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AIIMS Bhopal में OPD पर्चा बनाने की प्रक्रिया में बदलाव, लाइन में खड़ा होने की जरूरत नहीं

भोपाल  एम्स में इलाज कराने वाले मरीजों को बड़ी राहत मिलने वाली है। उपचार और जांच के लिए एम्स की ओपीडी से लेकर इमरजेंसी तक मरीजों की कतार और भटकाव से मुक्ति मिलने वाली है। संस्थान ने अपनी सेवाओं को डिजिटलाइजेशन करने के लिए नई तकनीक अपनाने जा रहा है। इसके तहत व्हाट्सएप से ही डॉक्टर का अपॉइंटमेंट और जांच का भुगतान किया जा सकेगा। उसी व्हाट्सएप पर जांच रिपोर्ट भी प्राप्त होगी। इसका पायलट प्रोजेक्ट इस सप्ताह के अंत या अप्रेल के प्रारंभ में शुरू होने वाला है। यह सेवा जून तक लागू होगी। ओपीडी की लाइन में लगने वाले लोगों को राहत मिलेगी। ऑनलाइन भुगतान और तुरंत रिफंड आइआइटी इंदौर इस तकनीक को तैयार कर रहा है। इस प्रणाली में जांच और अन्य सेवाओं का भुगतान ऑनलाइन होगा। भूल से यदि मरीज अधिक राशि जमा कर देगा, तो अतिरिक्त धनराशि उसे उसी प्लेटफॉर्म के जरिए मिल जाएगा। इससे काउंटर पर भीड़ कम होगी और प्रक्रिया पारदर्शी बनेगी। मरीजों को मिलेंगी ये स्मार्ट सुविधाएं     व्हाट्सएप पर अपॉइंटमेंट स्लॉट चुनने की सुविधा     डिस्प्ले बोर्ड पर विभागवार प्रतीक्षा समय दिखेगा     नेविगेशन फीचर से विभाग तक पहुंचना आसान     जांच रिपोर्ट की पीडीएफ व्हाट्सएप पर प्राप्त होगी     ओपीडी में क्यू मैनेजमेंट ऐप से टोकन नंबर मिलेगा     डिजिटल ट्रैकिंग से हर प्रक्रिया पर नजर रखी जाएगी सिस्टम बताएगा कहां है कौन विभाग इस तकनीक के नेविगेशन फीचर से यह पता चलेगा कि परिसर में कौन विभाग कहां हैं और कहां कौन सी जांच होती है। ए्स के एक हिस्से में इसका पायलट प्रोजेक्ट चलाया जाएगा। सफल होने पर इसे पूरे परिसर में लागू किया जाएगा। हम इसका पायलट प्रोजेक्ट मार्च के अंत तक शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इसे पूरी तरह से लागू करने में तीन महीना लगेगा। इससे कामकाज अधिक व्यवस्थित होगा, मरीजों और उनके परिजन परेशानी से बचेंगे। – डॉ. केतन मेहरा, एसोसिएट प्रोफेसर, यूरोलॉजी विभाग और प्रवक्ता, एम्स भोपाल बच्चों के किडनी ट्रांसप्लांट की तैयारी एम्स में पीडियाट्रिक किडनी ट्रांसप्लांट शुरू करने की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। संस्थान के अनुसार तीन बच्चों को चिन्हित किया गया है और उनके डोनर की जांच व प्री-वर्कअप जारी है। सब कुछ अनुकूल रहा तो अगले माह प्रदेश का पहला बाल किडनी प्रत्यारोपण संभव हो सकेगा।

नसों के बीच फंसा ट्यूमर, निजी अस्पतालों ने किया मना, एम्स में माइक्रोसर्जरी से सफल निकासी

