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हाईकोर्ट में गरमाया माहौल: ‘आप वकील कहलाने के योग्य नहीं’ सुनते ही भड़कीं जज साहिबा

नई दिल्ली  बार चुनावों को लेकर गंभीर आरोप लगाने वाले वकील को दिल्ली हाईकोर्ट ने फटकार लगाई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने वकील की फेसबुक पोस्ट पर आपत्ति जताई है। साथ ही कहा है कि वह वकील बनने तक के लायक नहीं हैं। हालांकि, कोर्ट ने अवमानना की कार्यवाही करने से इनकार कर दिया है, लेकिन वकील को कड़े शब्दों में चेतावनी दी है।   मामला दिल्ली डिस्ट्रिक्ट कोर्ट बार एसोसिएशन चुनावों से जुड़ा हुआ है। यहां एक एडवोकेट ने फेसबुक पर चुनाव में गड़बड़ी के गंभीर आरोप लगाए थे और भड़काऊ पोस्ट की थी। जस्टिस मिनी पुष्करणा ने इस पर कड़ी आपत्ति जाहिर की है। उन्होंने वकील की आलोचना की और मामला बार काउंसिल ऑफ इंडिया के पास भेजने की बात कही है। बार एंड बेंच के अनुसार, उन्होंने कहा, 'अगर आप इस तरह की पोस्ट डालते हैं, तो आप वकील बनने के लायक ही नहीं हैं। चुनाव कभी भी दोस्ताना नहीं होते और खासतौर से बार के। इससे आपको ये सब पोस्ट करने का अधिकार नहीं मिलता है। मैं इस मामले को बार काउंसिल ऑफ इंडिया के पास भेजूंगी। ये सब क्या बकवास है। बार में ऐसे नेता नहीं होने चाहिए। कोर्ट आपके इस काम और सफाई से खुश नहीं है। कोर्ट ऐसे बार नेताओं के होने की उम्मीद नहीं करता है।' कोर्ट में पोस्ट करने वाले वकील की तरफ से एडवोकेट महमूद पर्चा पेश हुए थे। उन्होंने मुवक्किल की ओर से बगैर शर्त माफी मांगी है। हालांकि, कोर्ट ने आदेश दिए हैं कि वकील की तरफ से सोशल मीडिया पर की गईं पोस्ट्स को हटाया जाए। जज ने कहा, 'कोर्ट की गरिमा को बनाए रखना है। आप इस बात के व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे कि पोस्ट डिलीट की जाएं। कोर्ट ये उम्मीद नहीं करता कि बार के नेता ऐसा हों।' कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि एडवोकेट के फेसबुक पोस्ट को गंभीरता से लिया गया है। हालांकि, बगैर शर्त माफी मांगने और केस को देखते हुए कोर्ट की अवमानना की कार्यवाही नहीं की जा रही है। कोर्ट ने वकील को भविष्य में ऐसी कोई भी पोस्ट नहीं करने की चेतावनी देकर छोड़ा है। अदालत ने कहा है कि ऐसी कोई भी पोस्ट न की जाएं, जिसके कोर्ट की गरिमा को धक्का लगे।

सागर के थानों की अनियमितता पर हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को दी राहत, पुलिस कार्रवाई पर रोक

