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गैस सिलेंडर महंगा होने पर सियासत तेज, विपक्ष बोला- गलत नीतियों की मार झेल रही जनता

नई दिल्ली पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। विभिन्न दलों के नेताओं ने केंद्र सरकार की नीतियों, बढ़ती महंगाई और देश की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से बात करते हुए पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध पर चिंता जताते हुए कहा कि किसी भी हालत में युद्ध रुकना चाहिए। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय तनाव का सीधा असर भारत पर पड़ रहा है और ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का असर व्यापक है। सरकार ने एलपीजी के दाम बढ़ा दिए हैं और इसकी वजह से आम जनता पर अतिरिक्त बोझ पड़ा है। सरकार की गलत विदेश नीति के कारण देश को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। वहीं, शिवसेना (यूबीटी) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने संसद में प्रधानमंत्री के बयान की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अगर प्रधानमंत्री देश की मौजूदा स्थिति और संभावित चुनौतियों पर खुलकर बोलते हैं, तो जनता को सही जानकारी मिल सकेगी और भ्रम की स्थिति खत्म हो जाएगी। आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई सीसीएस बैठक पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह बैठक पहले क्यों नहीं की गई और सरकार ने समय रहते कदम क्यों नहीं उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि अन्य देशों ने ईरान से बातचीत कर अपने जहाज सुरक्षित निकाल लिए, लेकिन भारत ने ऐसा नहीं किया, जिससे देश को खतरे में डाला गया। समाजवादी पार्टी के सांसद राजीव राय ने भी सरकार को घेरते हुए कहा कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इज़रायल भेजे गए भारतीय छात्र फिलहाल कहां हैं और उनकी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जा रही है। साथ ही, उन्होंने कच्चे तेल की कीमतों में पहले आई गिरावट के दौरान राहत न देने और अब कीमतें बढ़ाने पर सवाल उठाए। इसी बीच आप सांसद राघव चड्ढा ने कहा, "आज जीरो आवर के दौरान मैंने एक अहम मुद्दा उठाया, जो देश के सभी मोबाइल फोन यूजर्स से जुड़ा है। जब हम अपने प्लान रिचार्ज करवाते हैं, तो हमें रोजाना के लिए एक तय डेटा लिमिट मिलती है, जैसे कि 1.5 जीबी, 2 जीबी या 3 जीबी प्रति दिन मिलती है। जब आधी रात बीत जाती है, तो जो डेटा इस्तेमाल नहीं हुआ है, उसे आगे बढ़ाकर अगले दिन की डेटा लिमिट में जोड़ दिया जाना चाहिए।" सांसद राघव चड्ढा ने कहा, "मैंने लगातार नागरिक उड्डयन से जुड़े मुद्दे उठाए हैं। मेरा मकसद हमेशा यही रहा है कि आम आदमी के लिए हवाई यात्रा आरामदायक और किफायती हो। यह इतनी महंगी न हो जाए कि लोग हवाई यात्रा ही न कर पाएं। हम एयरलाइन टिकट की कीमतों से जुड़ी समस्याओं को लगातार देख रहे हैं।"

ओवैसी और हुमायूं कबीर की जोड़ी, ममता बनर्जी के लिए चुनौती बनेगी?

