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‘जेल भेजने आए थे, खुद हैं जमानत पर’ — राहुल पर सीएम सरमा की सीधी चोट

गुवाहाटी  राहुल गांधी ने असम दौरे पर कांग्रेस नेताओं से कहा कि हिमंत बिस्वा सरमा को जेल भेजा जाएगा। इस पर असम के सीएम सरमा ने पलटवार करते हुए कहा कि खुद राहुल गांधी देशभर में कई मामलों में जमानत पर हैं। उन्होंने राहुल को तंज कसते हुए असम की मेहमाननवाजी का आनंद लेने की सलाह दी। असम की राजनीति में गर्मी बढ़ गई है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी के असम दौरे पर दिए गए कथित बयान को लेकर मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने तीखा पलटवार किया है। सरमा ने एक्स पर राहुल गांधी के बंद कमरे में बोले गए कथित बयान का जिक्र करते हुए कहा कि जो खुद देशभर में कई मामलों में जमानत पर हैं, वो दूसरों को जेल भेजने की बात कर रहे हैं। यह टिप्पणी कांग्रेस की असम में रणनीतिक बैठक के बाद सामने आई है। राहुल गांधी असम दौरे पर थे, जहां उन्होंने कांग्रेस की राज्य स्तरीय राजनीतिक मामलों की समिति के साथ एक बंद बैठक की। इस बैठक में उन्होंने कथित रूप से कहा कि लिख कर ले लीजिए, हिमंत बिस्वा सरमा को जेल जरूर भेजा जाएगा। सरमा खुद को ‘राजा’ समझते हैं, लेकिन असम की जनता उन्हें भ्रष्टाचार के लिए जेल भेजेगी। राहुल ने आगे कहा कि मुख्यमंत्री और उनके परिवार को घोटालों का जवाब देना होगा। वहीं, मुख्यमंत्री सरमा ने इस बयान को राहुल की दुर्भावना और राजनीतिक प्रतिशोध की भावना बताया। सात ही उन्होंने इसे राजनीतिक मंच का दुरुपयोग कहा। सीएम हिमंत का पलटवार हिमंत बिस्वा सरमा ने राहुल गांधी के बयान का जवाब एक्स पर एक पोस्ट के जरिए दिया। उन्होंने लिखा कि राहुल गांधी बड़े आराम से भूल गए कि वे स्वयं देशभर में दर्ज कई आपराधिक मामलों में जमानत पर हैं। सरमा ने राहुल को तंज कसते हुए असम की मेहमाननवाजी का आनंद लीजिए। इसके साथ ही आगे उन्होंने कहा कि केवल मुझे जेल भेजने की बात कहने के लिए राहुल गांधी असम आए हैं। कांग्रेस और भाजपा के बीच जुबानी जंग इस बयानबाजी के बाद असम की राजनीति में गर्मी बढ़ गई है। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी और भाजपा के मुख्यमंत्री सरमा के बीच यह तकरार सीधे तौर पर दोनों दलों की रणनीति और विचारधारा को सामने रखती है। कांग्रेस राज्य में भाजपा सरकार पर भ्रष्टाचार और तानाशाही के आरोप लगाती रही है, जबकि भाजपा कांग्रेस को परिवारवाद और कानूनी मामलों में घिरा हुआ बताती है। क्या हैं राहुल गांधी के खिलाफ केस? मुख्यमंत्री सरमा के बयान के मुताबिक, राहुल गांधी देश के कई हिस्सों में आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं और इन मामलों में उन्हें जमानत मिली हुई है। इसमें सबसे चर्चित मामला 'मोदी सरनेम' टिप्पणी वाला है, जिसमें मानहानि का आरोप लगा और उन्हें दो साल की सजा भी सुनाई गई थी, हालांकि बाद में सजा पर रोक लगी और उन्हें जमानत मिली।  इतना ही नहीं राहुल गांधी पर और भी मामले दर्ज हैं।  

