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AI-समिट 2026 में नया आविष्कार, 30 मिनट में कैंसर डिटेक्शन संभव

नई दिल्ली हेल्थ सेक्टर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का असर तेजी से दिख रहा है. दिल्ली के भारत मंडपम में चल रहे एआई समिट में एक खास डिवाइस लोगों का ध्यान खींच रहा है. दावा किया गया है कि यह नया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डिवाइस पेट से जुड़ी बीमारियों और खासतौर पर कैंसर का पता आसानी से और समय रहते लगा सकता है, जिससे मरीज को बीमारी के गंभीर होने से पहले इलाज मिल सकेगा. विप्रो की चीफ टेक्निकल ऑफिसर संध्या अरुण के मुताबिक, यह डिवाइस शुरुआती स्टेज में ही कैंसर का पता लगा लेता है. इससे मरीज को समय पर इलाज मिल सकता है और कई मामलों में सर्जरी की जरूरत ही नहीं पड़ेगी.उनका कहना है कि जल्दी पहचान ही सबसे बड़ा फायदा है, क्योंकि बीमारी जितनी जल्दी पकड़ में आ जाएगी, इलाज उतना आसान और असरदार होगा. आइए व‍िस्‍तार से जानते हैं इस ड‍िवाइस के बारे में… कैसे काम करती है मशीन? यह एआई आर्म रोबोटिक एमआरआई मशीन सबसे पहले मरीज के पेट का स्कैन करती है. स्कैन का रिजल्ट रियल-टाइम स्क्रीन पर दिखाई देता है, जिससे डॉक्टर तुरंत समझ सकते हैं कि अंदर क्या समस्या है. कैंसर का कैसे लगाएगी पता स्कैन में अगर ट्यूमर या कैंसर से जुड़ी कोई असामान्यता दिखती है, तो एआई तुरंत उसका विश्लेषण करता है और बताता है कि तस्वीर में दिख रही चीज क्या है. कंपनी का कहना है कि 30–45 मिनट में पूरा स्कैन और रिपोर्ट तैयार हो जाती है. मशीन में क्या है, क्या सिर्फ पेट होगा स्कैन? विप्रो की ओर से बताया गया कि इस एआई मशीन में चार अलग-अलग आर्म लगी हुई हैं और इनसे पूरा शरीर स्कैन हो सकेगा. एक आर्म मिड-बॉडी स्कैन के लिए है और बाकी अलग-अलग हिस्सों के लिए हैं. इससे पूरे शरीर की जांच आसानी से की जा सकती है. और क्या फायदे हैं इस मशीन के दावा किया गया कि इस मशीन से समय और लागत दोनों की बचत होगी. साथ ही यह भारत में बनी पहली AI-संचालित MRI मशीन है, जो स्कैन समय में करीब 37 फीसदी की कमी लाती है. 75 फीसदी तक हीलियम की खपत घटाती है. यानि जांच होगी तेज़, सटीक और सस्ती होगी और मरीज को जल्दी इलाज मिल सकेगा. बता दें क‍ि नई AI तकनीक से मेडिकल जांच का तरीका लगातार बदल रहा है और भविष्य में कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का पता लगाना पहले से कहीं ज्यादा आसान हो सकता है.

