samacharsecretary.com

कजाकिस्तान ने चुना अब्राहम समझौता: 33 साल से इजरायल से संबंध, अब क्यों हो रहा साझेदारी?

तेल अवीव अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा ऐलान किया है. उन्होंने कहा कि कजाकिस्तान अब्राहम समझौते में शामिल हो गया है. यह ट्रंप के दूसरे कार्यकाल का पहला ऐसा कदम है. लेकिन सवाल यह है कि आखिर यह समझौता क्या है, कजाकिस्तान क्यों इसमें आ रहा है, और इससे मिडिल ईस्ट या दुनिया में क्या बदलाव आएगा? आइए समझते हैं. अब्राहम समझौता क्या है? अब्राहम समझौता ट्रंप के पहले कार्यकाल की बड़ी कामयाबी है. यह 2020 में शुरू हुआ था. इसका नाम अब्राहम से आया है, जो यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्मों के पैगंबर माने जाते हैं. यह समझौता इजरायल और कुछ मुस्लिम देशों के बीच दोस्ती से जुड़ा है. इससे पहले, इजरायल और कई अरब देशों के बीच दुश्मनी थी. लेकिन इस समझौते से वे देश इजरायल को आधिकारिक तौर पर मान्यता देने लगे. दूतावास खोले, व्यापार बढ़ाया, पर्यटन शुरू किया. अभी तक इसमें संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन, मोरक्को और सूडान शामिल हैं. इन देशों ने इजरायल के साथ पूर्ण संबंध बनाए. सूडान इकलौता ऐसा देश है, जिसने दूतावास नहीं खोला. ट्रंप इसे अपनी विदेश नीति की सबसे बड़ी सफलता मानते हैं. लेकिन गाजा युद्ध के बाद यह समझौता थोड़ा ठंडा पड़ गया था. अब ट्रंप इसे फिर से जिंदा करना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि मध्य एशिया का मुस्लिम बहुल देश कजाखस्तान ऐसा पहला देश होगा, जो उनके दूसरे कार्यकाल में अब्राहम अकॉर्ड का हिस्सा बनेगा। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ पर इस संबंध में पोस्ट करके जानकारी दी। उन्होंने कहा कि मैंने कजाखस्तान के राष्ट्रपति कासम-जोमार्ट तोकायेव से बात की है। इसके अलावा इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू से भी इस संबंध में बात की है। उन्होंने कहा कि हम दुनिया में शांति स्थापित करना चाहते हैं और उसके लिए ये संबंध अहम हैं। इसी के तहत अब्राहम अकॉर्ड अहम है और सभी इसके साथ जुड़कर शांति एवं समृद्धि को बढ़ावा देना चाहते हैं। डोनाल्ड ट्रंप का दावा- कुछ और मुसलमान देश हैं लाइन में डोनाल्ड ट्रंप ने यह दावा भी किया कि अभी इस अकॉर्ड से कुछ और देश भी जुड़ने के लिए कतार में हैं। उन्होंने कहा कि हम जल्दी ही एक सेरेमनी का ऐलान करेंगे, जिसमें कजाखस्तान अब्राहम अकॉर्ड का हिस्सा बनेगा। हमें उम्मीद है कि जल्दी ही दुनिया में एकता, विकास और समृद्धि को बढ़ावा देने के लिए कुछ और देश भी साथ आएंगे। बता दें कि इस अकॉर्ड से सीरिया के भी जुड़ने की संभावनाएं जताई जा रही हैं। यह इजरायल का पड़ोसी देश है और यदि सीरिया साथ आया तो यह बड़ा बदलाव होगा। खासतौर पर मध्य पूर्व एशिया में शांति और स्थिरता के लिहाज से यह अहम होगा। यही नहीं मुस्लिम देशों की एकता के लिए भी यह देखने लायक होगा। इजरायल के साथ कजाखस्तान के हैं पुराने रिश्ते, अब क्या बदलेगा बता दें कि कजाखस्तान के पहले से ही इजरायल से रिश्ते रहे हैं। कभी सोवियत संघ का हिस्सा रहे कजाखस्तान ने 1992 में इजरायल के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित किए थे। ट्रंप का मानना है कि मुसलमान देशों को साथ लाने से गाजा में भी शांति व्यवस्था स्थापित करने में मदद मिलेगी। ऐसा इसलिए क्योंकि गाजा में इजरायली हमलों के खिलाफ मुसलमान देश एकजुट रहे हैं। कजाखस्तान भी मुस्लिम बहुल देश, पर क्यों नहीं है कट्टरता कज़ाखस्तान की आबादी लगभग 2 करोड़ है और यह क्षेत्रफल की दृष्टि से दुनिया के सबसे बड़े देशों में से एक है। हालांकि इसकी अधिकांश आबादी मुस्लिम है, लेकिन यह आधिकारिक तौर पर इस्लामिक देश नहीं है। जैसा बहरीन, मोरक्को और संयुक्त अरब अमीरात के साथ है, जिन्होंने 2020 में अब्राहम अकॉर्ड में शामिल होने का फैसला लिया था। यही नहीं कजाखस्तान को अपेक्षाकृत उदारवादी देश माना जाता है। अन्य इस्लामिक देशों के मुकाबले सोवियत से अलग होने वाले मुल्क मुस्लिम बहुल तो हैं, लेकिन कट्टरता वहां नहीं है। कजाकिस्तान का क्या संबंध है? कजाकिस्तान मध्य एशिया का एक बड़ा देश है. यहां की आबादी का 70 फीसदी मुस्लिम है. लेकिन अब्राहम समझौते पर अगर यह देश हस्ताक्षर करता है तो भी ये कुछ नया नहीं होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि कजाकिस्तान के 1992 से ही इजरायल के साथ अच्छे संबंध रखे हैं. वहां दूतावास हैं, व्यापार होता है, कोई दुश्मनी नहीं. ऐसे में यह कदम नया संबंध बनाने का नहीं, बल्कि पुराने को मजबूत करने का है. ट्रंप ने कहा कि उन्होंने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट टोकायेव से फोन पर बात की. टोकायेव गुरुवार को व्हाइट हाउस में ट्रंप से मिले थे, क्योंकि वहां सेंट्रल एशिया के पांच देशों के नेताओं का समिट था. टोकायेव ने कहा, ‘यह हमारे देश की नीति का प्राकृतिक हिस्सा है. हम संवाद, सम्मान और स्थिरता चाहते हैं.’ एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप ने इसे ‘शक्ति का क्लब’ कहा और बोले, ‘यह पहला देश है, कई और आएंगे.’ कजाकिस्तान अब क्यों करेगा समझौता?     न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक कजाकिस्तान के राष्ट्रपति टोकायेव का कहना है कि इससे इजरायल के साथ व्यापार और सहयोग बढ़ेगा.     कजाकिस्तान के पास यूरेनियम और दुर्लभ खनिजों के बड़े भंडार हैं. गुरुवार को कजाकिस्तान ने महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में अमेरिकी सरकार के साथ एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग पर हस्ताक्षर किया. इसमें कजाकिस्तानका भी हित है. वह नहीं चाहता कि चीन और रूस के बीच फंसा रहे.     कजाकिस्तान अमेरिका को खुश करके निवेश और तकनीक हासिल करना चाहता है. इसका एक उदाहरण भी दिखा जब कजाकिस्तान के राष्ट्रपति ने ट्रंप के सामने उनकी तारीफ की. उन्होंने कहा, ‘आप एक महान राजनेता हैं जिन्हें अमेरिका की नीति में सामान्य ज्ञान और परंपराओं को वापस लाने के लिए स्वर्ग से भेजा गया है.’     ट्रंप के लिए यह राजनीतिक जीत है. गाजा युद्ध के बाद इजरायल दुनिया में अकेला पड़ गया था. ट्रंप पहले भी कह चुके हैं, ‘मेरा लक्ष्य इजरायल को फिर से मजबूत बनाना है.’ किसको क्या फायदा होगा?     ट्रंप कार्यकाल का यह पहला समझौता होगा. ऐसे में इजरायल की दुनिया में साख बढ़ेगी. दूसरे मुस्लिम देशों से समर्थन की भी उम्मीद है.     कजाकिस्तान अमेरिका के कहने पर यह समझौता करेगा. ऐसे में अमेरिका से आर्थिक मदद, इजरायल … Read more