भोपाल  नसों के बीच विकसित हुए खतरनाक ट्यूमर ने एक 40 वर्षीय महिला की जिंदगी पूरी तरह बदल दी थी। हालत यह हो गई थी कि उनका उठना-बैठना तक मुश्किल हो गया और धीरे-धीरे वे बिस्तर पर निर्भर हो गईं। कई निजी अस्पतालों ने इस जटिल सर्जरी को जोखिम भरा बताकर हाथ खड़े कर दिए थे।  बिस्तर तक सीमित हो गई थी जिंदगी भोपाल निवासी 40 वर्षीय महिला पिछले कई महीनों से इस न्यूरोलॉजिकल समस्या से जूझ रही थीं। स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि वे खुद से उठ-बैठ भी नहीं पा रही थीं। धीरे-धीरे उन्होंने अपने शरीर पर नियंत्रण खोना शुरू कर दिया, जिसमें सबसे बड़ी समस्या मल और मूत्र पर नियंत्रण खत्म होना था। डॉक्टरों ने बताया कि महिला को इंट्रामेडुलरी स्पाइनल ट्यूमर की समस्या थी। यह वह गांठ होती है जो रीढ़ की हड्डी (स्पाइनल कॉर्ड) के अंदर विकसित होती है। यह बेहद दुर्लभ स्थिति है और कुल स्पाइनल ट्यूमर मामलों में इसका प्रतिशत बहुत कम होता है। इस तरह के ट्यूमर में सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि यह सीधे नसों के बीच विकसित होता है, जिससे सर्जरी के दौरान जरा सी चूक स्थायी लकवे का कारण बन सकती है। इसके लक्षणों में शरीर के हिस्सों में कमजोरी, सुन्नपन, चलने में दिक्कत, और मल-मूत्र नियंत्रण में समस्या शामिल हैं। समय पर पहचान और विशेषज्ञ इलाज ही इससे बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है। एक प्रतिशत मामलों में होती है यह बीमारी यह ट्यूमर स्पाइनल श्वाननोमा के बेहद कम, लगभग 1.1 प्रतिशत मामलों में ही देखने को मिलता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह स्थिति रीढ़ की सर्जरी में सबसे जटिल मानी जाती है, क्योंकि इसमें स्पाइनल कॉर्ड के भीतर से ट्यूमर निकालना होता है। जरा सी चूक भी स्थायी लकवा जैसी गंभीर समस्या पैदा कर सकती है। कई अस्पतालों ने ठुकराया, एम्स में मिली उम्मीद मरीज और उनके परिजनों ने इलाज के लिए कई अस्पतालों का रुख किया, लेकिन कहीं सर्जरी को टाल दिया गया तो कहीं इसे अत्यधिक जोखिम भरा और महंगा बताया गया। लगातार निराशा और आर्थिक संकट के बीच परिवार ने लगभग उम्मीद छोड़ दी थी। ऐसे कठिन समय में उन्होंने एम्स का रुख किया, जहां उन्हें नई उम्मीद मिली। ऑर्थोपेडिक्स विभाग के डॉ. पंकज मिश्रा के नेतृत्व में विशेषज्ञों की टीम ने इस चुनौतीपूर्ण केस को स्वीकार किया। सर्जरी से पहले विस्तृत जांच और सटीक योजना बनाई गई। ऑपरेशन के दौरान माइक्रोसर्जिकल तकनीक का इस्तेमाल किया गया, जिससे स्पाइनल कॉर्ड के भीतर मौजूद ट्यूमर को सावधानीपूर्वक हटाया गया। इस प्रक्रिया में नसों को सुरक्षित रखना सबसे बड़ी चुनौती थी, जिसे टीम ने सफलतापूर्वक पूरा किया। ये सावधानियां जरूरी     किसी व्यक्ति को लंबे समय तक पीठ दर्द, पैरों में कमजोरी, चलने में असंतुलन या शरीर के किसी हिस्से में सुन्नपन महसूस हो रहा है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह स्पाइनल ट्यूमर का शुरुआती संकेत हो सकता है। ऐसे में तुरंत न्यूरोलॉजिस्ट या ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।     नियमित स्वास्थ्य जांच, एमआरआई जैसी जांचों से समय रहते बीमारी की पहचान संभव है।     सर्जरी के बाद फिजियोथेरेपी और पुनर्वास बेहद जरूरी होता है, जिससे मरीज तेजी से सामान्य जीवन में लौट सके। अलग-अलग विभागों के डॉक्टरों ने मिलकर की सर्जरी इस जटिल सर्जरी को सफल बनाने में कई विभागों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। एनेस्थीसिया विभाग के डॉ. एसआरएएन भूषण ने ऑपरेशन के दौरान मरीज की स्थिति को स्थिर बनाए रखा। वहीं, शारीरिक चिकित्सा एवं पुनर्वास विभाग के डॉ. विट्ठल पुरी ने सर्जरी के बाद मरीज की रिकवरी में अहम भूमिका निभाई। उनकी देखरेख में मरीज ने धीरे-धीरे अपनी शारीरिक क्षमता वापस पाना शुरू किया। आयुष्मान योजना से मिला फ्री इलाज इस पूरे इलाज की एक और खास बात यह रही कि सर्जरी और उपचार पूरी तरह आयुष्मान भारत योजना के तहत फ्री किया गया। इससे मरीज और उसके परिवार पर किसी प्रकार का आर्थिक बोझ नहीं पड़ा। यह योजना गंभीर बीमारियों से जूझ रहे गरीब और जरूरतमंद मरीजों के लिए बड़ी राहत साबित हो रही है। तेजी से हो रहा सुधार, लौट रही सामान्य जिंदगी सर्जरी के बाद मरीज की स्थिति में तेजी से सुधार देखने को मिला। उन्होंने धीरे-धीरे अपनी ताकत वापस पाना शुरू कर दिया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने फिर से मल-मूत्र पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया है, जो उनके लिए बड़ी राहत की बात है। अब वह धीरे-धीरे सामान्य और आत्मनिर्भर जीवन की ओर बढ़ रही हैं।

महिला डॉक्टर की मौत पर एनएचआरसी ने एम्स से 15 दिन में रिपोर्ट मांगी, सख्त कार्रवाई का आदेश

