोयला परिवहन, औद्योगिक ट्रैफिक एवं लंबी दूरी के मालवाहक वाहनों के कारण कई स्थानों पर ट्रैफिक जाम की स्थिति बनती रहती है। पर्यटन एवं इको-टूरिज्म को मिलेगा लाभ यह कॉरिडोर मध्य प्रदेश के कई महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों तक पहुंच का प्रमुख मार्ग है। पेंच नेशनल पार्क, तामिया, पचमढ़ी, देवगढ़ किला, जाम सांवली हनुमान मंदिर एवं छिंदवाड़ा-सिवनी के प्राकृतिक वन क्षेत्र पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। मार्ग के निर्माण से पर्यटक इन स्थलों तक जल्दी पहुंच सकेंगे। सड़क सुरक्षा को ध्यान में रखकर डीपीआर यह कॉरिडोर वर्तमान में कई सड़क सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है। इसी को ध्यान में रखते हुए परियोजना की DPR तैयार की जा रही है, जिसमें सड़क सुरक्षा को प्रमुख प्राथमिकता दी गई है। यातायात घनत्व, दुर्घटना संभावित स्थानों, शहरी क्षेत्रों में बढ़ते दबाव और भविष्य की यातायात आवश्यकताओं का विस्तृत अध्ययन किया जा रहा है। क्षेत्रीय और रणनीतिक महत्त्व सिवनी–छिंदवाड़ा–सावनेर कॉरिडोर मध्य भारत के महत्वपूर्ण राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क का हिस्सा है। यह मार्ग NH-44, NH-47 तथा अन्य प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों से संपर्क स्थापित करता है, जिससे नागपुर, छिंदवाड़ा, सिवनी, नरसिंहपुर, जबलपुर, बैतूल और सागर जैसे शहरों के बीच तेज संपर्क उपलब्ध होता है। यह कॉरिडोर महाराष्ट्र के औद्योगिक क्षेत्र नागपुर को मध्य प्रदेश के वन, खनन, कृषि और पर्यटन क्षेत्रों से जोड़ता है। भविष्य में यह मार्ग वैकल्पिक उत्तर-दक्षिण संपर्क कॉरिडोर के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, जिससे NH-44 पर यातायात दबाव कम करने में सहायता मिलेगी।  

घुसपैठ रोकने में कारगर साबित हुई बॉर्डर फेंसिंग, बांग्लादेश सीमा पर अब हाईटेक सुरक्षा की तैयारी

  नई दिल्ली भारत की सुरक्षा व्यवस्था में बॉर्डर फेंसिंग एक अहम बदलाव साबित हुई है. खासकर पाकिस्तान के साथ लगने वाली सीमा पर बाड़ लगाने के बाद घुसपैठ और आतंकवादी गतिविधियों में काफी कमी आई है. वहीं पूर्वी सीमा यानी बांग्लादेश बॉर्डर पर अभी भी चुनौतियां बनी हुई हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यहां स्मार्ट फेंसिंग (Smart Fencing) लगाए बिना सुरक्षा को पूरी तरह मजबूत नहीं किया जा सकता।  पाकिस्तान के साथ भारत की 3323 किलोमीटर लंबी सीमा है. पहले इस सीमा पर खुली जगहों से आतंकियों और तस्करों के घुसपैठ की घटनाएं आम थीं. 1990 के दशक और 2000 के शुरुआती सालों में जम्मू-कश्मीर, पंजाब और राजस्थान सेक्टर में घुसपैठ के जरिए आतंकी हमले होते थे।  2010 के आसपास भारत सरकार ने पाकिस्तान बॉर्डर पर सीमा सुरक्षा बल (BSF) की मदद से फेंसिंग का काम तेज किया. आज ज्यादातर हिस्सों में ऊंची, मजबूत और बार्ड वायर वाली फेंसिंग लग चुकी है. इस फेंसिंग का सुरक्षा पर सकारात्मक असर साफ दिखता है. घुसपैठ की घटनाओं में भारी कमी आई है।  पहले जहां हर साल सैकड़ों घुसपैठ की कोशिशें होती थीं, अब उनकी संख्या बहुत कम हो गई है. फेंसिंग के साथ-साथ लाइटिंग, कैमरा और पेट्रोलिंग भी बढ़ाई गई, जिससे BSF को निगरानी रखने में आसानी हुई. खासकर जम्मू-कश्मीर और पंजाब में सुरक्षा स्थिति पहले की तुलना में बेहतर हुई है. कुछ इलाकों में टोपोग्राफी की वजह से फेंसिंग पूरी नहीं हो पाई है, लेकिन कुल मिलाकर पाकिस्तान बॉर्डर पर फेंसिंग ने सुरक्षा को मजबूत किया है।  बांग्लादेश बॉर्डर पर क्यों जरूरी है फेंसिंग? बांग्लादेश के साथ भारत की 4096 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो दुनिया की सबसे लंबी स्थलीय सीमाओं में से एक है. यह सीमा पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम से होकर गुजरती है. यहां की जमीन ज्यादातर समतल, नदी-नालों और घने जंगलों वाली है. इस वजह से फेंसिंग लगाना मुश्किल और महंगा है. अब भी कई हिस्सों में कोई फेंसिंग नहीं है।  