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PAN नियमों में बड़ा बदलाव, 50 हजार से अधिक ट्रांजैक्शन पर नई व्यवस्था 1 अप्रैल 2026 से

नई दिल्ली भारत सरकार ने 7 फरवरी को नए आयकर नियम 2026 का ड्राफ्ट जारी किया है. नए आयकर नियम, 2026 में कई महत्वपूर्ण बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं. अब कई कामों के लिए PAN कार्ड बताने की जरूरत की सीमा बढ़ाई जा रही है. जैसे मोटर व्हीकल खरीदना, बैंक से बड़ी रकम निकालना या जमा करना, प्रॉपर्टी खरीदना और होटल में बड़ा बिल चुकाना आदि के लिए पैन कार्ड की जरूरत नहीं होगी. नए नियमों में यह भी प्रस्ताव है कि कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाओं का मूल्य बढ़ा दिया जाए. साथ ही, क्रिप्टो एक्सचेंजों के लिए यह जरूरी होगा कि वे अपनी जानकारी आयकर विभाग के साथ साझा करें. इसके अलावा डिजिटल रुपया (CBDC) को भी अब आधिकारिक तौर पर इलेक्ट्रॉनिक भुगतान के एक मान्य तरीके के रूप में शामिल किया गया है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट 2026 की घोषणा के कुछ दिनों बाद, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने नए आयकर कानून 2025 से जुड़े ड्राफ्ट नियम और फॉर्म जारी किए हैं. इन पर आम लोग अपनी राय दे सकते हैं. नए ड्राफ्ट Income Tax Rules 2026 के मुताबिक, कई जगहों पर PAN नंबर बताना अनिवार्य कर दिया गया है. भारत सरकार ने 7 फरवरी को नए आयकर नियम 2026 का ड्राफ्ट जारी किया है. नए आयकर नियम, 2026 में कई महत्वपूर्ण बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं. अब कई कामों के लिए PAN कार्ड बताने की जरूरत की सीमा बढ़ाई जा रही है. जैसे मोटर व्हीकल खरीदना, बैंक से बड़ी रकम निकालना या जमा करना, प्रॉपर्टी खरीदना और होटल में बड़ा बिल चुकाना आदि के लिए पैन कार्ड की जरूरत नहीं होगी. नए नियमों में यह भी प्रस्ताव है कि कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाओं का मूल्य बढ़ा दिया जाए. साथ ही, क्रिप्टो एक्सचेंजों के लिए यह जरूरी होगा कि वे अपनी जानकारी आयकर विभाग के साथ साझा करें. इसके अलावा डिजिटल रुपया (CBDC) को भी अब आधिकारिक तौर पर इलेक्ट्रॉनिक भुगतान के एक मान्य तरीके के रूप में शामिल किया गया है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट 2026 की घोषणा के कुछ दिनों बाद, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने नए आयकर कानून 2025 से जुड़े ड्राफ्ट नियम और फॉर्म जारी किए हैं. इन पर आम लोग अपनी राय दे सकते हैं. नए ड्राफ्ट Income Tax Rules 2026 के मुताबिक, कई जगहों पर PAN नंबर बताना अनिवार्य कर दिया गया है. बैंक में कैश जमा या निकासी अब प्रस्ताव है कि अगर कोई व्यक्ति एक वित्त वर्ष में कुल 10 लाख या उससे अधिक की कैश जमा या निकासी करता है. चाहे एक खाते में या कई खातों में तो PAN बताना जरूरी होगा. वर्तमान नियमों के अनुसार, एक ही दिन में बैंक या कोऑपरेटिव बैंक में 50,000 से अधिक का कैश जमा करने पर PAN देना अनिवार्य है. मोटर वाहन खरीदने पर PAN मौजूदा नियमों में अगर खरीदी जाने वाली गाड़ी (कार या बाइक) की कीमत 5 लाख से ज्यादा होती थी, तो PAN बताना जरूरी था. दोपहिया वाहनों के लिए PAN बताने का कोई नियम नहीं था. नए ड्राफ्ट नियम में किसी भी मोटर वाहन की खरीद पर, कीमत चाहे जो भी हो, PAN बताना अनिवार्य होगा यानी दोपहिया वाहन भी अब इस दायरे में आ जाएंगे. बैंक में कैश जमा या निकासी अब प्रस्ताव है कि अगर कोई व्यक्ति एक वित्त वर्ष में कुल 10 लाख या उससे अधिक की कैश जमा या निकासी करता है. चाहे एक खाते में या कई खातों में तो PAN बताना जरूरी होगा. वर्तमान नियमों के अनुसार, एक ही दिन में बैंक या कोऑपरेटिव बैंक में 50,000 से अधिक का कैश जमा करने पर PAN देना अनिवार्य है. मोटर वाहन खरीदने पर PAN मौजूदा नियमों में अगर खरीदी जाने वाली गाड़ी (कार या बाइक) की कीमत 5 लाख से ज्यादा होती थी, तो PAN बताना जरूरी था. दोपहिया वाहनों के लिए PAN बताने का कोई नियम नहीं था. नए ड्राफ्ट नियम में किसी भी मोटर वाहन की खरीद पर, कीमत चाहे जो भी हो, PAN बताना अनिवार्य होगा यानी दोपहिया वाहन भी अब इस दायरे में आ जाएंगे.

