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छत्तीसगढ़ की अनुष्का भगत का शानदार प्रदर्शन, राज्य को दिलाया लगातार चौथा रजत

रायपुर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आयोजित खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स-2026 के अंतर्गत तैराकी प्रतियोगिताओं का आज समापन हो गया। प्रतियोगिता में देशभर के खिलाड़ियों ने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, जिसमें पुरुष वर्ग में कर्नाटक ने 123 अंकों के साथ ओवरऑल टीम चौंपियनशिप का खिताब अपने नाम किया। वहीं असम 69 अंकों के साथ प्रथम रनरअप और ओडिशा 31 अंकों के साथ द्वितीय रनरअप रहा। महिला वर्ग में ओडिशा ने 102 अंकों के साथ शानदार प्रदर्शन करते हुए चौंपियन बनने का गौरव हासिल किया, जबकि कर्नाटक 50 अंकों के साथ प्रथम रनरअप और मेजबान छत्तीसगढ़ 38 अंकों के साथ द्वितीय रनरअप रहा। प्रतियोगिता के दौरान छत्तीसगढ़ की तैराक अनुष्का भगत ने लगातार चौथा रजत पदक जीतकर प्रदेश का मान बढ़ाया। उन्होंने महिला 50 मीटर ब्रेस्ट स्ट्रोक स्पर्धा में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए यह उपलब्धि हासिल की। उनके इस प्रदर्शन से छत्तीसगढ़ की पदक स्थिति मजबूत हुई है और राज्य के खिलाड़ियों में उत्साह का संचार हुआ है। आज आयोजित विभिन्न स्पर्धाओं में भी खिलाड़ियों ने दमदार प्रदर्शन किया। पुरुष 100 मीटर फ्रीस्टाइल में कर्नाटक के धोनिश ने स्वर्ण पदक जीता, जबकि असम के फर्मिनो एमोन लालुंग ने रजत और कर्नाटक के कीर्थन शरथ ने कांस्य पदक प्राप्त किया। महिला 100 मीटर फ्रीस्टाइल में ओडिशा की रितिका मिन्ज ने स्वर्ण पदक जीता, वहीं उनकी ही राज्य की कृष्णा प्रिया नायक ने रजत और असम की वायोलिना क्रो ने कांस्य पदक हासिल किया। पुरुष 50 मीटर बैकस्ट्रोक में असम के निबिर निलिम क्रो ने स्वर्ण, कर्नाटक के धोनिश ने रजत और ओडिशा के राजेश सोरेन ने कांस्य पदक जीता। महिला 50 मीटर बैकस्ट्रोक में ओडिशा की अंजलि मुंडा ने स्वर्ण पदक हासिल किया, जबकि छत्तीसगढ़ की अनुष्का भगत ने रजत और कर्नाटक की मेघांजली ने कांस्य पदक अपने नाम किया। रिले स्पर्धाओं में पुरुष 4Û100 मीटर मेडले में कर्नाटक ने स्वर्ण, असम ने रजत और त्रिपुरा ने कांस्य पदक जीता, वहीं महिला 4Û100 मीटर मेडले में ओडिशा ने स्वर्ण, त्रिपुरा ने रजत और गुजरात ने कांस्य पदक हासिल किया। खेलो इंडिया खेलो ट्राइबल प्रतियोगिता 2026 में अब तक छत्तीसगढ़ ने कुल 8 पदक 1 स्वर्ण, 4 रजत और 3 कांस्य अपने नाम किए हैं और इसी के साथ राज्य पदक तालिका में छठे स्थान पर बना हुआ है। प्रतियोगिता में कर्नाटक और ओडिशा का दबदबा देखने को मिला, जबकि छत्तीसगढ़ के खिलाड़ियों ने भी शानदार प्रदर्शन कर भविष्य के लिए सकारात्मक संकेत दिए हैं।