कलकत्ता हुमायूं कबीर ने एक बार खुद को पश्चिम बंगाल का असदुद्दीन ओवैसी बताया था. मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनवाने को लेकर चर्चा और विवादों में आए हुमायूं कबीर अब पश्चिम बंगाल में AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव लड़ने जा रहे हैं – ईद के मौके पर दोनों तरफ से यह बात कंफर्म की गई है।   हैदराबाद में असदुद्दीन ओवैसी और मुर्शिदाबाद में हुमायूं कबीर ने प्रस्तावित चुनावी गठबंधन का ऐलान किया. असदुद्दीन ओवैसी 25 मार्च को कोलकाता में हुमायूं कबीर के साथ एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में औपचारिक घोषणा और चुनावी गठबंधन की रूपरेखा पेश करेंगे।  तृणमूल कांग्रेस से सस्पेंड किए जाने के बाद हुमायूं कबीर ने दिसंबर, 2025 में अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बनाई थी. आम जनता उन्नयन पार्टी. और, अपनी पार्टी बनाने से पहले ही हुमायूं कबीर ने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के साथ मिलकर चुनाव लड़ने और ममता बनर्जी के सामने कड़ी चुनौती पेश करने का ऐलान कर दिया था।  तब AIMIM प्रवक्ता सैयद असीम वकार के बयान को लेकर काफी कंफ्यूजन हुआ था, लेकिन बाद में AIMIM के पश्चिम बंगाल अध्यक्ष इमरान सोलंकी ने प्रवक्ता के बयान से किनारा कर लिया था. हुमायूं कबीर पर गंभीर आरोप लगाते हुए सैयद असीम वकार ने ऐसी किसी भी संभावना से साफ इनकार कर दिया था. सैयद असीम वकार ने हुमायूं कबीर को बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी का करीबी बताया, और हुमायूं कबीर को शुभेंदु अधिकारी के पॉलिटिकल सिस्टम का हिस्सा बताया था. सैयद असीम वकार का कहना था, कबीर के साथ जाने का सवाल ही नहीं उठता… उनके प्रस्ताव हमारी विचारधारा से बिल्कुल मेल नहीं खाते।  AIMIM के पश्चिम बंगाल अध्यक्ष इमरान सोलंकी ने हुमायूं कबीर के साथ बातचीत होने का दावा किया. सैयद असीम वकार के बयान की याद दिलाने पर इमरान सोलंकी ने कहा था, ‘हां, हम जानते हैं कि वकार ने क्या कहा था, लेकिन फिलहाल यह पार्टी का आधिकारिक रुख नहीं है।  बंगाल में ओवैसी और हुमायूं कबीर साथ साथ पश्चिम बंगाल में हुमायूं कबीर की प्रस्तावित बाबरी मस्जिद मैदान पर पहली बार ईद की नमाज अदा की गई. इस मौके पर बीरभूम, नदिया और पूर्वी मेदिनीपुर जैसे जिलों के अलावा झारखंड से भी काफी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग मुर्शिदाबाद पहुंचे थे।  ईद की नमाज का आयोजन करने के बावजूद 'आम जनता उन्नयन पार्टी' के संस्थापक हुमायूं कबीर व्यस्त होने के कारण व्यक्तिगत रूप से मौजूदगी नहीं दर्ज करा सके. हुमायूं कबीर ने फोन पर वहां जुटी भीड़ के बीच अपनी बात रखी – और उसी दौरान ऐलान किया कि आम जनता उन्नयन पार्टी विधानसभा की 182 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. हुमायूं कबीर ने यह भी बताया कि आम जनता उन्नयन पार्टी और AIMIM के बीच गठबंधन हुआ है, और  AIMIM आठ सीटों पर चुनाव लड़ेगी।  उधर, हैदराबाद में ईद के मौके पर ही एक कार्यक्रम में असदुद्दीन ओवैसी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को टार्गेट करते हुए हुमायूं कबीर के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है. असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, हमारी कोशिश है कि AIMIM को मजबूत किया जाए, हमारी आवाज को मजबूत किया जाए. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार है, वहां 30 फीसदी मुसलमानों की आबादी है… वहां लगभग पांच लाख पिछड़े वर्ग के प्रमाण पत्रों को रद्द कर दिया गया, जिनमें मुसलमान भी शामिल हैं… ये लोग धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वोट हासिल करते हैं लेकिन जहां AIMIM हिस्सेदारी की बात करती है तो इन्हें तकलीफ होती है।  ममता बनर्जी को कठघरे में खड़ा करते हुए असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, ‘अन्याय की कई कहानियां हैं।  भवानीपुर और नंदीग्राम पर भी हुमायूं कबीर की नजर हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी ने भवानीपुर विधानसभा सीट पर पूनम बेगम को उम्मीदवार बनाया है. भवानीपुर से ही ममता बनर्जी फिलहाल विधायक हैं, और बीजेपी ने उनके खिलाफ विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी को टिकट दिया।  काउंटर स्ट्रैटेजी के तहत तृणमूल कांग्रेस ने नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी के ही करीबी पबित्र कर को उम्मीदवार बनाया है. शुभेंदु अधिकारी फिलहाल नंदीग्राम से ही विधायक हैं. और, भवानीपुर के साथ साथ नंदीग्राम से भी चुनाव मैदान में हैं।  भवानीपुर के साथ साथ हुमायूं कबीर ने नंदीग्राम में आम जनता उन्नयन पार्टी की तरफ से शाहिदुल हक को उम्मीदवार बनाया है. इस तरह भवानीपुर और नंदीग्राम दोनों हाई प्रोफाइल सीटों पर तीनों पार्टियां मैदान में डट गई हैं।  हुमायूं कबीर खुद मुर्शिदाबाद जिले की रेजिनगर और नौदा सीटों से विधानसभा का चुनाव लड़ने जा रहे हैं. ध्यान देने वाली बात है कि हुमायूं कबीर ने अपनी भरतपुर सीट छोड़ दी है, जहां से फिलहाल विधायक हैं।  पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए आम जनता उन्नयन पार्टी का घोषणापत्र 28 मार्च को सामने आएगा. यानी असदुद्दीन ओवैसी के साथ गठबंधन की औपचारिक घोषणा के तीन दिन बाद. पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे, और वोटों की गिनती 4 मई को होगी।  बंगाल के मुस्लिम वोटर और तृणमूल कांग्रेस 2011 की जनगणना के मुताबिक तो पश्चिम बंगाल की आबादी में मुसलमानों की संख्या करीब 27 फीसदी है, लेकिन असदुद्दीन ओवैसी और कुछ रिपोर्टों की मानें, तो फिलहाल यह 30 फीसदी के आस पास है. पश्चिम बंगाल के मालदा, मुर्शिदाबाद, बीरभूम, उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर और दक्षिण बंगाल के कई हिस्सों में मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका में माने जाते हैं।  2020 के बिहार चुनाव में AIMIM के 5 सीटें जीत लेने के बाद असदुद्दीन ओवैसी को पश्चिम बंगाल चुनाव में भी वैसी ही उम्मीद थी, लेकिन निराशा हाथ लगी. सीट तो एक भी नहीं मिली, वोट शेयर भी मामूली ही रहा – अब हुमायूं कबीर के मैदान में आ जाने के बाद अगर असदुद्दीन ओवैसी मिलकर कोई असर दिखा पाएं, तो चमत्कार ही कहा जाएगा।  बाद में जो भी हो, बाकी राजनीतिक दलों की तरह हुमायूं कबीर का दावा है कि देश की आजादी के बाद, पहली बार पश्चिम बंगाल में शासन की बागडोर एक मुस्लिम मुख्यमंत्री के हाथों में होगी, या फिर मुस्लिम समुदाय से डिप्टी सीएम होगा।  ममता बनर्जी का क्या बिगाड़ पाएंगे? हुमायूं कबीर को लगता है कि मुर्शिदाबाद में नई बाबरी मस्जिद के निर्माण का प्रस्ताव भावनात्मक मुद्दा है, और पश्चिम बंगाल … Read more

