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मणिपुर में शांति बहाली तक राष्ट्रपति शासन जारी रहेगा, अवधि छह महीने और बढ़ी

 नई दिल्ली मणिपुर में राष्ट्रपति शासन को छह महीने के लिए और बढ़ा दिया गया है. यह विस्तार 13 अगस्त 2025 से प्रभावी होगा. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस संबंध में राज्यसभा में एक प्रस्ताव पेश किया, जिसे सदन ने स्वीकार कर लिया. सदन में पेश किए गए नोटिस में कहा गया, 'यह सदन, संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति की ओर से मणिपुर के संबंध में 13 फरवरी 2025 को जारी उद्घोषणा को 13 अगस्त 2025 से प्रभावी छह माह की और अवधि तक जारी रखने की स्वीकृति प्रदान करता है.' 2023 में हुई थी हिंसा की शुरुआत राज्य में हिंसा की शुरुआत 2023 में तब हुई जब हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ एक 'जनजातीय एकजुटता मार्च' आयोजित किया गया. मणिपुर में 13 फरवरी 2025 को पहली बार राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था. यह फैसला राज्य में लंबे समय से जारी जातीय हिंसा और प्रशासनिक विफलता के चलते लिया गया था. कानून-व्यवस्था स्थिर करने की कोशिश में सरकार हालांकि शांति और सुलह की कोशिशें अभी भी जारी हैं, लेकिन मणिपुर के कई हिस्सों में सुरक्षा हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं. इस अवधि में केंद्र सरकार कानून-व्यवस्था को स्थिर करने और भविष्य में विधानसभा चुनाव कराने की संभावनाओं का मूल्यांकन करने की योजना बना रही है. दरअसल, इस संबंध में सदन ने नोटिस स्वीकार किया और प्रस्ताव पारित किया, जिसमें कहा गया, "यह सदन राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत मणिपुर के संबंध में 13 फ़रवरी 2025 को जारी की गई उद्घोषणा को 13 अगस्त 2025 से अगले छह महीनों के लिए लागू रखने का अनुमोदन करता है। फरवरी में मणिपुर में लगा था राष्ट्रपति शासन जानकारी दें कि मणिपुर में इसी साल 13 फरवरी को राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था। राज्य के तत्कालीन सीएम एन बीरेन सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दिया, जिसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा था। ध्यान देने वाली बात है कि राष्ट्रपति शासन राज्य में केवल छः महीने के लिए ही लगाया जा सकता है। मणिपुर में भी राष्ट्रपति शासन की अवधि 31 अगस्त को पूरी होने जा रही थी। इससे पहले ही राज्य में एक बार फिर राष्ट्रपति शासन छः महीने के लिए विस्तारित कर दिया गया है। मणिपुर में मैतई और कुकी संघर्ष में 260 से अधिक लोगों की मौत गौरतलब है कि मणिपुर में मई 2023 में कुकी और मैतेई समुदायों के बीच जातीय हिंसा फैल गई। इस संघर्ष में अभी तक 260 लोगों की जान जा चुकी है। इसके अलावा 1000 से अधिक लोगों को अपना घर छोड़कर दूसरी जगहों पर शिफ्ट होना पड़ा। इस जातीय हिंसा पर काबू पाने की कोशिशें की जा रही थीं। इसी बीच इसी साल फरवरी में मणिपुर के मुख्‍यमंत्री एन बीरेन सिंह ने इसी साल फरवरी में इस्‍तीफा दे दिया था। इसके बाद 13 फरवरी 2025 को केंद्र सरकार ने राज्य में विधानसभा को भंग कर दिया और राष्ट्रपति शासन लगा दिया था। 