बांग्लादेश बॉर्डर पर मुख्य चुनौतियां हैं – अवैध घुसपैठ, गाय तस्करी, ड्रग्स तस्करी, हथियारों की तस्करी और कभी-कभी आतंकियों का आना-जाना. चूंकि दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, भाषाई और पारिवारिक संबंध हैं, इसलिए सीमा पार करना थोड़ा आसान है. यही वजह है कि सुरक्षा बलों को 24 घंटे सतर्क रहना पड़ता है.  स्मार्ट फेंसिंग क्यों जरूरी है? साधारण फेंसिंग के बजाय स्मार्ट फेंसिंग की जरूरत इसलिए पड़ी है क्योंकि बांग्लादेश बॉर्डर की भौगोलिक स्थिति अलग है. स्मार्ट फेंसिंग में सेंसर, CCTV कैमरा, इंफ्रारेड डिटेक्टर, ड्रोन निगरानी, AI आधारित मॉनिटरिंग और रियल-टाइम अलर्ट सिस्टम शामिल होते हैं।  यह सिस्टम रात में भी काम करता है. घुसपैठ को तुरंत पकड़ लेता है और कंट्रोल रूम में अलर्ट भेजता है. इससे जवानों की जान बचती है. छोटी-छोटी घटनाओं को बढ़ने से रोका जा सकता है. सरकार पहले ही पायलट प्रोजेक्ट के रूप में कुछ इलाकों में स्मार्ट फेंसिंग लगा चुकी है. अब इसे पूरे बॉर्डर पर फैलाने की योजना है।  स्मार्ट फेंसिंग पारंपरिक तार की बाड़ से काफी आगे की आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था है. इसमें साधारण फेंसिंग को सेंसर, कैमरा, AI और रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम के साथ जोड़ दिया जाता है, ताकि सीमा पर कोई भी गतिविधि तुरंत पकड़ी जा सके. यह तकनीक खासकर लंबी और चुनौतीपूर्ण सीमाओं पर बहुत उपयोगी है।  स्मार्ट फेंसिंग में क्या-क्या होता है? फिजिकल फेंस       ऊंची (8-10 फीट) मजबूत स्टील की बाड़ जिसमें बार्ब्ड वायर या इलेक्ट्रिफाइड तार लगे होते हैं.     कुछ जगहों पर डबल लेयर फेंसिंग (दो दीवारें) भी लगाई जाती है. सेंसर सिस्टम       मोशन सेंसर: कोई व्यक्ति या वस्तु पास आने पर डिटेक्ट करते हैं.     इंफ्रारेड (IR) सेंसर: रात में भी गर्मी वाली वस्तुओं (मानव शरीर) को पकड़ते हैं.     फाइबर ऑप्टिक सेंसर: फेंस पर कट या चढ़ाई करने पर अलर्ट.     वाइब्रेशन सेंसर: फेंस हिलने या काटने पर सिग्नल भेजते हैं. कैमरा नेटवर्क       PTZ कैमरा (Pan-Tilt-Zoom) जो 360 डिग्री घूम सकते हैं.     थर्मल इमेजिंग कैमरा (रात में बिना रोशनी के देख सकते हैं).     AI आधारित कैमरा जो इंसान, जानवर या वाहन को अलग-अलग पहचान सकते हैं. AI और सॉफ्टवेयर       आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस गलत अलर्ट (जैसे जानवर) को फिल्टर करता है.     मशीन लर्निंग से सिस्टम समय के साथ और स्मार्ट होता जाता है.     रियल-टाइम एनालिसिस करके कंट्रोल रूम को अलर्ट भेजता है. कमांड एंड कंट्रोल सेंटर       सभी सेंसर और कैमरे एक केंद्रीय कंट्रोल रूम से जुड़े होते हैं.     BSF जवान 24×7 मॉनिटरिंग करते हैं.     अलर्ट मिलते ही तुरंत रिस्पॉन्स टीम भेजी जाती है. अन्य टेक्नोलॉजी       ड्रोन पेट्रोलिंग     सोलर पावर बैकअप     GPS ट्रैकिंग     मोबाइल ऐप पर अलर्ट भारत में स्मार्ट फेंसिंग की स्थिति भारत सरकार ने कॉम्प्रिहेंसिव इंटीग्रेटेड बॉर्डर मैनेजमेंट सिस्टम (CIBMS) के तहत स्मार्ट फेंसिंग को बढ़ावा दिया है. पाकिस्तान बॉर्डर पर पहले ही काफी हद तक फेंसिंग + स्मार्ट टेक्नोलॉजी लग चुकी है. बांग्लादेश बॉर्डर पर पायलट प्रोजेक्ट चल रहे हैं. बांग्लादेश बॉर्डर पर स्मार्ट फेंसिंग जल्दी पूरी करने की तैयारी चल रही है।  फायदे     24×7 निगरानी: रात-दिन काम करता है.     कम मैनपावर: कम जवानों के साथ ज्यादा क्षेत्र कवर होता है.     तेज प्रतिक्रिया: अलर्ट मिलते ही एक्शन लिया जा सकता है.     कम घुसपैठ: तस्करी और अनधिकृत प्रवेश में भारी कमी.     डेटा संग्रह: लंबे समय में पैटर्न विश्लेषण करके बेहतर प्लानिंग. चुनौतियां     उच्च लागत: शुरुआती खर्च बहुत ज्यादा है.     रखरखाव: नदियों, बाढ़ और जंगलों वाले इलाकों में रखरखाव मुश्किल.     तकनीकी ट्रेनिंग: BSF जवानों को नई टेक्नोलॉजी का प्रशिक्षण देना पड़ता है.     बिजली और इंटरनेट: दूर-दराज के इलाकों में बिजली और कनेक्टिविटी की समस्या. पाकिस्तान बॉर्डर vs बांग्लादेश बॉर्डर पाकिस्तान बॉर्डर पर फेंसिंग मुख्य रूप से आतंकवाद और सैन्य घुसपैठ रोकने के लिए लगाई गई. वहीं बांग्लादेश बॉर्डर पर समस्या ज्यादातर आर्थिक, सामाजिक और अपराधिक है. यहां बड़े पैमाने पर अवैध माइग्रेशन होता है, जो स्थानीय संसाधनों और कानून-व्यवस्था पर दबाव डालता है।  स्मार्ट फेंसिंग बांग्लादेश बॉर्डर पर इसलिए ज्यादा जरूरी है क्योंकि यहां पारंपरिक फेंसिंग लगाना मुश्किल है. नदियां, दलदल और घने जंगल … Read more

