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बंगाल में बाबरी मस्जिद फंडिंग तेज: दान पेटियां और QR कोड से लगातार बढ़ रहा चंदा

कोलकाता  पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर द्वारा मुर्शिदाबाद में प्रस्तावित बाबरी मस्जिद-शैली की मस्जिद के लिए मिले चंदे की राशि लगभग तीन करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। विधायक के सहयोगियों ने मंगलवार को यह दावा किया। कबीर ने शनिवार को मुर्शिदाबाद जिले के रेजीनगर में इस मस्जिद का शिलान्यास किया था। कबीर के अनुसार, स्थल पर 12 दान पेटियां रखी गई थीं। अब तक इन पेटियों से 57 लाख रुपये की गिनती हुई है, जबकि क्यूआर कोड भुगतान के माध्यम से 2.47 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं। योगदान के लिए शिलान्यास स्थल पर एक दान पेटी अब भी रखी हुई है। सोमवार तक जुटा लिए थे एक करोड़ रुपये से ज्यादा सोमवार को पीटीआई भाषा की रिपोर्ट में बताया गया था कि मस्जिद बनाने के लिए चलाए जा रहे अभियान के तहत अब तक करीब 1.3 करोड़ रुपये का चंदा मिल चुका है। कबीर के करीबी लोगों ने बताया कि चंदे के लिए जगह-जगह लगाए गए दानपत्र लगभग भर चुके हैं और नकदी गिनने वाली मशीनों की मदद से रात भर चंदे की गिनती चलती रही। उन्होंने बताया कि लोग दान नकदी और ऑनलाइन दोनों तरीके से दे रहे हैं। कबीर के करीबी लोगों ने सोमवार को बताया कि चार दान पेटियों और एक बोरी से अब तक कम से कम 37.33 लाख रुपये नकद गिने गए हैं, जबकि क्यूआर कोड के माध्यम से ऑनलाइन योगदान 93 लाख रुपये तक पहुंच गया है, जिससे कुल राशि 1.30 करोड़ रुपये हो गई है, जबकि सात और सीलबंद पेटियों को खोला जाना बाकी है। सियासी पारा चढ़ा कबीर ने शनिवार को सुरक्षा के बीच मुर्शिदाबाद के रेजिनगर में मस्जिद की आधारशिला रखी। कहा जा रहा है कि उनके इस कदम से बंगाल का सियासी पारा चढ़ गया है जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। टीएमसी ने उन्हें पहले ही निलंबित कर दिया था। कबीर ने छह दिसंबर को शिलान्यास कार्यक्रम स्थल पर 11 बड़े स्टेनलेस स्टील के दान पात्र रखे थे और लोगों से चंदे की अपील की थी।  

फोन पर मिली जानलेवा धमकियां, हुमायूं कबीर बोले— अब HC से ही मिलेगी सुरक्षा

कोलकाता  पश्चिम बंगाल में बाबरी मस्जिद की नींव रखने वाले विधायक हुमायूं कबीर ने धमकियां मिलने की बात कही है। उन्होंने कहा है कि राज्य के बाहर से फोन आ रहे हैं और जान से मारने की धमकी दे रहे हैं। उन्होंने सुरक्षा के लिए राज्य सरकार से गुहार लगाई है। साथ ही कहा है कि सिक्योरिटी की मांग के लिए उच्च न्यायालय का भी रुख करेंगे। कबीर को तृणमूल कांग्रेस ने निलंबित कर दिया था।   एक चैनल से बातचीत में कबीर ने कहा, 'लगातार सात दिनों से इतना धमकी आ रही है। पश्चिम बंगाल के बाहर से। कोई फोन करके मुझे जान से मारने की धमकी दे रहा है। वो बाबरी मस्जिद की नींव रखी थी, उसके पहले ही मुझे जान से मुझे जान से मार देंगे, ऐसा बोल रहे हैं। मैं डरा नहीं अभी तक, मुझे अल्लाह पर पूरा भरोसा है। लेकिन सावधानी के लिए मैं सिक्योरिटी के लिए पश्चिम बंगाल सरकार को, गृह विभाग के पास आवेदन दूंगा। फिर सिक्योरिटी के लिए हाईकोर्ट में जाऊंगा।' खबर के अनुसार, कबीर ने सोमवार को यहां संवाददाताओं से कहा, 'तत्काल उपाय के तौर पर मैं कल से अपने लिए आठ निजी सुरक्षाकर्मी नियुक्त करूंगा क्योंकि 06 दिसंबर को बाबरी मस्जिद का शिलान्यास करने के बाद मुझे राज्य के बाहर से धमकी भरे फोन आ रहे हैं। धमकी भरे फोन आने के बाद मैंने सुरक्षा मुहैया कराने के लिए राज्य सरकार के साथ-साथ केंद्र को भी मेल किया है।' उन्होंने कहा कि वह 16 दिसंबर को बेंगलुरु जाएंगे और उसके बाद नोएडा जाएंगे। एजेंसी के मुताबिक, उन्होंने कहा, 'हालांकि राज्य सरकार ने अभी तक अपने सुरक्षाकर्मियों को नहीं हटाया है, लेकिन मुझे पश्चिम बंगाल पुलिस पर भरोसा नहीं है क्योंकि सत्तारुढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस बाबरी मस्जिद के लिए फंडिंग का आरोप भारतीय जनता पार्टी पर लगा रही है।' उन्होंने कहा कि वह अपनी सुरक्षा के लिए पर्याप्त सुरक्षाकर्मी सुनिश्चित करने के लिए कलकत्ता उच्च न्यायालय जा सकते हैं।  