BS-6 वाहन भी हो सकते हैं बैन? सुप्रीम कोर्ट में 28 जुलाई को तय होगा भविष्य

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट 28 जुलाई को उस याचिका पर सुनवाई करेगा जिसमें यह सवाल उठाया गया है कि BS-VI (बीएस-6) मानकों वाली गाड़ियों पर भी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में पेट्रोल गाड़ियों के लिए 15 साल और डीजल गाड़ियों के लिए 10 साल की तय उम्र सीमा लागू होनी चाहिए या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने दी जल्दी सुनवाई की मंजूरी मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने गुरुवार को इस याचिका को जल्दी सुनवाई के लिए मंजूरी दी। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कहा कि यह मामला बेहद जरूरी है, क्योंकि सरकार कोर्ट के पहले दिए गए निर्देशों को नजरअंदाज करके अपने नियम लागू नहीं कर सकती। कोर्ट के पुराने आदेशों से नहीं हट सकती सरकार वकील ने दलील दी कि दिल्ली में प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही गाड़ियों की उम्र को लेकर जो सीमाएं तय की थीं, सरकार को उन्हें बिना कोर्ट की मंजूरी के बदलने का अधिकार नहीं है। ऐसे में यह साफ किया जाना जरूरी है कि बीएस-6 मानकों को पूरा करने वाली नई तकनीक की गाड़ियों पर भी पुराने नियम लागू होंगे या नहीं। अब सबकी नजर 28 जुलाई की सुनवाई पर टिकी है, जहां यह तय हो सकता है कि एनसीआर में चल रही नई BS-VI गाड़ियों को भी तय वर्षों के बाद बंद करना पड़ेगा या उन्हें राहत मिलेगी। क्या है मौजूदा नियम कानून के अनुसार, दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में डीजल वाहनों के लिए वर्तमान एंड ऑफ लाइफ (जीवन अवधि) 10 वर्ष और सभी पेट्रोल वाहनों के लिए 15 वर्ष है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2015 में, भारत के राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने निर्देश दिया था कि शहर में बढ़ते प्रदूषण स्तर को कम करने के प्रयास में 10 वर्ष से अधिक पुराने डीजल वाहनों और 15 वर्ष से अधिक पुराने पेट्रोल वाहनों को दिल्ली-एनसीआर में चलने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। 

BS-6 वाहन भी हो सकते हैं बैन? सुप्रीम कोर्ट में 28 जुलाई को तय होगा भविष्य

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट 28 जुलाई को उस याचिका पर सुनवाई करेगा जिसमें यह सवाल उठाया गया है कि BS-VI (बीएस-6) मानकों वाली गाड़ियों पर भी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में पेट्रोल गाड़ियों के लिए 15 साल और डीजल गाड़ियों के लिए 10 साल की तय उम्र सीमा लागू होनी चाहिए या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने दी जल्दी सुनवाई की मंजूरी मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने गुरुवार को इस याचिका को जल्दी सुनवाई के लिए मंजूरी दी। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कहा कि यह मामला बेहद जरूरी है, क्योंकि सरकार कोर्ट के पहले दिए गए निर्देशों को नजरअंदाज करके अपने नियम लागू नहीं कर सकती। कोर्ट के पुराने आदेशों से नहीं हट सकती सरकार वकील ने दलील दी कि दिल्ली में प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही गाड़ियों की उम्र को लेकर जो सीमाएं तय की थीं, सरकार को उन्हें बिना कोर्ट की मंजूरी के बदलने का अधिकार नहीं है। ऐसे में यह साफ किया जाना जरूरी है कि बीएस-6 मानकों को पूरा करने वाली नई तकनीक की गाड़ियों पर भी पुराने नियम लागू होंगे या नहीं। अब सबकी नजर 28 जुलाई की सुनवाई पर टिकी है, जहां यह तय हो सकता है कि एनसीआर में चल रही नई BS-VI गाड़ियों को भी तय वर्षों के बाद बंद करना पड़ेगा या उन्हें राहत मिलेगी। क्या है मौजूदा नियम कानून के अनुसार, दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में डीजल वाहनों के लिए वर्तमान एंड ऑफ लाइफ (जीवन अवधि) 10 वर्ष और सभी पेट्रोल वाहनों के लिए 15 वर्ष है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2015 में, भारत के राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने निर्देश दिया था कि शहर में बढ़ते प्रदूषण स्तर को कम करने के प्रयास में 10 वर्ष से अधिक पुराने डीजल वाहनों और 15 वर्ष से अधिक पुराने पेट्रोल वाहनों को दिल्ली-एनसीआर में चलने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। 

