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इस्लामाबाद में 21 घंटे चली मैराथन बातचीत, लेकिन कोई अंतिम समझौता नहीं

नई दिल्ली    अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में हुई हाई लेवल वार्ता भले ही किसी अंतिम समझौते पर नहीं पहुंच सकी, लेकिन इस शांति वार्ता ने एक मैसेज जरूर दिया है। इस शांति वार्ता ने अमेरिका के सियासी गलियारों की हलचल बढ़ा दी है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के बयान से इसके संकेत मिले हैं। वेंस ने इस बात का खुलासा किया कि 21 घंटे तक चली इस मैराथन वार्ता के दौरान वे लगातार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ हॉट लाइन पर संपर्क में थे। वेंस के अनुसार, वाशिंगटन से राष्ट्रपति ट्रंप केवल निर्देश ही नहीं दे रहे थे, बल्कि वे वार्ता की हर बारीक अपडेट पर नजर रख रहे थे। पत्रकारों के साथ बातचीत में जेडी वेंस ने बताया कि बातचीत के दौरान राष्ट्रपति के साथ उनका संवाद निरंतर बना रहा। उन्होंने कहा, "मैं सटीक संख्या तो नहीं बता सकता, लेकिन पिछले 21 घंटों में हमारी राष्ट्रपति से शायद आधा दर्जन या दर्जन भर बार बात हुई।" यह वार्ता केवल उपराष्ट्रपति तक सीमित नहीं थी। वेंस ने पुष्टि की कि अमेरिका की पूरी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम इस कूटनीतिक दबाव का हिस्सा थी। उन्होंने बातचीत के दौरान निम्नलिखित शीर्ष अधिकारियों के साथ निरंतर परामर्श किया। उनमें विदेश मंत्री मार्को रुबियो, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ, वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एडमिरल कूपर जैसे नाम शामिल हैं। वेंस ने जोर देकर कहा कि इतनी बड़ी टीम का एक साथ सक्रिय होना इस बात का प्रमाण है कि अमेरिका नेक नीयत के साथ बातचीत की मेज पर बैठा था। उपराष्ट्रपति ने एक बार फिर दोहराया कि अमेरिका ने अपना सर्वश्रेष्ठ और अंतिम प्रस्ताव ईरान के सामने रख दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब यह तेहरान को तय करना है कि वह इन शर्तों को स्वीकार कर शांति का रास्ता चुनता है या नहीं। आक्रामक ट्रंप प्रशासन विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन इस बार काफी आक्रामक और संगठित कूटनीति अपना रहा है। वार्ता में वित्त मंत्री और रक्षा मंत्री की सक्रियता का मतलब है कि प्रस्ताव में आर्थिक प्रतिबंधों में ढील और सुरक्षा गारंटी जैसे पेचीदा मुद्दे शामिल हैं, जिन पर राष्ट्रपति ट्रंप खुद अंतिम फैसला ले रहे हैं। क्या होगा अगला कदम? फिलहाल अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल इस्लाबाद से रवाना हो रहा है, लेकिन उन्होंने तेहरान को सोचने के लिए समय दिया है। वेंस के बयानों से स्पष्ट है कि यदि ईरान ने इस प्रस्ताव को ठुकराया तो इसका मतलब केवल वार्ता की विफलता नहीं होगी, बल्कि अमेरिका की पूरी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम के सामूहिक प्रयास को चुनौती देना होगा। अब पूरी दुनिया की नजरें तेहरान की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं कि क्या वह ट्रंप प्रशासन की इन सख्त और समन्वित शर्तों के आगे झुकेगा या क्षेत्र में तनाव का एक नया दौर शुरू होगा?

नारी शक्ति वंदन अधिनियम को 2029 चुनाव से लागू करने की तैयारी, संसद में विशेष सत्र

नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों के सभी संसदीय दलों के नेताओं को पत्र लिखकर नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण कानून) के संशोधन पर पूर्ण समर्थन की अपील की है. इस पत्र में पीएम मोदी ने 16 अप्रैल से शुरू होने वाले संसद के विशेष सत्र में इस ऐतिहासिक संशोधन को सर्वसम्मति से पारित करने की बात कही है. साथ ही बीजेपी ने अपने सभी सांसदों को व्हिप जारी कर 16, 17 और 18 अप्रैल को सदन में उपस्थित रहने का निर्देश दिया है. उन्होंने कहा कि अब वक्त आ गया है कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम अपनी पूरी भावना के साथ देश में लागू हो. यह उचित होगा कि 2029 के लोकसभा चुनाव और आने वाले सभी विधानसभा चुनावों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण पूरी तरह लागू किया जाए. पीएम मोदी ने अपने पत्र में लिखा, '16 अप्रैल से देश की संसद में नारी शक्ति वंदन अधिनियम से जुड़ी एक ऐतिहासिक चर्चा होने जा रही है. ये विशेष बैठक हमारे लोकतंत्र को और मजबूत बनाने का अवसर है. ये सबको साथ लेकर चलने की हम सभी की प्रतिबद्धता को दोहराने का अवसर है. इसी भावना और उद्देश्य से मैं आपको यह पत्र लिख रहा हूं.' विकसित भारत के लिए नारी शक्ति आवश्यक प्रधानमंत्री ने अपने पत्र में जोर दिया कि कोई भी समाज तभी आगे बढ़ता है, जब महिलाओं को आगे बढ़ने, निर्णय लेने और नेतृत्व का अवसर मिले. देश ने विकसित भारत का जो संकल्प लिया है, उसकी सिद्धि के लिए आवश्यक है कि इस यात्रा में नारी शक्ति अपनी पूरी क्षमता और पूरी भागीदारी के साथ जुड़े. हम सभी साक्षी हैं कि सार्वजनिक जीवन में हमारी बहनों-बेटियों की भागीदारी निरंतर बढ़ रही है. भारत की बेटियां स्पेस से लेकर स्पोर्ट्स और सशस्त्र बलों से लेकर स्टार्ट-अप्स तक, हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं. अपनी बड़ी सोच और पूरे जज्बे के साथ वे कड़ी मेहनत करती हैं और खुद को साबित कर रही हैं. पीएम ने याद दिलाया कि देश की संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण की चर्चा दशकों से होती आ रही है. साल 2023 में संसद में सभी दलों के सांसदों ने एक साथ आकर नारी शक्ति वंदन अधिनियम का समर्थन किया था. ये हमारी एकजुटता को दिखाने वाला एक अविस्मरणीय अवसर था. नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर चर्चा में संसद के सभी सदस्यों का योगदान रहा था. और जब ये चर्चा चल रही थी, तब उस समय इसे लागू करने के समय पर भी विचार हुआ था. तब सबने सहमति से ये विचार रखा था कि नए कानून के प्रावधान जल्द से जल्द लागू हो जाने चाहिए. सभी दलों के नेताओं ने मुखर होकर इस विचार का समर्थन किया था. पिछले कुछ समय में हमने इस विषय पर जानकारों से विमर्श किया. संविधान की बारीकियों को समझने वाले विशेषज्ञों से हमें सुझाव और मार्गदर्शन मिले. हमने राजनीतिक दलों से भी इस बारे में संवाद किया है. ऐतिहासिक बदलाव का लक्ष्य गहन मंथन के बाद सरकार इस नतीजे पर पहुंची है कि 2029 का लोकसभा चुनाव महिला आरक्षण के साथ ही होना चाहिए. इससे जन-विश्वास गहरा होगा और प्रतिनिधित्व की आकांक्षा पूरी होगी. प्रधानमंत्री ने सांसदों से अपील की है कि यह अवसर किसी एक पार्टी या व्यक्ति से ऊपर है. यह आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी है. सांसदों का योगदान आने वाले समय में गौरव के साथ याद किया जाएगा. पीएम ने कहा कि मैं यह पत्र इसलिए लिख रहा हूं, ताकि हम सभी एक स्वर में इस संशोधन को पारित कराने के लिए एकजुट हों. ज्यादा से ज्यादा सांसद इस विषय पर अपने विचार संसद में रखें. यह अवसर किसी एक पार्टी या व्यक्ति से ऊपर है. यह नारी शक्ति और आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी जिम्मेदारी भी है. हम सभी दल काफी समय से चाहते रहे हैं कि राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़े. इस आकांक्षा को वास्तविकता में बदलने का यही सही समय है. एकजुट होकर इतिहास रचने की अपील पत्र के अंत में पीएम मोदी ने अटूट विश्वास जताया कि सभी दल एकजुट होकर संसद में इस ऐतिहासिक उपलब्धि को हासिल करेंगे. उन्होंने इसे 140 करोड़ देशवासियों की सिद्धि का विषय बताया है. यह संशोधन देश की माताओं, बहनों और बेटियों के प्रति असीम दायित्वों का निर्वहन होगा.  प्रधानमंत्री ने लोकतंत्र की महान परंपराओं को और जीवंत बनाने के लिए इस ऐतिहासिक बदलाव की दिशा में कदम उठाने का आह्वान किया है. खड़गे ने उठाए सवाल वहीं, प्रधानमंत्री के पत्र के जवाब में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे पीएम मोदी को पत्र लिखा है. उन्होंने कहा कि साल 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित होने से अब तक 30 महीने बीत चुके हैं और अब हमें विश्वास में लिए बिना यह विशेष सत्र बुलाया गया है और आपकी सरकार परिसीमन के बारे में कोई भी जानकारी दिए बिना हमसे फिर से सहयोग मांग रही है. आप समझ सकते हैं कि परिसीमन और अन्य पहलुओं के विवरण के बिना, इस ऐतिहासिक कानून पर कोई भी सार्थक चर्चा करना असंभव होगा. खड़गे ने ये भी कहा कि आपने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि आपकी सरकार ने इस संबंध में राजनीतिक दलों के साथ बातचीत की है. हालांकि, मुझे यह बताते हुए खेद है कि यह बात सच के विपरीत है, क्योंकि सभी विपक्षी दल सरकार से आग्रह कर रहे हैं कि 29 अप्रैल 2026 को मौजूदा चुनाव खत्म होने के बाद संविधान संशोधनों पर चर्चा करने के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए. उन्होंने संशोधन के लिए बुलाए गए विशेष सत्र की टाइमिंग पर भी सवाल उठाए. कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा, 'राज्य में चल रहे चुनावों के दौरान विशेष सत्र बुलाना हमारे इस विश्वास को और मजबूत करता है कि आपकी सरकार महिलाओं को वास्तव में सशक्त बनाने के बजाय राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए विधेयक के कार्यान्वयन में जल्दबाजी कर रही है.' पिछले रिकॉर्ड का किया जिक्र पत्र के अंत में उन्होंने लिखा कि मुझे यह लिखते हुए दुख हो रहा है कि सार्वजनिक महत्व के मामलों में सरकार का पिछला रिकॉर्ड, चाहे वह नोटबंदी हो, जीएसटी हो, जनगणना हो या वित्त आयोग की सिफारिशों … Read more

