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हिमालय के जंगलों में गिरावट, सरकारी रिपोर्ट ने किया खुलासा- 2 साल में 2.2% ग्रीन कवर गायब

 नई दिल्ली भारतीय हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण को लेकर एक परेशान करने वाली रिपोर्ट सामने आई है. केंद्रीय मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने राज्यसभा में जानकारी दी है कि साल 2021 से 2023 के बीच हिमालयी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 'ट्री कवर' में 2.27 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। शुक्रवार को राज्यसभा में एक सवाल का लिखित जवाब देते हुए मंत्री ने 'इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट' (ISFR) 2023 के आंकड़े पेश किए. रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 में ट्री कवर 15,427.11 वर्ग किलोमीटर था, जो कि 2023 में घटकर 15,075.5 वर्ग किलोमीटर रह गया। ये आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ दो सालों में हिमालय की हरियाली में बड़ी कमी आई है. इस क्षेत्र में जम्मू और कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और उत्तर-पूर्वी राज्यों सहित कुल 13 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं। कार्बन स्टॉक में मामूली बढ़ोतरी एक तरफ जहां पेड़ों की संख्या कम हुई है, वहीं जंगलों में मौजूद कुल कार्बन स्टॉक में बहुत मामूली बढ़ोतरी देखी गई है. 2021 में ये 3,272.68 मिलियन टन था, जो 2023 में बढ़कर 3,273.10 मिलियन टन हो गया है. कार्बन स्टॉक का बढ़ना पर्यावरण के लिए अच्छा संकेत माना जाता है क्योंकि ये वातावरण से कार्बन सोखने की क्षमता को दिखाता है। जंगलों की स्थिति पर बात करते हुए मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने कहा, 'जंगलों का स्वास्थ्य सिर्फ उनकी हरियाली से नहीं मापा जाता. ये कई इकोलॉजिकल और बायोफिजिकल स्टैंडर्ड्स पर निर्भर करता है। भारतीय वन सर्वेक्षण क्यों करता है जंगलों की स्टडी? भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) जंगलों की सेहत जांचने के लिए कई तरह के आंकड़े जुटाता है. इसमें मिट्टी की गहराई, मिट्टी का कटाव, वनस्पति की विशेषताएं और जंगलों को होने वाले खतरों की स्टडी की जाती है. ये सभी कारक मिलकर ये तय करते हैं कि किसी खास समय में जंगलों की स्थिति क्या है। हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण में हो रहे ये बदलाव विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय हैं, क्योंकि ये क्षेत्र न सिर्फ जैव विविधता बल्कि भारत की प्रमुख नदियों का भी स्रोत है।  

ईरान ने 14 दिन की जंग में US को भीख मंगवाया, दुबई बना घोस्ट टाउन! अमीरों ने छोड़ा ‘सबसे सुरक्षित’ शहर

