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राजस्थान हाई कोर्ट का बड़ा आदेश, शादी से पहले लिव इन में रह सकते हैं युवाओं

 जयपुर राजस्थान हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि दो व्यस्क आपसी सहमति से तब भी लिव इन में रह सकते हैं जब उनकी उम्र शादी के लायक नहीं हुई है। देश में शादी के लिए लड़की की आयु कम से कम 18 और लड़के की न्यूनतम 21 निर्धारित है, जबकि व्यस्क होने की उम्र 18 है। जस्टिस अनूप कुमार ढांड ने ऐसे ही दो व्यस्क की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अहम आदेश पारित किया। राजस्थान के कोटा की रहने वाली 18 साल की लड़की और 19 साल के लड़के ने संरक्षण की मांग की थी। लड़की की उम्र शादी के लायक हो चुकी है, लेकिन लड़के की उम्र में अभी दो साल की कमी है। फैसले की कॉपी गुरुवार को अपलोड की गई। इसके मुताबिक, दोनों ने पुलिस सुरक्षा की मांग करते हुए कहा था कि वे आपसी सहमति से लिव इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं। कपल ने 27 अक्टूबर 2025 को लिव इन अग्रीमेंट बनाया था। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक लड़की का परिवार इस रिश्ते के खिलाफ है और उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई। उन्होंने कहा कि पुलिस के सामने लिखित अपील के बाद भी कोई ऐक्शन नहीं लिया गया। राज्य की ओर से पेश हुए लोक अभियोजक विवेक चौधरी ने दलील दी कि चूंकि लड़के की उम्र 21 नहीं हुई है इसलिए वह कानूनी रूप से शादी नहीं कर सकता है। इसलिए उन्हें लिव इन पार्टनरशिप में रहने की इजाजत नहीं देनी चाहिए। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि संविधान का आर्टिकल 21 'जीवन जीने का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता'की गारंटी प्रदान करता है और कोई धमकी संवैधानिक उल्लंघन है। अदालत ने जोर देकर कहा कि राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि हर नागरिक से जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा हो। जज ने कहा, 'सिर्फ इसलिए कि याचिकाकर्ताओं की उम्र शादी के लिए लायक नहीं हुई है, उन्हें मौलिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है।' अदालत ने यह भी कहा कि भारतीय कानूनों के तहत लिव इन ना तो अवैध ही और ना ही अपराध। अदालत ने भीलवाड़ा और जोधपुर रूरल के एसपी को धमकी के आरोपों की जांच करने और कपल को जरूरत पड़ने पर सुरक्षा देने का आदेश दिया।

शिक्षक की मृत्यु के बाद बेटे की याचिका खारिज, हाईकोर्ट ने कहा—अनुकंपा नियुक्ति अनिवार्य नहीं