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फिर सुर्खियों में, पाकिस्तान के संयुक्त गश्त प्रस्ताव पर चर्चा तेज

नई दिल्ली  अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुई शांति वार्ता बेनतीजा रही। इस दौरान दोनों देशों के बीच किसी भी बात को लेकर आम सहमति नहीं बनी। यह वार्ता भले ही सिर्फ दो देशों के बीच हुई, लेकिन दुनिया की निगाहें इसपर टिकी हुई थीं। इसका सबसे बड़ा केंद्र स्ट्रेट ऑफ होर्मुज था, जिसपर युद्ध के बाद से ही पहरा है। हालांकि, शनिवार को इस समुद्री मार्ग से कम से कम 16 जहाज गुजरे। युद्धविराम के बाद का अब तक का सबसे व्यस्त दिन रहा। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, अमेरिकी नौसेना के गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर USS फ्रैंक ई. पीटरसन और USS माइकल मर्फी इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन जहाजों को विशेष रूप से ईरानी समुद्री बारूदी सुरंगों को साफ करने के अभियान में लगाया गया है ताकि जहाजों के लिए रास्ता सुरक्षित किया जा सके। नौसेना की निगरानी करने वाली संस्था 'मैरीन ट्रैफिक' ने बताया कि USS माइकल मर्फी की सुरक्षा में चीन, हांगकांग और लाइबेरिया के झंडे वाले तीन विशाल कच्चे तेल के टैंकरों को सफलतापूर्वक मार्ग से गुजरने की अनुमति दी गई। वहीं, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने अपने संक्षिप्त संबोधन में होर्मुज (Strait of Hormuz) के फिर से खोलने जैसे संवेदनशील विषय पर किसी भी असहमति का जिक्र नहीं किया। आपको बता दें कि यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है। इस मार्ग का बंद होना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा माना जा रहा है। पाकिस्तान का संयुक्त गश्त प्रस्ताव इस्लामाबाद में संपन्न अमेरिका-ईरान सीधी बातचीत में पाकिस्तान ने इस विवादित जलमार्ग में जहाजों की आवाजाही बहाल करने के लिए एक रूपरेखा पेश की है। अल जजीरा अरबी की रिपोर्ट के अनुसार, एक सूत्र ने पुष्टि की है कि पाकिस्तान ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में संयुक्त गश्त का प्रस्ताव दिया। इसका मकदसद, अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए इस मार्ग को सुरक्षित और बाधा रहित बनाना है। पाकिस्तान ने सुझाव दिया है कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए इस रणनीतिक जलमार्ग की निगरानी में संयुक्त तंत्र विकसित किया जाए। होर्मुज का खुलना क्यों जरूरी? दुनिया के कुल तेल निर्यात का लगभग 20 प्रतिशत इसी संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता है। युद्ध के दौरान इस मार्ग के बाधित होने से वैश्विक तेल बाजार में भारी अस्थिरता पैदा हो गई थी। अब जबकि शनिवार को एक ही दिन में 16 जहाजों ने इसे पार किया है, यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए राहत के संकेत हैं।