भोपाल  राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने एम्स भोपाल में कार्यरत एक महिला सहायक प्राध्यापक की मौत के मामले में गंभीर संज्ञान लिया है। आयोग ने मामले की जांच के निर्देश देते हुए 15 दिन के भीतर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी है।शिकायत में आरोप लगाया गया है कि 5 जनवरी 2026 को महिला डॉक्टर की मौत लंबे समय से हो रहे मानसिक उत्पीड़न और खराब कार्य वातावरण के कारण हुई। शिकायत के अनुसार ट्रॉमा एवं आपातकालीन चिकित्सा विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. मोहम्मद यूनुस पर मानसिक प्रताड़ना के आरोप लगाए गए हैं।  महिला डॉक्टरों की शिकायतों को दबाया शिकायत में बताया गया है कि पीड़ित डॉक्टर ने अपनी परेशानी को लेकर तीन बार ई-मेल के माध्यम से संस्थान के अधिकारियों को जानकारी दी थी, लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। शिकायत में यह भी कहा गया है कि संस्थान में पहले भी महिला डॉक्टरों की शिकायतों को दबाया गया और इस मामले में अभी तक प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई।  पुलिस आयुक्त और एम्स भोपाल के निदेशक को दिए निर्देश मामले को गंभीर मानते हुए आयोग के सदस्य प्रियांक कानूनगो की अध्यक्षता वाली पीठ ने नोटिस जारी किया है। आयोग ने भोपाल के पुलिस आयुक्त और एम्स भोपाल के निदेशक को निर्देश दिए हैं कि मामले की जांच कर प्राथमिकी, शव परीक्षण रिपोर्ट और अन्य संबंधित दस्तावेज आयोग को उपलब्ध कराएं। 3 वर्षों की शिकायतों और उन पर हुई कार्रवाई का विवरण मांगा इसके साथ ही एम्स प्रशासन से संस्थान की यौन उत्पीड़न निवारण समिति की जानकारी, पिछले तीन वर्षों में मिली शिकायतों और उन पर हुई कार्रवाई का पूरा विवरण भी मांगा गया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कहा है कि यदि शिकायत में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन माना जाएगा। आयोग ने सभी संबंधित अधिकारियों को 15 दिन के भीतर पूरी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। 

AIIMS भोपाल में ‘मैजिक नाइफ’ की मदद से डेंटल सर्जरी में क्रांतिकारी बदलाव

भोपाल एम्स भोपाल के डॉक्टरों ने दांतों की सर्जरी में इस्तेमाल होने वाला एक मल्टीपल टूल विकसित किया है, जिसे भारत सरकार से पेटेंट मिला है. यह उपकरण डेंटल इम्प्लांट और ओरल सर्जरी को आसान और कम समय में पूरा करने में मदद करेगा.  दरअसल, दांतों के ऑपरेशन के दौरान डॉक्टरों को एक ही उपकरण से  कट लगाना, पकड़ना और इम्प्लांट करना  जैसे अलग अलग काम करने होते हैं.  इससे निजात पाने के लिए एम्स के डॉक्टरों ने डेंटल इम्प्लांट और माइनर ओरल सर्जरी के लिए एक मल्टीपर्पज सर्जिकल टूल बनाया है. यह एक 'स्विस नाइफ' की तरह काम करता है, जिसमें सर्जरी के तमाम स्टेपस् के लिएजरूरी  कई टूल्स एक ही डिवाइस में मिलते हैं.  इस 'स्विस नाइफ' की 5 बड़ी विशेषताएं     ऑल-इन-वन डिज़ाइन यानी सर्जरी के दौरान अलग-अलग दर्जनों औजारों की जरूरत नहीं पड़ेगी, जिससे प्रक्रिया आसान होगी.     कम उपकरणों के उपयोग से संक्रमण का खतरा कम होगा और शल्य चिकित्सा की सटीकता बढ़ेगी.     प्रक्रिया कम समय में पूरी होने से मरीजों को कम असुविधा होगी और उनकी रिकवरी तेज होगी.     इसका डिजाइन काफी छोटा और हल्का है, जो इसे मोबाइल क्लीनिकों और ग्रामीण स्वास्थ्य शिविरों के लिए आदर्श बनाता है.     वहीं, महंगे विदेशी उपकरणों पर निर्भरता कम होने से दंत चिकित्सा की लागत में कमी आएगी.  विशेषज्ञों का मानना है कि यह पेटेंट न केवल एम्स भोपाल के लिए गौरव की बात है, बल्कि यह 'मेक इन इंडिया' पहल को भी मजबूती प्रदान करता है. आने वाले समय में यह उपकरण सरकारी अस्पतालों, प्राइवेट क्लीनिकों और ग्रामीण क्षेत्रों की स्वास्थ्य सेवाओं में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है. इस स्वदेशी उपकरण के मुख्य आविष्कारक डॉ. अंशुल राय हैं. उनके साथ डॉ. बाबूलाल, डॉ. जितेंद्र कुमार, डॉ. ज़ेनिश भट्टी और डॉ. मोनिका राय ने सह-आविष्कारकों के रूप में इस पर काम किया. टीम का उद्देश्य सर्जरी के दौरान बार-बार उपकरण बदलने की जटिलता और उससे होने वाली मानवीय त्रुटियों को कम करना था. 

एम्स भोपाल में मप्र में पहली बार हुई ‘मसल ट्रांसफर’ सर्जरी, जांघ की मांसपेशी से लौटाई गई हाथ की गति