पीड़िता के शादी रिसेप्शन की तस्वीरें बनीं आधार, कोर्ट ने रेप आरोपी को दी जमानत; उम्र पर संदेह बरकरार

चंडीगढ़  मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 14 मई 2023 को युवती के पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी कि 12 मई को उसकी 15 वर्षीय बेटी बिना बताए घर से निकल गई और आरोपी उसे विवाह का झांसा देकर भगा ले गया। पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 363 (अपहरण), 376(2)(n) (बार-बार बलात्कार) और पॉक्सो एक्ट की धारा 4 व 6 के तहत आरोपपत्र दायर किया। ओसिफिकेशन टेस्ट में युवती की हड्डी की उम्र 15-16 वर्ष और दंत आयु 14-16 वर्ष बताई गई थी। अदालत का फैसला फैसले में अदालत ने कहा कि मेडिकल अनुमान वाली उम्र में दो वर्ष की त्रुटि-सीमा लागू करने पर युवती की आयु उसकी मेडिकल परीक्षा के समय 18 वर्ष से अधिक बैठती है। इसलिए 12 मई 2023 को घटना की तिथि मानने पर भी युवती की आयु 18 वर्ष से अधिक मानी जा सकती है। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि अभियोजन पक्ष कोई भी दस्तावेज- जैसे स्कूल रिकॉर्ड या नगर निगम का जन्म प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं कर पाया जिससे साबित हो सके कि घटना के समय युवती नाबालिग थी। तस्वीरों और आचरण पर अदालत की टिप्पणी जज ने विवाह और रिसेप्शन की तस्वीरों का हवाला देते हुए कहा कि युवती 'बहुत खुश दिख रही है' और उसका घर आरोपी के घर से मात्र 5-6 मकान की दूरी पर था, इसलिए यदि वह अपनी इच्छा के विरुद्ध वहां गई होती तो आसान तरीके से घर लौट सकती थी। अदालत ने कहा- युवती वयस्क प्रतीत होती है। यदि उसके साथ जबरन यौन संबंध बनाए गए होते, तो वह शोर मचा सकती थी, पर उसने ऐसा नहीं किया, जिससे स्पष्ट होता है कि यदि कोई संबंध बने भी हों तो वे उसकी सहमति से बने। बयानों में विरोधाभास अदालत ने माना कि युवती और उसके पिता के बयान विभिन्न मंचों पर एक-दूसरे से मेल नहीं खाते, जिससे अभियोजन की कहानी पर संदेह पैदा होता है। न्यायालय ने कहा कि यह भी संभव है कि युवती स्वयं आरोपी के साथ चली गई हो और बाद में कहानी को प्रलोभन देकर ले जाने के रूप में प्रस्तुत किया गया हो। अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी और मुकदमे में लगाए गए आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुए। इसलिए आरोपी को सभी आरोपों से बरी किया गया। फैसले में यह भी दोहराया गया कि जब तक अभियोजन पक्ष किसी व्यक्ति की नाबालिग उम्र को ठोस दस्तावेजों से सिद्ध न कर दे, सहमति आधारित संबंध पर पॉक्सो एक्ट लागू नहीं किया जा सकता।