जबलपुर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक अहम आदेश में कहा है "अनुकंपा नियुक्ति अधिकार नहीं है. मृतक के परिवार को आर्थिक सहायता प्रदान करने अनुकंपा नियुक्ति प्रदान की जा सकती है. कर्मचारी की मृत्यु के 7 साल बाद परिजन अनुकंपा नियुक्ति की दावेदारी नहीं कर सकते." हाई कोर्ट जस्टिस दीपक खोत ने इस आदेश के साथ याचिका को खारिज कर दिया. बालिग होने के बाद अनुकंपा नियुक्ति की मांग आशुतोष साध ने याचिका में कहा "उसके पिता गवर्नमेंट मिडिल स्कूल ब्लॉक केसला तहसील इटारसी में असिस्टेंट टीचर थे. नौकरी के दौरान दिसम्बर 2008 में पिता की मौत हो गयी. उस समय वह नाबालिग था और उसकी उम्र महज 11 साल थी. वह सितंबर 2015 में बालिग हुआ था और साल 2016 में हायर सेकेंडरी एग्जाम पास किया." याचिकाकर्ता ने अप्रैल 2016 को अनुकंपा नियुक्ति के लिए डीईओ को आवेदन दिया था, उसे सूचित किया गया कि उसके पिता आदिवासी कल्याण विभाग में पदस्थ थे. इसलिए वह सहायक आयुक्त आदिवासी कल्याण विभाग में आवेदन दें. याचिकाकर्ता के पास बीएड व डीएड की डिग्री नहीं इसके बाद आशुतोष साध ने सहायक आयुक्त के समक्ष आवेदन पेश किया. उसके आवेदन पर उच्च अधिकारी से मार्गदर्शन मांगा गया. विभाग की तरफ जारी पत्र के अनुसार उसने जुलाई 2019 में अपने दस्तावेज जमा कर दिये थे. विभाग ने नियुक्ति के लिए उसकी पसंद पूछी थी तो उसने शिक्षक कैडर बताया. विभाग ने जनवरी 2020 के पत्र जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि 3 दिन के अंदर सर्टिफिकेट जमा नहीं होने पर उसका आवेदन निरस्त कर दिया जायेगा. याचिकाकर्ता के पास बीएड तथा डीएड की डिग्री नहीं थी, जो टीचिंग कैडर के लिए आवश्यक है. याचिकाकर्ता ने काफी देर से दिया आवेदन याचिकाकर्ता ने ग्रेजुएशन की डिग्री के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति प्रदान करने या बीएड की डिग्री के लिए दो साल का समय प्रदान करने के आग्रह किया. इसके बाद 3 सदस्यीय कमेटी ने उसके आवेदन को इस आधार पर खारिज कर दिया कि साल 2014 की पॉलिसी के अनुसार बालिग होने के एक साल के अंदर अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन करना था. लगभग 11 माह बाद आवेदन किया. याचिकाकर्ता की तरफ से तर्क दिया गया कि उसने अज्ञानतावश अप्रैल 2016 में आवेदन किया था, जो निर्धारित समय सीमा के अंदर था. हाई कोर्ट ने आदेश सुनाकर आवेदन किया खारिज एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया "याचिकाकर्ता के पिता का निधन 2008 में हुआ था. उस समय 2008 की पॉलिसी प्रभावी थी. अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन की अधिकतम समय सीमा 7 साल थी. कमेटी ने पॉलिसी 2014 के तहत आवेदन खारिज किया है. अनुकंपा पॉलिसी 2008 के अनुसार भी आवेदन निर्धारित समय अवधि के बाद दायर किया गया." एकलपीठ ने इस आदेश के साथ आवेदन खारिज कर दिया.

हाईकोर्ट ने निर्देश दिए, मानव-वन्यजीव संघर्ष की नीति पर सुप्रीम कोर्ट पालन की स्थिति रिपोर्ट पेश करनी होगी