दुबई ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच चल रही जंग के कारण दुबई में अभूतपूर्व स्थिति पैदा हो गई है। पहले दुनिया के सबसे सुरक्षित और चमकदार शहरों में शुमार दुबई अब लगभग खाली नजर आ रहा है। विदेशी निवासी और पर्यटक बड़े पैमाने पर शहर छोड़ चुके हैं, जबकि बीचेस, पार्टी पूल, बीच क्लब और रेस्तरां सुनसान पड़े हैं। केवल स्थानीय मजदूर वर्ग ही बचा हुआ है जो अब खाली जगहों पर काम कर रहा है। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक, शहर की यह स्थिति ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों के हमलों से पैदा हुई है। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद, ईरान ने पलटवार करते हुए खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। यूएई (अबू धाबी और अन्य इलाकों) में अमेरिकी बेस होने के कारण, ईरान ने यहां सैकड़ों ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलें दागी हैं। इसी तनाव ने दुबई की चकाचौंध को खौफ में बदल दिया है। दुबई से सामने आ रहे वीडियो में चकाचौंध से भरा रहने वाला यह शहर किसी घोस्ट टाउन जैसा दिख रहा है। 14 दिन की जंग में ही अमेरिका को भीख मंगवा दिया  अमेरिका और ईरान के भी जंग के साथ बयानबाजी भी काफी तेज हो गई है. ईरान के खर्ग द्वीप को तबाह करने के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दावे के बीच तेहरान ने भी बेहद चुभने वाला कटाक्ष किया है। शिया मुल्क ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर निशाना साधते हुए कहा है कि मात्र 14 दिन की जंग में हमने अमेरिका से भीख मंगवा दिया है. ईरान का यह बयान रूस से तेल खरीदने की अमेरिकी अपील को लेकर आया है. दरअसल, अमेरिका ने दुनिया के देशों से रूस से तेल खरीदने की अपील की है ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उछाल को थामा जा सके। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा- अमेरिका महीनों से भारत पर रूसी तेल नहीं खरीदने का दबाव बना रहा था, लेकिन ईरान के साथ दो सप्ताह की जंग में ही व्हाइट हाउस अब भारत सहित दुनिया के सामने गिड़गिड़ा रहा है. वह भीख मांग रहा है कि दुनिया रूस से तेल खरीदे। अरागची ने यूरोपीय देशों को भी निशाने पर लिया. उन्होंने कहा कि वे अमेरिका के इस ‘अवैध जंग’ को सपोर्ट कर रहे हैं. उनको लगता है कि वे ईरान के खिलाफ अमेरिकी का इस अवैध जंग को सपोर्ट कर रूस के खिलाफ वाशिंगटन का समर्थन हासिल कर लेंगे. लेकिन, यह एक बकवास सोच है। ईरान के हमलों का असर: 1700 मिसाइल-ड्रोन, लेकिन 90% रोक दिए गए ईरान ने अमेरिकी-इजराइली हमलों के जवाब में पिछले दो हफ्तों में लगभग 1700 मिसाइलें और ड्रोन दुबई समेत यूएई पर दागे। यूएई की एयर डिफेंस सिस्टम ने करीब 90% हमलों को रोक लिया, लेकिन गिरते मलबे (डेब्री) ने बड़ा नुकसान पहुंचाया। बुर्ज अल अरब होटल, फेयरमॉन्ट द पाम, दुबई इंटरनेशनल फाइनेंशियल सेंटर, दुबई एयरपोर्ट और कई स्काईस्क्रेपर्स को नुकसान पहुंचा। एयरपोर्ट पर दो ड्रोनों के गिरने से चार लोग घायल हुए और उड़ानें अस्थायी रूप से रोक दी गईं। दुबई मीडिया ऑफिस ने शुरुआत में कोई घटना नहीं हुई कहा, लेकिन तस्वीरें और रिपोर्ट्स ने सच्चाई उजागर कर दी। शहर खाली क्यों? एक्सपैट्स ने सामान बांधा, पालतू जानवर सड़कों पर छोड़े द सन की रिपोर्ट के मुताबिक, दुबई में रहने वाले हजारों अमीर विदेशी निवासी और पर्यटक शहर छोड़ चुके हैं। स्कूलों की स्प्रिंग ब्रेक शुरू होने के बावजूद पश्चिमी बच्चे नदारद हैं। बीच क्लबों और रेस्तरां में सन लाउंजर्स खाली पड़े हैं, जबकि पहले यहां इन्फ्लुएंसर्स और टूरिस्टों की भीड़ रहती थी। सीएनबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, कई विदेशी निवासियों ने कहा कि जन-जीवन लगभग सामान्य है, लेकिन फोन पर शेल्टर अलर्ट, आसमान में फ्लैश और गिरते डेब्री की आग सब कुछ बदल देती है। ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार, पश्चिमी देशों के पेशेवर और रईस लोग चार्टर्ड फ्लाइट्स के जरिए भारी रकम चुकाकर भाग रहे हैं। रातों-रात शहर छोड़ने की जल्दबाजी में कई लोग अपने पालतू जानवरों तक को सड़कों पर लावारिस छोड़ गए हैं। एयरपोर्ट पर उड़ानें सीमित हैं, जिससे हजारों लोग फंस गए थे। अमेरिका ने अपने नागरिकों को निकालने के लिए चार्टर फ्लाइट्स शुरू की हैं। टूरिज्म धड़ाम, जुमेराह बीच वीरान 'गल्फ टाइम्स' के अनुसार मध्य पूर्व में इस युद्ध के कारण पर्यटन उद्योग को रोजाना करीब 600 मिलियन डॉलर का नुकसान हो रहा है। जुमेराह बीच रेजीडेंस (JBR), रेस्टोरेंट्स और दुबई मॉल जैसे इलाके, जहां पैर रखने की जगह नहीं होती थी, आज लगभग सुनसान पड़े हैं। दुनिया के सबसे बड़े फेरिस व्हील 'ऐन दुबई' के पहिए भी थम गए हैं। फंस गए आम मजदूर इस पूरी स्थिति का सबसे डरावना पहलू यह है कि जहां पैसे वाले लोग दुबई छोड़कर निकल गए, वहीं दक्षिण एशियाई देशों (भारत, पाकिस्तान, नेपाल आदि) के लाखों ब्लू-कॉलर वर्कर, टैक्सी ड्राइवर और होटल कर्मचारी यहीं फंस गए हैं। काम ठप होने से इनकी सैलरी रुक गई है और फ्लाइट्स का किराया तीन गुना तक बढ़ जाने के कारण इनके लिए स्वदेश लौटना नामुमकिन सा हो गया है। राहत की बात यह है कि इस अस्थिरता के बीच भारत सरकार और एयरलाइंस के प्रयासों से 1 से 7 मार्च के बीच 52,000 से अधिक भारतीय नागरिक यूएई और खाड़ी देशों से सुरक्षित भारत लौट चुके हैं। सरकार की प्रतिक्रिया और फ्री स्पीच पर अंकुश यूएई सरकार ने एयर डिफेंस को मजबूत किया और नागरिकों को आश्वासन दिया। लेकिन पुलिस ने चेतावनी दी है- हमले की तस्वीरें या वीडियो शेयर करने पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है। अब तक 21 लोगों पर अफवाह फैलाने का केस दर्ज किया जा चुका है, जिनमें एक 60 वर्षीय ब्रिटिश टूरिस्ट भी शामिल है। ब्रिटिश एंबेसी ने नागरिकों को सावधान किया है कि यूएई कानून बहुत सख्त हैं। कुल मिलाकर दुबई की स्थिति अभी भी 'खतरे से बाहर' नहीं है, लेकिन बड़े पैमाने पर क्षति या हताहत नहीं हुए हैं। शहर की चमक कम हुई है, लेकिन मजदूर वर्ग और कुछ स्थानीय निवासियों के साथ जीवन जारी है। तेल की कीमतें, उड़ानें और पर्यटन पर असर वैश्विक स्तर पर पड़ रहा है।