कांग्रेस का हमला तेज: बालासोर केस को लेकर ओडिशा सरकार पर इस्तीफा देने का दबाव

भुवनेश्वर  कांग्रेस ने बालासोर की घटना पर ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी का इस्तीफा मांगा है। इसके साथ राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की गई है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस महिला विंग की अध्यक्ष अलका लांबा बुधवार को भुवनेश्वर पहुंचीं, जहां उन्होंने मीडिया से बात करते हुए सरकार पर गंभीर सवाल उठाए। अलका लांबा ने आरोप लगाया कि भाजपा नेतृत्व वाली सरकार के तहत ओडिशा महिलाओं के लिए असुरक्षित होता जा रहा है। उन्होंने छात्रा की मौत के लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया। साथ ही घटना को प्रशासनिक असफलता व जवाबदेही की कमी का नतीजा बताया। अलका लांबा ने कहा कि राज्य मशीनरी पूरी तरह असफल हो गई है। एक लड़की को न्याय मांगने के लिए खुद को आग लगानी पड़ी। मीडिया से बातचीत में अलका लांबा ने कहा, "आज हकीकत यह कहती है कि पूरा ओडिशा बर्बादी की ओर बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री (मोहन चरण माझी) अनुभवहीन हैं। यह एक साल में फेल साबित हुए हैं। इन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए।" उन्होंने कहा, "जब कानून-व्यवस्था चरमरा जाए, अपराधी खुलेआम घूमें और पीड़ित न्याय के इंतजार में दम तोड़ दें, तब मुख्यमंत्री का इस्तीफा देना जरूरी होता है। हम उनका तुरंत इस्तीफा मांगते हैं और ओडिशा में राष्ट्रपति शासन लागू करने का आग्रह करते हैं।" अलका लांबा ने कथित तौर पर छात्रा के इलाज में देरी और प्रशासन की ओर से तुरंत कार्रवाई न करने की भी निंदा की। उन्होंने कहा, "उसे (छात्रा) समय पर इलाज से बचाया जा सकता था। जब एक बच्ची जल रही थी, तब व्यवस्था मूकदर्शक बनी रही।" कांग्रेस की महिला नेता ने जानकारी दी कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी बालासोर का दौरा कर सकते हैं। उन्होंने कहा, "राहुल गांधी ने संवेदनशीलता दिखाते हुए छात्रा के पिता से बात की। पिता भावुक थे, राहुल गांधी ने उन्हें विश्वास दिलाया कि तब तक न्याय नहीं मिल जाता है कांग्रेस उनके साथ खड़ी है। राहुल गांधी दोबारा लौटेंगे और प्रियंका गांधी भी आएंगी।" उन्होंने कहा कि ओडिशा के सभी अभिभावकों को हम विश्वास दिलाने आए हैं कि आप अकेले नहीं हैं। कांग्रेस न्याय का हक मिलने तक साथ खड़ी है। इस दौरान अलका लांबा ने राज्य की जनता से 17 जुलाई को 'ओडिशा बंद' में हिस्सा लेने की अपील की।

चीन से फंडिंग पाने वालों को विदेश नीति पर बोलने का हक नहीं: तरुण चुघ

नई दिल्ली  कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने विदेश मंत्री एस जयशंकर पर भारत की विदेश नीति को कमजोर करने का आरोप लगाया है। इसी पर अब भाजपा नेता तरुण चुघ की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। उन्होंने एजेंसी से बातचीत में कहा कि राहुल गांधी हमें विदेश नीति पर ज्ञान दे रहे हैं। वह हमें किसी भी प्रकार का ज्ञान नही दें, तो बेहतर रहेगा, क्योंकि इस बात को खारिज नहीं किया जा सकता है कि राहुल गांधी ही वह शख्स हैं, जो छुप-छुप कर चीनी अधिकारियों से मुलाकात किया करते थे। भाजपा नेता ने कहा कि जिन लोगों ने चीन के साथ एमओयू साइन किया है, वे हमें कैसे विदेश नीति पर ज्ञान दे सकते हैं। राहुल गांधी ने हमेशा से ही भारत की विदेश नीति को नीचा दिखाने की कोशिश की है। उन्होंने कहा कि देश अब इस बात को जान चुका है कि गांधी परिवार का चीन प्रेम बहुत पुराना है। देश इस बात को भूला नहीं है कि जब कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' का नारा देकर देश की झोली में 1962 का युद्ध डाला था। तरुण चुघ ने कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में भारत की विदेश नीति कमजोर थी, सभी लोग भारत को छोटी नजरों से देखा करते थे। लेकिन, आज ऐसी स्थिति नहीं है। आज की तारीख में भारत की विदेश नीति काफी मजबूत हुई है। आज की तारीख में पूरी दुनिया में भारत को सम्मान की दृष्टि से देखा जा रहा है। कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए वैश्विक मंच पर देश की विदेश नीति को कमजोर करने का अपनी तरफ से भरसक प्रयास किया था। लेकिन, आज जब देश हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है, तो कुछ लोगों के पेट में दर्द हो रहा है। इसके अलावा, शंघाई सहयोग संगठन में विदेश मंत्री एस जयशंकर की तरफ से पहलगाम आतंकी हमले को उठाए जाने की तारीफ की और कहा कि विदेश मंत्री ने वैश्विक मंच पर आतंक के मुद्दे को उठाया है। उन्होंने पूरी दुनिया में यह संदेश फैलाने की कोशिश की कि भारत आतंकवाद के विरुद्ध है। भारत ने हमेशा से ही आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार करके रखा और आगे भी रखेगा।

बिहार चुनावी रण से पहले बेंगलुरु में कांग्रेस का दांव: OBC को 50% से ज्यादा आरक्षण का संकल्प

