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बढ़ते टैरिफ तनाव के दौरान भारत ने अमेरिका से किया 7995 करोड़ का नेवी सौदा

नई दिल्ली  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ के साए में भी भारत-अमेरिका संबंधों को नई मजबूती मिल रही है। शुक्रवार को दोनों देशों ने भारतीय नौसेना के एमएच-60आर 'सीहॉक' हेलीकॉप्टर बेड़े के रखरखाव के लिए 7,995 करोड़ रुपये का महत्वपूर्ण रक्षा समझौता किया। यह सौदा न केवल नौसेना की परिचालन क्षमता को बढ़ाएगा, बल्कि व्यापारिक तनाव के बीच रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने का संकेत भी देता है। इससे पहले वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि साल के अंत तक व्यापार समझौता होने की संभावना है, जो टैरिफों को कम करने का रास्ता खोलेगा।   यह समझौता पांच साल के फॉलो-ऑन सपोर्ट और फॉलो-ऑन सप्लाई सपोर्ट के तहत किया गया है। भारतीय नौसेना ने इन अपग्रेडेड मल्टी-रोल हेलीकॉप्टरों के 24 यूनिट अमेरिकी सरकार से फॉरेन मिलिट्री सेल्स (FMS) कार्यक्रम के तहत 2020 में लगभग 2.4 अरब अमेरिकी डॉलर में खरीदे थे। इनमें से 15 हेलीकॉप्टर अब तक नौसेना में शामिल किए जा चुके हैं। MH-60R हेलीकॉप्टर लॉकहीड मार्टिन द्वारा निर्मित हैं और इन्हें एडवांस एंटी-सबमरीन वॉरफेयर सहित कई आधुनिक सैन्य भूमिकाओं के लिए जाना जाता है। हालिया दिनों में तीसरा बड़ा रक्षा सौदा यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका के डिफेंस सिक्योरिटी कोऑपरेशन एजेंसी (DSCA) ने कुछ ही दिन पहले भारत को दो बड़े हथियार पैकेजों की संभावित बिक्री को मंजूरी दी है। इसमें शामिल हैं:     एक्सकैलिबर प्रिसिजन गाइडेड प्रोजेक्टाइल और संबंधित उपकरण- अनुमानित लागत 47.1 मिलियन डॉलर     जैवलिन एंटी-टैंक मिसाइल सिस्टम और संबंधित उपकरण- अनुमानित लागत 45.7 मिलियन डॉलर आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम रक्षा मंत्रालय के अनुसार, नए LOAs पर हस्ताक्षर रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की उपस्थिति में हुए। मंत्रालय ने बताया कि यह सपोर्ट पैकेज एक व्यापक व्यवस्था है, जिसमें शामिल हैं-     स्पेयर पार्ट्स और सपोर्ट इक्विपमेंट की उपलब्धता     प्रोडक्ट सपोर्ट व प्रशिक्षण     तकनीकी सहायता     रिपेयर और कंपोनेंट रीप्लेनिशमेंट     भारत में ‘इंटरमीडिएट लेवल’ रिपेयर सुविधाओं और पीरियॉडिक मेंटेनेंस इंस्पेक्शन सेटअप की स्थापना मंत्रालय ने कहा कि भारत में इन सुविधाओं के विकास से लंबे समय में स्वदेशी क्षमता निर्माण होगा और अमेरिका पर निर्भरता कम होगी, जो सरकार के आत्मनिर्भर भारत विजन के अनुरूप है। इससे भारतीय MSMEs और अन्य घरेलू कंपनियों को भी रक्षा विनिर्माण और सेवाओं में नए अवसर मिलेंगे। परिचालन क्षमता में होगा बड़ा इजाफा मंत्रालय ने यह भी कहा कि यह सतत समर्थन पैकेज MH-60R हेलीकॉप्टरों की ऑपरेशनल उपलब्धता और मेंटेनबिलिटी को और अधिक मजबूत करेगा। ये हेलीकॉप्टर हर मौसम में उपयोग योग्य हैं और दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने व उन्हें निशाना बनाने की अत्याधुनिक क्षमता रखते हैं। इस नए समझौते के साथ, भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग एक नए स्तर पर पहुंच गया है, और भारतीय नौसेना की समुद्री सुरक्षा क्षमता और अधिक सुदृढ़ होने जा रही है। बता दें कि यह बेड़ा फरवरी 2020 में 15,157 करोड़ रुपये के मूल समझौते के तहत खरीदा गया था। पहली तीन इकाइयां 2021 में डिलीवर हुईं, और मार्च 2024 में कोच्चि के आईएनएस गरुड़ पर INAS 334 स्क्वाड्रन के रूप में पूरी तरह तैनात हो गया। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह सौदा लंबे समय में करोड़ों डॉलर की बचत करेगा, क्योंकि भारत में रखरखाव सुविधाओं का विकास होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सौदा हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ भारत की समुद्री शक्ति को मजबूत करेगा। एमएच-60आर हेलीकॉप्टरों की क्षमता से नौसेना को सबमरीन शिकार और सतह-से-सतह हमलों में बढ़त मिलेगी। व्यापारिक तनाव के बीच सकारात्मक संकेत यह रक्षा सौदा ऐसे समय में आया है जब अगस्त 2025 के अंत में ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिए थे। इसमें 25 प्रतिशत 'जवाबी' टैरिफ और अतिरिक्त 25 प्रतिशत 'पेनल्टी' (रूस से तेल आयात जारी रखने के कारण) शामिल हैं। ट्रंप ने इसे भारत की 'रूस के साथ निकटता' और पाकिस्तान-भारत तनाव में मध्यस्थता अस्वीकार करने से जोड़ा। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इसे 'अनुचित' बताते हुए कहा कि रूसी तेल आयात वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच 1.4 अरब नागरिकों के लिए आवश्यक है। हालांकि ट्रंप ने हाल ही में कहा कि भारत के साथ सौदा बहुत करीब है। रूसी तेल बंद होने से टैरिफ कम होंगे। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, एक वरिष्ठ भारतीय अधिकारी ने पुष्टि की कि साल के अंत तक व्यापार समझौता हो सकता है। इसमें भारत अमेरिकी ऊर्जा आयात बढ़ाएगा, जबकि अमेरिका कृषि उत्पादों (मकई, सोयाबीन) पर छूट देगा। संभावित रूप से टैरिफ 15-20 प्रतिशत तक गिर सकते हैं।

रामदेव की पतंजलि को कोर्ट की फटकार: मिलावटी घी मामले में कार्रवाई, कंपनी ने दी सफाई