महंगे और अनुपलब्ध गैस सिलेंडर ने बढ़ाई मुश्किलें, उधना स्टेशन पर उमड़ी भीड़

सूरत गुजरात के सूरत में इन दिनों घरेलू गैस सिलेंडर की किल्लत ने गंभीर सामाजिक संकट खड़ा कर दिया है. मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष के कारण सप्लाई प्रभावित होने और स्थानीय स्तर पर कालाबाज़ारी बढ़ने से आम लोगों, खासकर प्रवासी श्रमिकों के लिए हालात बेहद मुश्किल हो गए हैं. स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि बड़ी संख्या में मजदूर शहर छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं. स्टेशन पर भीड़, खुले मैदान में परिवार के साथ बैठे नजर आए लोग शनिवार रात और रविवार सुबह उधना रेलवे स्टेशन पर हजारों श्रमिकों की भीड़ देखने को मिली. रेलवे स्टेशन के वेटिंग एरिया से लेकर खुले मैदान तक लोग अपने परिवारों के साथ बैठे नजर आए. ट्रेनों में सफर करने के लिए लंबी कतारें लगी हुई थीं, जिससे साफ है कि पलायन का सिलसिला पिछले एक महीने से लगातार जारी है. मजदूरों ने बताया कि उन्हें सामान्य कीमत पर गैस सिलेंडर नहीं मिल रहा है. कई लोगों का कहना है कि सिलेंडर या तो उपलब्ध नहीं है या फिर ब्लैक में कई गुना ज्यादा कीमत पर बेचा जा रहा है. सीमित आय वाले इन श्रमिकों के लिए इतना महंगा सिलेंडर खरीद पाना संभव नहीं है. ऐसे में खाना बनाना और रोजमर्रा का जीवन चलाना कठिन हो गया है. श्रमिकों का पलायन उद्योगों के लिए भी बना चिंता का विषय एक श्रमिक ने बताया कि “काम तो मिल रहा है, लेकिन खाना बनाने के लिए गैस नहीं है. महंगे सिलेंडर खरीदना हमारे बस की बात नहीं है, इसलिए गांव लौटना ही बेहतर विकल्प है.” कई परिवारों ने भी यही कारण बताते हुए शहर छोड़ने का निर्णय लिया है. आपको बता दें कि सूरत देश का एक प्रमुख औद्योगिक केंद्र है, जहां टेक्सटाइल और डायमंड इंडस्ट्री में लाखों प्रवासी मजदूर काम करते हैं. ऐसे में श्रमिकों का यह पलायन उद्योगों के लिए भी चिंता का विषय बनता जा रहा है. यदि यही स्थिति बनी रही, तो उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है. फिलहाल प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती गैस की आपूर्ति को सामान्य करना और कालाबाज़ारी पर सख्ती से रोक लगाना है. जब तक यह समस्या हल नहीं होती, तब तक सूरत से श्रमिकों का पलायन जारी रहने की आशंका बनी हुई है.