जबलपुर  हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकलपीठ के समक्ष शुक्रवार को सागर जिले के चार थानों की अनियमितता उजागर करने वाले याचिकाकर्ताओं के मामले की सुनवाई हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से आशंका जताई गई कि पुलिस दुर्भावनावश झूठे प्रकरण पंजीबद्ध कर सकती है। बताया गया कि स्टिंग ऑपरेशन के बाद से उनके कॉल रिकॉर्ड किए जा रहे हैं। इनको जारी किया गया नोटिश मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने प्रदेश के मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव विधि विभाग, प्रमुख सचिव गृह विभाग, पुलिस महानिदेशक, आईजी, पुलिस अधीक्षक सागर एवं सीबीआई को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह में जवाब मांगा है। साथ ही कोर्ट ने अंतरिम आदेश पारित करते हुए आगामी आदेश तक याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध किसी भी प्रकार की कार्रवाई न करने के निर्देश दिए हैं। राजधानी भोपाल निवासी राहुल शर्मा, दीपक शर्मा एवं सागर निवासी अतुल अग्रवाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ताओं ने सागर के चार थाना बहेरिया, मोतीनगर, मकरोनिया एवं गोपालगंज में पदस्थ पुलिस कर्मियों द्वारा अवैध शराब की बिक्री, छह हजार रुपये प्रति सप्ताह लेकर शहर में जुआ-सट्टा खिलाने की अनुमति, नाबालिगों के माध्यम से ड्रग्स, स्मैक व गांजा विक्रय तथा स्पा सेंटरों में देह व्यापार संचालित करवाने का स्टिंग ऑपरेशन के माध्यम से खुलासा किया था। कार्रवाई के बजाय परेशान इस संबंध में 30 नवंबर को खबर प्रकाशित की गई थी। दलील दी गई कि मामले उजागर होने के बाद पुलिस प्रशासन ने दोषी अधिकारियों के विरुद्ध जांच व कार्रवाई करने के बजाय याचिकाकर्ताओं के कॉल रिकॉर्डिंग और आईपीडीआर निकलवाने शुरू कर दिए। साथ ही याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध झूठे प्रकरण दर्ज करने की तैयारी की जा रही है।  

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने विक्रम अवार्ड-2023 पर अंतरिम रोक लगाई, कोर्ट ने दूसरी दावेदार से मांगा जवाब

जबलपुर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने साहसिक खेलों के लिए दिए जाने वाले विक्रम अवार्ड-2023 का आयोजन करने पर अंतरिम रोक लगा दी। कोर्ट ने दूसरी दावेदार भावना डेहरिया को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। साथ ही मामले की अगली सुनवाई पांच जनवरी, 2026 को निर्धारित की। कहा कि तब तक विक्रम अवार्ड-2023 आयोजन न किया जाए। सीहोर निवासी पर्वतारोही मेघा परमार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक कृष्ण तन्खा व अधिवक्ता अतुल जैन ने पक्ष रखा। दलील दी कि याचिकाकर्ता इस अवार्ड की सही दावेदार है, इसलिए अंतिम निराकरण तक उक्त अवार्ड किसी अन्य को नहीं दिया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि मप्र शासन ने साहसिक खेलों के लिए विक्रम अवार्ड 2023 की घोषणा की है। इसके लिए छिंदवाड़ा की पर्वतारोही भावना डेहरिया का चयन किया गया है। याचिकाकर्ता को भावना के चयन पर कोई आपत्ति नहीं है। उसका कहना है कि 22 मई 2019 को दुनिया की सबसे ऊंची छोटी माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराने वालों में वह अग्रणी थीं। भावना डेहरिया से पहले तिरंगा फहराया था। दोनों के बीच पांच घंटे का अंतराल था। मेघा सुबह पांच बजे चोटी पर पहुंच गई थीं, जबकि भावना पौने 10 बजे पहुंची थीं। इस लिहाज से भावना की भांति मेघा का भी विक्रम अवार्ड पर हक है। नियम शिथिल करें विगत सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता तन्खा ने दलील दी थी कि 2022 में विक्रम अवार्ड के चयन की प्रक्रिया में नियमों को शिथिल करते हुए प्रदेश के दो पुरुष खिलाड़ियों पर्वतारोही भगवान सिंह और रत्नेश पांडेय के नामों पर मुहर लगाई थी। दोनों के बीच लक्ष्य हासिल करने में एक घंटे का अंतराल था। एक वर्ष में सिर्फ एक खिलाड़ी को अवार्ड देने का नियम बदलने का दृष्टांत सामने है। याचिकाकर्ता मेघा के लिए विक्रम अवार्ड पाने का नामांकन प्रक्रिया के अनुसार यह अंतिम अवसर है। कोर्ट को बताया गया कि प्रदेश में संचालित बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान में याचिकाकर्ता मेघा परमार को ब्रांड एम्बेसडर नियुक्त किया गया था और भावना को यह अवसर मेघा के बाद हासिल हुआ।