देहरादून योग गुरु बाबा रामदेव की कंपनी पतंजलि पर गाय का घटिया घी बेचने का आरोप लगा है। इसके लिए कोर्ट के आदेश पर पतंजलि घी के निर्माता और वितरक पर कुल 1.40 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। हालांकि, पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड इस पर सफाई देते हुए इस आदेश को त्रुटिपूर्ण तथा विधि-विरुद्ध है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में पतंजलि घी के सैंपल फेल होने पर अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट कोर्ट ने पतंजलि घी के निर्माता, वितरक और खुदरा विक्रेता पर राज्य और सेंट्रल लैब में घी के सैंपल फेल होने के बाद क्रमशः 1.25 लाख और 15,000 रुपये का जुर्माना लगाया है। पिथौरागढ़ के सहायक खाद्य सुरक्षा आयुक्त आरके शर्मा ने न्यूज एजेंसी वार्ता को बताया, "एडीएम पिथौरागढ़ की अदालत में तीनों के खिलाफ खाद्य सुरक्षा अधिनियम की धारा 46/4 के तहत मामला दर्ज किया गया था, जिसने 19 नवंबर को फैसला सुनाया, जिसकी कॉपी हमें आज मिली।" शर्मा के अनुसार, अक्टूबर 2020 में घी के सैंपल एकत्र किए गए और रुद्रपुर स्थित राज्य खाद्य प्रयोगशाला में भेजे गए, जहां सैंपल फेल रहे। इसके बाद व्यापारियों ने सितंबर 2021 में केंद्र सरकार की प्रयोगशाला से टेस्ट कराने का अनुरोध किया, जहां सैंपलों को 2022 में फेल घोषित किया गया। पिथौरागढ़ के सहायक खाद्य सुरक्षा आयुक्त ने कहा, "उसके बाद उस समय हमारे खाद्य सुरक्षा अधिकारी दिलीप कुमार जैन को 17 फरवरी, 2022 को एसडीएम कोर्ट में मामला दर्ज करने का आदेश दिया गया था, जिसका फैसला इसी महीने 19 नवंबर को आया। कोर्ट के आदेश पर क्या बोली पतंजलि पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड की ओर से शुक्रवार को अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म 'एक्स' पर इसको लेकर स्पष्टीकरण जारी किया गया है। बयान में कहा गया, कि एक यह स्पष्टीकरण मीडिया रिपोर्ट से हमारे संज्ञान में आए खाद्य सुरक्षा विभाग, पिथौरागढ़ द्वारा 20 अक्टूबर 2020 को खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत लिए गए पतंजलि गाय का घी के नमूने के संदर्भ में मुकदमा और न्यायालय द्वारा संबंधित आदेश के विषय में है।‌ यह आदेश निम्नलिखित कारणों से त्रुटिपूर्ण तथा विधि-विरुद्ध है: 1.रेफरल प्रयोगशाला NABL से गाय के घी के परीक्षण के लिए मान्यता प्राप्त नहीं थी, इसलिए वहां किया गया परीक्षण कानून की दृष्टि से स्वीकार्य नहीं है। यह हास्यास्पद और घोर आपत्तिजनक है कि एक सब-स्टैंडर्ड लैब ने पतंजलि के सर्वश्रेष्ठ गाय के घी को सब-स्टैंडर्ड बताया है। 2.जिन पैरामीटरों के आधार पर नमूना असफल घोषित किया गया, वे उस समय लागू ही नहीं थे, इसलिए उनका प्रयोग करना विधिक रूप से गलत है। 3.दोबारा परीक्षण सैंपल की एक्सपायरी डेट बीत जाने के बाद किया गया, जो कानून के अनुसार अमान्य है। कोर्ट ने इन सभी प्रमुख तर्कों पर विचार किए बिना प्रतिकूल आदेश पारित किया है, जो विधि की दृष्टि से सही नहीं है। इस आदेश के विरुद्ध फूड सेफ्टी ट्राइब्यूनल में अपील दायर की जा रही है, और हमें पूर्ण विश्वास है कि ट्राइब्यूनल के समक्ष हमारे पक्ष के ठोस आधारों पर यह मामला हमारे पक्ष में निर्णयित होगा। वैसे भी इस फैसले में कहीं भी पतंजलि गाय का घी उपयोग के लिए हानिकारक नहीं बताया गया है। सिर्फ घी में RM Value के मानक से नाम-मात्र का अंतर पाया जाना ही स्पष्ट किया गया है। यह RM Value घी में volatile fatty acid (जो घी के गर्म करने पर उड़नशील होता है) का लेवल बताता है। यह प्राकृतिक प्रक्रिया है। इससे घी की गुणवत्ता पर कोई असर नहीं होता। जैसे शरीर में नाम-मात्र का हीमोग्लोबिन के अंतर प्राकृतिक होता है। यह RM Value का मानक पशुओं के आहार और जलवायु आदि के आधार पर क्षेत्रीय स्तर पर भिन्न-भिन्न होता है। यहां तक कि सरकारी नियामक संस्था FSSAI भी इस RM Value को बदलती रहती है। कभी क्षेत्रीय आधार पर अलग-अलग RM Value का प्रावधान तो कभी राष्ट्रीय स्तर पर एक RM Value निश्चित किया जाता रहा है। पतंजलि पूरे देश से कड़े मानदंडों और जांच के आधार पर दूध एवं गाय का घी एकत्र करके राष्ट्रीय स्तर पर विक्रय करती है।  

ऑक्सफोर्ड डिबेट में पाकिस्तान की पोल खुली, सवालों से बचकर भारत पर ठीकरा फोड़ा

ब्रिटेन  ब्रिटेन की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी ऑक्सफोर्ड में भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों के बीच होने वाली एक बहस रद्द कर दी गई है। इस बहस के रद्द होने का दुनिया के ज्यादातर लोगों को कोई पता नहीं चला। लेकिन झूठे पाकिस्तान को यह कहां बर्दाश्त था। भारत के खिलाफ मिली हर हार को अपनी जीत बनाकर पेश करने वाले पाकिस्तान ने यहाँ पर भी बहस से भागकर इसे जीत बनाने की कोशिश करनी शुरू कर दी। ब्रिटेन स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग ने ट्वीट करके दावा किया कि ऑक्सफोर्ड में होने वाली बहस से भारतीय प्रतिनिधि पीछे हट गए हैं। बाद में भारतीय सुप्रीम कोर्ट के वकील जे साईं दीपक ने पाकिस्तान के इस झूठ का सबूतों के साथ पर्दाफाश कर दिया।   पाकिस्तानी उच्चायोग की तरफ से ट्वीट करके कहा गया कि ऑक्सफोर्ट यूनिवर्सिटी में 'भारत की पाकिस्तान नीति एक सुरक्षा नीति के रूप में बेची गई जनप्रिय रणनीति है।' नामक शीर्षक पर बहस होनी थी, लेकिन भारतीय वक्ता अंतिम समय पर इस बहस से पीछे हट गए। पाकिस्तानी उच्चायोग ने इस बहस के लिए भारत की तरफ से जिन वक्ताओं के नाम बताए उनमें पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवाणे, सुब्रमण्यम स्वामी और राजस्थान के पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट का नाम था। वहीं, पाकिस्तान की तरफ से पूर्व विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार, ब्रिटेन में पाकिस्तान के उच्चायुक्त मोहम्मद फैसल और पाकिस्तानी सेना के पूर्व जनरल जुबैर महमूद हयात शामिल थे। जे साईं दीपक ने खोली पोल पाकिस्तान के ब्रिटेन स्थित हाईकमीशन द्वारा फैलाए जा रहा यह झूठ जब तक दुनिया तक पहुंचता उससे पहले भी भारतीय सुप्रीम कोर्ट के वकील जे साईं दीपक ने इसकी बखियां उधेड़ दीं। उन्होंने पाकिस्तानी दावों का खंडन सबूतों के साथ किया। उन्होंने कहा ऑक्सफोर्ड द्वारा भेजी गई अपनी भागीदारी की पुष्टि वाली ईमेल को भी साझा करते हुए लिका कि उनके साथ पूर्व सेना प्रमुख नरवाने और स्वामी भी भारतीय पक्ष की तरफ से वक्ता थे। उन्होंने लिखा, "पाकिस्तानी लोग ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी को भी गड़बड़ कर देते हैं और हमेशा की तरह इस बार भी वह सच बोलने की ताकत नहीं रखते।" दीपक ने कहा, "इस ईमेल के बाद यूनिवर्सिटी की तरफ से बताया गया कि नरवाने और स्वामी इस कार्यक्रम में नहीं आ सकते हैं। उन्होंने मुझसे कोई नए नाम भेजने के लिए कहा। लेकिन जब तक मैं विकल्प भेज पाता उससे पहले ही मुझे बताया गया कि इस बहस के लिए सुहेल सेठ और राज्य सभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी से संपर्क किया गया है और उन्होंने शामिल होना स्वीकार किया है। मुझे लगा की ठीक है मामला खत्म हुआ। लेकिन इसके बाद मुझे बताया गया कि दोनों ने एक दम से नोटिस देने की वजह से इस कार्यक्रम में शामिल होने से इनकार कर दिया है।" प्रियंका चतुर्वेदी ने भी की पुष्टि प्रियंका चतुर्वेदी ने भी सोशल मीडिया पर इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि उन्हें जुलाई में ही इसका आमंत्रण मिल गया था लेकिन उसके बाद कोई संपर्क नहीं किया गया। इसलिए मैंने इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। लेकिन हाल ही में एक दम उनका फोन आया। इसलिए उन्होंने इनकार कर दिया। दीपक अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि इसके बाद भी अंतिम समय पर मैं लंदन पहुंच कर बहस में शामिल होने के लिए तैयार था। यहां पर उन्होंने मनु खजूरिया और पंडित सतीश शर्मा के साथ मिलकर एक टीम भी तैयार कर ली। लेकिन बहस के तीन घंटे पहले उन्हें बताया गया कि बहस रद्द कर दी गई है क्योंकि पाकिस्तानी दल लंदन पहुंचा ही नहीं है। दीपक ने लिखा, “इस बात में मैं गुस्सा था, क्योंकि इसमें काफी मेहनत लगी थी।” इतना ही नहीं दीपक ने सबूत के तौर पर इस पूरी बहस के आयोजक मूसा हरराज की कॉल लॉग भी साझा की। पाकिस्तान को दी चुनौती इसके बाद दीपक ने पाकिस्तान की पोल खोलते हुए लिखा कि बाद में मुझे पता चला कि इस बहस के आयोजक मूसा हरराज, जिनके पिता पाकिस्तान में मंत्री हैं। उन्होंने इस पूरी झूठी कहानी को गढ़ा है। पाकिस्तान की टीम लंदन में ही मौजूद थी। लेकिन बहस नहीं करना चाहती थी। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि अगर पाकिस्तान की टीम तैयारी के साथ है तो फिर बहस के लिए सामने आ जाए। उन्हें इसमें आतंकियों की तरह छिपने की जरूरत नहीं है।  

