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दरवाज़ा बंद कर जज के सामने पिटाई, वकील की दलील सुन CJI भड़के

नई दिल्ली भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत के सामने वकील ने अपने साथ मारपीट का मुद्दा उठाया। वकील ने सीजेआई को बताया कि कोर्ट में दूसरे पक्ष के लोगों ने उनके साथ मारपीट की और ये सब एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज के सामने हुआ। इसपर सीजेआई ने नाराजगी जाहिर की। साथ ही कहा कि अदालत में इस तरह का गुंडाराज नहीं चलेगा। वकील ने सुप्रीम कोर्ट में कहा, 'मैं ADJ हरजीत सिंह पाल की अदालत तीस हजार कोर्ट में पेश हुआ था। मैं आरोपी की तरफ से कोर्ट में पेश हुआ था। शिकायतकर्ता और उसके कई गुंडों ने मुझपर हमला किया। पीटा भी। जज वहीं बैठे थे। कोर्ट के सभी सदस्य वहीं पर बैठे हुए थे।' उन्होंने आरोप लगाए हैं कि कोर्ट रूम का दरवाज बंद करके आरोपी के साथ उनके साथ मारपीट की गई थी। CJI ने शिकायत दाखिल करने कहा सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने वकील से शिकायत दर्ज कराने के लिए कहा है। उन्होंने कहा है कि इस संबंध में दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पास शिकायत दर्ज कराई जाए और इसमें उनका नाम भी शामिल किया जाए। CJI ने कहा, 'ये सब 7 फरवरी को हुआ? क्या आपने इसकी जानकारी दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को दी है? सीजे को लेटर लिखें और मुझे भी मार्क करें। इसपर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को संज्ञान लेने दीजिए और कार्रवाई प्रशासनिक पक्ष की तरफ से की जाएगी। इस तरह का गुंडा राज हमें स्वीकार्य नहीं है। इसका मतलब कानून का व्यर्थ होना है। ऐसा करें और मुझे बताएं।'

CJI की दो टूक: ऐसा हुआ तो सब पर केस बनेगा— सुप्रीम कोर्ट ने याचिका सुनने से किया इनकार