भवानीपुर सीट का सफर: कभी कांग्रेस का किला, आज ममता बनर्जी का मजबूत गढ़

कोलकाता पश्चिम बंगाल की राजनीति के लगातार बदलते परिदृश्य में भवानीपुर जैसी कुछ ही सीटें हैं, जिनके साथ इतिहास और प्रतीकात्मक महत्व इतनी गहराई से जुड़ा हुआ है। यह केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि वह राजनीतिक सफर है जो राज्य में कांग्रेस के लंबे प्रभुत्व से लेकर तृणमूल कांग्रेस के उभार तक के बदलाव को साफ तौर पर दर्शाता है। आज मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का राजनीतिक गढ़ मानी जाने वाली भवानीपुर सीट हमेशा से तृणमूल कांग्रेस की पहचान नहीं रही। आजादी के बाद दशकों तक दक्षिण कोलकाता की यह सीट कांग्रेस का मजबूत गढ़ थी और राज्य के कई प्रभावशाली नेताओं का राजनीतिक आधार रही। जब बदल गया था नाम पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने इस सीट से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में और बाद में निर्दलीय के तौर पर चुनाव जीता। कांग्रेस के अन्य दिग्गज नेताओं जैसे मीरा दत्ता गुप्ता और रथिन तालुकदार ने भी इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया, जिससे भवानीपुर कांग्रेस का प्रमुख शहरी गढ़ बन गया। कई वर्षों तक यह सीट कांग्रेस के प्रभाव में रही, जबकि वामपंथी दल उस समय केवल 1969 में थोड़े समय के लिए यहां जीत हासिल कर सके, जब इस सीट का नाम बदलकर कालीघाट विधानसभा क्षेत्र कर दिया गया था। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेता साधन गुप्ता ने बांग्ला कांग्रेस और माकपा की संयुक्त मोर्चा की दूसरी सरकार के दौरान यह सीट जीती। वह 1953 में भारत के पहले दृष्टिहीन सांसद बने थे। चुनावी नक्शे से भी हुई थी गायब भवानीपुर की राजनीतिक यात्रा ने तब अप्रत्याशित मोड़ ले लिया जब यह सीट 1972 में परिसीमन के बाद चुनावी नक्शे से ही गायब हो गयी। लगभग चार दशकों तक यह सीट केवल राजनीतिक स्मृतियों में ही बनी रही। जब 2011 के परिसीमन के दौरान यह सीट दोबारा अस्तित्व में आयी, तब पश्चिम बंगाल की राजनीति भी बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही थी। उसी वर्ष वाम मोर्चा के 34 साल के शासन का अंत हुआ और ममता बनर्जी का दौर शुरू हुआ। नए सिरे से बनी भवानीपुर सीट जल्द ही तृणमूल के उभार से जुड़ गई। बनर्जी ने 2011 के पहले चुनाव में अपने करीबी सहयोगी सुब्रत बक्शी को इस सीट से उम्मीदवार बनाया। बक्शी ने 64 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल कर माकपा के नारायण जैन को करीब 50,000 वोट से हराया और भवानीपुर को तृणमूल का मजबूत गढ़ बना दिया। ममता बनर्जी का यहां से पहला चुनाव इसके बाद बक्शी ने सीट छोड़ दी ताकि तृणमूल की भारी जीत के बाद मुख्यमंत्री बनीं ममता बनर्जी उपचुनाव के जरिए विधानसभा में प्रवेश कर सकें। बनर्जी ने करीब 77 प्रतिशत वोट हासिल कर माकपा की नंदिनी मुखर्जी को 54,000 से अधिक मतों से हराया और भवानीपुर में अपना मजबूत राजनीतिक आधार स्थापित किया। तब से यह सीट तृणमूल के कब्जे में बनी हुई है। कोलकाता के महापौर और मंत्री फिरहाद हाकिम ने कहाकि भवानीपुर हमारे लिए सिर्फ एक सीट नहीं है। यह वह जगह है जहां लोगों ने ममता बनर्जी की विकास और समावेश की राजनीति पर बार-बार भरोसा जताया है। कई हाई-प्रोफाइल मुकाबले वर्षों से भवानीपुर में कई हाई-प्रोफाइल मुकाबले हुए, लेकिन नतीजा नहीं बदला। 2016 के विधानसभा चुनाव में वाम दलों और कांग्रेस ने गठबंधन कर वरिष्ठ कांग्रेस नेता दीपा दासमुंशी को बनर्जी के खिलाफ उतारा। इस मुकाबले को ‘दीदी बनाम बौदी’ के रूप में पेश किया गया। बनर्जी ने 65,520 वोट हासिल कर दासमुंशी (40,219 वोट) को आसानी से हराया। भाजपा के चंद्र कुमार बोस तीसरे स्थान पर रहे, जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिवार से ताल्लुक रखते हैं। जब ममता ने छोड़ा भवानीपुर पांच साल बाद 2021 के विधानसभा चुनाव में बनर्जी ने नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का फैसला किया, जहां उनका मुकाबला उनके पूर्व सहयोगी शुभेंदु अधिकारी से हुआ। भवानीपुर से तृणमूल ने शोवनदेव चट्टोपाध्याय को उम्मीदवार बनाया, जबकि भाजपा ने अभिनेता रुद्रनील घोष को मैदान में उतारा। घोष को 44,786 वोट मिले, जो इस सीट पर किसी विपक्षी उम्मीदवार को अब तक मिले सबसे ज्यादा वोट थे लेकिन वह 28,000 से अधिक वोटों से हार गए। उसी साल यह सीट और अधिक महत्वपूर्ण हो गई। नंदीग्राम में अधिकारी से 1,956 वोटों से हारने के बाद ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री बने रहने के लिए उपचुनाव जीतना जरूरी था। एक बार फिर भवानीपुर केंद्र में आया। चट्टोपाध्याय ने सीट खाली की और बनर्जी ने भाजपा की प्रियंका टिबरेवाल के खिलाफ उपचुनाव लड़ा। बनर्जी ने 58,000 से अधिक वोटों के अंतर और लगभग 72 प्रतिशत मतों के साथ जीत हासिल की, जिससे भवानीपुर उनकी सबसे भरोसेमंद सीट के रूप में स्थापित हो गया। इसी इलाके में ममता का निवास भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र मुख्यतः कोलकाता नगर निगम के वार्डों से बना है जो दक्षिण कोलकाता की सामाजिक विविधता को दर्शाता है। यहां बंगाली मध्यमवर्गीय इलाकों के साथ बड़ी संख्या में हिंदी भाषी व्यापारी समुदाय भी रहते हैं। इस क्षेत्र में प्रसिद्ध कालीघाट मंदिर भी स्थित है, जो कोलकाता के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है और यहीं ममता बनर्जी का निवास भी है। अनुमान के अनुसार, यहां लगभग 42 फीसदी वोटर बंगाली हिंदू, 34 फीसदी गैर-बंगाली हिंदू और करीब 24 फीसदी मुस्लिम हैं। दिलचस्प होगा ममता बनाम शुभेंदु का मुकाबला राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सामाजिक मिश्रण ममता बनर्जी की शहरी जनवादी राजनीति के अनुकूल रहा है। राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती ने कहाकि भवानीपुर दक्षिण कोलकाता की बहुसांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है। ममता बनर्जी ने यहां समुदायों से परे एक व्यक्तिगत जुड़ाव बनाया है।