शिर्क मंजूर नहीं: वंदे मातरम् बहस पर मदनी ने रखी दो-टूक राय

नई दिल्ली राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को 150 वर्ष पूरे होने पर संसद में चल रही बहस के बीच जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा है कि मुसलमानों को मर जाना स्वीकार है लेकिन शिर्क नहीं। उन्होंने कहा कि किसी के वंदे मातरम् पढ़ने या गाने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन मुसलमान केवल एक अल्लाह की इबादत करता है और अपनी इस इबादत में किसी दूसरे को शरीक नहीं कर सकता। एक बयान जारी करते हुए मदनी ने कहा कि वंदे मातरम् की कविता की कुछ पंक्तियां ऐसे धार्मिक विचारों पर आधारित हैं जो इस्लामी आस्था के खिलाफ हैं। विशेष रूप से इसके चार अंतरों में देश को 'दुर्गा माता' जैसी देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया है और उसकी पूजा के शब्द प्रयोग किए गए हैं, जो किसी मुसलमान की बुनियादी आस्था के खिलाफ हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) देता है। इन अधिकारों के अनुसार किसी भी नागरिक को उसके धार्मिक विश्वास के विरुद्ध किसी नारे, गीत या विचार को अपनाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। मदनी ने कहा कि वतन से मोहब्बत करना अलग बात है और उसकी पूजा करना अलग बात है। मुसलमानों को इस देश से कितनी मोहब्बत है इसके लिए उन्हें किसी प्रमाण-पत्र की जरूरत नहीं है। आजादी की लड़ाई में मुसलमानों और जमीयत उलमा-ए-हिंद के बुजुर्गों की कुर्बानियां और विशेष रूप से देश के बंटवारे के खिलाफ जमीयत उलमा-ए-हिंद की कोशिशें दिन की रोशनी की तरह स्पष्ट हैं। आजादी के बाद भी देश की एकता और अखंडता के लिए उनकी कोशिशें भुलाई नहीं जा सकतीं। हम हमेशा कहते आए हैं कि देशभक्ति का संबंध दिल की सच्चाई और अमल से है, न कि नारेबाजी से। मदनी ने कहा कहा कि 'वंदे मातरम्' बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास 'आनंद मठ' से लिया गया एक अंश है। इसकी कई पंक्तियां इस्लाम के धार्मिक सिद्धांतों के खिलाफ हैं, इसलिए मुसलमान इस गीत को गाने से परहेज करते हैं। 'वंदे मातरम्' का पूरा अर्थ है- मां, मैं तेरी पूजा करता हूं।' यह शब्द स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि यह गीत हिंदू देवी दुर्गा की प्रशंसा में लिखा गया था, न कि भारत माता के लिए। वंदे मातरम् गीत मां के सामने झुकने और उसकी पूजा करने की बात करता है, जबकि इस्लाम अल्लाह के अलावा किसी के सामने झुकने और पूजा करने की अनुमति नहीं देता। हम एक ईश्वर को मानने वाले हैं, हम उसके अलावा किसी को भी न अपना पूज्य मानते हैं और न ही किसी के सामने सजदा करते हैं। इसलिए हम इसे किसी भी हाल में स्वीकार नहीं कर सकते। मर जाना स्वीकार है, लेकिन शिर्क (अल्लाह के साथ किसी साझी) स्वीकार नहीं है। मरेंगे तो इस्लाम पर और जिएंगे तो इस्लाम पर, इंशा अल्लाह।