हाईकोर्ट का निर्णय: विवाहेतर यौन संबंध के मामले में तस्वीरों के आधार पर तलाक का फैसला सही

जबलपुर  विवाहेतर यौन संबंध में 65 बी सर्टिफिकेट के बिना तस्वीरों के आधार पर दिया गया तलाक का फैसला सही है. हाईकोर्ट जस्टिस विशाल धगट और जस्टिस बी पी शर्मा की युगलपीठ ने अहम फैसले में कहा है कि शादी के मामले में इंडियन एविडेंस एक्ट पूरी तरह से लागू नहीं होता है. युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि 65-बी सर्टिफिकेट के बिना कुटुंब न्यायालय के द्वारा तस्वीर को देखते हुए विवाहेतर यौन संबंध के आधार पर तलाक की डिक्री जारी करने में कोई गलती नहीं की है. युगलपीठ ने इस आदेश के साथ दायर अपील को खारिज कर दिया. कुटुंब न्यायालय के फैसले को हाईकोर्ट में दी थी चुनौती बालाघाट निवासी महिला की तरफ से कुटुंब न्यायालय के द्वारा तलाक की डिक्री जारी किये जाने को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी. अपील में कहा गया था कि उसका विवाह साल 2006 में अनावेदक के साथ हिन्दू रीति रिवाज के अनुसार हुआ था. अनावेदक पति ने एक अन्य व्यक्ति के साथ उसकी आपत्तिजनक फोटो के साथ कुटुंब न्यायालय ने तलाक के लिए आवेदन किया था. फोटो के साथ इंडियन एविडेंस एक्ट के तहत प्रमाणिता के लिए 65-बी सार्टिफिकेट प्रस्तुत नहीं किया गया था. अपील में सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा पारित आदेश का हवाला देते हुए कहा गया था कि एविडेंस एक्ट, 1872 के सेक्शन 65-बी का पालन करना जरूरी है. अपीलकर्ता के मोबाइल में यह तस्वीर गलती से अनावेदक पति के मोबाइल पर ट्रांसफर हो गई थी. जिसके बाद पति ने उसका मोबाइल फोन तोड़ दिया. एविडेंस एक्ट की सेक्शन 65-बी के तहत बिना प्रमाणिता सार्टिफिकेट के कुटुंब न्यायालय द्वारा पारित आदेश निरस्त करने योग्य है. 'पति के पास पत्नी के मोबाइल फोन पर उसके एडल्टरी के थे सबूत' हाईकोर्ट जस्टिस विशाल धगट और जस्टिस बी पी शर्मा की युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि "अपीलकर्ता ने इस बात से इनकार नहीं किया है कि वह तस्वीरों में नहीं थी. सिर्फ यह कहा गया है कि तस्वीरें किसी ट्रिक का इस्तेमाल करके बनाई गई हैं. नकली तस्वीरें किसने और किस तरीके से क्यों बनाई हैं, इसका भी उल्लेख नहीं किया है. अपीलकर्ता ने अपने बयान में कहा था कि तस्वीरें उसके मोबाइल से पति के मोबाइल में ट्रांसफर की गईं, फिर पति ने उसका मोबाइल तोड़ दिया. पति के पास पत्नी के मोबाइल फोन पर उसके एडल्टरी के सबूत थे. कोई भी इंसान नहीं चाहेगा कि उसकी पत्नी एडल्टरी करती रहे. इसलिए पति ने गुस्से में पत्नी का मोबाइल फोन तोड़ दिया. जिससे उसकी अपने पार्टनर से बातचीत बंद हो जाए. जिस फोटोग्राफर ने फोटो खींची थी उससे भी कोर्ट में पूछताछ की गई थी." 'इंडियन एविडेंस एक्ट शादी के मामलों में पूरी तरह लागू नहीं होता' युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि "इंडियन एविडेंस एक्ट शादी के मामलों में पूरी तरह लागू नहीं होता है. फैमिली कोर्ट एक्ट के सेक्शन 14 के मुताबिक कुटुंब न्यायालय को सच्चाई का पता लगाने के लिए सबूत के तौर पर कोई भी रिपोर्ट, बयान, डॉक्यूमेंट्स लेने का अधिकार दिया गया है. कुटुंब न्यायालय ने इन तस्वीरों पर भरोसा करके विवाहेतर यौन संबंध के आधार पर तलाक की डिक्री जारी करके कोई गलती नहीं की. युगलपीठ ने इस आदेश के साथ महिला की अपील को खारिज कर दिया.