भोपाल  एम्स भोपाल के बर्न्स एवं प्लास्टिक सर्जरी विभाग ने मध्य प्रदेश में पहली बार एक ऐसी जटिल सर्जरी को अंजाम दिया है, जिसमें शरीर के एक हिस्से की सक्रिय मांसपेशी को दूसरे हिस्से में लगाकर अंग की गति वापस लाई गई। 'फ्री फंक्शनिंग मसल ट्रांसफर' (एफएफएमटी) नामक इस तकनीक के जरिए 55 वर्षीय एक ऐसे मरीज का हाथ सक्रिय किया गया है, जो 'पैन ब्रैकियल प्लेक्सस इंजरी' के कारण पूरी तरह लकवाग्रस्त (पैरालाइज्ड) हो चुका था। मरीज एक ऐसी गंभीर स्थिति से जूझ रहा था जिसमें कंधे से हाथ तक जाने वाली नसों का जाल पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था। इसके परिणामस्वरूप उसका ऊपरी अंग पूरी तरह निष्क्रिय था और वह हाथ हिलाने तक में असमर्थ था। इस स्थिति में जीवन की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित होती है क्योंकि मरीज दैनिक कार्यों के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाता है। कैसे हुई जटिल माइक्रोसर्जरी? इस सर्जरी में मरीज की जांघ से 'ग्रैसिलिस' नामक मांसपेशी को उसकी नसों और रक्त वाहिकाओं के साथ निकाला गया। इस जीवित मांसपेशी को प्रभावित हाथ में प्रत्यारोपित किया गया। इसके बाद माइक्रोस्कोप की मदद से नसों और खून की नलियों को जोड़ा गया। इस सफल प्रक्रिया के बाद अब मरीज की कोहनी में सक्रिय लचीलापन बहाल हो सकेगा, जिससे वह हाथ मोड़ना और उठाना जैसे बुनियादी कार्य कर पाएगा। इन विशेषज्ञों की टीम ने रचा इतिहास इस ऐतिहासिक सर्जरी में बर्न्स एवं प्लास्टिक सर्जरी विभाग के डॉ. दीपक कृष्णा (अतिरिक्त प्रोफेसर), डॉ. राहुल दुबेपुरिया (एसोसिएट प्रोफेसर) की मुख्य भूमिका रही। एनेस्थीसिया टीम का नेतृत्व डॉ. अनुज जैन (अतिरिक्त प्रोफेसर) ने किया। जटिल सर्जरी किफायती दरों पर उपलब्ध     प्रदेश में यह अपनी तरह की पहली और बेहद जटिल प्रक्रिया है। इस उपलब्धि ने साबित किया है कि एम्स भोपाल अब दुनिया की सबसे उन्नत माइक्रोसर्जिकल तकनीकों को अपनाने में सक्षम है। हमारा लक्ष्य गरीब और जरूरतमंद मरीजों को ऐसी महंगी और जटिल सर्जरी किफायती दरों पर उपलब्ध कराना है। – प्रो. डॉ. माधवानंद कर, कार्यपालक निदेशक, एम्स भोपाल।  

एम्स भोपाल के डॉक्टरों की सफलता: अत्यंत चुनौतीपूर्ण ‘होल लंग्स लैवेज’ प्रक्रिया पूरी की

 भोपाल  पत्थर, सीमेंट और निर्माण से जुड़ी दुनिया जितनी मजबूत दिखती है, उतनी ही कमजोर जिंदगियां उसके पीछे काम कर रही होती हैं। इन्हीं जिंदगियों को धीरे-धीरे निगल लेने वाली एक खामोश और जानलेवा बीमारी है सिलिकोसिस। यह ऐसी बीमारी है, जिसमें फेफड़े धीरे-धीरे पत्थर जम जाता है।  एम्स भोपाल में मध्य भारत की पहल एम्स भोपाल के डॉक्टरों ने इस मरीज के इलाज के लिए ‘होल लंग्स लैवेज’ नाम की अत्यंत जटिल प्रक्रिया को अंजाम दिया। इस प्रक्रिया में फेफड़ों के अंदर जमा प्रोटीन और धूल को सलाइन वाटर से धोकर बाहर निकाला जाता है। एम्स प्रबंधन के अनुसार, मध्य भारत में यह पहला मौका है, जब सिलिकोसिस से प्रभावित फेफड़ों में जमे प्रोटीन को इस तकनीक से सफलतापूर्वक साफ किया गया हो। डॉक्टरों का कहना है कि यह सिर्फ एक मरीज का इलाज नहीं, बल्कि उन हजारों मजदूरों के लिए उम्मीद की किरण है, जो रोजाना पत्थरों और धूल के बीच काम करते हुए अपनी सांसें दांव पर लगा देते हैं। स्टोन क्रशर की धूल ने बिगाड़ी हालत एम्स के पल्मोनोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. अल्केश खुराना और असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अभिनव खुराना ने बताया कि मरीज लंबे समय से स्टोन क्रशर में काम कर रहा था। वहां उड़ने वाली बारीक सिलिका धूल सांस के साथ उसके फेफड़ों में पहुंचती रही और धीरे-धीरे वहां जमती चली गई। इस स्थिति को मेडिकल भाषा में डिफ्यूज एल्वियोलर प्रोटीनोसिस कहा जाता है। इसमें फेफड़ों की हवा वाली थैलियों में प्रोटीन भर जाता है, जिससे ऑक्सीजन का आदान-प्रदान रुकने लगता है। यही कारण था कि मरीज को सांस लेने में अत्यधिक परेशानी हो रही थी और उसका ऑक्सीजन स्तर लगातार गिरता जा रहा था। 6 घंटे चली बेहद जोखिमभरी प्रक्रिया डॉ. खुराना के अनुसार, होल लंग्स लैवेज एक बेहद जटिल और जोखिमभरी प्रक्रिया है। इसमें फेफड़ों के अंदर 6 से 8 लीटर तक सलाइन वाटर डाला जाता है और फिर उसे बाहर निकाला जाता है, ताकि जमा प्रोटीन साफ हो सके। यह प्रक्रिया इसलिए भी खतरनाक होती है क्योंकि ज्यादा मात्रा में पानी फेफड़ों में जाने से मरीज की जान को सीधा खतरा हो सकता है। इसी वजह से पूरी प्रक्रिया को अत्यंत सावधानी के साथ करीब 6 घंटे में पूरा किया गया। डॉक्टरों की एक पूरी टीम लगातार मरीज के ऑक्सीजन स्तर, हृदय गति और ब्लड प्रेशर पर नजर रखे हुए थी। कार्डियक ओटी में हुआ ऑपरेशन इस जटिल प्रक्रिया को कार्डियक ओटी में किया गया, जिसमें कार्डियक थोरेसिक सर्जन डॉ. योगेश निवारिया भी शामिल थे। उन्होंने बताया कि इस इलाज की सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि जब एक फेफड़े को साफ किया जा रहा होता है, तब मरीज को दूसरे फेफड़े के सहारे ही सांस लेनी पड़ती है। इस मरीज के मामले में मुश्किल और बढ़ गई थी, क्योंकि दूसरा फेफड़ा भी काफी कमजोर हो चुका था। ऐसे हालात में कई बार मरीज को हार्ट-लंग मशीन यानी आर्टिफिशियल लंग्स पर रखना पड़ता है। हालांकि, डॉक्टरों की सतर्कता और सही रणनीति के चलते इस मरीज को मशीन पर डालने की जरूरत नहीं पड़ी और प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी हो गई। क्या है सिलिकोसिस और क्यों है यह जानलेवा सिलिकोसिस सिलिका नामक बेहद बारीक धूल के कणों से होने वाली बीमारी है। ये कण सांस के साथ फेफड़ों में पहुंच जाते हैं और वहां जमा होकर फेफड़ों की कोमल झिल्लियों को नुकसान पहुंचाते हैं। धीरे-धीरे फेफड़े स्पंज जैसे नरम रहने के बजाय पत्थर की तरह सख्त हो जाते हैं। जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, मरीज को सांस लेने में तकलीफ, लगातार खांसी, थकान और ऑक्सीजन की कमी महसूस होने लगती है। अंतिम चरण में शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और मरीज की मौत तक हो सकती है। मजदूर सबसे ज्यादा चपेट में सिलिकोसिस का सबसे बड़ा शिकार वे मजदूर होते हैं, जो खदानों, स्टोन क्रशर, पत्थर की पाउडर मिलों, सीमेंट फैक्ट्रियों और कांच-सिरेमिक उद्योगों में काम करते हैं। इनमें से ज्यादातर मजदूर गरीब तबके से आते हैं और सुरक्षा उपकरणों की कमी या जानकारी के अभाव में इस जानलेवा धूल के संपर्क में रहते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि सिलिकोसिस से बचाव ही सबसे बड़ा इलाज है। इसके लिए कार्यस्थलों पर धूल नियंत्रण, मास्क और नियमित स्वास्थ्य जांच बेहद जरूरी है।

