samacharsecretary.com

राधाकृष्णन की एंट्री से सियासत गरमाई, बीजेपी के कदम से उद्धव-स्टालिन पर दबाव

नई दिल्ली उपराष्ट्रपति चुनाव को लेकर बीजेपी ने अपने उम्मीदवार के नाम का ऐलान कर दिया है. एनडीए उम्मीदवार के तौर पर सीपी राधाकृष्णन के नाम पर मुहर लगी है, लेकिन विपक्ष ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं. बीजेपी ने सीपी राधाकृष्णन के नाम का ऐलान कर एनडीए को एकजुट रखने के साथ-साथ विपक्षी किले में भी सेंधमारी का दांव चल दिया है. बीजेपी संसदीय बोर्ड की बैठक के बाद पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने राधाकृष्णन के नाम का ऐलान करते हुए कहा कि विपक्ष के साथ भी बातचीत कर उनके नाम पर सर्वसम्मति बनाने की कोशिश करेंगे. एनडीए की ओर से उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर राधाकृष्णन को उतारना मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है. प्रधानमंत्री मोदी का हर एक फैसला राजनीतिक लिहाज से काफ़ी अहम होता है. ऐसे में राधाकृष्णन का चयन के पीछे बीजेपी की सोची-समझी रणनीति मानी जा रही है. सीपी राधाकृष्णन दक्षिण भारत के तमिलनाडु से आते हैं और फिलहाल महाराष्ट्र के राज्यपाल हैं. इस तरह से बीजेपी ने उन्हें उम्मीदवार बनाकर डीएमके और एआईएडीएमके में सेंधमारी करने के साथ-साथ उद्धव ठाकरे की शिवसेना को भी कशमकश में डाल दिया है. राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति चुनाव में सेंधमारी देश में राष्ट्रपति चुनाव हो या फिर उपराष्ट्रपति का चुनाव, देखा गया है कि सत्तापक्ष ने विपक्षी खेमे में सेंधमारी करती रही है. चाहे कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूपीए का दौर रहा हो या फिर मौजूदा बीजेपी के नेतृत्व वाला एनडीए. यूपीए ने 2007 के राष्ट्रपति चुनाव में प्रतिभा देवीसिंह पाटिल को उम्मीदवार बनाया था, जिनके ख़िलाफ़ एनडीए से भैरों सिंह शेखावत चुनाव लड़े थे. प्रतिभा पाटिल महाराष्ट्र की होने के नाते शिवसेना ने एनडीए गठबंधन का हिस्सा होते हुए भी यूपीए को वोट किया था. इसी तरह 2012 के राष्ट्रपति चुनाव में यूपीए ने प्रणब मुखर्जी को जब उम्मीदवार बनाया था, तब भी एनडीए का हिस्सा होने के बावजूद शिवसेना और जेडीयू ने यूपीए को वोट किया था. वहीं, 2017 के राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए ने राम नाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया था, तब जेडीयू ने विपक्ष में रहते हुए भी उनका समर्थन किया था क्योंकि वे बिहार के राज्यपाल थे. इसके बाद 2022 में उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में एनडीए ने जगदीप धनखड़ को अपना उम्मीदवार बनाया था तो कांग्रेस की तरफ़ से मार्गरेट अल्वा विपक्षी उम्मीदवार थीं. इसके बाद भी टीएमसी ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया था जबकि धनखड़ के साथ ममता की अदावत जगजाहिर रही है.  कशमकश में उद्धव से स्टालिन तक  तमिलनाडु से आने वाले सीपी राधाकृष्णन एनडीए के संयुक्त उम्मीदवार हैं, जो फिलहाल महाराष्ट्र के राज्यपाल हैं. ऐसे में उद्धव ठाकरे की शिवसेना और एमके स्टालिन की डीएमके कशमकश की स्थिति में फंस गए हैं. स्टालिन और उद्धव दोनों ही विपक्षी खेमे में हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने सीपी राधाकृष्णन का नाम आगे बढ़ाकर इन दोनों नेताओं के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं. उद्धव ठाकरे के लिए मुश्किल यह है कि अगर वे राधाकृष्णन को समर्थन नहीं देते हैं, तो यह सीधा मैसेज जाएगा कि उन्होंने अपने ही राज्यपाल के ख़िलाफ़ जाकर वोट किया. यही वजह है कि शिवसेना (यूबीटी) के नेता संजय राउत ने कहा, "सीपी राधाकृष्णन बहुत अच्छे इंसान हैं, वे विवादास्पद नहीं हैं और उनके पास अनुभव है. मैं उन्हें शुभकामनाएँ देता हूँ." संजय राउत के बयान से साफ़ है कि उद्धव ठाकरे के सामने एनडीए कैंडिडेट का खुलकर विरोध करना आसान नहीं होगा. वहीं, भारतीय जनता पार्टी ने तमिलनाडु की सियासत में भी डीएमके और एआईएडीएमके की टेंशन बढ़ा दी है. तमिलनाडु में क्षेत्रीय अस्मिता काफ़ी अहमियत रखती है. ऐसे में एमके स्टालिन के लिए राधाकृष्णन के नाम का विरोध करना आसान नहीं होगा. इसी तरह से एआईएडीएमके के लिए भी एनडीए के ख़िलाफ़ जाना मुश्किल होगा. विपक्षी एकता कैसे रहेगी बरकरार? उपराष्ट्रपति चुनाव में एनडीए की तरफ़ से सीपी राधाकृष्णन को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाले 'इंडिया' ब्लॉक के लिए आपसी एकता बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है. विपक्ष संयुक्त उम्मीदवार उतारकर एनडीए को टेंशन बढ़ाना चाहता था, लेकिन राधाकृष्णन की उम्मीदवारी होने के बाद 'इंडिया' ब्लॉक में भी सियासी चिंता बढ़ गई है. डीएमके के लोकसभा और राज्यसभा में कुल 32 सांसद हैं और तमिलनाडु की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते उसके सामने यह दुविधा रहेगी कि वह अपने राज्य के एनडीए उम्मीदवार का समर्थन करे या नहीं. डीएमके के लिए दुविधा इसलिए भी होगी, क्योंकि अगले साल तमिलनाडु में चुनाव हैं और बीजेपी और एआईएडीएमके इसे बड़ा मुद्दा बना सकते हैं. सीपी राधाकृष्णन के नाम से विपक्षी एकता डगमगा सकती है. 2022 में टीएमसी ने वोटिंग में हिस्सा न लेकर कांग्रेस को गच्चा दे चुकी है. अब फिर से कांग्रेस के लिए सियासी चुनौती खड़ी हो गई है. देखना होगा कि उद्धव ठाकरे और एमके स्टालिन उपराष्ट्रपति चुनाव में क्या स्टैंड लेते हैं.