जबलपुर हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा व न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पालन में बनाई जा रही नीति की स्टेटस रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। इसके लिए राज्य शासन को चार सप्ताह का समय दिया गया है। रिपोर्ट आने के बाद जनहित याचिकाकर्ता के सुझावों पर विचार किया जाएगा।  हुई सुनवाई में किसानों द्वारा हाई-वोल्टेज तार लगाने से वन्य प्राणियों की मौतें होने का बिंदु भी रेखांकित हुआ। जनहित याचिकाकर्ता रायपुर निवासी नितिन संघवी की ओर से अधिवक्ता अंशुमान सिंह ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि हाथियों को रेस्क्यू के नाम पर लंबे समय तक कैद में रखने का रवैया बेहद चिंताजनक है। मानव-वन्यजीव संघर्ष में फसलों और संपत्ति को भारी नुकसान हो रहा है, लेकिन इसकी भरपाई की प्रक्रिया बेहद धीमी है। मुआवजा पटवारी स्तर पर तय होता है और इसे सामान्य प्राकृतिक आपदा जैसा माना जाता है। राहत मिलने में काफी समय लगता है। आंकड़ों के अनुसार किसानों को सिर्फ 17 प्रतिशत तक ही मुआवजा मिल पाता है। फसल और संपत्ति के नुकसान का मामला वन विभाग संभाले। पटवारी के बजाय वन विभाग को जिम्मेदारी संभालनी चाहिए। मौत पर 10 लाख रुपये मुआवजा तय किया जाए सुप्रीम कोर्ट ने 17 नवंबर, 2025 को सभी राज्यों को टीएन गोदावर्मन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में यह निर्देश दिए थे कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को उत्तर प्रदेश और केरल की तर्ज पर प्राकृतिक आपदा की श्रेणी में रखा जाए। ऐसे मामलों में मौत पर 10 लाख रुपये मुआवजा तय किया जाए और छह महीने के भीतर विस्तृत नीति बनाई जाए। प्रदेश में बाघों की मौत का कारण करंट विगत सुनवाई में एक्सपर्ट कमेटी ने बताया था कि कान्हा में रखे गए जंगली हाथियों को 15 दिनों में छोड़ दिया जाएगा और उनकी ट्रैकिंग के लिए रेडियो कॉलर आईडी मंगवाई गई है। आज की सुनवाई में बताया गया कि दो हाथियों को कॉलर आईडी लगाकर जंगल में छोड़ दिया गया है। इसी देरी और परेशानियों के कारण किसान खेतों की सुरक्षा के लिए हाई टेंशन करंट वाले तार लगाने लगते हैं। इसके कारण प्रदेश में बड़ी संख्या में वन्य प्राणियों की मौत करंट लगने से हो रही है। याचिकाकर्ता ने कहा कि बाघों की मौत के मामलों में करंट एक बड़ा कारण है।  

हाईकोर्ट का आदेश: जावेद सिद्दीकी के घर पर बुलडोजर कार्रवाई पर 15 दिन की रोक

इंदौर  मध्य प्रदेश के इंदौर जिले में महू कैंटोनमेंट क्षेत्र में अल फलाह यूनिवर्सिटी के चेयरमैन जावेद अहमद सिद्दीकी का पुराना पैतृक मकान इन दिनों सुर्खियों में है. यह चार मंजिला मकान मुकेरी मोहल्ला में है और इसके कुछ हिस्से को महू कैंट बोर्ड ने अवैध निर्माण बताया है. बोर्ड ने हाल ही में नोटिस जारी कर सिर्फ तीन दिन का समय दिया था कि अवैध हिस्सा खुद हटा लें, वरना बुलडोजर चलाकर तोड़ दिया जाएगा और खर्चा भी वसूला जाएगा. यह मकान मूल रूप से जावेद सिद्दीकी के पिता स्वर्गीय मौलाना हम्माद सिद्दीकी के नाम पर दर्ज है. हम्माद सिद्दीकी कभी महू के शहर काजी रह चुके थे. परिवार ने यह मकान जावेद को गिफ्ट किया था. बाद में जावेद सिद्दीकी ने इसे अब्दुल माजिद नाम के शख्स को गिफ्ट कर दिया. तब से अब्दुल माजिद और उनका परिवार इस मकान में रह रहा है. महू कैंट बोर्ड का कहना है कि यह निर्माण 1996-97 में दिए गए पुराने नोटिस के आधार पर अवैध है. नोटिस में साफ नहीं बताया गया कि मकान का कौन सा हिस्सा गैरकानूनी है. साथ ही सुप्रीम कोर्ट की 2025 वाली नई गाइडलाइंस का भी पालन नहीं किया गया. बोर्ड ने अवैध बेसमेंट और अतिरिक्त मंजिलों का हवाला दिया है. फिलहाल इस मकान पर बुलडोजर एक्शन नहीं होगा. क्योंकि मकान में रहने वाले अब्दुल माजिद ने इंदौर हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में याचिका दाखिल की थी. अब्दुल माजिद इस संपत्ति पर अपना क्लेम कर रहे हैं, क्योंकि मकान उन्हें गिफ्ट किया जा चुका है. याचिका की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने तीन मुख्य आधारों पर 15 दिन का स्टे ऑर्डर दे दिया है: वर्तमान नोटिस में 1996-97 के पुराने नोटिस का जिक्र तो है, लेकिन सही तरीके से नहीं बताया गया. नोटिस में यह साफ नहीं है कि मकान का ठीक कौन सा हिस्सा अवैध है. सुप्रीम कोर्ट की ताजा गाइडलाइंस (2025) का पालन नोटिस में नहीं हुआ. हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों – यानी याचिकाकर्ता और महू कैंट बोर्ड – को अपना पक्ष रखने के लिए 7-7 दिन का समय दिया है. इस तरह कुल 15 दिन बाद मामले की अगली सुनवाई होगी. तब तक बुलडोजर एक्शन पर पूरी तरह रोक लगी हुई है. यह मामला इसलिए भी ज्यादा चर्चा में है क्योंकि जावेद सिद्दीकी इन दिनों दिल्ली ब्लास्ट और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर मामलों में जांच के घेरे में है, लेकिन मकान तोड़ने का यह पुराना विवाद अवैध निर्माण से जुड़ा है. अब देखना पक्ष मजबूत रखने के लिए अब्दुल माजिद को राहत मिली है, लेकिन 15 दिन बाद कोर्ट क्या फैसला लेगी, यह देखना बाकी है.