बुलडोजर चला तो आगे आए पड़ोसी: हिंदू युवक ने पत्रकार को दिया प्लॉट, नया घर बनवाने का वादा

जम्मू-कश्मीर  जम्मू-कश्मीर में एक मुस्लिम पत्रकार के घर पर जब बुलडोजर चला दिया गया तो उसके हिंदू पड़ोसी मदद के लिए आगे आ गए। बीजेपी नेता रविंदर रैना ने भी पत्रकार के परिवार से मुलाकात की थी। उन्होंने कहा था कि हमारे प्रधानमंत्री लोगों को घर देने पर विश्वास करते हैं और यह सरकार लोगों के घर उजाड़ रही है। पत्रकार ने कहा था कि घर पर बुलडोजर चलवाने से पहले उन्हें कोई नोटिस भी नहीं दिया गया था। उन्होंने कहा कि प्रशासन की यह कार्रवाई तानाशाही है। जम्मू डिवेलपमेंट अथॉरिट ने पत्रकार अराफाज अहमद दैंग का घर ढहा दिया था। इस मौके पर बड़ी संख्या में पुलिसबल को तैनात कर दिया गया था।   पत्रकार ने बताया था कि उनका घर 40 साल पुराना था और उनके पिता भी इसी घर में रहते थे। उन्होंने कहा कि पिछले साल उनका एक घर ढहा दिया गया था और इसके बाद वह इस घर में रहने लगे ते। बता दें कि दैंग जम्मू- में एक न्यूज पोर्टलल चलाते थे। उन्होंने सरकार की डिमोलिशन ड्राइव के खिलाफ रिपोर्टिंग करनी शुरू कर दी थी। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि यह केवल सरकार को बदनाम करने की साजिश है। उन्होंने कहा कि उपराज्यपाल की तरफ से नियुक्त किए गए अधिकारियों ने ही यह कार्रवाई की है। उन्होंने कहा कि चुनी हुई सरकार के खिलाफ साजिश रची जा रही है। सोशल मीडिया पर क्या चल रहा है सोशल मीडिया पर लोग हिंदू समुदाय के इस कदम की सराहना कर रे हैं। वहीं पत्रकार का एक वीडियो भी वायरल हो रहा है जिसमें देखा जा सकता है कि घर ढहाने के वक्त पुलिसबल उन्हें खींचकर दूर ले जा रहा है। सोशल मीडिया यूजर्स का कहना है कि इस तरह से किसी का घर ढहाना तानाशाही है। कुलदीप शर्मा ने गिफ्ट कर दिया प्लॉट पड़ोसी पत्रकार का घर ढहाए जाने के बाद उनके पड़ोसी कुलदीप शर्मा सामने आए और उन्होंने एक प्लॉट उन्हें गिफ्ट कर दिया। उन्होंने कहा, मैं अपने भाई को इस तरह टूटने नहीं दे सकता। कुछ भी हो जाए, मैं उनका घर बनवाऊंगा। उन्होंने तीन मारला प्लॉट पर बने घर को गिराया, मैं उन्हें पांच मारला का प्लॉट दे रहा हूं।  

ट्रम्प ने किया ऐतिहासिक फैसला, बाइडेन के कार्यकाल के अधिकांश एग्जीक्यूटिव ऑर्डर्स रद्द