साइबर ठगी के शिकार ग्राहकों के लिए बड़ी खबर, RBI देगा 25 हजार रुपये तक मुआवजा

नई दिल्ली केंद्रीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने साइबर फ्रॉड के शिकार ग्राहकों के लिए बड़ी योजना बनाई है। अब ऐसे ग्राहकों को धोखाधड़ी वाले ट्रांजैक्शन के मामले में 25,000 रुपये तक का हर्जाना मिल सकेगा। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शुक्रवार को मौद्रिक नीति समिति की बैठक के बाद जारी बयान में इसके बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कम मूल्य के धोखाधड़ी वाले ट्रांजैक्शन के मामलों में 25,000 रुपये तक का हर्जाना देने के लिए एक फ्रेमवर्क लाने का प्रस्ताव है। 50 हजार रुपये तक के फ्रॉड मामले शामिल इसमें 50 हजार रुपये या उससे कम की धोखाधड़ी के मामलों को शामिल किया जाएगा। आरबीआई गवर्नर ने बताया कि "बिना कोई सवाल पूछे" ग्राहकों को 85 प्रतिशत राशि (अधिकतम 25 हजार रुपये) वापस की जायेगी। धोखाधड़ी की राशि में से 15 प्रतिशत का नुकसान ग्राहक को उठाना होगा और 15 प्रतिशत का नुकसान संबंधित बैंक उठाएगा। शेष 70 प्रतिशत राशि आरबीआई देगा। हालांकि, किसी भी स्थिति में ग्राहक को 25,000 रुपये से अधिक का हर्जाना नहीं मिलेगा। एक बार ही ले सकेंगे लाभ आरबीआई गवर्नर ने स्पष्ट किया कि ग्राहक इस सुविधा का लाभ अपने जीवनकाल में सिर्फ एक बार उठा सकेंगे। उन्होंने कहा, "हम चाहते हैं कि ग्राहक एक बार की गलती से सीख लें।" एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने साफ किया कि भले ही ग्राहक ने खुद ही ठगों को ओटीपी (वन टाइम पासवर्ड) बताया हो, तब भी वे हर्जाना राशि पाने के हकदार होंगे। मल्होत्रा ने कहा कि डिजिटल धोखाधड़ी में 50 हजार रुपये तक की राशि वाले मामले 65 प्रतिशत हैं, हालांकि मूल्य के हिसाब से उनका अनुपात काफी कम है। यह पहली बार है जब आरबीआई ने साइबर फ्रॉड मामले में पीड़ित को हर्जाने देने की पहल की है। RBI के डेटा के मुताबिक भारतीय बैंकों ने वित्त वर्ष 2024-25 में कार्ड और इंटरनेट-आधारित ट्रांजैक्शन से जुड़े धोखाधड़ी के 13,469 मामले दर्ज किए, जिससे 520 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। वहीं, 2023-24 में 29,080 धोखाधड़ी और 1,457 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। साइबर फ्रॉड की शिकायत सबसे पहले बैंक/पेमेंट ऐप को सूचित करें। इसके बाद 1930 पर कॉल करें। यह नेशनल साइबर क्राइम हेल्पलाइन का ऑफिशियल नंबर है। ऑनलाइन शिकायत दर्ज करें। इसके लिए वेबसाइट https://cybercrime.gov.in पर विजिट करें। यहां सभी डिटेल भरने के बाद Acknowledgement नंबर मिलेगा। इसे सेव करके रखना जरूरी है। इस नंबर को लेकर नजदीकी साइबर सेल/पुलिस स्टेशन से संपर्क करें। आप शिकायत का स्टेटस cybercrime.gov.in पर ट्रैक कर सकते हैं।