विपक्ष पर निशाना साधते हुए राजनाथ सिंह बोले, उनका रवैया निराशाजनक रहा

नई दिल्ली  लोकसभा में अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन पर भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला से जुड़े मुद्दे पर विशेष चर्चा हुई। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला की अंतरिक्ष यात्रा पर चर्चा की शुरुआत की। हालांकि, इस दौरान विपक्ष के सांसदों ने जमकर हंगामा किया और नारेबाजी की। वहीं, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में विपक्ष के हंगामे को लेकर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि शुभांशु शुक्ला की अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (आईएसएस) यात्रा और उसके बाद की वापसी पर विशेष चर्चा के दौरान जिस तरह से विपक्ष ने सदन में हंगामा किया और सदन को चलने नहीं दिया, वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। रक्षा मंत्री ने विपक्ष को नसीहत देते हुए कहा कि अंतरिक्ष जैसे विषय जो भारत की वैज्ञानिक और सामरिक दृष्टि से 21वीं सदी के भविष्य में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, कम से कम उन्हें दलगत राजनीति से ऊपर रखना चाहिए। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सोमवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, ''आज लोकसभा में भारतीय वायु सेना के ग्रुप कैप्टन और इसरो मिशन के पायलट शुभांशु शुक्ला की अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (आईएसएस) यात्रा और उसके बाद की वापसी पर विशेष चर्चा के दौरान जिस तरह से विपक्ष ने सदन में हंगामा किया और सदन को चलने नहीं दिया, वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। यह चर्चा ''भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम और विकसित भारत 2047 में इसकी भूमिका'' विषय पर थी, जो राष्ट्रीय उपलब्धि और देश के सम्मान, स्वाभिमान और भविष्य की वैज्ञानिक और राष्ट्रीय सुरक्षा की संभावनाओं से जुड़ी हुई है। इसमें जिस प्रकार से विपक्ष ने बाधा डाली, उनका व्यवहार आज बेहद निराशाजनक रहा है।'' उन्होंने आगे लिखा, ''प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत अंतरिक्ष में विकास की जिन नई ऊंचाइयों पर पहुंच रहा है, वह अभूतपूर्व है। विपक्ष चर्चा में भाग लेकर भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की रचनात्मक समीक्षा, आलोचना व सुझाव दे सकता था। अंतरिक्ष जैसे विषय जो भारत की वैज्ञानिक और सामरिक दृष्टि से 21वीं सदी के भविष्य में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, कम से कम उन्हें दलगत राजनीति से ऊपर रखना चाहिए।''