शेख हसीना ने उजागर किया मोदी का संकट-सहयोग, बोलीं—ऐसी मदद कोई नहीं भूल सकता

नई दिल्ली  भारत में शरण लेने वालीं बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना ने पीएम नरेंद्र मोदी की तारीफ की है। उन्होंने कहा है कि मुश्किल समय में भारत के लोगों और पीएम मोदी ने उनकी मदद की थी। खास बात है कि बांग्लादेश की कोर्ट ने हसीना को मौत की सजा सुनाई है। हालांकि, उनके प्रत्यर्पण को लेकर स्थिति साफ नहीं है। मीडिया से बातचीत में हसीना से सवाल किया गया कि पीएम मोदी ने उनकी मदद कैसे की। इसपर उन्होंने जवाब दिया, 'मैं निजी बातचीत या रिश्तों के बारे में बात नहीं करना चाहती। हालांकि, मैं आपको यह बता सकती हूं कि मैं भारत के लोगों और उनकी तरफ से लगातार मिल रहे समर्थन की आभारी हूं।' बांग्लादेश के मौजूदा हालात के बारे में पीएम मोदी की भूमिका पर भी उनसे सवाल किया गया। हसीना ने जवाब दिया, 'भारत बहुत ही अहम पड़ोसी है। मैं प्रधानमंत्री मोदी के समर्थन और हमारे देशों के बीच पुराने संबंधों की कद्र करती हूं। व्यक्तिगत और कूटनीतिक रूप से भी मैं संकट में मिले शरण के प्रति आभारी हूं। भारत के साथ मजबूत द्विपक्षीय रिश्ते बांग्लादेश के हित में है। ये क्षेत्रीय स्थिरता को लंबे समय तक टिकाए रखने में मदद कर सकते हैं।' अमेरिका की भूमिका? हसीना से बांग्लादेश संकट में अमेरिका की भूमिका की अफवाहों को लेकर सवाल किया गया। उन्होंने कहा, 'अमेरिका ने सार्वजनिक रूप से कोई भूमिका होने से इनकार किया है और अब तक पब्लिक डोमेन में ऐसा कोई सबूत नहीं है, जो इसके खिलाफ हो। बगैर सबूत आरोप लगाने के कारण स्थिरता को बहाल करने, जिम्मेदार का पता करने और राष्ट्रीय एकता की राह से भटकने का जोखिम होता है।' बेटे के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट बांग्लादेश में एक विशेष न्यायाधिकरण ने हसीना के निर्वासित बेटे साजिब वाजेद जॉय के खिलाफ गुरुवार को गिरफ्तारी वारंट जारी किया। यह वारंट मानवता के खिलाफ अपराध करने के आरोप में उनकी मां को मौत की सजा सुनाने के एक महीने बाद जारी किया गया है। बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (आईसीटी-बीडी) के एक अभियोजक ने संवाददाताओं को बताया, 'न्यायाधिकरण ने जुलाई के विद्रोह के दौरान मानवता के विरुद्ध अपराध करने के लिए उनके (जॉय के) विरुद्ध दर्ज मामले में गिरफ्तारी वारंट जारी किया है।' उन्होंने बताया कि आईसीटी मामलों के तत्कालीन कनिष्ठ मंत्री जुनैद अहमद पलक के विरुद्ध भी इसी प्रकार का वारंट जारी किया गया था। पलक पहले से ही जेल में हैं। आईसीटी-बीडी ने पूर्व प्रधानमंत्री और उनके तत्कालीन गृह मंत्री असदुज्जमां खान कमाल को छात्रों के नेतृत्व में हुए हिंसक विरोध प्रदर्शन को दबाने के प्रयासों के लिए मौत की सजा सुनाई। यह फैसला उनकी गैर हाजिरी में सुनाया गया है।

सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्देश: BLO से संबंधित सभी नियम पूरे देश में लागू

