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पेड़ों की कटाई और ऑक्सीजन की जिम्मेदारी: जबलपुर हाईकोर्ट ने सरकारी खजाने में मुआवजे का मुद्दा उठाया

जबलपुर   मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एनजीटी कमेटी की अनुमति बिना प्रदेश में एक भी पेड़ नहीं काटने के आदेश को बरकरार रखा है. हाईकोर्ट ने दिनों पेड़ों की कटाई को लेकर सख्त है और कई मामलों में स्वत: संज्ञान लेकर सुनवाई कर रह है. इसी बीच स्ट्रैटटेक मिनरल रिसोर्सेज की एक याचिका पर सुनवाई हुई जिसमें धिरौली कोल ब्लॉक के लिए 6 लाख पेड़ों की कटाई किए जाने का प्रस्ताव है. इस कोल ब्लॉक के लिए अबतक 20 हजार पेड़ काटे जा चुके हैं. 6 लाख पेड़ काटे जाने का प्रस्ताव स्ट्रैटटेक मिनरल रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड के धिरौली कोल ब्लॉक मामले में कंपनी की ओर से ये याचिका दायर की गई कि पेड़ कटाई के संबंध में किसी प्रकार का हस्तक्षेप न हो. याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया कि इस प्रोजेक्ट के तहत करीब 20 हजार पेड़ काटे गए हैं, वहीं 6 लाख पेड़ काटने का प्रस्ताव है. कंपनी की ओर से एक आवेदन पेश कर दलील दी गई कि ये कोल ब्लॉक वन क्षेत्र में आता है और ऐसे में कंपनी के उस प्रोजेक्ट में हस्तक्षेप नहीं किया जाए. चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने कहा कि जब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) द्वारा गठित एक्सपर्ट कमेटी और ट्री ऑफिसर की अनुमति के आधार पर ही पेड़ों की कटाई की अनुमति दी गई है, तो इस व्यवस्था को बदला नहीं जा सकता। यदि किसी पक्षकार को इससे आपत्ति या परेशानी है, तो वह एनजीटी के समक्ष अपनी बात रखे। कोर्ट ने अगली सुनवाई 14 जनवरी को तय करते हुए राज्य सरकार से विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। सिंगरौली में 6 लाख पेड़ों की कटाई का मुद्दा भी उठा बुधवार की सुनवाई में सिंगरौली के घिरौली कोल ब्लॉक में करीब 6 लाख पेड़ों की कटाई का मामला भी उठाया गया। यह याचिका बैढन जनपद पंचायत की अध्यक्ष सविता सिंह द्वारा दायर की गई है। कंपनी की ओर से कहा गया कि प्रस्तावित कटाई के बदले हर पेड़ का मुआवजा दिया जाएगा। इस पर चीफ जस्टिस की बेंच ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि मुआवजे की राशि सरकार के खजाने में जाएगी, लेकिन उन पेड़ों के कटने से लोगों को मिलने वाली ऑक्सीजन का जिम्मेदार कौन होगा—यह बड़ा सवाल है। सरकार के ट्रांसलोकेशन दावे पर सवाल सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से कहा गया कि काटे गए पेड़ों को भोपाल के चंदनपुरा क्षेत्र में 9.71 हेक्टेयर भूमि पर ट्रांसलोकेट किया गया है। इस पर बेंच ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जो किया गया है, वह ट्रांसलोकेशन नहीं है। भोजपुर रोड और अन्य मामलों पर लिया गया था संज्ञान दरअसल, रायसेन जिले के भोजपुर मार्ग पर स्थित 448 पेड़ों की कटाई के मामले में हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए इसे जनहित याचिका के रूप में सुना था। इसके अलावा भोपाल में विधायकों के आवास निर्माण के लिए 244 पेड़ और रेलवे परियोजना के लिए करीब 8000 पेड़ों की कटाई का मामला भी सामने आया था। चीफ जस्टिस की बेंच ने पहले 20 नवंबर को भोपाल में और फिर 26 नवंबर को पूरे मध्यप्रदेश में पेड़ों की कटाई पर सशर्त रोक लगा दी थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि केवल एनजीटी की एक्सपर्ट कमेटी और ट्री ऑफिसर की अनुमति से ही पेड़ों की कटाई की जा सकती है। पेड़ कटाई के कई मामलों में हाईकोर्ट सख्त इससे पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट पेड़ कटाई के कई मामलों सुनवाई कर रहा है. राजधानी भोपाल के पास भोजपुर-बैरसिया सड़क निर्माण के लिए बिना अनुमति के ही सैकड़ों पेड़ काटने के मामले में हाईकोर्ट ने स्वत संज्ञान लेकर जनहित याचिका के रूप में सुनवाई की है. वहीं, पिछली सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने अखबार में प्रकाशित उस खबर पर भी संज्ञान लिया था, जिसमें सागर कलेक्ट्रेट में एक हजार पेड़ काटने का खुलासा किया गया था. कलेक्टर कार्यालय में दो अतिरिक्त कक्ष बनाने के लिए सिर्फ दस घंटे में ये पेड़ काट दिए गए थे. इसके अलावा भोपाल में एमएलए क्वार्टर्स निर्माण से जुड़े प्रोजेक्ट में कितने पेड़ काटे गए हैं और कितने और काटे जाने इस संबंध में विधानसभा सचिव को स्टेटस रिपोर्ट पेश कराने के निर्देश दिए गए. याचिका की सुनवाई के दौरान बताया गया कि प्रोजेक्ट के लिए पूर्व में 112 पेड़ काटे गए हैं और 132 पेड़ और काटा जाना है. सरकार ने इन्हें शिफ्ट करने और वृक्षारोपण की कार्ययोजना का प्लान भी प्रस्तुत किया. वहीं, धिरौली कोल ब्लॉक मामले पर अगली सुनवाई 14 जनवरी को निर्धारित की गई है.