भाजपा ने साधा विपक्ष को, कहा—बस ‘अब्बा-डब्बा-जब्बा’ की बातें करते हैं

नई दिल्ली  भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर विपक्ष पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि आज कई राजनीतिक दलों के नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे, लेकिन उनकी विश्वसनीयता और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति उनका रवैया संदिग्ध है। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा, "आज मैं देख रहा था कि अनेक राजनीतिक पार्टियों के लोग बैठकर प्रेस वार्ता कर रहे थे। मैं पूछना चाहता हूं कि आपकी खंडपीठ बड़ी है, या सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ बड़ी है। जब सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर पर रोक नहीं लगाई है, तो आप कौन सी खंडपीठ हैं जो घोषणा कर रहे हैं कि चोरी हो रही है? ये दिखाता है कि संवैधानिक संस्थाओं के साथ आप खिलवाड़ करते हैं।" उन्होंने कहा, "सिर्फ चुनाव आयोग ही नहीं, देश की ऐसी कोई संवैधानिक संस्था नहीं बची है, जिस पर कांग्रेस परिवार और उनके इर्द-गिर्द घूम रहे परिवारों ने हमला न किया हो। याद कीजिए, ये वही लोग हैं जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट पर उंगली उठा दी थी। ये वही लोग हैं जिन्होंने भारत के आर्मी चीफ को 'सड़क का गुंडा' कहने की हिमाकत की थी। ये वही लोग हैं जो 'सर्जिकल स्ट्राइक', 'एयरस्ट्राइक' और 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद भारतीय सेना पर हमला करने से नहीं कतराते हैं और सबूत मांगते हैं।" भाजपा प्रवक्ता ने विपक्ष को अनाड़ी बताया और कहा कि भारत निर्वाचन आयोग ने रविवार को सभी मुद्दों पर विस्तार से जवाब दिया, लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं जो इसे नहीं समझते हैं। वह (विपक्ष) खुद को खिलाड़ी समझते हैं, लेकिन मैं बताना चाहता हूं कि वह अनाड़ी हैं। वह चाहते हैं कि हिंदुस्तान के अंदर अफरा-तफरी का माहौल बने ताकि वह राजनीतिक लाभ उठा सकें। हर मुद्दे पर विपक्ष का सिर्फ एक ही राग अब्बा-डब्बा-जब्बा है। उन्होंने कहा, "विपक्ष का एकमात्र लक्ष्य घुसपैठियों को बचाना है। इनका (कांग्रेस और उसके सहयोगियों का) मकसद घुसपैठियों को बचाना है। भारत की जनता जानती है कि आप किस प्रकार से वोट बैंक की, तुष्टिकरण की राजनीति और उसमें घुसपैठियों को जोड़कर अपना वोट बैंक बनाकर जीतना चाहते हैं। लेकिन इस देश के संसाधनों पर इस देश की जनता का अधिकार है, किसी घुसपैठिए का अधिकार नहीं है। संबित पात्रा ने विपक्ष पर सवाल उठाते हुए कहा, "सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, भारत के चुनाव आयोग को चुनाव के लिए मतदाता सूची तैयार करने का अधिकार है। कांग्रेस, राजद, तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का लक्ष्य बांग्लादेश जैसी स्थिति पैदा करना है। वे भारत की सड़कों पर पूरी तरह अराजकता फैलाना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि भारतीय लोग बर्बर बनें और हिंसा का सहारा लें, ताकि विपक्ष इस अस्थिरता का फायदा उठा सके।"