बेंगलुरु बिहार विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने पिछड़ा वर्ग को रिझाने के लिए शिक्षा, नौकरियों और अन्य क्षेत्रों में आरक्षण की 50% की सीमा को तोड़ने का संकल्प लिया है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कांग्रेस की ओबीसी परिषद की बैठक में इसका ऐलान किया। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) की ओबीसी सलाहकार परिषद की दो दिवसीय बैठक बेंगलुरु में आयोजित की गई थी। आज बैठक का दूसरा और आखिरी दिन है। कांग्रेस द्वारा गठित ओबीसी सलाहकार परिषद को देश भर में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को प्रभावित करने वाले प्रमुख मुद्दों पर रणनीति बनाने का काम सौंपा गया है। परिषद की बैठक में केंद्र से तेलंगाना जाति सर्वेक्षण के मॉडल के आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तावित जातिगत गणना कराने का आह्वान किया गया। मुख्यमंत्री सिद्धरमैया के नेतृत्व में यहां हुई दो दिवसीय बैठक में इस संबंध में एक प्रस्ताव पारित किया गया। सिद्धरमैया ने परिषद में पारित प्रस्तावों को ‘बेंगलुरु घोषणा’ नाम देते हुए कहा,‘‘जनगणना में प्रत्येक व्यक्ति और जाति के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक, रोज़गार, राजनीतिक पहलुओं को शामिल किया जाना चाहिए।’’ उन्होंने कहा कि दूसरा प्रस्ताव आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा को समाप्त करने का था, जिससे शिक्षा, सेवा, राजनीतिक और अन्य क्षेत्रों में ओबीसी के लिए उपयुक्त आरक्षण सुनिश्चित हो सके। सिद्धरमैया ने बुधवार को बेंगलुरु में हुई परिषद की बैठक की अध्यक्षता की। निजी शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के लिए आरक्षण सिद्धरमैया ने कहा कि बैठक में पारित तीसरे प्रस्ताव में कहा गया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4) के अनुसार निजी शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के लिए आरक्षण होना चाहिए। सलाहकार परिषद ने सर्वसम्मति से ‘न्याय योद्धा’ राहुल गांधी को समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों के लिए सामाजिक न्याय का मुद्दा उठाने के लिए धन्यवाद दिया। सिद्धरमैया ने कहा, ‘‘राहुल जी के दृढ़ निश्चय ने मनुवादी मोदी सरकार को भारत में जातिगत गणना की न्यायोचित और संवैधानिक मांग के आगे झुकने पर मजबूर कर दिया। भारत के सभी पिछड़े वर्गों की ओर से, परिषद हृदय से उनकी सराहना करता है और इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए राहुल गांधी के योगदान को श्रेय देता है।’’ जातिगत गणना मील का पत्थर जातिगत गणना को लेकर केंद्र द्वारा किये गए फैसले को मील का पत्थर बताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि यह भारतीय संविधान द्वारा परिकल्पित सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में एक छोटा सा कदम है। सिद्धरमैया ने कहा, ‘‘न्याय योद्धा राहुल गांधी जी के साहसी और अडिग नेतृत्व में, भारत सामाजिक सशक्तिकरण के अंतिम संवैधानिक उद्देश्य को साकार करने और प्राप्त करने के लिए नियत है, जिससे हमारे महान राष्ट्र में एक समतावादी और समान समाज का निर्माण होगा।’’ मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने परिषद से राष्ट्रव्यापी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक जाति जनगणना पूरी करने के लिए मौजूदा सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति बनाने का आग्रह करते हुए कहा कि पिछड़े वर्गों के लिए 75% आरक्षण या जाति जनगणना के आधार पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व के लिए संघर्ष किया जाना चाहिए। उन्होंने निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की वकालत की। …तो भारत एक सच्चा लोकतंत्र नहीं रह सकता सिद्धारमैया ने जोर देकर कहा कि अगर अल्पसंख्यकों और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) सहित अन्य हाशिए पर पड़े समुदायों की बात नहीं सुनी जाती, तो भारत एक सच्चा लोकतंत्र नहीं रह सकता। ओबीसी परिषद की बैठक को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, "अगर ओबीसी, एससी, एसटी और अल्पसंख्यकों – यानी अहिंदा समुदायों – की सिर्फ़ गिनती की जाती है, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी जाती, तो भारत एक सच्चा लोकतंत्र नहीं रह सकता।" यह सिर्फ आरक्षण की लड़ाई नहीं: सिद्धारमैया उन्होंने आगे कहा, "यह सिर्फ आरक्षण की लड़ाई नहीं है। यह उन लोगों के लिए सम्मान, पहचान और असली ताकत की लड़ाई है, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से इससे वंचित रखा गया है।" अहिंदा कन्नड़ में अल्पसंख्यातरु, हिंदुलिदावरु और दलितरु (अल्पसंख्यक, ओबीसी, एससी) का संक्षिप्त रूप है। कर्नाटक के सामाजिक न्याय के संघर्ष से उपस्थित लोगों को अवगत कराते हुए, मुख्यमंत्री ने 2015 में कंथराज समिति सहित विभिन्न समितियों द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों का उल्लेख किया, जिन्होंने 1.3 करोड़ परिवारों का सर्वेक्षण किया था। हालांकि, उन्होंने कहा कि भाजपा ने रिपोर्ट को चार साल तक रोके रखा। सिद्धारमैया ने आगे कहा, "कर्नाटक सामाजिक न्याय की लड़ाई में अग्रणी रहा है: 1918 में मिलर समिति, 1921 में 75 प्रतिशत आरक्षण, हवानूर आयोग (1975) ने पिछड़े वर्ग के उत्थान की वैज्ञानिक नींव रखी, 1995 में ओबीसी राज्य अधिनियम, 2015 में कंथराज आयोग, जिसने 1.3 करोड़ परिवारों का सर्वेक्षण किया। लेकिन भाजपा ने हर प्रगतिशील कदम को रोका या लटकाकर रखा। इसमें कंथराज रिपोर्ट को 4 साल तक रोके रखना भी शामिल है।"  