वाशिंगटन एक बार फिर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बड़े फैसले ने सभी को हैरान कर दिया है। डोनाल्ड ट्रंप ने पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल में जारी किए गए 92% एग्जीक्यूटिव ऑर्डर्स को कैंसिल कर दिया है। इसकी जानकारी डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ के जरिए दी है। ट्रंप ने दावा किया है कि यह सभी ऑर्डर्स ऑटोपेन से साइन किए गए थे, यानी जो भी ऑर्डर्स जारी किए गए थे वे मशीन द्वारा साइन किए गए थे और इस पर जो बाइडेन की मंजूरी नहीं थी। डोनाल्ड ट्रंप के इस बड़े कदम से जो बाइडेन के कई महत्वपूर्ण एग्जीक्यूटिव ऑर्डर्स प्रभावित हुए हैं। इन ऑर्डर्स में पर्यावरण, स्वास्थ्य, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे बड़े आदेश शामिल थे। इस दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने जो बाइडेन को भी निशाने पर लिया और कहा कि अगर जो बाइडेन इन दस्तावेजों पर अपनी सहमति का दावा करेंगे तो उन पर झूठे बयान के आरोप लगेंगे। जो बाइडेन को डोनाल्ड ट्रंप ने सुस्त और चालाक बताया है। जानकारी दे दें कि डोनाल्ड ट्रंप ने यह फैसला व्हाइट हाउस के पास नेशनल गार्ड्स पर हुए हमले के बाद लिया है। यह अवैध रूप से किया गया था: डोनाल्ड ट्रंप दरअसल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ’ पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लिखा कि ‘जो बाइडेन के ऑटोपेन से साइन किए गए लगभग 92% ऑर्डर्स रद्द किए जाते हैं और ऑटोपेन का इस्तेमाल तभी वैध है जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने स्पष्ट मंजूरी दी हो। यह अवैध रूप से किया गया था, बिडेन ऑटोपेन प्रक्रिया में शामिल नहीं थे।’ हालांकि ऐसा नहीं है कि जो बाइडेन के सभी एग्जीक्यूटिव ऑर्डर्स रद्द कर दिए गए हैं। जो बाइडेन ने अपने कार्यकाल में कुल 162 एग्जीक्यूटिव ऑर्डर्स जारी किए थे, लेकिन इनमें से 80 ऑर्डर्स को डोनाल्ड ट्रंप ने पद संभालने के तुरंत बाद ही रद्द कर दिया था। ये बड़े एग्जीक्यूटिव ऑर्डर्स हो सकते हैं प्रभावित अभी भी जो बाइडेन के कई एग्जीक्यूटिव ऑर्डर्स जारी हैं, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले के बाद अब इन पर भी संकट मंडराने लगा है। रिपोर्ट के मुताबिक अब इन ऑर्डर्स में से कुछ रद्द होने का खतरा है। इनमें एग्जीक्यूटिव ऑर्डर 14087 शामिल है, जो अमेरिका में प्रिस्क्रिप्शन दवाओं की कीमतों से जुड़ा हुआ है। इस ऑर्डर से ही दवा कंपनियों पर नियंत्रण लगाया जाता है और यह आम नागरिकों को सस्ती दवाएं प्रदान करवाता है। एग्जीक्यूटिव ऑर्डर 14096 प्रभावित हो सकता है। दूसरा एग्जीक्यूटिव ऑर्डर 14096 प्रभावित हो सकता है। यह ऑर्डर पर्यावरणीय न्याय पर केंद्रित है, जिसका उद्देश्य गरीब और अल्पसंख्यक समुदायों को पर्यावरण प्रदूषण से बचाना था। इसके अलावा एक और ऑर्डर प्रभावित हो सकता है, जो एग्जीक्यूटिव ऑर्डर 14110 है। इस ऑर्डर के तहत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के विकास को लेकर नियम बनाए गए थे, खास तौर पर इसके उपयोग में क्षमता, जोखिम भरे कामों से बचाव और नैतिक उपयोग सुनिश्चित करने जैसे प्रावधान शामिल हैं। अमेरिकी नियमों पर नजर डालें तो कोई भी मौजूदा राष्ट्रपति पूर्व राष्ट्रपति के एग्जीक्यूटिव ऑर्डर्स को रद्द, संशोधित और अमान्य करने की पावर रखता है। यानी डोनाल्ड ट्रंप चाहे तो जो बिडेन के इन ऑर्डर्स को रद्द कर सकते हैं और इसके लिए उन्हें ज्यादा जोर लगाने की जरूरत नहीं होगी। हालांकि कुछ सीमाएं भी हैं, खासकर सजा में माफी और कमी से जुड़े मामलों में ये ऑर्डर्स वापस नहीं लिए जा सकते हैं।

बंगाल में बड़ा यू-टर्न! महीनों की ना के बाद ममता दीदी ने मंजूर किया नया वक्फ कानून, चुनाव से पहले रणनीति?

कोलकाता केंद्र के नए वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 को महीनों तक टालने के बाद, पश्चिम बंगाल सरकार ने आखिरकार इस कानून को स्वीकार कर लिया है। राज्य सरकार ने सभी जिलाधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि राज्य की करीब 82000 वक्फ संपत्तियों का विवरण निर्धारित समयसीमा 6 दिसंबर 2025 तक केंद्रीय पोर्टल (umeedminority.gov.in) पर अपलोड कर दिया जाए। यह जानकारी राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों ने गुरुवार देर शाम दी। सूत्रों ने बताया कि केंद्र ने राज्यों से छह दिसंबर तक सभी अविवादित वक्फ संपत्तियों की जानकारी अपलोड करने को कहा है, जिसके कारण राज्य प्रशासन ने तुरंत डेटा-एंट्री प्रक्रिया शुरू करने के लिए कदम उठाए हैं। उन्‍होंने कई मौकों पर कहा था कि वे इस संशोधित कानून को पश्चिम बंगाल में लागू नहीं होने देंगी. अब उनका रुख इस कानून को लेकर बदल गया है. ममता सरकार ने वक्‍फ संशोधन कानून-2025 को बंगाल में लागू करने को लेकर दिशा-न‍िर्देश जारी किए हैं. वक्‍फ संपत्तियों को केंद्रीय पोर्टल (umeedminority.gov.in) पर अपलोड करने को लेकर डेडलाइन भी फिक्‍स कर दी है. प्रदेश के माइनॉरिटी डिपार्टमेंट की ओर से 8 बिंदुओं में प्रोग्राम भी जारी किया गया है. केंद्र के वक्फ़ संशोधन अधिनियम, 2025 को लागू करने से महीनों तक इंकार करने के बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने आखिरकार इस कानून को अपने यहां लागू करने पर सहमत हो गई है. अधिकारियों के अनुसार, राज्य सरकार ने सभी जिलों को निर्देश दिया है कि राज्य की लगभग 82,000 वक्फ़ संपत्तियों का विवरण 5 दिसंबर की अंतिम तारीख से पहले केंद्र के पोर्टल पर अपलोड कर दिया जाए. यह कानून इस साल अप्रैल में संसद के दोनों सदनों से पारित हुआ था. बंगाल के अल्पसंख्यक विकास विभाग के सचिव पीबी सलीम ने सभी जिला मजिस्ट्रेटों को पत्र भेजकर कहा कि हर ज़िले की वक्फ़ संपत्तियों की जानकारी तय समय में umeedminority.gov.in पर अपलोड की जाए. राज्य सरकार का यू-टर्न क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है क्योंकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सार्वजनिक तौर पर घोषणा की थी कि वह इस नए कानून को पश्चिम बंगाल में लागू नहीं होने देंगी। अप्रैल में जब यह विधेयक संसद में पारित हुआ था, तब राज्य में व्यापक विरोध प्रदर्शन भी हुए थे। 9 अप्रैल को जैन समुदाय के एक कार्यक्रम में ममता बनर्जी ने कहा था- मैं वक्फ संशोधन अधिनियम को बंगाल में लागू नहीं होने दूंगी। हम 33 प्रतिशत मुसलमानों का राज्य हैं, जो सदियों से यहां रह रहे हैं। उनका संरक्षण करना मेरा कर्तव्य है। लेकिन उसके बाद कानूनी लड़ाई में भी राज्य सरकार को राहत नहीं मिली। अदालत में याचिका दाखिल करने के बावजूद सरकार को अनुकूल फैसला नहीं मिला। अधिनियम की धारा 3B के तहत सभी पंजीकृत वक्फ संपत्तियों की जानकारी छह महीने के भीतर केंद्रीय पोर्टल पर डालना अनिवार्य है। जिलाधिकारियों को राज्य सरकार का विस्तृत निर्देश राज्य के अल्पसंख्यक विकास विभाग के सचिव पी. बी. सलीम ने जिलाधिकारियों को भेजे पत्र में एक आठ बिंदु कार्रवाई कार्यक्रम भी जारी किया है, जिसके तहत उम्मीद पोर्टल पर उपलब्ध सुविधा और प्रक्रिया को समझना और मुतवल्लियों, इमामों और मदरसा शिक्षकों के साथ बैठकें/कार्यशालाएं करना भी शामिल है। अधिकारी ने बताया कि जिला मजिस्ट्रेट को भेजे गए पत्र में चार प्राथमिक निर्देश दिए गए हैं। उनसे इमामों, मुअज्जिनों (मस्जिद में प्रति दिन पांच वक्त की नमाज कराने के लिए अजान लगाने वाला) और मदरसा शिक्षकों के साथ बैठकें बुलाने और उन्हें अपलोड करने प्रक्रिया समझाने को कहा गया है। उन्होंने कहा कि जिलाधिकारियों को कहा गया है कि पोर्टल में केवल निर्विरोध संपत्तियों को ही दर्ज किया जाए। अधिकारी ने कहा कि सभी जिलों को कहा गया है कि जहां भी तकनीकी सहायता की आवश्यकता हो वहां सुविधा केंद्र स्थापित करें।" उन्होंने कहा कि जिलों को यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि कार्य बिना किसी देरी के हो। केंद्र सरकार ने इस वर्ष की शुरुआत में वक्फ अधिनियम 1995 के कई प्रावधानों में संशोधन किया। हालांकि इनमें से कुछ संशोधन अब भी उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन हैं, लेकिन राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ध्यान दिलाया कि केंद्र के प्रस्तावित परिवर्तनों के कार्यान्वयन पर कोई रोक नहीं है। उन्होंने कहा कि इसका अर्थ है कि राज्य को दी गयी समय-सीमा के भीतर निर्देश का पालन करना होगा। उन्होंने बताया कि संशोधित नियमों के तहत पश्चिम बंगाल में 8,063 वक्फ सम्पत्तियों के मुतवल्लियों (वक्फ की देखभाल करने वालों) को छह दिसंबर तक यूएमआईडी पोर्टल पर अपनी पूरी संपत्ति का विवरण दर्ज कराना होगा। कानून में प्रमुख बदलाव क्या हैं वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 में कुछ बड़े प्रावधान किए गए हैं, जिनमें वक्फ बोर्ड और वक्फ ट्रिब्यूनल में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति और किसी भी संपत्ति को वक्फ घोषित करने को लेकर अंतिम निर्णय सरकार द्वारा लिए जाने का प्रावधान है। इन्हीं प्रावधानों को लेकर पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों में विरोध देखने को मिला था। वक्‍फ संशोधन अधिनियम- 2025 को लेकर ममता सरकार के 8 निर्देश -:     वेबसाइट (उम्मीद पोर्टल) को देख लें और उससे परिचित हो जाएं.     संबंधित मुतवल्लियों, इमामों/मदरसा शिक्षकों को शामिल करते हुए बैठकें/कार्यशालाएं आयोजित करें, ताकि वे केंद्रीय पोर्टल पर विवरण जल्द से जल्द अपलोड कर सकें (मुतवल्लियों की एक सूची साझा की जा चुकी है).     डेटा एंट्री दो हिस्सों में की जाएगी: पहला, व्यक्तिगत मुतवल्लियों द्वारा ओटीपी-आधारित प्रारंभिक रजिस्ट्रेशन और दूसरा, वक्फ संपत्ति से जुड़े विवरणों का पंजीकरण.     विवादित वक्फ संपत्तियों को (यदि कोई हों) इस चरण में रजिस्‍टर्ड करने की आवश्यकता नहीं है.     कार्य के लिए अधिकारियों को विशेष रूप से नियुक्त करें और दैनिक प्रगति की निगरानी करें.     राज्य स्तर के दफ्तरों से वरिष्ठ अधिकारियों को अपने-अपने ज़िलों के दौरे पर भेजा जाए.     आठ जिलों में हेल्प डेस्क बनाए जा चुके हैं और बाकी ज़िले भी ऐसे ही हेल्प डेस्क बना सकते हैं.     राज्य वक्फ बोर्ड की ओर से हर दिन दोपहर 2 बजे से 4 बजे तक वर्चुअल मोड में प्रशिक्षण दिया जाएगा, जिसमें राज्यभर के सभी दफ्तरों से लोग जुड़ सकते हैं. ममता बनर्जी वक्‍फ संशोधन कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट भी गई थीं. क्‍यों अहम है यह फैसला? ममता … Read more