LPG संकट पर राहत: 92 हजार टन गैस लेकर भारत पहुंचेंगे दो विशाल जहाज

देश  पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारत के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में पैदा हुई अनिश्चितता के बावजूद, भारत के झंडे वाले दो बड़े मालवाहक जहाज करीब 92 हजार टन एलपीजी लेकर सुरक्षित रूप से भारत की ओर बढ़ रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार, ये जहाज गुजरात के बंदरगाहों पर पहुंचने वाले हैं, जिससे देश में गैस आपूर्ति की स्थिति में सुधार होगा। गुजरात के मुंद्रा और कांडला बंदरगाह पर पहुंचेगी खेप शिपिंग मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी राजेश कुमार सिन्हा के अनुसार, भारत के दो जहाज 'शिवालिक' (Shivalik) और 'नंदा देवी' (Nanda Devi) ने सफलतापूर्वक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पार कर लिया है। शिवालिक – 16 मार्च को गुजरात के मुंद्रा बंदरगाह पहुंचेगा। नंदा देवी – 17 मार्च को कांडला बंदरगाह पर लंगर डालेगा। इन दोनों जहाजों में कुल 92,700 मीट्रिक टन एलपीजी है। वर्तमान में फारस की खाड़ी में 22 अन्य भारतीय जहाज भी मौजूद हैं और उनमें तैनात सभी 611 नाविक सुरक्षित हैं। पैनिक बुकिंग से बढ़ी मांग, आपूर्ति पर सरकार की नजर पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने स्पष्ट किया कि यद्यपि भू-राजनीतिक हालात चुनौतीपूर्ण हैं, लेकिन देश में गैस खत्म होने जैसी स्थिति नहीं है। उन्होंने बताया कि आपूर्ति में बाधा की आशंका के चलते लोगों ने 'पैनिक बुकिंग' शुरू कर दी है, जिससे मांग 76 लाख से बढ़कर 88 लाख तक पहुंच गई है। सरकार स्थिति पर बारीकी से नजर रख रही है और रिफाइनरियां पूरी क्षमता के साथ काम कर रही हैं। क्या है होर्मुज जलडमरूमध्य? होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) फारस की खाड़ी (Persian Gulf) और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित एक अत्यंत संकरा और रणनीतिक समुद्री मार्ग है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल और गैस शिपिंग मार्गों में से एक है, जिससे होकर वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20% से 25% हिस्सा गुजरता है। यह ईरान और ओमान के बीच स्थित है। पेट्रोल-डीजल का पर्याप्त भंडार, PNG पर जोर सरकार ने भरोसा दिलाया है कि देश में पेट्रोल और डीजल की कोई कमी नहीं है, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का अधिकांश उत्पादन स्वयं करता है। जिन व्यावसायिक क्षेत्रों में एलपीजी की किल्लत हो रही है, वहां पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) कनेक्शन देने की प्रक्रिया को तेज किया जा रहा है। तमिलनाडु सरकार की पहल – इंडक्शन चूल्हे पर मिलेगी सब्सिडी कमर्शियल एलपीजी की किल्लत को देखते हुए तमिलनाडु सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की समीक्षा बैठक के बाद राज्य सरकार ने घोषणा की है कि होटल, रेस्टोरेंट और चाय की दुकानें जो गैस के बजाय इंडक्शन चूल्हे का उपयोग करेंगे, उन्हें बिजली पर 2 रुपये प्रति यूनिट की सब्सिडी दी जाएगी। यह योजना तब तक जारी रहेगी जब तक कमर्शियल एलपीजी की आपूर्ति पर प्रतिबंध या अनिश्चितता बनी रहेगी।  

84 ईरानी नाविकों के शव तुर्की के प्लेन से श्रीलंका से रवाना, शिया देश ने बदले की कसम खाई

कोलंबो  हिंद महासागर में अमेरिकी हमले का शिकार बने ईरानी युद्धपोत IRIS डेना को लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है. श्रीलंका ने इस हमले में मारे गए 84 ईरानी नाविकों के शव स्वदेश वापस भेज दिए हैं. ये शव श्रीलंका के दक्षिणी तट पर गाले के पास युद्धपोत डूबने के बाद बरामद किए गए थे. बताया गया है कि ये शव शुक्रवार को तुर्किये की एक निजी एयरलाइन के विमान से ईरान रवाना किए गए. यह ईरानी पोत भारत के विशाखापत्तनम से ईरान लौट रहा था, जहां उसने इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026 में हिस्सा लिया था. अमेरिका ने डुबो दिया था जहाज रिपोर्ट्स के मुताबिक, 4 मार्च को श्रीलंका के गाले तट के पास हिंद महासागर में इस युद्धपोत पर अमेरिकी टॉरपीडो हमला हुआ, जिसके बाद यह डूब गया. हमले के बाद 84 नाविकों के शव बरामद किए गए थे, जबकि 32 लोग जिंदा बच गए, जिनका इलाज श्रीलंका के अस्पताल में किया गया. श्रीलंका के मुख्य मजिस्ट्रेट ने 11 मार्च को करापितिया नेशनल हॉस्पिटल के निदेशक को आदेश दिया था कि वे इन शवों को ईरान के दूतावास को सौंप दें. इससे पहले श्रीलंका सरकार ने कहा था कि हालात सामान्य होने तक शवों को वहीं रखा जाएगा, ताकि उन्हें सुरक्षित तरीके से वापस भेजा जा सके. हमले में बचे 32 नाविकों को रविवार को अस्पताल से छुट्टी भी दे दी गई थी. ईरान ने शहीदों के बदले की खाई कसम इस बीच, ईरान ने इस हमले को लेकर कड़ा रुख दिखाया है. न्यूज एजेंसी IANS की रिपोर्ट के मुताबिक ईरानी सेना के कमांडर इन चीफ अमीर हातमी ने कहा है कि ईरान अपने युद्धपोत पर हुए हमले का जवाब जरूर देगा. उन्होंने कहा कि डेना जहाज और उसके जवानों की कुर्बानी ईरानी नौसेना के इतिहास में हमेशा याद रखी जाएगी और देश अपनी समुद्री सीमाओं की रक्षा के लिए नौसेना को और मजबूत बनाएगा. ईरान की सरकारी न्यूज एजेंसी IRNA के मुताबिक, यह जहाज किसी युद्ध में शामिल नहीं था और सैन्य अभ्यास पूरा करके वापस लौट रहा था, तभी उस पर हमला हुआ. ईरान के विदेश मंत्री सईद अब्बास अराघची ने भी इस घटना की कड़ी निंदा की और इसे ‘समुद्र में की गई बर्बरता’ बताया.  