नई दिल्ली एसआईआर के कार्य में लगे बीएलओ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा निर्देश दिया है. शीर्ष अदालत ने कहा है कि BLO से जुड़े सभी निर्देश पूरे देश में लागू होंगे. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं में बीएलओ की सुरक्षा और प्रशासनिक निर्देश पूरे देश में लागू होंगे, ये सिर्फ पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं हैं. मामले की सुनवाई कर रहे सीजेआई की बेंच ने कहा कि प्रभावित कर्मचारी को स्वतंत्रता होगी कि वे राज्य के चुनाव आयोग, जिले के जिला निर्वाचन अधिकारी से संपर्क करें. जिला अधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे कि राज्य सरकार आवश्यक अनुपालन करें. पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान ये निर्देश दिए गए. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश अलग-अलग राज्यों की याचिकाओं को अलग-अलग श्रेणी में विभाजित किया जाए, ताकि मुख्य मुद्दे पर सुनवाई सुचारू रूप से हो सके. तीन अलग-अलग राज्यों से संबंधित SIR मामलों को अगले हफ्ते तीन अलग-अलग तारीखों पर सूचीबद्ध किया जाए. सुनवाई के दौरान उठे मुद्दे वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ दवे ने दलील दी कि यूपी जैसा बड़ा राज्य तय टाइमलाइन में SIR पूरा नहीं कर पाएगा. इस पर CJI ने यूपी की याचिका पर नोटिस जारी करते हुए कहा कि अगले मंगलवार को सुनवाई होगी. CJI ने फिर दोहराया, “आप लोग इसी तरह नई-नई याचिकाएं लाते रहेंगे, तो मुख्य केस की सुनवाई कैसे होगी?” तमिलनाडु का पक्ष तमिलनाडु SIR मुद्दे पर एक वकील ने कहा कि राज्य के प्रवासी मजदूर पोंगल के बाद ही लौटते हैं, इसलिए अदालत को इसे ध्यान में रखना चाहिए. अदालत ने स्पष्ट किया कि वह पहले बिहार मामले को प्राथमिकता देगी, क्योंकि उसमें होने वाला निर्णय सभी राज्यों को प्रभावित करेगा. बीएलओ की सुरक्षा पर चिंता चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि जमीनी स्तर पर बीएलओ को मिल रही धमकियां गंभीर मुद्दा बन सकती हैं. इनकी सुरक्षा नजरअंदाज नहीं की जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है. उसने कहा कि बीएलओ से जुड़े निर्देश देश भर में लागू होंगे. इस सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने कहा कि बीएलओ की सुरक्षा राज्य पुलिस के सहयोग पर निर्भर है. जरूरत पड़ी तो केंद्रीय बल तैनात किए जा सकते हैं. प्रभावित कर्मचारी राज्य ECI और जिला निर्वाचन अधिकारी से सुरक्षा के लिए संपर्क कर सकेंगे. मतदाता नामांकन और नागरिकता से जुड़े मामलों की अगली सुनवाई 17 तारीख को होगी.

कितनी भी बड़ी कंपनी क्यों न हो, यात्रियों को तंग नहीं होने देंगे: IndiGo को सरकार की सख्त चेतावनी

नई दिल्ली  हवाई यात्रा बाधित होने के मुद्दे पर सरकार ने IndiGo के खिलाफ बड़े ऐक्शन की तैयारी कर ली है। केंद्र सरकार ने कोर्ट में कहा है कि कंपनी को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। साथ ही कहा है कि किसी भी कंपनी को यात्रियों को परेशान करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इससे पहले ही इंडिगो के रूट्स में 5 फीसदी की कटौती करने का फैसला लिया गया था।   इंडिगो संकट पर लोकसभा में बोलते हुए, केंद्रीय उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू किंजरापु ने कहा, 'ऑपरेशन तेजी से स्थिर हो रहे हैं, सुरक्षा पूरी तरह से लागू है, इंडिगो को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, यात्रियों की सुविधा और सम्मान की रक्षा की जा रही है और भारत के उड्डयन सेक्टर को और ज्यादा यात्री-केंद्रित बनाने के लिए लंबे समय के उपाय किए जा रहे हैं…।' उन्होंने कहा, 'इंडिगो की दिक्कतें अब ठीक हो रही हैं। देशभर में अन्य एयरलाइन्स आराम से काम कर रही हैं। देशभर के एयरपोर्ट्स पर हालात सामान्य हैं। मंत्रालय की देखरेख में रिफंड्स, सामान का पता लगाना और यात्रियों की मदद करने के उपाय किए जा रहे हैं। DGCA की तरफ से इंडिगो नेतृत्व को कारण बताओ नोटिस भेजे गए हैं और जांच शुरू की गई है।' उन्होंने कहा, 'रिपोर्ट के आधार पर उचित और कठोर कार्रवाई की जाएगी। कोई भी एयरलाइन्स हो, फिर भले ही वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो। उसे यात्रियों को ऐसे परेशान नहीं करने दिया जाएगा।' DGCA ने कर दी कटौती डीजीसीए ने मंगलवार को कहा कि उसने एक दिसंबर 2025 से बड़े पैमाने पर उड़ान व्यवधानों के बाद विमान कंपनी इंडिगो की उड़ान सेवाओं में पांच प्रतिशत की कटौती है। मंगलवार को इस संबंध में आदेश जारी किया गया है। बयान के अनुसार, सभी क्षेत्रों में उड़ानों में कटौती की गई है खासकर उच्च मांग वाले मार्गों पर। इंडिगो को बुधवार शाम पांच बजे तक डीजीसीए को संशोधित शेड्यूल प्रस्तुत करने का भी निर्देश दिया गया है। इससे पहले नगार विमानन मंत्री के. राममोहन नायडू ने सोमवार को कहा था कि सरकार चालू शीतकालीन कार्यक्रम के तहत इंडिगो द्वारा जिन मार्गों पर उड़ान सेवाएं संचालित की जाती हैं उन्हें कम किया जाएगा। वित्त वर्ष 2025-26 के शीतकालीन कार्यक्रम के तहत विमानन कंपनी प्रतिदिन 2,200 से अधिक उड़ानें संचालित कर रही हैं।  

