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फर्जी मुकदमों में 29 लोगों को फंसाने वाला वकील दोषी, कोर्ट ने दी उम्रकैद और जुर्माना

लख्रनऊ लख्रनऊ में 29 लोगों के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट, रेप समेत अन्य धाराओं में फर्जी मुकदमे दर्ज कराकर उन्हें जेल भेजने और परेशान करने के मामले में आरोपी अधिवक्ता परमानंद गुप्ता को कोर्ट ने दोषी करार दिया है। अधिवक्ता परमानंद गुप्ता को अनुसूचित जाति/जनजाति निवारण अधिनियम के विशेष न्यायाधीश विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने उम्रकैद की सजा सुनाई है। इसके साथ ही 5.10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। परमानंद गुप्ता झूठे मुकदमे दर्ज कराने के लिए अपनी पत्नी के ब्यूटी पार्लर में काम करने वाली एक महिला का सहारा लेता था। वह महिला परमानंद के प्रभाव में आकर वही करती थी जैसा वह कहता था। दो भाइयों के खिलाफ विभूतिखंड थाने में दर्ज हुए दुष्कर्म के मुकदमे की विवेचना में एसीपी विभूतिखंड रहे राधा रमण सिंह और विशेष लोक अभियोजक अरविंद मिश्रा द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और मजबूत पैरवी के आधार पर अधिवक्ता को सजा हुई। विशेष लोक अभियोजक अरविंद मिश्रा ने बताया कि परमानंद गुप्ता का विभूतिखंड में रहने वाले अरविंद यादव और उनके भाई अवधेश यादव से विवाद चल रहा था। परमानंद ने पत्नी के ब्यूटी पार्लर में काम करने वाली पूजा रावत को पीड़िता दर्शा कर दोनों के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट और दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज कराया था। 18 जनवरी 2025 को मुकदमा दर्ज कर विवेचना करने का आदेश दिया गया। मामले की जांच तत्कालीन एसीपी राणा रमण सिंह को सौंपी गई। एसीपी की जांच में आरोप निराधार पाए गए। पता चला कि अधिवक्ता की पत्नी और दोनों आरोपियों के बीच प्रॉपर्टी का विवाद था। इस कारण फर्जी मुकदमा दर्ज कराया गया था। दुष्कर्म, मारपीट और धमकी व इलेक्ट्रानिक साक्ष्यों, फोन की काल डिटेल्स में कोई ऐसा साक्ष्य नहीं मिला जिससे दोनों आरोपी भाइयों पर आरोप सिद्ध हो सके। साक्ष्य कोर्ट में प्रस्तुत किए गए। इसी बीच पता चला कि 18 मुकदमे विभिन्न थानों में खुद परमानंद ने और 11 मुकदमे महिला के माध्यम से दर्ज कराए थे। वे सभी झूठे थे। अदालत ने तलब किया तो वादी ने ही खोल दी पोल इस प्रकरण का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जब अदालत द्वारा अधिवक्ता परमानंद गुप्ता एवं पूजा रावत को विचारण के लिए तलब किया गया तो पूजा ने 4 अगस्त 2025 को एक प्रार्थना पत्र देकर कहा कि वह रोजगार के सिलसिले में गोरखपुर से लखनऊ आई थी। उसे अधिवक्ता परमानंद गुप्ता एवं उसकी पत्नी संगीता गुप्ता ने अपने जाल में फंसा लिया है। अदालत को पूजा रावत ने यह भी बताया कि संगीता गुप्ता का ब्यूटी पार्लर का काम है, जिसमें वह सहायिका के रूप में काम करती थी तथा संगीता गुप्ता का अरविंद यादव आदि के परिवार से खसरा संख्या 351 के रूप में संपत्ति का विवाद चल रहा है तथा सिविल कोर्ट में मुकदमे भी चल रहे हैं। अर्जी में यह भी कहा गया कि परमानंद गुप्ता ने उसका अनुसूचित जाति होने के तथ्य का फायदा उठाते हुए अरविंद यादव आदि के परिवार के विरुद्ध रेप, छेड़छाड़ आदि के अनेकों मुकदमे अदालतों में दर्ज कराए हैं। पूजा रावत ने अदालत को यह भी बताया कि उसके साथ कथित घटना के समय कोई भी छेड़छाड़ अथवा दुराचार की घटना नहीं हुई बल्कि परमानंद गुप्ता जैसा बयान मजिस्ट्रेट के सामने देने के लिए कहते थे, वैसा ही बयान उसे देना पड़ता था। उसे माफ कर दिया जाए और वह अदालत को सही-सही बात बता रही है। परमानंद जैसे अपराधी प्रैक्टिस करने योग्य नहीं : कोर्ट अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट रूप से कहा है कि अधिवक्ता परमानंद गुप्ता जैसे अपराधी न्यायालय में प्रवेश और प्रैक्टिस करने योग्य नहीं हैं। न्यायपालिका की शुचिता बनी रहे, इस आशय से सूचना एवं निर्णय की प्रति बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश को पत्र के साथ भेजी जाए। इसके साथ ही कोर्ट ने पूजा रावत की अर्जी व उसके द्वारा दिए गए बयानों के आधार पर उससे सशर्त माफी दे दी। मौके पर पहुंची पुलिस को नहीं मिला कमरा एसीपी राधा रमण सिंह ने बताया कि दुष्कर्म का मुकदमा दो भाइयों के खिलाफ था, इस पर उन्हें आशंका हुई। पूजा के बयानों के बाद वह घटनास्थल पहुंचे, जहां उसने दुष्कर्म की बात कही थी। स्थलीय निरीक्षण में मौके पर कमरा ही नहीं मिला। वहां खाली प्लॉट था। पूजा और आरोपी भाइयों की काल डिटेल्स खंगाली गई तो दोनों की कभी फोन पर बात भी नहीं हुई थी। घटना के समय की लोकेशन एक नहीं मिली। मुकदमे के गवाहों में अधिवक्ता परमानंद की पत्नी का नाम था। घटनास्थल के आस-पास के गवाहों का वीडियो बयान लिया तो पता चला कि पूजा कभी उस मोहल्ले अथवा आस-पास के इलाके में रही ही नहीं।