सिख नेता स्वर्णजीत सिंह खालसा की बड़ी सफलता, नॉर्विच (कनेक्टिकट) के मेयर चुने गए

 वॉशिंगटन भारतीय मूल के मुसलमान जोरहान ममदानी के अमेरिकी शहर न्यूयॉर्क का मेयर चुने जाने की दुनिया भर में चर्चा है। इस बीच भारतीय मूल के ही एक सिख नेता स्वर्णजीत सिंह खालसा ने भी बड़ी सफलता पाई है। वह अमेरिकी प्रांत कनेक्टिकट के शहर नॉर्विच के मेयर चुने गए हैं। वह पहले सिख नेता हैं, जिन्हें अमेरिका के इस प्रांत के किसी शहर में यह जिम्मेदारी मिली है। खालसा ने रिपब्लिक कैंडिडेट पीटर नैस्ट्रॉम को हराकर सफलता हासिल की है। अहम बात यह है कि नॉर्विच में सिर्फ 10 परिवार ही हैं और उसके बाद भी खालसा को जीत मिलना दिलचस्प है। स्वर्णजीत सिंह खालसा 40 वर्षीय अमृतधारी सिख हैं और मूल रूप से उनका परिवार पंजाब के जालंधर का रहने वाला है। उनका परिवार दिल्ली से लेकर पंजाब तक पंथिक मामलों से लेकर राजनीति तक में ऐक्टिव रहा है। उन्होंने अमेरिका में राजनीतिक जीवन की शुरुआत तब की, जब 9/11 के आतंकी हमलों के बाद सिखों को भी उनकी वेश-भूषा के चलते टारगेट किया गया। हेट क्राइम का भी सामना करना पड़ा। स्वर्णजीत सिंह खालसा ने एक लंबा कैंपेन चलाया था कि कैसे सिख समुदाय की एक अलग पहचान है। इसके बाद वह स्थानीय मसले भी उठाने लगे और धीरे-धीरे अमेरिका के नॉर्विच शहर में एक लोकप्रिय चेहरा बन गए। FBI ने भी किया था स्वर्णजीत सिंह खालसा का सम्मान उनकी ओर से लगातार प्रयास किए गए कि नॉर्विच समेत अमेरिका में सहिष्णुता और सामुदायिक भावना को प्रोत्साहित किया जाए। उनके प्रयासों का परिणाम था कि अमेरिकी एजेंसी एफबीआई की ओर से 2017 में उन्हें कम्युनिटी लीडरशिप अवॉर्ड मिला था। कुल 56 लोगों को ये सम्मान मिले थे, जिनमें से वह अकेले भारतीय थे। उनका मुख्य प्रयास यह था कि अमेरिकियों को बताया जाए कि सिखों की एक अलग पहचान है। वे वैसे नहीं हैं, जैसी इमेज उनके बारे में है। खासतौर पर दाढ़ी और पगड़ी के चलते उनके बारे में पूर्वाग्रह रखने वाले लोगों को उन्होंने जागरूक किया। जालंधर के कॉलेज से पढ़े और फिर स्टडी वीजा पर गए थे अमेरिका स्वर्णजीत सिंह खालसा के पिता परमिंदर पाल सिख इंटरनेशल सोसायटी में हैं। उन्होंने बेटे की सफलता का जिक्र सोशल मीडिया पर भी किया है। परमिंदर ने बताया कि उनके बेटे ने जालंधर के डीएवी इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई की थी। इसके बाद वह स्टडी वीजा पर अमेरिका चले गए थे। अमेरिका में ही स्वर्णजीत सिंह ने कंप्यूटर इंजीनियरिंग में मास्टर्स की डिग्री हासिल की थी। वहीं पर उन्होंने लुधियाना की ही रहने वाली सिख युवती से विवाह किया था। फिलहाल वह नॉर्विच में कंस्ट्रक्शन का बिजनेस करते हैं। वह जिस नॉर्विच शहर में रहते हैं, वह अमेरिका के उन शहरों में से एक है, जहां लोगों की प्रति व्यक्ति आय काफी ज्यादा है।

महिला क्रिकेट की सफलता के बाद, अब महिला कुश्ती पर भी ध्यान: प्रो रेसलिंग लीग भविष्य को नए सिरे से परिभाषित करने के लिए तैयार