SC ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर जताई नाराजगी, लड़की के स्तन पकड़ने को रेप का प्रयास नहीं माना

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि यौन हमलों से जुड़े मामलों में असंवेदनशील न्यायिक टिप्पणियों का पीड़िता, उनके परिवार और बड़े पैमाने पर समाज पर ‘डरावना असर’ पड़ सकता है, ऐसे में इस तरह की टिप्पणियों पर लगाम लगाने के लिए उच्च न्यायालयों और जिला अदालतों के लिए दिशा-निर्देश बनाने पर विचार कर सकता है। शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ स्वत: संज्ञान याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। फैसले में कहा गया था कि नाबालिग लड़की के स्तनों को पकड़ना, उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ना, उसके कपड़े उतारने का प्रयास और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश करना दुष्कर्म या दुष्कर्म के प्रयास नहीं है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष मामले की सुनवाई के दौरान वकीलों ने कहा कि इस मामले के अलावा, हाल के दिनों में कई हाईकोर्ट ने यौन हमले के मामलों में इसी तरह की मौखिक और लिखित टिप्पणी की है। वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने पीठ से कहा कि ‌हाल ही में एक अन्य मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि चूंकि रात थी, इसलिए यह आरोपी के लिए एक ‘आमंत्रण’ था। उन्होंने कलकत्ता और राजस्थान हाईकोर्ट के ऐसे दूसरे मामलों का भी पीठ के समक्ष उल्लेख किया। एक अन्य अधिवक्ता ने पीठ से जिला अदालत के एक मामले का जिक्र किया, जहां बंद कमरे में अदालती कार्यवाही के बावजूद कई लोग मौजूद थे और सुनवाई के दौरान पीड़िता को कथित तौर पर परेशान किया गया। स्तन पकड़ना और पायजामे का नाड़ा तोड़ना, रेप या रेप का प्रयास नहींः हाईकोर्ट ऐसी टिप्पणियों से समाज पर बुरा असर इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि यदि आप इन सभी मामलों का जिक्र कर सकते हैं तो हम पूरा दिशा-निर्देश जारी करने पर विचार कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की कोई भी असंवेदनशील बातें और न्यायिक टिप्पणियां पीड़ितों, उनके परिवारों और पूरे समाज पर बुरा असर डाल सकती है। पीड़ितों को मजबूर करने के तरीके हैं इसके साथ ही, कभी-कभी, उन्हें (पीड़ितों को) शिकायतें वापस लेने के लिए मजबूर करने के लिए भी ऐसे तरीके अपनाए जाते हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि ‘ये हाईकोर्ट की टिप्पणियां हैं और जिला अदालत के स्तर पर इस तरह की बातों पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए और हम दिशा-निर्देश जारी करना चाहेंगे। इसके साथ ही, पीठ ने वकीलों से अगली सुनवाई की तारीख से पहले संक्षिप्त में लिखित सुझाव देने को कहा।

IMF का पाकिस्तान को 1.2 अरब डॉलर का और वित्तीय सहायता देने का फैसला, बावजूद इसके देश की स्थिति पर चिंता