हाईकोर्ट ने दिए ज्यूडिशियल सेपरेशन के आदेश, बीमारी छिपाने को माना क्रूरता

जबलपुर हाईकोर्ट जस्टिस विशाल धगट तथा जस्टिस बीपी शर्मा की युगलपीठ अपने अहम फैसले में कहा है कि बीमारी की जानकारी छुपाकर विवाह करना और बीमार करने की साजिश करने का आरोप लगाना क्रूरता की श्रेणी में आता है। जीवन साथी की सेहत को लेकर टेंशन में दूसरे पक्ष को ज़िंदगी भर परेशान रहते हुए आर्थिक तथा भावुक नुकसान उठाना पड़ेगा। हाईकोर्ट युगलपीठ ने कुटुम्ब न्यायालय के आदेश को निरस्त करते हुए अपीलकर्ता पति के पक्ष में ज्यूडिशियल सेपरेशन के आदेश जारी किए हैं। मंडला निवासी डॉ. महेन्द्र कुशवाहा की तरफ से दायर अपील में ज्यूडिशियल सेपरेशन के आवेदन को कुटुम्ब न्यायालय द्वारा निरस्त किए जाने को चुनौती दी गई थी। अपील में कहा गया था कि उसकी अनावेदिका पत्नी के साथ अरेंज मैरिज हुई थी। विवाह के पूर्व वह मिर्गी की बीमारी से पीड़ित थी और इस संबंध में उसे जानकारी नहीं दी गई। विवाह के बाद अनावेदिका को जून व जुलाई 2022 में मिर्गी के दौरे आने के बाद अपीलकर्ता ने ज्यूडिशियल सेपरेशन के लिए कुटुम्ब न्यायालय में आवेदन किया था। ज्यूडिशियल सेपरेशन के आवेदन की सुनवाई के दौरान पत्नी ने इस बात से साफ इंकार कर दिया कि वह मिर्गी की बीमारी से पीड़ित है। उसने अपने पति व सास पर बदनीयती से बीमार करने उसे बहुत मीठा खाना खाना दिए जाने के आरोप लगाये थे। पत्नी का तर्क, मिर्गी कोई बीमारी नहीं है अनावेदक पत्नी की तरफ से तर्क दिया गया कि ज्यूडिशियल सेपरेशन की मंजूरी से उसकी परेशानियां बढ़ जाएंगी। बीमारी के मुश्किल समय में यह उसके साथ क्रूरता होगी। पति को पत्नी की देखभाल करनी चाहिए और कोर्ट में ज्यूडिशियल सेपरेशन की अपील नहीं करनी चाहिए थी। मिर्गी कोई ऐसी बीमारी नहीं है जिसका इलाज नहीं है। उसे यह बीमारी शादी के बाद हुई है। कोर्ट ने माना सच छिपाकर धोखा किया गया युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि हर इंसान के पास शादी का पार्टनर चुनने का ऑप्शन होता है। वह बायोडाटा देखने, एक-दूसरे से मिलने और परिवार के सदस्यों और दोस्तों से बात करने के बाद एक-दूसरे से शादी करते हैं। अपीलकर्ता को बीमारी के संबंध में जानकारी होती तो शायद वह अनावेदक से शादी नहीं करता। शादी के बाद बीमारी होने के बाद पति का फ़र्ज़ है कि वह पत्नी का ध्यान रखे। सच छिपाकर अपीलकर्ता के साथ धोखा किया गया है। मेडिकल रिपोर्ट से स्पष्ट, बीमारी पहले से थी मेडिकल दस्तावेज से स्पष्ट है कि अनावेदक को विवाह के पहले से उक्त बीमारी थी। इसके बावजूद भी अनावेदिका ने पति व सास पर साज़िश का झूठा आरोप लगाया गया। अनावेदक का यह बर्ताव क्रूरता के बराबर है, जो हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के सेक्शन 13(1)(पं) के तहत क्रूरता के दायरे में आएगा। युगलपीठ ने कुटुम्ब न्यायालय के आदेश को निरस्त करते हुए अपीलकर्ता के पक्ष में ज्यूडिशियल सेपरेशन आदेश जारी किए है।