AIIMS रायपुर और अन्य अस्पतालों की दयनीय स्थिति पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकार से सवाल

बिलासपुर  बिलासपुर हाई कोर्ट ने राजधानी रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) सहित प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में व्याप्त अव्यवस्था, लापरवाही और घटिया स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर नाराजगी जताते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच ने कहा कि प्रदेश की अधिकांश जनता निजी अस्पतालों में महंगा इलाज कराने में सक्षम नहीं। ये सभी सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर है। ऐसे में वहां की बदहाली बेहद चिंताजनक और गंभीर है। अदालत ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि स्वास्थ्य सचिव के शपथ पत्र के साथ विस्तृत जवाब पेश किया जाए। अस्पताल में लंबी कतारें लगी रहती हैं। जांच के बाद सर्जरी के लिए 4 महीने रुकना पड़ता है। एक्स-रे जैसी साधारण जांच के लिए भी 3 घंटे का इंतजार करना पड़ता है। कोर्ट ने इन अव्यवस्थाओं के लिए राज्य सरकार से जवाब मांगा है। कोर्ट ने कहा कि राज्य की अधिकांश आबादी निजी अस्पतालों में महंगा इलाज कराने में सक्षम नहीं है और उनकी स्वास्थ्य सेवाओं का मुख्य आधार सरकारी अस्पताल हैं। ऐसे में वहां की लापरवाही और अव्यवस्था बेहद गंभीर है। एम्स में रजिस्ट्रेशन के बाद 48 घंटे इंतजार दरअसल, रायपुर के एम्स में मरीजों को डॉक्टर से मिलने के लिए रजिस्ट्रेशन के बाद करीब 48 घंटे तक इंतजार करने जैसी अव्यवस्थाओं को लेकर मीडिया रिपोर्ट्स को हाईकोर्ट ने जनहित याचिका मानकर सुनवाई शुरू की है। खबरों के मुताबिक अस्पताल में लंबी कतारें लगी रहती हैं, जिससे मरीजों का समय और ऊर्जा दोनों बर्बाद हो रहे हैं। जांच के बाद सर्जरी के लिए चार-चार महीने की देरी हो रही है, जबकि एक्स-रे जैसी साधारण जांच के लिए भी तीन घंटे का इंतजार करना पड़ता है। स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल हाईकोर्ट ने कहा कि गर्भावस्था जांच किट के गलत परिणाम, घटिया गुणवत्ता की सर्जिकल सामग्री और दवाओं की आपूर्ति जैसे मामले सामने आए हैं। यहां तक कि कुछ जीवन रक्षक दवाएं लैब परीक्षण में फेल होने के बावजूद बाजार में बिक रही थीं। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि इस तरह की खबरें सही हैं तो यह राज्य के स्वास्थ्य विभाग और छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाता है। डॉक्टरों की लापरवाही पर हाईकोर्ट सख्त बिलासपुर जिले के एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का भी कोर्ट ने जिक्र किया, जहां रिकॉर्ड में 15 डॉक्टर दर्ज थे। लेकिन, सुबह 11 बजे तक वहां कोई भी डॉक्टर मौजूद नहीं था। 