इस्लामाबाद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने पाकिस्तान की आर्थिक अस्थिरता और सुधारों में कमी पर चिंता जताने के बावजूद देश को 1.2 अरब डॉलर की नई किस्त जारी कर दी है। यह राशि पाकिस्तान की विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने और महंगाई को नियंत्रित करने में सहायक होगी, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम दीर्घकालिक सुधारों के बिना जोखिम भरा हो सकता है। IMF ने पाकिस्तान को 1.2 अरब डॉलर की तीसरी किस्त जारी करने की घोषणा की। यह धनराशि उन दो कार्यक्रमों के तहत दी गई है, जिनका उद्देश्य देश में आर्थिक सुधारों को समर्थन देना और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करना है। इस ताजा किस्त के साथ वाशिंगटन स्थित संस्था द्वारा इस्लामाबाद को अब तक कुल 3.3 अरब डॉलर जारी किए जा चुके हैं। आईएमएफ के उप प्रबंध निदेशक नाइजल क्लार्क ने एक बयान में कहा कि पाकिस्तान द्वारा लागू किए गए सुधारों ने हालिया झटकों के बावजूद मैक्रोइकॉनॉमिक स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने विशेष रूप से इस वर्ष की मॉनसून बाढ़ों का उल्लेख किया, जिनमें सितंबर तक 1,000 से अधिक लोगों की जान चली गई थी। क्लार्क ने कहा कि पाकिस्तान सरकार द्वारा प्राथमिक राजकोषीय संतुलन लक्ष्य को हासिल करने की प्रतिबद्धता, साथ ही बाढ़ प्रभावितों को जरूरी आपात सहायता प्रदान करना, उनकी वित्तीय विश्वसनीयता को मजबूत करने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है। हालांकि, आईएमएफ अधिकारी ने सरकार से आर्थिक डेटा कलेक्शन में सुधार, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के निजीकरण और निवेश को बढ़ावा देने जैसे प्रमुख सुधारों की गति तेज करने का आग्रह भी किया। गंभीर आर्थिक संकट में फंसा पाकिस्तान पाकिस्तान पिछले कई वर्षों से लंबे आर्थिक और राजनीतिक संकट से जूझ रहा है। विदेशी कर्ज पर भारी निर्भरता रखने वाला देश 2023 में डिफॉल्टर होने से बाल-बाल बचा। तब 2024 में आईएमएफ द्वारा 7 अरब डॉलर के बेलआउट पैकेज की मंजूरी मिली थी। दक्षिण एशियाई यह देश अर्जेंटीना और यूक्रेन के बाद आईएमएफ का तीसरा सबसे बड़ा देनदार है। वित्तीय मोर्चे पर राहत पाने के लिए पाकिस्तान ने जनवरी 2024 में विश्व बैंक से 10 वर्षों के लिए 20 अरब डॉलर के वित्तीय पैकेज पर भी समझौता किया था। आईएमएफ की ताजा किश्त से पाकिस्तान को विदेशी मुद्रा भंडार को स्थिर रखने और सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में कुछ राहत मिलने की उम्मीद है, लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार वास्तविक आर्थिक सुधारों को तेज़ी से लागू किए बिना स्थिति में स्थायी सुधार की संभावना अभी सीमित है।

सीजेआई सूर्यकांत के फैसले से बदल रही परंपरा: मां की जाति से मिलेगा कास्ट सर्टिफिकेट, न पिता की जाति से