पंजाब सरकार चलाने के आरोपों पर बोले संजय सिंह—क्या उन्हें हक नहीं कि…?

नई दिल्ली आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल के पंजाब सरकार चलाने के भारतीय जनता पार्टी के आरोपों का 'आप' नेता संजय सिंह ने खुलकर जवाब दिया है। उन्होंने कहा है कि केजरीवाल पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक हैं। क्या उन्हें इतना हक नहीं है कि वह लोगों की भलाई के लिए अपने सुझाव दें। संजय सिंह ने कहा, ये ऐसे आरोप है जिसका कोई सिर पैर नहीं है। संजय सिंह ने कहा, ये बातें इसलिए की जाती हैं, ताकी अरविंद केजरीवाल जाना बंद कर दें और हम अपना काम करना बंद कर दें और आसानी से पार्टी को हराया जा सके। उन्होंने कहा, हम जा रहे हैं तो क्या गलती हो गई। अगर वहां मोहल्ला क्लिनिक बन रहा है। 30 सालों से जिन नहरों में पानी नहीं आया था, वहां पानी आ गया। 300 यूनिट बिजली फ्री मिल रही है पंजाब के लोगों को। इसमें गलती क्या है। केजरीवाल के साथ कई लोग पंजाब में लगे हुए हैं- संजय सिंह तो क्या अरविंद केजरीवाल वाकई वहां सब संभाल रहे है, इस सवाल पर संजय सिंह ने कहा, केजरीवाल खुले आम जा रहे हैं। जो जिम्मेदारी उनकी राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर बनती है, उसेस 100 फीसदी ज्यादा निभाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे पंजाब के लोगों का फायदा हो रहा है। क्या एक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को ये सलाह देने का हक नहीं है कि राज्य में अच्छी व्यवस्था दीजिए। जब उनसे पूछा गया कि क्या इन कामों के लिए सीएम नहीं है तो उन्होंने कहा, बिल्कुल है और वह कर रहे हैं। इन सब कामों में 100 गुना ताकत लगनी चाहिए। केजरीवाल के साथ और कई लोग वहां लगे हुए हैं। संजय सिंह ने कहा, अगर एक राज्य ने आपको इतना बड़ा बहुमत दिया है तो पूरी पार्टी की जिम्मेदारी है कि वहां अच्छे से काम हो। भगवंत मान की सरकार अच्छा काम कर रही है और पूरी पार्टी के लीडर की जिम्मेदारी है कि वह मदद करें।

मध्य प्रदेश राजनीति: मंत्रियों ने छोड़ी जिलों की जिम्मेदारी? भोपाल में ही जुट रहा कोर ग्रुप