AI क्रिएटर्स के लिए बड़ा झटका? सरकार का नया नियम सोशल मीडिया का नियम बदल देगा

 नई दिल्ली सरकार ने AI से बने कंटेंट को लेकर नए नियम लागू कर दिए हैं. अब सोशल मीडिया पर जो भी फोटो, वीडियो या ऑडियो AI टूल्स से बनेगा, उस पर साफ लेबल दिखाना जरूरी होगा. इसके लिए कंपनियों को 20 फरवरी तक का डेडलाइन मिला है.  प्लेटफॉर्म्स को यह भी पक्का करना होगा कि यूज़र सच बता रहा है या नहीं कि कंटेंट AI से बना है. भ्रामक या गैरकानूनी AI कंटेंट को तीन घंटे के अंदर हटाने का नियम भी लाया गया है. मतलब डीपफेक और फेक वीडियो पर अब ढील नहीं चलेगी. ये बदलाव 20 फरवरी 2026 से लागू होंगे. सोशल मीडिया कंपनियों के लिए असली चुनौती इन नियमों के बाद इंस्टाग्राम, यूट्यूब और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स का काम करने का तरीका बदलेगा. अभी तक AI कंटेंट अक्सर बिना पहचान के घूमता रहा है. कई बार यूज़र को पता भी नहीं चलता कि वीडियो या फोटो असली है या मशीन से बना है. अब अपलोड के वक्त ही यह जानकारी लेनी होगी कि उस वीडियो में कितना AI यूज हुआ है. यहां अब सिर्फ यूज़र की बात पर भरोसा नहीं चलेगा. प्लेटफॉर्म्स को टेक्निकल तरीके से भी चेक करना होगा. दिक्कत यह है कि हाई क्वालिटी डीपफेक आज इतने रियल लगते हैं कि सिस्टम भी कन्फ्यूज हो जाता है. ऊपर से तीन घंटे में कंटेंट हटाने की डेडलाइन बहुत टाइट है. इतने बड़े प्लेटफॉर्म पर हर केस में इतनी तेजी से एक्शन लेना आसान नहीं होगा. AI कंटेंट क्रिएटर्स के लिए क्या मुश्किलें बढ़ेंगी इन नियमों का सबसे सीधा असर उन लोगों पर पड़ेगा जो AI से रील्स, फेसस्वैप वीडियो, फेक वॉइस या जनरेटेड क्लिप्स बनाकर ग्रो कर रहे थे. अब कंटेंट पर AI का लेबल दिखेगा. मतलब जो लोग जानबूझकर रियल जैसा दिखाकर वीडियो वायरल करते थे, उनकी ट्रिक पकड़ी जाएगी. इससे क्लिकबेट और शॉक वैल्यू कम होगी. अगर नोटिस के बावजूद कोई कंटेंट क्रिएटर इसे इग्नोर करेगा तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स उन्हें हमेशा के लिए बैन कर सकती हैं. क्योंकि सरकार की तरफ से सख्त हिदायत मिल चुकी है.  AI क्रिएटर्स को अब यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी असली इंसान का चेहरा या आवाज बिना परमिशन यूज न करें. आज जो मजाक या ट्रेंड लग रहा है, वही कल कानूनी परेशानी बन सकता है. अगर प्लेटफॉर्म ने पकड़ लिया कि आपने जानबूझकर AI कंटेंट को छुपाया है, तो अकाउंट पर स्ट्राइक या बैन का रिस्क भी रहेगा. यानी अब AI से कंटेंट बनाना सिर्फ क्रिएटिव काम नहीं रहेगा. उसमें जिम्मेदारी भी जुड़ जाएगी. यूज़र का एक्सपीरियंस कैसे बदलेगा नए नियम यूज़र की आदतें भी बदलेंगे. अब फीड में दिखने वाले वीडियो या फोटो पर लेबल देखना पड़ेगा. अगर AI लिखा है, तो समझना होगा कि यह असली घटना या असली व्यक्ति का वीडियो नहीं है. इससे लोग थोड़ा रुककर सोचेंगे. अभी तक बहुत से लोग डीपफेक को सच मानकर शेयर कर देते थे. अब शायद वह आदत बदले. हालांकि एक खतरा यह भी है कि अगर हर दूसरी पोस्ट पर AI टैग दिखने लगे, तो लोग उसे इग्नोर करना शुरू कर दें. तब लेबल का असर धीरे धीरे कम हो सकता है. प्लेटफॉर्म्स के बिजनेस पर असर यह बदलाव सिर्फ टेक्निकल नहीं है. यह बिजनेस का भी सवाल है. AI कंटेंट आज सोशल मीडिया की ग्रोथ का बड़ा हिस्सा बन चुका है. रील्स और शॉर्ट्स में AI ट्रेंड्स खूब चलते हैं. अब अगर हर AI कंटेंट पर सख्त लेबल और चेकिंग होगी, तो एंगेजमेंट पैटर्न बदल सकता है. कुछ यूज़र AI कंटेंट से दूरी बना सकते हैं. वहीं ब्रांड्स और एडवर्टाइज़र ज्यादा सेफ फील करेंगे क्योंकि फेक और भ्रामक कंटेंट पर कंट्रोल बढ़ेगा. प्लेटफॉर्म्स को अब ग्रोथ और रेगुलेशन के बीच बैलेंस बनाना होगा. आगे क्या बदलेगा आने वाले वक्त में सोशल मीडिया पर कुछ भी चलेगा वाला माहौल खत्म होगा. डीपफेक, फेक डॉक्यूमेंट और बिना सहमति वाली तस्वीरों पर पहले जैसी ढील नहीं मिलेगी. सरकार साफ कह चुकी है कि प्लेटफॉर्म्स को जिम्मेदारी लेनी होगी. इसका मतलब ज्यादा मॉडरेशन टीम, बेहतर टेक और भारत के हिसाब से अलग सिस्टम बनाना पड़ेगा. कुल मिलाकर, नए AI कंटेंट नियम सोशल मीडिया को ज्यादा जिम्मेदार बनाने की कोशिश हैं. यह बदलाव एकदम परफेक्ट नहीं होगा. शुरुआत में टेक्निकल दिक्कतें आएंगी. गलतियां भी होंगी. लेकिन लंबे वक्त में सोशल मीडिया का माहौल बदलेगा. कंटेंट बनाना अब सिर्फ क्रिएटिविटी का खेल नहीं रहेगा. उसमें जवाबदेही भी जुड़ जाएगी. यही इस पूरे बदलाव की असली दिशा है. रास्ता आसान नहीं है भले ही सरकार ने डेडलाइन दे दी है, लेकिन टेक्निकल तौर पर बात करें तो ये तुरंत इंप्लिमेंट करना आसान नहीं है. क्योंकि लेबल लगाए हुए वीडियो को डाउनलोड करके फिर से अपलोड किया जा सकता है. AI डिटेक्शन सिस्टम भी पूरी तरह ठीक से काम नहीं करते हैं. कई बार वो असली को नकली और नकली को असली समझने की भी गलती कर रहे हैं.  