AIIMS दिल्ली की बड़ी पहल: स्ट्रोक से जूझ रहे मरीज अब घर पर ही कर सकेंगे रिकवरी

नई दिल्ली भारत में आज स्ट्रोक एक गंभीर और तेजी से बढ़ती हुई स्वास्थ्य समस्या बन चुका है. बदलती लाइफस्टाइल, बढ़ता स्ट्रेस, गलत खान-पान और फिजिकल एक्टिविटी की कमी के कारण स्ट्रोक के मामले हर साल लगातार बढ़ रहे हैं. हालात इतने गंभीर हैं कि हर साल लाखों भारतीय स्ट्रोक का शिकार होते हैं, जिनमें से कई लोगों की जान चली जाती है. जेरोधा के को-फाउंडर नितिन कामथ और एक्टर मिथुन चक्रवर्ती, हाल के कुछ सालों में कई जानी-मानी हस्तियां स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारी का सामना कर चुकी हैं. इससे साफ है कि यह बीमारी अब सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही, बल्कि कम उम्र के लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं. स्ट्रोक के बाद कई मरीजों में शरीर के किसी हिस्से में कमजोरी या लकवा, बोलने-समझने में परेशानी, चलने-फिरने में दिक्कत और रोजमर्रा के कामों में दूसरों पर निर्भरता बढ़ जाती है.  AIIMS की नई स्टडी से नई उम्मीद ऐसे में AIIMS दिल्ली की एक नई स्टडी स्ट्रोक के मरीजों के लिए उम्मीद की किरण बनकर सामने आई है. इस स्टडी के अनुसार, रोजाना सिर्फ 30 मिनट धूप में समय बिताना स्ट्रोक से उबर रहे मरीजों की रिकवरी, नींद और मूड में सुधार कर सकता है. वो भी बिना किसी अधिक खर्च के… एम्स की यह स्टडी नवंबर 2023 से अप्रैल 2025 के बीच की गई और इसे संस्थान के पांचवें रिसर्च डे पर पेश किया गया. इसमें पाया गया कि जिन स्ट्रोक मरीजों को नियमित इलाज और फिजियोथेरेपी के साथ सनलाइट थेरेपी दी गई, उनकी जिंदगी की गुणवत्ता उन मरीजों की तुलना में काफी बेहतर रही जिन्हें केवल सामान्य इलाज दिया गया.  कैसे की गई स्टडी? इस स्टडी में 18 से 80 वर्ष के उन मरीजों को शामिल किया गया, जिन्हें पिछले एक महीने के अंदर मिडियम लेवल का स्ट्रोक हुआ था.     200 से ज्यादा मरीजों की स्क्रीनिंग के बाद 40 मरीजों को चुना गया और फिर उन्हें दो ग्रुप में बांटा गया.      पहला ग्रुप सिर्फ स्टैंडर्ड मेडिकल ट्रीटमेंट और रिहैबिलिटेशन और दूसरा ग्रुप स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट और करीब दो हफ्तों तक हर दूसरे दिन 30 मिनट धूप में बैठना.      धूप की तीव्रता 10,000 से 25,000 लक्स के बीच रखी गई, जो हल्की आउटडोर डे-लाइट के बराबर होती है. सुरक्षा के लिए लक्स मीटर से लगातार निगरानी की गई.     तीन महीने तक मरीजों की शारीरिक क्षमता, मूड, नींद, रोजाना के काम करने की शक्ति और ओवरऑल वेल-बीइंग को देखा गया. स्टडी का नतीजा क्या हुआ? डॉक्टरों के मुताबिक, सनलाइट थेरेपी लेने वाले मरीजों में नींद की क्वालिटी  बेहतर हुई. नींद के साथ मूड और मानसिक स्थिति में सुधार देखा गया और खुद रोजाना के काम में आत्मनिर्भरता बढ़ी. एक्सपर्ट्स का मानना है कि धूप शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक को ठीक करती है, विटामिन D बढ़ाने में मदद करती है और सूजन को कम कर सकती है, जो स्ट्रोक रिकवरी में अहम रोल निभाते हैं.  भारतीयों के लिए क्यों है खास? भारत में स्ट्रोक रिकवरी एक लंबा और महंगा प्रोसेस माना जाता है, जिसकी वजह से कई बार लोग इसको अफोर्ड नहीं कर पाते हैं. कई मरीजों को लंबे समय तक फिजियोथेरेपी और देखभाल की जरूरत होती है, जो हर किसी के लिए पॉसिबल नहीं. ऐसे में 30 मिनट की धूप जैसी फ्री, सुरक्षित और आसानी से मौजूद थेरेपी खासतौर पर गांव के इलाकों और घर पर रिकवरी कर रहे मरीजों के लिए बेहद  उपयोगी हो सकती है. हालांकि स्टडी का सैंपल साइज छोटा था और यह एक ही सेंटर पर की गई, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि अगर आगे बड़े लेवल पर इस पर रिसर्च होती है, तो सनलाइट थेरेपी पोस्ट-स्ट्रोक केयर का अहम हिस्सा