डरावनी चेतावनी: 2040 तक कैंसर से हालात होंगे और भयावह, हर 2 मिनट में एक पीड़ित

कैंसर के मामले वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य के लिए सबसे गंभीर चुनौती बने हुए हैं। हर साल इस बीमारी के कारण लाखों लोगों की जान जा रही है। बुजुर्ग और युवा तो छोड़िए, बच्चे भी तेजी से इसका शिकार होते जा रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, जिस गति से ये बीमारी बढ़ती जा रही है, ऐसे में अनुमान है कि आने वाले वर्षों में कैंसर के कारण हालात और भी गंभीर हो सकते हैं। इस जानलेवा रोग के जोखिमों को देखते हुए सभी लोगों को इससे बचाव के लिए निरंतर प्रयास करते रहने की जरूरत है। आने वाले दो दशकों में कैंसर और कितना खतरनाक रूप लेने वाला है? इससे संबंधित रिपोर्ट में जो बातें सामने आई हैं, वो निश्चित ही काफी डराने वाली हैं। ब्रिटेन की एक जानी-मानी चैरिटी ने चेतावनी दी है कि साल 2040 तक कैंसर के मामले रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच सकते हैं। हालात इतने बिगड़ सकते हैं कि हर दो मिनट में एक व्यक्ति में इस बीमारी का निदान होने की आशंका है। वैसे तो ये रिपोर्ट केवल ब्रिटिश नागरिकों में कैंसर के बढ़ते जोखिमों को लेकर है, पर विशेषज्ञ इसे दुनियाभर के लिए बड़ी चेतावनी मान रहे हैं। बच्चे भी कैंसर की चपेट में आ रहे हैं जिसके कारण एक पूरी पीढ़ी पर कैंसर का गहरा साया देखा जा रहा है। अगले दो दशकों में और बिगड़ सकते हैं हालात 'वन कैंसर वॉइस' नाम के 60 कैंसर संस्थानों वाले ग्रुप ने ये चौंकाने वाला अनुमान जारी किया है, जिसमें अगले दो दशकों में अकेले ब्रिटेन में कैंसर के 63 लाख नए मामलों का अनुमान लगाया गया है। विशेषज्ञों ने शोध के दौरान पाया है कि ब्रेस्ट, प्रोस्टेट और लंग्स कैंसर के मामले बहुत तेजी से बढ़ने वाले हैं। इसके कारण स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त बोझ बढ़ने की आशंका जताई गई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया कि कैंसर के बढ़ते खतरे के लिए वैसे तो कई कारण जिम्मेदार पाए गए हैं। हालांकि मोटापे की बढ़ती दर, खराब डाइट, कुछ प्रकार के कैंसर को रोकने वाली वैक्सीन लगवाने में कमी और लोगों में बढ़ती धूम्रपान की आदत इसके लिए मुख्यरूप से जिम्मेदार है। क्या कहती हैं विशेषज्ञ? कैंसर रिसर्च यूके की चीफ एग्जीक्यूटिव मिशेल मिशेल ने चेतावनी दी है कि हममें से लगभग दो में से एक को अपनी जिंदगी में कैंसर का खतरा हो सकता है। इस बीमारी का असर हर किसी पर पड़ेगा, चाहे उन्हें खुद इस बीमारी का पता चले या उनके किसी दोस्त-परिवार के सदस्य या प्रियजन को ये समस्या हो। उन्होंने आगे कहा कि अगर अभी से कैंसर की रोकथाम के लिए कदम नहीं उठाए गए तो इंग्लैंड में इस रोग के मामले दुनिया के कई देशों को पीछे छोड़ सकते हैं।       यूके में कैंसर और इसके कारण होने वाली समय से पहले मौत का सबसे बड़ा कारण तंबाकू है।     कैंसर का खतरा उम्र से भी जुड़ा हुआ है, क्योंकि समय के साथ बीमारी को ट्रिगर करने वाले सेल्स में डैमेज का जोखिम भी काफी बढ़ सकता है। कौन से कैंसर बढ़ा रहे खतरा? कैंसर को लेकर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि ब्रिटेन में जिन कैंसर का जोखिम सबसे ज्यादा बढ़ता जा रहा है उनमें प्रोस्टेट, ब्रेस्ट, लंग्स, बाउल और मेलेनोमा स्किन कैंसर शीर्ष पांच पर हैं। ये सिर्फ ब्रिटेन ही नहीं दुनिया के अन्य देशों के लिए भी अलर्ट है। कैंसर रोग विशेषज्ञों ने बताया कि हमारी रोजाना की गड़बड़ आदतें भी कैंसर के खतरे को बढ़ाती जा रही हैं। अमर उजाला में प्रकाशित रिपोर्ट में हमने बताया था कि किस तरह से डियोड्रेंट और परफ्यूम के इस्तेमाल के कारण भी कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है। इसके अलावा जिन लोगों को इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज की दिक्कत होती है, ऐसे लोगों में आगे चलकर बाउल कैंसर का खतरा 600 प्रतिशत तक ज्यादा हो सकता है। बाउल कैंसर को कोलन कैंसर या कोलोरेक्टल कैंसर के नाम से भी जाना जाता है।  