खरगे और राहुल गांधी की प्रधानमंत्री से मांग – जम्मू-कश्मीर को फिर से मिले राज्य का दर्जा

नई दिल्ली  राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर आग्रह किया कि जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए संसद के आगामी मॉनसून सत्र में विधेयक लाया जाए। उन्होंने यह मांग भी उठाई कि सरकार केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची के तहत शामिल करने के लिए भी विधेयक लाए। संसद का मॉनसून सत्र 21 जुलाई से शुरू होकर 21 अगस्त तक चलेगा। प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कांग्रेस अध्यक्ष खरगे और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा, "पिछले पांच वर्षों से जम्मू-कश्मीर के लोग लगातार पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग कर रहे हैं। यह मांग वैध भी है और उनके संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों पर आधारित है।" उनका कहना था कि अतीत में केंद्र शासित प्रदेशों को राज्य का दर्जा दिए जाने के उदाहरण रहे हैं, लेकिन जम्मू -कश्मीर का मामला ऐसा है कि स्वतंत्र भारत में जिसकी कोई मिसाल नहीं है। उन्होंने इस बात का उल्लेख किया कि यह पहली बार है कि विभाजन के बाद किसी पूर्ण राज्य को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया है। कांग्रेस के दोनों शीर्ष नेताओं ने कहा, "कई अवसरों पर, आपने व्यक्तिगत रूप से राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई है। 19 मई 2024 को भुवनेश्वर में अपने एक साक्षात्कार में आपने कहा: "राज्य का दर्जा बहाल करना एक गंभीर वादा है, जो हमने किया है और हम इस पर कायम हैं।" फिर, 19 सितंबर 2024 को श्रीनगर में एक रैली को संबोधित करते हुए आपने इस बात को दोहराया था: "हमने संसद में कहा है कि हम क्षेत्र का राज्य का दर्जा बहाल करेंगे।" खरगे और राहुल गांधी के अनुसार, केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 के मामले में उच्चतम न्यायालय के समक्ष इसी तरह का आश्वासन दिया है, जिसमें कहा गया है कि राज्य का दर्जा "जितनी जल्दी हो सके" बहाल किया जाएगा। उन्होंने कहा, " हम सरकार से केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के लिए संसद के आगामी मॉनसून सत्र में एक कानून लाने का आग्रह करते हैं।" कांग्रेस नेताओं ने यह भी कहा, "इसके अतिरिक्त, हम अनुरोध करते हैं कि सरकार केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची के तहत शामिल करने के लिए कानून लाए। यह लद्दाख के लोगों के अधिकारों, भूमि और पहचान की रक्षा करते हुए उनकी सांस्कृतिक, विकासात्मक और राजनीतिक आकांक्षाओं को संबोधित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।"  

दिग्विजय सिंह की पोस्ट पर घमासान, मंत्री विश्वास सारंग ने तीखी प्रतिक्रिया दी

भोपाल  मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह की एक फेसबुक पोस्ट को लेकर विवाद खड़ा हो गया है. दिग्विजय ने अपने पोस्ट में दो तस्वीरें शेयर की हैं. पहली तस्वीर में कांवड़ यात्रा को सड़क पर दिखाया गया है, जबकि दूसरी तस्वीर में नमाज अदा करते हुए लोग नजर आ रहे हैं. पोस्ट में सवाल उठाया गया है, 'एक देश, दो कानून?' इस पोस्ट पर बीजेपी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. मध्यप्रदेश के मंत्री विश्वास सारंग ने दिग्विजय सिंह को 'मौलाना' करार देते हुए कहा कि वे केवल सनातन धर्म का विरोध करते हैं. आरोप लगाया कि दिग्विजय सिंह कांवड़ यात्रा जैसे पवित्र पर्व को विवादास्पद बनाना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि जाकिर नाइक का महिमामंडन करने वाले, आतंकवादियों को संरक्षण देने वाले, सेना के ऑपरेशन पर विवाद खड़ा करने वाले, पाकिस्तान परस्ती की बात करने वाले, तुष्टिकरण को आगे बढ़कर राजनीति करने वाले दिग्विजय सिंह से और कुछ अपेक्षा नहीं है. विश्वास सारंग ने यह भी कहा कि दिग्विजय सिंह हमेशा हिंदू धर्म के अनुयायियों, साधु-संतों और हिंदू त्योहारों का अपमान करते आए हैं, इसलिए उन्हें 'मौलाना दिग्विजय सिंह' कहा जाता है. मोहन सरकार के मंत्री ने आगे कहा, ''भगवा आतंकवाद जैसे शब्दों को इजाद करके दिग्विजय सिंह ने ही सनातन को इस दुनिया में बदनाम करने का काम किया है. मैं दिग्विजय सिंह से कहना चाहता हूं कि हिंदू और सनातन धर्म के किसी भी त्यौहार पर इस तरीके की टिप्पणी होगी तो यह सहन नहीं किया जाएगा.'' 