भोपाल जिलों में आम लोगों व कार्यकर्ताओं के लिए मंत्रियों की उपलब्धता सहज रहे और प्रशासनिक कार्य भी ठीक से संचालित हों, इसके लिए सरकार द्वारा बनाई प्रभारी मंत्रियों की व्यवस्था पर मंत्री ही पानी फेर रहे हैं। प्रभारी मंत्रियों ने अपने जिलों से दूरी बना रखी है। यही नहीं, संगठन की दृष्टि से मंत्रियों को जिले के कोर ग्रुप के साथ प्रतिमाह बैठक करने के निर्देश दिए गए थे, इसके विपरीत प्रभारी मंत्री भोपाल में जिलों से सभी पदाधिकारियों को बुलाकर बैठकें करने लगे हैं। मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल ने 17 मार्च को भिंड जिला और उदय प्रताप सिंह ने 16 मार्च को कटनी जिला कोर ग्रुप की बैठक भोपाल में ले ली थी। मंत्रियों को प्रभार के जिले में रात्रि विश्राम के निर्देश दिए गए हैं। प्रहलाद सिंह पटेल अपने प्रभार के जिले में केवल दो रात ही रुके। उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा अपने प्रभार के जिले जबलपुर और राजेंद्र शुक्ल ने शहडोल में दो बैठकें ही लीं और दो रात ही रुके। सार यही है कि न तो मंत्री प्रभार के जिलों में नियमित रात्रि विश्राम करते हैं और न ही जनता से संवाद के लिए आसानी से उपलब्ध रहते हैं। इससे पार्टी कार्यकर्ता व आमजन मंत्रियों के कामकाज को लेकर संतुष्ट नहीं है। केवल मुख्यमंत्री ही प्रभार के जिले में सक्रिय मुख्यमंत्री मोहन यादव ही अपने प्रभार के जिले इंदौर में सक्रिय रहते हैं, हर सप्ताह वह इंदौर की जनता के लिए उपलब्ध भी हो जाते हैं लेकिन मंत्रियों की कार्यशैली उनसे ठीक उलट है। समय का अभाव था इसलिए भोपाल में कर ली बैठक 17 मार्च को आवश्यक कार्य की वजह से, समयाभाव के कारण मैंने भिंड जिला कोर ग्रुप की बैठक भोपाल में ही ले ली थी। वैसे मैं अपने प्रभार के जिले में सबसे अधिक समय देता हूं और आमजन के लिए उपलब्ध रहता हूं। मेरे पास रीवा का भी प्रभार है। वहां पिछले माह ही बैठक की थी। प्रहलाद सिंह पटेल, प्रभारी मंत्री, भिंड व रीवा   वैसे कोर ग्रुप की बैठक जिले में होती है, लेकिन उस दिन कृषि महोत्सव के कार्यक्रम में हम सब भोपाल में ही थे इसलिए मंत्री जी के साथ उनके बंगले पर ही बैठक कर ली। यह रूटीन बैठक है, हर माह जिले में होती है। – दीपक टंडन सोनी, भाजपा जिला अध्यक्ष, कटनी    मंत्री जी भोपाल में थे और हम भी भोपाल आए हुए थे इसलिए कोर ग्रुप की बैठक वहीं कर ली, वैसे जिले में ही नियमित बैठक होती है। -देवेंद्र नरवरिया, भाजपा जिला अध्यक्ष, भिंड मंत्रियों के दौरे और बैठकों की यह स्थिति धारः प्रभारी मंत्री कैलाश विजयवर्गीय। आखिरी दौरा 11 जनवरी। केवल 'जी राम जी' योजना के लिए मीडिया से चर्चा की। देवासः प्रभारी मंत्री जगदीश देवड़ा। आखिरी दौरा आठ जनवरी, पार्टी कार्यक्रम में। कोर ग्रुप बना है लेकिन बैठक अब तक नहीं हुई। 23 मार्च को बैठक संभावित। नीमचः प्रभारी मंत्री निर्मला भूरिया। आखिरी दौरा 14 मार्च। 26 जनवरी से अब तक करीब तीन बार आ चुकी हैं। कोर ग्रुप की बैठक ली। मंदसौरः प्रभारी मंत्री निर्मला भूरिया। सात दिन पहले आई थीं, कोर ग्रुप की बैठक हुई। एक बार रात्रि विश्राम किया है। बुरहानपुरः प्रभारी मंत्री तुलसीराम सिलावट (जल संसाधन मंत्री)। बीते दो माह में चार बार दौरा। आठ जनवरी, 26 जनवरी, 14 फरवरी और 15 मार्च। खरगोनः प्रभारी मंत्री विश्वास सारंग। आखिरी दौरा 26 जनवरी, गणतंत्र दिवस पर। कोर ग्रुप की बैठक लंबे समय से नहीं हुई। रतलामः प्रभारी मंत्री विजय शाह। आखिरी दौरा 14 दिसंबर, 2025। छिंदवाड़ा : प्रभारी मंत्री राकेश सिंह। पिछले माह आए थे। भाजपा कोर ग्रुप के साथ बैठक ली। जिला प्रशासन की बैठक ली थी। बालाघाट : प्रभारी मंत्री उदय प्रताप सिंह। एक हफ्ते पूर्व आए थे। जिला प्रशासन और पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ बैठक की थी। सिवनी : प्रभारी मंत्री करण सिंह वर्मा। 15 मार्च को आए थे, पार्टी के कोर ग्रुप की बैठक ली। मंडला : प्रभारी मंत्री दिलीप जायसवाल। इसी सप्ताह एक धार्मिक कार्यक्रम में आए थे। डिंडौरी : प्रभारी मंत्री प्रतिभा बागरी। आखिरी बार 14 दिसंबर, 2025 को आई थीं। शहडोल : प्रभारी मंत्री राजेंद्र शुक्ला। इसी सप्ताह एक संस्था के कार्यक्रम में आए। प्रशासनिक और पार्टी की कोर ग्रुप की बैठक ली। उमरिया : प्रभारी मंत्री नागर सिंह चौहान। पिछले सप्ताह आए थे। जिला प्रशासन की बैठक भी ली। कटनी : प्रभारी मंत्री उदय प्रताप सिंह। 14 मार्च को बरही आए थे, कटनी में रुके। पार्टी नेता व कार्यकर्ताओं के साथ बैठक की। दमोह : प्रभारी मंत्री इंदर सिंह परमार। 11 मार्च को मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में आए। प्रभारी मंत्री बनने के बाद से केवल तीन बार ही दमोह आए। रीवा : प्रभारी मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल। आखिरी बार 18 फरवरी को आए थे, जिला प्रशासन और पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ बैठक की थी। सतना : प्रभारी मंत्री कैलाश विजयवर्गीय। मार्च के पहले सप्ताह में आए थे और पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ बैठक की थी।  

उमा भारती ने किया सनसनीखेज बयान, जब तक जिंदा हूं राजनीति करूंगी, बहुत लंबा जीने का मन है