इंदौर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी, 10 महीने में सिर्फ एक हिस्से की रेलिंग हट पाई

 इंदौर  बीआरटीएस की रेलिंग हटाने, इंदौर के बिगड़ते ट्रैफिक और नियम विरुद्ध प्राइवेट वाहनों में हूटर लगाने के मामले में लगी जनहित याचिकाओं के मामले में बुधवार को हाईकोर्ट की डबल बेंच में सुनवाई हुई। इसमें कमेटी ने बीआरटीएस को लेकर रिपोर्ट पेश की। इंदौर बीआरटीएस हटाने का फरवरी 2025 से आदेश होने के बाद भी आज दिनांक तक पूरी तरह नहीं हटा है। इसी मामले को लेकर हाईकोर्ट ने इसे लेकर सख्त आदेश जारी करना शुरू कर दिए हैं। अधिकारियों को कोर्ट में लगातार तलब किया जा रहा है। एक दिसंबर की सुनवाई में 16 दिसंबर तक एक तरफ की रैलिंग हटाने और फिर सुनवाई में कलेक्टर शिवम वर्मा, निगमायुक्त दिलीप यादव व डीसीपी ट्रैफिक आनंद कलादगी को पेश होने के लिए कहा गया था, लेकिन अधिकारियों ने आवेदन लगाकर छूट ले ली। हाईकोर्ट ने नई तारीख अगले दिन 17 दिसंबर की लगा दी। लेकिन इसके लिए भी फिर SIR (निर्वाचन) काम की व्यस्तता का बोलकर छूट लेने की बात कही गई। इस पर हाईकोर्ट सख्त हुआ और अधिकारियों को दोपहर ढाई बजे उपस्थित होने के आदेश दिए गए। इसके बाद यह अधिकारी डबल बैंच के सामने पेश हुए।  सुनवाई के दौरान कमेटी की रिपोर्ट आई सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट द्वारा वकीलों की बनाई गई कमेटी की रिपोर्ट आई। इसमें यह तो कहा गया कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद रैलिंग हटाने का काम हुआ है, लेकिन अभी दूसरी ओर की नहीं हटी है। साथ ही जो पेंचवर्क हुआ है वह सही नहीं हुआ है और इससे सड़क अनईवन हो रही है। बस स्टाप के पास सुरक्षा के मानक सही नहीं है। वहां सामान पड़ा हुआ है। इससे रास्ता ब्लाक हो रहा है और दुर्घटना की भी आशंका बनी हुई है।  इस तरह हुई बहस, यह दिए आदेश हाईकोर्ट बेंच ने इस मामले में एक बार अधिकारियों से पूछा कि भोपाल में नौ दिन में बीआरटीएस हट गया था यहां इतनी देर क्यों हो रही है। इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागड़िया ने कहा कि क्योंकि वह भोपाल था और यह इंदौर है। वहीं बागड़िया ने कहा कि रैलिंग एक ओर की हटी है लेकिन दूसरी ओर की नहीं हटी है। इसअधिवक्ता अजय बागड़ियाके चलते रास्ता एक और तो बहुत चौड़ा है वहीं दूसरी ओर तंग है। अभी तक बीच में डिवाइडर नहीं लगे हैं। सीमेंट ब्लाक की लागत बहुत ज्यादा, खत्म हो गए इस पर जस्टिस ने कहा कि सीमेंट के ब्लाक लगा दिए जाएं, जैसे जीपीओ पर लगाए हैं। इस पर निगमायुक्त दिलीप यादव ने कहा कि इन ब्लाक की लागत बहुत ज्यादा आती है। एक किमी में करीब एक करोड़ होती है। जो अभी थे वह 500 मीटर में लगा दिए हैं। इस पर जस्टिस ने कहा कि जो रैलिंग निकाली है क्या उसका उपयोग कर बीच में डिवाइडर नहीं कर सकते हैं। इस पर कलेक्टर ने कहा कि जो टेंडर दिया है वह एजेंसी ही इस निकले माल को रखेगी और इसे ही बेचकर वह टेंडर की राशि भरेगी, इसलिए इनका उपयोग सही नहीं है। इस पर बागड़िया ने कहा कि रस्सी बांधकर या ट्रैफिक पुलिस के बैरिकेडिंग लगाकर व्यवस्था की जाए। इससे अधिकारियों ने एक्सीडेंट होने की आशंका जताई।  