250 से अधिक मरीज सुबह से कतार में खड़े रहे, जबकि एक्स-रे यूनिट जैसी महत्वपूर्ण मशीनें एक साल से अधिक समय से बंद पड़ी थीं। रीएजेंट की सप्लाई नहीं होने से हमर लैब भी बंद पड़ी थी। इन गंभीर खामियों और लापरवाहियों को लेकर हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग के सचिव को व्यक्तिगत शपथपत्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। बता दें कि चीफ जस्टिस रमेश कुमार सिन्हा की डिवीजन बैंच ने सुनवाई की। अब इस मामले की अगली सुनवाई 12 अगस्त को होगी। डिवीजन बेंच ने यह टिप्पणी मीडिया में प्रकाशित रिपोर्ट पर स्वत: संज्ञान लेते हुए की। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, एम्स रायपुर में मरीजों को डॉक्टर से मिलने के लिए रजिस्ट्रेशन के बाद करीब 48 घंटे तक इंतजार करना पड़ रहा है। अस्पताल में लंबी कतारें लगी रहती हैं, जिससे मरीजों का समय, ऊर्जा और स्वास्थ्य तीनों प्रभावित हो रहा है। कोर्ट ने कहा कि यदि ये तथ्य सही हैं तो यह न केवल राज्य के स्वास्थ्य विभाग, बल्कि छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। इन अव्यवस्थाओं की ओर खींचा ध्यान- जांच के बाद सर्जरी के लिए चार-चार महीने तक की देरी हो रही है। साधारण एक्स-रे जांच के लिए भी मरीजों को तीन घंटे तक इंतजार करना पड़ रहा है। गर्भावस्था जांच किट के गलत परिणाम सामने आ रहे हैं। गुणवत्ताविहीन सर्जिकल सामग्री और दवाओं की सप्लाई हो रही है। कुछ जीवन रक्षक दवाएं लैब परीक्षण में फेल होने के बावजूद बाजार में बिक रही हैं। डॉक्टरों की अनुपस्थिति और बंद मशीनों पर सवाल- सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने बिलासपुर जिले के एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का भी उल्लेख किया, जहां 15 डॉक्टर पदस्थ हैं, लेकिन सुबह 11:15 बजे तक एक भी डॉक्टर मौजूद नहीं थे। इस दौरान 250 से अधिक मरीज सुबह से कतार में खड़े रहे। यहां अस्पताल की एक्स-रे यूनिट एक साल से अधिक समय से बंद थी। इसके अलावा रीएजेंट सप्लाई नहीं होने से हमर लैब भी लंबे समय से काम नहीं कर रहा था। अदालत ने इस पर नाराजगी जताते हुए कहा कि सरकारी अस्पतालों में इस तरह की लापरवाही अस्वीकार्य है और यह आम नागरिकों के मौलिक स्वास्थ्य अधिकारों का उल्लंघन है। कोर्ट की टिप्पणी, तुरंत उठाएं ठोस कदम- हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया कि शपथ पत्र के साथ विस्तृत जवाब दें और बताए कि एम्स रायपुर सहित सरकारी अस्पतालों में अव्यवस्था को दूर करने और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं की गई तो यह जनता के भरोसे को तोड़ देगा और स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर असर डालेगा।

MP हाईकोर्ट की टिप्पणी: महिला बनी आदर्श पत्नी, लंबे अलगाव के बावजूद निभाया कर्तव्य