BRICS बनाम NATO: रूस ने अमेरिका को दिया करारा जवाब, वैश्विक ताकत का दावा

मास्को  रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने हाल ही में अमेरिका और पश्चिमी देशों के समूह नाटो के काम करने के तरीके पर सवाल उठाते हुए उन पर निशाना साधा है। लावरोव ने कहा है कि ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) ज्यादातर मामलों में सर्वसम्मति के आधार पर फैसले करते हैं, जबकि नाटो के फैसले अमेरिका पर निर्भर करते हैं। लावरोव ने रूस के एक यूट्यूब चैनल एमपाशिया मनुची प्रोजेक्ट के साथ बातचीत में कहा, “ज्यादातर मामलों में अंतरराष्ट्रीय समझौतों का पालन किया जाता है। जब बात हमारे पश्चिमी साथियों की हो तब नहीं, बल्कि जब उन प्रतिनिधियों की होती है जिन्हें हम वैश्विक बहुमत कहते हैं। ब्रिक्स, एससीओ, और सोवियत के बाद वाले सीएसटीओ, ईएईयू, और सीआईएस जैसे समूहों में आम सहमति ज़्यादातर बनी रहती है।” उन्होंने कहा, “ यहां आप नाटो की तरह आसानी से फैसले नहीं ले सकते, जहां अमेरिकी कहते हैं 'चुप रहो' और सबको पता है कि यह सब कैसे काम करता है।” लावरोव ने आगे कहा कि यूरोपीय संघ भी फैसलों पर असर डालता है। यूरोपीय संघ की तरह, जहां ब्रसेल्स में बिना चुने हुए नौकरशाह देश की चुनी हुई सरकारों को बताते हैं कि क्या करना है, कैसे बर्ताव करना है, किसके साथ व्यापार करना है और किसके साथ नहीं करना है। हमारे हंगरी के साथियों ने ब्रसेल्स के हाल के गलत कामों पर साफ और समझने लायक टिप्पणी की है।" बता दें कि हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान ने दिसंबर 2025 में कहा था कि यूरोपीय संघ यूक्रेनी संघर्ष को लंबा खींचने के लिए व्यवस्थित तरीके से कानून को रौंद रहा है। उन्होंने कहा कि यूराेपीय संघ में कानून का राज "ब्रसेल्स की तानाशाही" से बदल गया है। इससे पहले ने लावरोव ने रूसी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाकर प्रतिस्पर्धियों को दबाने के लिए अमेरिका पर 'अनुचित तरीकों' का इस्तेमाल करने का आरोप भी लगाया। लावरोव ने एक इंटरव्यू में कहा, ''अमेरिका भारत और अन्य ब्रिक्स सदस्यों जैसे प्रमुख रणनीतिक साझेदारों के साथ हमारे व्यापार, निवेश सहयोग और सैन्य-तकनीकी संबंधों को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा है।''

पूर्व PM इमरान खान की सेहत पर बड़ा खुलासा, 85% दृष्टि प्रभावित; पाक सुप्रीम कोर्ट के CJP को करनी पड़ी दखल