औषधीय पौधे में कैंसर का उपचार ढूंढने वाटिका पर खर्च होंगे 30 करोड़

भागलपुर. जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज सूबे का पहला मेडिकल कॉलेज होगा, जहां हर्बल वाटिका बनेगी। दो माह के अंदर हर्बल वाटिका तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है। हर्बल वाटिका तैयार होने के बाद छात्र आयुर्वेद और एलोपैथी के बीच के संबंध पर शोध करेंगे। औषधीय पौधों पर अध्ययन कर कैंसर, हृदय रोग सहित अन्य गंभीर बीमारियों के उपचार की संभावनाएं तलाशेंगे। कॉलेज परिसर में बनने वाली हर्बल वाटिका में बीएयू का सहयोग लिया जा रहा है। यह वाटिका बीएयू के वानिकी विभाग के अध्यक्ष की देखरेख में लगाई जा रही है। चालीस डिस्मिल जमीन पर लगेगी वाटिका मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. अविलेश कुमार ने बताया कि कॉलेज के मुख्य भवन के पीछे, जहां एनिमल हाउस बनाया गया है, वहीं लगभग 40 डिस्मिल खाली जमीन है। इसी जमीन पर हर्बल वाटिका लगाने की योजना है। फार्माकोलॉजी विभाग के एचओडी डॉ. जीतेंद्र कुमार ने बताया कि हर्बल वाटिका में एलोवेरा, पुदीना, लेमनग्रास, लौंग, हरसिंगार, सप्तपर्णी, अजवाइन, अश्वगंधा, शतावर, तितराज, कपूर, शंखपुष्पी, शुगर क्योर, पत्थरचूर समेत 100 से अधिक औषधीय पौधे लगाए जाएंगे। यहां लगाया जाने वाला प्रत्येक पौधा किसी न किसी रोग के उपचार में उपयोगी साबित होगा। आयुर्वेद एवं एलोपैथी के संबंधों पर होगा शोध इस वाटिका को बनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य आयुर्वेद और एलोपैथी के संबंध को समझना है। डॉ. जीतेंद्र ने बताया कि यह वाटिका एमबीबीएस एवं फार्माकोलॉजी में पीजी कर रहे छात्रों के लिए बेहतर अनुभव लेकर आएगी। वाटिका की देखरेख की जिम्मेदारी फार्माकोलॉजी विभाग की होगी। फार्माकोलॉजी के छात्र यह अध्ययन करेंगे कि औषधीय पौधों से किस प्रकार की दवाएं बनाई जा सकती हैं। कई अंग्रेजी दवाएं भी औषधीय पौधों से बनती हैं। हृदय रोग के लिए दी जाने वाली दवा डिजिटलिस, फाक्सग्लोव नामक औषधीय पौधे की पत्तियों से बनती है। वहीं, यहां इस बात पर भी शोध होगा कि क्या औषधीय पौधों से कैंसर की दवा बनाई जा सकती है।

Cancer Warning: ये 4 गलत आदतें शरीर को अंदर ही अंदर कर रही हैं खोखला, अभी संभल जाइए

नई दिल्ली चिकित्सा विज्ञान में हुई अभूतपूर्व प्रगति के बावजूद 'कैंसर' आज भी दुनिया भर में मौत के प्रमुख कारणों में से एक बना हुआ है। जब शरीर की कोशिकाएं अनियंत्रित होकर स्वस्थ ऊतकों (Tissues) को नष्ट करने लगती हैं, तो यह घातक बीमारी जन्म लेती है। हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञ और भारत सरकार का आयुष मंत्रालय (Ministry of AYUSH) इस बात पर जोर देते हैं कि कैंसर कोई अपरिहार्य नियति नहीं है। सही जानकारी और अनुशासित जीवनशैली अपनाकर इस जानलेवा बीमारी के जोखिम को 40% तक कम किया जा सकता है। आयुष मंत्रालय के दिशा-निर्देश: रोकथाम ही सबसे बड़ा इलाज आयुष मंत्रालय के अनुसार, कैंसर से बचाव के लिए महंगे इलाज से बेहतर 'प्रिवेंटिव हेल्थकेयर' है। मंत्रालय ने कुछ बुनियादी आदतों को रेखांकित किया है जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर कैंसर कोशिकाओं को पनपने से रोक सकती हैं। कैंसर मुक्त जीवन के 5 मुख्य स्तंभ  1. तंबाकू का पूर्ण त्याग: कैंसर से बचाव का सबसे पहला और अनिवार्य कदम है नशा मुक्ति। सिगरेट, बीड़ी, गुटखा और खैनी जैसे उत्पाद न केवल मुंह और फेफड़ों, बल्कि पेट और किडनी के कैंसर का भी मुख्य कारक हैं। मंत्रालय के अनुसार, तंबाकू छोड़ना ही सुरक्षा की सबसे पहली ढाल है।   2. संतुलित वजन और मेटाबॉलिज्म: मोटापा केवल हृदय रोग ही नहीं, बल्कि स्तन, आंत और गर्भाशय के कैंसर का भी आमंत्रण है। शरीर में अत्यधिक वसा (Fat) हार्मोनल असंतुलन पैदा करती है, जो ट्यूमर के विकास में सहायक हो सकता है। 3. सक्रिय जीवनशैली (Physical Activity): नियमित व्यायाम शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करता है। रोजाना कम से कम 30-45 मिनट का योग, प्राणायाम या तेज पैदल चलना कैंसर के जोखिम को न्यूनतम स्तर पर ले आता है।   4. 'रेनबो डाइट' का महत्व: आयुष मंत्रालय पोषक तत्वों से भरपूर आहार की वकालत करता है। अपनी थाली में रंग-बिरंगे फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज और एंटीऑक्सीडेंट युक्त मसालों (जैसे हल्दी, अदरक) को शामिल करना चाहिए। प्रोसेस्ड मीट और अत्यधिक चीनी युक्त जंक फूड से दूरी बनाना अनिवार्य है।   5. समय पर स्क्रीनिंग और मेडिकल चेकअप: कैंसर की शुरुआती पहचान ही जीवन रक्षा की कुंजी है। मैमोग्राफी (स्तन कैंसर के लिए) और पैप स्मीयर (सर्वाइकल कैंसर के लिए) जैसे नियमित टेस्ट करवाने से बीमारी को प्रथम चरण में ही पकड़ा जा सकता है, जहाँ इलाज की सफलता दर 90% से अधिक होती है।  

