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92 करोड़ की मेफेड्रोन जब्त, भोपाल में अवैध ड्रग्स मैन्युफैक्चरिंग का भंडाफोड़; 7 गिरफ्तार

डीआरआई ने भोपाल में अवैध दवाओं की मैन्युफैक्चरिंग कारखाने का भंडाफोड़ किया; 92 करोड़ रुपये कीमत की 61.2 किलोग्राम मेफेड्रोन जब्त; सात गिरफ्तार भोपाल  एक महत्त्वपूर्ण खुफिया सूचना के आधार पर, राजस्व आसूचना निदेशालय (डीआरआई) ने भोपाल में एक गुप्त मेफेड्रोन मैन्युफैक्चरिंग कारखाने का, एक सुनियोजित और समन्वित ऑपरेशन, जिसका कोड नाम "ऑपरेशन क्रिस्टल ब्रेक" था, सफलतापूर्वक भंडाफोड़ किया। इस ऑपरेशन के दौरान सूरत और मुंबई पुलिस ने भी डीआरआई का सहयोग किया। डीआरआई ने मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश में कई जगहों पर छापे मारे और इस गिरोह के सात प्रमुख लोगों को गिरफ्तार किया।  16.08.2025 को, ग्राम-जगदीशपुर (इस्लामनगर), हुजूर-तहसील, जिला-भोपाल, मध्य प्रदेश स्थित अवैध निर्माण इकाई की तलाशी में 61.20 किलोग्राम मेफेड्रोन (तरल रूप में) बरामद और जब्त किया गया, जिसकी अवैध बाजार में कीमत ₹92 करोड़ आंकी गई। इसके अतिरिक्त, 541.53 किलोग्राम कच्चा माल, जिसमें मेथिलीन डाइक्लोराइड, एसीटोन, मोनोमेथिलमाइन (एमएमए), हाइड्रोक्लोरिक एसिड (एचसीएल), और 2-ब्रोमो शामिल हैं, के साथ-साथ प्रसंस्करण उपकरणों का एक पूरा सेट भी जब्त किया गया। एकांत परिसर में जानबूझकर चारों ओर से ढके हुए कारखाने पर डीआरआई अधिकारियों ने चतुराई से छापा मारा। मेफेड्रोन बनाने वाले केमिस्ट समेत दो लोग को अवैध उत्पादन प्रक्रिया में लिप्त पाया गया। तत्परतापूर्वक की गई कार्रवाई में, ड्रग कार्टेल के एक प्रमुख शख्स को बस्ती, उत्तर प्रदेश में गिरफ्तार किया गया, जिसे भिवंडी (मुंबई) से भोपाल तक कच्चे माल की आपूर्ति की देख-रेख का काम सौंपा गया था। अवैध रूप से रसायन/ कच्चा माल उपलब्ध कराने वाले दो आपूर्तिकर्ताओं को भी मुंबई में गिरफ्तार किया गया, साथ ही मुंबई से भोपाल तक रसायनों/ कच्चे माल के परिवहन के लिए जिम्मेदार शख्स को भी गिरफ्तार किया गया। शुरुआती जांच से यह भी पता चला है कि सूरत और मुंबई से हवाला के जरिए भोपाल में पैसा भेजा जा रहा था। पैसे के लेन-देन के लिए जिम्मेदार कार्टेल के एक करीबी सहयोगी को भी सूरत में गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तार किए गए सभी सात लोगों ने भारत में मेफेड्रोन नेटवर्क के एक विदेशी संचालक और सरगना के निर्देश पर मेफेड्रोन के गुप्त निर्माण में अपनी-अपनी भूमिका को स्वीकार किया। मेफेड्रोन, एक मनोविकार नाशक पदार्थ है जो स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ (एनडीपीएस) अधिनियम, 1985 के अंतर्गत सूचीबद्ध है। यह समाज के लिए एक गंभीर खतरा है क्योंकि इसमें मनो-सक्रिय गुण होते हैं और माना जाता है कि यह कोकीन और एम्फैटेमिन के सेवन जैसा असर पैदा करता है। यह पिछले एक साल में डीआरआई की ओर से बर्बाद की गई छठा गुप्त मेफेड्रोन कारखाना है। डीआरआई मादक दवाओं का निर्माण करने वाली अवैध फैक्ट्रियों को ध्वस्त करने और उनके मास्टरमाइंडों तथा इसमें शामिल अंतरराष्ट्रीय गिरोहों की तलाश में लगातार सक्रिय है।

एम.पी. ट्रांसको की सख्ती: बड़वानी में अवैध निर्माण पर 24 नोटिस जारी, सुरक्षा की जाए सुनिश्चित