इस्लामाबाद पाक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि इमरान खान के दाहिनी आंख में 'सेंट्रल रेटिनल वेन ऑक्लूजन' (CRVO) नामक गंभीर बीमारी का पता चला है, जो समय पर इलाज न मिलने पर स्थाई अंधापन पैदा कर सकती है। इसी वजह से उनकी 85 फीसदी रोशनी चली गई। लंबे समय से जेल में बंद पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के हेल्थ अपडेट से पाकिस्तान में हड़कंप मचा हुआ है। पाक मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक खान की दाहिनी आंख की रोशनी 85 फीसदी खत्म हो चुकी है। उसमें अब सिर्फ 15 फीसदी को रोशनी बची है। डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इमरान खान की आंख की जांच के लिए एक स्पेशल मेडिकल टीम बनाने का आदेश दिया है। यह आदेश कोर्ट में पेश की गई एक रिपोर्ट के बाद आया है, जिसमें PTI फाउंडर ने दावा किया था कि उनकी दाहिनी आंख में “सिर्फ़ 15 फीसदी” रोशनी बची है। SC ने यह भी निर्देश दिया कि इमरान को उनके बच्चों से बात करने की इजाज़त दी जाए। यह आदेश दिया गया कि आंखों की जांच और फोन कॉल दोनों 16 फरवरी (सोमवार) से पहले किए जाएं। SC का यह निर्देश तब आया जब पाकिस्तान के चीफ जस्टिस (CJP) याह्या अफरीदी की अगुवाई वाली और जस्टिस शाहिद बिलाल हसन सहित दो अन्य जजों की बेंच ने PTI संस्थापक के अदियाला जेल में रहने की स्थिति से जुड़े मामले की सुनवाई फिर से शुरू की। खून का थक्का जमने से गई रोशनी कोर्ट में पेश रिपोर्ट में बताया गया कि इमरान खान ने कहा है कि उनकी दाईं आंख की केवल लगभग 15% दृष्टि बची है। रिपोर्ट के अनुसार, अक्टूबर 2025 तक उनकी दोनों आंखों की दृष्टि सामान्य थी, लेकिन बाद में धुंधलापन शुरू हुआ और इलाज में देरी के कारण स्थिति बिगड़ गई। बताया गया कि बाद में डॉक्टरों ने जांच में खून का थक्का (ब्लड क्लॉट) जैसी समस्या की पहचान की और इंजेक्शन सहित इलाज किया गया, लेकिन दृष्टि पूरी तरह वापस नहीं आ सकी। कैदी की सेहत राज्य की जिम्मेदारी सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कैदी की सेहत सर्वोच्च प्राथमिकता है और राज्य का दायित्व है कि उसे उचित इलाज मिले। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून के तहत सभी कैदियों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। कोर्ट ने माना कि परिवार से संपर्क भी महत्वपूर्ण मानवीय पहलू है। इसलिए बच्चों से टेलीफोन पर बातचीत की अनुमति देने के निर्देश दिए गए। सुनवाई के दौरान टॉप जज ने कहा, “हम उनकी (इमरान की) हेल्थ के मामले पर सरकार का स्टैंड जानना चाहते हैं।” इस पर पाकिस्तान के अटॉर्नी जनरल (AGP) मंसूर उस्मान अवान ने कन्फर्म किया कि मेडिकल फैसिलिटी देना सरकार की ज़िम्मेदारी है। AGP अवान ने कहा, “अगर कैदी सैटिस्फाइड नहीं है, तो सरकार कदम उठाएगी।” इस पर CJP अफरीदी ने फिर कहा कि इमरान के “अपने बच्चों के साथ टेलीफोन कॉल का मामला भी जरूरी है”। जेल में इलाज पर उठे सवाल रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इमरान खान ने पहले जेल प्रशासन को आंख की समस्या की शिकायत की थी, लेकिन समय पर विशेष इलाज नहीं मिला। बाद में विशेषज्ञ डॉक्टर बुलाए गए। यह मामला सिर्फ एक कैदी के स्वास्थ्य का नहीं बल्कि जेलों में मेडिकल सुविधाओं, मानवाधिकार और राजनीतिक संवेदनशीलता से भी जुड़ा माना जा रहा है। इस बीच, इन्फॉर्मेशन मिनिस्टर अताउल्लाह तरार ने कहा कि जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री के परिवार द्वारा फैलाई जा रही कहानी रिपोर्ट के सामने “पूरी तरह से गलत साबित हुई है।”

चीन का बढ़ता दखल या कर्ज़ का जाल? पेरू पर मंडराए संकट को लेकर अमेरिका अलर्ट

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने चिंता जताई है कि चीन लातिन अमेरिकी देश पेरू के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर अपना नियंत्रण मजबूत करके उसकी संप्रभुता को नुकसान पहुंचा रहा है। अमेरिकी की यह चेतावनी पेरू की एक अदालत के उस फैसले के बाद आई है जिसमें एक स्थानीय नियामक ने चीन द्वारा बनाए गए विशाल बंदरगाह की निगरानी को सीमित कर दिया है। पेरू की राजधानी लीमा के उत्तर में चांकाय में स्थित 1.3 अरब अमेरिकी डॉलर की लागत से स्थापित गहरे पानी का बंदरगाह लातिन अमेरिका में चीन की पकड़ का प्रतीक बन गया है। यह बंदरगाह अमेरिका के साथ तनाव का केंद्र बिंदु भी है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के पश्चिमी गोलार्ध मामलों के ब्यूरो ने सोशल मीडिया मंच पर कहा कि वह ''उन नवीनतम खबरों से चिंतित है कि पेरू अपने सबसे बड़े बंदरगाहों में से एक, चांकाय पर नजर रखने में असहाय हो सकता है, जो लालची चीनी मालिकों के अधिकार क्षेत्र में है।'' अमेरिका ने कहा, ''हम पेरू के उसके क्षेत्र में महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की देखरेख करने के संप्रभु अधिकार का समर्थन करते हैं। इसे इस क्षेत्र और दुनिया के लिए एक सबक के रूप में लें, सस्ते चीनी ऋण की कीमत संप्रभुता से चुकानी पड़ती है।'' यह चिंता ऐसे समय में सामने आई है जब ट्रंप प्रशासन पश्चिमी गोलार्ध पर अपना वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। वहीं, चीन लंबे समय से बड़े पैमाने पर ऋण और व्यापार के माध्यम से अपना प्रभाव स्थापित कर रहा है। चीन की सरकार ने बृहस्पतिवार को अमेरिकी टिप्पणियों को सिरे से खारिज कर दिया है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने बृहस्पतिवार को अपनी दैनिक प्रेस वार्ता में कहा, ''चीन चांकाय बंदरगाह के बारे में अमेरिका द्वारा फैलाई जा रही अफवाहों और दुष्प्रचार का कड़ा विरोध करता है और इसकी कड़ी निंदा करता है।''  

सहमति के बाद यू-टर्न? अमेरिका ने क्यों बदलीं ट्रेड डील की शर्तें, MEA का बड़ा बयान