नई दिल्ली देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने गुरुवार को उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें यह घोषणा करने की मांग की गई थी कि घरेलू कामगारों या घरेलू सहायकों को न्यूनतम मजदूरी पाने का मौलिक अधिकार है पेन थोजिलालारगल संगम और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य के मामले की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन लागू करने जैसे नीतिगत फैसले राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और इस पर न्यायपालिका का हस्तक्षेप सीमित है। CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने आशंका जताई कि यदि घरेलू कामगारों के लिए अनिवार्य न्यूनतम वेतन तय किया गया, तो इसके उलटे परिणाम हो सकते हैं। CJI ने कहा, “अगर ऐसा हुआ तो हर घर मुकदमे में फंस जाएगा।” इसके आगे मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “न्यूनतम वेतन तय होते ही हर घर मुकदमेबाजी में फंस जाएगा। लोग घरेलू कामगार रखना ही बंद कर देंगे। ट्रेड यूनियनें हर घर को अदालत तक घसीटेंगी।” इसके साथ ही CJI ने उदाहरण देते हुए कहा कि कई उद्योगों में ट्रेड यूनियनों के हस्तक्षेप के बाद रोजगार के अवसर घटे हैं और घरेलू कामगारों के मामले में भी ऐसा ही हो सकता है। मौलिक अधिकार की दलील पर कोर्ट ने जताई चिंता हालांकि, सुनवाई के दौरान पीठ ने माना कि यह तर्क आकर्षक लगता है कि न्यूनतम वेतन के बिना घरेलू कामगारों के समानता, गैर-भेदभाव और निष्पक्ष रोजगार से जुड़े अधिकार (अनुच्छेद 14, 15, 16) प्रभावित होते हैं, लेकिन कोर्ट ने आगाह किया कि अति-सक्रिय ट्रेड यूनियनें इन कामगारों को और बदतर हालात में छोड़ सकते हैं। CJI ने कहा, “कृपया इसके परिणामों पर विचार करें। ट्रेड यूनियनें अंत में इन्हें छोड़ देंगी और इनके पास कहीं जाने की जगह नहीं बचेगी।” एजेंसियों के शोषण पर भी सवाल बार एंड बेंच के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू कामगारों को रोजगार देने वाली एजेंसियों की भूमिका पर भी चिंता जताई। मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट परिसर में भी पहले एजेंसियों के जरिए कामगार रखे गए थे। उन्होंने कहा, “हम एजेंसियों को 40,000 रुपये प्रति कर्मचारी देते थे, लेकिन उन गरीब लड़कियों को सिर्फ 19,000 रुपये मिलते थे। यही वजह है कि भरोसा टूटता है।” उन्होंने कहा कि कई आपराधिक घटनाएं भी तब सामने आती हैं, जब घरेलू कामगार एजेंसियों के माध्यम से रखे जाते हैं, न कि सीधे मानवीय संपर्क के आधार पर। याचिका पर अदालत का रुख अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता जिस तरह का आदेश चाहते हैं, उसके लिए कानून में संशोधन जरूरी होगा और ऐसा निर्देश देना न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। अपने आदेश में कोर्ट ने कहा, “जब तक विधायिका से कानून बनाने को नहीं कहा जाता, तब तक कोई प्रभावी आदेश पारित नहीं किया जा सकता। ऐसा निर्देश देना इस अदालत के लिए उचित नहीं है।” हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्यों को घरेलू कामगारों की स्थिति पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और शोषण रोकने के लिए उपयुक्त तंत्र विकसित किया जाना चाहिए। क्या थी याचिका याचिका में मांग की गई थी कि घरेलू कामगारों को न्यूनतम वेतन का मौलिक अधिकार घोषित किया जाए और उन्हें न्यूनतम वेतन अधिनियम या वेज कोड, 2019 से बाहर रखने को असंवैधानिक ठहराया जाए। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि सिंगापुर जैसे देशों में घरेलू कामगारों के लिए छुट्टी और अन्य अधिकार अनिवार्य हैं। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि यह कहना सही नहीं है कि घरेलू कामगारों के लिए कोई कल्याणकारी कानून नहीं हैं। उन्होंने असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायालय आर्थिक नीतियों के मामलों में बेहद सतर्क रहता है।

बौद्ध बनकर अल्पसंख्यक कोटा लेने की कोशिश, सुप्रीम कोर्ट नाराज़— CJI की तीखी टिप्पणी

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बौद्ध धर्म अपनाने वाले हिंदू अपर कास्ट युवक के अल्पसंख्यक आरक्षण की मांग करने पर कड़ी फटकार लगाई। सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने इसे नया तरीके का फ्रॉड करार दिया। अदालती सुनवाइयों को रिपोर्ट करने वाली वेबसाइट बार एंड बेंच के अनुसार, निखिल कुमार पूनिया ने याचिका दायर कर अल्पसंख्यक उम्मीदवार के आधार पर एडमिशन की मांग की। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने पूछा कि आप कौन से पूनिया हैं? आप किस अल्पसंख्यक समुदाय से हैं? सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, ''मैं आपसे सीधे-सीधे पूछता हूं, आप कौन से पूनिया हैं?'' इस पर निखिल के वकील ने जवाब दिया कि जाट पूनिया हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि तब कैसे अल्पसंख्यक हुए? सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि उसने (निखिल) बौद्ध धर्म अपना लिया है और यह उसका अधिकार है। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने फटकार लगाते हुए कहा कि वाओ, यह तो नया तरीके का फ्रॉड है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को सख्त आदेश दिया। उसने कहा कि राज्य उसे अल्पसंख्यक सर्टिफिकेट जारी करने के लिए गाइडलाइंस की जानकारी दे और बताए कि क्या ऊंची जाति के जनरल कैटेगरी के उम्मीदवार बौद्ध धर्म अपनाने के बाद अल्पसंख्यक सर्टिफिकेट हासिल कर सकते हैं। कोर्ट ने हरियाणा के चीफ सेक्रेटरी से जवाब मांगा है।