कांकेर ऑपरेशन में बड़ी सफलता, 3 नक्सलियों ने डाली हथियार, 14 की तलाश तेज

बड़गांव कांकेर जिले में माओवादियों के लगातार आत्मसमर्पण से संगठन को बड़ा झटका लगा है। शनिवार को पखांजूर क्षेत्र के परतापुर थाने में एरिया कमेटी सदस्य राधिका कुंजाम, संदीप कड़ियाम और रैनू पद्दा ने समर्पण कर दिया है। इनके पास से दो एसएलआर और एक 303 राइफल मिली है। बीते चार दिनों में नौ माओवादी मुख्यधारा में लौट चुके हैं। पुलिस के सामने शेष बचे 14 माओवादियों का समर्पण करवाना सबसे बड़ी चुनौती है। बड़े चेहरों का समर्पण पुलिस के लिए बड़ी चुनौती सूत्रों के अनुसार मिलिट्री कंपनी की सदस्य व आठ लाख की इनामी स्वरूपा व अन्य समर्पण ने संगठन को अंदर तक प्रभावित किया है। हालांकि स्टेट कमेटी सदस्य रूपी और डिविजनल कमेटी सदस्य चंदर के आत्मसमर्पण की चर्चाएं लंबे समय से चल रही हैं, लेकिन अब तक दोनों ने हथियार नहीं डाले हैं। जानकारी के मुताबिक रूपी राजनांदगांव-कांकेर-बैलाडीला डिवीजन के माओवादी विजय रेड्डी की पत्नी है और वह अब भी जंगलों में सक्रिय रहकर संगठन को संभाल रही है। प्रशासन की अपील और आत्मसमर्पण नीति का असर पखांजूर एडिशनल एसपी राकेश कुर्रे का कहना है कि आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों से मिली जानकारियों के आधार पर शेष माओवादियों से संपर्क साधने और उन्हें मुख्यधारा में लाने के प्रयास तेज कर दिए गए हैं। अधिकारियों ने उम्मीद जताई है कि जल्द ही शेष बचे माओवादी भी समर्पण कर देंगे। बस्तर रेंज के आइजी सुंदरराज पी. ने शेष माओवादियों से भी हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में शामिल होने की अपील की है। पूर्व माओवादी स्वरूपा के आत्मसमर्पण के बाद अब उनके हाथ से लिखा हुआ मार्मिक पत्र इंटरनेट मीडिया पर तेजी से प्रसारित हो रहा है। यह पत्र गोंडी भाषा में लिखा गया है, जिसमें स्वरूपा ने अपने पूर्व साथियों से मुख्यधारा में लौटने की अपील की है। आंकड़ों में आत्मसमर्पण और माओवाद का इतिहास सूत्रों के अनुसार क्षेत्र में सुरक्षा बल के लगातार अभियान और सरकार की आत्मसमर्पण नीति के दबाव के चलते माओवादी संगठन के सदस्य मुख्यधारा में लौट रहे हैं। कांकेर सहित बस्तर के सात जिलों में जनवरी 2024 से मार्च 2026 तक कुल 2,756 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है। कांकेर जिले में माओवाद का प्रभाव 1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक की शुरुआत में पड़ोस के आंध्र प्रदेश और गढ़चिरौली (महाराष्ट्र) से आए माओवादियों के माध्यम से शुरू हुआ। जिले की पहाड़ियां और घने जंगल माओवादियों के लिए सुरक्षित पनाहगाह और प्रशिक्षण शिविर के रूप में इस्तेमाल होते रहे हैं। जिले में अब तक की प्रमुख मुठभेड़ें मार्च 2025 – बीजापुर-कांकेर सीमा पर हुई मुठभेड़ में 30 माओवादी ढेर। अप्रैल 2025 – कांकेर के छोटे बेठिया थाना क्षेत्र में 29 माओवादी मारे गए। अगस्त 2025 – कांकेर-बस्तर सीमा पर मंडा पहाड़ के पास मुठभेड़ में तीन माओवादी ढेर। सितंबर 2024 – कांकेर के छिंदखड़क जंगल-पहाड़ी क्षेत्र में तीन माओवादी मारे गए। फरवरी 2026 – कांकेर के जंगलों में हुई मुठभेड़ में दो सक्रिय माओवादी मारे गए।