सुरक्षा के लिए NHRC का अलर्ट: बसों की खतरनाक डिजाइन पर राज्यों को भेजा नोटिस

नई दिल्ली राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को पत्र भेजकर सार्वजनिक परिवहन बसों की असुरक्षित डिजाइन पर गंभीर चिंता जताई है। आयोग को मिली शिकायतों में आरोप लगाया गया है कि कई बसों में ड्राइवर केबिन को पूरी तरह अलग बनाया जा रहा है, जिससे आग लगने या आपात स्थिति में ड्राइवर और यात्रियों के बीच समय पर संवाद नहीं हो पाता। आयोग ने इसे यात्रियों की जान के लिए बड़ा खतरा बताया और इसे अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के मौलिक अधिकार का गंभीर उल्लंघन माना है। शिकायत में कहा गया था कि हाल के दिनों में कई बसों में सफर के दौरान आग लगने की घटनाएं सामने आईं, जिनमें कई लोगों की मौत हो गई। आयोग की पीठ (जिसकी अध्यक्षता सदस्य प्रियंक कानूनगो कर रहे थे) ने मामले की गंभीरता को देखते हुए संरक्षण मानव अधिकार अधिनियम, 1993 की धारा 12 के तहत संज्ञान लिया और परिवहन मंत्रालय व केंद्रीय सड़क परिवहन संस्थान (सीआईआरटी) पुणे से दो सप्ताह के भीतर विस्तृत एक्शन टेकन रिपोर्ट (एटीआर) मांगी। सीआईआरटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि राजस्थान परिवहन विभाग के अनुरोध पर की गई जांच में हादसे वाली बस में कई गंभीर कमियां मिलीं। बस बॉडी निर्माण में मानकों का उल्लंघन किया गया था। स्लीपर बसों में ड्राइवर पार्टिशन डोर नियमों के खिलाफ है, फिर भी लगाया गया था। 12 मीटर से लंबी बसों में कम से कम 5 आपात निकास अनिवार्य हैं पर उपलब्ध नहीं थे।2019 से अनिवार्य फायर डिटेक्शन एंड सप्रेशन सिस्टम (एफडीएसएस) बस में मौजूद नहीं था। स्लीपर कोच के स्लाइडर और चेसिस एक्सटेंशन जैसे खतरनाक हिस्से बगैर अनुमति लगाए गए थे। सीआईआरटी ने कई अहम सुझाव दिए। केंद्रीय सड़क परिवहन संस्थान का कहना है कि सभी स्लीपर कोचों में ड्राइवर पार्टिशन हटाया जाए, एफडीएसएस अनिवार्य रूप से लगाया जाए, 10 किलो के फायर एक्सटिंग्विशर चेक किए जाएं और नियमों के उल्लंघन वाले सभी बस बॉडी डिजाइन तत्काल बंद किए जाएं। आयोग ने कहा कि 14 अक्टूबर को जिस बस में आग लगी, वह पूरी तरह नियमों की अनदेखी का परिणाम था। न केवल निर्माता और बॉडी बिल्डर, बल्कि फिटनेस सर्टिफिकेट जारी करने वाले अधिकारी भी गंभीर लापरवाही के दोषी हैं। आयोग ने इसे स्पष्ट रूप से क्रिमिनल नेग्लिजेंस करार दिया। आयोग ने कहा सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय, भारत सरकार सभी राज्यों को नियमों के सख्त पालन के लिए एडवाइजरी जारी करे। कोई भी बस ऑपरेटर या बॉडी बिल्डर सुरक्षा मानकों से बच न सके, इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर तंत्र तैयार किया जाए। सभी मुख्य सचिव सीआईआरटी की सभी सिफारिशों को राज्यभर में लागू करें। लापरवाह अधिकारियों और निर्माताओं पर तत्काल कार्रवाई हो। पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा व सहायता दी जाए। सभी राज्यों को दो सप्ताह के भीतर एटीआर भेजने का आदेश दिया गया है।