भोपाल  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति बिनोद कुमार द्विवेदी की खंडपीठ एक पति की अपील सुन रही थी, जिसमें उसने निचली अदालत के तलाक से इनकार करने के आदेश को चुनौती दी थी. पति-पत्नी की शादी गांव पिपलाडा, इंदौर में हुई थी और 2002 में बेटे का जन्म हुआ था. पति का आरोप था कि पत्नी उसे पसंद नहीं करती, उस पर शराब पीने और अन्य महिलाओं से संबंध होने के आरोप लगाती, गर्भावस्था में खुश नहीं थी और बच्चे के जन्म के बाद मायके चली गई. पत्नी ने इन आरोपों को झूठा बताया और कहा कि पति का एक महिला सहकर्मी से प्रेम संबंध था, जबकि वह हमेशा वैवाहिक दायित्व निभाने के लिए तैयार रही. पति ने पत्नी पर लगाए गंभीर आरोप कोर्ट ने पाया कि पति के दूर रहने के बाद भी पत्नी ससुराल में सास-ससुर और देवर-ननद के साथ संयुक्त परिवार में रही. उसने कभी घर नहीं छोड़ा, न ही पति या उसके परिवार के खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज किया. उसने अपने विवाह के प्रतीक मंगलसूत्र और सिंदूर नहीं त्यागे और अपने कर्तव्यों को निभाती रही. पत्नी ने विपरीत परिस्थितियों में दिखाया धैर्य कोर्ट ने कहा कि यह पत्नी आदर्श भारतीय नारी के गुणों का प्रतीक है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य, मर्यादा और संस्कार बनाए रखती है. कोर्ट ने तलाक की याचिका खारिज करते हुए पति को अपने उपेक्षित और अनादरपूर्ण व्यवहार से लाभ लेने से रोका.

हाईकोर्ट में याचिका, एक से अधिक यौन अपराध मामले दर्ज कराने वाली महिलाओं का रिकॉर्ड बनाने की मांग

नई दिल्ली  दिल्ली हाई कोर्ट ने  राजधानी पुलिस और अन्य संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे यौन अपराधों की बार-बार शिकायत करने वालों का डेटाबेस बनाने की मांग करने वाली याचिका पर जल्द से जल्द निर्णय लें. मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और जस्टिस तुषार राव गेडेला की बेंच एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रही थी.  कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता पहले ही इस मांग को लेकर दिल्ली पुलिस और अन्य अधिकारियों को आवेदन दे चुका है. बेंच ने याचिका के मामले की मेरिट पर कोई टिप्पणी किए बिना याचिका को निपटा दिया. याचिकाकर्ता की मांग पर कोर्ट ने क्या कहा? याचिकाकर्ता की यह मांग थी कि कोर्ट संबंधित अधिकारियों को निर्देश दे कि वे ऐसे लोगों का डेटाबेस बनाएं जो यौन शोषण के मामलों में एक से अधिक बार शिकायत दर्ज कराते हैं. इस पर कोर्ट ने कहा कि यह फैसला लेना प्रशासन और पुलिस का कार्यक्षेत्र है और 'उन्हें बेहतर पता है कि पुलिसिंग कैसे करनी है.' कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, 'बगैर याचिका में उठाए गए मुद्दों की मेरिट पर कुछ कहे, याचिका को यह निर्देश देते हुए निपटाया जाता है कि संबंधित अधिकारी याचिकाकर्ता की मांग पर जल्द और उचित निर्णय लें.' याचिका में क्या मांग की गई थी? यह पीआईएल शोनी कपूर नामक व्यक्ति की ओर से दाखिल की गई थी, जिनकी ओर से वकील शशि रंजन कुमार सिंह ने पक्ष रखा. याचिका में केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि प्रत्येक पुलिस जिला मुख्यालय में ऐसे शिकायतकर्ताओं का रिकॉर्ड रखा जाए जिन्होंने बलात्कार या यौन अपराधों के आरोपों से जुड़ी एक से अधिक शिकायतें दर्ज कराई हैं. साथ ही, शिकायत दर्ज कराने वाले प्रत्येक व्यक्ति का पहचान पत्र (प्राथमिकता से आधार कार्ड) अनिवार्य रूप से लिया जाए. याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि बलात्कार कानूनों का दुरुपयोग कुछ शिकायतकर्ताओं की ओर से बड़े पैमाने पर किया जा रहा है.

MP में निलंबन पर हाई कोर्ट की सख्ती, विधायक के दबाव को माना अनुचित प्रभाव

 जबलपुर   हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने महिला विधायक के दबाव में किए गए सहकारी बैंक के सीईओ के निलंबन को अनुचित पाकर निरस्त कर दिया। इसी के साथ अविलंब बहाल करने के निर्देश दे दिए। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि याचिकाकर्ता का निलंबन आदेश शक्तियों का दुरुपयोग करके महिला विधायक के दबाव में पारित किया गया है। ट्रांसफर का मामला दरअसल, गांधीग्राम शाखा से सीधी शाखा ट्रांसफर किए गए एक क्लर्क के तबादले को रद कराने के लिए यह कवायद की गई। विधायक ने इस मामले में पक्षपातपूर्ण तरीके से अपने अधिकार क्षेत्र का दुरुपयोग किया है। याचिकाकर्ता सीधी निवासी राजेश रायकवार की ओर से पक्ष रखा गया। दलील दी गई कि जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक की गांधीग्राम शाखा के एक क्लर्क का सीधी तबादला किया था। याचिकाकर्ता पर लगाया यह आरोप इससे नाराज होकर महिला विधायक (याचिका में रीति पाठक का नाम न होने की वजह से हाई कोर्ट ने यही शब्द इस्तेमाल किया) ने पांच जून, 2025 को फोन पर पहले याचिकाकर्ता को डांटा व धमकाया। इसके बाद याचिकाकर्ता पर आरोप लगाया गया कि उसने विधायक, प्रभारी मंत्री प्रदीप जायसवाल व सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग के विरुद्ध अभद्र भाषा का इस्तेमाल करके अपशब्द कहे हैं। फिर विधायक के साथ दो और विधायकों ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर जिले के प्रभारी मंत्री के जरिए 10 जून, 2025 को याचिकाकर्ता को निलंबित करा दिया। 