CJI का गुस्सा: पब्लिसिटी के लिए याचिकाएं दायर करने पर की कड़ी टिप्पणी

नई दिल्ली देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच आज (गुरुवार, 11 दिसंबर को) भी मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इस मामले में लगातार दायर हो रही याचिकाओं पर सीजेआई ने नाराजगी जताते हुए कहा कि ये सब पब्लिसिटी पाने के लिए किया जा रहा है। CJI सूर्यकांत ने कहा कि हमें सिर्फ SIR जैसे बड़े मामलों पर फोकस न रहकर बल्कि आम आदमी से जुड़े मुकदमों पर भी ध्यान देने की जरूरत है। इस दौरान उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा, “रेलवे एक्सीडेंट का मामला देख लीजिए… एक व्यक्ति की ट्रैक पर मौत हो गई… हमने कुछ मुआवजा दिया फिर भी वारिसों को कुछ नहीं मिला। मुआवजा न मिलने पर वे कहीं गायब हो गए। अब हमने उन्हें ढूँढ़ निकाला और फिर पक्का किया कि उन्हें पैसे मिलें.. सोचिए उस विधवा के चेहरे पर मुस्कान कैसी होगी?” सभी मामलों के लिए समय का बराबर बंटवारा चाहता हूँ इसी बीच, CJI सूर्यकांत ने कहा, "अब हर मामले में बार के सदस्यों को एक टाइमलाइन देनी होगी क्योंकि कुछ मामले जो ज़रूरी लगते हैं, वे कोर्ट का सारा समय ले लेते हैं और कई जरूरी खासकर MACT मामले में याचिकाकर्ताओं को समय नहीं मिल पाता है।" उन्होंने कहा, “मैं इस कोर्ट में सभी मामलों के लिए समय का बराबर बंटवारा चाहता हूँ, SIR जैसे जरूरी मामलों में पूरा दिन लग जाता है, जो पिटीशनर मुआवज़े के मामलों वगैरह के लिए आते हैं, वे आखिरी लाइन में बैठे रहते हैं और शाम 4 बजे बिना सुनवाई के घर वापस चले जाते हैं, वे नहीं जानते कि उनका नंबर कब आएगा?” लोग अब सिर्फ़ पब्लिसिटी के लिए आ रहे इसके बाद CJI सूर्यकांत ने कहा, "मैं रजिस्ट्री को इस मामले में (SIR केस में) कोई और नई याचिका स्वीकार न करने का निर्देश दे रहा हूँ। कई लोग अब सिर्फ़ पब्लिसिटी के लिए आ रहे हैं। अब किसी नए मामले की ज़रूरत नहीं है। मुझे ऐसा कहते अफसोस हो रहा है।" इसके बाद जस्टिस सूर्यकांत ने SIR के मुद्दे पर दायर अलग-अलग राज्यों के मामलों की अलग-अलग सुनवाई करने का फैसला करते हुए सभी राज्यों के लिए अलग-अलग तारीखें भी तय कर दीं। UP, केरल के मामले 18 दिसंबर को सुने जाएंगे CJI ने कहा कि तमिलनाडू का मामला 16 तारीख को सुना जाएगा। इस बीच सिब्बल बोले, पश्चिम बंगाल का मामला 17 तारीख तक के लिए टाल दिया गया है। CJI ने बिना उस पर ध्यान देते हुए आगे कहा कि बिहार के सभी मामले आज सुने जाएंगे, जबकि असम के मामले 16 को, WB के मामले भी 16 को और UP, केरल के मामले 18 दिसंबर को सुने जाएंगे।