अदालत में राहुल गांधी के खिलाफ सावरकर केस का ट्विस्ट, सीडी पेश की गई पर कोई सबूत नहीं

 पुणे पुणे की एमपी/एमएलए विशेष अदालत में गुरुवार को कांग्रेस सांसद और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ चल रहे मानहानि मामले की सुनवाई के दौरान एक अप्रत्याशित घटना सामने आई। दरअसल हिंदू विचारक विनायक दामोदर सावरकर के कथित अपमान से जुड़े इस मामले में मुख्य सबूत के तौर पर एक सीडी पेश की गई थी। लेकिन यह सीडी अदालत में चलाए जाने पर खाली निकली। मामले की सुनवाई मजिस्ट्रेट अमोल शिंदे कर रहे हैं। शिकायत सावरकर के परपौत्र सत्यकी सावरकर ने दर्ज कराई है, जिसमें आरोप लगाया गया कि राहुल गांधी ने लंदन में दिए एक भाषण के दौरान सावरकर के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। सीलबंद सीडी खुलने पर बढ़ा ड्रामा इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, कथित भाषण का वीडियो एक सीलबंद सीडी में अदालत में पहले ही जमा किया गया था। बताया गया था कि संज्ञान लेते समय यही सीडी अदालत में चलाई गई थी और उसी के आधार पर राहुल गांधी को समन जारी किया गया था। लेकिन गुरुवार को सुनवाई के दौरान जब सीडी खोली और चलाई गई, तो सभी हैरान रह गए। सीडी में कोई डेटा ही नहीं था। यह देख शिकायतकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता संग्राम कोल्हटकर भी चौंक गए। उन्होंने अदालत को याद दिलाया कि इसी सीडी को पहले अदालत ने देखा था और उसी के आधार पर प्रक्रिया चलाई गई थी। यूट्यूब लिंक देखने का अनुरोध खारिज खाली सीडी का खुलासा होने के बाद कोल्हटकर ने अदालत से यूट्यूब पर उपलब्ध भाषण को सीधे देखने की अनुमति मांगी। राहुल गांधी की ओर से पेश अधिवक्ता मिलिंद दत्तात्रय पवार ने इसका कड़ा विरोध किया और कहा कि ऑनलाइन कंटेंट अपने आप में प्रमाणित नहीं होता। मजिस्ट्रेट शिंदे ने इस आपत्ति को स्वीकार करते हुए कहा कि यूआरएल को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के अनुरूप प्रमाणपत्र प्राप्त नहीं है, इसलिए यह सबूत के रूप में स्वीकार्य नहीं है। धारा 65-बी के तहत किसी भी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को अदालत में सबूत के रूप में मान्य कराने के लिए प्रमाणीकरण प्रमाणपत्र जरूरी होता है। दो और सीडी पेश करने की कोशिश भी नाकाम इसके बाद सांसदों और विधायकों के खिलाफ मामलों की विशेष अदालत ने सत्यकी द्वारा दायर उस याचिका को भी नामंजूर कर दिया जिसमें उन्होंने एक अतिरिक्त सीडी चलाने का अनुरोध किया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड में ऐसी कोई सीडी मौजूद नहीं है। कुल मिलाकर 14 नवंबर को सत्यकी की मुख्य जिरह के दौरान सबूत के रूप में पेश की गई वह सीडी चलाई नहीं जा सकी जिसमें दावा किया गया था कि राहुल गांधी ने 2023 में लंदन में आपत्तिजनक भाषण दिया था। जांच में पता चला कि सीडी में कोई डेटा था ही नहीं। सत्यकी सावरकर के वकील संग्राम कोल्हटकर ने अदालत से सत्यकी सावरकर लिंक चलाने की अनुमति देने का अनुरोध किया, लेकिन अदालत ने इसे भी मंजूरी नहीं दी। न्यायिक जांच की मांग, सुनवाई शुक्रवार तक स्थगित खाली हुई सीडी का रहस्य जानने और न्यायिक जांच कराने की मांग करते हुए कोल्हटकर ने स्थगन का अनुरोध किया। पवार ने इसका विरोध किया, लेकिन अंततः अदालत ने सुनवाई शुक्रवार तक के लिए स्थगित कर दी। इस पूरी घटना ने मामले में नया नाटकीय मोड़ ला दिया है और यह सवाल उठ खड़ा किया है कि पहले चलाई गई सीडी आखिर खाली कैसे हो गई।

विनीत तिवारी की फ़लस्तीन यात्रा, कहा— इंसानियत के नाम पर हमेशा फ़लस्तीन के साथ खड़ा रहना चाहिए