हूटर और फैंसी नंबर प्लेट पर रोक, हटाने के लिए MP हाईकोर्ट ने दी 7 दिन की मोहलत

इंदौर  निजी वाहनों पर लगे हूटर और गलत तरीके से लगी नंबर प्लेट सात दिनों में हटवाएं। हाईकोर्ट(MP High Court) की इंदौर खंडपीठ ने इंदौर पुलिस को ये अंतरिम आदेश जारी किया है। जस्टिस विवेक रुसिया और जस्टिस बिनोद कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार, डीजीपी, इंदौर पुलिस कमिश्नर, डिप्टी पुलिस कमिश्नर (ट्रैफिक) समेत आरटीओ को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है। पत्रिका ने उठाया मुद्दा, अब रंग लाया पत्रिका ने प्रदेशभर में हूटर का रौब दिखाने वाले नेता, जनप्रतिनिधि और दबंगों का रसूख उजागर किया था। इस पर पुलिस हरकत में भी आई। कई जगहों पर कार्रवाई हुई। अब हाईकोर्ट ने सख्त आदेश दिए। सीएम हेल्पलाइन पर नहीं की कार्रवाई हूटर को लेकर छह माह पहले एक अन्य वकील उज्ज्वल फणसे ने भी मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर शिकायत की थी। गलत तरीके से गाड़ियाें पर लगे हूटर हटवाने की मांग की। छह माह में शिकायत टॉप लेवल पर पहुंची पर हर बार अफसर कार्रवाई करने की बात कह शिकायत खत्म करवाने के लिए कहते रहे। अदालत में कई गाड़ियों के फोटो भी पेश अभिभाषक मनीष यादव ने बताया, सरकार ने निजी गाड़ियों पर हूटर, बत्ती लगाने पर प्रतिबंध लगाया है, लेकिन कई निजी गाड़ियां पर ये लगे हैं। नंबर प्लेट भी नियमों के खिलाफ लगी है। इसके खिलाफ पूर्व पार्षद महेश गर्ग ने जनहित याचिका दायर की थी। इस पर गुरुवार को हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान कोर्ट में ऐसी कई गाड़ियों के फोटो भी पेश किए गए, जिन्हें पात्रता नहीं थी, पर हूटर लगे थे। साथ ही बताया कि ये गाड़ियां पूरे शहर में घूम रही हैं, पर पुलिस कार्रवाई नहीं करती। इस पर कोर्ट ने अंतरिम आदेश जारी किया। कोर्ट ने ७ दिन में सभी गाड़ियों से हूटर हटवाने को कहा है। गलत नंबर प्लेट्स, गाड़ियाें पर लगने वाली फ्लैश लाइट्स के साथ ही नियम विरुद्ध लगी सभी एसेसरीज हटवाने के भी आदेश दिए। इसकी पालन प्रतिवेदन रिपोर्ट भी तलब की। हूटर बजाना गलत है, क्या हूटर लगाना भी गलत है.. कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा कि गाड़ियों से हूटर बजाना तो गलत है, क्या ये लगाना भी गलत है? इस पर अभिभाषक यादव ने बताया कि मोटर व्हीकल एक्ट में हूटर, फ्लैश लाइट्स, नंबर प्लेट्स आदि के लिए नियम तय हैं। उन्होंने नियमों का उल्लेख भी किया।

पति की संपत्ति पर तलाक के बाद नहीं रहेगा हक़: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का साफ़ आदेश