बन सकती है. स्ट्रोक पर क्या कहते हैं ICMR के आंकड़े ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज के आंकड़ों के अनुसार, साल 2021 में भारत में करीब 12 लाख नए स्ट्रोक के मामले सामने आए. इतना ही नहीं, लगभग 94 लाख लोग ऐसे थे जो स्ट्रोक के बाद इसके लंबे समय तक रहने वाले असर जैसे कमजोरी, बोलने में दिक्कत या याददाश्त की समस्या से जूझ रहे थे. ICMR के 2021 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में स्ट्रोक आज मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण बन चुका है. यह डिसेबिलिटी की छठी सबसे बड़ी वजह भी है, यानी बड़ी संख्या में लोग स्ट्रोक के बाद नॉर्मल जिंदगी नहीं जी पाते हैं. 2023 में लैंसेट जर्नल में पब्लिश एक स्टडी, जो भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के साथ की गई थी. उस रिपोर्ट के मुताबिक, अगर हालात नहीं सुधरे तो साल 2050 तक कम और मिडियम इनकम वाले देशों में करीब 1 करोड़ लोगों की मौत स्ट्रोक की वजह से हो सकती है, और इस खतरे से भारत भी बाहर नहीं है.

एम्स का नया कदम: CAPE सेंटर शुरू, कैंसर मरीजों को मिलेगा मानसिक और वैज्ञानिक सहयोग

भोपाल  एम्स भोपाल ने कैंसर मरीजों और उनके परिजनों के लिए एक बड़ी और संवेदनशील पहल की है। संस्थान में कैंसर जागरूकता एवं रोगी सशक्तिकरण (CAPE) सुविधा केंद्र की शुरुआत की गई है, जिसका मकसद कैंसर से जुड़े डर, भ्रम और गलतफहमियों को तोड़कर मरीजों को सही जानकारी से सशक्त बनाना है।यह CAPE सेंटर कैंसर के तकनीकी इलाज और मरीज की सामान्य समझ के बीच एक मजबूत सेतु के रूप में काम करेगा। यहां मरीजों को उनकी बीमारी, इलाज के विकल्प, दवाओं के दुष्प्रभाव और जीवनशैली में जरूरी बदलावों की जानकारी सरल और संवेदनशील भाषा में दी जाएगी। डर और तनाव कम करेगा CAPE सेंटर कैंसर का नाम सुनते ही मरीज और उनके परिजन मानसिक दबाव में आ जाते हैं। CAPE सेंटर का मुख्य लक्ष्य इसी डर को खत्म करना है। यहां इलाज की पूरी प्रक्रिया विस्तार से समझाई जाएगी, ताकि मरीज बिना घबराए सही और समय पर निर्णय ले सकें। यह पहल राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के उस सिद्धांत को भी मजबूत करती है, जिसमें मरीज को इलाज की प्रक्रिया का केंद्र माना गया है। समय पर जांच से बचेंगी जानें केंद्र का एक अहम उद्देश्य लोगों को समय पर जांच और इलाज के लिए प्रेरित करना है। जानकारी के अभाव में होने वाली देरी कैंसर में जानलेवा साबित होती है। CAPE सेंटर इस देरी को कम कर अनावश्यक मौतों को रोकने में मदद करेगा और देश में बढ़ते कैंसर बोझ को घटाने में सहायक बनेगा। सरल भाषा, वीडियो और दो-तरफा संवाद इस केंद्र की खासियत इसकी कार्यप्रणाली है। यहां जटिल मेडिकल शब्दों के बजाय आम बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल होगा। वीडियो, दृश्य-श्रव्य सामग्री और दो-तरफा बातचीत के जरिए मरीज और उनके परिजन खुलकर सवाल पूछ सकेंगे। इलाज के दौरान ही नहीं, बल्कि इलाज के बाद भी यह केंद्र मरीजों के साथ जुड़ा रहेगा। एम्स भोपाल का CAPE सेंटर यह संदेश देता है कि कैंसर केवल बीमारी नहीं, सही जानकारी और भरोसे से लड़ी जाने वाली चुनौती है। एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक प्रो. (डॉ.) माधवानंद कर के निर्देशन में और सेट (सिमुलेशन, ई-लर्निंग एवं टेलीमेडिसिन) समिति के मार्गदर्शन में इस केंद्र को विकसित किया गया है। इसके निर्माण और योजना में वरिष्ठ संचार विशेषज्ञ श्री बीरेंद्र दास की अहम भूमिका रही। वहीं, सेट समिति के प्रो. (डॉ.) रजनीश जोशी (डीन-अकादमिक), डॉ. संजीव कुमार (चेयरमैन, सेट), डॉ. सैकत दास (सदस्य, सेट एवं सदस्य सचिव, ट्यूमर बोर्ड) और डॉ. गुंजन चौकसे (सदस्य सचिव, सेट) ने इस पहल को जमीन पर उतारने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