मुख्यमंत्री साय ने जशपुर सर्किट हाउस में मातृत्व वन का किया लोकार्पण

रायपुर  मुख्यमंत्री  विष्णुदेव साय ने आज जशपुर सर्किट हाउस परिसर में विकसित मातृत्व वन का लोकार्पण किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री  साय ने कहा कि मातृत्व वन न केवल हरित क्षेत्र के रूप में विकसित होगा, बल्कि यह प्रकृति के प्रति भावनात्मक जुड़ाव का एक सशक्त प्रतीक भी है और आने वाले समय में पर्यावरण संरक्षण एवं जागरूकता का केंद्र बनेगा। उल्लेखनीय है कि जशपुर मंडल द्वारा विकसित मातृत्व वन में लगभग 2 एकड़ क्षेत्र में 400 से अधिक विभिन्न प्रजातियों के पौधों का रोपण किया गया है, जो पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक संवेदनाओं के अद्वितीय समन्वय का उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस अवसर पर ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के तहत जिले के जनप्रतिनिधियों द्वारा अपनी माताओं के नाम पर पौधरोपण किया गया, जिससे प्रकृति और परिवार के बीच भावनात्मक संबंध को और अधिक सुदृढ़ करने का संदेश दिया गया। मुख्यमंत्री  विष्णुदेव साय ने अपने संबोधन में कहा कि माँ हमारे जीवन की प्रथम गुरु होती हैं और उनका स्थान सर्वोच्च होता है। ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के माध्यम से हम माँ के प्रति सम्मान को प्रकृति से जोड़ने का एक सार्थक प्रयास कर रहे हैं। यह पहल आने वाली पीढ़ियों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करने के साथ-साथ सामाजिक मूल्यों को भी सुदृढ़ करेगी। उन्होंने कहा कि मातृत्व वन जैसी पहल न केवल हरित क्षेत्र के विस्तार में सहायक होगी, बल्कि समाज में संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की भावना को भी मजबूत करेंगी। मातृत्व वन के अंतर्गत पर्यावरणीय एवं औषधीय दृष्टि से महत्वपूर्ण पौधों का चयन कर उनका रोपण किया गया है। इनमें टिकोमा, झारुल, सीताअशोक, गुलमोहर, लक्ष्मीतरु, आंवला, बीजा, सिन्दूर, नागकेसरी, अर्जुन एवं जामुन जैसी प्रजातियाँ प्रमुख हैं। ये पौधे न केवल पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में सहायक होंगे, बल्कि भविष्य में औषधीय उपयोग एवं जैव विविधता के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। मातृत्व वन की स्थापना का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाना, माताओं के प्रति सम्मान को प्रकृति के माध्यम से अभिव्यक्त करना तथा नई पीढ़ी में संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की भावना विकसित करना है। यह पहल ‘हर घर एक पेड़, हर पेड़ में माँ की ममता’ के संदेश को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित जनप्रतिनिधियों एवं अधिकारियों ने इस पहल की सराहना करते हुए इसे समाज और पर्यावरण के लिए प्रेरणादायक बताया। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण मंडल के अध्यक्ष  रामप्रताप सिंह, जिला पंचायत अध्यक्ष  सालिक साय, नगर पालिका अध्यक्ष  अरविंद भगत, नगर पालिका उपाध्यक्ष  यश प्रताप सिंह जूदेव, जिला पंचायत उपाध्यक्ष  शौर्य प्रताप सिंह जूदेव, जनपद पंचायत अध्यक्ष  गंगाराम भगत,  विजय आदित्य सिंह जूदेव सहित जनप्रतिनिधि एवं अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित थे।

खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026: निकिता ने रचा इतिहास, भारोत्तोलन में कुल 160 किलोग्राम उठाकर छत्तीसगढ़ को दिलाया पहला स्वर्ण

रायपुर खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 में छत्तीसगढ़ की बेटी निकिता ने राज्य को पहला स्वर्ण पदक दिलाकर इतिहास रच दिया है। राजधानी रायपुर स्थित पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में निकिता ने महिला 77 किलोग्राम भारोत्तोलन वर्ग में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए कुल 160 किलोग्राम वजन उठाकर प्रथम स्थान हासिल किया। प्रतियोगिता में निकिता ने स्नैच में 70 किलोग्राम तथा क्लीन एंड जर्क में 90 किलोग्राम वजन उठाया। दोनों ही वर्गों में उन्होंने संतुलित और प्रभावशाली प्रदर्शन करते हुए अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ दिया। इस शानदार जीत के साथ उन्होंने न केवल स्वर्ण पदक अपने नाम किया, बल्कि छत्तीसगढ़ को खेलों में मजबूत शुरुआत भी दिलाई। प्रतियोगिता में दूसरे स्थान पर ओडिशा की मती जानी रहीं, जिन्होंने कुल 126 किलोग्राम वजन उठाया, जबकि तीसरा स्थान असम की जॉय पाटिर को मिला, जिनका कुल प्रदर्शन 118 किलोग्राम रहा। निकिता की इस उपलब्धि से पूरे राज्य में खुशी की लहर दौड़ गई है। खेल प्रेमियों और अधिकारियों ने उनकी मेहनत, समर्पण और आत्मविश्वास की सराहना की है। यह जीत छत्तीसगढ़ के युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी और आने वाले मुकाबलों में राज्य के खिलाड़ियों का मनोबल और बढ़ाएगी। खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 में देशभर के जनजातीय प्रतिभागी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐसे में निकिता का यह स्वर्ण पदक न केवल व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि छत्तीसगढ़ के खेल इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में दर्ज हो गया है।