सुरों की दुनिया में शोक की लहर: आशा भोसले ने दुनिया को कहा अलविदा

नई दिल्ली बॉलीवुड की लेजेंडरी सिंगर्स में से एक आशा भोसले ने दुनिया को अलविदा कह दिया है. वो 92 साल की थीं. आशा भोसले को 11 अप्रैल को मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती करवाया गया था. अस्पताल के डॉक्टर प्रति समदानी ने कन्फर्म किया था कि सिंगर उनकी केयर भी हैं. सिंगर की पोती ने बताया था कि चेस्ट इंफेक्शन और थकान के कारण उनकी तबीयत बिगड़ी है. मगर अब खबर आई है कि आशा भोसले का निधन हो गया है. आशा भोसले ने 40 के दशक में अपने करियर की शुरुआत की थी. उन्होंने लेजेंडरी डायरेक्टर बिमल रॉय, राज कपूर के साथ-साथ लेजेंडरी म्यूजिक कम्पोजर ओ पी नय्यर, सरदार मलिक, सज्जाद हुसैन, एस मोहिंदर, ए आर रहमान संग काम किया था. उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर 40 और 50 के दशक की सबसे बड़ी गायिकाओं में से एक थीं. मंगेशकर परिवार से आईं आशा भी अपनी बहन की ही तरह सुरीली आवाज वाली थीं. आशा ने अपनी आवाज का जादू बॉलीवुड में 1950 के दशक में चलाया. हालांकि उन्होंने बड़ी फिल्मों में अपनी आवाज देने से पहले कई लो बजट फिल्मों में गाना गाकर पहचान पाई. 1952 में आई फिल्म 'संगदिल' में उन्होंने गाने गाए थे. म्यूजिक कम्पोजर सज्जाद हुसैन की इस एल्बम ने आशा को फेम दिलाया. उस जमाने के जाने माने डायरेक्टर बिमल रॉय ने 1953 में आई फिल्म 'परिणीता' में आशा भोसले को साइन किया था. इसके बाद राज कपूर ने उनकी अपनी 1954 की फिल्म 'बूट पोलिश' में काम दिया. लेजेंडरी म्यूजिक कम्पोजर ओ पी नय्यर के साथ आशा ने 1952 से लेकर 1956 तक कई गानों पर काम किया था. मगर 1957 में आई बी आर चोपड़ा की फिल्म 'नया दौर' के साथ आशा भोसले ने सफलता का असली स्वाद चखा. इस फिल्म के गाने भी नय्यर ने ही कम्पोज किए थे. बॉलीवुड में आशा ने बनाई अलग पहचान मोहम्मद रफी के साथ आशा भोसले की जोड़ी उस जमाने में सुपरहिट थी. दोनों ने मिलकर 'मांग के साथ तुम्हारा', 'साथी हाथ बढ़ाना' और 'उड़ें जब जब जुल्फें तेरी' को गाया था. साहिर लुधियानवी के बोल और रफी संग आशा की आवाज का जादू सभी के सिर चढ़कर बोलता था. उन्होंने 60 के दशक की फिल्म 'गुमराह', 'हमराज', 'आदमी और इंसान' संग कई और में अपनी आवाज दी. 1966 में उन्होंने आर डी बर्मन के साथ फिल्म 'तीसरी मंजिल' के लिए गाने गाए थे, जिन्हें खूब सराहा गया. इसके बाद वो दौर आया जब आशा भोसले ने बॉलीवुड के हिट डांस नंबर गाने शुरू किए. कहा जाता है कि जब उन्होंने पहली बार 'आजा आजा' गाने को सुना था तो उन्हें लगा था कि वो वेस्टर्न म्यूजिक ट्यून पर नहीं गा पाएंगी. बर्मन ने इसे बदलने का ऑफर दिया, मगर आशा ने मना कर दिया. बाद में उन्होंने इसे एक चैलेंज की तरह लिया और 10 दिन रिहर्सल करने के बाद इसे रिकॉर्ड किया था. आज भी ये गाना लोगों की जुबान पर है. 'आजा आजा' के बाद आशा ने 'ओ हसीना जुल्फों वाली', 'ओ मेरे सनम रे', 'पिया तू अब तो आजा' और 'ये मेरा दिल' जैसे बढ़िया गाने गाए, जो हर पार्टी की जान बन गए थे. गजल गायिकी ने दिलाया नेशनल अवॉर्ड 1981 में आशा भोसले ने गजल गायिकी में अपना हाथ आजमाया. उन्होंने फिल्म 'उमराव जान' में 'दिल चीज क्या है', 'इन आंखों की मस्ती के', 'ये क्या जगह है दोस्तों' और 'जुस्तजू जिसकी थी' जैसी गजलों को गाकर सभी का दिल खुश कर दिया था. इस फिल्म के म्यूजिक डायरेक्टर खय्याम थे, जिन्होंने आशा की आवाज को लो पिच पर ला दिया था. इन्हीं गजलों ने उन्हें उनका पहला नेशनल अवॉर्ड दिलवाया. इसके बाद उन्हें फिल्म 'इजाजत' के अपने गाने 'मेरा कुछ सामान' के लिए अपना दूसरा नेशनल अवॉर्ड मिला. 1995 में आशा भोसले ने 62 साल की उम्र में एक्ट्रेस उर्मिला मतोंडकर को अपनी आवाज दी. उर्मिला की फिल्म 'रंगीला' के गाने 'तन्हा तन्हा' और 'रंगीला रे' उन्होंने गाए. 2000 में दशक में आई 'लगान' के गाने 'राधा कैसे न जले', फिल्म 'प्यार तूने क्या किया' के गाने 'कमबख्त इश्क', फिल्म 'लकी' के गाने 'लकी लिप्स' को आशा भोसले ने ही गाया था. ये सभी गाने आगे चलकर सुपरहिट हुए. आशा के नाम है ये रिकॉर्ड साल 2013 में आशा भोसले ने अपना एक्टिंग डेब्यू किया था. 79 साल की आशा को फिल्म 'माई' में एक 65 साल की महिला के रोल में देखा गया था, जो अल्जाइमर की मरीज है. महिला को उसके बच्चे छोड़ जाते हैं. अपने काम के लिए क्रिटिक्स से आशा भोसले को तारीफ मिली थी. मई 2020 में आशा ने आशा भोसले ऑफिशियल के नाम से अपना यूट्यूब चैनल लॉन्च किया था. हिंदी, बंगाली, मराठी समेत आशा भोसले ने अपने करियर में 20 भाषाओं में गाने गाए. इसके चलते उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज किया गया था. जनवरी 2025 में आशा भोसले को दुबई में एक कॉन्सर्ट करते देखा गया था. 91 साल की आशा, जिन्हें प्यार से आशा ताई बुलाया जाता था, दमदार अंदाज में परफॉर्म करती दिखीं. उन्होंने इस कॉन्सर्ट में पंजाबी सिंगर करण औजला के हिट गाने 'तौबा तौबा' को गाया था. ये गाना विक्की कौशल की फिल्म 'बैड न्यूज' का था. ऐसे में विक्की के अतरंगी स्टेप्स को आशा भोसले ने भी कॉपी किया और स्टेज पर धूम मचाई थी.