नौकरीपेशा के दिन बहुरेंगे! 8वें वेतन आयोग से ₹51,000 बेसिक सैलरी की उम्मीद

नई दिल्ली आठवें वेतन आयोग का गठन जल्‍द होने जा रहा है. जनवरी 2026 तक इसे लागू करने का प्रस्‍ताव रखा गया है, जिसे लेकर राज्‍य वित्त मंत्री पंकज चौधरी ने जानकारी दी है कि 8th Pay Commission को लेकर राज्‍य सरकारों, वित्त मंत्रालय और संबंधित विभागों से परामर्श की प्रक्रिया चल रही है. जल्‍द ही इसे लागू कर दिया जाएगा.  इस आयोग के तहत केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनर्स के वेतन, पेंशन और भत्तों में इजाफा हो जाएगा. कर्मचारियों की बेसिक सैलरी में जबरदस्‍त उछाल देखने को मिलेगी. साथ ही महंगाई भत्ता और फिटमेंट फैक्‍टर भी बढ़ेगा, जिससे कर्मचारियों और पेंशनर्स को लाभ मिलेगा. आइए समझते हैं, आपकी सैलरी कितनी बढ़ सकती है…  इस फॉर्मूले से बढ़ेगी कर्मचारियों की सैलरी 8वें वेतन आयोग के तहत सैलरी में ठीक वैसे ही इजाफा होगा, जैसे 7वें वेतन आयोग (7th Pay Commission) के लागू होने पर हुआ था. कर्मचारियों की सैलरी और पेंशन में बढ़ोतरी के लिए एक्रोयड फॉर्मूले का उपयोग किया जाएगा.  क्‍या है ये फॉर्मूला?  डॉ वालेस एक्रोयड ने यह फॉर्मूला पेश किया था, जिसे जीवन के न्‍यूनतम लागत तय करने के लिए डिजाइन किया गया था. इस फॉर्मूले में यह बताया गया था कि एवरेज कर्मचारियों की पोषण संबंधी जरूरतों के आधार पर सैलरी का कैलकुलेशन किया जाना चाहिए. इस फॉर्मूले को बनाते वक्‍त भोजन, कपड़ा और मकान जैसी कर्मचारियों की जरूरतों को ध्‍यान में रखा गया था. 15वें भारतीय श्रम सम्मेलन (ILC) ने 1957 में इस फॉर्मूले को अपनाया गया था.  7वें वेतन आयोग पर भी लागू हुआ था ये फॉर्मूला  इस फॉर्मूले का उपयोग करते हुए 7वें वेतन आयोग (7th Pay Commission) के तहत भी कर्मचारियों की सैलरी में इजाफा किया गया था. 7वें वेतन आयोग लागू होने के बाद कर्मचारियों की बेसिक सैलरी 7000 रुपये से बढ़कर 18000 रुपये हो गई थी. कर्मचारियों की सैलरी और पेंशन को अपडेट करने के लिए 2.57 का फिटमेंट फैक्टर लागू किया गया था. ये फिटमेंट फैक्‍टर एक्रोयड फॉर्मूला से तय किया गया था.  8वें वेतन आयोग के तहत 3 गुना बढ़ जाएगी सैलरी!  अनुमान है कि 8th Pay Commission के लागू होते ही कर्मचारियों की सैलरी में बंपर उछाल देखने को मिलेगी. बेसिक सैलरी में करीब 3 गुना बढ़ोतरी हो सकती है, जो एक्रोयड फॉर्मूला के तहत संभव होगा. अगर ये फॉर्मूला 8वां वेतन आयोग के तहत भी यूज किया जाता है तो सैलरी और पेंशन का कैलकुलेशन 2.86 फिटमेंट के आधार पर होगा. इसका मतलब है कि न्‍यूनतम बेसिक सैलरी 18000 रुपये से बढ़कर 51480 रुपये तक हो सकती है. वहीं पेंशन 9000 रुपये से बढ़कर 25740 रुपये हो जाएगी.

केंद्र सरकार का बड़ा कदम: अपात्र राशन कार्ड होंगे कैंसिल, तुरंत करें दस्तावेज़ों की जांच