2009 का एसिड अटैक… अब तक ट्रायल जारी! CJI ने दिखाई कड़ी नाराज़गी, अदालत में लगाई फटकार

नई दिल्ली  साल 2009 में महिला पर हुए एसिड अटैक मामले में गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई है। जब याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि 16 साल पहले 2009 में उस पर एसिड से हमला हुआ था और अब तक मामले का ट्रायल चल रहा है तो इस पर सीजेआई सूर्यकांत भड़क उठे और जमकर क्लास लगाई। उन्होंने कहा कि अगर राष्ट्रीय राजधानी ऐसे हालात को हैंडल नहीं कर सकती है तो फिर कौन संभालेगा? यह तो शर्म की बात है। सिस्टम का मजाक है।   सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सभी हाई कोर्ट से एसिड अटैक केस में पेंडिंग ट्रायल के बारे में डेटा मांगा। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने सभी हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को पेंडिंग एसिड अटैक केस के बारे में डेटा जमा करने का निर्देश दिया है। बार एंड बेंच के अनुसार, मामले की याचिकाकर्ता ने कोर्ट में कहा, ''मेरे ऊपर 2009 में एसिड अटैक हुआ था, अभी तक ट्रायल चल रहा है। 2013 तक केस में कुछ नहीं हुआ और ट्रायल, जो अब दिल्ली के रोहिणी में हो रहा है, अब आखिरी सुनवाई के स्टेज में है।'' सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, ''यह जुर्म 2009 का है और ट्रायल अब तक पूरा नहीं हुआ। अगर नेशनल कैपिटल ऐसी चुनौतियों को हैंडल नहीं कर पाएगी तो कौन करेगा? यह सिस्टम के लिए शर्म की बात है।'' याचिकाकर्ता ने बताया कि वह अपना केस लड़ने के साथ-साथ दूसरे एसिड अटैक सर्वाइवर्स की मदद के लिए भी काम कर रही हैं। सीजेआई ने याचिकाकर्ता से ट्रायल में तेजी लाने के लिए एक ऐप्लीकेशन फाइल करने के लिए कहा। साथ ही कहा कि इस मामले का ट्रायल रोज होना चाहिए। बेंच ने सभी हाई कोर्ट की रजिस्ट्री से चार हफ्ते के अंदर डिटेल मांगी। सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता ने उन पीड़ितों की बुरी हालत पर रोशनी डाली जिन्हें एसिड पीने के लिए मजबूर किया जाता है, अक्सर आर्टिफिशियल फीडिंग ट्यूब और गंभीर विकलांगता के सहारे जिंदा रहते हैं। बेंच ने उनकी इस अर्जी पर भी केंद्र से जवाब मांगा कि एसिड अटैक सर्वाइवर्स को दिव्यांगों की कैटेगरी में रखा जाए ताकि वेलफेयर स्कीम्स तक उनकी पहुंच पक्की हो सके।  

CJI गवई ने न्यायपालिका में बढ़ाई सामाजिक हिस्सेदारी, जानिए कितने OBC–SC जजों की हुई नियुक्ति