SIR अभियान का असर: 12 राज्यों में 10% से ज्यादा मतदाता सूची से बाहर

नई दिल्ली भारतीय चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के तहत देश के 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की वोटर लिस्ट से करीब 5.2 करोड़ अयोग्य मतदाताओं के नाम हटा दिए हैं जो कि इन राज्यों के कुल मतदाताओं का लगभग 10.2 प्रतिशत है. आयोग का कहना है कि ये अभियान वोटर लिस्ट को साफ-सुथरा और सटीक बनाने के उद्देश्य से चलाया गया, जिसमें अनुपस्थित, ट्रांसफर, मृत, डबल पंजीकृत और अन्य अयोग्य मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, ताकि फर्जी मतदान की गुंजाइश खत्म हो सके. आयोग ने बताया कि SIR का पहला चरण बिहार में शुरू किया गया था. इसके बाद उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात और तमिलनाडु जैसे 11 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में एसआईआर अभियान शुरू किया गया था. अभियान के दौरान कुल 51 करोड़ मतदाताओं की जांच की गई, जिसमें से 10.2% नाम अनुपस्थित, मृत या फर्जी पाए जाने पर हटाए गए. आयोग ने ये कदम मतदाता सूची को शुद्ध और सटीक बनाने के उद्देश्य से उठाया है. इस प्रक्रिया में अंदमान-निकोबार से लेकर केरल तक के चुनावी डेटा को खंगाला गया और लाखों नए नाम भी जोड़े गए. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में कटे सबसे ज्याद नाम आंकड़ों के अनुसार, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में सबसे अधिक 16.6% नाम हटाए गए. इसके बाद उत्तर प्रदेश में 13.2% और गुजरात में 13.1% नामों की छंटनी की गई है. छत्तीसगढ़ में भी 11.3% मतदाताओं के नाम सूची से बाहर किए गए. बंगाल में ये दर 10.9% रही, जहां न्यायिक प्रक्रिया के जरिए 27 लाख से ज्यादा नाम हटाए गए. इन राज्यों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग थे जो या तो स्थायी रूप से ट्रांसफर हो चुके थे या उनकी मृत्यु हो चुकी थी. '6.5 करोड़ ने नहीं किया कभी मतदान' SIR अभियान के दौरान पाया गया कि 13 करोड़ लोग अपने पंजीकृत पतों पर अनुपस्थित थे, जबकि 3.1 करोड़ लोग दूसरे राज्यों में चले गए थे. इसके अलावा मतदाता सूची ने करीब 6.5 करोड़ ऐसे मतदाता थे, जिन्होंने कभी मतदान ही नहीं किया. इससे फर्जी वोटिंग की आशंका बनी रहती थी. लिहाजा उन्हें हटाने से एक शुद्ध और सटीक मतदाता सूची तैयार हुई है. अब इन 12 प्रदेशों में शुद्धिकरण के बाद कुल 45.8 करोड़ मतदाता पंजीकृत हैं. पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में क्रमशः 20.9% और 10% की शुद्ध गिरावट दर्ज की गई है, जबकि पुडुचेरी में मतदाताओं की संख्या में 1% की शुद्ध गिरावट देखी गई है. मध्य प्रदेश में 5.7, राजस्थान में 5.4, केरल में 2.5 और लक्षद्वीप में 0.3% मतदाताओं की संख्या में कमी आई है. UP में जोड़े गए सबसे ज्यादा नाम आयोग ने बताया कि नाम हटाने के साथ-साथ निर्वाचन आयोग ने 2 करोड़ नए नाम मतदाता सूची में जोड़े भी हैं. जिसमें उत्तर प्रदेश 92.4 लाख नए मतदाताओं के साथ पहले स्थान पर है. यूपी के बाद तमिलनाडु में 35 लाख, केरल में 20.4 लाख और राजस्थान में 15.4 लाख नए नाम शामिल किए गए. मध्य प्रदेश में 12.9 लाख और गुजरात में 12 लाख से अधिक मतदाताओं ने फॉर्म 6 और फॉर्म 8 के जरिए अपना पंजीकरण कराया, जिससे सूची में युवाओं की भागीदारी बढ़ी है.