बड़वानी मध्यप्रदेश पावर ट्रांसमिशन कंपनी (एम.पी. ट्रांसको) ने बड़वानी शहर में एक्स्ट्रा हाईटेंशन ट्रांसमिशन लाइनों के समीप विद्युत सुरक्षा मानकों की अनदेखी कर बने असुरक्षित और अवैध निर्माणों को हटाने के लिए मुहिम शुरू की है। प्रतिबंधित कॉरीडोर 27 मीटर की सीमा के अंदर बने इन निर्माणों से मानव जीवन को गंभीर खतरा है तथा दुर्घटनाओं की आशंका बनी रहती है। इन क्षेत्रों में अवैध निर्माण हटाने के लिए 24 व्यक्तियों को नोटिस जारी किये गए हैं। एम पी ट्रांसको बड़वानी के अभियंता वीर सिंह भूरिया ने बताया कि मुहिम के पहले चरण में लोगों को समझाइश दी गई थी, अब संबंधितों को नोटिस देकर निर्माण हटाने के लिए कहा गया है। कर्मचारी पब्लिक ऐड्रेस सिस्टम द्वारा हाईटेंशन लाइन से निर्धारित सुरक्षित दूरी बनाए रखने की अपील कर रहे हैं और लोगों को संभावित खतरों के प्रति सतर्क किया जा रहा है। इन क्षेत्रों में जारी किए गए नोटिस बड़वानी क्षेत्र में एम.पी. नगर, तलुन, अंजद, न्यू फिल्टर के पास कसरावद रोड आदि स्थानों पर 132 के.व्ही. वोल्टेज की बड़वानी- निमरानी ट्रांसमिशन लाइन के समीप सबसे कम सुरक्षा दूरी में निर्माण किए गए हैं। इन्हें हटाने के लिए एम.पी. ट्रांसको द्वारा संबंधित व्यक्तियों को कुल 24 नोटिस जारी किए गए हैं। 27 मीटर का सुरक्षित कॉरीडोर क्यों आवश्यक? केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की गाइडलाइन्स के अनुसार 132 के.व्ही. क्षमता की ट्रांसमिशन लाइनों के 27 मीटर कॉरीडोर की न्यूनतम सुरक्षित दूरी में कोई निर्माण नहीं किया जाना चाहिए। यह दूरी इसलिए तय की गई है क्योंकि हवा के दबाव से कंडक्टर (विद्युत तार) झूल सकता है, जिसे स्विंग कहा जाता है। इस स्विंग को ध्यान में रखते हुए ही दुर्घटनाओं से बचाव के लिए यह मानक निर्धारित है। घरेलू बिजली से 600 गुना अधिक घातक ट्रांसमिशन लाइनों के नीचे बने अवैध निर्माण घरेलू बिजली से 600 गुना से अधिक खतरनाक साबित हो सकते हैं। इससे न केवल जिले की विद्युत आपूर्ति लंबे समय तक बाधित होने का खतरा है, बल्कि आम नागरिकों के जीवन पर भी बड़ा संकट होता है। सुरक्षा की दृष्टि से एम.पी. ट्रांसको ने नागरिकों से अपील की है कि वे मानकों के अनुरूप ही निर्माण करें और ट्रांसमिशन लाइनों से निर्धारित दूरी बनाए रखें।  

राज्यपाल पटेल 20 अगस्त को मंडला में आयुष विभाग की कार्यशाला में होंगे शामिल, आयुष मंत्री परमार भी उपस्थित

भोपाल  राज्यपाल मंगुभाई पटेल 20 अगस्त को मंडला जिले के सेमर खापा में आयुष विभाग द्वारा "परंपरागत चिकित्सा का स्वास्थ्य संवर्धन में योगदान एवं सिकल सेल एनीमिया प्रबंधन" विषय पर आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला में शामिल होंगे। कार्यशाला में उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं आयुष मंत्री इन्दर सिंह परमार भी शामिल होंगे। कार्यशाला में जनजातीय कार्य, लोक परिसम्पत्ति प्रबंधन, भोपाल गैस त्रासदी राहत एवं पुनर्वास मंत्री डॉ. कुँवर विजय शाह, पंचायत, ग्रामीण विकास एवं श्रम मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री श्रीमती संपतिया उइके, कुटीर एवं ग्रामोद्योग राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) एवं मंडला जिले के प्रभारी मंत्री दिलीप जायसवाल भी उपस्थित रहेंगे। एकदिवसीय यह कार्यशाला मंडला जिले के सेमरखापा स्थित एकलव्य विद्यालय परिसर के ऑडिटोरियम में प्रातः10.30 बजे आयोजित होगी। प्रदेश में पारंपरिक चिकित्सा पद्धति के माध्यम से जनस्वास्थ्य को प्रोत्साहित करने एवं क्षेत्र-विशिष्ट स्वास्थ्य चुनौतियों के समाधान के लिए यह कार्यशाला आयोजित की गई है। कार्यशाला में मंडला एवं समीपवर्ती जिलों के जनजातीय क्षेत्रों में सिकल सेल एनीमिया की व्यापकता एवं पारंपरिक वैद्यों की सक्रिय भूमिका को दृष्टिगत रखते हुए व्यापक विचार-विमर्श होगा। कार्यशाला में आयुर्वेदिक चिकित्सकों के अनुभव साझा किए जाएंगे एवं उनके ज्ञान का संवर्द्धन भी किया जाएगा।  