युवा महिलाओं में बढ़ता कैंसर जोखिम: 30–40 की उम्र में खतरे की बड़ी वजहें

कैंसर को अक्सर बढ़ती उम्र की बीमारी माना जाता रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में डॉक्टरों ने एक चौंकाने वाला बदलाव देखा है। 40 साल से कम उम्र की महिलाओं में कैंसर के मामले धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं। हालांकि, बुजुर्गों की तुलना में इस आयु वर्ग में जोखिम अब भी कम है, लेकिन बदलता ट्रेंड चिंता का विषय है। ऐसे में इस बीमारी के खतरे को कम करने के लिए इसके पीछे के कारणों को समझना जरूरी है, ताकि समय पर पहचान करके बीमारी का बेहतर इलाज किया जा सके। डॉक्टरों के अनुसार, युवा महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के मामले ज्यादा सामने आ रहे हैं, जो अक्सर काफी अग्रेसिव होते हैं। इसके अलावा, 30 से 40 की उम्र के बीच महिलाओं में कोलोरेक्टल कैंसर के मामले भी बढ़ रहे हैं। अनियमित स्क्रीनिंग के कारण सर्वाइकल कैंसर के मामलों में भी कमी देखने को नहीं मिल रही। थायरॉइड और कुछ प्रकार के ब्लड कैंसर के मामले भी बढ़ रहे हैं। क्यों बढ़ रहा है यह खतरा? इस बढ़ते जोखिम के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे- मोटापा, शारीरिक गतिविधि में कमी, शराब पीना और अल्ट्रा प्रोसेस्ड डाइट। ये फैक्टर्स हार्मोनल बदलाव पैदा कर रहे हैं। इसके अलावा-     लाइफस्टाइल- देर से शादी और बच्चों के जन्म में देरी, कम प्रेग्नेंसी और ब्रेस्टफीडिंग की कम अवधि भी ब्रेस्ट कैंसर के पैटर्न को प्रभावित कर रही है।     पर्यावरण और तनाव- प्लास्टिक से लेकर कॉस्मेटिक्स तक में पाए जाने वाले एंडोक्राइन-डिस्ट्रप्टिंग केमिकल्स और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड शरीर में सूजन पैदा कर सकते हैं। सुस्त जीवनशैली, बढ़ता तनाव और नींद की कमी भी कैंसर का कारण बन रहा है।     जेनेटिक्स- युवा महिलाओं में कैंसर का एक हिस्सा BRCA जैसे जीन म्यूटेशन से जुड़ा होता है। अगर परिवार में कैंसर का इतिहास रहा है, तो खतरा बढ़ जाता है। देर से पहचान अक्सर युवा महिलाओं में कैंसर की पहचान देरी से होती है, क्योंकि लक्षणों को सामान्य मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। उम्र कम होने का मतलब यह नहीं है कि आपको खतरा नहीं है। ब्रेस्ट में गांठ, लगातार पेट से जुड़ी समस्याएं, बिना कारण वजन कम होना, असामान्य ब्लीडिंग या लंबे समय तक थकान को कभी भी हल्के में नहीं लेना चाहिए। बचाव और जागरूकता जल्दी जांच से इलाज के नतीजों में बड़ा अंतर आ सकता है। महिलाओं को अपने शरीर को समझना चाहिए और इन बातों का ध्यान रखना चाहिए-     नियमित जांच- 50 की उम्र से पहले ब्रेस्ट अल्ट्रासाउंड और 50 के बाद मैमोग्राफी मददगार होती है।     सेल्फ एग्जामिन- ब्रेस्ट सेल्फ-एग्जामिनेशन यानी से  खुद से जांच की आदत डालें।     पारिवारिक इतिहास- अगर परिवार में किसी को कैंसर रहा है, तो समय से पहले स्क्रीनिंग शुरू कर दें।  

स्टडी में दावा: शुगर के मरीजों की बॉडी में कैंसर सेल्स को मिलती है अतिरिक्त ऊर्जा