टीकमगढ़  मध्य प्रदेश की पूर्व सीएम और  BJP का फायर ब्रांड नेता उमा भारती  Uma Bharti Statement  के एक नए बयान से प्रदेश की राजनीति में हलचल है। टीमकमढ़ में उमा भारती ने ये बड़ा बयान दिया है। उमा भारती ने बड़ा बयान देते हुए कहा कि वो अभी राजनीति से संन्यास नहीं लेनी वाली है, जब तक वह जिंदा रहेंगी, तब तक राजनीति के मैदान में डटी रहेंगी। इस दौरान उन्होंने लोगों से साथ देने की भी अपील की।दरअसल  टीकमगढ़ में वीरांगना अवंती बाई लोधी के बलिदान दिवस पर पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने ये बड़ी अपील करते हुए हुंकार भरी है। सेहत का जिक्र करते हुए उमा भारती काफी भावुक नजर आई Uma Bharti  उमा भारती ने दो टूक शब्दों में कहा कि जब तक वह जिंदा रहेंगी, तब तक राजनीति के मैदान में रहेंगी, लोगों से भावुक अपील करते हुए भारती न अपने लंबे जीवन और संघर्ष के लिए आशीर्वाद मांगा. इस मौके पर अपनी सेहत का जिक्र करते हुए उमा भारती काफी भावुक नजर आईं हैं। उन्होंने कहा कि उनका बहुत लंबा जीने का मन है और इसके लिए उन्हें समाज और  लोगो के समर्थन की जरूरत है। जब मैं चल न पाऊं तो लोग उठाकर कुर्सी पर बैठा दिया करें-उमा उमा भारती ने कहा कि कभी ऐसा समय आए और उम्र के साथ ऐसी स्थिति आ जाए कि वह खुद चल न पाएं, तो लोग उन्हें उठाकर कुर्सी पर बैठा दिया करें, लेकिन वह काम करना बंद नहीं करेंगी। उमा भारती ने वाणी, आंख और कान की सलामती पर जोर दिया।  उन्होंने कहा कि जब तक उन्हें दिखाई देगा, कानों से सुनाई देगा और बोलने योग्य रहेंगी तब तक वह जनता के हितों के लिए संघर्ष करती रहेंगी उमा बोलीं- जीवनभर राजनीति करना चाहती हैं भारती ने वीरांगना अवंती बाई लोधी के प्रति गहरी आस्था व्यक्त की. उन्होंने कहा कि वह वीरांगना के अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए ही जीवनभर राजनीति करना चाहती हैं। पूर्व सीएम ने कहा कि उनकी सेहत ठीक नहीं रहती लेकिन जनता का प्यार और आशीर्वाद ही उन्हें लड़ने की ताकत देता है।

BAP का राज्यसभा चुनाव में कदम, कमलेश्वर डोडियार ने मोदी और राहुल से समर्थन की अपील की

रतलाम  मध्य प्रदेश में आगामी राज्यसभा चुनाव को लेकर भारतीय आदिवासी पार्टी भी मैदान में उतर आई है. मध्य प्रदेश विधानसभा में केवल एक विधायक वाली बाप(BAP) पार्टी ने राज्यसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार उतारने की घोषणा कर नई सियासी हलचल पैदा कर दी है. पार्टी के एकमात्र विधायक कमलेश्वर डोडियार ने इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस नेता राहुल गांधी सहित अन्य बड़े राजनेताओं से समर्थन भी मांगा है. विधायक कमलेश्वर डोडियार ने अपने आधिकारिक लेटर हेड पर प्रधानमंत्री और राहुल गांधी को पत्र लिखकर आगामी राज्यसभा चुनाव में भारतीय आदिवासी पार्टी के उम्मीदवार को समर्थन देने की मांग की है. सैलाना से विधायक कमलेश्वर डोडियार ने कहा कि जब भाजपा और कांग्रेस आदिवासी क्षेत्रों में जाकर वोट मांगते हैं और सरकार बना लेते हैं. तो आदिवासियों का भी अधिकार है कि राज्यसभा की उम्मीदवारी के लिए उन्हें भी दोनों प्रमुख पार्टियों का समर्थन मिले. डोडियार ने पत्र में लिखा है कि भारतीय आदिवासी पार्टी देश भर में आदिवासी समाज के अधिकार, सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के लिए कार्य कर रही है और राज्यसभा में प्रतिनिधित्व चाहती है. मध्य प्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटों पर होना है चुनाव दरअसल मध्य प्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटों पर चुनाव होना है. वर्तमान में बीजेपी के केंद्रीय मंत्री एल. मुरुगन, डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी और दिग्विजय सिंह का कार्यकाल जून, 2026 में समाप्त होना है. संख्या बल के हिसाब से बीजेपी 2 राज्यसभा सीटों पर कब्जा करने की स्थिति में है. वहीं, कांग्रेस को अपनी एक सीट बचाने के लिए क्रॉस वोटिंग से बचना होगा. लेकिन भारतीय आदिवासी पार्टी द्वारा भी राज्यसभा के लिए उम्मीदवार उतारे जाने की स्थिति में कांग्रेस के उम्मीदवार को क्रॉस वोटिंग का खतरा भी झेलना पड़ सकता है. कमलेश्वर डोडियार ने भाजपा और कांग्रेस सहित कई बड़े नेताओं से उनकी पार्टी के लिए समर्थन मांगा है. गौरतलब है कि मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव 2023 में भारतीय आदिवासी पार्टी ने सैलाना विधानसभा सीट से अपना खाता खोला था. वहीं, पड़ोसी राज्य राजस्थान में भी भारतीय आदिवासी पार्टी के चार विधायक और एक सांसद है. बाप पार्टी का प्रभाव राजस्थान और मध्य प्रदेश के करीब 20 जिलों में है. इसके बाद अब भारतीय आदिवासी पार्टी की नजर राज्यसभा में भी सांसद भेजने पर है. बहरहाल मध्य प्रदेश में केवल एक विधायक वाली भारतीय आदिवासी पार्टी राज्यसभा की सीट जीतने की स्थिति में तो नहीं है. लेकिन राज्यसभा उम्मीदवारी की घोषणा के बाद इससे कांग्रेस का गणित जरूर बिगड़ सकता है. वहीं, कमलेश्वर डोडियार के अनुसार राज्यसभा में आदिवासी समाज का उम्मीदवार भेजने के लिए दोनों प्रमुख पार्टियों के बड़े नेताओं के साथ ही आदिवासी विधायकों से भी समर्थन की मांग की जा रही है.