महाशीर का भारी नुकसान, मध्यप्रदेश की नदी में अब मिलेगी केवल छोटी मछली

भोपाल  मध्यप्रदेश की पहचान बन चुकी महाशीर मछली अब संकट में है. यह वही मछली है जिसे 2011 में राज्य मछली का दर्जा दिया गया था और जिसे लोग “टाइगर फिश” के नाम से भी जानते हैं. कभी नर्मदा में 40 किलो तक वज़न और 7 फीट लंबाई वाली यह मछली पाई जाती थी, लेकिन अब इसका वजन घटकर सिर्फ 4 किलो और लंबाई 2 फीट तक रह गई है. महाशीर विलुप्त की कगार पर, महज 2 फीसदी ही बची  नर्मदा में पाई जाने वाली राज्य मछली महाशीर पर संकट मंडरा रहा है। स्वच्छ जल में रहने वाली महाशीर नर्मदा में बढ़ते प्रदूषण, पर्यावरणीय संकट, अवैध उत्खनन जैसी समस्याओं के कारण घटती जा रही है। नए आंकड़ों के अनुसार नर्मदा में इसकी संख्या 30 प्रतिशत से घटकर 2 प्रतिशत हो गई है। महाशीर ताजे और साफ पानी में ही पनपती है। पिछले कुछ वर्षों में नर्मदा में बढ़ते प्रदूषण के कारण इसकी संख्या तेजी से घटी है। इसमें सीवेज का पानी सबसे बड़ा कारण है। विशेषज्ञों के अनुसार नर्मदा से अंधाधुंत रेत उत्खनन से नदी की धार टूट रही है। नदी में प्राकृतिक रूप से आने वाले जल की मात्रा लगातार घटी है। नदी पर बांधों के निर्माण जैसे कारणों से इस मछली की संख्या तेजी से घटी है। मछली घटने से जल जैविक स्थिति होगी प्रभावित नर्मदा में महाशीर मछली की पर्यावरण को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जिस पानी में मछली न हो उसकी जल जैविक स्थिति सामान्य नहीं रहती। वैज्ञानिकों के अनुसार जलस्रोतों में मछली जीवन सूचकांक है, केन्द्रीय अंतरस्थलीय माित्स्यकीय अनुसंधान केन्द्र कोलकाता के अनुसार नर्मदा में महाशीर मछली 30 प्रतिशत से घटकर 2 प्रतिशत हो गई है। 2011 में मिला राज्य मछली का दर्जा वैज्ञानिकों के अनुसार जैव विविधता के लिहाज से नर्मदा में महाशीर का होना बहुत जरूरी है। 26 सितम्बर 2011 में महाशीर को राज्य में संरक्षण प्रदान कर स्टेट फिश घोषित किया गया। वर्ष 2012 में अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) ने महाशीर को विलुप्त प्राय घोषित किया है। नदी को साफ रखने में अहम भूमिका इस मछली की खासियत यह है कि ये पत्थरों में लगने वाली काई और पानी की गंदगी खाकर नदी को साफ रखने में अहम भूमिका निभाती है। मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने आंकलन कर कई स्थानों पर नर्मदा जल "ए" ग्रेड और बिना किसी उपचार के पीने योग्य बताया गया है। लेकिन ऐसे स्थानों पर भी जल में महाशीर का अस्तित्व मुश्किल में है। विशेषज्ञों के अनुसार अगर जल वाकई साफ होता तो महाशीर के अंडे पानी में जरूर नजर आते। यह खुलासा जबलपुर स्थित वेटरनरी यूनिवर्सिटी के रिसर्चर ने किया है. कैसे घट गई महाशीर मछली? पहले नर्मदा में महाशीर की आबादी करीब 20% थी. अब यह घटकर सिर्फ 1% रह गई है. लंबाई 7 फीट से घटकर 1.5 से 2 फीट. वजन 40 किलो से घटकर 2-4 किलो. कहां और कैसे हुई स्टडी? रिसर्चर ने “स्टडी ऑन द ब्रीडिंग ग्राउंड ऑफ महाशीर इन नर्मदा रिवर ऑफ जबलपुर डिस्ट्रिक्ट” विषय पर अध्ययन किया. रिसर्च नर्मदा नदी के चार घाटों – गौरी घाट, तिलवारा घाट, लम्हेटा घाट और भेड़ाघाट – में किया गया. करीब 25 किलोमीटर लंबे एरिया में मछलियों की लंबाई, वजन और ब्रीडिंग पैटर्न पर रिसर्च की गई. 25 मछुआरों से ली मदद अध्ययन के दौरान 25 से ज्यादा मछुआरों से जानकारी जुटाई गई. मछुआरों ने बताया कि महाशीर अभी भी इन घाटों पर ब्रीडिंग कर रही है, लेकिन उसका साइज़ और वजन पहले जैसा नहीं है. घटने की मुख्य वजहें फिशरी साइंस कॉलेज जबलपुर के डीन ने बताया कि— अवैध खनन से नर्मदा का प्राकृतिक आवास नष्ट हो गया. मछलियों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल रहा. लगातार घटते संसाधनों की वजह से उनका वजन 2-4 किलो और लंबाई 1.5 से 2 फीट तक सीमित हो गई है. क्यों चिंता की बात? महाशीर मछली को “नदी की शान” कहा जाता है. इसका आकार और वजन घटना इस बात का संकेत है कि नर्मदा नदी का इकोसिस्टम खतरे में है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अवैध खनन और प्रदूषण पर रोक नहीं लगी तो आने वाले समय में यह मछली विलुप्त भी हो सकती है. नर्मदा को रखती है स्वच्छ बड़वाह वन क्षेत्र में महाशीर की कैप्टिव ब्रीडिंग कराने के लिए नदी जैसा स्ट्रक्चर बनाया गया है। यहां पर देश में पहली बार महाशीर की ब्रीडिंग की गई, जो सफल भी रही। अब इसकी ब्रीडिंग के लिए भोपाल के केरवा और कोलार में इसकी संभावनाओं की तलाश की जा रही है। यह मछली प्राकृतिक रूप से पानी को साफ करने का काम करती है। नर्मदा को स्वच्छ रखने और प्रदूषण को नियंत्रित करने में भी महाशीर अहम भूमिका निभाती है। इसलिए विलुप्ति की कगार पर जैव विविधता बोर्ड के पूर्व सदस्य सचिव आर श्रीनिवास मूर्ति ने बताया महाशीर बहती नदी और राफ्टिंग वाली जगह अंडे देती है। इन्हें अंडे देने के लिए अनुकूल स्थान नहीं मिल रहा। शिकार, रेत का अवैध उत्खनन, पानी की धाराओं का खत्म होना भी इसके विलुप्त होने का कारण है।