लखनऊ डायबिटीज में कैंसर कोशिकाओं को अनुकूल माहौल मिल जाता है। केजीएमयू के अध्ययन में देखा गया कि डायबिटीज और प्रोस्टेट कैंसर से एक साथ पीड़ित व्यक्तियों में इंसुलिन और आइजीएफ- 1 का स्तर सामान्य कैंसर रोगियों की तुलना में लगभग दोगुणा होता है। एचबीएसी का बढ़ा हुआ स्तर सीधे तौर पर कैंसर की गंभीरता से जुड़ा पाया गया। लिपिड प्रोफाइल (कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड) में गड़बड़ी भी कैंसर की आशंका बढ़ा देती है । 300 मरीजों पर अध्ययन शोध में शामिल 100 पुरुष बिनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया (बीपीएच) से, 100 केवल प्रोस्टेट कैंसर से और 100 डायबिटीज के साथ प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित थे। इन सभी के हार्मोनल और मेटाबोलिक प्रोफाइल से निष्कर्ष निकाला गया कि डायबिटीज, प्रोस्टेट कैंसर को अधिक आक्रामक बना देता है। कैंसर को बढ़ावा देने वाले तत्व की अधिकता शोधकर्ताओं ने पाया कि डायबिटीज में इंसुलिन, आइजीएफ – 1, एचबीए | सी और पीएसए का स्तर सामान्य पुरुषों से अत्यधिक ऊंचा रहता है। इंसुलिन और आइजीएफ-1 दोनों ही ऐसे हार्मोन हैं, जो कोशिका वृद्धि को उत्तेजित करते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि सभी मधुमेह रोगियों को प्रोस्टेट कैंसर नहीं होता, परंतु जोखिम सामान्य पुरुषों की तुलना में काफी अधिक रहता है। यह तभी कम हो सकता है, जब शुगर नियंत्रित रखी जाए, वजन सामान्य हो, भोजन संतुलित हो और जीवनशैली सक्रिय हो। प्रोस्टेट के समस्या लक्षण     बार-बार पेशाब लगना     रात में कई बार उठकर पेशाब जाना     पेशाब का फ्लो धीमा होना     पेशाब रुक-रुक कर आना     पेशाब में जलन     निचले पेट या पेल्विस में भारीपन कई बार प्रोस्टेट कैंसर शुरुआती अवस्था में बिल्कुल लक्षणहीन भी रहता है, इसलिए नियमित जांच सबसे महत्त्वपूर्ण है। कब कराएं प्रोस्टेट की जांच     सामान्य पुरुषों को 50 वर्ष के बाद     डायबिटिक वालों को 45 की उम्र के बाद     जिनके परिवार में इसका इतिहास है, उन्हें 40 वर्ष के बाद     पीएसए टेस्ट और डिजिटल रेक्टल एग्जाम (डीआरई) साल में एक बार जरूर कराना चाहिए। यदि शुगर अधिक समय से अनियंत्रित हो या मोटापा अधिक हो तो यह जांच 6-12 महीने में दोहरानी चाहिए। बचाव के आसान तरीके     रोज 30-45 मिनट तेज चाल से चलना     वजन (बीएमआई) के अनुसार रखना     मीठे, तले और प्रोसेस्ड फूड से बचना     फाइबर युक्त भोजन- सलाद, सब्जियां     नियमित ब्लड शुगर और पीएसए जांच विशेषज्ञों का कहना है कि इन उपायों से प्रोस्टेट कैंसर का खतरा कम होता है। सही जीनवशैली और समय पर जांच जरूरी हर डायबिटिक पुरुष को 50 वर्ष की उम्र के बाद प्रोस्टेट की नियमित जांच करानी चाहिए भले ही कोई लक्षण न हों। डायबिटीज के चलते होने वाली सूजन कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती है और डीएनए की मरम्मत प्रणाली को कमजोर करती है। ऐसे में कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने आसानी होती है। डायबिटीज और प्रोस्टेट कैंसर का मेल कैंसर को अधिक खतरनाक बना देता है। मोटे पुरुषों में एस्ट्रोजन बढ़ता है, टेस्टोस्टेरोन घटता है और इंसुलिन प्रतिरोध बढ़ जाता है । इस स्थिति को ही 'मेटाबोलिक सिंड्रोम' कहा जाता है। पेट की चर्बी, हाइ ब्लड प्रेशर, हाइ ट्राइग्लिसराइड, कम एचडीएल (अच्छा कोलेस्ट्राल) और हाइ ब्लड शुगर प्रोस्टेट कोशिकाओं के कैंसर में बदलने की आशंका बढ़ाते हैं। कुछ शोधों में पाया गया है कि मेटफार्मिन जैसी दवाएं कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि धीमा कर सकती है। हालांकि जीवनशैली पर नियंत्रण, वजन प्रबंधन और नियमित जांच सेहतमंद रहने के लिए जरूरी है।  

2026 से MP में कैंसर इलाज होगा आधुनिक: गामा नाइफ और पीईटी-सीटी स्कैन से सुविधा बढ़ेगी