कोर्ट की सख्ती के बाद उपस्थित हुए आला अफसर फिर ढाई बजे कलेक्टर शिवम वर्मा, निगम कमिश्नर दिलीप यादव, ट्रैफिक डीसीपी आनंद कलांदगी डिवीजन बेंच के सामने पेश हुए। मामले में याचिकाकर्ता राजलक्ष्मी फाउंडेशन की ओर से एडवोकेट अजय बागडिया ने सबसे पहले कोर्ट को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि आपके आदेश के कारण ही इतना काम हो पाया है। इसके लिए उन्होंने शहर की ओर से भी धन्यवाद दिया। मामले में अब सुनवाई 12 जनवरी को तय की गई है। एक ओर की रेलिंग नहीं हटाने से ट्रैफिक बदहाल याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट अजय बागडिया ने कहा कि वर्तमान में बीआरटीएस की एक हिस्से की रेलिंग हटाने से सड़क चौड़ी जरूर हुई है। इससे भंवरकुआ से विजय नगर की ओर आने वाले वाहनों चालकों को अब 1/3 हिस्सा मिल भी रहा है। दूसरी ओर विजय नगर से भंवरकुआ जाने वाले हिस्से की रेलिंग नहीं हटने से रास्ता काफी संकरा हो गया है, जिससे ट्रैफिक का दबाव वहां ज्यादा है। अस्थायी डिवाइडर नहीं लगाए जा सकते याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया कि वहां कि रेलिंग भी हटाकर बीच में डिवाइडर बनाए जाए। इस पर अधिकारियों की ओर से बताया कि इतनी जल्दी डिवाइडर नहीं बन पाएगा क्योंकि अभी हिस्से की रेलिंग को तोड़ा है और यह जगह अभी डिवाइडर के लिए ही छोड़ी गई है। इस पर याचिकाकर्ता की ओर से सुझाव दिया गया कि अभी जीपीओ चौराहा से शिवाजी नगर प्रतिमा तक बीच में डिवाइडर के रूप में सीमेंट के जो ब्लॉक लगाए हैं वैसे ही बाकी हिस्से में भी लगा दें। इस पर निगम कमिश्नर ने कहा कि इसकी लागत बहुत ज्यादा है। निगम के पास जो था वह लगा दिया गया है। अधिकारी बोले- इससे तो दुर्घटनाएं बढ़ेंगी मामले इसे लेकर याचिकाकर्ता ने सुझाव दिया कि ऐसे में पुलिस की जो बैरिकेडिंग होती है वह लगा दी जाए या प्लास्टिक बैरिकेड्स भी लगाए जा सकते हैं। अगर ये भी उपलब्ध नहीं हैं तो तब तक बीच में खंभे लगाकर रस्सी बांध दी जाए और दूसरी ओर रेलिंग भी तोड़ी जाए। इस पर अधिकारियों ने कहा कि यह जोखिमपूर्ण होगा और दुर्घटनाएं होंगी। लोग इससे कूदकर दूसरी ओर आएंगे। लोग पालन नहीं करते तो दूसरे कैसे जिम्मेदार मामले में याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया कि ये वे लोग हैं जो ट्रैफिक रूल्स का पालन नहीं करते। अगर वे ऐसा करते हैं तो खुद की रिस्क पर करते हैं। अगर कोई घटना होती है तो दूसरा (प्रशासन) कैसे जिम्मेदार होगा। ऐसे लोगों के कारण पूरे शहर के लोग परेशानी क्यों भुगतें। इसलिए बीच में डिवाइडर बनाया जाए जो बहुत जरूरी है। अब 12 जनवरी को पेश होगी स्टेटस रिपोर्ट सभी तर्क सुनने के बाद हाईकोर्ट बेंच ने कहा कि अधिकारी वकीलों की बनी कमेटी के साथ बैठक कर इसमें और क्या होना चाहिए इस पर बात करें। कमेटी से भी सुझाव लें। साथ ही 12 जनवरी को इस मामले में स्टेटस रिपोर्ट पेश करें। जो कमेटी ने अपनी रिपोर्ट … Read more

जंगली जानवरों की रहस्यमयी मौतों पर हाईकोर्ट का कड़ा रुख, स्वतः संज्ञान लेकर PCCF से मांगा जवाब