नई दिल्ली  प्रधान न्यायाधीश (CJI) के रूप में न्यायमूर्ति बीआर गवई के लगभग छह महीने के कार्यकाल के दौरान देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग के 10 न्यायाधीशों, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और पिछड़ा वर्ग के 11 जजों की नियुक्ति की गई। न्यायमूर्ति गवई देश के पहले बौद्ध और दूसरे दलित प्रधान न्यायाधीश हैं। उन्होंने उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम का नेतृत्व किया, जिसने विभिन्न उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के रूप में नियुक्ति के लिए सरकार को 129 नामों की सिफारिश की, जिनमें से 93 नामों को मंजूरी दी गई।   न्यायमूर्ति गवई के कार्यकाल के दौरान पांच न्यायाधीशों-न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया, न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई, न्यायमूर्ति एएस चंदुरकर, न्यायमूर्ति आलोक अराधे और न्यायमूर्ति विपुल मनुभाई पंचोली की भी शीर्ष अदालत में नियुक्ति हुई। उच्चतम न्यायालय की वेबसाइट पर 14 मई से लेकर अब तक अपलोड किए गए न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी विवरण के मुताबिक, जब न्यायमूर्ति गवई भारत के प्रधान न्यायाधीश बने, उसके बाद सरकार की ओर से उच्च न्यायालयों में नियुक्ति के लिए मंजूर किए गए 93 नामों में अल्पसंख्यक समुदायों के 13 न्यायाधीशों और 15 महिला न्यायाधीशों के नाम शामिल थे। विवरण के अनुसार, न्यायमूर्ति गवई के कार्यकाल में जिन न्यायाधीशों की नियुक्ति को मंजूरी दी गई, उनमें से पांच पूर्व या सेवारत न्यायाधीशों से संबंधित हैं, जबकि 49 न्यायाधीश बार से नियुक्त किए गए और बाकी सेवा संवर्ग से हैं। न्यायमूर्ति गवई रविवार (23 नवंबर) को पदमुक्त हो जाएंगे। उनके उत्तराधिकारी न्यायमूर्ति सूर्यकांत 24 नवंबर को भारत के अगले प्रधान न्यायाधीश के रूप में शपथ लेंगे। भारत के 52वें प्रधान न्यायाधीश गवई ने अपने छह महीने के कार्यकाल के दौरान कई महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं, जिनमें वक्फ कानून के प्रमुख प्रावधानों पर रोक लगाना, न्यायाधिकरण सुधार कानून को रद्द करना और केंद्र को परियोजनाओं को बाद में हरित मंजूरी देने की अनुमति देना शामिल है। शुक्रवार का दिन प्रधान न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति गवई का अंतिम कार्य दिवस था। वह न्यायमूर्ति केजी बालाकृष्णन के बाद भारतीय न्यायपालिका का नेतृत्व करने वाले दूसरे दलित न्यायाधीश थे। अपने अंतिम कार्य दिवस पर मिले सम्मान से अभिभूत न्यायमूर्ति गवई ने कहा कि वह एक वकील और न्यायाधीश के रूप में चार दशकों की यात्रा पूरी करने के बाद “पूर्ण संतुष्टि की भावना के साथ” तथा “न्याय के छात्र” के रूप में संस्थान छोड़ रहे हैं।