पीड़िता की नाबालिग होने की बात साबित नहीं कर पाई सरकार, हाईकोर्ट ने नहीं माना दुष्कर्म का आरोप

बिलासपुर हाईकोर्ट ने शादी का वादा कर नाबालिग से दुष्कर्म करने के आरोपी को दोषमुक्त किए जाने के खिलाफ पेश राज्य शासन की अपील खारिज कर दी है. पीड़िता ने इस बात का स्वीकार किया था कि वह आरोपी के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रह रही थी. मामले की सुनवाई जस्टिस संजय एस. अग्रवाल एवं जस्टिस राधाकिशन अग्रवाल की डीविजन बेंच में हुई. जानकारी के मुताबिक, रायगढ़ जिले की रहने वाली पीड़िता ने 10 फरवरी 2016 को रिपोर्ट दर्ज कराई कि 1 फरवरी 2016 से आरोपी उसके साथ लिव इन रिलेशनशिप में था, और इस दौरान उसने शादी का झूठा बहाना बनाकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाया. जब पीड़िता ने उससे शादी करने के लिए कहा, तो उसने मना कर दिया. पीड़िता की शिकायत के आधार पर पुलिस ने आरोपी के खिलाफ धारा 376 एवं पास्को एक्ट के तहत जुर्म दर्ज किया. पीड़िता का चिकित्सकीय परीक्षण रिपोर्ट में पीड़िता के साथ जबरदस्ती सेक्सुअल इंटरकोर्स का कोई निशान नहीं देखा और न ही पीड़िता के शरीर पर अंदर या बाहर कोई चोट का निशान पाये जाने की रिपोर्ट दी गई. उम्र प्रमाणित करने के लिए पीड़ित का वर्ष 2011 का प्रोग्रेस कार्ड के हिसाब से जन्म प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया गया. मामले की सुनवाई स्पेशल कोर्ट में हुई. सुनवाई के बाद कोर्ट ने पीड़ित के बयान व उसकी उम्र 18 वर्ष से कम होना साबित नहीं होने पर आरोपी को दोषमुक्त किया. स्पेशल कोर्ट द्वारा दोषमुक्ति को चुनौती देते हुए राज्य शासन ने हाई कोर्ट में अपील की थी. मामले की सुनवाई जस्टिस संजय एस. अग्रवाल व जस्टिस राधाकिशन अग्रवाल की डीविजन बेंच में हुई. पीड़िता की आयु 18 वर्ष से कम साबित नहीं हो पाया.