भोपाल  मध्यप्रदेश में कैंसर मरीजों के लिए एम्स भोपाल में प्रदेश का पहला सेंट्रलाइज्ड कैंसर ब्लॉक विकसित किया जा रहा है, जिसे 2026 तक शुरू करने की तैयारी है। इस आधुनिक ब्लॉक में मरीजों को गामा नाइफ और पीईटी-सीटी स्कैन जैसी उन्नत सुविधाएं एक ही परिसर में उपलब्ध होंगी। वर्तमान में एम्स में जांच और उपचार के लिए मरीजों को लंबी वेटिंग का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें सिटी स्कैन और एमआरआई जैसी जांचों के लिए छह माह से एक वर्ष तक का इंतजार शामिल है। नई सुविधा का उद्देश्य मरीजों को सभी सेवाएं एक जगह उपलब्ध कराना है। प्रस्तावित कैंसर ब्लॉक में जांच से लेकर छह प्रकार के उपचार तक की व्यवस्थाएं होंगी, जिनमें कीमोथेरेपी, सर्जरी, टारगेट थेरेपी, रेडिएशन थेरेपी, मेंटल हेल्थ काउंसलिंग और स्टेम सेल ट्रीटमेंट शामिल हैं। वर्तमान में कैंसर मरीजों को जांच, सर्जरी और रेडिएशन के लिए अलग-अलग विभागों में जाना पड़ता है, जबकि नया ब्लॉक शुरू होने के बाद सभी विशेषज्ञ एक साथ मिलकर मरीज की स्थिति के अनुसार संयुक्त निर्णय लेंगे। जांच से लेकर 6 तरह के इलाज तक की सुविधा नए कैंसर ब्लॉक में मरीजों को जांच से लेकर ट्रीटमेंट तक की सभी सेवाएं एक ही स्थान पर मिलेंगी। इसमें कीमोथेरेपी, सर्जरी, टारगेट थेरेपी, रेडिएशन थेरेपी, मेंटल हेल्थ काउंसलिंग और स्टेम सेल ट्रीटमेंट की व्यवस्था होगी। एम्स प्रशासन का कहना है कि फिलहाल कैंसर मरीजों को अलग-अलग विभागों में भटकना पड़ता है। जांच एक जगह, सर्जरी दूसरी जगह और रेडिएशन तीसरी जगह होती है। लेकिन इस ब्लॉक के शुरू होने के बाद सभी विशेषज्ञ एक साथ मिलकर मरीज की स्थिति के अनुसार संयुक्त फैसले लेंगे। गंभीर मरीजों के लिए ‘प्रेफरेंस सिस्टम’ तैयार होगा एम्स के इस नए ब्लॉक में स्मार्ट स्क्रीनिंग सिस्टम तैयार किया जा रहा है। अस्पताल में आने वाले हर मरीज को पहले एक स्क्रीनिंग यूनिट से गुजरना होगा। यहां डॉक्टर उनकी जांच करेंगे और यह तय करेंगे कि मरीज को कैंसर है या नहीं। जिन मरीजों में कैंसर की पुष्टि होगी, उन्हें गंभीरता के आधार पर वर्गीकृत किया जाएगा। इससे जिन मरीजों की हालत गंभीर है, उन्हें कम वेटिंग में प्राथमिकता के आधार पर इलाज मिलेगा। वहीं, जिन मरीजों में सिर्फ कैंसर का संदेह होगा, उन्हें आवश्यक जांच के लिए अन्य संबंधित विभागों में भेजा जाएगा। एमपी के इन जिलों से सबसे ज्यादा मरीज एम्स भोपाल के आंकड़ों के अनुसार, हर साल 36 हजार से ज्यादा कैंसर मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। इनमें से करीब 60% मरीज भोपाल के बाहर के हैं। सबसे ज्यादा केस आगर मालवा (3664), रायसेन (1776), विदिशा (1536), नर्मदापुरम (1216), सागर (1072), रीवा (944) जैसे जिले टॉप पर हैं। हालांकि, इसका बड़ा कारण भोपाल से भौगोलिक नजदीकी है। यह भी सवाल उठता है कि इन जिलों के सिविल अस्पताल या मेडिकल कॉलेज में कैंसर इलाज की व्यवस्था मजबूत क्यों नहीं है?। निदेशक बोले- रिसर्च-क्लिनिकल ट्रायल पर भी फोकस एम्स भोपाल के कार्यकारी निदेशक डॉ. माधवानंद कर ने बताया कि यह कैंसर ब्लॉक प्रदेश में कैंसर ट्रीटमेंट की दिशा बदल देगा। कैंसर के हर मरीज को समग्र इलाज की जरूरत होती है। अभी मरीजों को अलग-अलग विभागों में भागदौड़ करनी पड़ती है। इस ब्लॉक के शुरू होने से सर्जरी, कीमो और रेडिएशन सब एक ही छत के नीचे संभव हो जाएगा। डॉ. माधवानंद ने यह भी कहा कि यहां रिसर्च और क्लिनिकल ट्रायल्स पर भी फोकस किया जाएगा, ताकि कैंसर के शुरुआती लक्षणों में ही सटीक इलाज शुरू किया जा सके। गंभीर मरीजों के लिए प्रेफरेंस सिस्टम भी तैयार किया जा रहा है। अस्पताल में आने वाले हर मरीज की पहले स्क्रीनिंग यूनिट में जांच होगी, जिसके बाद यह तय किया जाएगा कि वह कैंसर रोगी है या नहीं। जिनमें बीमारी की पुष्टि होगी, उन्हें गंभीरता के आधार पर वर्गीकृत कर प्राथमिकता से उपचार दिया जाएगा। वहीं जिन मरीजों में सिर्फ कैंसर का संदेह होगा, उन्हें संबंधित विभागों में आगे की जांच के लिए भेजा जाएगा।