किसानों के फंड पर बड़ा विवाद, CAG रिपोर्ट में खुलासा – 90% पैसा चला सरकारी गाड़ियों में

भोपाल मध्य प्रदेश में किसानों के लिए जारी किए जाने वाले फंड में घपलेबाजी की बात सामने आई है। यह खुलासा भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने गुरुवार को मध्य प्रदेश विधानसभा में किया। कैग के मुताबिक किसानों के कल्याण के लिए बनाया गया उर्वरक विकास कोष, सरकारी अधिकारियों की कारों के लिए एक तरह का ईंधन टैंक बन गया है। यानी जो पैसा किसानों के हित में खर्च होना था, उसका इस्तेमाल अधिकारियों की गाड़ी में ईधन भरने, ड्राइवरों के वेतन देने जैसे खर्चों में इस्तेमाल हुआ है। किसानों के फंड से 4.79 करोड़ रुपये का घोटाला आंकड़ों को विस्तार से समझिए। साल 2017-18 से 2021-22 तक, तीन राज्य सरकारों में 5.31 करोड़ रुपये का फंड जारी किया गया। इस फंड का 90 फीसदी यानी 4.79 करोड़ रुपये राज्य और ज़िला स्तर पर सरकारी गाड़ियों, ड्राइवरों के वेतन और रखरखाव पर खर्च किया गया। इस तरह किसानों को प्राकृतिक आपदाओं के दौरान फर्टिलाइजर में मिलने वाली सब्सिडी, ट्रेनिंग या खेती से जुड़ी मशीनें खरीदने जैसे लाभ पर केवल 5.10 लाख रुपये ही खर्च हुए हैं। 20 वाहनों पर हुआ 2.25 करोड़ रुपये का खर्च अकेले राज्य स्तर पर 2.77 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जिसमें केवल 20 वाहनों पर 2.25 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च की गई। कैग ने ज़ोर देकर कहा कि उर्वरक विकास कोष (एफडीएफ) का मूल उद्देश्य किसानों को जरूरी सहायता मुहैया करना, पीएसीएस यानी लोन देने वाली समितियों को मज़बूत करना और फर्टिलाइजर को रैगुलेट में सुधार करना था। जबकि इसके बजाय इस फंड का इस्तेमाल परिवहन बजट बनाने में हुआ। छूट न देने से 10.50 करोड़ का अतिरिक्त बोझ कैग ने खुलासा किया कि मध्य प्रदेश राज्य सहकारी विपणन संघ (मार्कफेड) डायमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) और म्यूरेट ऑफ पोटाश (एमओपी) उर्वरकों पर छूट का लाभ किसानों को नहीं दे पाया। इस कारण उन पर 10.50 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ा। 2021-22 में, ऊँची दरों पर फर्टिलाइजर खरीदकर किसानों को सस्ते दामों पर बेचने से मार्कफेड को 4.38 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। इसका खामियाजा आखिरकार सरकारी खजाने को भुगतना पड़ा।