High Court का फैसला: मानसिक क्रूरता के चलते पत्नी को तलाक देने की अनुमति

बिलासपुर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक बहुत ही अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने पत्नी का पति से शारीरिक संबंध न बनाने को मानसिक क्रूरता माना है। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को खारिज करते हुए पति की दायर अपील पर तलाक का आदेश जारी किया है। कोर्ट ने कहा कि पति को शारीरिक संबंध बनाने से रोकना उसके साथ मानसिक क्रूरता है। जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस एके प्रसाद की डिवीजन बेंच ने कहा कि 11 साल अलगाव और पत्नी की शारीरिक संबंध के लिए ईच्छा न होना मानसिक क्रूरता मानी जाएगी। विवाह के एक महीने बाद ही पत्नी मायके चली गई थी। यह था पति और पत्नी के बीच पूरा मामला दरअसल अंबिकापुर के शख्स की शादी 30 मई 2009 को रायपुर की महिला के साथ हुई थी। पति का आरोप है कि शादी के एक महीने बाद ही उसे पत्नी मायके चली गई। जिस पर उन्होंने फैमिली कोर्ट में तलाक की मांग करते हुए आवेदन दिया। पत्नी पर आरोप लगाया कि वह वैवाहिक दायित्व निभाने से इनकार कर रही है। महिला ने पति को यहां तक धमकी दे डाली कि अगर  वो शारीरिक संबंध बनाएगा तो अपना जीवन खत्म लेगी। पति की कई कोशिशों के बाद भी पत्नी मायके से वापस नहीं लौटी।  केस दर्ज होने के बाद भी उसने कभी पति से संपर्क नहीं किया। महिला ने पति पर मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के आरोप लगाए थे। फैमिली कोर्ट की सुनवाई के दौरान पत्नी ने पति के आरोपों को निराधार बताया। कहा कि उसका पति एक साध्वी का भक्त हैं और वो वैवाहिक संबंधों में रुचि नहीं रखते ।  आरोप लगाया कि पति बच्चे नहीं चाहता था। पत्नी ने पहले वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए अर्जी भी लगाई, लेकिन बाद में उसे वापस ले लिया। फैमिली कोर्ट ने पति की अर्जी को खारिज कर दिया। पति ने फैमिली कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी पति फैमिली कोर्ट के फैसले से संतुष्ट नहीं हुआ और हाईकोर्ट में फैसले को चुनौती दी। कहा कि फैमिली कोर्ट ने उनके तर्कों को सुने बगैर ही तलाक की अर्जी खारिज की है। हाईकोर्ट ने मामले में सुनवाई करते हुए पाया कि पति-पत्नी 11 सालों से अलग रह रहे हैं। पत्नी ने माना कि वह अब पति के साथ वैवाहिक जीवन जारी नहीं रखना चाहती। हाईकोर्ट ने अलगाव के लंबे अंतराल को मानसिक क्रूरता माना और पति की तलाक की अपील को स्वीकार किया।