भूमिका मत बनाइए… CJI गवई ने सिब्बल को लगाई फटकार

नई दिल्ली  देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ आज (सोमवार को) अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के कुलपति के रूप में प्रोफेसर नईमा खातून की नियुक्ति को बरकरार रखने वाले इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी। पीठ में CJI गवई के अलावा जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस एनवी अंजारिया भी शामिल थे। इसी दौरान जस्टिस चंद्रन ने खुद को इस केस से अलग कर लिया। सुनवाई को दौरान जस्टिस चंद्रन ने खुलासा किया कि जब प्रोफेसर (डॉ.) फैजान मुस्तफा को चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (CNLU) का कुलपति नियुक्त किया गया था, तब वे वहां के कुलाधिपति थे। मुस्तफा चूंकि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति पद के लिए भी शॉर्टलिस्ट किए गए थे, जिसमें यह पद बाद में खातून को मिला। इसलिए उन्होंने इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। उस पीठ के समक्ष सूचीबद्ध कीजिए, जिसमें जस्टिस चंद्रन न हों जस्टिस चंद्रन ने कहा, "जब मैंने फैजान मुस्तफा का चयन किया था, तब मैं उस विश्वविद्यालय का कुलाधिपति था… इसलिए मैं मामले से अलग हो सकता हूँ।" हालांकि, सॉलिसिटर जनरल ने उनसे अनुरोध किया कि मामले से उनके अलग होने की जरूरत नहीं है, और उनमें उनका दृढ विश्वास है। इसी बीच, CJI गवई ने कहा, “मेरे भाई को फैसला करने दीजिए। इस मामले को उस पीठ के समक्ष सूचीबद्ध कीजिए, जिसमें जस्टिस चंद्रन शामिल नहीं हैं।” भूमिका मत दीजिए, दलीलें दीजिए बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, इससे पहले, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर याचिका की पैरवी करते हुए कहा कि अगर कुलपतियों की नियुक्ति इसी तरह होती रही, तो भविष्य में क्या होगा, यह सोचकर ही मैं काँप उठता हूँ। इस पर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गवई ने सिब्बल से दो टूक लहजे में कहा, 'भूमिका देने की बजाय, सीधे मुद्दे पर आइए और हमें अपनी दलीलें बताइए।' मामले की जाँच जरूरी है इसके बाद सिब्बल ने दलील दी, "अगर दो वोट निकाल दिए जाएँ तो उन्हें सिर्फ 6 वोट मिलेंगे। ऐसा सिर्फ कार्यकारी समिति में कुलपति के वोट की वजह से है और एक और वोट था। अगर आप इन दोनों को निकाल देते हैं, तो वह बाहर हो जाएँगी।" सिब्बल ने आगे कहा कि वह स्थगन की माँग नहीं कर रहे हैं, लेकिन मामले की जाँच जरूरी है। उन्होंने कहा, “तथ्यों के आधार पर इससे बेहतर कोई मामला नहीं हो सकता।” नईमा खातून की कुलपति के रूप में नियुक्ति ऐतिहासिक दूसरी तरफ, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि नईमा खातून की कुलपति के रूप में नियुक्ति ऐतिहासिक है। उन्होंने कहा, "यह ऐतिहासिक है। वह इस यूनिवर्सिटी की पहली महिला कुलपति हैं। उनकी नियुक्ति थोड़ा इलेक्शन और थोड़ा सेलेक्शन है। हाई कोर्ट खातून के के चुनाव संबंधी तर्कों से सहमत नहीं था, बावजूद उनकी नियुक्ति को बरकरार रखा।" प्रोफेसर गुलरेज़ को भाग नहीं लेना चाहिए था मुख्य न्यायाधीश गवई ने टिप्पणी की कि प्रोफेसर गुलरेज़ को इस प्रक्रिया में भाग नहीं लेना चाहिए था। जस्टिस गवई ने कहा, "आदर्श रूप से कुलपति को इसमें भाग नहीं लेना चाहिए था और सबसे वरिष्ठ व्यक्ति को इसमें शामिल होने देना चाहिए था। देखिए, जब हम कॉलेजियम के फैसले भी ले रहे हैं, अगर ऐसा कुछ होता है, तो हम भी इससे अलग हो जाते हैं।" अब मामले की अलग बेंच सुनवाई करेगी। विवाद क्या है? बता दें कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस साल मई में नईमा खातून की एएमयू कुलपति पद पर नियुक्ति को बरकरार रखा था। याचिकाकर्ताओं ने इस आधार पर खातून की नियुक्ति को चुनौती दी थी कि खातून के पति प्रोफेसर मोहम्मद गुलरेज़ कुलपति के रूप में वहां कार्यरत थे, जब उनके नाम की सिफारिश की गई थी। इसके अलावा प्रोफेसर गुलरेज ने यूनिवर्सिटी के कार्यकारी परिषद की महत्वपूर्ण बैठकों की अध्यक्षता भी की थी। हालांकि, हाई कोर्ट नेनियुक्ति को बरकरार रखते हुए फैसला सुनाया था कि उनका अंतिम चयन विजिटर द्वारा किया गया था, जिन पर पक्षपात के कोई आरोप नहीं हैं। राष्ट्रपति इस यूनिवर्सिटी की विजिटर हैं। मुजफ्फर उरूज रब्बानी ने उनकी नियुक्ति को चुनौती दी है।  