AIMIM से चुनी गई MP की एकमात्र हिंदू महिला पार्षद ने दिया इस्तीफा, पति ने लगाए थे धर्म परिवर्तन कराने के आरोप

खरगोन  मध्य प्रदेश खरगोन नगर पालिका परिषद में वार्ड क्रमांक 2 की एआईएमआईएम की एकमात्र गैर मुस्लिम पार्षद ने धर्म परिवर्तन के आरोपों को लेकर पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। खरगोन की वार्ड क्रमांक 2 से एआईएमआईएम के टिकट से चुनाव जीतने वाली पार्षद अरुण उपाध्याय ने राष्ट्रीय कार्यालय हैदराबाद को भेजे अपने इस्तीफे में कहा कि वह निजी कारणों के चलते प्रदेश कोर कमेटी के पद और पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे रही हैं। फंड लेकर धर्म परिवर्तन का आरोप उन्होंने आज पत्रकारों से इस्तीफा के कारण पर चर्चा करते हुए कहा कि उनके पति श्यामलाल उपाध्याय 2022 में चुनाव जीतने के बाद से पार्षद पद छोड़ने का दबाब बना रहे थे। पद छोड़ने से मना करने के बाद उन्होंने विगत दो वर्षों से उन पर फंड लेकर धर्म परिवर्तन करवाने का आरोप लगा कर विभिन्न फोरमों पर शिकायत भी की है। उन्होंने बताया कि वह जान से मारने की भी धमकी देते हैं, इसलिए अलग होकर उनके विरुद्ध तलाक का केस भी दायर किया है। इसके अलावा उन्होंने 15 दिन पहले पति के खिलाफ पुलिस अधीक्षक से शिकायत भी की है। पत्रकार वार्ता में दी जानकारी उन्होंने बताया कि न तो उन्होंने स्वयं धर्म परिवर्तन किया है, और ना ही वे फंड लेकर लोगों का धर्म परिवर्तन करवा रही हैं। उन्होंने कहा कि पति से तकरार का कारण पार्टी थी, इसलिए वे इसे छोड़ रही हैं, लेकिन पार्षद के रूप में काम करती रहेंगी। उन्होंने कहा कि 'मैंने पति से इन आरोपों को सिद्ध करने के लिए भी कहा है।' AIMIM की पहली हिंदू महिला पार्षद 2022 के निकाय चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी से प्रदेश में करीब आधा दर्जन पार्षद जीते थे। इनमें खरगोन की हिन्दू महिला अरुणा उपाध्याय सहित तीन पार्षद भी शामिल थे। वे AIMIM से प्रदेश की पहली हिंदू पार्षद बनकर चर्चा में रहीं। वार्ड 2 से अरुणा के सामने भाजपा प्रत्याशी सुनीता गांगले और कांग्रेस की शिल्पा सोनी मैदान में थीं। उन्होंने 643 वोट हासिल किए थे। भाजपा प्रत्याशी सुनीता को 612, कांग्रेस की शिल्पा को 498 मत मिले थे। अरुणा 31 वोट से जीती थी। खरगोन के वार्ड -2 में निकाय चुनाव के दौरान कुल 2915 मतदाता थे। वार्ड में 70% मुस्लिम आबादी होने के बावजूद उन्होंने जीत हासिल की थी।

बीजेपी में राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की तैयारी चल रही, पार्टी ने कई राज्यों में संगठन चुनाव पूरे कर लिए