वैवाहिक विवाद पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पत्नी द्वारा संबंध बनाने से रोकना मानसिक अत्याचार

बिलासपुर हाईकोर्ट ने तलाक से जुड़े अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पत्नी का पति को शारीरिक संबंध बनाने से रोकना मानसिक क्रूरता है. मामले में हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को खारिज करते हुए पति की अपील पर तलाक मंजूर कर लिया है. जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस ए के प्रसाद के डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि 11 साल लंबे अलगाव और पत्नी की शारीरिक संबंध के लिए अनिच्छा मानसिक क्रूरता मानी जाएगी. मामले में पति को अपनी पत्नी को दो महीने के अंदर 20 लाख रुपए स्थायी गुजारा भत्ता देना होगा. दरअसल, अंबिकापुर के रहने वाले 45 साल वर्षीय व्यक्ति की शादी 30 मई 2009 को रायपुर की रहने वाली महिला के साथ हिंदू रीति- रिवाजों से हुई थी. पति का आरोप है कि उसकी पत्नी शादी के एक महीने बाद ही उसे छोड़कर मायके चली गई. जिस पर उन्होंने फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i-a) के तहत तलाक की मांग करते हुए आवेदन प्रस्तुत किया. पति ने बताया कि 2013 में अंबिकापुर में उसकी पत्नी कुछ दिन साथ रही. लेकिन शारीरिक संबंध बनाने से मना करती रही. महिला ने अपने पति को यह भी धमकी दी कि वो शारीरिक संबंध बनाएगा तो सुसाइड कर लेगी. पत्नी मई 2014 से मायके में रह रही है, और पति के लगातार प्रयासों के बावजूद वापस नहीं लौटी. केस दर्ज होने के बाद भी उसने कभी अपने पति से संपर्क नहीं किया. इसके साथ ही परिवार के किसी खुशी या दुख के अवसर पर शामिल नहीं हुई. वहीं पत्नी ने अपने पति के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि उसके पति एक साध्वी के भक्त हैं, और योग साधना में लीन रहने के कारण वैवाहिक संबंधों में रुचि नहीं रखते थे. उसने आरोप लगाया कि पति बच्चे नहीं चाहते थे. उन्होंने पति पर मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने का आरोप लगाया. पत्नी ने पहले वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए अर्जी भी लगाई, लेकिन बाद में उसे वापस ले लिया. दोनों पक्षों को सुनने के बाद फैमिली कोर्ट ने पति की अर्जी को खारिज कर दी. जिसके बाद पति ने फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील की, जिसमें उन्होंने बताया कि फैमिली कोर्ट ने उनके तर्कों को सुने बगैर ही तलाक की अर्जी को खारिज किया है. साथ ही कहा कि वैवाहिक जीवन जीने के लिए पत्नी का साथ होना जरूरी है. मामले में हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों के बयान और रिकॉर्ड को देखते हुए पाया कि पति-पत्नी 11 साल से अलग रह रहे हैं. पत्नी ने क्रॉस एग्जामिनेशन में खुद स्वीकार किया कि वह अब पति के साथ वैवाहिक जीवन जारी नहीं रखना चाहती. कोर्ट ने कहा कि इतने लंबे अलगाव और संबंधों में लौटने से स्पष्ट इनकार को मानसिक क्रूरता माना जाएगा. मामले में दोनों पक्षों को सुनने के बाद डिवीजन बेंच ने पति की तलाक की अपील को स्वीकार कर ली है.