पेट्रोल-डीजल व गैस का पर्याप्त स्टॉक, घबराने की जरूरत नहीं: मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

मनेन्द्रगढ़/एमसीबी प्रदेश में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी गैस की पर्याप्त उपलब्धता होने की बात कहते हुए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने लोगों से अफवाहों से दूर रहने और अनावश्यक भंडारण न करने की अपील की है। उन्होंने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अधिकारियों की समीक्षा बैठक लेकर आपूर्ति व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कहा कि राज्य में ईंधन व गैस का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है, इसलिए किसी भी तरह की घबराहट की आवश्यकता नहीं है। साथ ही जमाखोरी और कालाबाजारी पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। जिला प्रशासन द्वारा पेट्रोल पंपों और गैस एजेंसियों की नियमित निगरानी की जा रही है। कलेक्टर डी. राहुल वेंकट ने बताया कि अवैध भंडारण पर कार्रवाई जारी है और शिकायतों के लिए हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए गए हैं। प्रशासन ने उपभोक्ताओं से निर्धारित अंतराल पर ही गैस बुकिंग करने तथा आवश्यकतानुसार ही उपयोग करने की अपील की है, ताकि सभी को समय पर सुविधा मिल सके।

संघर्ष से सफलता तक! बाबूलाल हेम्ब्रम एक-एक पदक जीतकर चमक रहे ट्राइबल गेम्स में

रायपुर. जब पूर्व आर्मी कोच गुरविंदर सिंह ने बाबूलाल हेम्ब्रम को उनकी शारीरिक बनावट के आधार पर अन्य खेल छोड़कर वेटलिफ्टिंग अपनाने की सलाह दी, तब झारखंड के रामगढ़ जिले के केरिबांदा गांव के इस किशोर के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी, इस खेल को जारी रखने के लिए पैसे जुटाना. लेकिन हार मानने के बजाय बाबूलाल ने कंस्ट्रक्शन साइट्स पर बांस और रॉड से अभ्यास शुरू किया. बाद में उन्होंने झारखंड स्टेट स्पोर्ट्स प्रमोशन सोसाइटी (JSPS) के कोचिंग सेंटर में दाखिला लिया, जिसके लिए उन्हें रोज़ 60 किलोमीटर का सफर तय कर कोच गुरविंदर के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण लेना पड़ता था. खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 में पुरुषों के 60 किग्रा वर्ग में रजत पदक जीतने वाले बाबूलाल कहते हैं कि, “2018 में जब मैंने इस खेल को अपनाया, वह समय मेरे लिए बहुत कठिन था. हमारे पास ट्रेनिंग के लिए उपकरण और किट खरीदने के पैसे नहीं थे, इसलिए मैं बांस और लोहे की रॉड से ही अभ्यास करता था. फिर जीएसपीएस और अपने कोच का साथ मिला और आज मैं यहां हूं.” पांच भाई-बहनों में सबसे छोटे 19 वर्षीय बाबूलाल ने बताया, “मेरी मां एक स्थानीय स्कूल में रसोइया हैं, और पिता छोटे-मोटे काम करते हैं. आर्थिक स्थिति हमेशा चुनौतीपूर्ण रही है. लेकिन मुझे भरोसा है कि खेलो इंडिया जैसे आयोजनों में मिल रही सफलता से हमारी स्थिति बदलेगी.” बाबूलाल हेम्ब्रोम ने उम्र-आधारित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहले ही अपनी छाप छोड़ी है. 2024 में उन्होंने चेन्नई में आयोजित खेलो इंडिया यूथ गेम्स में 49 किग्रा वर्ग में स्वर्ण पदक जीता. इसके बाद उन्होंने आईडब्ल्यूएफ़ वर्ल्ड यूथ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप और एशियन जूनियर एवं यूथ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में भी पदक हासिल किए. अब बाबूलाल सीनियर सर्किट में कदम रख रहे हैं और बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट्स में भारतीय टीम में जगह बनाने का लक्ष्य रख रहे हैं. फिलहाल, वह पटियाला में राष्ट्रीय शिविर का हिस्सा हैं. बाबूलाल ने कहा, “खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में यह रजत पदक मेरे लिए आत्मविश्वास बढ़ाने वाला है कि मैं सही दिशा में जा रहा हूं. राष्ट्रीय शिविर में लौटकर मैं अपने कोच से भविष्य के लक्ष्यों पर चर्चा करूंगा और उसी के अनुसार तैयारी करूंगा. मेरा सपना है कि मैं कॉमनवेल्थ गेम्स, एशियन गेम्स और वर्ल्ड चैंपियनशिप जैसे बड़े मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करूं.”