नई दिल्ली मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल का एक साल पूरा हो चुका है। इस बीच केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल की भी योजना बन रही है। सूत्रों के अनुसार नए भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव और राज्यपालों में बदलाव (सोमवार को तीन नए राज्यपालों की नियुक्ति) के बाद मंत्रिमंडल में फेर बदल हो सकता है। बीजेपी के कई राज्यों के भी अध्यक्ष के चुनाव हो रहे हैं। माना जा रहा है इसके पूरा होने के बाद मोदी सरकार के मंत्रिमंडल में बदलाव हो सकता है। हरियाणा और गोवा के लिए नए राज्यपाल नियुक्त किए जा चुके हैं जबकि लद्दाख को भी नया उपराज्यपाल मिल चुका है। वहीं मोदी सरकार द्वारा राज्यसभा के लिए चार नए सदस्यों (एडवोकेट उज्ज्वल निकम, मीनाक्षी जैन, हर्षवर्धन श्रृंगला और सी सदानंदन मास्टर) के नामांकन की घोषणा की घोषणा भी हो चुकी है। रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि इन बदलावों के जरिए कैबिनेट फेरबदल के लिए जमीन तैयार की जा रही है। हाल ही में हरियाणा, गोवा के लिए राज्यपाल और लद्दाख के लिए उपराज्यपालों की नियुक्ति की है। इससे एक दिन पहले ही एडवोकेट उज्ज्वल निकम, मीनाक्षी जैन, हर्षवर्दन श्रृंगला और सी सदानंद मास्टर को राज्यसभा के लिए नॉमिनेट किया गया है। अखबार से बातचीत में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, 'बड़े मंत्रालय वाले अधिकांश मंत्रियों को पिछली मोदी सरकार से रिपीट किया गया है…। अब तक इस बात पर जोर दिया जाता था कि निरंतरता बनी रही, लेकिन अब कैबिनेट को विदेश मामलों जैसी नई प्राथमिकताओं के साथ-साथ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नए टैरिफ के चलते वाणिज्य मंत्रालय फिर संतुलित किया जा सकता है।' रिपोर्ट में भाजपा सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि कैबिनेट में राज्यसभा सांसद बदले जा सकते हैं, जिनका कार्यकाल अंतिम दौर में है और उन्हें संगठन में जगह दी जा सकती है। वहीं, अन्य का कहना है कि भाजपा जनता दल यूनाइटेड, लोक जनशक्ति पार्टी और तेलुगु देशम पार्टी से नेताओं को देख सकती है। खास बात है कि बिहार में विधानसभा चुनाव हैं और लोजपा और जदयू बिहार आधारित पार्टियां हैं। एक भाजपा नेता ने अखबार से कहा, 'चीजें चल रही हैं और सवाल एक ही है कि अब आगे क्या होगा, गवर्नर में फेरबदल, अगले राष्ट्रीय अध्यक्ष और अन्य नेताओं की पार्टी संघठन में नियुक्ति की घोषणा या कैबिनेट फेरबदल।' कहा जा रहा है कि भाजपा 37 इकाइयों में से आधे से ज्यादा में अध्यक्षों का चुनाव कर चुकी है। साथ ही जल्द राष्ट्रीय अध्यक्ष की घोषणा हो सकती है। फिलहाल, भाजपा की कमान केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा के हाथों में है। अध्यक्ष पद के लिए कई दिग्गज नेताओं के नाम चर्चा में हैं. कुछ प्रमुख संभावित उम्मीदवार के नाम सामने आ रहे हैं, जिनमें धर्मेंद्र प्रधान, भूपेंद्र यादव, शिवराज सिंह चौहान और मनोहर लाल खट्टर शामिल हैं. धर्मेंद्र प्रधान: केंद्रीय शिक्षा मंत्री और ओडिशा से ताल्लुक रखने वाले धर्मेंद्र प्रधान को एक मजबूत दावेदार माना जा रहा है. उनकी संगठनात्मक क्षमता और केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका की वजह से उन्हें इस दौड़ में आगे रखा जा रहा है. साथ ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और संघ दोनों से ही उनके संबंध भी सामान्य हैं. भूपेंद्र यादव: केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव का नाम भी प्रमुखता से चर्चा में है. राजस्थान से आने वाले यादव को संघ का करीबी माना जाता है, और उनकी शांत और रणनीतिक कार्यशैली पार्टी के लिए फायदेमंद भी रही है. साथ ही उन्हें संगठन का भी काफी लंबा अनुभव है, और पार्टी ने कई राज्यों में उन्हें चुनाव प्रभार भी दिया था. शिवराज सिंह चौहान: मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता और संगठन में गहरी पकड़ उन्हें भी एक मजबूत दावेदार बना रही है. मगर सूत्रों का मानना है कि उनके नाम पर मुहर तभी लग पाएगी जब संघ की तरफ से दबाव डाले जाएगा. मनोहर लाल खट्टर: हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का नाम भी बीजेपी अध्यक्ष की रेस में शुरू से ही रहा है. हालांकि बीच में सूत्रों से ये भी खबर आई थी कि खट्टर ने उम्र की वजह से अपनी तबीयत का हवाला देते हुए ऐसे किसी पद को लेने से मना किया. मगर इसकी कोई आधिकारिक सूचना नहीं हुई. इसके अलावा, सूत्रों की मानें तो पार्टी इस संभावना पर भी चर्चा कर रही है कि बीजेपी पहली बार किसी महिला को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने पर विचार कर सकती है, जिससे संगठन में एक नया संदेश जाए. पार्टी का कोर वोटर वर्तमान में महिलाओं का वोट बैंक ही है, इसलिए पार्टी मुख्य पदों पर भी महिलाओं को आगे लाना चाह रही है. जुलाई में हो सकता है नए अध्यक्ष का ऐलान सूत्रों की मानें तो बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की घोषणा जुलाई 2025 में होने की संभावना है, क्योंकि संसद का मानसून सत्र 21 जुलाई से शुरू होने वाला है. पार्टी के आंतरिक संगठनात्मक चुनाव लगभग अंतिम चरण में हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की 4 से 6 जुलाई तक दिल्ली में होने वाली प्रांत प्रचारकों की बैठक में इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण चर्चा हो सकती है. इस बैठक के बाद बीजेपी राष्ट्रीय परिषद की मुहर के साथ नए अध्यक्ष का ऐलान कर सकती है. सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी और आरएसएस के बीच नए अध्यक्ष के चयन को लेकर सहमति फिलहाल नहीं बन पाई है. सूत्रों के अनुसार, दोनों संगठन किसी एक नाम पर पूरी तरह सहमत नहीं हो पा रहे हैं. संघ अपनी वैचारिक दृष्टि और दीर्घकालिक रणनीति को ध्यान में रखते हुए ऐसे नेता को प्राथमिकता देना चाहता है, जो संगठन की जड़ों को मजबूत करे और हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाए. वहीं, बीजेपी शीर्ष नेतृत्व, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह शामिल हैं, एक ऐसे नेता की तलाश में हैं जो सरकार और संगठन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर सके. संघ की 4-6 जुलाई की बैठक में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की मौजूदगी में इस मुद्दे पर अंतिम फैसला होने की संभावना है. यह बैठक न केवल नए बीजेपी अध्यक्ष के चयन पर केंद्रित होगी, बल्कि संघ की शताब्दी समारोह की तैयारियों और संगठनात्मक गतिविधियों की … Read more