बिलासपुर  छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि विवाह विच्छेद (तलाक) के बाद पत्नी का पति की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं रह जाता। अदालत ने कहा कि तलाक की डिक्री मिलने के बाद पत्नी का वैवाहिक दर्जा खत्म हो जाता है और वह पति की संपत्ति पर उत्तराधिकार या स्वामित्व का दावा नहीं कर सकती। हाई कोर्ट ने रायगढ़ सिविल कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए पत्नी की अपील खारिज कर दी। जिंदल स्टील स्टाफ से प्रेम विवाह, 2010 से रहने लगे अलग रायगढ़ निवासी युवक, जो जिंदल स्टील में कार्यरत था। उसने 11 मई 2007 को जिंदल स्टील प्लांट के स्टाफ से प्रेम विवाह किया था। कुछ वर्षों बाद पत्नी के चरित्र पर सवाल उठाते हुए दोनों के बीच विवाद शुरू हो गया और वे वर्ष 2010 से अलग-अलग रहने लगे। पति ने वर्ष 2013 में रायगढ़ के पारिवारिक न्यायालय में तलाक के लिए आवेदन दायर किया। फैमिली कोर्ट ने मार्च 2014 को पति के पक्ष में तलाक की डिक्री जारी कर दी। आदेश के अनुसार, पति-पत्नी का वैवाहिक संबंध 31 मार्च 2014 से समाप्त हो गया। संपत्ति पर अधिकार के लिए दाखिल किया सिविल वाद, सिविल कोर्ट ने किया खारिज तलाक के बावजूद पत्नी ने पति की संपत्ति पर अधिकार जताते हुए रायगढ़ सिविल कोर्ट में सिविल वाद दायर किया। लेकिन सिविल कोर्ट ने यह कहते हुए वाद खारिज कर दिया कि तलाक के आदेश के बाद पत्नी का पति की संपत्ति पर कोई वैध अधिकार नहीं बनता है। पति ने मकान खरीदा, पत्नी ने कर लिया कब्जा पति ने रायगढ़ में एक मकान खरीदा था, जिसे किराए पर दिया गया था। तलाक के बाद पत्नी अपने 8-10 साथियों के साथ जबरन उस मकान में घुस गई और अवैध रूप से कब्जा कर वहीं रहने लगी। इस घटना के बाद पति ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने पत्नी सहित अन्य आरोपितों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 452 व 448/34 के तहत प्रकरण दर्ज किया है। पत्नी का उत्तराधिकार हो जाता है समाप्त: हाई कोर्ट सिविल कोर्ट के आदेश के खिलाफ महिला ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में अपील दायर की। हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि विवाह विच्छेद की तारीख (31 मार्च 2014) से दोनों के वैवाहिक संबंध समाप्त हो चुके हैं। इसलिए पत्नी के पास पति की संपत्ति पर कोई भी वैधानिक अधिकार नहीं बचता। अदालत ने कहा कि तलाक की डिक्री के बाद पत्नी का दर्जा समाप्त हो जाता है, इसलिए उत्तराधिकार का अधिकार भी स्वतः समाप्त हो जाता है। अदालत ने सिविल कोर्ट रायगढ़ के आदेश की पुष्टि करते हुए पत्नी की अपील को खारिज कर दिया है।

मंदिर में इस्लाम प्रचार पर दर्ज FIR रद्द, हाईकोर्ट ने कहा– यह अपराध नहीं, मुस्लिम युवकों को राहत