सिर्फ एक की नहीं जिम्मेदारी! CJI गवई ने विदाई से पहले दिया देश को खास संदेश

नई दिल्ली  देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस बीआर गवई ने आह्वान किया है कि लैंगिक समानता (Gender justice) की दिशा में हमारी यात्रा तभी सफल होगी, जब महिलाएँ और पुरुष दोनों मिलकर सहयोग करेंगे और किसी भी चुनौती को पार पाने में समान रूप से योगदान देंगे। इसके साथ ही CJI गवई ने इस बात पर भी जोर दिया कि लैंगिक न्याय हासिल करना सिर्फ महिलाओं की इकलौती जिम्मेदारी नहीं है। उन्होंने कहा कि इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए पुरुषों को यह स्वीकार करना होगा कि उनके पास मौजूद असमान शक्ति को साझा करना नुकसान की बात नहीं है, बल्कि समग्र रूप से समाज की मुक्ति की दिशा में एक कदम है।   CJI ने बुधवार को ये बातें 30वें जस्टिस सुनंदा भंडारे स्मृति व्याख्यान में "सभी के लिए न्याय: लैंगिक समानता और समावेशी भारत का निर्माण" विषय पर देते हुए कहीं। उन्होंने कहा, "लैंगिक न्याय प्राप्त करना सिर्फ महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं है। इसके लिए पुरुषों द्वारा, विशेष रूप से हमारे संस्थानों, कार्यस्थलों और राजनीतिक व्यवस्थाओं में सत्ता के पदों पर आसीन पुरुषों द्वारा, सत्ता की सक्रिय पुनर्कल्पना की जरूरत है।" उन्होंने कहा, “वास्तविक प्रगति तभी होगी जब पुरुष यह समझेंगे कि सत्ता साझा करना नुकसान नहीं, बल्कि समाज की मुक्ति का कार्य है। इसलिए, लैंगिक समानता वाले भारत का मार्ग टकराव में नहीं, बल्कि सहयोग में निहित है, जहाँ पुरुष और महिलाएँ मिलकर हमारे संविधान द्वारा परिकल्पित समानता के नैतिक और संस्थागत ढाँचे का पुनर्निर्माण करते हैं।” 75 वर्षों की प्रगति का भी किया उल्लेख बार एंड बेंच के मुताबिक, मुख्य न्यायाधीश गवई ने अपने व्याख्यान में 1950 में भारत के संविधान के लागू होने से लेकर 25-25 वर्षों के तीन चरणों में इस क्षेत्र में हुई प्रगति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा, "1975 के बाद, लैंगिक समानता पर राष्ट्रीय विमर्श औपचारिक अधिकारों के प्रश्नों से आगे बढ़कर, समानता के एक अभिन्न अंग के रूप में गरिमा के गहन विचार की ओर मुड़ने लगा। बातचीत केवल कानूनी समानता से आगे बढ़कर महिलाओं की स्वायत्तता, शारीरिक अखंडता और उनके जीवन के अनुभवों को आकार देने वाली सामाजिक वास्तविकताओं की मान्यता की ओर मुड़ गई।" मानव गरिमा की संरक्षक रहीं अदालतें: CJI उन्होंने कहा कि नागरिक समाज की सतर्कता, महिला आंदोलनों की दृढ़ता और आम नागरिकों के साहस ने मिलकर न्यायपालिका को समानता के संवैधानिक वादे के प्रति जवाबदेह बनाये रखा है। उन्होंने कहा कि मान्यता और समानता के लिए प्रारंभिक संघर्षों से लेकर अंतर्संबंधी और सहभागी न्याय के वर्तमान युग तक, अदालतें अक्सर समानता और मानव गरिमा के संरक्षक के रूप में खड़ी रही हैं। चुनौतियों से भरा रहा है इतिहास जस्टिस गवई ने कहा, ‘‘यह विकासक्रम चुनौतियों से रहित नहीं रहा है। ऐसे कई अवसर आए जब न्यायिक व्याख्याएं महिलाओं के वास्तविक जीवन के अनुभवों को सही तरह नहीं समझ सकीं या संविधान की परिवर्तनकारी भावना पर खरी नहीं उतरीं।” उन्होंने कहा कि नागरिक समाज की सतर्कता, महिला आंदोलनों की निरंतरता और साधारण नागरिकों के साहस ने मिलकर न्यायपालिका को समानता के संवैधानिक वादे के प्रति जवाबदेह बनाए रखा है। यात्रा अभी भी अधूरी इस कार्यक्रम में दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी के उपाध्याय और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस एम बी लोकुर भी शामिल हुए। प्रधान न्यायाधीश गवई ने कहा, ‘‘अदालतों और लोगों के बीच संवाद भारत की लोकतांत्रिक ताकत के सबसे महत्वपूर्ण स्रोतों में से एक है, जो हमें याद दिलाता है कि लैंगिक समानता की ओर बढ़ना कोई मंजिल नहीं है, बल्कि यह एक प्रतिबद्धता है जिसे लगातार नवीनीकृत किया जाता है।’’ हालांकि, उन्होंने कहा कि प्रगति के बावजूद, वास्तविक लैंगिक समानता की दिशा में यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है। बता दें कि जस्टिस गवई इसी महीने 23 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं।