एमपी हाईकोर्ट का कड़ा रुख: युवक को टाइपिंग त्रुटि से हुई जेल, कलेक्टर से दो लाख वसूलने के निर्देश

जबलपुर मध्य प्रदेश के शहडोल जिले के 26 वर्षीय सुशांत बैस ने कहा कि एक लिपिकीय त्रुटि के कारण मुझे एक साल से ज्यादा समय तक जेल में रहना पड़ा। राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत उनकी गलत हिरासत इस बात का एक स्पष्ट उदाहरण बन गई है कि कैसे एक नौकरशाही का जाल किसी की ज़िंदगी को उलट-पुलट कर सकता है। सुशांत को पिछले साल चार सितंबर को गिरफ़्तार किया गया था और इस साल नौ सितंबर को हाई कोर्ट द्वारा उनकी रिहाई के आदेश के बाद उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया। हाई कोर्ट ने ज़िला कलेक्टर को अवमानना ​​का नोटिस जारी किया और उन्हें सुशांत को दो लाख रुपये का मुआवज़ा देने का निर्देश दिया। लेकिन यह राहत उनके लिए कोई सांत्वना नहीं है। पत्नी अकेले संघर्ष कर रही थी 26 वर्षीय सुशांत का कहना है कि एक साल तक चली इस यातना ने उनके दिल पर गहरे जख्म छोड़ दिए हैं। मेरी बेटी अनाया का जन्म 13 मार्च को हुआ था। मैंने उसे पहली बार घर लौटने के बाद ही देखा था। उन्होंने यह याद करते हुए कि कैसे उनकी पत्नी अकेले संघर्ष कर रही थीं और उनके माता-पिता ने एक ऐसा मुकदमा लड़ने के लिए पैसे उधार लिए थे जिसे वे समझ नहीं पा रहे थे। अनाया ने अपने पहले कदम तब रखे जब मैं जेल में था। कोई व्यवस्था, कोई पैसा मुझे वह समय वापस नहीं दिला सकता। अपनी गिरफ्तारी से बमुश्किल कुछ महीने पहले ही शादी करने वाले सुशांत कहते हैं कि इस यातना ने उनके दिल पर गहरे जख्म छोड़ दिए हैं। अब, इस गलत तरीके से कैद किए जाने के कारण मेरी नौकरी की संभावना भी खत्म हो गई हैं। कोर्ट ने अपनाया गंभीर रूख सुशांत को जेल में डालने वाला कोई अपराध नहीं था, बल्कि अधिकारियों ने शुरुआत में इसे एक नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया के दौरान टाइपिंग की गलती बताकर टाल दिया था। शहडोल के ज़िला कलेक्टर केदार सिंह ने एक एनएसए निरोध आदेश पर हस्ताक्षर किए, जिसमें वास्तविक अभियुक्त नीरजकांत द्विवेदी के बजाय सुशांत का नाम था। न्यायालय ने युवक को हुई मानसिक प्रताड़ना पर गंभीर रुख़ अपनाया। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति अवनींद्र कुमार सिंह की युगलपीठ ने राज्य सरकार की भी खिंचाई की और कहा कि वह निरोध आदेश को मंज़ूरी देने से पहले उसकी जांच-पड़ताल करने में विफल रही।

बाएं की जगह दाएं घुटने का ऑपरेशन, फिर दोनों की कर दी सर्जरी—हाईकोर्ट सख्त, जांच के निर्देश