बेंगलुरु कर्नाटक हाई कोर्ट ने वैसे तीन मुस्लिम व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया है, जिन पर एक हिंदू मंदिर में इस्लाम की शिक्षा को बढ़ावा देने वाले पर्चे बांटने और मौखिक रूप से अपनी धार्मिक मान्यताओं को समझाने का आरोप लगाया गया था। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि किसी मंदिर में सिर्फ इस्लाम का प्रचार करने वाला पर्चा बांटने और उसके बारे में व्याख्या करने से कोई अपराध नहीं हो जाता, जब तक कि धर्मांतरण से जुड़ा कोई साक्ष्य न मिलता हो। आरोपियों पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 299, 351(2) और 3(5) और कर्नाटक धर्म स्वतंत्रता अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2022 की धारा 5 के तहत आरोप लगाए गए थे। जस्टिस वेंकटेश नाइक टी की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि आरोपियों ने उपरोक्त कानूनों के तहत कोई अपराध नहीं किया है, क्योंकि उन लोगों ने किसी भी व्यक्ति को इस्लाम में धर्मांतरित करने का कोई प्रयास नहीं किया। हिन्दू धर्म पर अपमानजनक टिप्पणी के भी आरोप लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि चार मई 2025 को शाम 4:30 बजे, जब वह जामखंडी स्थित रामतीर्थ मंदिर गया था, तो कुछ लोग वहां मंदिर परिसर में इस्लामिक शिक्षा का प्रचार करने वाले पर्चे बाँट रहे थे और अपनी धार्मिक मान्यताओं के बारे में लोगों को मौखिक रूप से समझा रहे थे। शिकायत में बताया गया है कि घटनास्थल पर मौजूद हिन्दू श्रद्धालुओं ने उन लोगों से उनकी गतिविधियों के बारे में पूछताछ की थी, तो इसके जवाब में, मुस्लिम युवकों ने कथित तौर पर हिंदू धर्म की आलोचना करते हुए अपमानजनक टिप्पणियाँ की थीं। नौकरी और गाड़ी का दिया था प्रलोभन शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया था कि आरोपी मंदिर में मौजूद लोगों को इस्लाम धर्म अपनाने के एवज में गाड़ी देने और दुबई में नौकरी दिलाने का प्रलोभन दे रहे थे। दूसरी तरफ, अपने खिलाफ दर्ज अपराध को रद्द करने की मांग करते हुए, याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि वे केवल अल्लाह या पैगंबर मुहम्मद की शिक्षाओं का प्रचार कर रहे थे। धर्मांतरण के साक्ष्य नहीं याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत से कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा किसी व्यक्ति को एक धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तित करने का प्रयास करने के आरोप केपीआरएफआर अधिनियम की धारा 5 के तहत दंडनीय अपराध के आवश्यक तत्वों को पूरा नहीं करते हैं क्योंकि ऐसे कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं, जिससे साबित हो कि वे सभी धर्मांतरण कराने की कोशिश कर रहे थे।

होटल ले जाने के मामले में टीचर को मिली जमानत, कोर्ट ने सहमति का किया उल्लेख

मुंबई  नाबालिग छात्र के यौन उत्पीड़न के आरोप में गिरफ्तार हुईं मुंबई की एक शिक्षिका को जमानत मिल गई है। मुंबई की एक कोर्ट ने सबूतों के आधार पर कहा कि दोनों के बीच सहमति से संबंध बने थे। टीचर पर आरोप थे कि उसने कई मौकों पर फाइव स्टार होटल ले जाकर नाबालिग छात्र का यौन शोषण किया है। अदालत ने जमानत देते समय आरोपी शिक्षिका पर पीड़ित से किसी तरह का संबंध नहीं साधने की शर्तें लगाई हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, स्पेशल पॉक्सो कोर्ट ने आदेश में कहा है कि सबूत दिखाते हैं दोनों के बीच सहमति से संबंध थे। स्पेशल जज सबीना मलिक ने कहा, 'आरोपी ने स्कूल से इस्तीफा दे दिया था, तो छात्र और शिक्षिका के बीच संबंध की बात नहीं है। ऐसे में प्रभाव उतना नहीं है।' जज ने कहा कि ट्रायल पूरा होने में समय लगेगा और आरोपी को तब तक हिरासत में रखने से कुछ नहीं मिलेगा। इधर, पीड़ित ने जमानत याचिका का विरोध किया है। पक्ष का कहना है कि अगर महिला को जमानत मिलती है, तो वह एक बार फिर छात्र को डराने धमकाने के रास्ते खोज लेगी। साथ ही कहा गया है कि वह सबूतों के साथ भी छेड़छाड़ कर सकती है। इसपर जज ने कहा कि जरूरी शर्तें लगाई जा सकती हैं, जिनके जरिए ऐसी आशंकाओं को दूर किया जा सकेगा। जज ने कहा कि आरोपी किसी भी तरह से पीड़ित से संपर्क नहीं करेगी। किसी भी गवाह या पीड़ित को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उकसाने, डराने या किसी चीज का वादा करने की रोक लगाई जाती है। जज ने यह भी साफ किया है कि इन शर्तों का उल्लंघन करने से जमानत तुरंत रद्द हो जाएगी। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, आरोपी की तरफ से दिए गए आवेदन में महिला ने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया है। साथ ही उसका कहना है कि यह मामला झूठा और लड़के की मां के कहने पर किया गया है, क्योंकि वह उनके रिश्ते के खिलाफ थीं। महिला ने याचिका में लड़के से बातचीत के सबूत पेश किए और कहा है कि उसके पैरेंट्स को रिश्ते के बारे में पता था। वह इसके खिलाफ थे। क्या था केस पुलिस का दावा है कि शिक्षा नाबालिग छात्र के प्रति दिसंबर 2023 में आकर्षित हुई थी। उसने कथित तौर पर जनवरी 2024 में पहली बार यौन संबंधों की पेशकश की। FIR में कहा गया है कि शिक्षिका नाबालिग छात्र को बड़े होटलों में ले जाती थी, जहां कथित तौर पर उसका यौन शोषण किया जाता था। खबरें हैं कि टीचर ने कई बार शोषण करने से पहले छात्र को नशीला पदार्थ दिया।