भारत में विभाजन की स्थिति पर रीवा सांसद का विवादित बयान, बहस गरमाई

रीवा  कांग्रेस पर वोट चोरी का आरोप लगाने के बाद रीवा के भाजपा सांसद एक बार फिर सुर्खियों में हैं। उनका एक और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस बार भारत-पाकिस्तान विभाजन की बात करते-करते उनकी जुबान फिसल गई। सांसद ने धर्म विशेष के लोगों को लेकर एक विवादित बयान दिया है। रीवा के सांसद ने कहा कि वो लोग भारत छोड़कर नहीं गए और अब यहां छाती में बैठकर मूंग दलने का काम कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जहां हिंदु बहुसंख्यक था वहां अल्पसंख्यक हो गया। सांसद जनार्दन मिश्रा ने वायरल वीडियो में कहा कि सबसे ज्यादा मुस्लिम उत्तरप्रदेश और बिहार में थे, वो यहीं रह गए और अब यहां रहकर छाती में मेक ठोक रहे हैं(छाती पर बैठकर मूंग दलने वाली कहावत), यह स्थिति रह गई है भारत में विभाजन की। सांसद ने मऊगंज जिले में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि विभाजन के समय पाकिस्तान की मांग करने वालो के साथ जा रहे कुछ लोगों को कांग्रेस ने अपने फायदे के लिए रोक लिया था। देश के लगभग 150 जिले है जहां हिन्दू बहुसंख्यक थे, लेकिन अब अल्पसंख्यक हो गए हैं। मुस्लिमों की आबादी बढ़ गई है, ये भारत में रहकर छाती में मेक ठोंक रहे हैं। गौरतलब है कि सांसद जनार्दन मिश्र अक्सर अपने बड़बोले बयानों को लेकर सुर्खियों में रहते है। उनका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए दिया बयान हो या फिर IPS और IAS अफसरों के लिए मंच पर धमकी। जनार्दन का वायरल होना तय होता है। सोमवार को ही उनका एक और बयान सोशल मीडिया में वायरल हुआ था जिसमें वो वोट चोरी का उदाहरण देते हुए पूर्व विधानसभा अध्यक्ष स्वर्गीय श्रीनिवास तिवारी पर निशाना साधा था। अब सोमवार को ही उनका एक और विवादित बयान सामने आया है जो मुस्लिम समाज को लेकर है।

विधानसभा चुनाव 2027: जीत सुनिश्चित करने बीजेपी के पुराने विधायकों के टिकट होंगे जोखिम में

लखनऊ  उत्तर प्रदेश में बीजेपी इस बार जिताऊ और लोकप्रिय चेहरों पर दांव लगा सकती है। साथ ही उन सभी मौजूदा विधायकों के टिकट खतरे में है, जो पिछले चुनाव में बीजेपी के दम पर अपनी सीट निकलने में कामयाब हुए थे और इस बार भी इसी फिराक में बैठे हैं। सूत्रों की माने तो बीजेपी इस बार बड़ी संख्या में यानी 100 से 115 के बीच विधायकों का टिकट काट सकती है। इस तरह बीजेपी के मौजूदा विधायकों में से आधे विधायकों के टिकट पर तलवार लटक सकती है। इनकी जगह पर इस बार नए चेहरों के साथ ही विपक्षी दलों से आये मौजूदा विधायकों को बीजेपी अपने सिंबल पर चुनाव लड़ाने का दांव खेल सकती है। हालांकि इस सर्वे से बीजेपी के साथ ही समाजवादी पार्टी के बागी विधायकों की भी मुश्किलें बढ़ गई है। सपा का PDA बीजेपी की हैट्रिक में बन रहा रोड़ा राजनीतिक जानकारों की माने तो सपा से आने वाले विधायक ये न सोचे कि बीजेपी में उनका टिकट पक्का है। उनका कहना है कि बीजेपी विधायकों के साथ ही सपा के बागी विधायकों को भी इंटरनल सर्वे के इम्तिहान में पास होना पड़ेगा। दरअसल बीते लोकसभा चुनाव के आए नतीजो ने 2027 विधानसभा चुनाव में बीजेपी की राह मुश्किल कर दी है। बीजेपी इस बार जहां जीत की हैट्रिक लगाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। वहीं समाजवादी पार्टी के पीडीए ने बीजेपी की हालत पतली कर दी है। सपा मुखिया अखिलेश यादव लगातार जनता से जुड़े मुद्दे उठाते हुए पीडीए का नारा दे रहे हैं। साथ इस बार बीजेपी को सत्ता से उखाड़ फेंकने की बात भी पूरे दमखम के साथ कह रहे हैं। इन्ही सब चीजों को देखते हुए बीजेपी अभी से अंदर ही अंदर बिना किसी को भनक लगे अपनी तैयारियों में जुट गई है। सर्वे और BJP विधायकों की कीकत सूत्रों की माने तो बीजेपी इस बार टिकटों से पहले हर विधानसभा सीट पर इंटरनल सर्वे करा सकती है। इससे जिन सीटों पर बीजेपी के विधायक है उनकी असलियत का पता लग जाएगा। साथ ही जो सीट सपा समेत अन्य दलों के खाते में हैं वहां के किये क्या रणनीति तैयार करनी है उसका खाका भी तैयार हो जाएगा। इस तरह बीजेपी एक तीर से कई निशाने साध सकती है। उधर इंटरनल सर्वे की बात सुनकर विधायकों में हड़कंप मच गया है। क्योंकि सूत्रों की माने तो कई ऐसे मौजूदा विधायक है, जिनके टिकट पर तलवार लटकी है। कहा ये भी जा रहा है कि इस बार के टिकट वितरण में पैरवी और परिवारवाद की झलक नहीं दिखाई देगी। पूजा पाल को भी टिकट मिलने की संभावना समाजवादी पार्टी से निष्कासित होने के बाद से चायल सीट से विधायक पूजा पाल चर्चाओ में आ गई हैं। उन्होंने जन्माष्टमी के दिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी मुलाकात की है। इस मुलाकात को लेकर कई तरह की चर्चाएं चलने लगी है। हालांकि पूजा पाल अभी बीजेपी में शामिल नहीं हुई है, लेकिन आने वाले समय में ऐसा देखने को मिल सकता है। साथ ही बीजेपी अगर पूजा पाल को टिकट दे देती है तो ये कोई आश्चर्यजनक बात नहीं होनी चाहिए। इसके साथ ही सपा के बागी अभय सिंह, मनोज पांडेय, राकेश प्रताप सिंह समेत अन्य बागियों को भी बीजेपी मौका देकर समाजवादी पार्टी की मुसीबतें खड़ी कर सकती है। 