बिलासपुर छत्तीसगढ़ में हो रही जंगली जानवरों की संदिग्ध मौतों और अवैध शिकार की आशंका से जुड़े मामलों को हाईकोर्ट ने गंभीरता से लिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बिभु दत्त गुरु की डिवीजन बेंच ने मीडिया में लगातार सामने आ रही खबरों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए मामले की सुनवाई जनहित याचिका के रूप में की। मामले में कोर्ट ने राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक सह मुख्य वन्यजीव वार्डन को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही स्पष्ट किया है कि प्रदेश में वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर किसी भी तरह की लापरवाही स्वीकार्य नहीं होगी। मामले की अगली सुनवाई 19 दिसंबर 2025 को निर्धारित की गई है। बता दें कि हाल के दिनों में प्रदेश में वन्यजीवों की मौत की कई घटनाएं सामने आई हैं। खैरागढ़-डोंगरगढ़ के बीच स्थित वन ग्राम बनबोड़ क्षेत्र में एक वयस्क तेंदुए की निर्मम हत्या कर दी गई। शिकारियों ने तेंदुए के पंजे, नाखून और जबड़े के दांत काटकर ले गए। इसके अलावा कबीरधाम जिले के भोरमदेव अभ्यारण्य अंतर्गत जामपानी क्षेत्र में करंट की चपेट में आने से दो बाइसन की मौत हो गई। आशंका है कि शिकारियों ने करंट लगाकर बाइसन का शिकार किया। वहीं मोतीनपुर और बोटेसूर गांव के बीच जंगल में भी एक तेंदुए का शव मिला है।

हाईकोर्ट में गरमाया माहौल: ‘आप वकील कहलाने के योग्य नहीं’ सुनते ही भड़कीं जज साहिबा

नई दिल्ली  बार चुनावों को लेकर गंभीर आरोप लगाने वाले वकील को दिल्ली हाईकोर्ट ने फटकार लगाई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने वकील की फेसबुक पोस्ट पर आपत्ति जताई है। साथ ही कहा है कि वह वकील बनने तक के लायक नहीं हैं। हालांकि, कोर्ट ने अवमानना की कार्यवाही करने से इनकार कर दिया है, लेकिन वकील को कड़े शब्दों में चेतावनी दी है।   मामला दिल्ली डिस्ट्रिक्ट कोर्ट बार एसोसिएशन चुनावों से जुड़ा हुआ है। यहां एक एडवोकेट ने फेसबुक पर चुनाव में गड़बड़ी के गंभीर आरोप लगाए थे और भड़काऊ पोस्ट की थी। जस्टिस मिनी पुष्करणा ने इस पर कड़ी आपत्ति जाहिर की है। उन्होंने वकील की आलोचना की और मामला बार काउंसिल ऑफ इंडिया के पास भेजने की बात कही है। बार एंड बेंच के अनुसार, उन्होंने कहा, 'अगर आप इस तरह की पोस्ट डालते हैं, तो आप वकील बनने के लायक ही नहीं हैं। चुनाव कभी भी दोस्ताना नहीं होते और खासतौर से बार के। इससे आपको ये सब पोस्ट करने का अधिकार नहीं मिलता है। मैं इस मामले को बार काउंसिल ऑफ इंडिया के पास भेजूंगी। ये सब क्या बकवास है। बार में ऐसे नेता नहीं होने चाहिए। कोर्ट आपके इस काम और सफाई से खुश नहीं है। कोर्ट ऐसे बार नेताओं के होने की उम्मीद नहीं करता है।' कोर्ट में पोस्ट करने वाले वकील की तरफ से एडवोकेट महमूद पर्चा पेश हुए थे। उन्होंने मुवक्किल की ओर से बगैर शर्त माफी मांगी है। हालांकि, कोर्ट ने आदेश दिए हैं कि वकील की तरफ से सोशल मीडिया पर की गईं पोस्ट्स को हटाया जाए। जज ने कहा, 'कोर्ट की गरिमा को बनाए रखना है। आप इस बात के व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे कि पोस्ट डिलीट की जाएं। कोर्ट ये उम्मीद नहीं करता कि बार के नेता ऐसा हों।' कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि एडवोकेट के फेसबुक पोस्ट को गंभीरता से लिया गया है। हालांकि, बगैर शर्त माफी मांगने और केस को देखते हुए कोर्ट की अवमानना की कार्यवाही नहीं की जा रही है। कोर्ट ने वकील को भविष्य में ऐसी कोई भी पोस्ट नहीं करने की चेतावनी देकर छोड़ा है। अदालत ने कहा है कि ऐसी कोई भी पोस्ट न की जाएं, जिसके कोर्ट की गरिमा को धक्का लगे।

सागर के थानों की अनियमितता पर हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को दी राहत, पुलिस कार्रवाई पर रोक