कोविड पीड़ितों के लिए मुआवजा: ‘नो-फॉल्ट’ कंपेंसेशन पॉलिसी से मिलेगा न्याय या बढ़ेगी चुनौती?

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसमें केंद्र सरकार को कोविड-19 वैक्सीन के गंभीर साइड इफेक्ट्स या इससे होने वाली मौतों के लिए 'नो-फॉल्ट' कंपेंसेशन पॉलिसी बनाने का निर्देश दिया गया है. इस फैसले के अनुसार, प्रभावित परिवारों को यह साबित करने की जरूरत नहीं होगी कि मौत या कोई गंभीर इफेक्ट्स के लिए राज्य सरकार किसी भी तरह से जिम्मेदार है. राज्य की जिम्मेदारी है कि वह सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियान के दौरान होने वाली दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के लिए राहत प्रदान करे. यह फैसला उन याचिकाओं पर आया है, जहां वैक्सीन लेने के बाद मौत या गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का दावा किया गया था. यह निर्णय न्याय की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है। हालांकि इस फैसले को लागू करने में बहुत सी व्यावहारिक चुनौतियां हैं. क्योंकि इसके कार्यान्वयन में इतनी तरह की जटिलताएं हैं जिसका निदान करना असंभव हो सकता है.पर एक देश और समाज के रूप में, हमें इस फैसले की गहराई को समझना होगा. यह फैसला अव्यावहारिक लग सकता है लेकिन लंबे समय में महत्वपूर्ण साबित होगा. फैसले की पृष्ठभूमि में कोविड महामारी के दौरान भारत में चलाया गया दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीनेशन अभियान है. करोड़ों लोगों को वैक्सीन दी गई, जिसने संक्रमण दर को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाई। हालांकि, सरकारी आंकड़ों से भी पता चलता है कि कुछ मामलों में वैक्सीन के बाद मौतें हुईं  हैं. यह बात तो वैक्सीन बनाने वालों ने भी स्वीकार किया था कि कुछ मामलों में साइड इफेक्ट संभव है. दुनिया की कोई भी वैक्सीन अपने आप को हंड्रेड परसेंट सुरक्षित होने का दावा नहीं कर सकती हैं. पर दुनिया भर में तरह तरह के वैक्सीन आम जनता के स्वास्थ्य को सुरक्षित करने के लिए लगाईं जाती हैं. शायद यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार को आधार बनाते हुए कहा कि जब वैक्सीनेशन राज्य-प्रायोजित कार्यक्रम है, तो प्रभावितों को अदालतों में लंबी लड़ाई लड़ने के बजाय सीधा मुआवजा मिलना चाहिए. 'नो-फॉल्ट' का मतलब है कि बिना दोष साबित किए राहत, जो कई विकसित देशों में पहले से लागू है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या यह भारत जैसे विकासशील देश में व्यावहारिक है? सबसे बड़ी चुनौती कार्यान्वयन की है. वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स को साबित करना वैज्ञानिक रूप से जटिल है. कोविड वैक्सीन जैसे कोविशील्ड या कोवैक्सिन के बाद देश में बहुत सी मौतें हुईं हैं, लेकिन क्या हर दावे की जांच कैसे हो सकती है? अदालत ने स्वास्थ्य मंत्रालय को पॉलिसी बनाने का आदेश दिया है, लेकिन सरकार कोई ऐसी सर्वसुलभ प्रक्रिया बना पाएगी . इसमें संदेह है. उदाहरण के लिए, अमेरिका या यूके में ऐसी पॉलिसी है, लेकिन उनके पास मजबूत स्वास्थ्य डेटा सिस्टम हैं। भारत में ग्रामीण इलाकों को छोड़िए शहरों में भी मेडिकल रिकॉर्ड इस तरह के नहीं हैं कि अदालत में यह साबित किया जा सके कि अमुक व्यक्ति की मौत कोविड के चलते हुई है. ग्रामीण इलाकों में तो मेडिकल रिकॉर्ड माशा अल्ला है. अब सवाल उठता है कि क्या वैक्सीन और मौत के बीच सीधा संबंध स्थापित करने के लिए विशेषज्ञ पैनल बनाए जाएंगे? अगर हां, तो क्या सरकार के पास इतने प्रशासनिक संसाधन है कि वह इसे क्रियान्वित कर सकेगी? स्वास्थ्य मंत्रालय पहले से ही AEFI (एडवर्स इफेक्ट्स फॉलोइंग इम्यूनाइजेशन) की निगरानी करता है, लेकिन मौतों के मामलों में जांच लंबी चलती है. नई पॉलिसी से दावों की बाढ़ आ सकती है, जिसमें वास्तविक और फर्जी दोनों शामिल होंगे.देश में दलालों के रैकेट सक्रिय हो जाएगा जो सामान्य मौतों को भी कोविड से हुई मौत साबित करना शुरू कर देंगे.   दुरुपयोग की आशंका से सिस्टम चरमरा सकता है, और वित्तीय बोझ जो बढ़ेगा वो अलग से है। इसके अलावा, यह फैसला वैक्सीन उत्पादकों की जिम्मेदारी को भी प्रभावित कर सकता है. वर्तमान में, वैक्सीन कंपनियां इंडेम्निटी क्लॉज के तहत सुरक्षित हैं, यानी वे सीधे जिम्मेदार नहीं. अगर राज्य मुआवजा देगा, तो क्या यह कंपनियों को और लापरवाह बना देगा? वैश्विक स्तर पर देखें तो WHO की COVAX योजना में भी ऐसी प्रावधान हैं, लेकिन भारत जैसे देश में जहां वैक्सीन आयात और उत्पादन दोनों होते हैं, यह जटिल हो जाता है। इन सब के बावजूद इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि एक लोकतांत्रिक समाज में, राज्य की जिम्मेदारी सिर्फ वैक्सीन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उसके जोखिमों को भी संभालना है. महामारी ने दिखाया कि वैक्सीनेशन सामूहिक प्रयास था, लेकिन कुछ लोगों ने व्यक्तिगत कीमत चुकाई. ऐसे में, 'नो-फॉल्ट' पॉलिसी न्याय सुनिश्चित करती है. यह अनुच्छेद 21 को मजबूत करती है, जो जीवन के अधिकार को सिर्फ नकारात्मक (हानि न करने) नहीं, बल्कि सकारात्मक (रक्षा करने) रूप में देखता है। अदालत ने कहा कि राज्य स्वास्थ्य संरक्षण का दायित्व निभाए, जो सार्वजनिक विश्वास बढ़ाएगा. कल्पना कीजिए, अगर भविष्य में कोई नई महामारी आई, तो लोग वैक्सीन से डरेंगे नहीं क्योंकि वे जानेंगे कि दुर्घटना में सहायता मिलेगी. यह सामाजिक न्याय का प्रतीक है, जहां गरीब परिवारों को अदालतों की लंबी प्रक्रिया से मुक्ति मिलेगी. कई मामलों में, जैसे दो युवतियों की मौत पर याचिका, परिवारों ने संघर्ष किया. यह फैसला उन्हें राहत देगा और समाज को संदेश देगा कि राज्य अपने नागरिकों के साथ खड़ा है।