US-ईरान शांति वार्ता क्यों टूटी? परमाणु हथियार बना सबसे बड़ा रोड़ा

नई दिल्ली पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही उच्च स्तरीय शांति वार्ता 21 घंटे तक चली सघन चर्चा के बाद भी बेनतीजा रही। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर ऐसी कौन सी बात हुई, जिसके कारण शांति वार्ता छोड़कर अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस वहां से निकल गए। दरअसल, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इस समझौते के विफल होने की वजह ईरान ने परमाणु हथियारों से जुड़ी अनिवार्य शर्तों को न मानना बता रहे हैं, तो वहीं ईरान ने अमेरिका पर अतार्किक और बेतुकी मांगें थोपने का आरोप लगाया है। क्यों विफल हुई शांतिवार्ता? पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में 21 घंटे तक चली बातचीत के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति वेंस ने विस्तार से चर्चा करने और सार्वजनिक रूप से बातचीत करने से इनकार कर दिया, लेकिन उन्होंने यह जरूर कहा कि मुख्य विवाद परमाणु हथियारों पर था। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस ने कहा कि यह ईरान के लिए बुरी खबर है और उनकी टीम अंतिम और सर्वोत्तम प्रस्ताव पेश करने के बाद वार्ता खत्म कर दी है। कैसे बिगड़ी बात? शांति वार्ता के दौरान अमेरिकी उपराष्ट्रपति वेंस ने कहा, "हमें एक सकारात्मक प्रतिबद्धता देखने की जरूरत है कि वे परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश नहीं करेंगे और न ही ऐसे उपकरण हासिल करने की कोशिश करेंगे जो उन्हें जल्दी से परमाणु हथियार प्राप्त करने में सक्षम बना सकें। वेंस ने तया कि यही लक्ष्य अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का भी है और यही वे बातचीत के माध्यम से हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। वेंस ने एक अलंकारिक प्रश्न पूछा कि क्या ईरानियों में दीर्घकाल में परमाणु हथियार विकसित न करने की इच्छाशक्ति है? जिसका ईरानियों ने सीधा सा जवाब 'नहीं' में दिया। शनिवार को इस्लामाबाद में चली शांति वार्ता के दौरान ईरान की जब्त संपत्तियों पर चर्चा हुई, इस बारे में एक पत्रकार के सवाल का जवाब देते हुए वैंस ने कहा कि इस पर और कई अन्य मुद्दों पर चर्चा हुई, लेकिन हम ऐसी स्थिति तक नहीं पहुंच सके जहां ईरानी हमारी शर्तों को स्वीकार करने के लिए तैयार हों। ईरान ने अमेरिका की बेतूकी मांगो की आलोचना की ईरान ने मध्य पूर्व में युद्ध समाप्त करने के उद्देश्य से इस्लामाबाद में चल रही वार्ता में गतिरोध के लिए अमेरिका की बेतूकी मांगो को जिम्मेदार ठहराया है। ईरानी सरकारी प्रसारक आईआरआईबी ने बताया, "ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने ईरानी जनता के राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए 21 घंटे तक लगातार और गहन बातचीत की। ईरानी प्रतिनिधिमंडल की विभिन्न पहलों के बावजूद, अमेरिकी पक्ष की अनुचित मांगों ने बातचीत की प्रगति को रोक दिया। इस प्रकार बातचीत समाप्त हो गई।"  

21 घंटे चली बातचीत फेल: US-ईरान में नहीं बनी सहमति, पाकिस्तान ने निभाई मध्यस्थ की भूमिका

नई दिल्ली अमेरिका और ईरान के बीच जारी जंग को रोकने के लिए पाकिस्तान ने मध्यस्थता का रोल निभाया. इस्लामाबाद में शांति वार्ता का आयोजन किया गया. हालांकि, ये बातचीत बेनतीजा साबित हुई. इसके बावजूद पाकिस्तान अपनी पीठ थपथपाने से पीछे नहीं हट रहा है. विदेश मंत्री इशाक डार ने बातचीत में शामिल होने के लिए अमेरिका और ईरान का आभार जताया है. शांति वार्ता के बाद इशाक डार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की. इस दौरान अपने बयान में उन्होंने कहा कि पाकिस्तान इन शांति वार्ताओं की मेजबानी करके सम्मानित महसूस कर रहा है. डार ने कहा, 'हम इस्लामाबाद में शांति वार्ता आयोजित करने के लिए ईरान और अमेरिका का शुक्रिया अदा करते हैं. ये न सिर्फ मिडिल-ईस्ट बल्कि पूरी दुनिया की स्थिरता के लिए एक अच्छा संकेत है.' पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने इस दौरान उम्मीद जताई कि दोनों पक्ष भविष्य में भी सीजफायर पर समझौतों को जारी रखेंगे. उन्होंने शांति के लिए पाकिस्तान की कोशिशें जारी रहने का भरोसा भी दिलाया. उन्होंने आगे बताया कि इस पूरी शांति वार्ता के पीछे पाकिस्तान के थल सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की अहम भूमिका रही. उन्होंने कहा, 'आसिम मुनीर ने सीजफायर करने के लिए कई दौर की वार्ताओं में मदद की.' बता दें कि इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच 21 घंटों तक बातचीत का दौर चला. इस दौरान दोनों पक्षों के बीच कई मुद्दों पर सहमति भी बनी. लेकिन परमाणु हथियार और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर ईरान और अमेरिका के बीच बात नहीं बन पाई. क्यों फेल हुई शांति वार्ता? अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने बताया कि वो बातचीत की नीयत से वार्ता में शामिल हुए थे. लेकिन ईरान अमेरिका का शर्तें मानने पर राजी नहीं है. ऐसे में वेंस अब अपनी टीम के साथ इस्लामाबाद से अमेरिका के लिए रवाना हो गए हैं. वहीं, ईरानी मीडिया का दावा है कि अमेरिका अपनी शर्तो में बहुत कुछ मांग रहा था.