जबलपुर  हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकलपीठ के समक्ष शुक्रवार को सागर जिले के चार थानों की अनियमितता उजागर करने वाले याचिकाकर्ताओं के मामले की सुनवाई हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से आशंका जताई गई कि पुलिस दुर्भावनावश झूठे प्रकरण पंजीबद्ध कर सकती है। बताया गया कि स्टिंग ऑपरेशन के बाद से उनके कॉल रिकॉर्ड किए जा रहे हैं। इनको जारी किया गया नोटिश मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने प्रदेश के मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव विधि विभाग, प्रमुख सचिव गृह विभाग, पुलिस महानिदेशक, आईजी, पुलिस अधीक्षक सागर एवं सीबीआई को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह में जवाब मांगा है। साथ ही कोर्ट ने अंतरिम आदेश पारित करते हुए आगामी आदेश तक याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध किसी भी प्रकार की कार्रवाई न करने के निर्देश दिए हैं। राजधानी भोपाल निवासी राहुल शर्मा, दीपक शर्मा एवं सागर निवासी अतुल अग्रवाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ताओं ने सागर के चार थाना बहेरिया, मोतीनगर, मकरोनिया एवं गोपालगंज में पदस्थ पुलिस कर्मियों द्वारा अवैध शराब की बिक्री, छह हजार रुपये प्रति सप्ताह लेकर शहर में जुआ-सट्टा खिलाने की अनुमति, नाबालिगों के माध्यम से ड्रग्स, स्मैक व गांजा विक्रय तथा स्पा सेंटरों में देह व्यापार संचालित करवाने का स्टिंग ऑपरेशन के माध्यम से खुलासा किया था। कार्रवाई के बजाय परेशान इस संबंध में 30 नवंबर को खबर प्रकाशित की गई थी। दलील दी गई कि मामले उजागर होने के बाद पुलिस प्रशासन ने दोषी अधिकारियों के विरुद्ध जांच व कार्रवाई करने के बजाय याचिकाकर्ताओं के कॉल रिकॉर्डिंग और आईपीडीआर निकलवाने शुरू कर दिए। साथ ही याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध झूठे प्रकरण दर्ज करने की तैयारी की जा रही है।  

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने विक्रम अवार्ड-2023 पर अंतरिम रोक लगाई, कोर्ट ने दूसरी दावेदार से मांगा जवाब

जबलपुर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने साहसिक खेलों के लिए दिए जाने वाले विक्रम अवार्ड-2023 का आयोजन करने पर अंतरिम रोक लगा दी। कोर्ट ने दूसरी दावेदार भावना डेहरिया को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। साथ ही मामले की अगली सुनवाई पांच जनवरी, 2026 को निर्धारित की। कहा कि तब तक विक्रम अवार्ड-2023 आयोजन न किया जाए। सीहोर निवासी पर्वतारोही मेघा परमार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक कृष्ण तन्खा व अधिवक्ता अतुल जैन ने पक्ष रखा। दलील दी कि याचिकाकर्ता इस अवार्ड की सही दावेदार है, इसलिए अंतिम निराकरण तक उक्त अवार्ड किसी अन्य को नहीं दिया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि मप्र शासन ने साहसिक खेलों के लिए विक्रम अवार्ड 2023 की घोषणा की है। इसके लिए छिंदवाड़ा की पर्वतारोही भावना डेहरिया का चयन किया गया है। याचिकाकर्ता को भावना के चयन पर कोई आपत्ति नहीं है। उसका कहना है कि 22 मई 2019 को दुनिया की सबसे ऊंची छोटी माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराने वालों में वह अग्रणी थीं। भावना डेहरिया से पहले तिरंगा फहराया था। दोनों के बीच पांच घंटे का अंतराल था। मेघा सुबह पांच बजे चोटी पर पहुंच गई थीं, जबकि भावना पौने 10 बजे पहुंची थीं। इस लिहाज से भावना की भांति मेघा का भी विक्रम अवार्ड पर हक है। नियम शिथिल करें विगत सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता तन्खा ने दलील दी थी कि 2022 में विक्रम अवार्ड के चयन की प्रक्रिया में नियमों को शिथिल करते हुए प्रदेश के दो पुरुष खिलाड़ियों पर्वतारोही भगवान सिंह और रत्नेश पांडेय के नामों पर मुहर लगाई थी। दोनों के बीच लक्ष्य हासिल करने में एक घंटे का अंतराल था। एक वर्ष में सिर्फ एक खिलाड़ी को अवार्ड देने का नियम बदलने का दृष्टांत सामने है। याचिकाकर्ता मेघा के लिए विक्रम अवार्ड पाने का नामांकन प्रक्रिया के अनुसार यह अंतिम अवसर है। कोर्ट को बताया गया कि प्रदेश में संचालित बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान में याचिकाकर्ता मेघा परमार को ब्रांड एम्बेसडर नियुक्त किया गया था और भावना को यह अवसर मेघा के बाद हासिल हुआ।

हाईकोर्ट का निर्णय: विवाहेतर यौन संबंध के मामले में तस्वीरों के आधार पर तलाक का फैसला सही