Cheap Phone Offer पड़ सकता है भारी! साइबर विंग ने लोगों को किया सावधान

नई दिल्ली भारत में ऑनलाइन शॉपिंग का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है, खासकर स्मार्टफोन खरीदने के लिए लोग ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर काफी भरोसा कर रहे हैं. हर महीने हजारों लोग ई-कॉमर्स या अन्य वेबसाइट्स से मोबाइल फोन खरीदते हैं। जैसे-जैसे ऑनलाइन खरीदारी का ट्रेंड बढ़ा है, वैसे-वैसे साइबर अपराधियों ने भी नए-नए तरीके को अपनाकर लोगों को ठगना शुरू कर दिया है. आज साइबर ठग केवल फर्जी कॉल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नकली वेबसाइट, सोशल मीडिया विज्ञापन, फर्जी डिलीवरी एजेंट, रिफंड फ्रॉड और स्क्रीन शेयरिंग ऐप्स के जरिए लोगों के बैंक खाते खाली कर रहे हैं। खास बात यह है कि ज्यादातर लोग बड़े डिस्काउंट, फ्लैश सेल और 'सीमित समय ऑफर' के लालच में आकर ठगी का शिकार बन जाते हैं. राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में ऑनलाइन शॉपिंग से जुड़े साइबर फ्रॉड के मामलों में लगभग 38 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की है।  एक्सपर्ट का कहना है कि फेस्टिवल, सेल सीजन और नए स्मार्टफोन लॉन्च के दौरान ऐसे मामलों में तेजी से उछाल आता है। मोबाइल शॉपिंग फ्रॉड? साइबर क्रिमिनल्स कौन सा अपनाते हैं तरीका. 1. फर्जी ई-कॉमर्स वेबसाइट्स का जाल साइबर अपराधी बिल्कुल असली वेबसाइट जैसी दिखने वाली नकली साइट तैयार करते हैं. इन वेबसाइट्स पर महंगे फोन बेहद कम कीमत में दिखाए जाते हैं। उदाहरण के तौर पर 1 लाख रुपये का फोन 25 या 30 हजार रुपये में ऑफर किया जाता है. यूजर जब वेबसाइट पर जाकर पेमेंट करते हैं, तो या तो डिलीवरी नहीं होती या फिर खाली डिब्बा भेज दिया जाता है. कई मामलों में वेबसाइट कुछ दिनों बाद गायब भी हो जाती है। 2 सोशल मीडिया विज्ञापनों से ठगी इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब पर 90 प्रतिशत डिस्काउंट, स्टॉक क्लियरेंस सेल या सरकारी नीलामी जैसे विज्ञापन चलाए जाते हैं. इन विज्ञापनों पर क्लिक करते ही यूजर फर्जी वेबसाइट पर पहुंच जाता है. एक्सपर्ट के अनुसार, सोशल मीडिया पर दिखने वाले हर विज्ञापन की सत्यता जांचना जरूरी है क्योंकि ठग अब AI आधारित डिजाइन और नकली रिव्यू का इस्तेमाल कर रहे हैं। 3. नकली कस्टमर केयर और रिफंड फ्रॉड कई बार लोग किसी ऑनलाइन ऑर्डर की शिकायत करने के लिए इंटरनेट पर कस्टमर केयर नंबर खोजते हैं. साइबर अपराधी गूगल सर्च में फर्जी नंबर डाल देते हैं. जैसे ही ग्राहक कॉल करता है, उसे AnyDesk, TeamViewer या QuickSupport जैसे ऐप डाउनलोड करवाए जाते हैं. फिर  स्क्रीन शेयर होते ही ठग बैंकिंग ऐप, यूपीआई और OTP तक पहुंच बना लेते हैं. कुछ ही मिनटों में अकाउंट खाली हो जाता है। 4. फर्जी पेमेंट लिंक और फिशिंग ठग WhatsApp, SMS या ईमेल के जरिए भुगतान लिंक भेजते हैं. लिंक बिल्कुल असली वेबसाइट जैसा दिखाई देता है. यूजर जैसे ही कार्ड डिटेल या यूपीआई जानकारी भरता है, उसकी सारी जानकारी अपराधियों के पास पहुंच जाती है. साइबर सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक भारत में हर दिन हजारों फिशिंग लिंक एक्टिव किए जाते हैं। 