‘आत्महत्या की धमकी भी मानसिक प्रताड़ना’ – हाईकोर्ट ने तलाक को दी हरी झंडी

बिलासपुर पति-पत्नी के बीच विवाद के मामले में पत्नी की तलाक के खिलाफ पेश अपील को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, आत्महत्या करने की बार-बार धमकी देना क्रूरता है। जब ऐसी बात किसी इशारे या हाव-भाव के रूप में दोहराई जाती है तो कोई भी पति-पत्नी शांति से नहीं रह सकता। इस मामले में अपील करने वाले के पति ने यह दिखाने के लिए काफी सबूत पेश किए हैं कि पत्नी बार-बार आत्महत्या करने की धमकी देती थी और एक बार तो अपने ऊपर कैरोसिन डालकर आत्महत्या करने की कोशिश भी की थी। क्रूरता का मतलब है पति-पत्नी के साथ इतनी क्रूरता से पेश आना, जिससे उसके मन में यह डर पैदा हो कि दूसरे पक्ष के साथ रहना उसके लिए नुकसानदायक होगा। पत्नी के काम इतने गंभीर हैं कि पति को दर्द, और तकलीफ़ हुई है, जो शादी के कानून में क्रूरता मानी जाएगी। जानिए पूरा मामला अपीलकर्ता पत्नी की 11 मई 2018 को हिदू रीति-रिवाजों के साथ हुई थी। वह पति के साथ रह रही थी और उनकी शादी से उनका बेटा पैदा हुआ, जो अभी लगभग 03 साल का है। शादी के लगभग एक हफ्ते बाद पति-पत्नी मोटरसाइकिल पर डोंगरगढ़ में मां बम्लेश्वरी मंदिर जा रहे थे और रास्ते में अचानक उनके सामने एक भैंस आ गई और उनका एक्सीडेंट हो गया। पत्नी ने अपने पिता को बताई। पिता ने दोनों को बागतराई बुलाया और उन्हें अधारी नवगांव की दरगाह पर ले गए, यह कहकर कि उन पर भूत का साया है और हर गुरुवार को वहां आने को कहा और उन्हें भरोसा दिलाया कि उनका बिजनेस अच्छा चलेगा। शादी के बाद पति लगभग 7-8 महीने तक पत्नी को हर गुरुवार बागतराई ले जाने लगा, जिससे उसे बिजनेस में नुकसान हुआ और इस दौरान पति को पता चला कि पत्नी और उसके माता-पिता मुस्लिम हैं और उन्होंने यह बात छिपाकर शादी की थी। फिर पति ने अपील करने वाले को हर गुरुवार उसके माता-पिता के घर ले जाने से मना कर दिया। पत्नी हर गुरुवार को अपने माता-पिता के घर जाने की जिद करने लगी। पत्नी और उसके माता-पिता ने उसे मुस्लिम धर्म अपनाने के लिए कहना शुरू कर दिया, जिससे पति ने मना कर दिया। इस पर पत्नी का व्यवहार बहुत बदल गया और झगड़ा करने लगी। पत्नी ने अजीब तरह से व्यवहार करना शुरू कर दिया, गाली-गलौज करने लगी। 25 सितंबर 2019 को अपील करने वाली ने पति से बेवजह झगड़ा किया और केरोसीन डालकर खुद को आग लगाने की कोशिश की, जिसे पति ने किसी तरह बचाया। इसके बाद पत्नी अपने माता-पिता के घर चली गई। इस पर पति ने न्यायालय में तलाक के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। सुनवाई उपरांत न्यायालय ने तलाक के आवेदन को मंजूर किया। इसके खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील पेश की थी। कोर्ट ने कहा, मामले में भी यह बिल्कुल साफ़ है कि पत्नी ने अपने पति को बार-बार सुसाइड करने की कोशिश करके धमकाया और यह भी बिल्कुल साफ़ है कि साल 2020 से पत्नी अपने पति से अलग रह रही है। पत्नी के व्यवहार को देखते हुए पति के लिए किसी भी मेंटल प्रेशर के साथ उसके साथ रहना मुमकिन नहीं है। इसके साथ हाईकोर्ट ने पत्नी की तलाक के खिलाफ पेश अपील को खारिज कर दिया है।