जबलपुर  विवाहेतर यौन संबंध में 65 बी सर्टिफिकेट के बिना तस्वीरों के आधार पर दिया गया तलाक का फैसला सही है. हाईकोर्ट जस्टिस विशाल धगट और जस्टिस बी पी शर्मा की युगलपीठ ने अहम फैसले में कहा है कि शादी के मामले में इंडियन एविडेंस एक्ट पूरी तरह से लागू नहीं होता है. युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि 65-बी सर्टिफिकेट के बिना कुटुंब न्यायालय के द्वारा तस्वीर को देखते हुए विवाहेतर यौन संबंध के आधार पर तलाक की डिक्री जारी करने में कोई गलती नहीं की है. युगलपीठ ने इस आदेश के साथ दायर अपील को खारिज कर दिया. कुटुंब न्यायालय के फैसले को हाईकोर्ट में दी थी चुनौती बालाघाट निवासी महिला की तरफ से कुटुंब न्यायालय के द्वारा तलाक की डिक्री जारी किये जाने को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी. अपील में कहा गया था कि उसका विवाह साल 2006 में अनावेदक के साथ हिन्दू रीति रिवाज के अनुसार हुआ था. अनावेदक पति ने एक अन्य व्यक्ति के साथ उसकी आपत्तिजनक फोटो के साथ कुटुंब न्यायालय ने तलाक के लिए आवेदन किया था. फोटो के साथ इंडियन एविडेंस एक्ट के तहत प्रमाणिता के लिए 65-बी सार्टिफिकेट प्रस्तुत नहीं किया गया था. अपील में सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा पारित आदेश का हवाला देते हुए कहा गया था कि एविडेंस एक्ट, 1872 के सेक्शन 65-बी का पालन करना जरूरी है. अपीलकर्ता के मोबाइल में यह तस्वीर गलती से अनावेदक पति के मोबाइल पर ट्रांसफर हो गई थी. जिसके बाद पति ने उसका मोबाइल फोन तोड़ दिया. एविडेंस एक्ट की सेक्शन 65-बी के तहत बिना प्रमाणिता सार्टिफिकेट के कुटुंब न्यायालय द्वारा पारित आदेश निरस्त करने योग्य है. 'पति के पास पत्नी के मोबाइल फोन पर उसके एडल्टरी के थे सबूत' हाईकोर्ट जस्टिस विशाल धगट और जस्टिस बी पी शर्मा की युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि "अपीलकर्ता ने इस बात से इनकार नहीं किया है कि वह तस्वीरों में नहीं थी. सिर्फ यह कहा गया है कि तस्वीरें किसी ट्रिक का इस्तेमाल करके बनाई गई हैं. नकली तस्वीरें किसने और किस तरीके से क्यों बनाई हैं, इसका भी उल्लेख नहीं किया है. अपीलकर्ता ने अपने बयान में कहा था कि तस्वीरें उसके मोबाइल से पति के मोबाइल में ट्रांसफर की गईं, फिर पति ने उसका मोबाइल तोड़ दिया. पति के पास पत्नी के मोबाइल फोन पर उसके एडल्टरी के सबूत थे. कोई भी इंसान नहीं चाहेगा कि उसकी पत्नी एडल्टरी करती रहे. इसलिए पति ने गुस्से में पत्नी का मोबाइल फोन तोड़ दिया. जिससे उसकी अपने पार्टनर से बातचीत बंद हो जाए. जिस फोटोग्राफर ने फोटो खींची थी उससे भी कोर्ट में पूछताछ की गई थी." 'इंडियन एविडेंस एक्ट शादी के मामलों में पूरी तरह लागू नहीं होता' युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि "इंडियन एविडेंस एक्ट शादी के मामलों में पूरी तरह लागू नहीं होता है. फैमिली कोर्ट एक्ट के सेक्शन 14 के मुताबिक कुटुंब न्यायालय को सच्चाई का पता लगाने के लिए सबूत के तौर पर कोई भी रिपोर्ट, बयान, डॉक्यूमेंट्स लेने का अधिकार दिया गया है. कुटुंब न्यायालय ने इन तस्वीरों पर भरोसा करके विवाहेतर यौन संबंध के आधार पर तलाक की डिक्री जारी करके कोई गलती नहीं की. युगलपीठ ने इस आदेश के साथ महिला की अपील को खारिज कर दिया.