नई दिल्ली सरकार से मिलने वाला गेहूं-चावल तो छोड़िए..सरकारी योजनाओं के लाभ भी हाथ से फिसलने वाले हैं। राशन कार्ड बनवाकर सरकार की विभिन्न योजनाओं का लाभ लेने वाले लोगों पर सरकार ने सख्ती करने का मूड बना लिया है। केंद्र सरकार ने राज्यों को नियमों का सख्ती से पालन करने का आदेश दिया है। 22 जुलाई को जारी नोटिफिकेशन में साफ कहा गया है कि जो लोग 6 महीने से ज्यादा समय से राशन नहीं ले रहे हैं, उनके राशन कार्ड रद्द कर दिए जाएं। अभी देश में करीब 23 करोड़ राशन कार्ड हैं। माना जा रहा है कि देशभर में करीब 18 फीसदी तक राशन कार्ड रद्द हो सकते हैं। एक अनुमान के मुताबिक देश में 25 लाख से ज्यादा फर्जी राशन कार्ड हैं। सरकार के नए आदेश के मुताबिक जिन लोगों ने 6 महीने से राशन नहीं लिया है, उन पर सबसे पहले गाज गिरने वाली है। बात यहीं नहीं रुकेगी। प्रशासन घर-घर जाकर राशनकार्ड धारकों की जांच करने वाला है। यहां तक कि जिन लोगों ने ई-केवाईसी कराया हुआ है, उनकी भी पात्रता की फिर से जांच होगी। गरीब कल्याण अन्न योजना भी दायरे में केंद्र सरकार की मुफ्त राशन योजना यानी गरीब कल्याण अन्न योजना के लाभार्थियों पर भी नया आदेश लागू होगा। अगर कोई लाभार्थी इस योजना के तहत मुफ्त राशन ले रहा है और पिछले 6 महीने से उसने राशन नहीं उठाया है तो नाम कटने की पूरी संभावना है। तुरंत करा लें राशन कार्ड का ई-केवाईसी अगर अभी तक आपने अपने राशन कार्ड का ई-केवाईसी नहीं कराया है तो इस काम को पहली फुर्सत में निपटा लें। बिना ईकेवाईसी के राशन कार्ड पर खतरा सबसे ज्यादा है। राशन कार्ड का ई-केवाईसी आप ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीकों से कर सकते हैं। लगातार मौके दिए जाने के बावजूद अभी भी बड़ी संख्या में राशन कार्ड के e-KYC नहीं हुए हैं। सरकार को आशंका है कि ये कार्ड फर्जी हो सकते हैं। सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए फर्जी राशन कार्ड दरअसल ऐसा देखा जा रहा है कि ऐसे लाखों लोगों ने भी राशन कार्ड बनवा रखे हैं, जो पात्रता की शर्तों को पूरा भी नहीं करते हैं। इन लोगों ने सिर्फ सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए फर्जी दस्तावेजों की मदद से राशन कार्ड बनवा रखे हैं। इन परिवारों को राशन की जरूरत नहीं है, लेकिन राशन कार्ड के आधार पर सरकारी योजनाओं का लाभ लेना है। मसलन आयुष्मान कार्ड बनवाने के लिए राशन कार्ड की जरूरत होती है। आयुष्मान कार्ड से 5 लाख तक का कैशलेस इलाज मिल सकता है। इसी तरह EWS कोटे से दाखिला लेने में भी राशन कार्ड बहुत काम आता है।

चुनावी पारदर्शिता पर सवाल: CEC ने उठाया मुद्दा, मरे हुए लोगों के नाम लिस्ट में क्यों?