“पिच से लेकर मैट तक – भारत की महिलाएं खेल सशक्तिकरण के एक नए युग की पटकथा लिख रही हैं।” नई दिल्ली जब पूरा देश भारतीय महिला क्रिकेट टीम की ऐतिहासिक वर्ल्ड कप जीत का जश्न मना रहा है, उसी समय एक और खेल चर्चा में आने को तैयार है- महिला कुश्ती। क्रिकेट की इस बड़ी जीत से कुछ दिन पहले ही, प्रो रेसलिंग लीग (PWL) की वापसी की आधिकारिक घोषणा नई दिल्ली में एक शानदार प्रेस कॉन्फ्रेंस में की गई। यह लीग जनवरी 2026 से शुरू होगी। इन दोनों उपलब्धियों ने मिलकर भारतीय खेलों में एक नया दौर शुरू किया है, जहाँ महिला खिलाड़ी अब हर मैदान पर देश की शान बढ़ा रही हैं और सफलता की नई कहानियाँ लिख रही हैं। प्रो रेसलिंग लीग 2026: एक नई शुरुआत फिर से शुरू हो रही प्रो रेसलिंग लीग (PWL) एक बार फिर कुश्ती को चर्चा के केंद्र में लाने जा रही है। यह लीग अब और भी आधुनिक, पेशेवर और महिला-पुरुष दोनों खिलाड़ियों के लिए समान अवसरों वाली होगी। भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) के सहयोग से यह लीग आईपीएल जैसी फ्रेंचाइज़ी प्रणाली पर आधारित होगी, जिसमें भारत के साथ-साथ विदेशी पहलवान भी मुकाबला करेंगे। लॉन्च के दौरान डब्ल्यूएफआई के प्रवक्ता ने कहा, “पीडब्ल्यूएल की वापसी सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं है, बल्कि यह भारत की महिला पहलवानों को दुनिया के मंच पर अपनी पहचान बनाने का मौका देगी। हमारी महिला क्रिकेट टीम की शानदार सफलता के बाद, अब कुश्ती भारत की खेल क्रांति का अगला अध्याय लिखने के लिए तैयार है।” महिलाओं की भागीदारी पर विशेष ध्यान PWL 2026 की सबसे खास बात यह है कि यह लीग महिला खिलाड़ियों की भागीदारी और नेतृत्व को बढ़ावा देने पर खास ध्यान देगी। यह पहल महिलाओं को न सिर्फ पहलवानी के अखाड़े में, बल्कि खेल के हर स्तर पर आगे बढ़ने का अवसर देगी। लीग आयोजकों ने यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्धता जताई है: हर टीम में महिला खिलाड़ियों को बराबर प्रतिनिधित्व मिलेगा। महिला मुकाबलों का प्रसारण प्राइम टाइम में किया जाएगा, ताकि उनकी लोकप्रियता और दर्शक संख्या बढ़े। उभरती हुई पहलवानों को अनुभवी चैंपियनों से जोड़ा जाएगा, ताकि वे उनसे सीख सकें और आगे बढ़ें। महिला खिलाड़ियों को बराबर इनामी राशि और स्पॉन्सरशिप के अवसर दिए जाएंगे। यह पहल भारत में खेलों में लैंगिक समानता (gender parity) की बढ़ती भावना को मजबूती देती है और देशभर की युवा लड़कियों के लिए कुश्ती को एक प्रेरणादायक करियर विकल्प के रूप में स्थापित करने का लक्ष्य रखती है। पीडब्ल्यूएल के सीईओ अखिल गुप्ता ने कहा, “प्रो रेसलिंग लीग की वापसी सिर्फ एक खेल को फिर से शुरू करने की बात नहीं है, यह एक सपने को दोबारा जगाने की कोशिश है। हमारी महिला पहलवानों में वो काबिलियत, हौसला और जुनून है कि वे दुनिया के किसी भी मंच पर डटकर खड़ी हो सकती हैं। बराबर के अवसर और बेहतर पहचान के साथ, हम ऐसा भविष्य बना रहे हैं जहाँ कुश्ती हर लड़की को यह विश्वास दिलाए कि वह भी कर सकती है। यह सिर्फ एक लीग नहीं, बल्कि भारत में ताकत और बहनचारे का आंदोलन है।” क्रिकेट की प्रेरणा, कुश्ती का अवसर भारतीय महिला क्रिकेट टीम की विश्व कप जीत ने प्रशंसकों और प्रायोजकों की नज़र में महिला खिलाड़ियों की छवि को एक नई पहचान दी है। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि यह जोश अब महिला कुश्ती तक भी पहुँचेगा, जिससे प्रो रेसलिंग लीग (PWL) में कॉरपोरेट निवेश, विज्ञापन और दर्शकों की बढ़ती दिलचस्पी के नए अवसर खुलेंगे। पहले से ही भारत के पास साक्षी मलिक, अंतिम पंघाल और विनेश फोगाट जैसी विश्वस्तरीय पहलवान हैं। ऐसे में PWL देश में कुश्ती के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हो सकती है — जो इस पारंपरिक ग्रामीण खेल को बदलकर राष्ट्रीय स्तर का प्राइम-टाइम खेल बना देगी। जमीनी स्तर पर सशक्तिकरण और व्यापक दृष्टिकोण पीडब्ल्यूएल के पुनरुद्धार का मकसद सिर्फ खेल को दोबारा लोकप्रिय बनाना नहीं, बल्कि उसका विकासात्मक लक्ष्य भी है। हरियाणा, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की ट्रेनिंग अकादमियाँ अब युवा महिला पहलवानों को खोजने और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए विशेष कार्यक्रम शुरू कर रही हैं। इसी के साथ, सरकारी योजनाएँ और सीएसआर समर्थित खेल संस्थान मिलकर कोचिंग, पोषण और अंतरराष्ट्रीय अनुभव के लिए संसाधनों का विस्तार कर रहे हैं। यह दोहरा प्रयास – पेशेवर मंच और जमीनी विकास, भारत में कुश्ती को पेरिस 2028 ओलंपिक और आने वाले वर्षों में पदक की सबसे बड़ी उम्मीदों में बदलने की दिशा में एक मजबूत कदम है। निष्कर्ष: एक नए खेल समुदाय का उदय जब भारत अपनी महिला क्रिकेट टीम की जीत की खुशी मना रहा है, उसी समय प्रो रेसलिंग लीग 2026 की वापसी एक और प्रेरणादायक शुरुआत लेकर आई है। यह सिर्फ एक लीग नहीं, बल्कि एक आंदोलन है, जो भारत की महिला खिलाड़ियों की ताकत, समानता और नए अवसरों का प्रतीक है। मैदान से लेकर अखाड़े तक, भारत की बेटियाँ अब सिर्फ खेल नहीं रही हैं, बल्कि भारतीय खेलों की तस्वीर हमेशा के लिए बदल रही हैं।  