अमेरिका का बड़ा कदम: मिडल ईस्ट में 2500 नौसैनिक और युद्धपोत भेजने का आदेश

दुबई अमेरिकी सेना ने मिडिल ईस्ट में 2,500 मरीन (नौसैनिक) और एक बख्तरबंद नौसैनिक युद्धपोत भेजने का आदेश दिया है. ईरान के खिलाफ युद्ध के बाद इस इलाके में अमेरिकी सेना की यह बड़ी तैनाती है। इस घोषणा के कुछ घंटों बाद, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी फोर्स ने ईरान के खार्ग द्वीप पर सैन्य ढांचे को 'खत्म' कर दिया है और चेतावनी दी कि अगला निशाना द्वीप का तेल इंफ्रास्ट्रक्चर हो सकता है. खार्ग द्वीप तेल सप्लाई का मुख्य टर्मिनल है जो ईरान के तेल एक्सपोर्ट को हैंडल करता है. एक दिन पहले, ईरानी संसद के स्पीकर ने चेतावनी दी थी कि इस तरह के हमले से बदले की कार्रवाई का एक नया स्तर शुरू होगा। फॉक्स न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि युद्ध तब खत्म होगा "जब मैं इसे अपनी हड्डियों में महसूस करूंगा." वह विरोधियों द्वारा इस्लामिक सरकार को गिराने की संभावना को लेकर भी अधिक सावधान थे। ट्रंप ने ईरान के अर्धसैनिक बल बसीज का हवाला देते हुए कहा, "इसलिए मुझे सचमुच लगता है कि जिन लोगों के पास हथियार नहीं हैं, उनके लिए यह एक बड़ी बाधा है." बसीज बल ने हाल के देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों को कुचलने में केंद्रीय भूमिका निभाई है। मरीन और युद्धपोत अमेरिकी सेना में शामिल होंगे अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक, 31वीं मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट और एम्फीबियस असॉल्ट शिप USS त्रिपोली को मिडिल ईस्ट जाने का ऑर्डर दिया गया है. उन्होंने नाम न बताने की शर्त पर संवेदनशील सैन्य योजनाएं पर बात करने के लिए एसोसिएटेड प्रेस से बात की। मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट्स जल-थलीय लैंडिंग कर सकती हैं, लेकिन वे दूतावास की सुरक्षा बढ़ाने, आम लोगों को निकालने और आपदा राहत में भी विशेषज्ञता प्राप्त करती हैं. बड़ी सैन्य तैनाती का मतलब यह नहीं है कि कोई ग्राउंड ऑपरेशन जल्द ही होने वाला है या होगा. नए मरीन की तैनाती के बारे में सबसे पहले द वॉल स्ट्रीट जर्नल ने रिपोर्ट किया था। अमेरिकी सेना द्वारा जारी तस्वीर के मुताबिक, 31वीं मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट, साथ ही यूएसएस त्रिपोली और मरीन को ले जाने वाले दूसरे एम्फीबियस असॉल्ट शिप जापान में हैं और कई दिनों से पैसिफिक ओशन में हैं. त्रिपोली को कमर्शियल सैटेलाइट ने ताइवान के पास अकेले चलते हुए देखा, इसे ईरान के जलक्षेत्र तक पहुंचने में एक हफ्ते से ज्यादा समय लग सकता है। इस हफ्ते की शुरुआत में, अमेरिकी नेवी के 12 जहाज थे, जिनमें एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस अब्राहम लिंकन और आठ डिस्ट्रॉयर शामिल थे, जो अरब सागर में काम कर रहे थे. अगर त्रिपोली इस बेड़े में शामिल हो जाता है, तो यह इस इलाके में लिंकन के बाद दूसरा सबसे बड़ा जहाज होगा। हालांकि मिडिल ईस्ट में जमीन पर मौजूद यूएस सर्विस मेंबर्स की कुल संख्या साफ नहीं है, लेकिन कतर में स्थित अल-उदीद एयर बेस, जो इस इलाके के सबसे बड़े एयर बेस में से एक है, में आम तौर पर लगभग 8,000 अमेरिकी सैनिक रहते हैं।