नई दिल्ली भारत और अमेरिका के बीच हुई ट्रेड डील की चर्चा इन दिनों सभी जगह है। इस डील की फैक्टशीट पर हाल ही में वाइट हाउस द्वारा कुछ बदलाव किए गए थे। अब इन बदलावों पर जवाब देते हुए विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह संशोधन दोनों देशों की आपसी सहमति के बाद हुए हैं। यह दोनों देशों की साझा समझ को भी प्रदर्शित करते हैं। मीडिया से बात करते हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस मामले पर सरकार का मत सामने रखा। उन्होंने कहा, "दोनों देशों के बीच में पारस्परिक लाभ और व्यापारिक लाभ को ध्यान में रखकर एक अंतरिम समझौते पर सहमति बनी थी। इसे एक संयुक्त बयान के रूप में पेश किया गया था। यही बयान (फैक्टशीट) इस मामले में हमारी समझ का आधार बना हुआ है। अमेरिका की तरफ से इसमें जो भी संशोधन किए गए हैं, वह पूरी तरह से आपसी समझ को प्रदर्शित करते हैं। क्या है पूरा मामला? लंबी बातचीत और कई दौर की मीटिंग के बाद आखिरकार भारत और अमेरिका के बीच एक समझौते पर मुहर लगी थी। हालांकि, अभी भी इस पर बातचीत जारी है, लेकिन एक संयुक्त बयान जारी कर दिया गया था। यह एक बार 10 फरवरी को फिर चर्चा में आया, जब वाइट हाउस ने इस बयान की फैक्टशीट में बदलाव कर दिया। इस बदलाव के मुताबिक भारत द्वारा जिन अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ कम करने या समाप्त करने की बात पहले कही गई थी, उनमें से कुछ दालों को हटा दिया गया। इस संशोधन के पहले वाइट हाउस की आधिकारिक बेवसाइट पर उपलब्ध बयान के मुताबिक कहा गया था कि भारत सभी प्रकार की औद्योगिक वस्तुओं और अमेरिकी खाद्य और कृषि उत्पादों पर से टैरिफ हटाने या कम करने के लिए सहमत हुआ है। इसके अलावा अमेरिका की तरफ से पहले 500 बिलियन डॉलर की खरीद को लेकर भारत के प्रतिबद्ध होने की बात कही गई थी, इसे बाद में संशोधित करके 'इरादा रखता है' वाली बात जोड़ी गई। यानी यह बात भारत के लिए बाध्यकारी न होकर एक आपसी सहमति पर आधारित होगी। भारत और अमेरिका व्यापारिक समझौता ट्रंप के सत्ता में आने के बाद से लगातार भारत और अमेरिका के बीच में तनाव बना हुआ था। यह तनाव इतना बढ़ गया कि ट्रंप ने भारत की अर्थव्यवस्था को भी खरी-खोटी सुनाना शुरू कर दी। अमेरिकी ट्रंप, प्रशासन द्वारा लगातार बनाए गए दबाव के बाद भी सरकार ने किसानों के हितों को ताक पर नहीं रखा। महीनों की वार्ता के बाद आखिरकार दोनों देश एक समझौते पर पहुंचे। इस समझौते की तरफ सबसे पहले अमेरिकी राजदूत सर्गियो गोर ने इशारा किया। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर इसकी जानकारी साझा कर दी। इसके बाद भारत सरकार की तरफ से भी इस पर जानकारी साझा की गई।

क्रेडिट कार्ड यूजर्स अलर्ट! RBI करने जा रहा है नियमों में बड़ा बदलाव

नई दिल्ली  भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) योजना के दिशा-निर्देशों में बदलाव के लिए ड्राफ्ट जारी किया है। इसका मकसद कवरेज का विस्तार, परिचालन प्रक्रियाओं का सरलीकरण और कृषि क्षेत्र की उभरती जरूरतों का ध्यान रखना है। इस ड्राफ्ट पर आम लोग और अन्य हितधारक छह मार्च 2026 तक टिप्पणियां और सुझाव दे सकते हैं। होने वाले हैं ये बदलाव आरबीआई ने केसीसी लोन की मंजूरी और री-पेमेंट प्रोग्राम में एकरूपता लाने के लिए फसल सत्रों की अवधि को मानकीकृत करने का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत कम अवधि में तैयार होने वाली फसलों को 12 माह के चक्र और लंबी अवधि वाली फसलों को 18 माह के चक्र के रूप में परिभाषित किया गया है। लंबी अवधि की फसलों के चक्र के अनुरूप लोन अवधि तय करने के लिए किसान क्रेडिट कार्ड की कुल अवधि छह वर्ष करने का प्रस्ताव रखा गया है। ड्राफ्ट में केसीसी के तहत निकासी सीमा को प्रत्येक फसल सत्र के लिए फसल की अनुमानित लागत के साथ समायोजित करने का सुझाव दिया गया है, ताकि किसानों को वास्तविक खेती लागत के अनुरूप पर्याप्त लोन मिल सके। इसके अलावा, मिट्टी की जांच, वास्तविक समय में मौसम पूर्वानुमान, जैविक एवं उत्तम कृषि पद्धतियों के सर्टिफिकेशन जैसे तकनीकी खर्चों को भी पात्र मद में शामिल किया गया है। ये खर्च कृषि परिसंपत्तियों के मेंटेनेंस के लिए वर्तमान में स्वीकृत 20 प्रतिशत अतिरिक्त के भीतर रखे जाएंगे। किसान क्रेडिट कार्ड के बारे में बता दें कि किसान क्रेडिट कार्ड सिर्फ सरकारी बैंक ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय ग्रामीण और कुछ निजी बैंकों से भी मिलता है। इस कार्ड के लिए जमीन का मालिक होना जरूरी नहीं, किरायेदार और शेयरफार्मर भी पात्र हैं। इसके लिए जरूरी दस्तावेज में दो पासपोर्ट साइज के फोटो, राजस्व अधिकारियों द्वारा विधिवत प्रमाणित भूमि जोत का प्रमाण, रकबे के साथ फसल पैटर्न (उगाई जाने वाली फसलें) आदि शामिल हैं। शॉर्ट टर्म के लिए कितना लोन किसान क्रेडिट कार्ड योजना, किसानों को उनकी विविध वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त और समय पर लोन प्रोवाइड करने के लिए बनाई गई है। यह किसानों को संस्थागत लोन तक आसान पहुंच प्राप्त करने मदद करती है। इसके जरिए कृषि और फसल के बाद के खर्चों के लिए पैसे की उपलब्धता सुनिश्चित किया जा सकता है। संशोधित ब्याज अनुदान योजना (एमआईएसएस) के तहत किसानों को फसल और संबद्ध गतिविधियों के लिए रियायती शॉर्ट टर्म एग्री लोन प्रोवाइड किया जाता है। योजना में 3 लाख रुपये तक के लोन पर 7 प्रतिशत ब्याज दर है। वहीं, समय पर री-पेमेंट के लिए अतिरिक्त 3 प्रतिशत अनुदान के साथ प्रभावी दर को घटकर 4 प्रतिशत हो जाता है। एमआईएसएस में किसान क्रेडिट कार्ड वाले छोटे किसानों के लिए नेगोशिएबल वेयरहाउस रसीदों यानी एनडब्ल्यूआर पर फसल के बाद के लोन भी शामिल हैं।  