कोर्ट ने जताई चिंता: ट्रैफिक नियम तोड़ते हैं डिलीवरी कर्मचारी, पुलिस नहीं करती वैरिफिकेशन

इंदौर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कई बिंदुओं पर बात की। ऑनलाइन खाने-पीने का सामान सप्लाय करने वालों को लेकर कहा कि सबसे ज्यादा रेड सिग्नल जंप डिलीवरी वाले ही करते हैं। दो मिनट बचाने रेड लाइट जंप करते हैं और कुछ नहीं होता। ये हमारे घरों तक पहुंच रखते हैं, लेकिन इनके पुलिस सत्यापन की व्यवस्था नहीं है। कभी इनका आपराधिक रिकॉर्ड नहीं जांचा। इस बारे में नीति बनानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि ग्रीन बेल्ट, उद्यान और फुटपाथ पर धड़ल्ले से धार्मिक स्थल बन रहे हैं, लेकिन इस तरफ किसी का ध्यान नहीं है। ये धार्मिक स्थल यातायात को बाधित कर रहे हैं। यह किसी एक क्षेत्र की नहीं बल्कि पूरे शहर की समस्या है। इसका स्थायी समाधान जरूरी है। करोड़ों रुपये मूल्य की जमीन पर धार्मिक गतिविधियों के नाम पर कब्जा हो रहा है। हालत यह हो जाती है कि 80 फीट चौड़ी सड़क पर भी चलना मुश्किल है। ई-रिक्शा को लेकर कोई योजना नहीं कोर्ट ने ई-रिक्शा की व्यवस्था को लेकर भी नाराजगी जताई। कहा कि इस बारे में सख्ती से कार्रवाई जरूरी है। पुलिस ई-रिक्शा चालकों के पुलिस सत्यापन, ट्रेनिंग इत्यादि की व्यवस्था करे। ई-रिक्शा के चालकों की कोई सूची नहीं है। कभी उनका आपराधिक रिकार्ड नहीं जांचा जाता। इस संबंध में कार्रवाई सुनिश्चित करना चाहिए। यह कहा याचिकाकर्ता ने याचिकाकर्ता राजलक्ष्मी फाउंडेशन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागडिया ने पैरवी की। उन्होंने कोर्ट के समक्ष कहा कि     चौराहों पर लगे सिग्नल 24 घंटे चालू रखे जाएं।     पुलिसकर्मी चौराहों पर यातायात नियंत्रित करने के बजाय मोबाइल चलाते हैं। सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।     वीआईपी मूवमेंट के दौरान सिग्नल ग्रीन रखे जाएं।     सड़कों पर गड्ढों की समस्या का स्थायी समाधान हो। कोर्ट ने कहा कि     जो रेड लाइट जंप करते हैं, उन्हें वहीं दो घंटे रोकें।     जिस चौराहे पर चालान बन रहे हैं, वहां तैनात पुलिसकर्मियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।     बीमा रिन्यू करने वाली कंपनी पहले बकाया चालान जमा कराए। इसके बाद बीमा रिन्यू किया जाए।     कार पुलिंग को बढ़ावा दें। शुरुआत हाई कोर्ट से हो सकती है। एक ऑफिस से जुड़े वकील एक कार से कोर्ट आएं तो सड़क पर वाहन संख्या कम करने में मदद होगी।     आईटीएमएस साफ्टवेयर के माध्यम से निगरानी और कानूनी कार्रवाई के लिए सैकड़ों स्थानों पर हाईडेफिनिशन कैमरे लगाए गए हैं।     पिछले दो वर्ष में यातायात पुलिस द्वारा 12 लाख से अधिक ई-चालान किए गए हैं।     यातायात नियमन के तीनों घटकों – यातायात इंजीनियरिंग, प्रवर्तन और शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।     सरकार ने राहवीर योजना शुरू की है। इसके तहत दुर्घटना पीड़ित को अस्पताल पहुंचाने में मदद करने वाले व्यक्ति को उचित पुरस्कार दिया जाता है।     किसी भी समय समस्या पर प्रतिक्रिया देने और उसका समाधान करने के लिए 40 से अधिक त्वरित प्रतिक्रिया दल (क्यूआरटी) बनाए गए हैं।