 नई दिल्ली बिहार में चल रहे विशेष गहन संशोधन (SIR) अभियान को लेकर विपक्ष के लगातार विरोध के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार ने इस प्रक्रिया का पुरजोर बचाव किया है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या चुनाव आयोग को मरे हुए मतदाताओं, डुप्लिकेट मतदाता पहचान पत्र धारकों और विदेशी नागरिकों को वोटर लिस्ट में शामिल करने की अनुमति देनी चाहिए। यह बयान तब आया है जब राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने SIR अभियान के खिलाफ तीखा विरोध जताया है। विपक्षी दलों का दावा है कि SIR की प्रक्रिया से 50 लाख से अधिक मतदाताओं के मताधिकार छिन सकते हैं। SIR अभियान पर उठे सवाल मुख्य चुनाव आयुक्त ने इंटरव्यू में कहा, "क्या चुनाव आयोग को मृत मतदाताओं को वोटर लिस्ट में रखने की अनुमति देनी चाहिए? क्या डुप्लिकेट वोटर आईडी वाले लोगों को अनुमति दी जानी चाहिए? क्या विदेशी नागरिकों को वोटर लिस्ट में शामिल करना चाहिए? इस पर आपत्ति क्या है?" उन्होंने जोर देकर कहा कि एक शुद्ध और सटीक मतदाता सूची लोकतंत्र की सफलता की नींव है। विपक्ष का विरोध और संसद में हंगामा कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी समेत इंडिया गठबंधन के कई सांसदों ने बिहार में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची में संशोधन के खिलाफ संसद भवन परिसर में विरोध प्रदर्शन किया और इसे वापस लेने के साथ-साथ दोनों सदनों में इस मुद्दे पर चर्चा की मांग की। दिन की कार्यवाही शुरू होने से पहले, कांग्रेस, द्रमुक, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, झामुमो, राजद और वामपंथी दलों सहित विपक्ष के शीर्ष नेता और सांसद संसद के मकर द्वार के बाहर एकत्र हुए और सरकार तथा मतदाता सूची के एसआईआर के खिलाफ नारेबाजी की। विपक्ष का आरोप है कि यह अभियान बिहार विधानसभा चुनाव से पहले मतदाताओं, खासकर गरीब और हाशिए पर रहने वाले समुदायों को वोट देने के अधिकार से वंचित करने की साजिश है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और RJD नेता तेजस्वी यादव ने इस अभियान को "लोकतंत्र के खिलाफ साजिश" करार दिया। चुनाव आयोग का आंकड़ा चुनाव आयोग ने  एक बयान में बताया कि SIR अभियान के तहत अब तक 56 लाख मतदाताओं को अयोग्य पाया गया है। इसमें 20 लाख मृत मतदाता, 28 लाख ऐसे मतदाता जो बिहार से बाहर चले गए हैं, 7 लाख ऐसे मतदाता जो दो जगहों पर पंजीकृत हैं, और 1 लाख ऐसे मतदाता शामिल हैं जिनका पता नहीं चल सका। CEC ने सवाल उठाया, “क्या चुनाव आयोग को ऐसे मतदाताओं को नहीं हटाना चाहिए?” पारदर्शी प्रक्रिया का दावा ज्ञानेश कुमार ने कहा कि SIR अभियान पूरी तरह पारदर्शी है और इसका उद्देश्य एक शुद्ध मतदाता सूची तैयार करना है। उन्होंने बताया कि बिहार के मतदाताओं ने इस अभियान में उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया है और अब तक 57.48% गणना फॉर्म एकत्र किए जा चुके हैं। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि 2003 की मतदाता सूची में शामिल 4.96 करोड़ मतदाताओं को कोई अतिरिक्त दस्तावेज जमा करने की जरूरत नहीं है, जबकि शेष 3 करोड़ मतदाताओं को अपनी जन्म तिथि या स्थान साबित करने के लिए 11 सूचीबद्ध दस्तावेजों में से एक जमा करना होगा। उन्होंने पूछा, "क्या चुनाव आयोग द्वारा पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से तैयार की जा रही शुद्ध मतदाता सूची निष्पक्ष चुनाव और एक मजबूत लोकतंत्र की आधारशिला नहीं है?" मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा, "किसी न किसी मोड़ पर, हम सभी को, और भारत के सभी नागरिकों को, राजनीतिक विचारधाराओं से परे जाकर, इन सवालों पर एक साथ गहराई से विचार करना होगा।" सुप्रीम कोर्ट में मामला SIR अभियान के खिलाफ कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई हैं, जिनमें दावा किया गया है कि यह प्रक्रिया असंवैधानिक है और लाखों मतदाताओं को मताधिकार से वंचित कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को अभियान जारी रखने की अनुमति दी है, लेकिन यह भी सुझाव दिया कि आधार, राशन कार्ड और वोटर आईडी जैसे दस्तावेजों को स्वीकार किया जाना चाहिए। कोर्ट ने अभियान के समय पर भी सवाल उठाए, पूछा कि इसे केवल बिहार में ही क्यों लागू किया गया और इसे पूरे देश में क्यों नहीं किया गया। विपक्ष की रणनीति एक दिन पहले, बिहार में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने धमकी दी थी कि अगर एसआईआर प्रक्रिया नहीं रोकी गई तो वे राज्य में आगामी चुनावों का बहिष्कार करेंगे। उनके बहिष्कार वाले बयान के बारे में पूछे जाने पर, तेजस्वी ने कहा, "देखेंगे कि लोग क्या चाहते हैं और हमारे सहयोगी क्या कहते हैं।" उन्होंने पूछा, "अगर राज्य के चुनाव पक्षपातपूर्ण और जोड़-तोड़ वाले तरीके से कराए जाते हैं, जहां यह पहले से ही तय होता है कि कौन कितनी सीटें जीतेगा, तो ऐसे चुनाव कराने का क्या फायदा?"