5. डिलीवरी स्कैम कुछ मामलों में ठग खुद को डिलीवरी एजेंट बताते हैं. वे कहते हैं कि 'डिलीवरी कन्फर्म करने के लिए OTP बताइए' या 'QR कोड स्कैन करें. लोग बिना सोचे-समझे जानकारी साझा कर देते हैं और उनके खाते से पैसे निकल जाते हैं। क्यों तेजी से बढ़ रहे हैं ऐसे अपराध? साइबर मामलों से जुड़े एक्सपर्ट यह मानते हैं कि डिजिटल पेमेंट और ऑनलाइन खरीदारी के विस्तार के साथ साइबर अपराधियों को नए अवसर मिल रहे हैं. भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 95 करोड़ से अधिक पहुंच चुकी है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी ऑनलाइन खरीदारी तेजी से बढ़ रही है. युवा वर्ग जल्दी डिस्काउंट और ऑफर के चक्कर में आ जाता है. कई लोग साइबर सुरक्षा के बेसिक नियमों से अनजान हैं. यही कारण है कि साइबर ठग लगातार नए तरीके विकसित कर रहे हैं। कैसे पहचाने कि ऑनलाइन ऑफर फर्जी है? यदि कोई फोन बाजार मूल्य से आधे या उससे भी कम दाम पर मिल रहा है, तो सतर्क हो जाइए. कई नकली वेबसाइट्स असली नाम से मिलते-जुलते डोमेन बनाती हैं. इसमे ऑफर या फेक सेल जैसे नाम हैं. देकर प्रोडक्ट को जल्द से जल्द बेचने का प्रयास उनके द्वारा किया जाता है. इस दौरान जब उपभोक्ता ऑनलाइन पेमेंट के लिए जाता है तो वेबसाइट केवल एडवांस पेमेंट मांग रही है और COD विकल्प नहीं दे रही, तो शक करना चाहिए। फर्जी वेबसाइट्स पर अक्सर टूटी-फूटी हिंदी या अंग्रेजी होती है. कई बार सभी रिव्यू एक जैसे दिखते हैं तो आप समझ जाइए कि यहां पर ऑनलाइन फ्रॉड होने वाला है. अगर इस तरीके के ऑफर आ रहे हैं तो भी समझिए कि यह फ्रॉड करने वाली वेबसाइट है. केवल 5 मिनट का ऑफर, अभी खरीदें वरना मौका खत्म, जैसे मैसेज लोगों पर मानसिक दबाव बनाते हैं। कैसे सुरक्षित ऑनलाइन खरीदारी करें केवल भरोसेमंद प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करें मोबाइल हमेशा ऑथराइज्ड वेबसाइट या जाने-माने ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से खरीदें. ब्रांड की ऑफिशियल साइट सबसे सुरक्षित विकल्प मानी जाती है। वेबसाइट का URL जरूर जांचें वेबसाइट के नाम के आगे HTTPS और लॉक का निशान देखें. गलत स्पेलिंग वाली साइट से बचें. डिलीवरी के समय वीडियो रिकॉर्ड करें   फोन की अनबॉक्सिंग करते समय वीडियो रिकॉर्ड करना सुरक्षित माना जाता है. इससे विवाद की स्थिति में सबूत रहता है. IMEI नंबर चेक करें फोन मिलने के बाद *#06# डायल करके IMEI नंबर देखें और बॉक्स पर लिखे नंबर से मिलाएं.संचार साथी पोर्टल पर भी IMEI की जांच की जा सकती है. OTP और UPI PIN कभी साझा न करें कोई भी बैंक, कंपनी या डिलीवरी एजेंट OTP नहीं मांगता. OTP साझा करना सीधे खाते तक पहुंच देना है. स्क्रीन शेयरिंग ऐप्स से दूर रहें अनजान व्यक्ति के कहने पर AnyDesk या TeamViewer जैसे ऐप डाउनलोड न करें. लोगों को बचाने के लिए सरकार चला रही अभियान सरकार लगातार साइबर अपराध रोकने के लिए अभियान चला रही है. गृह मंत्रालय के तहत इंडियन साइबर क्राइम कॉर्डिनेशन सेंटर्स (I4C) लोगों को जागरूक करने के लिए डिजिटल कैंपेन चला रहा है.इसके अलावा बैंकों और ई-कॉमर्स कंपनियों को भी सुरक्षा बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं.  कई फर्जी वेबसाइट्स और साइबर गैंग्स के खिलाफ कार्रवाई की जा चुकी है। ऑनलाइन मोबाइल खरीदारी सुविधाजनक जरूर है, लेकिन थोड़ी सी लापरवाही … Read more

कांटों का ताज पहनेंगे डीके शिवकुमार? अगले 24 महीने तय करेंगे कांग्रेस का भविष्य

बेंगलुरु कर्नाटक की राजनीति में सत्ता परिवर्तन सिर्फ चेहरा बदलने की कहानी नहीं है, यह कांग्रेस के भविष्य की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुकी है. सिद्धारमैया के इस्तीफे के बाद डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलने जा रही है. लेकिन यह ताज फूलों का नहीं बल्कि कांटों का माना जा रहा है. कांग्रेस हाईकमान ने यह फैसला ऐसे वक्त में लिया है, जब पार्टी दक्षिण भारत में अपनी सबसे मजबूत सरकार को किसी भी कीमत पर बचाए रखना चाहती है. राहुल गांधी की रणनीति साफ है. कर्नाटक को 2028 चुनाव तक कांग्रेस का मॉडल राज्य बनाना है. लेकिन मुश्किल यह है कि पिछले चार दशक में यहां कोई भी सत्ताधारी दल लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी नहीं कर पाया है. ऐसे में शिवकुमार के सामने सिर्फ सरकार चलाने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि उन्हें इतिहास बदलने की जिम्मेदारी भी निभानी होगी. यही वजह है कि दिल्ली से लेकर बेंगलुरु तक इस बदलाव को कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक दांव माना जा रहा है।  