ग्रीन एनेस्थीसिया: सिम्स में इलाज के साथ पर्यावरण संरक्षण की नई पहल

रायपुर छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) बिलासपुर में स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा देते हुए “ग्रीन एनेस्थीसिया” की पहल की जा रही है। इस पहल के तहत मरीजों को सुरक्षित उपचार प्रदान करने के साथ-साथ पर्यावरण और चिकित्सकों की सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। ऑपरेशन थिएटर में उपयोग होने वाली एनेस्थीसिया गैसों के दुष्प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से सिम्स द्वारा आधुनिक और पर्यावरण हितैषी तकनीकों को अपनाया जा रहा है। एनेस्थीसिया गैसें: पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा सर्जरी के दौरान उपयोग की जाने वाली गैसें, जैसे डेसफ्लुरेन और नाइट्रस ऑक्साइड, ग्रीनहाउस गैसों के रूप में जानी जाती हैं। इनका प्रभाव कार्बन डाइऑक्साइड से कई गुना अधिक होता है और ये लंबे समय तक वातावरण में बनी रहती हैं। हर वर्ष बड़ी संख्या में होने वाली सर्जरी से निकलने वाली ये गैसें ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। चिकित्सकों पर भी पड़ता है प्रभाव एनेस्थीसिया का प्रभाव केवल मरीज तक सीमित नहीं रहता। जहां एक मरीज को ऑपरेशन के दौरान एक बार एनेस्थीसिया दिया जाता है, वहीं एनेस्थीसिया विशेषज्ञ चिकित्सक दिनभर में 10 से 12 घंटे तक लगातार कई मरीजों को एनेस्थीसिया प्रदान करते हैं। इस दौरान वे बार-बार इन गैसों के संपर्क में आते हैं, जिससे लंबे समय में उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना रहती है। ऐसे में ग्रीन एनेस्थीसिया चिकित्सकों की सुरक्षा के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। क्या है ग्रीन एनेस्थीसिया ग्रीन एनेस्थीसिया एक ऐसी पद्धति है, जिसमें मरीज को सुरक्षित बेहोशी देने के साथ-साथ पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को कम किया जाता है। इसका उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाना है। सिम्स में अपनाए जा रहे प्रमुख उपाय सिम्स में इस दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं— टी.आई.वी.ए. (Total Intravenous Anesthesia) इस तकनीक में प्रोपोफोल, मिडाज़ोलम आदि दवाओं को इंट्रावेनस (रक्त शिरा द्वारा) दिया जाता है, जो बेहद प्रभावी एवं सुरक्षित माना जाता है। इससे गैसों के उपयोग में कमी आती है और पर्यावरण पर दुष्प्रभाव भी कम होता है। लो फ्लो एनेस्थीसिया तकनीक कम मात्रा में गैस देकर भी सुरक्षित एनेस्थीसिया दिया जाता है, जिससे गैस की खपत और प्रदूषण दोनों में कमी आती है। आधुनिक उपकरणों का उपयोग नई तकनीकों के माध्यम से गैस लीकेज को नियंत्रित कर ऑपरेशन थिएटर के बाहर प्रदूषण को कम किया जा रहा है। किफायती और प्रभावी प्रणाली यह पद्धति पर्यावरण के साथ-साथ आर्थिक रूप से भी लाभकारी (Cost Effective) साबित हो रही है। निश्चेतना में उपयोग होने वाली गैसों का अत्यधिक प्रयोग ग्लोबल वार्मिंग और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। ग्रीन एनेस्थीसिया के माध्यम से इन दुष्प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। सिम्स इस दिशा में निरंतर प्रयासरत है। ग्रीन एनेस्थीसिया सिम्स की एक सराहनीय और दूरदर्शी पहल है, जो यह दर्शाती है कि बेहतर इलाज के साथ पर्यावरण और मानव दोनों की सुरक्षा संभव है। यह प्रयास भविष्य में अन्य चिकित्सा संस्थानों के लिए भी प्रेरणास्रोत बनेगा।