कैंसर से जंग में असरदार साथी: गाजर का जूस

कैंसर जैसी घातक बीमारी से बचने के लिए इसका इलाज पहले चरण में ही कराना बेहतर होता है। लेकिन कैंसर के ज्यादातर मामलों में इसका खुलासा तब होता है, जब यह अपनी प्रारंभिक अवस्था से आगे बढ़ चुका होता है। ऐसे में कीमोथैरेपी के अलावा कैंसर को और कोई इलाज नहीं होता और यह अत्यधिक तकलीफदेह होता है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी, कि चैथी स्टेज पर आने के बाद भी कैंसर का इलाज संभव है, सिर्फ गाजर के सेवन से। ब्रिटेन की न्यू कैसल यूनिवर्सिटी में किए गए एक शोध के अनुसार, गाजर में पॉलीएसिटिलीन पाया जाता है, जो कैंसर कोशिकाओं को समाप्त कर ट्यूमर का विकास रोकने में सहायता करता है। इसके अलावा गाजर में कई तरह के विटामिन और मिनरल्स के अलावा बीटा कैरोटीन, अल्फा कैरोटीन, कैल्शियम एवं अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो आंतरिक अंगों को स्वस्थ रखने में सहायक होते हैं। शोध के मुताबिक गाजर में मौजूद फैलकारिनॉल, फैलकैरिन्डियॉल और एंटी कैंसर तत्व लंग कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर व कोलोन कैंसर के खतरे को कम करते हैं। इसमें पाया जाने वाला रेटिनॉइड एसिड महिलाओं में होने वाले स्तन कैंसर की कारक कोशिकाओं के शुरूआती बदलाव को रोकने में कारगर होता है। गाजर के सेवन से कैंसर की चैथी स्टेज पर जीत हासिल करने का भी एक उदाहरण सामने आया है। इंडिया टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित एक खबर के अनुसार, कैमरून नामक एक महिला ने गाजर के जूस का सेवन कर कैंसर को चैथे चरण में आने के बावजूद मात देने में कामयाबी हासिल की है। कैमरून बताती हैं, कि उन्हें सन 2013 में कोलोन कैंसर के बारे में पता चला, जो कि चैथे चरण पर पहुंच चुका था। कीमोथैरेपी के अलावा इसके लिए कोई और विकल्प भी नहीं था। कैमरून ने इंटरनेट पर रिसर्च कर, राल्प कोले नामक व्यक्ति का अनुभव पढ़ा, जिसे प्रतिदिन 2.25 किलो गाजर का जूस पीने से कैंसर में काफी लाभ हुआ था। इसके बाद कैमरून ने भी गाजर के जूस का सेवन शुरू किया। कैमरून ने लगतार आठ सप्ताह तक प्रतिदिन 2.25 किलो गाजर का जूस पीना शुरू किया। इस दौरान कैमरून ने पाया कि कैंसर ट्यूमर में होने वाली वृद्धि रूक गई है। लगभग 13 महीनों के बाद उनका कैंसर पूरी तरह से ठीक हो चुका था।  