राजस्थान हाई कोर्ट का बड़ा आदेश, शादी से पहले लिव इन में रह सकते हैं युवाओं

 जयपुर राजस्थान हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि दो व्यस्क आपसी सहमति से तब भी लिव इन में रह सकते हैं जब उनकी उम्र शादी के लायक नहीं हुई है। देश में शादी के लिए लड़की की आयु कम से कम 18 और लड़के की न्यूनतम 21 निर्धारित है, जबकि व्यस्क होने की उम्र 18 है। जस्टिस अनूप कुमार ढांड ने ऐसे ही दो व्यस्क की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अहम आदेश पारित किया। राजस्थान के कोटा की रहने वाली 18 साल की लड़की और 19 साल के लड़के ने संरक्षण की मांग की थी। लड़की की उम्र शादी के लायक हो चुकी है, लेकिन लड़के की उम्र में अभी दो साल की कमी है। फैसले की कॉपी गुरुवार को अपलोड की गई। इसके मुताबिक, दोनों ने पुलिस सुरक्षा की मांग करते हुए कहा था कि वे आपसी सहमति से लिव इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं। कपल ने 27 अक्टूबर 2025 को लिव इन अग्रीमेंट बनाया था। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक लड़की का परिवार इस रिश्ते के खिलाफ है और उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई। उन्होंने कहा कि पुलिस के सामने लिखित अपील के बाद भी कोई ऐक्शन नहीं लिया गया। राज्य की ओर से पेश हुए लोक अभियोजक विवेक चौधरी ने दलील दी कि चूंकि लड़के की उम्र 21 नहीं हुई है इसलिए वह कानूनी रूप से शादी नहीं कर सकता है। इसलिए उन्हें लिव इन पार्टनरशिप में रहने की इजाजत नहीं देनी चाहिए। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि संविधान का आर्टिकल 21 'जीवन जीने का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता'की गारंटी प्रदान करता है और कोई धमकी संवैधानिक उल्लंघन है। अदालत ने जोर देकर कहा कि राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि हर नागरिक से जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा हो। जज ने कहा, 'सिर्फ इसलिए कि याचिकाकर्ताओं की उम्र शादी के लिए लायक नहीं हुई है, उन्हें मौलिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है।' अदालत ने यह भी कहा कि भारतीय कानूनों के तहत लिव इन ना तो अवैध ही और ना ही अपराध। अदालत ने भीलवाड़ा और जोधपुर रूरल के एसपी को धमकी के आरोपों की जांच करने और कपल को जरूरत पड़ने पर सुरक्षा देने का आदेश दिया।

शिक्षक की मृत्यु के बाद बेटे की याचिका खारिज, हाईकोर्ट ने कहा—अनुकंपा नियुक्ति अनिवार्य नहीं

जबलपुर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक अहम आदेश में कहा है "अनुकंपा नियुक्ति अधिकार नहीं है. मृतक के परिवार को आर्थिक सहायता प्रदान करने अनुकंपा नियुक्ति प्रदान की जा सकती है. कर्मचारी की मृत्यु के 7 साल बाद परिजन अनुकंपा नियुक्ति की दावेदारी नहीं कर सकते." हाई कोर्ट जस्टिस दीपक खोत ने इस आदेश के साथ याचिका को खारिज कर दिया. बालिग होने के बाद अनुकंपा नियुक्ति की मांग आशुतोष साध ने याचिका में कहा "उसके पिता गवर्नमेंट मिडिल स्कूल ब्लॉक केसला तहसील इटारसी में असिस्टेंट टीचर थे. नौकरी के दौरान दिसम्बर 2008 में पिता की मौत हो गयी. उस समय वह नाबालिग था और उसकी उम्र महज 11 साल थी. वह सितंबर 2015 में बालिग हुआ था और साल 2016 में हायर सेकेंडरी एग्जाम पास किया." याचिकाकर्ता ने अप्रैल 2016 को अनुकंपा नियुक्ति के लिए डीईओ को आवेदन दिया था, उसे सूचित किया गया कि उसके पिता आदिवासी कल्याण विभाग में पदस्थ थे. इसलिए वह सहायक आयुक्त आदिवासी कल्याण विभाग में आवेदन दें. याचिकाकर्ता के पास बीएड व डीएड की डिग्री नहीं इसके बाद आशुतोष साध ने सहायक आयुक्त के समक्ष आवेदन पेश किया. उसके आवेदन पर उच्च अधिकारी से मार्गदर्शन मांगा गया. विभाग की तरफ जारी पत्र के अनुसार उसने जुलाई 2019 में अपने दस्तावेज जमा कर दिये थे. विभाग ने नियुक्ति के लिए उसकी पसंद पूछी थी तो उसने शिक्षक कैडर बताया. विभाग ने जनवरी 2020 के पत्र जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि 3 दिन के अंदर सर्टिफिकेट जमा नहीं होने पर उसका आवेदन निरस्त कर दिया जायेगा. याचिकाकर्ता के पास बीएड तथा डीएड की डिग्री नहीं थी, जो टीचिंग कैडर के लिए आवश्यक है. याचिकाकर्ता ने काफी देर से दिया आवेदन याचिकाकर्ता ने ग्रेजुएशन की डिग्री के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति प्रदान करने या बीएड की डिग्री के लिए दो साल का समय प्रदान करने के आग्रह किया. इसके बाद 3 सदस्यीय कमेटी ने उसके आवेदन को इस आधार पर खारिज कर दिया कि साल 2014 की पॉलिसी के अनुसार बालिग होने के एक साल के अंदर अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन करना था. लगभग 11 माह बाद आवेदन किया. याचिकाकर्ता की तरफ से तर्क दिया गया कि उसने अज्ञानतावश अप्रैल 2016 में आवेदन किया था, जो निर्धारित समय सीमा के अंदर था. हाई कोर्ट ने आदेश सुनाकर आवेदन किया खारिज एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया "याचिकाकर्ता के पिता का निधन 2008 में हुआ था. उस समय 2008 की पॉलिसी प्रभावी थी. अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन की अधिकतम समय सीमा 7 साल थी. कमेटी ने पॉलिसी 2014 के तहत आवेदन खारिज किया है. अनुकंपा पॉलिसी 2008 के अनुसार भी आवेदन निर्धारित समय अवधि के बाद दायर किया गया." एकलपीठ ने इस आदेश के साथ आवेदन खारिज कर दिया.