चिकन नेक क्षेत्र में भारत का नया गढ़, पड़ोसी देशों की रणनीति पर टिकी निगाह

नईदिल्ली  भारत ने बांग्लादेश के साथ अपनी संवेदनशील और लंबी सीमा पर सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। भारत ने शुक्रवार को तीन नई सैन्य छावनियों (गैरीसन) का उद्घाटन किया है। ये छावनियां असम के धुबरी के पास बामुनी, बिहार के किशनगंज, और पश्चिम बंगाल के चोपड़ा में स्थित हैं। ये तीनों गढ़ अब पूरी तरह से ऑपरेशनल हैं। इन्हें भारतीय सेना व सीमा सुरक्षा बल (BSF) के लिए फोर्स मल्टीप्लायर यानी शक्ति में बढ़ोत्तरी माना जा रहा है। इन नई छावनियों का उद्देश्य 4096 किलोमीटर लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा में मौजूद रणनीतिक कमजोरियों को दूर करना और किसी भी संभावित घुसपैठ या आपात स्थिति में तेजी से जवाब देने की क्षमता बढ़ाना है। चिकन नेक पर नजर इस कदम का एक अहम भू-राजनीतिक पहलू भी है। उत्तर बंगाल का सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत की पूर्वोत्तर दिशा में एकमात्र जमीनी कड़ी है। इसे सामरिक हलकों में चिकन नेक कहा जाता है। मात्र 22 किलोमीटर चौड़ी यह पट्टी देश के आठ पूर्वोत्तर राज्यों को मुख्य भूमि भारत से जोड़ती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कभी यह कॉरिडोर दुश्मन के निशाने पर आया, तो भारत के 4.5 करोड़ से अधिक नागरिकों वाले पूरे उत्तर-पूर्वी क्षेत्र पर संकट मंडरा सकता है। इसीलिए नई छावनियों का निर्माण भारतीय सैन्य लॉजिस्टिक और आर्थिक संपर्क को सुरक्षित रखने के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। नई दिल्ली की रणनीतिक तैयारी रक्षा सूत्रों के अनुसार, इन छावनियों के साथ भारत ने सीमा पर आधुनिक उपकरणों, सड़क नेटवर्क और निगरानी प्रणालियों की तैनाती भी बढ़ा दी है। यह सब भारत की बॉर्डर मॉडर्नाइजेशन ड्राइव के तहत किया जा रहा है। एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने कहा कि नई छावनियां न केवल हमारी तैनाती को मजबूत करेंगी बल्कि घुसपैठ या बाहरी गतिविधियों पर तुरंत प्रतिक्रिया देने में भी मददगार होंगी। ढाका-रावलपिंडी समीकरण पर नजर इस सामरिक सुदृढ़ीकरण की टाइमिंग भी बेहद अहम मानी जा रही है। कुछ ही हफ्ते पहले, बांग्लादेश के अंतरिम मुख्य सलाहकार प्रो. मोहम्मद यूनुस ने पाकिस्तान के शीर्ष सैन्य अधिकारियों की मेजबानी की थी। पाकिस्तान के ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के अध्यक्ष जनरल साहिर शामशाद मिर्जा ने ढाका पहुंचकर यूनुस से उनके जमुना निवास पर मुलाकात की। दोनों के बीच क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और द्विपक्षीय सहयोग पर चर्चा हुई। हालांकि, भारतीय सुरक्षा हलकों में इस मुलाकात को सिर्फ कूटनीतिक औपचारिकता से कहीं अधिक माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, ढाका और रावलपिंडी के बीच ऐसे और संवाद आने वाले हफ्तों में जारी रह सकते हैं, जिससे दिल्ली की सतर्कता और बढ़ गई है। भविष्य की तैयारी भारत की ओर से सीमा पर नए गढ़ों का निर्माण न केवल सुरक्षा दृष्टिकोण से बल्कि राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम स्पष्ट करता है कि भारत अपने पूर्वी मोर्चे पर किसी भी भू-राजनीतिक अस्थिरता या पड़ोसी देशों के बदलते समीकरणों को लेकर चुपचाप लेकिन सख्त तैयारी में जुटा हुआ है।

Fitment Factor बढ़ने की तैयारी: 2026 से सरकारी कर्मचारियों की बल्ले-बल्ले

नई दिल्ली केंद्र सरकार के लाखों कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए खुशखबरी आई है। लंबे इंतज़ार के बाद आखिरकार आठवें वेतन आयोग का गठन औपचारिक रूप से कर दिया गया है। यह आयोग सरकारी कर्मचारियों के वेतन, पेंशन, भत्ते और अन्य वित्तीय लाभों की समीक्षा करेगा और ज़रूरी सुधारों की सिफारिश केंद्र को सौंपेगा। इस फैसले से करीब 1 करोड़ से अधिक कर्मचारियों और पेंशनर्स को सीधा फायदा पहुंचने की संभावना है। आयोग का काम क्या होगा? सरकार ने आयोग के साथ उसका टर्म्स ऑफ रेफरेंस (ToR) भी जारी किया है। इसके तहत आयोग को कई अहम जिम्मेदारियां दी गई हैं — मौजूदा वेतन ढांचे, सेवा शर्तों और रिटायरमेंट लाभों की गहन समीक्षा करना। देश की आर्थिक स्थिति, मुद्रास्फीति (महंगाई) और विकास दर को ध्यान में रखते हुए वेतन और पेंशन में संशोधन के सुझाव देना। सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ और कर्मचारियों की आय — दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना। हर 10 साल में सरकार नया वेतन आयोग गठित करती है ताकि कर्मचारियों की आय को महंगाई और आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप समायोजित किया जा सके। कब लागू होंगे नए वेतन नियम? पिछला, यानी सातवां वेतन आयोग, 1 जनवरी 2016 से प्रभावी हुआ था। उसी क्रम में माना जा रहा है कि आठवें वेतन आयोग की सिफारिशें 1 जनवरी 2026 से लागू हो सकती हैं। सरकार ने आयोग को 18 महीने का समय दिया है ताकि वह सभी मंत्रालयों, विभागों और कर्मचारी संगठनों से विचार-विमर्श कर रिपोर्ट सौंप सके। अगर रिपोर्ट में देरी होती है, तो कर्मचारियों को एरियर (arrears) के रूप में बढ़ा हुआ वेतन मिल सकता है। कितना बढ़ेगा वेतन और पेंशन? कर्मचारियों के लिए सबसे अहम रहेगा फिटमेंट फैक्टर (Fitment Factor) — यानी पुराने वेतन से नए वेतन में कितनी गुना बढ़ोतरी होगी। सातवें वेतन आयोग में यह 2.57 था। जानकारों का अनुमान है कि इस बार यह 2.8 से 3.0 के बीच रह सकता है। अगर ऐसा होता है तो कर्मचारियों के बेसिक पे (Basic Pay) में उल्लेखनीय इज़ाफा देखा जा सकता है। इसके साथ ही, महंगाई भत्ता (DA), मकान किराया भत्ता (HRA) और अन्य Allowances में भी बदलाव संभव है, जिससे पेंशनर्स को भी सीधा लाभ मिलेगा। क्यों अहम है यह फैसला? सरकार का उद्देश्य है कि वेतन वृद्धि आर्थिक रूप से टिकाऊ हो — यानी न तो सरकारी बजट पर असंतुलित दबाव पड़े और न ही कर्मचारियों की वास्तविक आय घटे। 8वां वेतन आयोग इसलिए खास है क्योंकि यह एक ऐसे दौर में आ रहा है जब महंगाई दर बढ़ रही है, और सरकारी कर्मचारियों के लिए यह राहत भरी खबर साबित हो सकती है।  