मंत्री जीवेश मिश्रा का तंज – विपक्ष थक चुका, हार स्वीकार कर चुका

मगध बिहार में इन दिनों निर्वाचन आयोग विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर)  को लेकर सख्त है। वहीं, विपक्ष लगातार फर्जी वोटर आईडी को लेकर सरकार और आयोग पर निशाना साध रहा है। इन दिनों डबल वोटर आईडी कार्ड पर पक्ष विपक्ष दोनों की ओर से बयान दिए जाने के बाद मामला तूल पकड़ता जा रहा है। राजनीति में इस समय एसआईआर को लेकर घमासान मचा हुआ है. साथ ही डबल वोटर कार्ड का मुद्दा भी तेजी से तूल पकड़ रहा है। इसी सियासी खींचतान के बीच शहरी विकास एवं आवास मंत्री जीवेश मिश्रा ने विपक्ष पर जोरदार हमला बोला है। उन्होंने कहा कि  चुनाव से पहले ही विपक्ष हार मान चुका है, इसलिए ऐसे आरोप लगा रहा है। जहानाबाद के टाउन हॉल में आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लेने पहुंचे मंत्री जीवेश मिश्रा ने मीडिया से बातचीत करते हुए ये बातें कही। उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले ही विपक्ष हार मान चुका है. उनके पास अब कोई मुद्दा नहीं बचा है. इस दौरान मंत्री जीवेश मिश्रा ने जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर पर भी तगड़ा हमला बोला। 'मुझे इस… बारे में जानकारी नहीं है' मंत्री जीवेश ने प्रशांत किशोर पर निशाना साधते हुए कहा कि विपक्ष के पाले हुए प्रशांत किशोर भी एनडीए के सामने कोई लाभ नहीं दिला पा रहे हैं। जब पत्रकारों ने डिप्टी सीएम विजय सिन्हा के दो-दो वोटर कार्ड को लेकर सवाल किया तो मंत्री ने कहा कि मुझे इस बारे में जानकारी नहीं है। अगर किसी के पास दो-दो ईपिक कार्ड हैं तो यह चुनाव आयोग का विषय है। आयोग को इसकी जांच करनी चाहिए. उन्होंने बताया कि सोमवार को वह फिर जहानाबाद आएंगे और जिले वासियों को बड़ी सौगात देंगे। ध्यान रहें कि मंत्री जीवेश मिश्रा एल्केम लैबोरेटरी के संस्थापक स्वर्गीय सम्प्रदा सिंह की 100वीं जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने के लिए जहानाबाद के टाउन हॉल पहुंचे थे। इस समारोह में पूर्व सांसद अरुण कुमार समेत कई राजनीतिक दलों के नेताओं ने शिरकत की।