I love India, love Modi’, प्रेसिडेंट ट्रंप ने पाकिस्तान को आतंकवाद का सबसे बड़ा निर्यातक बताया

 नई दिल्ली अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कट्टर समर्थक और धुर-दक्षिणपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता लौरा लूमर ने कहा है कि दुनिया को पाकिस्तान का सबसे बड़ा निर्यात "इस्लामी आतंकवाद" है. लौरा लूमर ने सुझाव दिया कि अमेरिका को पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार के साथ बिल्कुल भी गलबहियां नहीं करनी चाहिए. लौरा लूमर अपनी मुस्लिम विरोधी बयानबाजी के लिए जानी जाती हैं. वे स्वयं को गौरवशाली प्राउड इस्लामोफोब कहती हैं. लौरा ने जिहाद फैलाने के लिए पाकिस्तान को खुले तौर पर लताड़ा। लौरा लूमर के साथ गरमागरम चर्चा हुई. इस्लामी आतंकवाद पर तीखी टिप्पणी करते हुए लूमर ने आरोप लगाया कि दुनिया भर में हुए कई आतंकवादी हमलों के तार पाकिस्तान से जुड़े हो सकते हैं. ट्रंप के चुनाव प्रचार के दौरान उनके साथ लगातार दिखने वालीं लौरा ने जोर देकर कहा कि भारत और ब्रिटेन में हाल ही में हुए आतंकवादी हमले पाकिस्तान में सक्रिय चरमपंथी नेटवर्क से जुड़े थे। लौरा ने कहा, "दुनिया को पाकिस्तान का सबसे बड़ा निर्यात इस्लामी आतंकवाद है, और मेरा मानना ​​है कि अमेरिका को पाकिस्तानी सरकार के साथ बिल्कुल भी नज़दीकी नहीं बढ़ानी चाहिए," लौरा ने कहा कि उन्होंने कई बार अमेरिकी सरकार की इस बात के लिए आलोचना की है।  लौरा लूमर ने बातचीत के बीच कहा कि, "पाकिस्तान एक खुले तौर पर जिहादी और शरिया-समर्थक देश के तौर पर काम करता है, और जब आप दुनिया भर में हुए कई इस्लामी आतंकी हमलों को देखते हैं, तो अक्सर उनका कोई न कोई तार पाकिस्तान से जुड़ा होता है।  'आतंकवाद ज्यादातर पाकिस्तान से आ रहा है' अपने दावे को मजबूत करने के लिए लूमर ने पिछले हफ़्ते एक पाकिस्तानी नागरिक आसिफ मर्चेंट को दोषी ठहराए जाने का ज़िक्र किया. मर्चेंट पर ट्रंप और अमेरिका के बड़े नेताओं की हत्या की साजिश रचने का आरोप था। लौरा लूमर ने आगे कहा कि इस घटना से एक बात साफ हो जाती है. ज़्यादातर आतंकवाद मुख्य रूप से पाकिस्तान से ही आ रहा है. उन्होंने कहा कि आप देखते हैं कि जब भी भारत पर इस्लामिक आतंक का हमला होता है, ब्रिटेन पर इस्लामिक आतंक का हमला होता है, आप देख रहे होंगे कि यूके का इस्लामिक टेकओवर हो गया है। अमेरिकी दक्षिणपंथी एक्टिविस्ट ने कहा कि उन्होंने इस बारे में राष्ट्रपति ट्रंप से बात की है, और उन्होंने कहा है कि वे ओवल ऑफिस में इस्लामिक नेताओं की मीटिंग नहीं देखना चाहती हैं. लेकिन वे अमेरिका के राष्ट्रपति हैं और मैं उन्हें नहीं कह सकती हूं कि उन्हें क्या नहीं करना चाहिए. राष्ट्रपति ट्रंप को डिप्लोमैटिक होना पड़ता है और उन्हें दुनिया भर के नेताओं से मिलना पड़ता है. मैं समझती हूं कि राष्ट्रपति ट्रंप को जो करना होता है वे वही करते हैं. कोई सबसे बड़ी गलती यही करेगा कि वह राष्ट्रपति को बताए कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए. मैं उनके लीडरशिप में विश्वास करती हूं। इमिग्रेशन पर अपनी विवादित टिप्पणियों और कट्टर विचारों के लिए जानी जाने वाली और ट्रंप की कट्टर समर्थक लूमर ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने संदेश में PM मोदी को "एक शानदार नेता और मेरा अच्छा दोस्त" बताया है। लौरा लूमर का ये पहला भारत दौरा है. कार्यक्रम के दौरान उनसे पूछा गया कि वे प्राय: कितनी बार राष्ट्रपति ट्रंप से बात करती हैं. तो लौरा ने कहा कि इस सप्ताह मैंने तीन बार उनसे बात की है. मैं व्हाइट हाउस में उनसे मिलती रहती हूं. कुल मिलाकर मेरी उनसे बात होती रहती है. लौरा लूमर ने कहा कि राष्ट्रपति के साथ हमारी दोस्ती इस वजह से महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वे मुझ पर भरोसा करते हैं कि मैं उन्हें सलाह दे सकती हूं कि कौन उनका वफादार है और कौन नहीं। कार्यक्रम में लौरा ने कहा कि वे काफी रिसर्च करती रहती हैं और देखती रहतीं है कि राष्ट्रपति के अंडर काम करने वाले कौन-कौन लोग हैं जो उनके एजेंडे को डिरेल करने में लगे रहते हैं या फिर अमेरिका फर्स्ट एजेंडा को नुकसान पहुंचाते हैं. मैं उनको तमाम चीजों पर अपडेट करती रहती हूं. लौरा से जब पूछा गया कि क्या वे ट्रंप प्रशासन में काम करना चाहेंगी. इस पर उन्होंने कहा कि ये उनके लिए गर्व की बात होगी. लौरा ने कहा कि ट्रंप प्रशासन के कई लोग उन्हें राष्ट्रपति तक पहुंचने से रोकते रहते हैं। लौरा लूमर ने कहा कि लोगों को बुरा लग सकता है लेकिन 'इस्लाम डेथ कल्ट' है और दुनिया के लिए कैंसर है।  