भारत को मिलेगा नया मुख्य न्यायाधीश, जस्टिस सूर्यकांत संभालेंगे CJI का पद

नई दिल्ली केंद्र सरकार ने देश के अगले प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) के चुनने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। वर्तमान सीजेआई बीआर गवई 23 नवंबर को रिटायर होने वाले हैं। ऐसे में अगले सीजेआई को चुने जाने की प्रक्रिया महीनेभर पहले शुरू कर दी जाती है। सीजेआई गवई के बाद सुप्रीम कोर्ट के सबसे सीनियर जज जस्टिस सूर्यकांत अगले सीजेआई बनने जा रहे हैं। प्रक्रिया और नियम के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति, ट्रांसफर और प्रमोशन के नियम को निर्धारित करने वाले डॉक्युमेंट्स में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट में भारत के सीजेआई के पद पर नियुक्ति उस अदालत के सबसे वरिष्ठ जज की होनी चाहिए, जिन्हें पद धारण के लिए सबसे उपयुक्त समझा जाए। ऐसे में केंद्रीय कानून मंत्री वर्तमान सीजेआई से उनके उत्तराधिकारी के लिए उनकी सिफारिश मांगेंगे। हरियाणा के मिडिल क्लास में लिया जन्म हरियाणा के हिसार के एक मिडिल क्लास परिवार में 10 फरवरी, 1962 को जस्टिस सूर्यकांत का जन्म हुआ था। वह अभी सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई गवई के बाद सबसे सीनियर जज हैं। उन्होंने 1981 में गवर्नमेंट पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज, हिसार से ग्रेजुएशन किया। इसके बाद 1984 में रोहतक की महार्षि दयानंद यूनिवर्सिटी से लॉ की बैचलर डिग्री हासिल की। उन्होंने उसी साल 1984 में ही हिसार के जिला अदालत में प्रैक्टिस शुरू कर दी। बाद में 1985 में वे पंजाब एवं हरियाणा हाइ्र कोर्ट में प्रैक्टिस करने के लिए चंडीगढ़ शिफ्ट हो गए। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के भी चीफ जस्टिस रहे सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट के अनुसार, जस्टिस सूर्यकांत कॉन्स्टिट्यूशनल, सर्विस और सिविल मामलों में स्पेशलाइज्ड हैं। कई यूनिवर्सिटी, बोर्ड, कॉर्पोरेशन, बैंक और खुद हाई कोर्ट को भी रिप्रेजेंट किया है। सात जुलाई 2000 को हरियाणा के सबसे युवा एडवोकेट जनरल नियुक्त किए गए। मार्च 2001 में वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित किया गया। इसके बाद, 9 जनवरी 2004 को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के स्थायी न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत होने तक हरियाणा के एडवोकेट जनरल के पद पर रहे। 22 फरवरी 2011 तक लगातार दो कार्यकालों के लिए 23 फरवरी 2007 को राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण के शासी निकाय के सदस्य के रूप में चुना गया। पांच अक्टूबर, 2018 से हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस बने। इसके बाद, 24 मई, 2019 में सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में प्रमोट हुए। वे 9 फरवरी, 2027 को रिटायर होंगे।

सरकार ने शुरू की CJI की नियुक्ति प्रक्रिया, अगले चीफ जस्टिस बनने वाले चेहरे पर लगी नज़र