FASTag से जुड़ा बड़ा अपडेट: अब Toll पर ये गलती पड़ी तो तुरंत भरना पड़ेगा Fine!

नई दिल्ली अगर आपकी कार का FASTag टोल प्लाजा पर स्कैन नहीं हो रहा या “इनवैलिड टैग” दिखा रहा है, तो परेशान होने की जरूरत नहीं है। हाल ही में ऐसे कई वाहन चालकों को समस्या का सामना करना पड़ा है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने अब इस स्थिति को देखते हुए FASTag से जुड़ा एक नया नियम लागू किया है। क्या है FASTag KYV प्रक्रिया? FASTag KYV यानी “Know Your Vehicle Verification” एक नई वेरिफिकेशन प्रक्रिया है जिसे NHAI ने अनिवार्य किया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हर FASTag उसी वाहन पर इस्तेमाल हो जिसके लिए उसे जारी किया गया है — ताकि गलत टैग या फर्जीवाड़े की घटनाओं को रोका जा सके। इस प्रक्रिया में वाहन मालिक को यह साबित करना होता है कि उसका FASTag सही वाहन पर लगा है। इसके लिए गाड़ी के रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट (RC) और वाहन की फोटो अपलोड करनी होती है। FASTag KYV में हुए नए बदलाव कई यूज़र्स की शिकायतों के बाद NHAI ने इस प्रक्रिया को आसान बना दिया है। अब नियमों में कुछ बड़े बदलाव किए गए हैं: ➤ अब पहले की तरह कई फोटो अपलोड नहीं करनी होंगी — केवल एक फ्रंट फोटो काफी है, जिसमें नंबर प्लेट और FASTag स्टिकर साफ दिखाई दें। ➤ वाहन नंबर दर्ज करते ही सिस्टम अपने आप Vahan डेटाबेस से RC की जानकारी ले आएगा। ➤ अगर वेरिफिकेशन अधूरा रह जाए, तो FASTag तुरंत बंद नहीं होगा, बल्कि NHAI वाहन मालिक को SMS रिमाइंडर भेजेगा। ➤ अगर एक मोबाइल नंबर पर कई FASTag रजिस्टर्ड हैं, तो अब आप खुद चुन सकते हैं कि किस वाहन का KYV पहले पूरा करना है। ➤ दस्तावेज़ अपलोड में दिक्कत आने पर बैंक या FASTag जारी करने वाला संस्थान सीधे ग्राहक से संपर्क करेगा। FASTag KYV करने का आसान तरीका ➤ अगर आपका FASTag काम नहीं कर रहा है, तो नीचे दिए स्टेप्स फॉलो करें ➤ सबसे पहले जाएं — https://fastag.ihmcl.com अपने रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर से लॉगिन करें। ➤ वाहन की फ्रंट फोटो अपलोड करें, जिसमें नंबर प्लेट और विंडशील्ड पर लगा FASTag साफ दिखे। ➤ सिस्टम अपने आप RC की डिटेल्स भर देगा — उन्हें चेक करें और सबमिट करें। ➤ अगर टैग सही वाहन पर है और उसका गलत इस्तेमाल नहीं हो रहा, तो FASTag दोबारा एक्टिवेट हो जाएगा। क्यों जरूरी है यह वेरिफिकेशन? NHAI के अनुसार, हाल में कई मामलों में पाया गया कि कुछ लोग एक वाहन का FASTag दूसरे वाहन में इस्तेमाल कर रहे थे। इससे न केवल टैग सिस्टम का दुरुपयोग हो रहा था, बल्कि टोल कलेक्शन की पारदर्शिता पर भी असर पड़ रहा था। इसलिए अब यह KYV प्रक्रिया अनिवार्य कर दी गई है ताकि हर वाहन की पहचान और उसका टैग एक-दूसरे से लिंक रहे।  

नई कृषि क्रांति की तैयारी – ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से होगी स्मार्ट खेती