‘राहुल गांधी को पढ़ाने’ की याचिका खारिज, हाईकोर्ट ने सावरकर मामले में दखल से किया इनकार

मुंबई  बॉम्बे हाई कोर्ट ने मंगलवार को कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया। इस याचिका में आरोप लगाया गया था कि राहुल गांधी ने हिंदुत्व विचारक विनायक दामोदर सावरकर पर “अपरिपक्व टिप्पणी” की है। मांग की कि अदालत द्वारा राहुल गांधी को याचिका पढ़ने का निर्देश दिया जाए। यह याचिका डॉ. पंकज फडनीस द्वारा दायर की गई थी। वह अभिनव भारत कांग्रेस के संस्थापक अध्यक्ष हैं। उन्होंने अपनी याचिका में मांग की थी कि अदालत राहुल गांधी को निर्देश दे कि वे याचिका को पढ़ें ताकि उनकी "सावरकर को लेकर अज्ञानता" दूर हो सके। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ता का दावा था कि राहुल गांधी के बयान ने उनके उस मौलिक कर्तव्य के पालन के अधिकार का उल्लंघन किया है, जिसमें संविधान नागरिकों को स्वतंत्रता संग्राम के आदर्शों को संजोने और उनका पालन करने की बात कहता है। कोर्ट ने खारिज की याचिका मामले की सुनवाई कर रहे मुख्य न्यायाधीश आलोक अराधे और न्यायमूर्ति संदीप मरने की खंडपीठ ने स्पष्ट किया, “हम राहुल गांधी को कोई याचिका पढ़ने का निर्देश नहीं दे सकते। किसी नेता की सोच या विचारधारा को बदलने के लिए अदालत कोई बाध्यकारी आदेश नहीं दे सकती।” डॉ. पंकज द्वारा इसी विषय पर पहले सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने ने भी यह यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि अदालत इस तरह के मुद्दों पर हस्तक्षेप नहीं कर सकती।  