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम फैसले में एक नाबालिग बच्ची की शिक्षा को ध्यान में रखते हुए उसकी मां की जाति ‘आदि द्रविड़’ के आधार पर अनुसूचित जाति (SC) प्रमाणपत्र जारी करने की मंजूरी दे दी. कोर्ट का यह फैसला दूरगामी असर डालने वाला माना जा रहा है. यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब शीर्ष अदालत के समक्ष पहले से ही कई याचिकाएं लंबित हैं, जिनमें उस परंपरागत नियम को चुनौती दी गई है, जिसके अनुसार बच्चे की जाति पिता की जाति के आधार पर तय की जाती रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने से इनकार कर दिया, जिसमें पुडुचेरी की इस बच्ची को एससी जाति प्रमाणपत्र जारी करने का निर्देश दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि अगर बच्ची को समय पर जाति प्रमाणपत्र नहीं मिला, तो उसका भविष्य प्रभावित हो सकता है. क्या बोले CJI सूर्यकांत? हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस मामले में कानून से जुड़े बड़े प्रश्न को अभी खुला रख रही है. इस दौरान सीजेआई सूर्यकांत की एक टिप्पणी ने नई बहस को जन्म दे दिया. उन्होंने कहा, ‘समय के साथ जब परिस्थितियां बदल रही हैं, तो फिर मां की जाति के आधार पर जाति प्रमाणपत्र क्यों नहीं जारी किया जा सकता?’ इस टिप्पणी को सामाजिक और कानूनी दृष्टि से एक बड़ा संकेत माना जा रहा है. अगर भविष्य में यह सिद्धांत स्थापित होता है, तो इसका अर्थ यह होगा कि अनुसूचित जाति की महिला और उच्च जाति के पुरुष की संतानें, भले ही वे उच्च जाति के सामाजिक माहौल में पली-बढ़ी हों, फिर भी वे एससी प्रमाणपत्र की हकदार हो सकती हैं. क्या है पूरा मामला? यह मामला पुडुचेरी की एक महिला से जुड़ा है, जिसने अपने तहसीलदार के पास आवेदन देकर अपने तीन बच्चों दो बेटियों और एक बेटे के लिए मां की जाति के आधार पर अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र जारी करने की मांग की थी. महिला ने अपने आवेदन में कहा था कि उसके माता-पिता और दादा-दादी सभी हिंदू आदि द्रविड़ समुदाय से संबंध रखते हैं. उसने यह भी बताया कि शादी के बाद उसका पति उसके मायके में ही रहता रहा है. इस मामले में केंद्र सरकार के पुराने अधिसूचनाओं का भी जिक्र किया गया. 5 मार्च 1964 और 17 फरवरी 2002 को जारी राष्ट्रपति अधिसूचनाओं और गृह मंत्रालय के निर्देशों के अनुसार, किसी व्यक्ति की जाति का निर्धारण मुख्य रूप से पिता की जाति और उसके निवास स्थान के आधार पर किया जाता रहा है. पिता से ही तय होती थी बच्चों की जाति सुप्रीम कोर्ट पहले भी इस सिद्धांत को कई मामलों में स्वीकार कर चुका है कि बच्चे की जाति का निर्धारण सामान्य रूप से पिता की जाति के आधार पर होगा. वर्ष 2003 में ‘पुनित राय बनाम दिनेश चौधरी’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आरक्षण से जुड़े मामलों में जाति निर्धारण का निर्णायक आधार पिता की जाति होगी और परंपरागत हिंदू कानून के तहत संतान पिता से ही अपनी जाति प्राप्त करती है, न कि मां से. हालांकि, 2012 में आए ‘रमेशभाई दबाई नाइका बनाम गुजरात सरकार’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस सिद्धांत को कुछ हद तक लचीला बनाया था. उस फैसले में अदालत ने कहा था कि अंतरजातीय विवाह या आदिवासी और गैर-आदिवासी विवाह से जन्मे बच्चे की जाति का निर्धारण केवल पिता की जाति के आधार पर यांत्रिक तरीके से नहीं किया जा सकता. उस फैसले में यह भी कहा गया था कि ऐसे मामलों में यह अनुमान जरूर लगाया जा सकता है कि बच्चा पिता की जाति से जुड़ा होगा, लेकिन यह अनुमान अंतिम और अटल नहीं है. पहले क्या था जाति निर्धारण का नियम? सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले में यह भी साफ किया था कि अगर बच्चा यह साबित कर दे कि उसका पालन-पोषण अनुसूचित जाति या जनजाति से जुड़ी मां के सामाजिक परिवेश में हुआ है और उसे जीवन में वही सामाजिक भेदभाव, अपमान और वंचनाएं झेलनी पड़ी हैं, जो उस समुदाय के अन्य लोगों को झेलनी पड़ती हैं, तो उसे उस समुदाय से संबंधित माना जा सकता है. अब ताजा फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बच्ची के हितों को सर्वोपरि मानते हुए मां की जाति के आधार पर एससी प्रमाणपत्र जारी करने की अनुमति दे दी है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया है कि जाति निर्धारण से जुड़े बड़े कानूनी सवालों पर अंतिम फैसला बाद में किया जाएगा. इस फैसले के बाद देशभर में जाति प्रमाणपत्र, आरक्षण और अंतरजातीय विवाह से जुड़े अधिकारों को लेकर एक नई बहस छिड़ने की संभावना है. कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भविष्य में अदालत मां की जाति को भी निर्णायक आधार मानने की दिशा में जाती है, तो इससे सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.