नई दिल्ली.  भारत में कृषि अब सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि तकनीक का संगम बन चुकी है. एग्री-टेक यानी कृषि प्रौद्योगिकी ने किसानों की मेहनत को आधुनिक साधनों से जोड़कर खेती को लाभकारी बना दिया है. ड्रोन से लेकर सेंसर्स, डेटा एनालिटिक्स और मोबाइल ऐप्स तक- हर स्तर पर तकनीक का असर दिखने लगा है. अब किसान मौसम की सटीक जानकारी, मिट्टी की गुणवत्ता और फसल की पैदावार का अनुमान डिजिटल साधनों से कर पा रहे हैं. इससे न सिर्फ उत्पादकता बढ़ रही है, बल्कि लागत में भी बड़ी कमी आई है. केंद्र सरकार की योजना परवान चढ़ी तो देश में कृषि अब हल-बैल से नहीं, ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ), रोबोट और बीजों की जीन एडिटिंग से चलेगी। पानी की बर्बादी शून्य होगी और भरपूर पैदावार से अन्नदाता किसान की आय मौजूदा स्तर से दोगुनी हो सकती है। नीति आयोग ने अगले पांच साल के लिए देश में खेती का रोडमैप जारी करते हुए यह सपना दिखाया है जो सच भी हो सकता है। नीति आयोग ने रोडमैप के रूप में विजन डॉक्यूमेंट ‘रीइमैजिनिंग एग्रीकल्चर : रोडमैप फॉर फ्रंटियर टेक्नोलॉजी लेड ट्रांसफॉर्मेशन’ तैयार किया है। इस डॉक्यूमेंट में कृषि में 100 प्रतिशत आत्मनिर्भता लाने के लिए ऐसी तकनीकों को चुना है, जिसके जरिए देश की कृषि में क्रांतिकारी बदलाव आने की उम्मीद है। ये तकनीकें क्लाइमेट चेंज, पानी की कमी, मिट्टी की थकान और बाजार की अनिश्चितता को खत्म करने में मददगार बनेगी। रोडमैप पर प्रभावी अमल से अगले 5 साल में देश मेें कृषि लागत 40 प्रतिशत घटने का अनुमान जताया गया है। कृषि लागत को ही किसानों की खुशहाली और खेती को लाभकारी बनाने में सबसे बड़ी बाधा माना जाता है। रोडमैप से कृषि उत्पादन में 60 प्रतिशत बढ़ोतरी होगी। स्मार्ट फार्मिंग: खेतों से जुड़ी स्मार्ट सोच ‘स्मार्ट फार्मिंग’ अब भारतीय गांवों में तेजी से लोकप्रिय हो रही है. यह तकनीक खेती के हर चरण में वैज्ञानिक नजरिया अपनाने पर आधारित है. उदाहरण के लिए, ड्रोन के जरिए फसलों पर छिड़काव से समय और पानी दोनों की बचत होती है. वहीं, सेंसर से मिट्टी की नमी और पोषक तत्वों की निगरानी कर किसान तय कर सकते हैं कि किस समय कितनी सिंचाई या खाद की जरूरत है. कई स्टार्टअप्स किसानों को मोबाइल ऐप्स के माध्यम से बाजार भाव, बीज चयन, और फसल बीमा की जानकारी भी दे रहे हैं. इससे किसान पहले से ज्यादा आत्मनिर्भर और जागरूक हो रहे हैं. डिजिटल एग्रीकल्चर से नए अवसर सरकार और निजी कंपनियां मिलकर ‘डिजिटल एग्रीकल्चर’ को तेजी से बढ़ावा दे रही हैं. प्रधानमंत्री किसान ड्रोन योजना, डिजिटल किसान पोर्टल, और ई-नाम (राष्ट्रीय कृषि बाजार) जैसी पहलों ने किसानों के लिए तकनीक को सुलभ बना दिया है. आज किसान अपने स्मार्टफोन से सीधे मंडियों से जुड़ सकते हैं और बिचौलियों से बचकर बेहतर दाम पा सकते हैं. इसके अलावा, सैटेलाइट इमेजिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी तकनीकें फसलों की स्थिति पर नज़र रखती हैं और समय रहते चेतावनी भी देती हैं. इससे फसल नुकसान की संभावना काफी घट गई है. आधुनिक तकनीक से आत्मनिर्भर किसान एग्री-टेक ने भारतीय कृषि को नई दिशा दी है. जहां पहले खेती को जोखिम भरा माना जाता था, वहीं अब यह इनोवेशन और उद्यमिता का क्षेत्र बन चुका है. युवा किसान अब पारंपरिक खेती के साथ-साथ जैविक, हाइड्रोपोनिक और प्रिसिशन फार्मिंग जैसी तकनीकों को अपना रहे हैं. इससे न केवल उनकी आमदनी बढ़ रही है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी मजबूत हो रही है. भारत धीरे-धीरे ‘स्मार्ट एग्रीकल्चर इकोनॉमी’ की ओर बढ़ रहा है, जहां तकनीक और परंपरा मिलकर एक स्थायी कृषि भविष्य की नींव रख रहे हैं. संक्षेप में भारत में एग्री-टेक सिर्फ खेती का आधुनिकीकरण नहीं, बल्कि किसानों की जिंदगी में नई उम्मीदों की बुआई है. तकनीक ने साबित कर दिया है कि अगर सही जानकारी और संसाधन मिलें, तो खेत भी डिजिटल इंडिया की ताकत बन सकते हैं. फ्रंटियर टेक्नोलॉजी : खेत से लैब तक ड्रोन फार्मिंग : एक घंटे में 50 एकड़ पर कीटनाशक छिड़काव, 80% दवा बचत। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस व मशीन लर्निंग (एआइ/एमएल): मौसम, कीट, बीमारी का 100% सटीक पूर्वानुमान। इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आइओटी) : मिट्टी की नमी, पीएच, पोषक तत्व 24 घंटे सातों दिवस मोबाइल पर। सैटेलाइट इमेजरी : बादल पार कर फसल की लाइव तस्वीर, सूखा-बाढ़ अलर्ट। ब्लॉकचेन : बीज से बाजार तक पारदर्शी चेन, नकली खाद-बीज खत्म। रोबोटिक्स : बुवाई, निराई, कटाई सब ऑटोमैटिक, मजदूरों की कमी दूर। जीन एडिटिंग (सीआरआइएसपीआर ) : 2 साल में सूखा, कीट, नमक रोधी नई किस्में। प्रिसिजन फार्मिंग : हर पौधे को अलग खाद-पानी, 30% लागत में होगी बचत। वर्टिकल फार्मिंग : शहरों में की छतों पर 10 मंजिला खेत, 1 एकड़ यानी 10 एकड़ यील्ड पर फॉर्मिंग। हाइड्रोपोनिक्स : बिना मिट्टी, 90 प्रतिशत कम पानी, साल भर फसल। एरोपोनिक्स : हवा में उगाएं सब्जी, पानी की बूंद भी न बर्बाद। बिग डेटा एनालिटिक्स : हर गांव, हर फसल का अलग ‘डिजिटल फॉर्मूला’। साल दर साल ऐसे कदम वर्ष –लक्ष्य — यह होगा 2026- पायलट प्रोजेक्ट – 10 राज्यों में ड्रोन एआइ हब, 1 लाख एकड़ कवर 2027- डिजिटल पहुंच – 50 प्रतिशत किसानों को मुफ्त ऐप, सैटेलाइट डेटा, आइओटी किट मिलेंगे 2028 –ग्लोबल मार्केट- ब्लॉक चेन से सीधे निर्यात, 10 लाख टन ऑर्गेनिक 2029—रोबोट क्रांति-— 500 रुपए /दिन रोबोट किराया, 50,000 यूनिट डिप्लॉय 2030—स्मार्ट विलेज-–हर गांव में ‘डिजिटल खेत’, आय दोगुनी की गारंटी किसानो को ऐसे लाभ आय: 1 एकड़ में गेहूं से मौजूदा 25,000 रुपए से बढ़कर 2030 में 70,000 रुपए लागत कम: 40% कम होगी (खाद-पानी-दवा) उत्पादन बढ़ेगा : 60% बढ़ेगा पानी बचत : 90% (हाइड्रो/एरोपोनिक्स) बाजार उपलब्धता: 100% (ब्लॉकचेन) फंडिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर : कृषि-टेक फंड : 50,000 करोड़ रुपए ड्रोन दीदी : 1 लाख महिलाओं को ट्रेनिंग। एआइ लैब: हर जिले में 1 एआइ लैब बनेगी। फ्री स्मार्टफोन: 10 करोड़ किसानों को रोबोट बैंक: 1 लाख यूनिट रेंट पर खुलेगा। सब साथ आएंगे होंगे सफल यह यात्रा अकेले सरकार की नहीं है। यह तभी सफल होगी जब किसान, वैज्ञानिक, उद्यमी, निवेशक और नीति-निर्माता एक साथ आएं। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि तकनीक केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित न रहे, बल्कि खेतों तक पहुंचे। जहां यह वास्तव में बदलाव ला सकें। यह रोडमैप ऐसे भविष्य का एक आह्वान है, जहां भारत … Read more