डीके शिवकुमार को संगठन का मजबूत खिलाड़ी माना जाता है. संकट के समय विधायकों को संभालने से लेकर पार्टी को टूटने से बचाने तक उन्होंने कई बार अपनी उपयोगिता साबित की है. लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद समीकरण पूरी तरह बदल जाएंगे. अब उन्हें विपक्ष के साथ-साथ अपनी ही पार्टी के भीतर असंतोष को भी साधना होगा. सिद्धारमैया भले ही कुर्सी छोड़ चुके हों, लेकिन उन्होंने राज्यसभा जाने से इनकार कर यह संकेत दे दिया है कि वह अभी भी कर्नाटक की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाएंगे. इसका मतलब साफ है कि शिवकुमार को हर फैसले में राजनीतिक संतुलन बनाकर चलना होगा. कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता यह भी है कि अगर जातीय समीकरण बिगड़े तो भाजपा और जेडीएस इसका बड़ा फायदा उठा सकते हैं।  40 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ने की चुनौती     कर्नाटक में पिछले 40 सालों से कोई भी सरकार लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में नहीं लौटी है. कांग्रेस चाहती है कि डीके शिवकुमार इस मिथक को तोड़ें. पार्टी का मानना है कि उनकी आक्रामक शैली और संगठन पर पकड़ आगामी चुनावों में फायदा दिला सकती है. लेकिन यह राह आसान नहीं होगी, क्योंकि सत्ता विरोधी लहर को रोकना सबसे मुश्किल काम माना जाता है।      सिद्धारमैया के हटने से कुरुबा समुदाय में नाराजगी की संभावना जताई जा रही है. कांग्रेस इसे संतुलित करने के लिए उनके बेटे यतींद्र को बड़ी जिम्मेदारी दे सकती है. दूसरी ओर, वोक्कालिगा समुदाय में डीके शिवकुमार की मजबूत पकड़ पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक लाभ बन सकती है. कांग्रेस को उम्मीद है कि जेडीएस का पारंपरिक वोट बैंक धीरे-धीरे उसकी तरफ शिफ्ट होगा।      राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिवकुमार की सबसे बड़ी ताकत उनकी ‘फाइटर’ वाली छवि है. वह जमीनी नेता माने जाते हैं और गांधी परिवार के बेहद करीबी भी हैं. यही कारण है कि राहुल गांधी उन्हें भविष्य के बड़े चेहरे के रूप में देख रहे हैं. हालांकि भाजपा पहले ही कांग्रेस के भीतर संभावित खींचतान को मुद्दा बनाना शुरू कर चुकी है।  सिद्धारमैया की मौजूदगी बनेगी दबाव? सिद्धारमैया का दिल्ली राजनीति से दूरी बनाना कई संकेत देता है. वह बेंगलुरु में रहकर अपनी राजनीतिक पकड़ कमजोर नहीं होने देना चाहते. इससे डीके शिवकुमार पर लगातार दबाव बना रहेगा. कांग्रेस नेतृत्व भले इसे सहज परिवर्तन बता रहा हो, लेकिन अंदरखाने दोनों खेमों के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी।  डीके शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी? डीके शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती 2028 विधानसभा चुनाव से पहले एंटी-इंकंबेंसी को नियंत्रित करना होगी. कर्नाटक में पिछले चार दशक से कोई भी सरकार दोबारा सत्ता में नहीं लौटी है. ऐसे में उन्हें विकास, संगठन और जातीय संतुलन तीनों मोर्चों पर सफल होना पड़ेगा. अगर सरकार के खिलाफ माहौल बनता है तो इसका सीधा असर कांग्रेस के राष्ट्रीय अभियान पर भी पड़ेगा।  सिद्धारमैया का सक्रिय रहना कांग्रेस के लिए फायदा है या नुकसान? यह दोनों तरह से असर डाल सकता है. सिद्धारमैया का अनुभव और AHINDA वोट बैंक कांग्रेस के लिए बड़ी ताकत है. लेकिन अगर उनके समर्थकों में असंतोष बढ़ता है तो डीके शिवकुमार के लिए फैसले लेना मुश्किल हो सकता है. इसलिए हाईकमान को दोनों नेताओं के बीच संतुलन बनाकर रखना होगा।  राहुल गांधी के लिए कर्नाटक इतना अहम क्यों है? कर्नाटक इस समय दक्षिण भारत में कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ है. पार्टी इसे 2029 लोकसभा चुनाव से पहले ‘गवर्नेंस मॉडल’ के तौर पर पेश करना चाहती है. अगर कांग्रेस यहां दोबारा सत्ता में लौटती है तो राहुल गांधी की राजनीतिक रणनीति को बड़ी मजबूती मिलेगी. इसलिए मुख्यमंत्री परिवर्तन को भविष्य की बड़ी चुनावी तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है।  