भूकंप से दहशत: डोडा के बाद महाराष्ट्र के हिंगोली तक महसूस हुए झटके

 डोडा जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में रविवार तड़के भूकंप के झटके महसूस किए गए.  रिक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता 4.6 मापी गई.  नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी के अनुसार, भूकंप सुबह 04:32 बजे आया. राहत की बात यह है कि अभी तक कहीं से भी जान-माल के नुकसान की कोई सूचना नहीं मिली है. भूकंप के बाद स्थानीय प्रशासन अलर्ट हो गया है. पुलिस और राहत टीमें हालात पर नजर बनाए हुए हैं.  प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे घबराएं नहीं, लेकिन सतर्क जरूर रहें और किसी भी आपात स्थिति में तुरंत सूचना दें. 1 मार्च को भी आया था भूकंप डोडा में भूकंप के झटके महसूस करना कोई नई बात नहीं है. इससे पहले 1 मार्च 2026 को भी यहां 4.2 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया था. हालांकि उस समय भी कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ था, लेकिन लोगों में दहशत फैल गई थी. महाराष्ट्र में भी महसूस हुए थे भूकंप के झटके महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र स्थित हिंगोली जिले के कुछ हिस्सों में शनिवार को भूकंप के झटके महसूस किए गए.  रिक्टर स्केल पर भूकंप की तीव्रता 4.7 मापी गई. इसके साथ ही पड़ोसी जिलों नांदेड़ और परभणी के भी कुछ हिस्सों में भूकंप के झटके महसूस किए गए. हिंगोली के जिलाधिकारी राहुल गुप्ता ने बताया कि पांगरा शिंदे गांव के कुछ हिस्सों में भूकंप का असर देखने को मिला है.  यहां कुछ घरों और सामुदायिक केंद्रो की दीवारों में दरार देखने को मिली हैं.  हालांकि किसी प्रकार की जान-माल का नुकसान नहीं हुआ. वहीं, नादेड़ जिला अधिकारी ने बताया कि भूकंप की तीव्रता 4.7 मापी गई थी.  नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी की एक रीडिंग का हवाला देते हुए कहा कि भूकंप शनिवार सुबह 8.45 बजे दर्ज किया गया. भूकंप का केंद्र हिंगोली जिले की वसमत तहसील के शिरली गांव में भूमि से करीब 10 किलोमीटर की गहराई में था.  

SIR वोटर लिस्ट में बड़ा अपडेट: 12 राज्यों में 6.08 करोड़ नाम हटे, यूपी और बंगाल में बदलाव सबसे ज्यादा

नई दिल्ली देशभर में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभियान के दूसरे फेज के तहत चुनाव आयोग ने 9 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों की अंतिम मतदाता सूची जारी कर दी है। इस प्रक्रिया के बाद वोटर लिस्ट में बड़ा बदलाव देखने को मिला है, जिसमें कुल 6.08 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। इस अपडेट के बाद इन राज्यों में कुल मतदाताओं की संख्या घटकर लगभग 44.92 करोड़ रह गई है। चुनाव आयोग के अनुसार, SIR प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक और अद्यतन बनाना है, ताकि डुप्लीकेट, मृत और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाए जा सकें। इस प्रक्रिया में उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, राजस्थान, छत्तीसगढ़, केरल, गुजरात, मध्य प्रदेश, गोवा सहित पुडुचेरी, अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप शामिल रहे। उत्तर प्रदेश और बंगाल में सबसे बड़ा बदलाव सबसे बड़ा असर उत्तर प्रदेश में देखने को मिला है, जहां मतदाता सूची से लगभग 2.04 करोड़ नाम हटाए गए हैं। इसके चलते राज्य में मतदाताओं की कुल संख्या में करीब 13 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है और अब यह लगभग 13.39 करोड़ रह गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह बदलाव मुख्य रूप से मृत, स्थानांतरित और दोहरी प्रविष्टियों को हटाने के कारण हुआ है। दूसरे बड़े राज्य पश्चिम बंगाल में भी मतदाता सूची में महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है। यहां करीब 91 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, जिससे राज्य की वोटर लिस्ट पहले की तुलना में काफी छोटी हो गई है। यह राज्य पहले से ही राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जाता है, ऐसे में इस बदलाव को लेकर राजनीतिक हलचल भी तेज हो गई है। 60 करोड़ मतदाता SIR प्रक्रिया के तहत कवर हुए  चुनाव आयोग का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया देश की मतदाता सूची को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने के लिए की जा रही है। आयोग के अनुसार, पूरे देश में करीब 99 करोड़ मतदाताओं में से अब तक लगभग 60 करोड़ मतदाता SIR प्रक्रिया के तहत कवर किए जा चुके हैं, जबकि शेष राज्यों में यह अभियान अगले चरण में पूरा किया जाएगा। हालांकि, इस प्रक्रिया को लेकर कुछ राज्यों में राजनीतिक विवाद भी देखने को मिला है। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में कुछ दलों ने मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने पर सवाल उठाते हुए इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। आने वाले समय में 17 राज्यों और 5 केंद्र शासित प्रदेशों में SIR प्रक्रिया शुरू की जाएगी। चुनाव आयोग का लक्ष्य है कि आगामी चुनावों से पहले देशभर की मतदाता सूची को पूरी तरह अपडेट कर लिा जाए, ताकि चुनावी प्रक्रिया और अधिक पारदर्शी हो सके।