खोई हुई जिंदगी वापस मिली: आतंकियों से आजाद हुए बंधक ने बताई परेशान कर देने वाली आपबीती

तेल अवीव उन्होंने मेरे सारे कपड़े, मेरा अंडरवियर, सब कुछ उतार दिया. जब मैं पूरी तरह से नंगा हो गया तब…. यह कहते हुए 21 साल के शख्स की आवाज धीमी हो गई. वह थोड़ा संभले फिर बोले कि जब एक पुरुष बंधक के तौर पर मैं बिना भोजन और पानी के मर रहा था. मैंने ईश्वर से प्रार्थना की थी – मुझे बचा लो, मुझे इस संकट से बाहर निकालो. रोम ब्रास्लास्की हाल ही में हमास के चंगुल से आजाद हुए हैं. वह पहले पुरुष इजरायली बंधक हैं जिन्होंने खुलकर आरोप लगाया है कि गाजा में बंदी रहते हुए उनका यौन उत्पीड़न किया गया.   7 अक्टूबर को उस इवेंट पर हमले के समय जब उन्हें अगवा किया गया, वह सिक्योरिटी गार्ड के तौर पर काम कर रहे थे. एक इंटरव्यू में उन्होंने फिलस्तीनी इस्लामिक जिहाद की ओर से बंधक बनाए जाने के बाद अपने साथ हुई आपबीती साझा की है. सीएनएन ने फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद से इस रिपोर्ट पर संपर्क करने की कोशिश की लेकिन आतंकी संगठन की ओर से कोई जानकारी नहीं मिल पाई. इससे पहले सोसना नाम की युवती ने आरोप लगाया था कि जब वह हमास की बंधक थी तो गार्ड ने बंदूक की नोक पर उसका यौन शोषण किया.  अब ब्रास्लास्की ने कहा है कि वह निश्चित रूप से यौन शोषण था. उन्होंने कहा कि मेरे साथ जो हुआ, वो यौन हिंसा थी और इसका मकसद मुझे अपमानित करना था. वे मेरे आत्मसम्मान पर हमला करना चाहते थे और उन्होंने वही किया. इस इंटरव्यू को पिछले हफ्ते ही रिकॉर्ड किया गया है. यह वीडियो सोशल मीडिया पर आ गया है जिसे कई इजरायली शेयर कर रहे हैं.  वह कहते हैं कि मेरे लिए उस टाइम के बारे में बात करना काफी मुश्किल है. ब्रास्लास्की उन आखिरी 20 जीवित बंधकों में से एक हैं जिन्हें इजरायल और हमास के बीच युद्धविराम समझौते के तहत दो साल से ज्यादा समय कैद में रहने के बाद पिछले महीने रिहा किया गया. उन्हें फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद संगठन ने बंधक बना रखा था, जो गाजा में हमास से संबद्ध एक फिलिस्तीनी आतंकी समूह है. खाने के बदले धर्म बदलने को कहा हमास के आतंकियों ने इस साल की शुरुआत में काफी कमजोर हो चुके ब्रास्लास्की का वीडियो जारी किया था. तस्वीर देखकर भावुक पिता ने कहा था कि वह अपने बेटे को पहचान नहीं पा रहे हैं. उनकी मां ने इजरायली मीडिया को बताया है कि उस पर खाना खाने (खाना देने) के बदले इस्लाम धर्म अपनाने का दबाव डाला गया था. मैं नर्क में रहा यौन उत्पीड़न पर ब्रास्लास्की ने कहा कि यह एक भयावह घटना थी. आप बस ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि यह रुक जाए. और जब मैं वहां था तो हर दिन, पिटाई… मैं खुद से कहता था कि मैं नर्क में एक दिन और जी चुका हूं. कल सुबह, मैं एक और नर्क में जागूंगा. कुछ और बंधकों ने आरोप लगाया है कि हमास की कैद में उनके साथ यौन उत्पीड़न या दुर्व्यवहार किया गया. हालांकि हमास की तरफ से इसका खंडन किया जाता रहा है. नया खुलासा इसलिए चौंकाता है क्योंकि अब तक, केवल महिला बंधक ही आगे आई थी, पहली बार किसी पुरुष ने यह आरोप लगाया है.  