हाईकोर्ट ने दिए ज्यूडिशियल सेपरेशन के आदेश, बीमारी छिपाने को माना क्रूरता

जबलपुर हाईकोर्ट जस्टिस विशाल धगट तथा जस्टिस बीपी शर्मा की युगलपीठ अपने अहम फैसले में कहा है कि बीमारी की जानकारी छुपाकर विवाह करना और बीमार करने की साजिश करने का आरोप लगाना क्रूरता की श्रेणी में आता है। जीवन साथी की सेहत को लेकर टेंशन में दूसरे पक्ष को ज़िंदगी भर परेशान रहते हुए आर्थिक तथा भावुक नुकसान उठाना पड़ेगा। हाईकोर्ट युगलपीठ ने कुटुम्ब न्यायालय के आदेश को निरस्त करते हुए अपीलकर्ता पति के पक्ष में ज्यूडिशियल सेपरेशन के आदेश जारी किए हैं। मंडला निवासी डॉ. महेन्द्र कुशवाहा की तरफ से दायर अपील में ज्यूडिशियल सेपरेशन के आवेदन को कुटुम्ब न्यायालय द्वारा निरस्त किए जाने को चुनौती दी गई थी। अपील में कहा गया था कि उसकी अनावेदिका पत्नी के साथ अरेंज मैरिज हुई थी। विवाह के पूर्व वह मिर्गी की बीमारी से पीड़ित थी और इस संबंध में उसे जानकारी नहीं दी गई। विवाह के बाद अनावेदिका को जून व जुलाई 2022 में मिर्गी के दौरे आने के बाद अपीलकर्ता ने ज्यूडिशियल सेपरेशन के लिए कुटुम्ब न्यायालय में आवेदन किया था। ज्यूडिशियल सेपरेशन के आवेदन की सुनवाई के दौरान पत्नी ने इस बात से साफ इंकार कर दिया कि वह मिर्गी की बीमारी से पीड़ित है। उसने अपने पति व सास पर बदनीयती से बीमार करने उसे बहुत मीठा खाना खाना दिए जाने के आरोप लगाये थे। पत्नी का तर्क, मिर्गी कोई बीमारी नहीं है अनावेदक पत्नी की तरफ से तर्क दिया गया कि ज्यूडिशियल सेपरेशन की मंजूरी से उसकी परेशानियां बढ़ जाएंगी। बीमारी के मुश्किल समय में यह उसके साथ क्रूरता होगी। पति को पत्नी की देखभाल करनी चाहिए और कोर्ट में ज्यूडिशियल सेपरेशन की अपील नहीं करनी चाहिए थी। मिर्गी कोई ऐसी बीमारी नहीं है जिसका इलाज नहीं है। उसे यह बीमारी शादी के बाद हुई है। कोर्ट ने माना सच छिपाकर धोखा किया गया युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि हर इंसान के पास शादी का पार्टनर चुनने का ऑप्शन होता है। वह बायोडाटा देखने, एक-दूसरे से मिलने और परिवार के सदस्यों और दोस्तों से बात करने के बाद एक-दूसरे से शादी करते हैं। अपीलकर्ता को बीमारी के संबंध में जानकारी होती तो शायद वह अनावेदक से शादी नहीं करता। शादी के बाद बीमारी होने के बाद पति का फ़र्ज़ है कि वह पत्नी का ध्यान रखे। सच छिपाकर अपीलकर्ता के साथ धोखा किया गया है। मेडिकल रिपोर्ट से स्पष्ट, बीमारी पहले से थी मेडिकल दस्तावेज से स्पष्ट है कि अनावेदक को विवाह के पहले से उक्त बीमारी थी। इसके बावजूद भी अनावेदिका ने पति व सास पर साज़िश का झूठा आरोप लगाया गया। अनावेदक का यह बर्ताव क्रूरता के बराबर है, जो हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के सेक्शन 13(1)(पं) के तहत क्रूरता के दायरे में आएगा। युगलपीठ ने कुटुम्ब न्यायालय के आदेश को निरस्त करते हुए अपीलकर्ता के पक्ष में ज्यूडिशियल सेपरेशन आदेश जारी किए है।

पीड़िता की नाबालिग होने की बात साबित नहीं कर पाई सरकार, हाईकोर्ट ने नहीं माना दुष्कर्म का आरोप

बिलासपुर हाईकोर्ट ने शादी का वादा कर नाबालिग से दुष्कर्म करने के आरोपी को दोषमुक्त किए जाने के खिलाफ पेश राज्य शासन की अपील खारिज कर दी है. पीड़िता ने इस बात का स्वीकार किया था कि वह आरोपी के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रह रही थी. मामले की सुनवाई जस्टिस संजय एस. अग्रवाल एवं जस्टिस राधाकिशन अग्रवाल की डीविजन बेंच में हुई. जानकारी के मुताबिक, रायगढ़ जिले की रहने वाली पीड़िता ने 10 फरवरी 2016 को रिपोर्ट दर्ज कराई कि 1 फरवरी 2016 से आरोपी उसके साथ लिव इन रिलेशनशिप में था, और इस दौरान उसने शादी का झूठा बहाना बनाकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाया. जब पीड़िता ने उससे शादी करने के लिए कहा, तो उसने मना कर दिया. पीड़िता की शिकायत के आधार पर पुलिस ने आरोपी के खिलाफ धारा 376 एवं पास्को एक्ट के तहत जुर्म दर्ज किया. पीड़िता का चिकित्सकीय परीक्षण रिपोर्ट में पीड़िता के साथ जबरदस्ती सेक्सुअल इंटरकोर्स का कोई निशान नहीं देखा और न ही पीड़िता के शरीर पर अंदर या बाहर कोई चोट का निशान पाये जाने की रिपोर्ट दी गई. उम्र प्रमाणित करने के लिए पीड़ित का वर्ष 2011 का प्रोग्रेस कार्ड के हिसाब से जन्म प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया गया. मामले की सुनवाई स्पेशल कोर्ट में हुई. सुनवाई के बाद कोर्ट ने पीड़ित के बयान व उसकी उम्र 18 वर्ष से कम होना साबित नहीं होने पर आरोपी को दोषमुक्त किया. स्पेशल कोर्ट द्वारा दोषमुक्ति को चुनौती देते हुए राज्य शासन ने हाई कोर्ट में अपील की थी. मामले की सुनवाई जस्टिस संजय एस. अग्रवाल व जस्टिस राधाकिशन अग्रवाल की डीविजन बेंच में हुई. पीड़िता की आयु 18 वर्ष से कम साबित नहीं हो पाया.