ग्रीस ने इजरायली जहाज को किनारे लगाने से रोका, 1600 यात्री परेशान

सायरोस इजरायल के खिलाफ दुनिया भर में फिलिस्तीन समर्थक ऐक्टिव हैं। पिछले दिनों अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों से लेकर सड़कों तक पर इजरायल के लोगों का विरोध हुआ था। यही नहीं इजरायली दूतावास के दो कर्मचारियों की वॉशिंगटन में गोली मारकर हत्या कर दी थी। अब ग्रीस में इजरायल के एक जहाज को समंदर के किनारे पर रुकने नहीं दिया गया। इसके चलते जहाज को मजबूरन वापस लौटना पड़ा। जहाज में 1600 यात्री सवार थे। ये प्रदर्शनकारी नारेबाजी कर रहे थे और नो-एंट्री टू इजरायल चिल्ला रहे थे। इस विरोध प्रदर्शन के चलते जहाज को वापस लौटना पड़ा और फिर साइप्रस के रास्ते आया। क्राउन इरिस नाम का क्रूज शिप 6 घंटे की यात्रा करके पहुंचा था, लेकिन उसे रुकने ही नहीं दिया गया। जहाज को ग्रीस के सायरोस में रुकना था और कुछ यात्रियों को उतरना था। फिर विरोध ऐसा हुआ कि जहाज को वापस ले जाया गया और वह साइप्रस के रास्ते अपनी मंजिल पर पहुंचा। इस जहाज को लिमासोल जाना था, जो साइप्रस का ही दूसरा सबसे बड़ा शहर है। चैनल 12 की रिपोर्ट के मुताबिक जिस जहाज को रुकने ही नहीं दिया गया, उसमें करीब 400 बच्चे भी सवार थे। जहाज में सवार लोगों और क्रू मेंबर का कहना था कि बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे भी बैठे थे। ऐसे में विरोध प्रदर्शन हिंसक होने से उनकी जान को खतरा हो सकता था। उन्हें बचाने के लिए ही जहाज को वहां से आगे बढ़ा लिया गया। जहाज में सवार लोगों को सुरक्षा के नजरिए से अंदर ही बने रहने को कहा गया। उनसे खिड़कियां और दरवाजे बंद करने को कहा गया। इजरायली यात्री ने बताया कि हमने विरोध प्रदर्शन को देखते हुए इजरायल के झंडे लहराए और गाना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि हम लोग तो जहाज के अंदर सुरक्षित महसूस कर रहे थे, लेकिन उसमें सवार बच्चे थोड़ा डरे हुए थे। यह प्रदर्शन ग्रीस में मौजूद फिलिस्तीन समर्थकों की ओर से आयोजित किया गया था। फ्रांस में इजरायल की साइकिलिंग टीम को घेरा यही नहीं ऐसे ही एक विरोध का सामना इजरायल की साइकिलिंग टीम को फ्रांस में करना पड़ा। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग इजरायल के खिलाफ नारेबाजी करने लगे और टीम को घेर लिया। इन लोगों का कहना था कि फ्रांस की सरकार को इजरायल के लोगों को अपने देश में एंट्री नहीं देनी चाहिए।