विधानसभा-लोकसभा चुनाव से पहले MP में कांग्रेस जांचेगी वोटर लिस्ट

भोपाल  बिहार विधानसभा चुनाव के लिए चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के शुद्धिकरण में कई लाख नाम काटे जाने पर आपत्ति के बीच कांग्रेस को मध्य प्रदेश की मतदाता सूचियों में भी खामियों की आशंका है। इसको तलाशने के लिए पार्टी प्रदेश के हर बूथ स्तर पर सत्यापन कराएगी। इसमें 2023 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव के समय जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए, जोड़े या संशोधित किए गए, उनकी पहचान करके रिपोर्ट तैयार की जाएगी। यह काम जनवरी 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए 65 हजार कार्यकर्ताओं को बूथों पर भेजकर मतदाताओं का सत्यापन कराने की रणनीति बना ली गई है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी राहुल गांधी के निर्देश पर पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने प्रदेश इकाई से मतदाता सूची का सत्यापन कराने को कहा है। प्रदेश के पदाधिकारियों के अनुसार, 65 हजार कार्यकर्ताओं को लगाकर सभी बूथों पर सत्यापन कराया जाएगा। इसकी रिपोर्ट पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को भेजी जाएगी। खामियां मिलने पर मुद्दे को उठाते हुए चुनाव आयोग में आपत्ति दर्ज कराई जाएगी। 24 नाम शिकायत के बाद हटाए गए थे बता दें कि पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ और दिग्विजय सिंह और कांग्रेस के अन्य नेता यह दावा कर चुके हैं कि 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची में भारी गड़बड़ी थी। लगभग 24 नाम पार्टी की शिकायत के बाद हटाए गए थे। 2023 के चुनाव में भी प्रमाण सहित शिकायतें की गई थीं, जिनमें से कुछ पर कार्रवाई भी हुई। पार्टी ने तय किया है कि बूथ लेवल एजेंटों के माध्यम से सूची का पड़ताल कराई जाएगी। 2023 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के बाद जो परिवर्तन हुआ था, उसकी जांच होगी। दोनों चुनाव के समय की मतदाता सूची लेकर बूथ लेवल एजेंट मतदान केंद्रों पर जाएंगे। यहां चिन्हित मतदाताओं के घर जाएंगे और यह पता करेंगे कि जो परिवर्तन हुए थे, वे सही थे या नहीं। बूथवार जांच कराएंगे, सतर्क भी रहेंगे कांग्रेस के प्रदेश संगठन महामंत्री संजय कामले का कहना है कि मध्य प्रदेश में मतदाता सूची की जांच कराने का निर्णय लिया है। इसी माह 230 विधानसभा के प्रभारी नियुक्त कर दिए जाएंगे। पार्टी के 65 हजार बूथ लेवल एजेंट स्थिति देखेंगे। सूची से जिनके नाम हटाए, जोड़े या संशोधित किए गए, सबको देखा जाएगा। रिपोर्ट बनाकर पार्टी मुख्यालय भेजेंगे और चुनाव आयोग में भी जाएंगे। जांच कराएं, कोई बुराई नहीं पर एक वर्ग विशेष पर फोकस न करें भाजपा के प्रदेश मंत्री रजनीश अग्रवाल का कहना है कि मतदाता सूची पारदर्शी और प्रमाणिक रहे, पार्टी हमेशा इसकी पक्षधर रही है। इसको लेकर पार्टी काम भी करती है। कांग्रेस एक मजहब को लेकर चुनाव आयोग के नियमों को दरकिनार करने की बात कर रही है। कांग्रेस मतदाता सूची का सत्यापन कराए, इसमें कोई बुराई नहीं। हम तो हमेशा कहते हैं कि सूची शुद्ध होनी चाहिए पर कांग्रेस का ध्येय मतदाता सूची का शुद्धीकरण नहीं तुष्टिकरण की राजनीति है। उसका संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा ही नहीं है। एक मजहब विशेष को लेकर बात करना कहां से उचित है। चुनाव चोरी पर रिपोर्ट जारी करेगी कांग्रेस कांग्रेस के अध्यक्ष जीतू पटवारी का कहना है कि लोकतंत्र और संविधान को खत्म करने की खुली दुर्भावना रखने वालों की साजिशों को बेनकाब करना अब जरूरी हो गया है। मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में क्या हुआ था, इसे सबके सामने लाया जाएगा। मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव-2023 को लेकर चुनाव-चोरी पर रिपोर्ट जारी की जाएगी।