वोक्कालिगा समीकरण से कांग्रेस को उम्मीद डीके शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं. कांग्रेस को भरोसा है कि इससे जेडीएस का प्रभाव कमजोर होगा. दक्षिण कर्नाटक की कई सीटों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है. यही वजह है कि पार्टी इस बदलाव को सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन नहीं बल्कि सामाजिक समीकरणों के पुनर्गठन के रूप में भी देख रही है  भाजपा की नजर कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान पर भाजपा पहले ही कांग्रेस के भीतर संभावित गुटबाजी को मुद्दा बनाने की तैयारी में है. पार्टी का मानना है कि सत्ता परिवर्तन के बाद असंतोष बढ़ सकता है. अगर कांग्रेस अंदरूनी संतुलन नहीं संभाल पाई तो भाजपा इसे अगले चुनाव में बड़ा हथियार बना सकती है।   

हाई ब्लड प्रेशर बना बड़ा खतरा, AIIMS विशेषज्ञ ने बताया हार्ट अटैक से बचने का आसान फॉर्मूला

नई दिल्ली  भारत का हर पांचवां वयस्क उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) से पीड़ित है। शहरी क्षेत्र के हर तीसरे और ग्रामीण क्षेत्र के हर चौथे व्यक्ति को हाई बीपी है। देश में यह तेजी से बड़े स्वास्थ्य संकट के रूप में उभर रहा है। यही वजह है कि यह तेजी से बढ़ती गैर-संचारी (संक्रामक) बीमारियों में शामिल है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-पांच (एनएफएचएस-पांच) के अनुसार देश में 15 वर्ष से अधिक आयु की लगभग 24 प्रतिशत पुरुष और 21 प्रतिशत महिलाएं उच्च रक्तचाप से प्रभावित हैं। यह भी सामने आया है कि बड़ी संख्या में लोगों को अपने उच्च रक्तचाप की जानकारी तक नहीं होती। दिल्ली जैसे महानगरों में बदलती जीवनशैली, तनाव, अधिक नमक व जंक फूड का सेवन, शारीरिक गतिविधि में कमी और मोटापा इसके प्रमुख कारण हैं। 40 साल से अधिक उम्र के पुरुषों का खतरा अधिक दिल्ली पर आधारित हालिया अध्ययन में बड़ी संख्या में लोगों में प्री-हाइपरटेंशन और उच्च रक्तचाप के मामले सामने आए हैं, विशेष रूप से 40 वर्ष से अधिक आयु के लोगों और पुरुषों में इसका खतरा अधिक पाया गया। एम्स के हृदय रोग विशेषज्ञ  डाॅ. ने बताया कि हर साल लाखों लोगों की जान लेने वाली यह बीमारी अधिकांशत: बिना किसी स्पष्ट लक्षण के शरीर को गंभीर नुकसान पहुंचाती रहती है और ज्यादातर पीड़ित इससे अनजान रहते हैं। डाॅ.  के अनुसार भारत में 30 करोड़ से अधिक वयस्क हाई बीपी से पीड़ित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में हर चौथा और शहरी क्षेत्रों में हर तीसरा व्यक्ति हाई पीबी से प्रभावित है। हर साल करीब 16 लाख लोगों की जान इसके कारण जाती है। यह टीबी से होने वाली मौत से कई गुना अधिक है। डाॅके अनुसार यदि लोगों का ब्लड प्रेशर औसतन सिर्फ दो अंक भी कम हो जाए, तो हर साल एक लाख से 1.6 लाख तक मौतों को रोका जा सकता है। यदि किसी व्यक्ति का ब्लड प्रेशर 140 से घटकर 138 हो जाए, तो इसे दो अंक (ब्लड प्रेशर नापने वाली इकाई एमएमएचजी) की कमी माना जाएगा। ऐसा होने पर देश में हार्ट अटैक, स्ट्रोक और किडनी की बीमारी के मामलों में बड़ी गिरावट आ सकती है। दिल, दिमाग और किडनी पर भारी पड़ रहा हाई ब्लड प्रेशर अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता सामंथा ओ'कोनेल के मुताबिक, सबसे चिंताजनक बात यह है कि लोगों में बीमारी के प्रति जागरूकता, इलाज और नियंत्रण, तीनों ही बेहद कमजोर हैं। यह समस्या केवल गरीब देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि विकसित देशों में भी स्थिति संतोषजनक नहीं है। आज हाइपरटेंशन हार्ट अटैक, स्ट्रोक, किडनी फेलियर और डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) का सबसे बड़ा कारण है। लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि ज्यादातर मामलों में इसके शुरुआती लक्षण दिखाई नहीं देते। इंसान अंदर ही अंदर बीमार होता रहता है और उसे पता तब चलता है जब पानी सिर से ऊपर गुजर जाता है। यहां तक कि जांच के बाद भी इसे नियंत्रित करना आसान नहीं होता। कई बार डॉक्टर इलाज से जुड़े नवीनतम दिशानिर्देशों का पालन नहीं कर पाते, जबकि मरीज