150 साल पूरे होने पर वंदे मातरम का भव्य आयोजन, पीएम की मौजूदगी में उठा इस्लाम से जुड़ा मुद्दा

 नई दिल्ली भारत के राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के 150 साल पूरे हो रहे हैं। इस मौके पर केंद्र सरकार ने देश भर के 150 स्थानों पर आयोजन का फैसला लिया है। इसके तहत सामूहिक रूप से वंदे मातरम गाया जाएगा। यही नहीं सभी आयोजनों में मुख्य अतिथि के तौर पर कोई वरिष्ठ नेता, मंत्री या अधिकारी भी शामिल होगा। खुद पीएम नरेंद्र मोदी शुक्रवार को दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में ऐसे ही एक कार्यक्रम में भाग लेंगे। संस्कृति मंत्रालय के अनुसार, ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री हिस्सा लेंगे। इस बीच जम्मू-कश्मीर में इन आयोजनों को लेकर इस्लाम वाला सवाल उठ गया है। मीरवाइज उमर फारूक के नेतृत्व वाले मुत्ताहिदा मजलिस-ए-उलेमा ने केंद्र शासित प्रदेश की सरकार पर सवाल उठाए हैं। सरकार ने सभी स्कूलों को यह आदेश दिए जाने पर आपत्ति जताई है कि वे वंदे मातरम पर संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम करें। इस्लामिक संस्था का कहना है कि वंदे मातरम के आयोजन में शामिल होने के लिए कहना गैर-इस्लामी है। यह मुस्लिम बहुल इलाके पर आरएसएस की हिंदुत्व वाली विचारधारा को थोपने का प्रयास है। बता दें कि 7 नवंबर को होने वाले आयोजनों में स्कूली बच्चों, कॉलेज के छात्रों, अधिकारियों, निर्वाचित प्रतिनिधियों, पुलिसकर्मियों और डॉक्टरों सहित नागरिकों की भागीदारी रहेगी। इन आयोजनों में वंदे मातरम का सामूहिक गान होगा। अधिकारियों ने बताया कि दिल्ली में होने वाले उद्घाटन समारोह में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम, वंदे मातरम के 150 वर्षों के इतिहास पर एक प्रदर्शनी, एक लघु वृत्तचित्र फिल्म का प्रदर्शन और एक स्मारक डाक टिकट और सिक्का जारी किया जाएगा। भाजपा भी इस उपलब्धि को एक उत्सव के रूप में मनाने की योजना बना रही है। नई दिल्ली में पार्टी मुख्यालय में भाजपा के महासचिव तरुण चुघ ने कहा, 'इस अवसर को मनाने के लिए सात नवंबर से 26 नवंबर (संविधान दिवस) तक देश भर में कई कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। ’ इन प्रमुख स्थानों पर भी होगा वंदे मातरम का गायन उन्होंने बताया कि सात नवंबर को 150 महत्वपूर्ण स्थानों पर वंदे मातरम गाया जाएगा, जिसके बाद स्वदेशी उत्पादों के उपयोग की शपथ ली जाएगी। इस दौरान कविता लेखन, पाठन और चित्रकला जैसे कई अन्य कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे। जिन स्थानों पर सात नवंबर को वंदे मातरम का गायन आयोजित किया जाएगा उनमें कारगिल युद्ध स्मारक, अंडमान और निकोबार सेलुलर जेल, ओडिशा का स्वराज आश्रम, आगरा में शहीद स्मारक पार्क और वाराणसी में नमो घाट शामिल हैं। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव ने कहा कि वंदे मातरम अंग्रेजों से भारत की मुक्ति के लिए एक प्रमुख मंत्र के रूप में उभरा। क्या है इस्लाम वाली दलील और जम्मू-कश्मीर से सरकार से क्या अपील संस्कृति मंत्रालय के अनुसार ऐसा माना जाता है कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इस गीत की रचना सात नवंबर 1875 को अक्षय नवमी के अवसर पर की थी। मातृभूमि की वंदना में गाए गए इस गीत को 1950 में राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया गया था। वहीं मुत्ताहिदा मजलिस-ए-उलेमा ने एक लेटर लिखकर जम्मू-कश्मीर की सरकार और एलजी से मांग की है कि वंदे मातरम के आयोजन में भाग लेने की अनिवार्यता खत्म की जाए। ऐसा करना गैर-इस्लामिक है और हिंदुत्व की विचारधारा को थोपने वाला है।

रूसी कंपनियों पर US प्रतिबंध विफल, भारत कर रहा है फीडस्टॉक की बड़ी खरीद: अलीपोव

नई दिल्ली  अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और रूस के बीच तेल व्यापार रोकने की भरपूर कोशिश की है, फिर चाहे वह रूसी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाना हो या फिर भारत के ऊपर टैरिफ के जरिए दबाव बनाना। इस बीच भारत में रूसी राजदूत डेनिस अलीपोव ने कहा है कि मॉस्को की दो सबसे बड़ी तेल कंपनियों पर अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद भारत 'भारी मात्रा में' फीडस्टॉक खरीद रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कई बार इस बात का दावा किया है कि भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया या कम कर दिया है। हालांकि, भारत ने इन दावों से इनकार किया। बता दें, हाल ही में अमेरिका ने दो रूसी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध भी लगाए हैं। वहीं, रूसी मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में, अलीपोव ने कहा कि अक्टूबर 2025 के अनुमान के अनुसार, भारत द्वारा रूसी फीडस्टॉक की खरीद लगभग 1.75 मिलियन बैरल प्रतिदिन के स्तर पर ही रहेगी। अलीपोव ने आगे कहा, "यह आंकड़ा पहले भी उछला था, अब भी उछल रहा है। कुछ महीनों में ज्यादा और कुछ में कम, औसतन लगभग उसी स्तर पर रहा है।" पिछले महीने, ट्रंप ने रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर मॉस्को की सबसे बड़ी तेल कंपनियों, रोसनेफ्ट और लुकोइल, पर प्रतिबंधों की घोषणा की थी। प्रतिबंधों की घोषणा करते समय स्कॉट बेसेंट ने कहा था, "अब समय आ गया है कि हत्याएं रोकी जाएं और तत्काल युद्धविराम किया जाए।" अमेरिका का कहना है कि रूस व्यापार से मिलने वाले पैसों का इस्तेमाल यूक्रेन के खिलाफ हमले करने में खर्च करता है। ऐसे में आर्थिक रूप से रूस को तोड़ने की कोशिशों में ट्रंप सरकार लगातार दबाव बनाने की कोशिश कर रही है। भारत में सूरजमुखी के तेल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। पिछले चार वर्षों में रूसी सूरजमुखी तेल की आपूर्ति यूक्रेन की तुलना में भारत में बारह गुना ज्यादा हो गई है। 2022 में रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध छिड़ने के बाद से, कीव का सूरजमुखी तेल निर्यात बड़े पैमाने पर यूरोप की ओर मुड़ गया है। इससे रूस को भारत के विशाल बाजार में प्रवेश करने का मौका मिला है।