MP कांग्रेस में घमासान, राहुल ने दिल्ली में बुलाकर की जिला अध्यक्षों से बैठक

भोपाल  मध्य प्रदेश में कांग्रेस के जिला अध्यक्षों की हुई नियुक्ति के बाद असंतोष के स्वर जोर पकड़ने लगे हैं, बयानबाजी हो रही है और इस्तीफे का दौर भी शुरू हो गया है। वहीं दूसरी ओर, नवनियुक्त जिला अध्यक्षों को प्रशिक्षण के लिए 24 अगस्त को दिल्ली बुलाया गया है, जिसमें लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी संवाद करेंगे। कांग्रेस ने संगठन सृजन अभियान के तहत राज्य के 71 जिला अध्यक्षों की नियुक्ति की है। इन जिला अध्यक्षों में विधायक, पूर्व विधायक और पूर्व मंत्री भी शामिल हैं। इनमें कई जिला अध्यक्ष ऐसे हैं जो पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के नाते रिश्तेदार भी हैं। इतना ही नहीं, कई जिला अध्यक्षों को एक बार फिर कमान सौंपी गई है। जिला अध्यक्षों की नियुक्ति के बाद पार्टी में नाराजगी बढ़ने लगी है और इन नियुक्तियों को लेकर सवाल भी उठाए जा रहे हैं। गुना का जिला अध्यक्ष पूर्व मंत्री और विधायक जयवर्धन सिंह को बनाया गया है, इससे उनके समर्थकों में नाराजगी है। समर्थकों का कहना है कि प्रदेश स्तरीय नेता को जिलाध्यक्ष बनाया गया है। विरोध में उतरे कार्यकर्ताओं ने जीतू पटवारी का पुतला तक दहन किया। इसी तरह डिंडोरी से आदिवासी चेहरे ओंकार सिंह मरकाम को अध्यक्ष बनाया गया है, जिससे उनके समर्थक सोशल मीडिया पर खुलकर अपनी राय जाहिर कर रहे हैं। इसके अलावा अगर हम देखें तो इंदौर में चिंटू चैकसे और विपिन वानखेड़े को अध्यक्ष बनाए जाने का विरोध हुआ है और संभागीय प्रवक्ता सन्नी राजपाल ने तो इस्तीफा तक दे दिया है। इतना ही नहीं, पूर्व महिला मोर्चा अध्यक्ष साक्षी डागा ने भी प्रदेश अध्यक्ष पटवारी पर हमला बोला है। इसके अलावा, भोपाल के जिला अध्यक्ष पद के दावेदार प्रदीप उर्फ मोनू सक्सेना ने प्रवीण सक्सेना को फिर भोपाल का जिला अध्यक्ष बनाए जाने पर नाराजगी जताई है और कांग्रेस नेताओं की भाजपा के साथ-गांठ का भी आरोप लगाया है। विरोध प्रदर्शनों के बीच गुना के जिला अध्यक्ष जयवर्धन सिंह से मीडिया ने बात की तो उन्होंने कहा कि राहुल गांधी ने जब भोपाल में आकर संगठन सृजन अभियान की शुरुआत की थी तो उन्होंने कहा था कि जिले के सबसे सक्षम और ताकतवर नेता को जिला अध्यक्ष बनाया जाएगा और उन्होंने यह किया है, जिससे पार्टी को लाभ होगा। वहीं उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि आगामी दिनों में जिला अध्यक्षों को दिल्ली में प्रशिक्षण दिया जाएगा जिसमें राहुल गांधी भी मौजूद रहेंगे। बताया गया है कि राज्य में जिन जिला अध्यक्षों को नियुक्त किया गया है उन सभी को 24 अगस्त को दिल्ली में प्रशिक्षण दिया जाने वाला है। इस प्रशिक्षण के कार्यक्रम में राहुल गांधी भी उपस्थित रहेंगे। 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति चरित्र निर्माण व व्यक्तित्व विकास में सहायक : उप मुख्यमंत्री शुक्ल

शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के तत्वाधान में तीन दिवसीय कार्यशाला भोपाल  उप मुख्यमंत्री श्री राजेन्द्र शुक्ल ने कहा है कि चरित्र निर्माण व व्यक्तित्व विकास में राष्ट्रीय शिक्षा नीति सहायक है। संस्कारित शिक्षा परोपकर का मार्ग प्रशस्ति करती है। उप मुख्यमंत्री श्री शुक्ल ने अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास नई दिल्ली के संयोजकत्व में आयोजित तीन दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ किया। उप मुख्यमंत्री श्री शुक्ल ने कहा कि हमारी सबसे बड़ी ताकत भारतीय ज्ञान परंपरा है, जिसके पुनरूत्थान का कार्य करते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति में समावेश किया गया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश में विकास कार्यों के साथ सांस्कृतिक व देशहित के महत्वपूर्ण कार्य किये जा रहे हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में समग्र विकास के आयाम निर्धारित किये गये हैं, जो चरित्र निर्माण में अपनी भूमिका निभायेंगे। उन्होंने कहा कि भारत विश्वगुरू बनने के मार्ग पर अग्रसर हैं। तीन दिवसीय कार्यशाला में नैतिक आधार के समावेश के साथ ही भारतीय ज्ञान परंपरा के गहन चिंतन का लाभ रीवा के विद्यार्थी व प्रबुद्धजन ले पायेंगे। शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के संयोजक अतुल कोठारी ने कहा कि नई शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान परंपरा एवं पंचकोष के सिद्धांत का समावेश किया गया है, जिससे समग्र विकास संभव हो सके। जरूरत है कि विद्यार्थी इसका अध्ययन करें और अपनी भूमिका तय करें। उन्होंने कहा कि शिक्षा का मूल आधार एकाग्रता है। नवीन शिक्षा नीति में समग्र विकास के आयाम, निर्धारित किये गये हैं। कुलगुरू प्रो. राजेन्द्र कुमार कुड़रिया ने कहा कि राष्ट्रीय संस्कृति उत्थान न्यास शिक्षा बचाओ अभियान का नेतृत्व करता है। कार्यशाला में स्मारिका एवं संकल्प पत्र का विमोचन किया गया। विधायक मनगवां इंजी. श्री नरेन्द्र प्रजापति, श्री ओम शर्मा, प्रो. सुनील तिवारी, कुल सचिव श्री सुरेन्द्र सिंह परिहार, श्री अजय तिवारी विश्वविद्यालय के प्राध्यापक, विद्यार्थी तथा प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।  

राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन पर तीन दिवसीय लेखनशाला 19 अगस्त से

भोपाल राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन अंतर्गत जेण्डर रिसोर्स सेण्टर की एसओपी (मानक संचालन प्रक्रिया) तैयार करने के लिए तीन दिवसीय राष्ट्रीय लेखन शाला 19 से 21 अगस्त तक भोपाल में आयोजित की जा रही है। लेखन शाला का शुभारंभ पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री श्री प्रहलाद सिंह पटेल करेंगे। इस अवसर पर राज्यमंत्री श्रीमती राधा सिंह भी उपस्थित रहेंगी। लेखन शाला में संयुक्त सचिव भारत सरकार, ग्रामीण विकास विभाग श्रीमती स्मृति शरण सहित 20 राज्यों के आजीविका मिशन प्रबंधन इकाई के सदस्य भाग लेंगे। मध्यप्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन की मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्रीमती हर्षिका सिंह सहित आजीविका मिशन की टीम भी उपस्थित रहेगी।  

प्रदेश का गौरव बढ़ाया छिंदवाड़ा की सरपंच श्रीमती कविता धुर्वे ने

स्वच्छ भारत मिशन में उत्कृष्ट कार्यों के लिये मिला राष्ट्रीय सम्मान भोपाल  "सफलता की कहानी" स्वतंत्रता दिवस पर दिल्ली के लाल किले में आयोजित समारोह में छिन्दवाड़ा जिले की जनपद पंचायत जुन्नारदेव की जनजातीय बहुल ग्राम पंचायत खुमकाल की सरपंच श्रीमती कविता शनिराम धुर्वे ने विशिष्ट अतिथि का गौरव पाकर पूरे मध्यप्रदेश को गौरवान्वित किया है। श्रीमती धुर्वे पर आज छिंदवाड़ा के साथ संपूर्ण प्रदेश गर्व कर रहा है। श्रीमती कविता धुर्वे का यह सम्मान न केवल व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि जनजातीय बहुल क्षेत्र से महिलाओं की सशक्त पहचान का भी प्रतीक है। राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान से जनजातीय समाज में गर्व और खुशी की लहर है। स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित एक कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री श्री के.आर. पाटिल तथा मंत्रालय की प्रमुख सचिव सुश्री देवोलीना मुखर्जी की उपस्थिति में उन्हें स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के अंतर्गत किए गए प्रेरणादायक नवाचारों और उत्कृष्ट कार्यों के लिए सम्मान पत्र प्रदान किया गया। खुमकाल सरपंच श्रीमती धुर्वे ने अपनी ग्राम पंचायत में स्वच्छता को जनआंदोलन बनाने में पूरी ताकत झोंक दी। उनके द्वारा ग्राम पंचायत खुमकाल में विभिन्न नवाचार किये गये। उनके द्वारा ‘कबाड़ से जुगाड़’ की थीम पर जनसहयोग से स्वच्छता पार्क तैयार किया गया, जिसमें स्वच्छ भारत मिशन की टीम का विशेष योगदान रहा। ग्राम आराडोंगरी को ओडीएफ प्लस मॉडल गांव के रूप में विकसित करने के लिए चौपाल, ग्राम सभा एवं गृह भेंटों के माध्यम से जनजागरूकता अभियान चलाया गया। ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन के लिए कम्पोज्ड पिट, प्लास्टिक संग्रहण यूनिट, सॉकपिट और मैजिक पिट का निर्माण कराया गया। सिंगल यूज प्लास्टिक मुक्त ग्राम की दिशा में कार्य करते हुए ग्रामीणों को कपड़े के थैले वितरित किए गए। सरपंच श्रीमती कविता धुर्वे के नवाचारों को ग्रामीणों के साथ ही छिंदवाड़ा जिला प्रशासन का भी पूरा-पूरा सहयोग मिला। नवाचारों को मिले प्रोत्साहन से महिला सरपंचों को नवाचार के लिए प्रेरणा मिली।  