AIIMS रिसर्च: योग अपनाने से घटता है मानसिक तनाव, स्टडी में हुआ खुलासा

भोपाल  ब्रेस्ट कैंसर के ऑपरेशन के बाद महिला मरीजों में मानसिक तनाव, चिंता और दर्द सामान्य रूप से देखने को मिलता है। एम्स भोपाल के हालिया अध्ययन में सामने आया है कि नियमित योग अभ्यास से मरीजों का मानसिक संतुलन बेहतर होता है और दर्द के प्रति सहनशीलता बढ़ती है। इससे मरीजों की रिकवरी में तेजी आती है और उनकी जीवन गुणवत्ता बेहतर होती है। बढ़ता है आत्मविश्वास भोपाल और इसके आसपास के जिलों कई महिलाएं अपने पहले वाली जीवन में लौट गई है। अध्ययन में शामिल मरीजों ने ऑपरेशन के बाद तनाव और भय में स्पष्ट कमी देखी। विशेषज्ञों का कहना है कि योग मानसिक स्थिरता बढ़ाकर मरीजों को भावनात्मक रूप से मजबूत बनाता है। तनाव और चिंता में कमी से रोगियों का आत्मविश्वास भी बढ़ता है।  एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि दर्द निवारक दवा बुप्रेनॉर्फिन के साथ योग करने से मरीज लगभग दो गुना तेजी से ओपिओइड वापसी से उबरते हैं। योग तनाव को कम करता है, नींद सुधारता है और दर्द को घटाता है। योग करने से औसत रिकवरी समय पांच दिन था, जबकि सिर्फ दवा लेने वाले का नौ दिन था। भविष्य में संभावनाएं अध्ययन के परिणाम बताते हैं कि ब्रेस्ट कैंसर के मरीजों में योग को नियमित अभ्यास के रूप में शामिल किया जा सकता है। इससे मानसिक तनाव घटेगा, दर्द में कमी आएगी और दवाओं पर निर्भरता कम होगी। सुरक्षित और प्रभावी उपाय एम्स भोपाल की योग विशेषज्ञ डॉ. मुद्दा सोफिया बताते हैं कि योग एक सुरक्षित और किफायती उपाय है। यह मन और शरीर, दोनों को मजबूत बनाता है। एक हजार से अधिक महिलाओं पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि ब्रेस्ट सर्जरी के बाद जो महिलाएं मानसिक तनाव में थी वे नियमित योग करने बाद मानसिक तनाव से मुक्त हो गई।

भोपाल एम्स की प्रोफेसर रश्मि वर्मा की आत्महत्या के प्रयास के बाद मौत, टॉक्सिक वर्क कल्चर पर उठे सवाल