नई दिल्ली  सीजेआई बीआर गवई के बाद देश का अगला चीफ जस्टिस कौन होगा, इसकी प्रक्रिया केंद्र सरकार ने शुरू कर दी है। सीजेआई गवई 23 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं। इससे पहले तक नए सीजेआई के नाम का चयन हो जाना है। जस्टिस सूर्यकांत अगले सीजेआई के रेस में हैं और उनका बनना लगभग तय है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया से वाकिफ लोगों ने बताया कि जस्टिस गवई से उनके उत्तराधिकारी का नाम बताने वाला लेटर आज शाम या शुक्रवार को दिया जाएगा। मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर के अनुसार, जो सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट जजों की नियुक्ति, ट्रांसफर और पदोन्नति को गाइड करने वाले डॉक्यूमेंट्स का एक सेट है, उसमें कहा गया है कि भारत के चीफ जस्टिस के पद पर नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के सबसे सीनियर जज की होनी चाहिए, जिन्हें पद संभालने के लिए फिट माना जाए। केंद्रीय कानून मंत्री सही समय पर भारत के जाने चीफ जस्टिस से उनके अगले चीफ जस्टिस की नियुक्ति के लिए सिफारिश मांगेंगे। आमतौर पर, यह लेटर मौजूदा सीजेआई के 65 साल की उम्र में रिटायर होने से एक महीने पहले भेजा जाता है। जस्टिस सूर्यकांत सीजेआई गवई के बाद सबसे सीनियर जज हैं और अगले सीजेआई बनने की सबसे ज्यादा संभावना है। एक बार नियुक्त होने के बाद, जस्टिस सूर्यकांत 24 नवंबर को अगले सीजेआई बन जाएंगे और 9 फरवरी, 2027 तक लगभग 15 महीने तक इस पद पर रहेंगे।  

CJI के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में हुई जूता फेंकने की कोशिश, वकील गिरफ्तार

नई दिल्ली चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) बीआर गवई के सामने कोर्ट में आज एक वकील ने हंगामा करने की कोशिश की. आरोप है कि वकील ने CJI की तरफ जूता फेंकने का प्रयास भी किया. घटना के तुरंत बाद पुलिस ने आरोपी वकील को हिरासत में ले लिया. इस बीच, पूरे घटनाक्रम के दौरान जस्टिस गवई शांत बने रहे और कोर्ट में सुनवाई यथावत जारी रही. उन्होंने कहा कि इन चीजों से "मुझे फर्क नहीं पड़ता." बताया जा रहा है कि वकील डेस्क के पास गया और जूता निकालकर जज की तरफ फेंकने की कोशिश की लेकिन कोर्ट में मौजूद सुरक्षा कर्मियों ने समय रहते हस्तक्षेप किया और वकील को बाहर ले गए. बाहर जाते समय वकील यह कहते सुना गया, "सनातन का अपमान नहीं सहेंगे." CJI इस घटना से प्रभावित नहीं हुए और कोर्ट में मौजूद अन्य वकीलों से कहा कि अपने तर्क जारी रखें. उन्होंने कहा, “इस सब पर ध्यान मत दें. हम प्रभावित नहीं हैं. ये बातें मुझे प्रभावित नहीं करतीं." मामले की गंभीरता को देखते हुए तुरंत कार्रवाई की और कोर्ट परिसर में सुरक्षा बढ़ा दी गई है. सीजेआई पर क्यों की गई जूता फेंकने की कोशिश? घटना पर एक वकील ने प्रतिक्रिया दी और कहा कि आज की जो घटना है, वह बहुत ही दुखद है. एक कोर्ट में, वो भी वकील ने अगर असॉल्ट करने का प्रयास किया है, तो हम इसकी कड़ी निंदा करते हैं. देखिए, हमारे बार के वो मेंबर हैं. अभी हमने जांच किया और पता चला कि वो 2011 के मेंबर हैं." वकील ने कार्रवाई की मांग की वकील ने अपने बयान में कहा, "यह बहुत ही दुखद घटना है. इसलिए हम कह सकते हैं कि जो पता चला है, वह लॉर्ड विष्णु के मैटर्स में आया कमेंट था, हॉनरेबल CJI के उसी पर ही उन्होंने ऐसा प्रयास (वकील ने जूता फेंकने का प्रयास) किया है. यह बहुत ही दुखद घटना है. हम इसकी कड़ी निंदा करते हैं और अगर यह घटना सच है, तो एक्शन होना चाहिए."