दिग्विजय सिंह ने कहा, कांग्रेस छोड़ने के बावजूद ज्योतिरादित्य मेरे पुत्र जैसे

भोपाल मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच हुई मुलाकात के बाद सियासत में कई तरह की अटकलें लग रही हैं। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा दिग्विजय सिंह को मंच पर बैठने का वीडियो भी जमकर वायरल हो रहा है। अब इस मामले में दिग्विजय सिंह ने ज्योतिरादित्य सिंधिया की तारीफ की है। उन्होंने कहा कि ज्योतिरादित्य सिंधिया जी मेरे बेटे की तरह हैं। क्या कहा दिग्विजय सिंह ने रविवार को मीडिया से चर्चा करते हुए दिग्विजय सिंह ने सिंधिया परिवार को लेकर बात की। दिग्विजय सिंह ने कहा कि ज्योतिरादित्य सिंधिया मेरे पुत्र के जैसे हैं। सिंधिया परिवार से हमारा पुराना संबंध हैं। माधवराव सिंधिया जी हमारी पार्टी के सीनियर नेता थे। उन्होंने गांधी परिवार को बहुत आदर और सम्मान दिया। ज्योतिरादित्य सिंधिया जी भी कांग्रेस में थी। कांग्रेस में उन्हें आदर और प्यार मिला। केंद्रीय कैबिनेट में जगह दी गई लेकिन पता नहीं वह क्यों छोड़कर चले गए। क्यों लेकर गए मंच पर दिग्विजय सिंह ने कहा कि हम लोग एक कार्यक्रम में मौजूद थे। मैं मंच के नीचे बैठा था और ज्योतिरादित्य सिंधिया जी कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे। इस दौरान जब उनकी नजर पड़ी तो वह मुझे मंच पर ले गए। अपनी कसम के बारे में बताया दिग्विजय सिंह ने कहा कि अब कहा जा रहा है कि दिग्विजय सिंह ने मंच पर नहीं बैठने की कसम तोड़ दी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के मंच पर इसलिए नहीं बैठता कि कई बार वहां मंच पर बैठने को लेकर विवाद की स्थिति हो जाती है कि मंच पर कौन-कौन बैठेगा। इसलिए मैं कार्यकर्ताओं के साथ बैठना पसंद करता हूं। उन्होंने कहा कि यह अभी से नहीं है यह कांग्रेस की बहुत पुरानी परंपरा है। मैंने कोई नई परंपरा शुरू नहीं की है। राहुल गांधी जब कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे तब वह भी मंच पर नहीं बैठे थे। आम कार्यकर्ताओं के साथ मंच के नीते बैठे थे। जब भाषण देने के लिए बुलाया जाता था तब लोग मंच पर भाषण देते थे। मंच पर केवल कांग्रेस के जिला अध्यक्ष बैठते थे। मंत्री, विधायक और सांसद नीचे ही बैठते थे। क्या हुआ था कार्यक्रम में दरअसल, शुक्रवार को ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह राजधानी भोपाल में आयोजित एक निजी कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे थे। दिग्विजय सिंह मंच के नीचे बैठे थे जबकि ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए मंच पर कुर्सी लगाई गई थी। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जब देखा की दिग्विजय सिंह नीचे बैठे हैं तो वह उठकर दिग्विजय सिंह के पास आए और हालचाल पूछा इसके बाद उनका हाथ पकड़कर उन्हें मंच पर लेकर गए।  

कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने छोड़ा विदेश मामलों का विभागाध्यक्ष पद, जानिए कारण

नई दिल्ली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा ने पार्टी के विदेश मामलों के विभाग के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया है. उन्होंने कहा कि यह कदम विभाग के पुनर्गठन और युवाओं को नेतृत्व का अवसर देने के लिए उठाया गया है. करीब एक दशक तक इस विभाग की कमान संभालने वाले आनंद शर्मा का कहना है कि “विभाग में संभावनाशील और प्रतिभाशाली युवा नेताओं को शामिल करने से इसके कामकाज में निरंतरता बनी रहेगी.”  पीटीआई के मुताबिक, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को पत्र लिखकर अपना इस्तीफ़ा सौंपा और पार्टी नेतृत्व को इस ज़िम्मेदारी के लिए धन्यवाद दिया. अंतरराष्ट्रीय मामलों में पार्टी का चेहरा रहे हैं आनंद शर्मा आनंद शर्मा कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) के सदस्य हैं और अंतरराष्ट्रीय मामलों में पार्टी का चेहरा रहे हैं. उन्होंने भारत-अमेरिका परमाणु समझौते, न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में भारत को छूट दिलाने, और भारत-अफ्रीका साझेदारी को संरचित रूप देने में अहम भूमिका निभाई. मुंबई 26/11 हमलों के बाद भी उन्होंने वैश्विक मंचों पर भारत का पक्ष मजबूती से रखा. कांग्रेस की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, उनके नेतृत्व में DFA ने दुनिया के तमाम लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकारों को मानने वाली पार्टियों से मजबूत संबंध बनाए.  मनीष तिवारी की पोस्ट इस दौरान एशिया, अफ्रीका, यूरोप, लैटिन अमेरिका और मिडिल ईस्ट की राजनीतिक पार्टियों के साथ कई अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन और डेलीगेशन एक्सचेंज आयोजित हुए. मनीष तिवारी ने X पर लिखा- “विदेश मामलों की उनकी समझ गहरी है, खासकर अफ्रीका पर. उनके अनुभव से हमने हमेशा लाभ उठाया है. उन्होंने अपने जीवन के साढ़े पांच दशक कांग्रेस की सेवा में लगाए हैं.” आनंद शर्मा अब भी कांग्रेस में बने रहेंगे, लेकिन DFA की कमान अब किसी युवा नेता के हाथ में जाएगी. वह ऑपरेशन सिंदूर पर भारत का दृष्टिकोण रखने के लिए विदेश गए बहु-दलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडलों का भी हिस्सा थे.