मध्यप्रदेश की नदियाँ भारत की सनातन संस्कृति की संवाहक : मुख्यमंत्री डॉ. यादव

मध्यप्रदेश है नदियों का मायका भोपाल  मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि भारत का हृदय मध्यप्रदेश, यहां के अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य और अथाह, अविरल जल राशि के लिए समूचे विश्व में जाना जाता है। मध्यप्रदेश में बहने वाली नदियां भारत की सनातन संस्कृति की संवाहक हैं, जिनके किनारे सदियों से हमारी शाश्वत सभ्यता फल फूल रही है। यहाँ की पहचान केवल प्राचीन धरोहरों, मंदिरों, किलों और जनजातीय संस्कृति तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ की छोटी-बड़ी 750-800 नदियों से भी है।प्रदेश की इस समृद्ध जल राशि के कारण ही मध्यप्रदेश को ‘नदियों का मायका’ कहा जाता है। मध्यप्रदेश से उद्गमित छोटी-बड़ी नदियाँ, गंगा, नर्मदा, ताप्ती, गोदावरी, माही और महानदी जैसे विशाल नदी प्रवाह तंत्रों में समाहित होकर पूरे भारत की जीवन-रेखा बनाती हैं। मध्यप्रदेश की नदियाँ केवल भौतिक जल स्रोत नहीं, बल्कि संस्कृति की वाहक भी हैं। नदियों के किनारे प्राचीन नगरों, धार्मिक स्थलों और व्यापारिक मार्गों का विकास हुआ। क्षिप्रा नदी के तट पर बसा उज्जैन प्राचीन समय से ही खगोल विज्ञान और श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लंग के कारण धार्मिक आस्था का केंद्र रहा है। प्राचीन उज्जयिनी सिंहस्थ ‘कुंभ’ समागम का तीर्थ क्षेत्र भी है। नर्मदा नदी के तट पर बसे महेश्वर और ओंकारेश्वर शहर शैव परंपरा के प्रमुख तीर्थ-स्थल हैं। ओंकारेश्वर 12 ज्योर्तिलिंगों में एक है। बेतवा नदी के तट औऱ प्रवाह क्षेत्र के ओरछा, सांची और विदिशा मध्यकालीन भारत की सांस्कृतिक यशोगाथा के प्रतीक होने के साथ ही बौद्ध संस्कृति के उदयावसान के साक्षी भी रहे हैं। मध्यप्रदेश का अधिकांश भूभाग विंध्य और सतपुड़ा की पहाड़ियों से आच्छादित है। यही कारण है कि यह अनेक महत्वपूर्ण नदियों का उद्गम स्थल है। नर्मदा और ताप्ती पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ हैं, जबकि सोन, क्षिप्रा, चंबल, बेतवा उत्तर और पूर्व की ओर बहकर अपनी अथाह जलराशि के साथ गंगा-यमुना में समाहित हो जाती हैं। माही, वैंगंगा, तवा जैसी नदियाँ भी अलग-अलग बेसिन को जल-पोषित करती हैं। इस भौगोलिक विविधता ने ही प्रदेश को नदी समृद्ध राज्य के रूप में प्रतिष्ठा दी है। पुण्य सलिला मां नर्मदा का दूसरा नाम रेवा भी है।भगवान शिव की पुत्री मानी जाने वाली रेवा मध्यप्रदेश और गुजरात दोनों की जीवन रेखा है। मान्यता है कि मां नर्मदा के दर्शन मात्र से ‘गंगा स्नान’ का पुण्य मिलता है। श्रद्धालुओं के लिए 3000 किमी से अधिक लंबी नर्मदा परिक्रमा जीवन का सबसे बड़ा तप माना जाता है। मां नर्मदा अमरकंटक से जन्म लेकर लेकर जबलपुर में धुआंधार जलप्रपात बनाती हुई गुजरात को अभिसिंचित कर लगभग 1312 किलोमीटर की यात्रा तय कर अरब सागर की खंभात की खाड़ी में विराम पाती हैं। महाभारत काल में चंबल नदी का नाम चर्मणवती था। यह भगवान परशुराम के जन्म-स्थल