नियमित रूप से दवाएं लेने और लंबे समय तक जीवनशैली में बदलाव बनाए रखने में संघर्ष करते हैं। अध्ययन में एक और चिंताजनक पहलु यह सामने आया है कि 2020 में दुनिया भर में हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित 20 फीसदी से भी कम लोगों का रक्तचाप नियंत्रित था। अमीर देशों में नियंत्रण की दर 40.2 फीसदी रही, जबकि निम्न और मध्यम आय वाले देशों में स्थिति कहीं ज्यादा बदतर है, जहां महज 13.6 फीसदी मरीज ही इसे कंट्रोल कर पा रहे हैं। अध्ययन की वरिष्ठ शोधकर्ता कैथरीन मिल्स का कहना है भले ही इस दिशा में कुछ प्रगति हुई हो, लेकिन वैश्विक स्तर पर रक्तचाप पर अभी भी बेहद कम नियंत्रण है। विडम्बना यह है कि प्रभावी दवाएं और इलाज मौजूद होने के बावजूद दुनिया इस बीमारी को काबू में नहीं कर पा रही। एशिया और अफ्रीका सबसे ज्यादा प्रभावित 119 देशों के 60 लाख से ज्यादा वयस्कों के आंकड़ों पर आधारित यह अध्ययन अब तक के सबसे व्यापक विश्लेषणों में से एक माना जा रहा है। नतीजे दर्शाते हैं कि 2020 तक दक्षिण अमेरिका, कैरिबियन और उप-सहारा अफ्रीका में हाइपरटेंशन की दर सबसे अधिक थी। वहीं कुल मरीजों की संख्या के लिहाज से पूर्वी एशिया और प्रशांत क्षेत्र पहले स्थान पर रहे, जबकि दक्षिण एशिया दूसरे स्थान पर रहा। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि कमजोर और समृद्ध देशों के बीच असमानता लगातार बढ़ रही है। 2000 में अनियंत्रित हाई ब्लड प्रेशर वाले 70 फीसदी लोग निम्न और मध्यम आय वाले देशों में रह रहे थे, जो 2020 तक बढ़कर 83 फीसदी हो गए हैं। उच्च रक्तचाप से जूझ रहे हैं भारत में 30 फीसदी से ज्यादा वयस्क विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा जारी रिपोर्ट 'ग्लोबल रिपोर्ट ऑन हाइपरटेंशन 2025' से पता चला है कि भारत में 21 करोड़ से ज्यादा वयस्क उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं। मतलब की देश की 30 फीसदी से ज्यादा वयस्क आबादी इस समस्या से जूझ रही है। इससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि इनमें से महज 39 फीसदी (8.22 करोड़) ही जानते हैं कि वो इस समस्या से पीड़ित हैं, जबकि करीब 83 फीसदी मरीजों यानी 17.3 करोड़ से ज्यादा का रक्तचाप नियंत्रित नहीं है। मतलब कि देश में हाई ब्लड प्रेशर के 17 फीसदी मरीजों में ही रक्तचाप नियंत्रित है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने इसपर किए अध्ययन में खुलासा किया है कि देश में करीब 34 फीसदी लोग प्री-हाइपरटेंशन का शिकार हैं। वहीं यदि देश में जिलों के आधार पर देखें तो यह आंकड़ा 15.6 फीसदी से 63.4 फीसदी दर्ज किया गया है। सच कहें तो देश में जिस तरह से खानपान की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है और जीवनशैली बदल रही है, उसके चलते स्वास्थ्य से जुड़ी अनगिनत समस्याएं पैदा हो रही हैं, ऊपर से तनाव यह सभी मिलकर भारतीयों को अंदर ही अंदर घुन की तरह खाए जा रहे हैं। कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था पर बढ़ता आर्थिक बोझ विशेषज्ञों के मुताबिक हाई ब्लड प्रेशर अब महज स्वास्थ्य से जुड़ा संकट नहीं रहा, बल्कि यह आर्थिक चुनौती भी बनता जा रहा है। कमजोर देशों में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को पहले ही संक्रामक रोगों, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य … Read more

स्वच्छता, आवास, तालाब सौंदर्यीकरण एवं ईको पार्क का किया अवलोकन

रायपुर स्वच्छता, आवास, तालाब सौंदर्यीकरण एवं ईको पार्क का किया अवलोकन नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग की सचिव शंगीता आर. ने आज गरियाबंद में विकास कार्यों का औचक निरीक्षण किया। उन्होंने नगर पालिका के वार्ड क्रमांक-7 में एमआरएफ सेंटर पहुंचकर स्वच्छता दीदियों से ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन, कचरा कलेक्शन और कचरे के अलग-अलग वर्गीकरण के बारे में विस्तृत जानकारी ली। उन्होंने स्वच्छता दीदियों द्वारा 110 प्रकार के कचरे को अलग-अलग वर्गीकृत किए जाने की जानकारी मिलने पर स्वच्छता दीदियों की सराहना की और कार्य के