हाईकोर्ट ने निर्देश दिए, मानव-वन्यजीव संघर्ष की नीति पर सुप्रीम कोर्ट पालन की स्थिति रिपोर्ट पेश करनी होगी

जबलपुर हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा व न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पालन में बनाई जा रही नीति की स्टेटस रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। इसके लिए राज्य शासन को चार सप्ताह का समय दिया गया है। रिपोर्ट आने के बाद जनहित याचिकाकर्ता के सुझावों पर विचार किया जाएगा।  हुई सुनवाई में किसानों द्वारा हाई-वोल्टेज तार लगाने से वन्य प्राणियों की मौतें होने का बिंदु भी रेखांकित हुआ। जनहित याचिकाकर्ता रायपुर निवासी नितिन संघवी की ओर से अधिवक्ता अंशुमान सिंह ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि हाथियों को रेस्क्यू के नाम पर लंबे समय तक कैद में रखने का रवैया बेहद चिंताजनक है। मानव-वन्यजीव संघर्ष में फसलों और संपत्ति को भारी नुकसान हो रहा है, लेकिन इसकी भरपाई की प्रक्रिया बेहद धीमी है। मुआवजा पटवारी स्तर पर तय होता है और इसे सामान्य प्राकृतिक आपदा जैसा माना जाता है। राहत मिलने में काफी समय लगता है। आंकड़ों के अनुसार किसानों को सिर्फ 17 प्रतिशत तक ही मुआवजा मिल पाता है। फसल और संपत्ति के नुकसान का मामला वन विभाग संभाले। पटवारी के बजाय वन विभाग को जिम्मेदारी संभालनी चाहिए। मौत पर 10 लाख रुपये मुआवजा तय किया जाए सुप्रीम कोर्ट ने 17 नवंबर, 2025 को सभी राज्यों को टीएन गोदावर्मन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में यह निर्देश दिए थे कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को उत्तर प्रदेश और केरल की तर्ज पर प्राकृतिक आपदा की श्रेणी में रखा जाए। ऐसे मामलों में मौत पर 10 लाख रुपये मुआवजा तय किया जाए और छह महीने के भीतर विस्तृत नीति बनाई जाए। प्रदेश में बाघों की मौत का कारण करंट विगत सुनवाई में एक्सपर्ट कमेटी ने बताया था कि कान्हा में रखे गए जंगली हाथियों को 15 दिनों में छोड़ दिया जाएगा और उनकी ट्रैकिंग के लिए रेडियो कॉलर आईडी मंगवाई गई है। आज की सुनवाई में बताया गया कि दो हाथियों को कॉलर आईडी लगाकर जंगल में छोड़ दिया गया है। इसी देरी और परेशानियों के कारण किसान खेतों की सुरक्षा के लिए हाई टेंशन करंट वाले तार लगाने लगते हैं। इसके कारण प्रदेश में बड़ी संख्या में वन्य प्राणियों की मौत करंट लगने से हो रही है। याचिकाकर्ता ने कहा कि बाघों की मौत के मामलों में करंट एक बड़ा कारण है।