जानापाव से निकली। यह राजस्थान और मध्यप्रदेश की सीमा बनाती है। जानापाव से निकलकर चंबल नदी मध्यप्रदेश-उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित ‘पंचनदा’ संगम पर यमुना में परिमित जलराशि के साथ समाहित हो जाती है। बेतवा (वेत्रवती)  को मध्यप्रदेश की गंगा भी कहा जाता है। इसके तट पर राम राजा का ऐतिहासिक शहर ओरछा बसा है। विदिशा और सांची जैसे नगरों को भी इसने पोषित किया है। विंध्यांचल पर्वत से निकल कर लगभग 590 किलोमीटर दूरी तय कर यमुना नदी में जा मिलती है।  मोझदायिनी क्षिप्रा नदी के तट पर प्राचीन उज्जयिनी शहर बसा है। ज्योतिर्लिंग श्री महाकालेश्वर और सिंहस्थ कुम्भ समागम का यह तीर्थ क्षेत्र विश्वविख्यात है। क्षिप्रा को भी मालवा की गंगा कहा जाता है। क्षिप्रा नदी इंदौर जिले में उज्जैनी-मुंडला गांव के ककड़ी-बड़ली नामक स्थान से निकल कर लगभग 195 किलोमीटर की यात्रा के बाद चंबल नदी में मिल जाती है। रामायण और महाभारत में सोन नदी का उल्लेख मिलता है। इसे पुरुष वाचक ‘नद’ की संज्ञा भी दी गई है। महर्षि वाल्मीकि ने इसे सुभद्र कहा है। यह नदी प्रदेश में शहडोल और रीवा के क्षेत्रों को सींचती हुई बिहार में प्रवेश कर लगभग 784 किलोमीटर लंबी यात्रा के बाद पतितपावनी गंगा से संगम करती है। ताप्ती नदी सतपुड़ा की पहाड़ियों से निकलकर गुजरात तक जाती है और लगभग 724 किलोमीटर की दूरी तय कर खंभात की खाड़ी में मिल जाती है। माही नदी की विशेषता है कि यह कर्क रेखा को दो बार पार करती है। माही नदी भी मध्यप्रदेश से गुजरात तक 583 किलोमीटर की यात्रा कर खंभात की खाड़ी में मिल जाती है। मध्यप्रदेश से उद्गम पाने वाली अन्य प्रमुख नदियों में वैंनगंगा गोंडवाना क्षेत्र की जीवनरेखा है। तवा नर्मदा की सहायक नदी है, जिस पर मध्यप्रदेश का सबसे बड़ा बाँध बना है। कालीसिंध, पार्वती, केन, शक्कर, जोहिला  स्थानीय कृषि और वन्य जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। मध्यप्रदेश की नदियों पर अनेक सिंचाई एवं जलविद्युत परियोजनाएँ बनी हैं, जिनसे लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि सिंचित होती है। चंबल-पार्वती-कालीसिंध रिवर लिंक परियोजना मध्यप्रदेश और राजस्थान दोनों के साझा महत्व की परियोजना है। केन-बेतवा रिवर लिंक परियोजना मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए समृद्धि की गंगोत्री मानी जा रही है। ताप्ती बेसिन मेगा रिचार्च परियोजना मध्यप्रदेश के बुरहानपुर एवं खंडवा और महाराष्ट्र के अकोला, अमरावती और बुलढाणा ज़िलों के भू-जल संकट और अनियमित वर्षा की समस्या का स्थायी समाधान मानी जा रही है। बाणसागर परियोजना सोन नदी पर बनी है। इससे शहडोल, रीवा और सीधी जिलों को लाभ पहुंच रहा है। तवा परियोजना नर्मदा की सहायक तवा पर निर्मित है। इससे होशंगाबाद क्षेत्र को सिंचाई और पेयजल की पूर्ति हो रही है। गांधीसागर परियोजना चंबल नदी पर बनाई गई है। इससे  जलविद्युत बनाई जा रही है, साथ ही बड़े क्षेत्र में सिंचाई हो रही है। ओंकारेश्वर एवं बरगी परियोजना नर्मदा नदी पर निर्मित है।