बिलासपुर ईएसआईसी योजना के तहत उपचार करा रही एक गरीब महिला के साथ हुई गंभीर चिकित्सीय लापरवाही को लेकर हाई कोर्ट ने नाराजगी जताई है। अदालत ने बिलासपुर के लालचंदानी अस्पताल और आरबी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में किए गए गलत घुटने के ऑपरेशन को लेकर पूर्व गठित जांच समिति की रिपोर्ट को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समिति न तो नियमों के तहत गठित थी और न ही इसकी प्रक्रिया वैध थी। कलेक्टर को अब नई उच्चस्तरीय समिति बनाकर चार माह में जांच पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं। ईएसआईसी योजना के तहत दयालबंद निवासी शोभा शर्मा का उपचार पहले लालचंदानी अस्पताल में शुरू हुआ। बाद में उन्हें ऑपरेशन के लिए आरबी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस भेजा गया। आरोप है कि डॉक्टरों ने बाएं घुटने की जगह गलती से दाएं घुटने का ऑपरेशन कर दिया। इस गंभीर भूल पर आपत्ति जताए जाने के बाद बिना पूरी तैयारी और आवश्यक जांच के जल्दबाजी में बाएं घुटने का भी ऑपरेशन कर दिया गया। चलने-फिरने में असमर्थ हो गई दोनों ऑपरेशनों के बाद भी उनकी समस्या खत्म नहीं हुई और स्थिति बिगड़ती गई, जिससे वे सामान्य चलने-फिरने और काम करने में असमर्थ हो गईं। इस मामले की शिकायत पर चार सदस्यीय जांच समिति गठित की गई थी, जिसने दोनों अस्पतालों को क्लीन चिट दे दी। हाई कोर्ट ने पाया कि यह समिति न तो विधिपूर्वक गठित थी और न ही इसका अध्यक्ष डिप्टी कलेक्टर स्तर का अधिकारी था, जो नियम 18 में अनिवार्य है। चार महीने में जांच पूरी करने को कहा कोर्ट ने कलेक्टर को निर्देश दिया है कि वह नई उच्चस्तरीय जांच समिति का गठन करें और चार माह में जांच पूरी करें। पीड़िता ने अदालत को बताया कि आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण न्याय की लड़ाई लड़ना संभव नहीं था, लेकिन प्रो बोनो कानूनी सहायता मिलने से वे कोर्ट तक पहुंच सकीं। चिकित्सीय लापरवाही के कारण वे आज भी सामान्य दैनिक कार्य करने में असमर्थ हैं।

खराब सड़क निर्माण पर सख्त हाईकोर्ट: NHAI को नोटिस, सड़क सुधारने के निर्देश

  इंदौर  मध्यप्रदेश के हाईकोर्ट की इदौर खंडपीठ ने NHAI (National Highways Authority of India भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण) के बनाए गए 8.5 किलोमीटर के हाईवे (सड़क) को लेकर लगी याचिका मामले में 15 दिसंबर तक जवाब मांगा है। गड्ढों के कारण हो रहे हादसे याचिकाकर्ता के एडवोकेट के मुताबिक 106 करोड रुपए की लागत से बनी सड़क 6 महीने में उखड़कर गड्ढे में तब्दील हो गई है। मामले में इंदौर हाईकोर्ट ने NHAI से 15 दिसंबर तक जवाब मांगा है। याचिका में बताया गया है कि सड़क पर हुए गड्ढों के कारण हादसे हो रहे हैं। इंदौर सेंधवा हाईवे का मामला इंदौर हाईकोर्ट ने NHAI को सड़क ठीक करने के निर्देश दिए हैं। साल 2009 से 2024 के बीच 3000 से ज्याद एक्सीडेंट में 450 से ज्यादा मौतें हो चुकी है। घाट को कम करने के लिए 8.5 किलोमीटर का रोड का निर्माण किया था। जनहित याचिका लगने के बाद ही इंदौर सेंधवा हाईवे का यह रोड बनाया गया था।

ट्रैक पार करते समय हादसे पर रेलवे प्रशासन को जवाबदेह ठहराया, हाई कोर्ट ने रेलवे का दावा खारिज किया