संजय दत्त की खामोशी से हुआ बड़ा नुकसान: उज्ज्वल निकम ने खोले पुराने राज़

मुंबई  महाराष्ट्र में भाषा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा. मराठी और अंग्रेजी के साथ एक से पांचवीं कक्षा तक तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को अनिवार्य करने के महाराष्ट्र सरकार के आदेश के खिलाफ उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने आंदोलन का ऐलान किया था. महाराष्ट्र सरकार ने थ्री लैंग्वेज पॉलिसी लागू करने का आदेश वापस ले लिया, लेकिन यह विवाद थमता नजर नहीं आ रहा. महाराष्ट्र में जल्द ही बीएमसी और अन्य स्थानीय निकायों के चुनाव होने हैं और सत्ताधारी महायुति की अगुवाई कर रही भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) मराठी अस्मिता की सियासी पिच पर घिरी नजर आ रही है. महाराष्ट्र में जारी भाषा विवाद के बीच राज्यसभा में चार सदस्य मनोनीत किए गए. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जिन चार सदस्यों को उच्च सदन के लिए मनोनीत किया है, उनमें एक नाम चर्चित सरकारी वकील उज्ज्वल निकम का भी है. उज्ज्वल निकम के राज्यसभा सदस्य मनोनीत होने के बाद अब बात इसे लेकर भी हो रही है कि क्या उनका मनोनयन उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की मराठी पॉलिटिक्स की काट है? मराठी पॉलिटिक्स की चर्चा क्यों उज्ज्वल निकम एक मराठी परिवार से आते हैं. निकम का जन्म जलगांव के एक संभ्रांत मराठी परिवार में हुआ था और उनके पिता न्यायिक सेवा में जज थे. उज्ज्वल निकम को पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी ने टिकट दिया था. हालांकि, कोर्ट रूम में अजेय निकम सियासत में अपना डेब्यू मैच हार गए थे. बीजेपी संदेश, संकेत और प्रतीकों की सियासत में दक्ष मानी जाती है और मराठी विवाद के बीच अब मराठा उज्ज्वल निकम का देश के उच्च सदन में मनोनयन भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. क्या कहते हैं जानकार महाराष्ट्र के मुंबई में ही रहने वाले राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी ने कहा कि उज्ज्वल निकम बड़े वकील हैं, लेकिन एंटी मराठी नैरेटिव काउंटर करने में कारगर होंगे भी या नहीं? यह भविष्य ही बताएगा. हां, बीजेपी ने ठाकरे बंधुओं के इस नैरेटिव को काउंटर करने के लिए अपने सबसे बड़े चेहरे को आगे कर दिया है. उन्होंने कहा कि उज्ज्वल निकम से पीएम मोदी का मराठी में बात करना मराठी समुदाय के लिए बीजेपी की ओर से यह संदेश है कि हमारा सबसे बड़ा नेता भी मराठी बोलता है, मराठी जानता है, उसका सम्मान करता है और यह मुद्दा अब यहीं पर समाप्त हो जाना चाहिए. महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव संदेश की पॉलिटिक्स का लिटमस टेस्ट होंगे. महाराष्ट्र में एमपी-छत्तीसगढ़ वाली रणनीति! राज्यसभा में उज्ज्वल निकम के मनोनयन को बीजेपी की मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव से पहले वाली रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है. दोनों राज्यों में छिटके अनुसूचित जनजाति (एसटी) के मतदाताओं को फिर से अपने पाले में लाने की कोशिश में बीजेपी ने रानी दुर्गावती गौरव यात्रा निकाली और सरकार ने भोपाल के हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम रानी कमलापति के नाम पर कर दिया. आदिवासी समाज के बीच भगवान का दर्जा रखने वाले बिरसा मुंडा की जयंती को राष्ट्रीय स्तर पर जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत हुई और जबलपुर में शंकर शाह-रघुनाथ शाह के नाम पर स्मारक भी बनवाया गया. छत्तीसगढ़ में पुरखौती सम्मान यात्रा भी इसी रणनीति का हिस्सा थी. दोनों राज्यों में मतदान से ठीक पहले पीएम मोदी ने बिरसा मुंडा की जयंती पर उनके गांव उलिहातु जाकर भी आदिवासी समाज को संदेश दिया था और यह चुनाव में कारगर भी साबित हुआ था. अब उज्ज्वल निकम के राज्यसभा में मनोनयन को भी मराठी पॉलिटिक्स की मुश्किल दिख रही पिच पर बीजेपी की संदेश और प्रतीक की सियासत वाली रणनीति से जोड़कर ही देखा जा रहा है. संजय दत्त अगर हथियार के बारे में बता देते तो मुंबई में नहीं होते धमाके राज्यसभा जाने की तैयारी कर रहे मशहूर वकील उज्ज्वल निकम ने मुंबई धमाकों को लेकर बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि अभिनेता अगर संजय दत्त हथियारों से लदे वाहन की जानकारी दे देते, तो मुंबई में हुए सीरियल ब्लास्ट टल सकते थे। 1993 में देश की आर्थिक राजधानी कही जाने वाली मुंबई में हुए धमाकों में 267 लोगों की मौत हो गई थी।  निकम ने कहा, 'मैं सिर्फ एक ही बात कहना चाहता हूं। धमाका 12 मार्च को हुआ। इससे एक दिन पहले वैन उनके (संजय दत्त) के घर पहुंची थी। वह हथियारों हैंड ग्रेनेड, एके 47 से लदी हुई थी। अबू सलेम उसे लेकर आया था। संजय ने कुछ हैंड ग्रेनेड और बंदूकें उठा ली थीं। इसके बाद उन्होंने सबकुछ वापस कर दिया और सिर्फ एक एके 47 रखी।' वकील ने कहा, 'अगर वह उस समय पुलिस को घर कर देते, तो पुलिस जांच करती और मुंबई धमाके कभी नहीं होते।' निकम ने कहा कि उन्होंने इस बारे में दत्त के वकील को भी बताया था कि एके 47 का नहीं चलना और उसका पास में होना एक बात है, लेकिन उनकी तरफ से पुलिस को नहीं बताए जाने के चलते ब्लास्ट हुए और बहुत सारे लोगों की जान गई। निकम ने चैनल को बताया कि तब संजय दत्त निर्दोष थे और बंदूकों के प्रति आकर्षण होने के कारण हथियार उठा लिया था। उन्होंने कहा, 'कानून की नजरों में जुर्म किया है, लेकिन वह सीधे व्यक्ति हैं…। मैं उन्हें निर्दोष मानता हूं।' कोर्ट ने TADA केस में दत्त को बरी कर दिया था, लेकिन आर्म्स एक्ट के तहत दोषी पाया गया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी 6 साल की सजा को घटाकर 5 साल कर दिया था। दत्त इस दौरान महाराष्ट्र के पुणे स्थित येरवाड़ा जेल में बंद थे। संजय दत्त से क्या हुई थी बात निकम बताते हैं कि आर्म्स एक्ट के तहत दोषी पाए जाने के बाद संजय दत्त को बड़ा झटका लगा था। उन्होंने कहा, 'मैंने उनकी बॉडी लैंग्वेज बदलते देखी। मैंने महसूस किया कि उन्हें झटका लगा है। वह फैसले को सहन नहीं कर पा रहे थे और घबराए लग रहे थे।'  बातचीत में निकम ने 'राज' का भी खुलासा किया। उन्होंने कहा, 'मैंने संजय से कहा था कि संजय ऐसा मत करो। मीडिया आपको देख रही है। आप एक एक्टर हैं। अगर आप सजा से डरे हुए लगेंगे, तो लोग आपको दोषी समझेंगे। आपके … Read more