राज्यसभा में क्रॉस वोटिंग का खतरा, कांग्रेस ने बढ़ाई विधायकों की बाड़ेबंदी, हरियाणा, ओडिशा और बिहार की घटनाओं के बाद टेंशन

भोपाल  मध्य प्रदेश में जून 2026 को खाली होने वाली राज्यसभा सीटों पर अप्रैल मई में चुनाव होने की संभावना है। इससे पहले राज्य में सियासी हलचल तेज हो गई है। प्रदेश की तीन राज्यसभा सीटों पर चुनाव होना है। वर्तमान में इन सीटों पर डॉ सुमेर सिंह सोलंकी (भाजपा), जॉर्ज कुरियन (भाजपा) और दिग्विजय सिंह (कांग्रेस) सांसद हैं। कांग्रेस को क्यों सता रहा डर? कांग्रेस पार्टी को इस चुनाव से पहले अपने ही विधायकों की क्रॉस वोटिंग का डर सता रहा है। हाल ही में हरियाणा, बिहार और ओडिशा में हुए राज्यसभा चुनावों में क्रॉस वोटिंग के उदाहरण सामने आए हैं, जिससे पार्टी सतर्क हो गई है। सूत्रों के अनुसार, इसी आशंका के चलते कांग्रेस अपने विधायकों की “बाड़ेबंदी” (रिसॉर्ट पॉलिटिक्स) की तैयारी में है, ताकि किसी तरह की टूट-फूट से बचा जा सके। किन विधायकों पर संशय? कांग्रेस के पास फिलहाल 65 विधायक हैं, लेकिन निर्मला सप्रे को लेकर स्थिति साफ नहीं है। निर्मला सप्रे लगातार भाजपा के कार्यक्रमों में नजर आ रही हैं। वहीं अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मुकेश मल्होत्रा राज्यसभा चुनाव में वोटिंग नहीं कर सकते। इसके अलावा पार्टी को आशंका है कि 5–6 विधायक भाजपा के संपर्क में आ सकते हैं। क्या कहता है चुनावी गणित? 230 सदस्यीय विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी के पास 165 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के पास 65। राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 58 वोटों की जरूरत होती है। इस हिसाब से भाजपा को 2 सीट और कांग्रेस को 1 सीट मिलना तय माना जा रहा है। कहां फंस सकता है पेंच? सियासी समीकरण तब बिगड़ सकते हैं, अगर कांग्रेस के कुछ विधायक क्रॉस वोटिंग कर दें या अनुपस्थित रहें। खासकर अगर निर्मला सप्रे भाजपा के पक्ष में जाती हैं और अन्य 5–6 विधायक भी टूटते हैं, तो कांग्रेस अपनी तय मानी जा रही एक सीट भी गंवा सकती है। पार्टी का दावा कांग्रेस नेता पीसी शर्मा का कहना है कि सभी विधायक एकजुट हैं और पार्टी का शीर्ष नेतृत्व स्थिति पर नजर बनाए हुए है। हालांकि अंदरखाने चल रही हलचल ने प्रदेश की राजनीति को गरमा दिया है। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भी दावा किया है कि पार्टी में सबकुछ ठीक है और सभी विधायक एकजुट है। संगठन को धार देने की तैयारी, जिला स्तर पर शुरू किया विस्तार दिल्ली में हुई अहम बैठक के बाद मध्यप्रदेश कांग्रेस ने संगठन विस्तार की प्रक्रिया तेज कर दी है। लंबे इंतजार के बाद अब जिला कार्यकारिणी की घोषणा शुरू हो गई है और नवरात्र के अंदर अधिकांश जिलों में नई टीम सामने आ जाएगी। दो दिन तक चली मंथन बैठक में संगठन को मजबूत करने की रणनीति तय हुई। इसके तुरंत बाद जिला कार्यकारिणी घोषित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। पार्टी नेतृत्व ने साफ संकेत दिए हैं कि अब देरी बर्दाश्त नहीं होगी।  लंबे समय से लटका था मामला जिला अध्यक्षों की नियुक्ति तो पहले ही हो चुकी थी, लेकिन कार्यकारिणी घोषित न होने से सवाल उठ रहे थे। कुछ जिलों में सूची जारी हुई भी, लेकिन पदों की संख्या ज्यादा होने पर उन्हें निरस्त करना पड़ा। अब नई गाइडलाइन के तहत संतुलित टीम बनाई जा रही है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक नवरात्रि के भीतर अधिकांश जिलों की कार्यकारिणी घोषित कर दी जाएगी। इसे आगामी चुनावों की तैयारी से जोड़कर देखा जा रहा है। जबलपुर ग्रामीण, श्योपुर, कटनी शहर और बड़वानी जिलों की नई कार्यकारिणी घोषित की जा चुकी है। ये नियुक्तियां प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के निर्देश पर की गई हैं। AICC की गाइडलाइन के मुताबिक गठन बड़े जिलों में अधिकतम 51 सदस्य छोटे जिलों में 31 सदस्य की सीमा तय इसी मानक के अनुसार नई कार्यकारिणियां तैयार की जा रही हैं। जमीनी स्तर पर भी संगठन मजबूत संगठन विस्तार के तहत 88 नगर अध्यक्ष और 21 मंडल अध्यक्षों की भी नियुक्ति की गई है। इसका मकसद बूथ स्तर तक पार्टी को मजबूत करना है। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और संगठन प्रभारी हरीश चौधरी लगातार प्रदेश का दौरा कर रहे हैं। उनका फोकस बूथ स्तर पर नेटवर्क मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने पर है। 