फ़लस्तीन यात्रा से लौटे विनीत तिवारी * फ़लस्तीन के साथ खड़ा होना इंसानियत का तकाज़ा _” अपने देश में बाँध विस्थापितों के नर्मदा बचाओ आंदोलन में या आदिवासी संगठनों के आंदोलनों में राज्य की हिंसा की वारदातों में, या सांप्रदायिक हिंसा पीड़ित इलाक़ों में स्वतंत्र जाँच दल के सदस्य की हैसियत से जाने पर अनेक बार पुलिस तथा सांप्रदायिक-फ़ासीवादी विचार वाले लोगों से आमना-सामना भी हुआ और झड़प भी, लेकिन फ़लस्तीन यात्रा मेरे लिए मानसिक तौर पर ज़्यादा चुनौतीपूर्ण थी। कभी डर का ऐसा अहसास नहीं हुआ था जैसा फ़लस्तीन जाते वक़्त हुआ। एक दूसरे देश में जहाँ इज़रायल ने हथियारों की ताक़त के दम पर इंसाफ़ को क़ैद किया हुआ है, जहाँ इतने बड़े-बड़े सीसीटीवी कैमरे लगे हैं कि लगता है, वे आपको कपड़ों में भी बिना कपड़ों के देख रहे हों, जहाँ चप्पे-चप्पे पर हथियारबंद फौजी होना आम बात है, और जहाँ इज़रायल ने 75 वर्षों से नस्लीय हिंसा फैला रखी है, वहाँ फ़लस्तीनियों के हाल जानना, उनसे मिलना कभी भी आशंकाओं से खाली नहीं होता था। लेकिन एक निश्चय था कि फ़लस्तीन के इंसाफ़ के संघर्ष को जानना और उसे जितना ज़्यादा हो सके, उतने लोगों तक पहुँचाना भी ज़रूरी है, इसीलिए मैं डर और ख़तरे के बावजूद वहाँ गया। – विनीत तिवारी (फ़लस्तीन से लौटकर)_ फ़लिस्तीनियों को मानव अधिकारों से वंचित रखकर दुनिया भर से मौकापरस्त यहूदियों और अन्य धर्मों के लोगों को फ़लस्तीन की ज़मीन पर बसाया गया है। इज़रायल में अमेरिकी समर्थन से ये लोग ऐश का जीवन जी रहे हैं। शेष आबादी, फ़लस्तीन के मूल निवासी, ईसाई और मुसलमान दोनों ही प्रताड़ित और अपमानित जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं। यह जानकारी प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी ने दी। वे हाल ही में फ़लस्तीन के हालात को क़रीब से जानने के लिए फ़लस्तीन गए थे। वहाँ उन्होंने दस दिनों तक वेस्ट बैंक के अनेक शहरों और गाँवों में जाकर मौजूदा हालात का जायज़ा लिया। प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई द्वारा अभिनव कला समाज में अनुभव साझा करने हेतु 24 नवंबर को आयोजित एक सभा में नगर के प्रबुद्धजनों को संबोधित करते हुए विनीत तिवारी ने बताया कि इज़रायल में फ़लिस्तीनियों को बेहद सीमित आज़ादी मिली हुई है। उन्हें बेथलहम से दस किलोमीटर दूर जेरुसलम जाने के लिए भी तमाम चेकपोस्टों से होकर गुजरना पड़ता है। कदम-कदम पर उन्हें जाँच चौकियों पर इज़रायली सैनिकों के अपमानजनक व्यवहार और उनकी मनमानियों से जूझना पड़ता है। अधिकांश इज़रायली लोग फ़लिस्तीनियों के साथ घोर अपमानजनक भेदभावभरा नस्लभेदी व्यवहार करते हैं। इज़रायली सरकार ने फ़लस्तीनियों के लिए अलग सड़कें बना रखी हैं, उनकी गाड़ियों की नंबर प्लेटें भी अलग होती हैं। एक ही शहर में एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले तक जाने के लिए भी पाबंदियाँ हैं। जगह-जगह आठ मीटर ऊँची दीवारें खड़ी की हुई हैं, जिन पर पूरा वक़्त निगरानी रहती है। फ़लस्तीनी लोग उन सड़कों पर नहीं जा सकते जो इज़रायली लोगों के लिए बनायी गईं हैं। लेकिन इज़रायली लोगों को कुछ भी करने के विशेषाधिकार दिए हुए हैं। यहाँ तक कि फ़लस्तीनी लोगों की हत्या करने पर भी वे छोड़ दिये गए हैं। वेस्ट बैंक और गाज़ा के हालात में फ़र्क़ के बारे में उन्होंने कहा कि जो गाज़ा में इज़रायल ने एक झटके में कर दिया, वेस्ट बैंक में वे उसे धीरे-धीरे रोज़-रोज़ कर रहे हैं। फ़लस्तीन के किसानों की सैकड़ों एकड़ में खड़ी जैतून की फ़सल लूट लेना, उनकी ज़मीनों पर क़ब्ज़ा कर लेना, उनके मवेशी लूट लेना इज़रायली लोगों के लिए और इज़रायली फौजियों के लिए आम है। वहाँ के घुमंतू आदिवासी बेदुइन लोग इन इज़रायली घुसपैठियों के ज़ुल्म का रोज़ निशाना बनते हैं। इज़रायल दूसरे देशों से मौकापरस्त लाखों लोगों को ऐशो-आराम की ज़िंदगी का लालच देकर फ़लस्तीन की ज़मीन पर बसा रहा है ताकि फ़लस्तीनी लोग लगातार सिकुड़ते जाएँ। बेशक वेस्ट बैंक के हालात गाज़ा से बहुत बेहतर हैं। गाज़ा में अब तक क़रीब एक लाख फ़लस्तीनी लोग मार दिए गए हैं। हज़ारों लाशें मलबे के नीचे अभी भी दबी हुई हैं। नब्बे फ़ीसदी इमारतें इज़रायली बमों से ज़मींदोज़ हो चुकी हैं। अस्पताल भी बमों के निशाने बने हैं और डॉक्टर भी। स्कूल-कॉलेज तो भूल जाइए, तीन साल से युद्ध के चलते ज़रूरी दवाओं, सैनिटरी पैड्स, पीने के पानी और खाने के भी लाले पड़े हुए हैं। गाज़ा में जो लोग रहते हैं, वे भी वेस्ट बैंक के लोगों के ही रिश्तेदार हैं। अपने ही देश के लोगों और रिश्तेदारों की यह हालत उनके लिए भी बहुत तक़लीफ़देह है लेकिन वे मजबूर महसूस करते हैं। वेस्ट बैंक में हज़ारों एकड़ ज़मीन इज़रायली क़ब्ज़े में ली जा रही है जहाँ बाहर से लाकर लाखों लोगों को स्थानीय फ़लस्तीनी लोगों के अधिकार छीनकर बसाया जा रहा है। पेयजल वितरण में भी फ़लस्तीनियों के साथ पक्षपात होता है। सार्वजनिक स्थलों पर फ़लिस्तीनियों से सावधान रहने की चेतावनी के बोर्ड लगे हैं। उन्होंने पैलस्टीन एडमिनिस्ट्रेशन (पीए) और हमास के फ़र्क़ के बारे में भी बताया और एकता के सूत्रों के बारे में भी। उन्होंने बताया कि वे जेनिन रिफ्यूजी कैम्प के पीड़ितों से भी मिले जिनके हज़ारों घरों को जनवरी में एक रात में ही मलबे के ढेर में बदल दिया गया। उन्होंने जबाबदेह, नाबलुस, आर्मीनिया, जेरिको, जॉर्डन वैली, जेरुसलम और सबस्तिया आदि जगहों के अपने अनुभव बताये। एक महत्त्वपूर्ण बात उन्होंने यह भी बतायी कि सभी इज़रायली नागरिक इज़रायली सरकार के इस नस्लभेदी अमानवीय रवैये के समर्थक नहीं हैं। अनेक इज़रायली नागरिक फ़लस्तीनी नागरिकों के हक़ के लिए अपनी सरकार से लड़ भी रहे हैं। उन्हीं में रूसी मूल का युवा इज़रायली नागरिक आंद्रे और इज़रायली कम्युनिस्ट पार्टी की सांसद आईदा टॉमस सुलेमान, कैरोस फ़ॉर पैलस्टीन के रिफ़त कसीस जैसे लोग भी हैं जिनसे विनीत की मुलाक़ात हुई। वे बेतेलहेम विश्वविद्यालय के फ़लस्तीनी विद्यार्थियों से भी मिले जहाँ ग़सान कनाफ़ानी और मेहमूद दरवेश के चित्र और शब्द अंकित थे। उन्होंने बताया कि फिलिस्तीन की समस्या प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश शासकों की देन है। उन्होंने फ़लस्तीन पर अपना क़ब्ज़ा हासिल करने के साथ ही दुनिया भर में फैले यहूदीवादी लोगों को फ़लस्तीन पर क़ब्ज़े के लिए उकसाना शुरू कर दिया था। बाद में 1948 में अँग्रेज़ों ने फ़लस्तीन से अपने हाथ झाड़कर यह देश यहूदियों … Read more