देश में मौसम का यू-टर्न: कहीं लू का कहर, तो कहीं ओलावृष्टि और मूसलाधार बारिश का खतरा

देश  इस साल मौसम के मिजाज ने वैज्ञानिकों और आम जनता दोनों को हैरान कर दिया है। सर्दियों की विदाई के बाद बसंत की गुलाबी ठंड गायब रही और सीधे भीषण गर्मी ने दस्तक दे दी। हालांकि, अब मौसम विभाग (IMD) ने एक नई चेतावनी जारी की है, जिसके मुताबिक अगले कुछ दिनों तक देश को लू (Heatwave) और तूफानी बारिश के दोहरे वार का सामना करना पड़ेगा। भीषण लू की चेतावनी राजस्थान से आ रही गर्म हवाओं ने मध्य प्रदेश सहित मध्य भारत को भट्टी बना दिया है। मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम में तापमान लगातार दूसरे दिन 40 डिग्री सेल्सियस के पार दर्ज किया गया। 15 मार्च तक मध्य प्रदेश, विदर्भ (महाराष्ट्र), कोंकण, सौराष्ट्र, कच्छ, ओडिशा और झारखंड में भीषण लू चलने की संभावना है। तेज धूप और शुष्क हवाओं के कारण दोपहर के समय सड़कों पर कर्फ्यू जैसा नजारा दिखने लगा है। हिमालयी क्षेत्रों में 'पश्चिमी विक्षोभ' का असर एक तरफ जहां मैदानी इलाके जल रहे हैं, वहीं पहाड़ी राज्यों में पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) सक्रिय हो रहा है। 14 मार्च से मौसम में बड़ा बदलाव आएगा: जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश में 14 मार्च तक हल्की बर्फबारी होगी, जो 15 से 19 मार्च के बीच और तेज हो सकती है। 15 और 16 मार्च को उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में ओले गिरने की प्रबल संभावना है। इस दौरान हवा की रफ्तार 70 किमी प्रति घंटे तक पहुंच सकती है। पूर्वोत्तर में भारी बारिश का 'रेड अलर्ट' देश के पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों में भारी बारिश का संकट मंडरा रहा है:अरुणाचल प्रदेश: 13 से 16 मार्च के बीच मूसलाधार बारिश की चेतावनी। असम, मेघालय और सिक्किम: 13 से 15 मार्च के दौरान भारी बारिश के साथ बिजली गिरने की आशंका है। धूल भरी आंधी और गरज-चमक मौसम विभाग के अनुसार, 15 और 16 मार्च को उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में धूल भरी आंधी चल सकती है: राजस्थान, पंजाब और हरियाणा: 14-15 मार्च को छिटपुट बारिश और गरज-चमक के साथ 30-50 किमी/घंटा की रफ्तार से हवाएं चलेंगी। उत्तर प्रदेश: 15 और 16 मार्च को पूर्वी और पश्चिमी यूपी में ओलावृष्टि और बारिश की संभावना जताई गई है, जिससे तापमान में थोड़ी गिरावट आ सकती है। कैसा रहेगा एमपी का मौसम? मध्य प्रदेश में फिलहाल गर्मी से राहत मिलने के आसार कम हैं, लेकिन 14 मार्च के बाद सक्रिय होने वाले पश्चिमी विक्षोभ के कारण बादलों की आवाजाही शुरू हो सकती है, जिससे रात के तापमान में मामूली बदलाव संभव है। मौसम विभाग ने लू के दौरान दोपहर 12 से 3 बजे के बीच घर से बाहर निकलने से बचने और ओलावृष्टि के समय सुरक्षित स्थानों पर रहने की अपील की है।