Naxalism Debate: संसद में 30 को होगी चर्चा, बस्तर में 96% इलाका नक्सल प्रभाव से आजाद

रायपुर/जगदलपुर. पांच दशकों से भी अधिक समय से बस्तर के सामाजिक ताने-बाने को नष्ट कर रहा नक्सलवाद आज समाप्ति की है. यह नराकात्मक विनाशकारी विचारधारा ने न केवल बस्तर के विकास को अवरुद्ध किया, बल्कि निर्दोष आदिवासियों की जान भी ली. लेकिन मजबूत राजनीतिक इरादे की बदौलत आज बस्तर का 96 प्रतिशत क्षेत्र नक्सली गतिविधियों से मुक्त हो चुका है. विषय पर 30 मार्च को लोकसभा में अहम चर्चा होगी. 1967 में जो चिंगारी बंगाल के नक्सलबाड़ी में फूटी थी, उसने आने वाले दशकों में बस्तर के जंगलों को आग में बदल दिया, इस आग ने हजारों जिंदगियां लीं, अनगिनत घर उजाड़े, और एक पूरे क्षेत्र को बदल कर रख दिया. लेकिन बस्तर ओलम्पिक 2024 के मंच से देश के गृहमंत्री अमित शाह ने एक ऐसा बयान दिया, जिसने इस कहानी को एक तय समयसीमा दे दी, उन्होंने कहा कि 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद पूरी तरह खत्म कर दिया जाएगा, यह पहली बार था जब इस लंबे संघर्ष के अंत की एक तारीख सामने आई, एक ऐसा वादा, जो सिर्फ शब्द नहीं बल्कि दशकों से चली आ रही इस लड़ाई का निष्कर्ष माना जा रहा है. अब जब 31 मार्च 2026 की तारीख जब करीब है, तो माहौल बदल चुका है. वो घोषणा सच्चाई में बदलती नजर आ रही है. इन 2 वर्षों में कुल 3000 नक्सली मुख्यधारा में जुड़ जाते हैं, 2000 नक्सली गिरफ्तार कर लिए जाते हैं, अभियान इतना तेज होता है कि 500 से अधिक नक्सली ढेर कर दिए जाते हैं, जिसमें नक्सलियों का महासचिव भी शामिल रहता है. कुल मिलाकर 5000 से अधिक नक्सली कम हो गए, हालांकि, नक्सल के इतिहास में 1987 से 2026 तक 1416 जवान शहीद हुए है. जबकि 1277 आईडी ब्लास्ट हुए, जिसमें 443 जवान शहीद और 915 जवान घायल हुए हैं. इसके अलावा 4580 आईडी बरामद की गई है. छत्तीसगढ़ सरकार के आंकड़ों के अनुसार, आज बस्तर संभाग के पांच जिलों में से दंंतेवाड़ा में अब महज एक नक्सली सक्रिय है, वहीं नारायणपुर में दो, सुकमा में 5, बीजापुर में 11 और कांकेर में गिनती के 19 नक्सली सक्रिय है. हालांकि, तय संकल्प में सशस्त्र नक्सलवाद का खत्मा तो हो गया है, लेकिन अभी भी सबसे बड़ा चुनौती जवानों के लिए जंगलों में बिछी बारूद है. समय के साथ यह भी खोजकर निकाल लिए जाएंगे, और नष्ट कर दिए जाएंगे. गृहमंत्री विजय शर्मा ने कहा है कि अब हम बस्तर के प्रत्येक गांव को ODF की तरह IED फ्री गांव बनाएंगे. अब बस्तर की आग बुझ गई, और बस्तर के जंगल, जो कभी डर का दूसरा नाम थे, एक बार फिर अपनी असली पहचान, अपनी शांति, और अपनी खूबसूरती के लिए जाने जाएंगे. अब बस्तर अपनी खूबसूरती के लिए पहचाने जाएगा. संसद में 30 मार्च को होगी चर्चा नक्सलमुक्त भारत के लिए निर्धारित मार्च 2026 की समय सीमा से पहले लोकसभा में नक्सलवाद उन्मूलन पर महत्वपूर्ण चर्चा होगी. लोकसभा की कार्यसूची के अनुसार, नक्सलवाद उन्मूलन के प्रयासों पर चर्चा के लिए 30 मार्च का समय आवंटित किया गया है. चर्चा की शुरुआत शिवसेना सांसद श्रीकांत शिंदे करेंगे.