अंतरराष्ट्रीय एविएशन में हड़कंप: A320 अपडेट ने रोकीं सैकड़ों फ्लाइट्स

 नई दिल्ली दुनियाभर में इस्तेमाल होने वाले एअरबस A320 फैमिली के विमानों में सोलर रेडिएशन से फ्लाइट कंट्रोल डेटा करप्ट होने का खतरा सामने आया है. एअरबस ने हाल ही में हुई एक घटना के बाद अपने लगभग 6,000 विमानों पर तत्काल सॉफ्टवेयर/हार्डवेयर अपडेट का आदेश जारी कर दिया है. इसका सीधा असर भारत की एअरलाइंस इंडिगो और एअर इंडिया समेत दुनियाभर की कई कंपनियों पर पड़ रहा है. यूरोपियन यूनियन एविएशन सेफ्टी एजेंसी (EASA) ने भी इस पर इमरजेंसी एअरवर्थिनेस डायरेक्टिव (EAD) लागू कर दिया है, जिससे ग्लोबल उड़ान संचालन प्रभावित होना तय है.  उड़ान नहीं भर पा रहीं 6000 फ्लाइट्स, जानिए क्या है CME? अगर आप भी कहीं भी फ्लाइट से सफर करने का सोच रहे हैं तो यह खबर जरूर पढ़ लीजिए. देशभर में कई फ्लाइट्स कैसिंल हो सकती हैं या फिर उनका संचालन देरी से हो सकता है. दरअसल भारत समेत दुनियाभर के 6,000 विमानों की हवाई यात्राएं इस सप्ताह पूरी तरह से प्रभावित होने वाली हैं. इसका कारण है कि एयरबस A320 फैमिली के विमानों में टेक्निकल खराबी आ गई है, जिससे सही करने के लिए ग्राउंड किया जा रहा है. इन विमानों पर तेज सोलर रेडिएशन का खतरा मंडरा रहा है. भारत में इंडिगो और एयर इंडिया ग्रुप के लगभग 250 से ज्यादा A320 फैमिली के विमानों को इस अपग्रेड के लिए रोका जाएगा. साफ्टवेयर अपग्रेड होने में लगभग 2-3 दिन का समय लग सकता है.  जानिए क्या है समस्या Airbus A320 फैमिली एयरक्राफ्ट में बड़ी तकनीकी समस्या सामने आई है, जिसके चलते देश में 250 से ज्यादा विमानों को तुरंत सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर अपडेट की जरूरत पड़ गई है. सोलर रेडिएशन के कारण फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम में डेटा करप्शन की शंका है और इसी वजह से कई प्लेनों को ग्राउंड कर चेकिंग और अपडेट करना पड़ेगा. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार विमान निर्माता कंपनी एयरबस ने अपने सभी ऑपरेटर्स को अलर्ट किया है कि हाल ही में A320 विमान में अचानक पिच डाउन की समस्या हुई थी. जांच में यह सामने आया कि समस्या एलीवेटर-ऐलेरॉन कंप्यूटर (ELAC) में टेक्निकल समस्या के कारण हो सकती है. एयरबस ने साफ किया कि अगर इस खराबी को समय पर ठीक नहीं किया गया तो विमान के फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम की सुरक्षा पर गंभीर खतरा बन सकता है. इस बीच ईयू एविएशन सेफ्टी एजेंसी (EASA) ने भी आदेश दिया है कि प्रभावित विमानों में तुरंत काम करने वाले ELAC इंस्टॉल किए जाएं और यह अपडेट अगली उड़ान से पहले अनिवार्य रूप से लागू होना चाहिए. EASA ने भी जारी किया अलर्ट यूरोपीय संघ उड्डयन सुरक्षा एजेंसी यानी EASA ने भी Airbus A320 विमान फैमिली के लिए एक इमरजेंसी एयर वर्थीनेस निर्देश (EAD) जारी कर दिया है. यह निर्देश विमान के ऑनबोर्ड कंप्यूटरों में से एक के सॉफ्टवेयर अपडेट द्वारा शुरू की गई एक संभावित समस्या को दूर करने के लिए जारी किया गया है. अंतरिक्ष का मौसम विमान इलेक्ट्रॉनिक्स को कैसे प्रभावित करता है? बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार Qantas Airline के पूर्व कैप्टन डॉ. इयान गेटली ने बताया कि आसमान में उड़ने वाले विमान कभी-कभी सूर्य से निकलने वाले एक बड़े विस्फोट से प्रभावित हो सकते हैं जिसे कोरोनल मास इजेक्शन (CME) कहा जाता है. यह तब होता है जब सूरज से भारी मात्रा में प्लाज्मा यानी ज्यादा गर्मी , आवेशित कण अंतरिक्ष में निकलता है. यह प्लाज्मा पृथ्वी की तरफ आता है और हमारे वायुमंडल में प्रवेश करता है. विमान पर इसका प्रभाव डॉ. गेटली के अनुसार CME जितना ज्यादा शक्तिशाली होगा, उतना ही 28,000 फीट से ऊपर उड़ने वाले विमानों और उपग्रहों के इलेक्ट्रॉनिक्स में समस्या आने की उतनी ही ज्यादा संभावना होती है. जब ये ज्यादा आवेशित कण वायुमंडल में प्रवेश करते हैं तो वे ऊपरी वायुमंडल में और भी ज्यादा आवेशित कण बनाते हैं. ये नए आवेशित कण सीधे विमान के नेविगेशन और कम्युनिकेशन जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स में समस्या पैदा कर सकते हैं. डॉ. गेटली का कहना है कि उन्होंने 2003 में लॉस एंजिल्स और न्यूयॉर्क के बीच की उड़ान के दौरान इस घटना का एक्सपीरियंस किया था जिसके बाद उन्होंने इस विषय पर शोध करना शुरू किया. सरल शब्दों में कहें तो सूरज का शक्तिशाली विस्फोट यानी CME पृथ्वी के वायुमंडल को भर देता है जिससे विमान के इलेक्ट्रॉनिक्स  और कम्युनिकेशन सिस्टम प्रभावित हो सकते हैं. दुनिया की पसंदीदा उड़ान पर मंडराया खतरा! एयरबस का A320 विमान परिवार दुनिया भर की एयरलाइंस की पसंद का विमान परिवार बना हुआ है. यह बेहतरीन विमान 4,700 नॉटिकल मील यानी लगभग 8,700 किलोमीटर की दूरी तय कर सकता है. इस विमान में 120 से 244 यात्रियों के बैठने की क्षमता है. सबसे खास बात यह है कि A320 अभी 50% सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल के साथ उड़ान भर सकता है. इस विमान में दो एडवांस टर्बोफैन इंजन का ऑप्शन मिलता है जिसकी वजह से पिछली पीढ़ी के मुकाबले इसकी ईंधन खपत में 20% तक की कमी आती है. लेकिन अब इस विमान परिवार से जुड़े लगभग 6,000 एयरक्राफ्ट पर एक बड़ी चुनौती आ गई है. हालांकि राहत की बात यह है कि ज्यादातर विमानों के लिए, समाधान काफी आसान है, केवल नया कंप्यूटर सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करना होगा, जिसमें अमूमन सिर्फ तीन घंटे लगेंगे. लेकिन करीब 900 पुराने विमानों को एक बड़ी मरम्मत की जरूरत है, उनके पूरे कंप्यूटर सिस्टम को बदलना होगा. जब तक यह काम पूरा नहीं हो जाता इन विमानों को उड़ाने के लिए ले जाने की अनुमति नहीं होगी.  क्या हुआ है?  दरअसल, एअरबस ने A-320 सेगमेंट के विमानों के लिए एक सोलर रेडिएशन से जुड़ी समस्या की पहचान की है. सोलर रेडिएशन की वजह से फ्लाइट के कंट्रोल सिस्टम में इस्तेमाल होने वाला डेटा प्रभावित हो सकता है. इसका असर A 320 सेगमेंट के करीब 6,000 विमानों पर पड़ेगा. एअरबस ने तुरंत सॉफ्टवेयर अपडेट कराने का निर्देश दिया है. भारत में इंडिगो, एअर इंडिया के विमान इस अपडेट से प्रभावित बताए जा रहे हैं. इन विमानों में बदलाव के दौरान कुछ उड़ानों में देरी या कैंसिल होने के आसार हैं. एअरबस ने अपनी प्रेस रिलीज में बताया कि हाल ही में A320 फैमिली के एक विमान में ऐसी घटना सामने आई, जिसमें इंटेंस सोलर रेडिएशन ने फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम के लिए … Read more