ग्रीस ने इजरायली जहाज को किनारे लगाने से रोका, 1600 यात्री परेशान

सायरोस इजरायल के खिलाफ दुनिया भर में फिलिस्तीन समर्थक ऐक्टिव हैं। पिछले दिनों अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों से लेकर सड़कों तक पर इजरायल के लोगों का विरोध हुआ था। यही नहीं इजरायली दूतावास के दो कर्मचारियों की वॉशिंगटन में गोली मारकर हत्या कर दी थी। अब ग्रीस में इजरायल के एक जहाज को समंदर के किनारे पर रुकने नहीं दिया गया। इसके चलते जहाज को मजबूरन वापस लौटना पड़ा। जहाज में 1600 यात्री सवार थे। ये प्रदर्शनकारी नारेबाजी कर रहे थे और नो-एंट्री टू इजरायल चिल्ला रहे थे। इस विरोध प्रदर्शन के चलते जहाज को वापस लौटना पड़ा और फिर साइप्रस के रास्ते आया। क्राउन इरिस नाम का क्रूज शिप 6 घंटे की यात्रा करके पहुंचा था, लेकिन उसे रुकने ही नहीं दिया गया। जहाज को ग्रीस के सायरोस में रुकना था और कुछ यात्रियों को उतरना था। फिर विरोध ऐसा हुआ कि जहाज को वापस ले जाया गया और वह साइप्रस के रास्ते अपनी मंजिल पर पहुंचा। इस जहाज को लिमासोल जाना था, जो साइप्रस का ही दूसरा सबसे बड़ा शहर है। चैनल 12 की रिपोर्ट के मुताबिक जिस जहाज को रुकने ही नहीं दिया गया, उसमें करीब 400 बच्चे भी सवार थे। जहाज में सवार लोगों और क्रू मेंबर का कहना था कि बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे भी बैठे थे। ऐसे में विरोध प्रदर्शन हिंसक होने से उनकी जान को खतरा हो सकता था। उन्हें बचाने के लिए ही जहाज को वहां से आगे बढ़ा लिया गया। जहाज में सवार लोगों को सुरक्षा के नजरिए से अंदर ही बने रहने को कहा गया। उनसे खिड़कियां और दरवाजे बंद करने को कहा गया। इजरायली यात्री ने बताया कि हमने विरोध प्रदर्शन को देखते हुए इजरायल के झंडे लहराए और गाना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि हम लोग तो जहाज के अंदर सुरक्षित महसूस कर रहे थे, लेकिन उसमें सवार बच्चे थोड़ा डरे हुए थे। यह प्रदर्शन ग्रीस में मौजूद फिलिस्तीन समर्थकों की ओर से आयोजित किया गया था। फ्रांस में इजरायल की साइकिलिंग टीम को घेरा यही नहीं ऐसे ही एक विरोध का सामना इजरायल की साइकिलिंग टीम को फ्रांस में करना पड़ा। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग इजरायल के खिलाफ नारेबाजी करने लगे और टीम को घेर लिया। इन लोगों का कहना था कि फ्रांस की सरकार को इजरायल के लोगों को अपने देश में एंट्री नहीं देनी चाहिए।

मंदिर में इस्लाम प्रचार पर दर्ज FIR रद्द, हाईकोर्ट ने कहा– यह अपराध नहीं, मुस्लिम युवकों को राहत

बेंगलुरु कर्नाटक हाई कोर्ट ने वैसे तीन मुस्लिम व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया है, जिन पर एक हिंदू मंदिर में इस्लाम की शिक्षा को बढ़ावा देने वाले पर्चे बांटने और मौखिक रूप से अपनी धार्मिक मान्यताओं को समझाने का आरोप लगाया गया था। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि किसी मंदिर में सिर्फ इस्लाम का प्रचार करने वाला पर्चा बांटने और उसके बारे में व्याख्या करने से कोई अपराध नहीं हो जाता, जब तक कि धर्मांतरण से जुड़ा कोई साक्ष्य न मिलता हो। आरोपियों पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 299, 351(2) और 3(5) और कर्नाटक धर्म स्वतंत्रता अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2022 की धारा 5 के तहत आरोप लगाए गए थे। जस्टिस वेंकटेश नाइक टी की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि आरोपियों ने उपरोक्त कानूनों के तहत कोई अपराध नहीं किया है, क्योंकि उन लोगों ने किसी भी व्यक्ति को इस्लाम में धर्मांतरित करने का कोई प्रयास नहीं किया। हिन्दू धर्म पर अपमानजनक टिप्पणी के भी आरोप लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि चार मई 2025 को शाम 4:30 बजे, जब वह जामखंडी स्थित रामतीर्थ मंदिर गया था, तो कुछ लोग वहां मंदिर परिसर में इस्लामिक शिक्षा का प्रचार करने वाले पर्चे बाँट रहे थे और अपनी धार्मिक मान्यताओं के बारे में लोगों को मौखिक रूप से समझा रहे थे। शिकायत में बताया गया है कि घटनास्थल पर मौजूद हिन्दू श्रद्धालुओं ने उन लोगों से उनकी गतिविधियों के बारे में पूछताछ की थी, तो इसके जवाब में, मुस्लिम युवकों ने कथित तौर पर हिंदू धर्म की आलोचना करते हुए अपमानजनक टिप्पणियाँ की थीं। नौकरी और गाड़ी का दिया था प्रलोभन शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया था कि आरोपी मंदिर में मौजूद लोगों को इस्लाम धर्म अपनाने के एवज में गाड़ी देने और दुबई में नौकरी दिलाने का प्रलोभन दे रहे थे। दूसरी तरफ, अपने खिलाफ दर्ज अपराध को रद्द करने की मांग करते हुए, याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि वे केवल अल्लाह या पैगंबर मुहम्मद की शिक्षाओं का प्रचार कर रहे थे। धर्मांतरण के साक्ष्य नहीं याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत से कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा किसी व्यक्ति को एक धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तित करने का प्रयास करने के आरोप केपीआरएफआर अधिनियम की धारा 5 के तहत दंडनीय अपराध के आवश्यक तत्वों को पूरा नहीं करते हैं क्योंकि ऐसे कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं, जिससे साबित हो कि वे सभी धर्मांतरण कराने की कोशिश कर रहे थे।