दौरान स्वास्थ्य सुरक्षा का विशेष ध्यान रखने को कहा। उन्होंने मास्क, दस्ताने, जैकेट, जूते और आवश्यक सुरक्षा सामग्री का अनिवार्य रूप से उपयोग करने को कहा। नगरीय प्रशासन विभाग की सचिव ने स्वसहायता समूह की महिलाओं को पीएम स्वनिधि योजना के माध्यम से लोन लेकर अपने स्वरोजगार को बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। साथ ही नागरिकों को डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण के साथ स्वच्छता के प्रति जागरूक करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि स्वच्छता को आदत में लाने पर ही नगरीय निकाय स्वच्छ और सुंदर बन सकेगा। इस दौरान उन्होंने बताया कि हाल ही में दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में छत्तीसगढ़ की 10 हजार से अधिक महिलाओं के द्वारा वर्षभर कचरा संग्रहण और पृथक्करण किए जाने की सराहना राष्ट्रीय स्तर पर की गई है। शंगीता आर. ने वार्ड क्रमांक-8 में केशरी नागेश के प्रधानमंत्री आवास का निरीक्षण कर समय-सीमा में निर्माण कार्य पूर्ण करने के निर्देश दिए, ताकि बरसात से पहले आवास का लाभ मिल सके। उन्होंने वार्ड क्रमांक-4 में तालाब सौंदर्यीकरण कार्य का अवलोकन करते हुए साफ-सफाई, पिचिंग और गहरीकरण का कार्य गुणवत्तापूर्ण ढंग से पूरा करने को कहा, जिससे नागरिकों को पर्याप्त निस्तारीकरण जल उपलब्ध हो सके और जल संवर्धन भी सुनिश्चित हो। विभागीय सचिव ने ईको पार्क का निरीक्षण कर पौधों की सुरक्षा, सिंचाई व्यवस्था, लगाए गए पौधों तथा ‘वीमन्स फार ट्री’ के तहत लगाए गए पौधों की जानकारी ली। उन्होंने पार्क को बेहतर पर्यावरणीय एवं मनोरंजक स्थल के रूप में विकसित करने के निर्देश दिए। गरियाबंद जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री प्रखर चंद्राकर, सूडा के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री शशांक पाण्डेय, नगरीय प्रशासन विभाग के अपर संचालक श्री पुलक भट्टाचार्य, संयुक्त संचालक श्री एस.के. सुंदरानी और सीएमओ संध्या वर्मा भी निरीक्षण के दौरान मौजूद थीं।

पुलिस महानिदेशक ने सभी को स्मृति चिन्ह भेंट कर किया सम्मानित

भोपाल  ​पुलिस मुख्यालय की विभिन्न शाखाओं से माह मई में सेवानिवृत्त 4 कर्मचारियों को पुलिस महानिदेशक कैलाश मकवाणा ने शुक्रवार को भावभीनी विदाई दी। पुलिस महानिदेशक ने सभी को पौधे एवं स्मृति चिन्ह भेंट किए और उनके स्वस्थ एवं सुखी जीवन की कामना की। सेवानिवृत्त कर्मचारियों को उनके विभिन्न स्वत्व (क्लेम) भुगतान के आदेश भी प्रदान किए गये। इस अवसर पर पुलिस महानिदेशक कैलाश मकवाणा ने अपने संबोधन में कहा कि पुलिस मुख्यालय से लगातार अनुभवी एवं समर्पित अधिकारी-कर्मचारी सेवानिवृत्त हो रहे हैं, जिनके साथ कार्य करने का उन्हें अवसर मिला है। उन्होंने कहा कि पुलिस विभाग में कार्य करना केवल नौकरी नहीं बल्कि चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी है, जहां देर रात तक एवं अवकाश के दिनों में भी कर्तव्यों का निर्वहन करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि आने वाली युवा पीढ़ी को भी इसी ऊर्जा, अनुशासन एवं जिम्मेदारी की भावना के साथ कार्य करना होगा, ताकि विभाग की गौरवशाली परंपरा निरंतर बनी रहे। नवीन पुलिस मुख्यालय भवन कॉन्फ्रेंस हॉल में आयोजित विदाई समारोह में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक ए.साईं मनोहर, उप पुलिस महानिरीक्षक किरणलता केरकट्टा एवं अन्य पुलिस अधिकारी, कर्मचारी एवं सेवानिवृत्त कर्मचारियों के परिजन उपस्थित थे। पुलिस मुख्यालय से सेवानिवृत्त मानसेवी उप पुलिस अधीक्षक अजाक सुनीता सिंह कुशवाह, मानसेवी उप पुलिस अधीक्षक विशेष शाखा मोहन लाल मेहरा, कार्यवाहक आंकिक/सूबेदार (एम) केन्द्रीय आवक जावक मुकेश मिश्रा एवं कार्यवाहक सहायक उप निरीक्षक विशेष शाखा दिनेश कुमार सक्सेना को पुलिस मुख्यालय परिवार ने शुक्रवार को भावभीनी विदाई दी। सहायक पुलिस महानिरीक्षक इरमीन शाह ने सेवानिवृत्त कर्मचारियों के कार्यकाल की जानकारी दी। विदाई समारोह में मौजूद अधिकारियों ने सेवानिवृत कर्मचारियों की मेहनत और लगन की सराहना की।