प्रधानमंत्री मोदी का बयान, सरकार वैश्विक संघर्षों के प्रभाव को कम करने के लिए कर रही है काम

सिलचर  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को कहा कि केंद्र सरकार दुनिया भर में हो रहे झगड़ों का लोगों पर पड़ने वाले असर को कम करने के लिए काम कर रही है. उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी कांग्रेस देश में पैनिक पैदा करने की कोशिश करके "गैर-जिम्मेदाराना" काम कर रही है।  प्रधानमंत्री ने यह बात असम के सिलचर शहर में विधानसभा चुनाव से पहले 23,550 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट्स का उद्घाटन करने के बाद एक रैली को संबोधित करते हुए कही.उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने नॉर्थईस्ट को नजरअंदाज किया और आजादी के समय ऐसा बॉर्डर बनाने दिया जिससे बराक वैली की समुद्र तक पहुंच काट दी।  उन्होंने कहा, दुनिया युद्धों का सामना कर रही है, हमारी कोशिश है कि देश के लोगों पर उनका असर कम से कम हो।  उन्होंने आरोप लगाया, "कांग्रेस को एक जिम्मेदार राजनीतिक पार्टी की भूमिका निभानी चाहिए थी, लेकिन वह ऐसा करने में नाकाम रही. वह लोगों में पैनिक पैदा करने की कोशिश कर रही है।  उन्होंने दावा किया, "उनके पास न तो असम के लिए और न ही देश के लिए कोई विजन है, बल्कि वे सिर्फ मोदी को गाली देना, लोगों को गुमराह करने के लिए अफवाहें और झूठ फैलाना जानते हैं." मोदी ने कहा कि बराक घाटी कभी व्यापार और वाणिज्य का प्रमुख केंद्र थी।  उन्होंने आरोप लगाया, जैसे कांग्रेस ने नॉर्थ-ईस्ट को अपने हाल पर छोड़ दिया, वैसे ही बराक वैली को कमजोर करने में भी उसकी बड़ी भूमिका रही. जब भारत आजाद हुआ, तो कांग्रेस ने एक ऐसा बॉर्डर बनाने दिया जिससे बराक वैली का समुद्र तक संपर्क कट गया।  बराक घाटी, जो कभी एक औद्योगिक केंद्र के तौर पर जानी जाती थी, उसकी ताकत छीन ली गई. उन्होंने कहा, "आजादी के बाद दशकों तक कांग्रेस की सरकारें सत्ता में रही, फिर भी इस इलाके में बहुत कम विकास हुआ. आज, भाजपा सरकार इसे बदलने के लिए काम कर रही है।  पीएम ने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस ने राज्य के युवाओं को हिंसा और आतंकवाद के रास्ते पर गुमराह किया, जबकि भाजपा ने यह पक्का किया है कि राज्य उनके लिए मौकों का सागर बन जाए।  उन्होंने कहा, जहां कांग्रेस सोचना बंद कर देती है, हम काम करना शुरू कर देते हैं." उन्होंने कहा कि भाजपा का मंत्र विकास में पीछे रह गए लोगों को प्राथमिकता देना है। 

मोजतबा खामेनेई की जानकारी देने पर 92.47 करोड़ रुपये का इनाम और US सिटीजनशिप का वादा

 मुंबई  अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ 28 फरवरी की रात को युद्ध छेड़ दिया था। उसके हमले में इरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई थी। उसके बाद उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को ईरान का नया सुप्रीम लीडर चुना गया। अब अमेरिका और इजरायल के टारगेट पर मोजतबा आ गए हैं। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स की मानें, तो आयतुल्ला अली खामेनेई पर हुए हमले में मोजतबा भी गंभीर घायल हो गए थे। वह इस समय कोमा में हैं, लेकिन अमेरिका और इजरायल कोई रिस्क नहीं लेना चाहते हैं। वह मौजूदा लीडरशिप को भी खत्म कर देना चाहते हैं। ऐसे में अमेरिका ने एलान किया है कि ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) से जुड़े कई अन्य वरिष्ठ अधिकारियों का पुख्ता पता बताने वालों को 10 मिलियन डॉलर का इनाम मिलेगा। यह राशि भारतीय रुपयों में 92,47,48,000 रुपये तक की होती है। यह घोषणा अमेरिकी विदेश विभाग के ‘रिवॉर्ड्स फॉर जस्टिस’ कार्यक्रम के तहत की गई है, जिसका संचालन राजनयिक सुरक्षा सेवा करती है। अमेरिका में बसने का भी मिलेगा मौका     अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार ये लोग उन नेटवर्क का हिस्सा हैं, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न गतिविधियों की योजना बनाने और उन्हें अंजाम देने में शामिल रहे हैं। ‘रिवॉर्ड्स फॉर जस्टिस’ कार्यक्रम का उद्देश्य ऐसे नेटवर्क को कमजोर करना है, जो वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करते हैं। कार्यक्रम के तहत सूचना देने वाले व्यक्तियों की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाती है। जरूरत पड़ने पर उन्हें सुरक्षा प्रदान करने, स्थानांतरण सहायता देने और अमेरिका में बसने का अवसर भी दिया जा सकता है। ईरान के खिलाफ होगी कठोर कार्रवाई यह घोषणा ऐसे समय में की गई है, जब अमेरिका और इजरायल ईरान के खिलाफ अपने सैन्य अभियान को तेज कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एक साक्षात्कार में कहा कि आने वाले दिनों में अमेरिकी सेना ईरानी ठिकानों पर और सख्त कार्रवाई कर सकती है।