डॉक्टर ने बताए कैंसर के 6 संकेत, जिन्हें अधिकतर लोग करते हैं अनदेखा

कैंसर एक ऐसी बीमारी है, जिसका नाम सुनते ही लोग सहम जाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं, अगर इसका पता शुरुआती स्टेज में ही चल जाए तो इसका इलाज काफी हद तक संभव है? समस्या यह है कि हममें से 80% लोग इसके शुरुआती संकेतों को सामान्य शारीरिक बदलाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे बीमारी गंभीर रूप ले लेती है। सीनियर ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. आंचल अग्रवाल के अनुसार, लोग अक्सर इन संकेतों को थकान, उम्र बढ़ने या किसी मामूली इन्फेक्शन का लक्षण मान लेते हैं। उनका कहना है, "यह लापरवाही ही अक्सर जानलेवा साबित होती है। अगर लोग इन संकेतों को पहचानकर समय पर डॉक्टर से मिलें, तो कई जानें बचाई जा सकती हैं।" आइए, जानते हैं उन 6 शुरुआती संकेतों के बारे में, जिन्हें कभी भी हल्के में नहीं लेना चाहिए। लगातार थकान जो आराम करने पर भी ठीक न हो अगर आपको बिना किसी कारण के लगातार थकान महसूस होती है और आराम करने के बाद भी इसमें सुधार नहीं होता, तो यह एक चेतावनी हो सकती है। यह थकान सामान्य थकान से अलग होती है और रोजमर्रा के काम करने में भी दिक्कत पैदा कर सकती है। शरीर के किसी भी हिस्से में लगातार दर्द शरीर के किसी भी हिस्से में बिना किसी चोट के अगर लगातार दर्द बना रहता है, तो इसे हल्के में न लें। यह दर्द हड्डियों, मांसपेशियों या पेट में हो सकता है। अगर यह दर्द लंबे समय तक रहता है, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें। त्वचा या तिल में बदलाव अपनी त्वचा पर नए तिल, गांठ, या किसी भी तरह के बदलाव पर ध्यान दें। अगर किसी पुराने तिल का आकार, रंग या रूप बदल रहा है, या उसमें से खून निकल रहा है, तो यह स्किन कैंसर का संकेत हो सकता है। बिना वजह वेट लॉस या भूख में कमी अगर बिना किसी डाइट या कोशिश के अचानक आपका वजन कम होने लगा है, तो यह चिंता का विषय है। इसके अलावा, भूख में कमी या खाने की इच्छा न होना भी एक गंभीर संकेत हो सकता है। शरीर में कहीं भी गांठ या सूजन अपने शरीर के अलग-अलग हिस्सों जैसे गर्दन, बगल या स्तनों में किसी भी तरह की गांठ या सूजन को महसूस करें। अगर आपको कोई नई गांठ महसूस होती है या कोई पुरानी गांठ बड़ी हो रही है, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। लंबे समय तक खांसी या आवाज में बदलाव अगर आपको लंबे समय से खांसी है जो किसी भी दवा से ठीक नहीं हो रही है, या आपकी आवाज में भारीपन या कर्कशता आ गई है, तो यह फेफड़ों या गले के कैंसर का संकेत हो सकता है। याद रखें, हमारा शरीर हमेशा हमें कुछ न कुछ बताने की कोशिश करता है। इन छोटे-मोटे संकेतों को नजरअंदाज न करें। समय पर पहचान और सही इलाज से कई जान बचाई जा सकती हैं। अगर आपको ऊपर दिए गए किसी भी संकेत का एहसास होता है, तो बिना देर किए डॉक्टर से संपर्क करें।  

महाराष्ट्र के हिंगोली में चिंता बढ़ाने वाला खुलासा, हजारों महिलाओं में दिखे कैंसर के संकेत,स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप

 हिंगोली  महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में 14,500 महिलाओं में कैंसर जैसे लक्षण पाए गए हैं। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री प्रकाश आबितकर ने गुरुवार को विधानसभा में यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार की संजीवनी स्कीम के तहत स्क्रीनिंग के दौरान इन महिलाओं के बारे में यह जानकारी मिली। प्रकाश आबितकर ने अपने एक लिखित जवाब में विधानसभा में बताया कि 8 मार्च को महिला दिवस से सर्वे की शुरुआत की गई थी। इसके तहत कुल 2,92,996 महिलाओं के बीच जाकर सर्वे किया गया। इस सर्वे के दौरान महिलाओं से कुछ सवाल पूछे गए, जिनके उन्होंने जवाब दिया। इन जवाबों के आधार पर ही यह पता चला है कि करीब 14,500 महिलाओं में कैंसर जैसे लक्षण हैं। उन्होंने कहा, 'कुल 14,542 महिलाओं में से तीन को गर्भाशय का कैंसर पाया गया है। इसके अलावा एक महिला को स्तन कैंसर है और 8 को माउथ कैंसर है। यह जानकारी जिला कलेक्टर की ओर से कैंसर को लेकर चलाए गए जागरूकता अभियान में सामने आई है। यह अभियान इसलिए चलाया गया है ताकि कैंसर की जानकारी शुरुआती स्टेज में ही पता चल सके और फिर उन लोगों का इलाज कराया जा सके।' हालांकि स्वास्थ्य मंत्री ने यह भी कहा कि महिलाओं के लिए अलग से किसी कैंसर अस्पताल के निर्माण का प्रस्ताव नहीं है। उन्होंने यह जरूर कहा कि ग्रामीण इलाकों में स्क्रीनिंग की व्यवस्था को मजबूत किया जाएगा ताकि पता चल सके कि महिलाओं में कैंसर की क्या स्थिति है। जिला अस्पतालों में भी इसकी जांच की सुविधा दी जा रही है। इसके लिए टाटा मेमोरियल अस्पताल से करार हुआ है। टाटा मेमोरियल अस्पताल की ओर से एक टीम महीने में दो बार अस्पतालों में जाएगी और वहां कैंप लगाकर जांच करेगी। यही नहीं निचले स्तर पर जांच के लिए कैंसर योद्धाओं को ट्रेनिंग भी टीम की ओर से दी जाएगी। उन्होंने कहा कि राज्य के 8 जिला अस्पतालों में डे-केयर कीमोथेरेपी सेंटर भी शुरू किए गए हैं। इसके अलावा ऐसे सेंटर्स को राज्य के अन्य जिलों में भी स्थापित करने की तैयारी है।