भोपाल  मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में इमरजेंसी एवं ट्रॉमा विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ रश्मि वर्मा की सोमवार को मौत हो गई। वह पिछले 24 दिनों से एम्स के एम्स के आईसीयू में वेंटिलेटर सपोर्ट में भर्ती थीं। जानकारी के अनुसार, डॉ रश्मि वर्मा ने सोमवार की सुबह 10 करीब अंतिम सांस ली। परिजनों को शव सौंप दिया गया है। बीते दिनों पहले उन्होंने एनेस्थीसिया का हाई डोज ले लिया था। जिसके बाद उनके पति ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ डॉ. मनमोहन शाक्य उन्हें बेहोशी की हालत में लेकर एम्स पहुंचे थे। 11 दिसंबर को एम्स भोपाल में कराया था भर्ती दरअसल, डॉ. रश्मि वर्मा को 11 दिसंबर को गंभीर हालत में एम्स भोपाल में भर्ती कराया गया था। एनेस्थीसिया का ओवरडोज लेकर खुदकुशी की कोशिश की थी। परिजनों के मुताबिक, उन्हें घर पर अचेत अवस्था में पाया गया, जिसके बाद उनके पति उन्हें तत्काल अस्पताल लेकर पहुंचे। अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टर ने उन्हें सीपीआर देकर रिवाइव किया। बताया गया कि उस समय करीब 7 मिनट तक उनकी दिल की धड़कन बंद रही थी। इसके बाद से डॉ. रश्मि का इलाज एम्स के आईसीयू में वेंटिलेटर सपोर्ट पर चल रहा था। एम्स के अनुसार, 5 जनवरी की सुबह करीब 11 बजे डॉ. रश्मि वर्मा ने अंतिम सांस ली। उनका शव परिजनों को सौंप दिया गया। डॉ. रश्मि वर्मा ने बेहोशी की दवा (एनेस्थीसिया) का हाई डोज लिया था। उनके पति ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ डॉ. मनमोहन शाक्य उन्हें बेहोशी की हालत में एम्स लेकर पहुंचे थे। 7 मिनट तक रुकी थी दिल की धड़कन एम्स पहुंचने से पहले करीब 25 मिनट का वक्त निकल चुका था। डॉक्टरों के मुताबिक, इस दौरान डॉ. रश्मि का दिल लगभग 7 मिनट तक धड़कना बंद कर चुका था। इमरजेंसी में मौजूद डॉक्टरों ने तुरंत सीपीआर शुरू किया और तीन बार रेससिटेशन के बाद उनकी हार्टबीट वापस लाई जा सकी थी। हालांकि, इतने लंबे समय तक ब्रेन को ऑक्सीजन नहीं मिलने से मस्तिष्क को गंभीर क्षति पहुंच चुकी थी। एमआरआई रिपोर्ट में सामने आया गंभीर ब्रेन डैमेज घटना के 72 घंटे बाद कराई गई एमआरआई रिपोर्ट में ‘ग्लोबल हाइपोक्सिया ब्रेन’ की पुष्टि हुई थी। इसका मतलब था कि उनके पूरे मस्तिष्क को लंबे समय तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिली। डॉक्टरों के अनुसार, यह स्थिति अकसर कार्डियक अरेस्ट के बाद होती है। इसमें रिकवरी की संभावना बेहद कम रहती है। डॉ. रश्मि वर्मा 24 दिनों से एम्स के मेन आईसीयू में वेंटिलेटर सपोर्ट पर थीं। विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम उनकी स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए थी। हर दिन उम्मीद की किरण तलाशने की कोशिश की गई, लेकिन ब्रेन डैमेज इतना गंभीर था कि सुधार नहीं हो सका। कई बार इलाज का खर्च खुद उठाती थीं डॉ. रश्मि डॉ. रश्मि वर्मा ने प्रयागराज के एमएलएन मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस और बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर से एमडी (जनरल मेडिसिन) किया था। वे एम्स भोपाल के अलावा एलएन मेडिकल कॉलेज और पीएमएस भोपाल में भी सेवाएं दे चुकी थीं। पांच साल का टीचिंग अनुभव रखने वाली डॉ. रश्मि गरीब मरीजों की मदद के लिए जानी जाती थीं और कई बार इलाज का खर्च भी खुद उठाती थीं। वर्तमान में सीपीआर ट्रेनिंग प्रोग्राम की नोडल अधिकारी भी थी। घटना के बाद हुई थी आपात बैठक, कई फैसले लिए गए थे डॉ. रश्मि की मौत के बाद एम्स के भीतर के कथित टॉक्सिक वर्क कल्चर, प्रशासनिक दबाव और नोटिस सिस्टम को लेकर सवाल और तेज हो गए हैं। घटना के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और एम्स प्रबंधन की आपात बैठक हुई थी, जिसमें ट्रॉमा एंड इमरजेंसी विभाग के एचओडी को हटाने और विभाग को दो हिस्सों में बांटने जैसे बड़े फैसले लिए गए थे। इस पूरे मामले की गोपनीय जांच के लिए हाई लेवल कमेटी गठित भी की गई थी, जिसकी अब तक रिपोर्ट सामने नहीं आई है। तमाम कोशिशों के बावजूद नहीं बची जान बीते 23 दिनों तक डॉक्टरों की टीम ने लगातार प्रयास किए, लेकिन लंबा इलाज और तमाम कोशिशों के बावजूद उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। एम्स प्रशासन ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। सहकर्मियों और स्टाफ के बीच शोक की लहर है। डॉ. रश्मि वर्मा एक समर्पित चिकित्सक के रूप में जानी जाती थीं और इमरजेंसी व ट्रॉमा विभाग में उनकी सेवाओं को सराहा जाता रहा है। डॉक्टरों के अनुसार, इमरजेंसी एंड ट्रॉमा विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रश्मि वर्मा 11 दिसंबर 2025 को ड्यूटी पूरी करने बाद शाम को घर लौट आईं थी। रश्मि के पति ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ डॉ. रतन वर्मा रात करीब साढ़े 10 बजे उनको बेहोशी की हालत में एम्स लेकर आए। डॉ. रतन ने बताया कि घर पर सब नॉर्मल था। सब अपना-अपना काम कर रहे थे। डॉ. रश्मि के पास पहुंचे तो वो बेहोश मिलीं थीं। जिसके बाद उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया था। 7 मिनट तक बंद रहा था दिल डॉ रश्मि का दिल करीब 7 मिनट तक बंद रहा, जिससे उनके दिमाग को गंभीर नुकसान पहुंचा । एमआरआई रिपोर्ट में ग्लोबल हाइपोक्सिया ब्रेन डैमेज की पुष्टि हुई थी। डॉ. रश्मि वर्मा बीते कई दिनों से वेंटिलेटर सपोर्ट पर थी। इलाज में जुटे चिकित्सकों की मानें तो उनकी हालत नाजुक बनी हुई थी।