बीमारी से जंग और भाई के अधूरे सपनों को पूरा करने का साहस लिए अरुणाचल की अनाई ने जीता स्वर्ण

बीमारी से जंग और भाई के अधूरे सपनों को पूरा करने का साहस लिए अरुणाचल की अनाई ने जीता यादगार केआईटीजी स्वर्ण रायपुर खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स के पहले संस्करण के लिए रायपुर रवाना होने से कुछ ही दिन पहले अरुणाचल प्रदेश की 21 वर्षीय वेटलिफ्टर अनाई वांगसु अस्पताल के बिस्तर पर थीं। उनकी पुरानी गैस्ट्रिक समस्या एक बार फिर उभर आई थी और ताकत लौटाने के लिए उन्हें इंट्रावेनस फ्लूइड्स पर रखा गया। ऐसे में उनके इन खेलों में भाग लेने पर ही सवाल खड़े हो गए थे।           अनाई के लिए यह संघर्ष नया नहीं है। 2019 से वह इस बीमारी से जूझ रही हैं, जो बिना किसी चेतावनी के उन्हें कमजोर, डिहाइड्रेटेड और थका हुआ बना देती है—एक ऐसे खेल में जहां ताकत और संतुलन सबसे अहम होते हैं।              लेकिन इस शारीरिक चुनौती के आगे हार मानने के बजाय अनाई ने वापसी की। अस्पताल से छुट्टी मिलने के अगले ही दिन वह फिर से प्रशिक्षण में जुट गईं, क्योंकि इस बार वह अपने करियर के ‘करीब आकर चूक जाने’ की कहानी को बदलना चाहती थीं।              अनाई ने यहां महिलाओं के 58 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण जीतने के बाद साई मीडिया से कहा,” मैंने पहले कांस्य और रजत पदक जीते थे और परिवार में सभी पूछते थे कि मैं स्वर्ण कब जीतूंगी। अब सब बहुत खुश हैं कि आखिरकार मैंने यह लक्ष्य हासिल कर लिया।”          इससे पहले अनाई ने यूथ नेशनल्स में दो कांस्य पदक जीते थे। इसके अलावा उन्होंने विभिन्न खेलो इंडिया प्रतियोगिताओं, जिसमें 2025 का खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स (राजस्थान) भी शामिल है, में रजत पदक हासिल किए। लेकिन स्वर्ण हर बार उनसे थोड़ा दूर रह जाता था।             पिछले साल ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी नेशनल्स में वह केवल एक लिफ्ट से स्वर्ण चूक गई थीं, क्योंकि एक मिनट की समय सीमा समाप्त हो गई थी। उस पल की टीस आज भी उनके दिल में है। उन्होंने उस पाल को याद किया,” उस दिन मैं बहुत रोई थी। लगा जैसे मेरी सारी मेहनत बेकार हो गई।”          वांगचो जनजाति से ताल्लुक रखने वाली अनाई की वेटलिफ्टिंग यात्रा उनके बड़े भाई सिंचाड बांसु के सपनों से जुड़ी है, जो खुद राष्ट्रीय स्तर के वेटलिफ्टर रह चुके हैं और अब अरुणाचल प्रदेश पुलिस में कार्यरत हैं।            सिंचाड ही उन्हें पहली बार इटानगर के स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) केंद्र में ट्रायल्स के लिए लेकर गए थे। शुरुआत में अनाई की दिलचस्पी इस खेल में नहीं थी। वह बॉक्सर बनना चाहती थीं, खासकर मैरी कॉम की फिल्म से प्रेरित होकर। लेकिन उनके भाई ने उन्हें समझाया और वेटलिफ्टिंग पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित किया। जल्द ही अनाई को लखनऊ के एनसीओई में उन्नत प्रशिक्षण के लिए चयनित कर लिया गया।         हालांकि, कोविड-19 महामारी के दौरान उन्हें वापस अरुणाचल लौटना पड़ा, जहां पर्याप्त पोषण और संसाधनों की कमी ने उनकी गैस्ट्रिक समस्या को और बढ़ा दिया।          अनाई ने कहा,” मैं बहुत मेहनत करती हूं, लेकिन कभी-कभी मेरी सेहत अचानक खराब हो जाती है। समझ नहीं आता कि मेरा शरीर मेरा साथ क्यों नहीं देता।”          भारत के लिए खेलने का सपना रखने वाली अनाई ने यह भी जोड़ा कि यहां मिला स्वर्ण पदक उन्हें यह भरोसा देता है कि उनकी मेहनत बेकार नहीं जा रही है। —