‘आत्महत्या की धमकी भी मानसिक प्रताड़ना’ – हाईकोर्ट ने तलाक को दी हरी झंडी

बिलासपुर पति-पत्नी के बीच विवाद के मामले में पत्नी की तलाक के खिलाफ पेश अपील को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, आत्महत्या करने की बार-बार धमकी देना क्रूरता है। जब ऐसी बात किसी इशारे या हाव-भाव के रूप में दोहराई जाती है तो कोई भी पति-पत्नी शांति से नहीं रह सकता। इस मामले में अपील करने वाले के पति ने यह दिखाने के लिए काफी सबूत पेश किए हैं कि पत्नी बार-बार आत्महत्या करने की धमकी देती थी और एक बार तो अपने ऊपर कैरोसिन डालकर आत्महत्या करने की कोशिश भी की थी। क्रूरता का मतलब है पति-पत्नी के साथ इतनी क्रूरता से पेश आना, जिससे उसके मन में यह डर पैदा हो कि दूसरे पक्ष के साथ रहना उसके लिए नुकसानदायक होगा। पत्नी के काम इतने गंभीर हैं कि पति को दर्द, और तकलीफ़ हुई है, जो शादी के कानून में क्रूरता मानी जाएगी। जानिए पूरा मामला अपीलकर्ता पत्नी की 11 मई 2018 को हिदू रीति-रिवाजों के साथ हुई थी। वह पति के साथ रह रही थी और उनकी शादी से उनका बेटा पैदा हुआ, जो अभी लगभग 03 साल का है। शादी के लगभग एक हफ्ते बाद पति-पत्नी मोटरसाइकिल पर डोंगरगढ़ में मां बम्लेश्वरी मंदिर जा रहे थे और रास्ते में अचानक उनके सामने एक भैंस आ गई और उनका एक्सीडेंट हो गया। पत्नी ने अपने पिता को बताई। पिता ने दोनों को बागतराई बुलाया और उन्हें अधारी नवगांव की दरगाह पर ले गए, यह कहकर कि उन पर भूत का साया है और हर गुरुवार को वहां आने को कहा और उन्हें भरोसा दिलाया कि उनका बिजनेस अच्छा चलेगा। शादी के बाद पति लगभग 7-8 महीने तक पत्नी को हर गुरुवार बागतराई ले जाने लगा, जिससे उसे बिजनेस में नुकसान हुआ और इस दौरान पति को पता चला कि पत्नी और उसके माता-पिता मुस्लिम हैं और उन्होंने यह बात छिपाकर शादी की थी। फिर पति ने अपील करने वाले को हर गुरुवार उसके माता-पिता के घर ले जाने से मना कर दिया। पत्नी हर गुरुवार को अपने माता-पिता के घर जाने की जिद करने लगी। पत्नी और उसके माता-पिता ने उसे मुस्लिम धर्म अपनाने के लिए कहना शुरू कर दिया, जिससे पति ने मना कर दिया। इस पर पत्नी का व्यवहार बहुत बदल गया और झगड़ा करने लगी। पत्नी ने अजीब तरह से व्यवहार करना शुरू कर दिया, गाली-गलौज करने लगी। 25 सितंबर 2019 को अपील करने वाली ने पति से बेवजह झगड़ा किया और केरोसीन डालकर खुद को आग लगाने की कोशिश की, जिसे पति ने किसी तरह बचाया। इसके बाद पत्नी अपने माता-पिता के घर चली गई। इस पर पति ने न्यायालय में तलाक के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। सुनवाई उपरांत न्यायालय ने तलाक के आवेदन को मंजूर किया। इसके खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील पेश की थी। कोर्ट ने कहा, मामले में भी यह बिल्कुल साफ़ है कि पत्नी ने अपने पति को बार-बार सुसाइड करने की कोशिश करके धमकाया और यह भी बिल्कुल साफ़ है कि साल 2020 से पत्नी अपने पति से अलग रह रही है। पत्नी के व्यवहार को देखते हुए पति के लिए किसी भी मेंटल प्रेशर के साथ उसके साथ रहना मुमकिन नहीं है। इसके साथ हाईकोर्ट ने पत्नी की तलाक के खिलाफ पेश अपील को खारिज कर दिया है।