ढाका-वॉशिंगटन की डील ने बढ़ाई दिल्ली की चिंता? क्षेत्रीय राजनीति में हलचल

नई दिल्ली कपड़ा उद्योग बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और इस रीढ़ को सहारा देते हैं भारत समेत सेंट्रल एशिया के कुछ देश. बांग्लादेश कपड़े बनाता है लेकिन इसके लिए कपास (Cotton) भारत सप्लाई करता है, लेकिन अब बांग्लादेश ने इसमें बड़े बदलाव की घोषणा कर दी है. मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने 9 फरवरी को अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौता किया था. आज यानी गुरुवार को बांग्लादेश में चुनाव हो रहे हैं और इस चुनाव से ठीक तीन दिन पहले यूनुस सरकार ने अमेरिका से व्यापार समझौता कर लिया. समझौते की वैधता पर कई सवाल खड़े हुए क्योंकि यूनुस सरकार ने समझौते को काफी सीक्रेट रखा और इसका ड्राफ्ट किसी के साथ शेयर नहीं किया गया. अमेरिका के साथ हुए समझौते के तहत बांग्लादेश भारत से कपास की खरीद को धीरे-धीरे कम करने जा रहा है. बांग्लादेश ने घोषणा की है कि भारत की जगह अब अमेरिका से कपास खरीदी जाएगी.   'बांग्लादेश के लिए गेमचेंजर साबित होगा अमेरिका से कपास की खरीद' बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस के सूचना सलाहकार शफीकुल आलम ने एक इंटरव्यू में अमेरिका के साथ हुए व्यापार समझौते को 'गेम चेंजर' बताया. उन्होंने कहा कि इससे बांग्लादेश को अमेरिकी बाजार तक बेहतर पहुंच मिलेगी, जो उसके लिए बेहद अहम है. अमेरिका ने बांग्लादेश से व्यापार समझौते के तहत टैरिफ में एक प्रतिशत की कटौती कर उसे 19% कर दिया है. कंबोडिया और इंडोनेशिया जैसे देश वस्त्र उद्योग में बांग्लादेश के प्रतिस्पर्धी हैं और इन देशों पर भी अमेरिका ने 19% का ही टैरिफ लगाया है. साथ ही, अमेरिका ने कहा है कि अगर बांग्लादेश अपने कपड़े अमेरिकी कपास या मानव निर्मित फाइबर से बनाता है तो उस पर कोई टैरिफ नहीं लगेगा यानी बांग्लादेश बिना किसी फीस के उसे अमेरिका में बेच सकेगा. भारत से बड़ी मात्रा में कपास खरीदता है बांग्लादेश बांग्लादेश का वस्त्र उद्योग काफी बड़ा है लेकिन वो कपड़ों के लिए पर्याप्त कपास या जरूरी धागे का उत्पादन नहीं कर पाता. इसके लिए वो भारत और सेंट्रल एशिया के देशों पर निर्भर है. लेकिन माना जा रहा है कि अमेरिका के साथ ट्रेड डील के बाद अब उसके सप्लायर्स में अमेरिका शीर्ष के देशों में शामिल हो जाएगा. 2024 में भारत ने बांग्लादेश को 1.6 अरब डॉलर का कपास धागा और लगभग 8.5 करोड़ डॉलर का मानव निर्मित फाइबर धागा बेचा था. इनका बड़ा हिस्सा जमीनी बंदरगाहों के रास्ते भेजा गया. लेकिन 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना के तख्तापलट के बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव आ गया. भारत ने शेख हसीना को राजनीतिक शरण दी जिसके बाद से रिश्ते और खराब हुए. इसे देखते हुए 13 अप्रैल 2025 को बांग्लादेश ने जमीनी रास्ते से भारतीय कपास के आयात पर रोक लगा दी. इसके जवाब में भारत ने 16 मई 2025 से बांग्लादेश के रेडीमेड गारमेंट्स समेत कई उत्पादों के जमीनी रास्ते से देश में एंट्री पर रोक लगा दी. बांग्लादेश भारत को सबसे अधिक रेडीमेड गारमेंट्स बेचता है. तनावपूर्ण रिश्तों के बीच बांग्लादेश ने भारत के बजाए अब अमेरिका से कपास खरीदने की योजना बनाई है. अमेरिका बांग्लादेशी कपड़ों का सबसे बड़ा बाजार भी है. ऐसे में बांग्लादेश मान रहा है कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में कपास खरीद को शामिल करना टेक्सटाइल इंडस्ट्री के लिए बहुत अच्छा फैसला साबित होगा. ब्रैक यूनिवर्सिटी के प्रमुख अर्थशास्त्री प्रोफेसर सलीम जहान ने द हिंदू से बात करते हुए कहा कि इस समझौते से अमेरिका के कपास उत्पादकों के लिए बांग्लादेश अब आकर्षक जगह बन गया है. हालांकि, उन्होंने कहा कि अमेरिका का कपास भारत और मिस्र के कपास जैसी क्वालिटी वाला होगा या नहीं, यह एक बड़ा सवाल है. उन्होंने कहा, 'टेक्सटाइल सेक्टर में कपास की क्वालिटी सबसे ज्यादा मायने रखती है. अगर अमेरिकी कपास स्टैंडर्ड पर खरी नहीं उतरी, तो अमेरिकी खरीदार भी हमारे कपड़े पसंद नहीं करेंगे.' प्रोफेसर जहान ने यह भी कहा कि अमेरिका बांग्लादेश से काफी दूर है और वहां से कपास के आने की वजह से उसका शिपिंग चार्ज काफी बढ़ सकता है जिससे टैरिफ में मिली छूट का फायदा कम हो जाएगा.