वन विभाग की बड़ी कार्रवाई: बिलासपुर के रिसॉर्ट में हिरण शिकार का खुलासा, 4 आरोपी धराए

बिलासपुर. छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के पर्यटन मंडल के रिसार्ट में हिरण का शिकार किया गया। वन विभाग की टीम ने रिसार्ट में छापेमारी कर हिरण के पके मीट बरामद किए है। मैनेजर समेत 4 कर्मचारियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। मामला कोटा क्षेत्र के बेलगहना स्थित कुरदर के एथनिक रिसार्ट का है। दरअसल, वन विभाग को शुक्रवार को सूचना मिली थी कि, बेलगहना वन परिक्षेत्र के कुरदर स्थित प्राइवेट रिसार्ट में हिरण का शिकार कर उसके मांस को पकाया जा रहा है। अफसरों ने रिसार्ट में दबिश देकर तलाशी ली, तो किचन में कड़ाही पर मांस पकाया जा रहा था। पर्यटन मंडल का है रिसार्ट जांच में पता चला कि, एथनिक रिसार्ट पर्यटन मंडल संचालित करता है। जहां 8 से 10 कर्मचारी कार्यरत हैं। मैनेजर और कर्मचारियों के लिए हिरण का मीट बनाया जा रहा था। टीम ने कुक रामकुमार टोप्पो समेत रिसॉर्ट के मैनेजर रजनीश सिंह सहित रमेश यादव, संजय वर्मा को पकड़ा है। उनके खिलाफ वन्यजीव संरक्षण कानून के उल्लंघन का केस दर्ज किया है। मैनेजर समेत कर्मचारियों ने कुक को बताया दोषी वन विभाग के अफसरों ने मैनेजर रजनीश सिंह के साथ कर्मचारियों से पूछताछ की, तब उन्होंने खुद का बचाव करते हुए कहा कि, उन्हें नहीं पता मांस किसका है। उन्होंने पूरा दोष कुक रामकुमार टोप्पो पर मढ़ दिया। जबकि, कुक रामकुमार ने कहा कि उसे इस बारे में कुछ जानकारी नहीं है। उसे गांव के जनक बैगा ने पत्ते में मांस लाकर दिया था। कुक रामकुमार टोप्पो, जिसे पूछताछ कर गिरफ्तार कर लिया गया। जांच के लिए जबलपुर लैब भेजा जाएगा मीट वन विभाग की टीम ने गिरफ्तार आरोपियों का बयान दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया है। अफसरों ने बताया कि, जब्त मांस को जांच के लिए जबलपुर लैब भेजा जाएगा, ताकि पुष्टि हो सके कि यह हिरण का ही मांस है या नहीं। हालांकि, वन विभाग की जांच में हिरण के बाकी अवशेषों का कुछ पता नहीं चल सका है। जंगल में बेधड़क हो रहा वन्य जीवों का शिकार कोटा-बेलगहना क्षेत्र में इससे पहले भी वन्य जीवों के शिकार हो चुके हैं। जंगल में करंट लगाकर बाघ-तेंदुआ के साथ ही जंगली सुअरों का भी शिकार किया जा रहा है। बताया जा रहा है कि क्षेत्र में कई प्राइवेट रिसार्ट भी हैं, जहां इसी तरह हिरण का शिकार कर मीट बनाया जाता है। लेकिन, वन विभाग के अफसरों ने अब तक प्राइवेट रिसार्ट में छापेमारी नहीं की है।