भा.ज.पा के केरल प्रचार अभियान की कमान संभालेंगे पीएम मोदी और गृह मंत्री शाह

तिरुवनंतपुरम   9 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए अभियान निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा केरल में एक आक्रामक अभियान की तैयारी कर रही है। इसमें ऐतिहासिक सफलता हासिल करने के प्रयास में पार्टी अपनी शीर्ष राष्ट्रीय नेतृत्व टीम को तैनात कर रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री समेत अन्य वरिष्ठ नेता केरल पहुंचने वाले हैं, जो 140 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा का खाता खोलने की पार्टी की दृढ़ता को दर्शाता है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो त्वरित दौरों पर प्रमुख जिलों का दौरा करेंगे। इस दौरान वह रैलियों को संबोधित करेंगे और कार्यकर्ताओं को उत्साहित करेंगे। भाजपा के अभियान का खाका राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे कसर्गोड, पलक्कड़, तिरुवनंतपुरम, कोल्लम और त्रिशूर में उच्च दृश्यता वाली पहुंच पर केंद्रित है। पार्टी अपने हाल के चुनावी लाभों से आत्मविश्वास ले रही है। सबसे प्रमुख है अभिनेता से राजनीतिज्ञ बने सुरेश गोपी की त्रिशूर लोकसभा सीट पर 70,000 से अधिक मतों से हासिल की गई जीत शामिल है। इसके बाद दिसंबर में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा ने तिरुवनंतपुरम निगम पर नियंत्रण हासिल किया, जो इस राज्य में पार्टी के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि है, जहां उसे परंपरागत रूप से स्थान पाने में कठिनाई रही है। हालांकि आंकड़े मिश्रित तस्वीर पेश करते हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने 15.64 प्रतिशत वोट शेयर प्राप्त किया जबकि 2025 के स्थानीय निकाय चुनावों में यह थोड़ी गिरकर 14.71 प्रतिशत रह गई। इसके बावजूद, पार्टी उत्साहित बनी हुई है और 2021 विधानसभा चुनावों में नौ सीटों पर दूसरे स्थान पर आने को बढ़ती पकड़ का सबूत मानते हुए लगातार सक्रिय है। केरल भाजपा अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने विश्वास जताया है कि पार्टी न केवल लंबे समय से चली आ रही चुनावी बाधा को तोड़ेगी बल्कि आगामी विधानसभा में कई सीटें भी जीतेगी। हालांकि, चुनौतियाँ बरकरार हैं। केरल की अद्वितीय जनसांख्यिकीय संरचना, जहां अल्पसंख्यक जिनमें मुस्लिम और ईसाई शामिल हैं, लगभग 42 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं और यह एक महत्वपूर्ण कारक बनी हुई है। पार्टी रणनीतिकार मानते हैं कि समुदाय के नेताओं के साथ सतत संपर्क महत्वपूर्ण होगा क्योंकि राष्ट्रीय नेता आने वाले दिनों में अधिक जुड़ाव बढ़ाएंगे। जैसे-जैसे अभियान तीव्र होता जा रहा है, भाजपा का यह उच्च-ऊर्जा अभियान यह संकेत देता है कि पार्टी केरल में क्रमिक लाभ को ऐतिहासिक चुनावी पकड़ में बदलने के लिए दृढ़ प्रयास कर रही है।

असम में चुनावी बिगुल: सीएम Himanta Biswa Sarma फिर मैदान में, सातवीं बार ठोकी ताल

गुवाहाटी असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने शुक्रवार को आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अपना नामांकन पत्र दाखिल किया। यह उनका सातवां चुनाव है। मुख्यमंत्री सरमा ने जालुकबारी निर्वाचन क्षेत्र से अपना नामांकन पत्र भरा है। नामांकन के बाद मीडिया से बातचीत में उन्होंने अपने राजनीतिक सफर को याद करते हुए कहा कि उन्होंने पहला चुनाव हारने के बाद लगातार पांच चुनाव जीते हैं और इस बार भी उन्हें अपने क्षेत्र की जनता का पूरा समर्थन मिलने की उम्मीद है। विपक्ष के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए सीएम हेमंता सरमा ने कहा कि अगर कांग्रेस उन्हें एक संस्था मानती है, तो यह उनके लिए गर्व की बात है। उन्होंने कहा, "अगर कांग्रेस ने मुझे एक संस्था के स्तर तक पहुंचा दिया है, तो मुझे इससे खुश होना चाहिए, न कि विवाद करना चाहिए।" शुक्रवार की सुबह ही मुख्यमंत्री सरमा ने राज्य की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को लेकर भी बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि इन परंपराओं को संरक्षित करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है न कि कोई दान। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर उन्होंने लिखा, "हमारी संस्कृति कोई नारा नहीं है, यह हमारे त्योहारों, हमारी प्रार्थनाओं और हमारे लोगों में जीवित है।" उन्होंने कहा कि इन परंपराओं को जीवित रखने वाले समुदायों के साथ खड़ा रहना सरकार का कर्तव्य है। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक समूहों को आर्थिक सहायता प्रदान कर रही है। इसके तहत हर रास समिति को 25,000 रुपए की मदद दी जा रही है, जिससे रास उत्सव को बेहतर तरीके से आयोजित किया जा सके। यह उत्सव असम की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का अहम हिस्सा है। इसके अलावा, राज्य में 8,000 से अधिक पूजा समितियों को 10,000 रुपए की वित्तीय सहायता दी जा रही है ताकि धार्मिक कार्यक्रम सुचारू रूप से आयोजित हो सकें। सरकार ने 620 उदासीन भक्तों के लिए हर महीने 1,500 रुपए की सहायता भी सुनिश्चित की है, जो आध्यात्मिक परंपराओं को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।