50 लोगों की जान पर आफत: रूस का यात्री विमान दुर्घटनाग्रस्त, बचाव अभियान जारी

मॉस्को  रूस में एक बड़ा विमान हादसा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक एक यात्री विमान चीन की सीमा के पास लापता हो गया था। विमान का संपर्क एयर ट्रैफिक कंट्रोल से टूट गया था। An-24 नाम के इस यात्री विमान में 49 लोग सवार थे और ताजा रिपोर्ट से पता चला है कि सभी लोगों की मौत हो गई है। लापता विमान क्रैश हो गया था और अब उसका मलबा मिल गया है। रूस की सरकारी न्यूज एजेंसी TASS की रिपोर्ट में पहले कहा गया था कि विमान ने टिंडा (Tynda) के लिए उड़ान भरी थी लेकिन गंतव्य के नजदीक पहुंचते ही एयर ट्रैफिक कंट्रोल से उसका उसका संपर्क टूट गया। बताया गया था कि चीन की सीमा के पास ये विमान लापता हो गया है। TASS की रिपोर्ट के मुताबिक यात्री विमान, अंगारा एयरलाइंस का था और अंतिम बार जब उससे संपर्क हुआ था, वह टिंडा एयरपोर्ट से कुछ किलोमीटर की दूरी पर था। इसके बाद से उसका कोई पता नहीं चल पाया है। यह इलाका चीन की सीमा के काफी पास स्थिति है और इस क्षेत्र में करीब करीब हमेशा मौसम काफी खराब रहता है, जिससे विमानों के लिए उड़ान भरना काफी चुनौतीपूर्ण रहता है। AN-24 का पूरा नाम Antonov-24 है, जो एक सोवियत निर्मित मध्यम दूरी का डबल इंजन टर्बोप्रॉप यात्री विमान है. इसे मुख्य रूप से कम दूरी की उड़ानों के लिए बनाया गया है और क्षेत्रीय उड़ानों के लिए इसका इस्तेमाल होता है. ये पहली बार 1959 में उड़ा था और इसे रूसी, पूर्वी यूरोप और एशिया के कठिन इलाकों में उड़ान भरने के लिए डिज़ाइन किया गया था. ये विमान लगभग 1,500 से 2,000 किलोमीटर तक उड़ान भर सकता है, जो इसे क्षेत्रीय उड़ानों के लिए परफेक्ट बनाता है. इसकी खासियत ये है कि ये कम दूरी के रनवे से टेकऑफ और लैंडिंग कर सकता है, जो इसे दूर-दराज और पहाड़ी इलाकों के लिए उपयुक्त बनाता है. इसके मजबूत और भरोसेमंद डिजाइन की वजह से इसे कार्गो विमान और सैन्य परिवहन में भी इस्तेमाल किया जाता है. रूस की सरकारी समाचार एजेंसी TASS और SHOT न्यूज आउटलेट ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि यात्री विमान के लापता होने की रिपोर्ट आने के साथ ही स्थानीय प्रशासन और एविएशन अथॉरिटी ने तत्काल सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिया था। बचाव दलों को जंगलों और पहाड़ी इलाकों की ओर रवाना किया गया था। आशंका जताई जा रही है कि विमान की क्रैश लैंडिंग हो सकती है। जिस क्षेत्र में विमान लापता हुआ था वो अमूर क्षेत्र मौसम के लिहाज से काफी मुश्किल क्षेत्र है। यहां काफी ज्यादा ठंड होती है और पहाड़ी इलाका है। यहां घने जंगल, ऊबड़-खाबड़ इलाके हैं। इसके अलावा मौसम में अचानक परिवर्तन आता रहता है। इसलिए पायलट्स के लिए इस क्षेत्र से विमानों को उड़ाना काफी मुश्किल होता है।