जबलपुर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है "यदि रेलवे ने पटरियों तक अनधिकृत पहुंच को रोकने के पर्याप्त इंतजाम नहीं किए तो क्रॉसिंग करते समय हुई मौत के लिए भी मुआवजा भी देना पड़ेगा." इस प्रकार जस्टिस हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने रेलवे दावा अधिकरण भोपाल के फैसले को निरस्त कर दिया. रेलवे दावा अधिकरण के फैसले को चुनौती एकलपीठ ने अपने आदेश कहा "बच्चे सहित दो महिलाओं की मौत एक अप्रिय घटना के कारण हुई थी और रेलवे प्रशासन पटरियों तक अनधिकृत पहुंच रोकने तथा सुरक्षा सुनिश्चित करने के अपने वैधानिक कर्तव्य में विफल रहा. लापरवाही या अनधिकृत प्रवेश से रेलवे प्रशासन स्वतः ही दायित्व से मुक्त नहीं हो जाता है." मामले के अनुसार सिंगरौली निवासी राम अवतार सहित दो अन्य की तरफ से दायर अपील में रेलवे दावा अधिकरण के फैसले को चुनौती दी थी. रेलवे ट्रैक पर 3 लोगों की मौत का मामला याचिका में कहा गया "रेलवे ही हादसे के लिए जिम्मेदार है." रेलवे दावा अधिकरण ने माना था "रेलवे मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी नहीं है, क्योंकि मृतक ट्रेन में नहीं चढ़े थे. ट्रेन की पटरी में आने के कारण उनकी मौत हुई थी." राम अवतार अपने बेटे राजेश (उम्र 3 साल) का मुंडन कराने 16 अप्रैल 2011 में मैहर ले गए थे. इस दौरान 8-10 लोगों का समूह मैहर गया था. लौटते समय रेलवे स्टेशन में बालक राजेश रेलवे की पटरियों पर आ गया था और उसे बचाने के लिए दो महिलाएं भी पटरी पर आ गईं और तीनों ट्रेन की चपेट में आ गई थीं. रेलवे दावा प्राधिकरण को मुआवजा के निर्देश प्राधिकरण ने सुनवाई के दौरान पाया था "समूह के लोग ट्रेन संख्या 51672 सतना-इटारसी पैसेंजर में नहीं चढे़ थे. लोली बाई, इंद्रमती और राजेश (बालक) की दूसरी पटरी से गुजरती हुई गुजरती ट्रेन की चपेट में आने से हुई." रेलवे ने लिखित बयान के माध्यम से दुर्घटना से इनकार किया और कहा "मृतक रेलवे लाइन पार कर रहे थे, तभी गुजरती ट्रेन की चपेट में आ गये." एकलपीठ ने रेलवे दावा अधिकरण को निर्धारित मुआवआ देने के निर्देश जारी किये हैं. जबलपुर में घोड़ों की मौत के मामले में सुनवाई एक अन्य मामले में हैदराबाद से जबलपुर लाए गए घोड़ों की मौत के मामले की सुनवाई हाई कोर्ट में हुई. याचिकाकर्ता की तरफ से कहा गया "पिछले माह में कुछ और घोड़ों की मौत हुई, जिसे छुपाया जा रहा है." हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा तथा जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ ने आरोप को गंभीरता से लेते हुए केयरटेकर सचिन तिवारी को शपथ पत्र पर यह बताने कहा है "वर्तमान में कितने घोड़े बचे हैं और उनका मानसिक व शारीरिक स्टेटस क्या है." युगलपीठ ने यह भी बताने कहा है "घोड़ों को स्वस्थ रखने के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं." युगलपीठ ने मामले की अगली सुनवाई 3 दिसंबर को नियत की है. जबलपुर निवासी पशु प्रेमी सिमरन इस्सर की ओर से याचिका दायर की गई थी.