‘हिंदू अनुष्ठान रोके जाएं’ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, दरगाह मैनेजमेंट को क्या मिला जवाब?

कर्नाटक सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (12 फरवरी) को कर्नाटक स्थित अलंद लाडले मशाइक दरगाह प्रबंधन की उस अर्जी पर सुनवाई करने से मना कर दिया जिसमें जिसमें दरगाह परिसर में हिंदू महाशिवरात्रि पूजा और दूसरे हिंदू रीति-रिवाजों पर रोक लगाने के लिए निर्देश देने की मांग की गई थी। दरगाह मैनेजमेंट ने भारत के संविधान के आर्टिकल 32 के तहत अर्जी दी थी, जो उन पार्टियों को राहत के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने की इजाज़त देता है जिनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। दरगाह प्रबंधन याचिका में दावा किया था कि दरगाह के धार्मिक स्वरूप को बदलने के लिए हर साल रणनीतिक तरीके से पूजा की अनुमति लेने की कोशिश की जा रही है। प्रबंधन ने सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप कर दरगाह के मूल धार्मिक चरित्र को बनाए रखने की भी मांग की थी। हालांकि, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की पीठ ने कहा कि इस तरह के मामलों में पहले हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए। इससे पहले मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने भी टिप्पणी की थी कि हर मामला सीधे अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट लाना उचित नहीं है, क्योंकि इससे यह संदेश जाता है कि हाई कोर्ट प्रभावी नहीं हैं। जब कल चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची के सामने यह मामला आया, तो इस बेंच ने यह भी सवाल उठाया था कि पहले हाई कोर्ट जाने के बजाय आर्टिकल 32 की पिटीशन क्यों फाइल की गई। यह विवाद उस दरगाह से जुड़ा है जो 14वीं सदी के सूफी संत हजरत शेख अलाउद्दीन अंसारी (लाडले मशाइक) और 15वीं सदी के हिंदू संत राघव चैतन्य से संबंधित मानी जाती है। दरगाह परिसर में राघव चैतन्य शिवलिंग नाम से पहचानी जाने वाली एक संरचना भी मौजूद बताई जाती है। ऐतिहासिक रूप से इस स्थल पर हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय पूजा-अर्चना करते रहे हैं, हालांकि 2022 में यहां पूजा अधिकार को लेकर तनाव की स्थिति बनी थी। गौरतलब है कि कर्नाटक हाई कोर्ट ने 2025 में 15 हिंदू श्रद्धालुओं को महाशिवरात्रि पर पूजा की अनुमति दी थी, जो भारी सुरक्षा के बीच सम्पन्न हुई थी। इससे पहले भी कोर्ट के आदेश पर सीमित संख्या में पूजा कराई गई थी। दरगाह प्रबंधन का कहना था कि बार-बार अंतरिम आदेश लेकर धार्मिक स्थल के स्वरूप को बदलने की कोशिश की जा रही है, जो Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991 के खिलाफ हो सकता है। इस कानून के तहत 15 अगस्त 1947 को किसी धार्मिक स्थल की जो स्थिति थी, उसे बनाए रखना जरूरी माना गया है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद इस मामले में आगे की कानूनी लड़ाई हाई कोर्ट में होने की संभावना जताई जा रही है। यह मामला धार्मिक अधिकार, ऐतिहासिक दावों और कानून के संतुलन के लिहाज से अहम माना जा रहा है।